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सट्टा खेलने वालों को समाज सम्मान से नहीं देखता-आलेख


सच बात तो यह है कि सट्टा एक विषय है जिस पर अर्थशास्त्र में विचार नहीं किया जाता। पश्चिमी अर्थशास्त्र अपराधियों, पागलों और सन्यासियों को अपने दायरे से बाहर मानकर ही अपनी बात कहता है। यही कारण है कि क्रिकेट पर लगने वाले सट्टे पर यहां कभी आधिकारिक रूप से विचार नहीं किया जाता जबकि वास्तविकता यह है कि इससे कहीं कहीं देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिति प्रभावित हो रही है।
पहले सट्टा लगाने वाले आमतौर से मजदूर लोग हुआ करते थे। अनेक जगह पर सट्टे का नंबर लिखा होता था। सार्वजनिक स्थानों-खासतौर से पेशाबघरों- पर सट्टे के नंबर लिखे होते थे। सट्टा लगाने वाले बहुत बदनाम होते थे और उनके चेहरे से पता लग जाता था कि उस दिन उनका नंबर आया है कि नहीं। उनकी वह लोग मजाक उड़ाते थे जो नहीं लगाते थे और कहते-‘क्यों आज कौनसा नंबर आया। तुम्हारा लगा कि नहीं।’
कहने का तात्पर्य यह है कि सट्टा खेलने वाले को निम्नकोटि का माना जाता था। चूंकि वह लोग मजदूर और अल्प आय वाले होते थे इसलिये अपनी इतनी ही रकम लगाते थे जिससे उनके घर परिवार पर उसका कोई आर्थिक प्रभाव नहीं पड़े।

अब हालात बदल गये हैं। दिन ब दिन ऐसी घटनायें हो रही हैं जिसमें सट्टा लगाकर बरबाद हुए लोग अपराध या आत्महत्या जैसे जघन्य कार्यों की तरफ अग्रसर हो रहे हैं। इतना ही नहीं कई जगह तो ऐसे सट्टे से टूटे लोग अपने ही परिवार के लोगों पर आक्रमण कर देते हैं। केवल एक ही नहीं अनेक घटनायें सामने आयी हैं जिसमें सट्टे में बरबाद हुए लोगों ने आत्मघाती अपराध किये। होता यह है कि यह खबरें आती हैं तो सनसनी कुछ यूं फैलायी जाती है जिसमें रिश्तों के खून होने की बात कही जाती है। कहा जाता है कि ‘अमुक ने अपने माता पिता को मार डाला’, अमुक ने अपनी पत्नी और बच्चों सहित जहर खा लिया’, ‘अमुक ने अपनी बहन या भाई के के घर डाका डाला’ या ‘अमुक ने अपने रिश्ते के बच्चे का अपहरण किया’। उस समय प्रचार माध्यम सनसनी फैलाते हुए उस अपराधी की पृष्ठभूमि नहीं जानते पर जब पता लगता है कि उसने सट्टे के कारण ऐसा काम किया तो यह नहीं बताते कि वह सट्टा आखिर खेलता किस पर था।’
सच बात तो यह है कि सट्टे में इतनी बरबादी अंको वाले खेल में नहीं होती। फिर सट्टे में बरबाद यह लोग शिक्षित होते हैं और वह पुराने अंकों वाले सट्टे पर शायद ही सट्टा खेलते हों। अगर खेलते भी हों तो उसमें इतनी बरबादी नहीं होती। बहुत बड़ी रकम पर सट्टा संभवतः क्रिकेट पर ही खेला जाता है। प्रचार माध्यम इस बात तो जानकर छिपाते हैं यह अनजाने में पता नहीं। हो सकता है कि इसके अलावा भी कोई अन्य प्रकार का सट्टा खेला जाता हो पर प्रचार माध्यमों में जिस तरह क्रिकेट पर सट्टा खेलने वाले पकड़े जाते हैं उससे तो लगता है कि अधिकतर बरबाद लोग इसी पर ही सट्टा खेलते होंगे।
अनेक लोग क्रिकेट खेलते हैं और उनसे जब यह पूछा गया कि उनके आसपास क्या कुछ लोग क्रिकेट पर सट्टा खेलते है तो वह मानते हैं कि ‘ऐसा तो बहुत हो रहा है।’
सट्टे पर बरबाद होने वालों की दास्तान बताते हुए प्रचार माध्यम इस बात को नहीं बताते कि आखिर वह किस पर खेलता था पर अधिकतर संभावना यही बनती है कि वह क्रिकेट पर ही खेलता होगा। लोग भी सट्टे से अधिक कुछ जानना नहीं चाहते पर सच बात तो यह है कि क्रिकेट पर सट्टा खेलना अपने आप में बेवकूफी भरा कदम है। सट्टा खेलने वालों को निम्न श्रेणी का आदमी माना जाता है भले ही वह कितने बड़े परिवार का हो। सट्टा खेलने वालों की मानसिकता सबसे गंदी होती है। उनके दिमाग में चैबीसों घंटे केवल वही घूमता है। देखा यह गया है कि सट्टा खेलने वाले कहीं से भी पैसा हासिल कर सट्टा खेलते हैं और उसके लिये अपने माता पिता और भाई बहिन को धोखा देने में उनको कोई संकोच नहीं होता। इतना ही नहीं वह बार बार मरने की धमकी देकर अपने ही पालकों से पैसा एैंठते हैं। कहा जाता है कि पूत अगर सपूत हो तो धन का संचय क्यों किया जाये और कपूत हो तो क्यों किया जाये? अगर धन नहीं है तो पूत ठीक हो तो धन कमा लेगा इसलिये संचय आवश्यक नहीं है और कपूत है तो बाद में डांवाडोल कर देगा पर अगर सट्टेबाज हुआ तो जीते जी मरने वाले हालत कर देता है।
देखा जाये तो कोई आदमी हत्या, चोरी, डकैती के आरोप में जेल जा चुका हो उससे मिलें पर निकटता स्थापित नहीं करे पर अगर कोई सट्टेबाज हो तो उसे तो मिलना ही व्यर्थ है क्योंकि इस धरती पर वह एक नारकीय जीव होता है। एक जो सबसे बड़ी बात यह है कि क्रिकेट पर लगने वाला सट्टा अनेक बड़े चंगे परिवारों का नाश कर चुका है और यकीनन कहीं न कहीं इससे देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। देश से बाहर हो या अंदर लोग क्रिकेट पर सट्टा लगाते हैं और कुछ लोगों को संदेह है कि जिन मैचों पर देश का सम्मान दांव पर नहीं होता उनके निर्णय पर सट्टेबाजों का प्रभाव हो सकता है। शायद यही कारण है कि देश की इज्जत के साथ खेलकर सट्टेबाजों के साथ निभाने से खिलाड़ियों के लिये जोखिम भरा था।
इसलिये अंतर्राष्ट्रीय मैचों के स्थान पर क्लब स्तर के मैचों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। क्लब स्तर की टीमों मे देश के सम्मान का प्रश्न नहीं होता। सच क्या है कोई नहीं जानता पर इतना तय है कि क्रिकेट पर लगने वाला सट्टा देश को खोखला कर रहा है। जो लोग सट्टा खेलते हैं उन्हें आत्म मंथन करना चाहिये। वैसे तो पूरी दुनियां के लोग भ्रम में जी रही है पर सट्टा खेलने वाले तो उससे भी बदतर हैं क्योंकि वह इंसानों के भेष में कीड़े मकौड़ों की तरह जीवन जीने वाले होते हैं और केवल उसी सोच के इर्दगिर्द घूमते हैं और तथा जिनकी बच्चे, बूढे, और जवान सभी मजाक उड़ाते हैं।
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विवाह विच्छेद के नियम आसान होना चाहिये-आलेख


कुछ ऐसी घटनाएँ अक्सर समाचारों में सुर्खियाँ बनतीं है जिसमें पति अपनी पत्नी की हत्या कर देता है
१। क्योंकि उसे संदेह होता है की उसके किसी दूसरे आदमी से उसके अवैध संबंध हैं।
२।या पत्नी उसके अवैध संबंधों में बाधक होती है।
इसके उलट भी होता है। ऐसी घटनाएँ जो अभी तक पाश्चात्य देशों में होतीं थीं अब यहाँ भी होने लगीं है और कहा जाये कि यह सब अपनी सभ्यता छोड़कर विदेशी सभ्यता अपनाने का परिणाम है तो उसका कोई मतलब नहीं है। यह केवल असलियत से मुहँ फेरना होगा और किसी निष्कर्ष से बचने के लिए दिमागी कसरत से बचना होगा।
हम कहीं न कहीं सभी लोग पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण कर ही रहे हैं। फिर भी समाज में बदनामी का डर रहता है इसलिए पुराने आदर्शों की बात करते हैं पर विवाह और जन्म दिन के अवसर पर हम सब भूलकर उसी ढर्रे पर आ जाते हैं जिस पर पश्चिम चल रहा है।
मैं एक दार्शनिक की तरह समाज को जब देखता हूँ तो कई लोगों को ऐसे तनावों में फंसा पाता हूँ जिसमें आदमी का धन और समय अधिक नष्ट होता देखता हूँ। कई माँ-बाप अपने बच्चों की शादी कराकर अपने को मुक्त समझते हैं पर ऐसा होता नहीं है। लड़कियों की कमी है पर लड़के वालों के अंहकार में कमी नहीं है। हम इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि लडकी के बाप के रूप में आदमी झुकता है लड़के के बाप के रूप में अकड़ता है। अपने आसपास जब कुछ लोगों को बच्चों के विवाह के बाद भी उनके तनाव झेलते हुए पाता हूँ तो हैरानी होती है।

रिश्ते करना सरल है और निभाना और मुश्किल है और उससे अधिक मुश्किल है उनको तोड़ना। कई जगह लडकी भी लड़के के साथ रहना नहीं चाहती पर लड़के वाले दहेज़ और अन्य खर्च की वापसी न करनी पड़े इसलिए मामले को खींचते हैं। कई जगह कामकाजी लडकियां घरेलू तनाव से बहुत परेशान होती हैं और वह अपने पति से अलग होना चाहतीं है पर यह काम उनको कठिन लगता है। लंबे समय तक मामला चलता है। कुछ घर तो ऐसे भी देखे हैं कि जिनका टूटना तय हो जाता है पर उनका मामला बहुत लंबा चला जाता है। दरअसल अधिकतर सामाजिक और कानूनी कोशिशे परिवारों को टूटने से अधिक उसे बचाने पर केन्द्रित होतीं है। कुछ मामलों में मुझे लगा कि व्यर्थ की देरी से लडकी वालों को बहुत हानि होती है। अधिकतर मामलों में लडकियां तलाक नहीं चाहतीं पर कुछ मामलों में वह रहना भी नहीं चाहतीं और छोड़ने के लिए तमाम तरह की मांगें भी रखतीं है। कुछ जगह लड़किया कामकाजी हैं और पति से नहीं बनतीं तो उसे छोड़ कर दूसरा विवाह करना चाहतीं है पर उनको रास्ता नहीं मिल पाता और बहुत मानसिक तनाव झेलतीं हैं। ऐसे मामले देखकर लगता है कि संबंध विच्छेद की प्रक्रिया बहुत आसान कर देना चाहिए। इस मामले में महिलाओं को अधिक छूट देना चाहिऐ। जहाँ वह अपने पति के साथ नहीं रहना चाहतीं वह उन्हें तुरंत तलाक लेने की छूट होना चाहिए। जिस तरह विवाहों का पंजीयन होता है वैसे ही विवाह-विच्छेद को भी पंजीयन कराना चाहिए। जब विवाह का काम आसानी से पंजीयन हो सकता है तो उनका विच्छेद का क्यों नहीं हो सकता।

कहीं अगर पति नहीं छोड़ना चाहता और पत्नी छोड़ना चाहती है उसको एकतरफा संबंध विच्छेद करने की छूट होना चाहिए। कुछ लोग कहेंगे कि समाज में इसे अफरातफरी फ़ैल जायेगी। ऐसा कहने वाले आँखें बंद किये बैठे हैं समाज की हालत वैसे भी कौन कम खराब है। अमेरिका में तलाक देना आसान है पर क्या सभी तलाक ले लेते हैं। देश में तलाक की संख्या बढ रही हैं और दहेज़ विरोधी एक्ट में रोज मामले दर्ज हो रहे हैं। इसका यह कारान यह है कि संबंध विच्छेद होना आसान न होने से लोग अपना तनाव इधर का उधर निकालते हैं। वैसे भी मैं अपने देश में पारिवारिक संस्था को बहुत मजबूत मानता हूँ और अधिकतर औरतें अपना परिवार बचाने के लिए आखिर तक लड़ती है यह भी पता है पर कुछ अपवाद होतीं है जो संबध विच्छेद आसानी से न होने से-क्योंकि इससे लड़के वालों से कुछ नहीं मिल पाता और लड़के वाले भी इसलिए नहीं देते कि उसे किसी के सामने देंगे ताकि गवाह हों-तमाम तरह की नाटकबाजी करने को बाध्य होतीं हैं। कुछ लड़कियों दूसरों के प्रति आकर्षित हो जातीं हैं पर किसी को बताने से डरती हैं अगर विवाह विच्छेद के प्रक्रिया आसान हो उन्हें भी कोई परेशानी नहीं होगी।

कुल मिलकर विवाह नाम की संस्था में रहकर जो तनाव झेलते हैं उनके लिए विवाह विच्छेद की आसान प्रक्रिया बनानी चाहिऐ। हालांकि देश के कुछ धर्म भीरू लोग जो मेरे आलेख को पसंद करते है वह इससे असहमत होंगें पर जैसा मैं वाद और नारों से समाज नहीं चला करते और उनकी वास्तविकताओं को समझना चाहिऐ। अगर हम इस बात से भयभीत होते हैं तो इसका मतलब हमें अपने मजबूत समाज पर भरोसा नहीं है और उसे ताकत से नियंत्रित करना ज़रूरी है तो फिर मुझे कुछ कहना नहीं है-आखिर साठ साल से इस पर कौन नियंत्रण कर सका।

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अध्यात्मिक केंद्र हैं कि व्यापारिक-आलेख


भारत में अधिकतर लोगों का अध्यात्म के प्रति झुकाव स्वाभाविक कारणों से होता है। मात पिता और अन्य बुजुर्गों की प्रेरणा से अपने देवताओं की तस्वीरों के प्रति उनका आकर्षण इतना रहता है कि बचपने में ही उनके अध्ययने की किताबों और कापियों पर उनकी झाकियां देखी जा सकतीं हैं। मुझे याद है कि बचपन में जब कापियां खरीदने जाता तो भगवान की तस्वीरों की ही खरीदता था। एक बार अपनी मां से पैसे लेकर एक मोटी कापी लेने बाजार गया वहां पर भगवान की तस्वीर वाली कापी तो नहीं मिली हां एक कापी पर ‘ज्ञान संचय’ छपा था वह खरीद ली। वह घर लाया तो ‘ज्ञान’ शब्द ने दिमाग पर ऐसा प्रभाव डाला कि उस कुछ ऐसे ही लिखना शुरू कर दिया। फिर एक छोटी कहानी लिखने का प्रयास किया। तब मैंने सोचा कि इस पर तो मैं कुछ और लिखूंगा और विद्यालय का काम उस पर न करने का विचार किया। इसलिये फिर अपनी मां से दूसरी कापी लेने बाजार गया और अपने मनोमुताबिक भगवान जी की तस्वीर वाली किताब ले आया। वह ज्ञान संचय वाली किताब मुझे लेखक बनाने के काम में आयी।

आशय यह है कि पहले बाजार लोगों की भावनाओं को भुनाता था और ऐसी देवी देवताओं की तस्वीर वाली किताबें और कापियां छापता था जिससे लोग खरीदें। बाजार आज भी यही करता है और मैं उस पर कोई आक्षेप भी नहीं करता क्योंकि उसका यही काम है पर उसके सामने अब दूसरा संकट है कि आज के अनेक अध्यात्मिक संतों ने अपना ठेका समझकर अनेक वस्तुओं का उत्पादन और वितरण अपने हाथ के लिया है जिनका अध्यात्म से कोई संबंध नहीं और इस तरह उसने बाजार में बिकने वाली वस्तुओं की बिक्री में से बहुत बड़ा भाग छीन लिया है। दवायंे, कैलेंडर, पेन, चाबी के छल्ले, डायरी और कापियां भी ऐसे आध्यात्मिक संस्थान बेचने लगे हैं जिन्हें केवल प्रचार का काम करना चाहिए।

उस दिन एक कापी और किताब बेचने वाले मेरे मित्र से मेरी मुलाकात हुई। मैं स्कूटर पर उसकी दुकान पर गया और कोई सामान उसे देने के लिये ले गया। उससे जब मैंने धंधे के बारे में पूछा तो उसने बातचीत में बताया कि अब अगर अध्यात्म लोग पेन, डायरियां और कापियां बेचेंगे तो हमसे कौन लेगा? अब तो संतों के शिष्य अधिक हो गये हैं और वह कापियां और पेन बेचते हैं। अगर कहो तो उनके भक्त घर पर भी दे जाते हैं।

मै सोच में पड़ गया क्योंकि मात्र पंद्रह मिनट पहले ही मुझे मेरे एक साथी ने एक रजिस्टर दिया था और और वह अध्यात्मिक संस्थान द्वारा प्रकाशित था। उस पर अध्यात्मक संत का चित्र भी था। मैनें उससे कई बार ऐसा रजिस्टर लिया है। वह और उस जैसे कई लोग आध्यात्मिक संस्थाओं को उत्पादों को सेवा भाव से ऐसी वस्तुऐं उपलब्ध कराते हैं। देखा जाये तो वह अध्यात्मिक कंपनियों के लिये भक्त लोग मुफ्त में हाकर की भूमिका अपने भक्ति भाव के कारण निभाते हैं। कई जगह इन अध्यात्मिक संस्थानों की बसें अपने उत्पाद बेचने के लिये आतीं हैं। कई संस्थान अपनी मासिक पत्रिकायें निकालते हें लोग पढ़ें या नहीं पर भक्ति भाव के कारण खरीदते हैं। इस तरह जहां घरों में पहले साहित्यक या सामाजिक पत्र पत्रिकाओं की जगह थी वहां इन धार्मिक पत्रिकाओं ने ले ली है। शायद कुछ हंसें पर यह वास्तविकता है कि पहलंे और अब का यह फर्क मेरा बहुत निकट से कई घरों में देखा हुआ है।

अधिक विस्तार से समझाने की आवश्यकता नहीं है कि दवाओं से लेकर चाबी के छल्ले बेचने वाले अध्यात्मिक संस्थानों की वजह से भी हमारे देश के छोटे कामगारों और व्यवसायियों की रोजी रोटी प्रभावित हुई है। हम अक्सर विदेशी और देशी कंपनियों पर लघु उद्योगों को चैपट करने का आरोप लगाते हैं पर देखा जाय तो उत्पादन से लेकर वितरण तक अपने भक्तों की सहायता से काम करने वाले इन अध्यात्मिक संस्थाओं ने भी कोई कम क्षति पहुंचाई होगी ऐसा लगता नहीं है। हमारा यह विचार कि हिंदी के पाठक कम हैं इसलिये पत्र-पत्रिकायें कम पढ़ी जा रही हैं। वस्तुतः उनकी जगह इन पत्रिकाओं ने समाप्त कर दी है। बढ़ती जनसंख्या के साथ जो पाठक बढ़े उन पर इन आध्यात्मिक पत्रिकाओं ने उन पर नियंत्रण कर लिया। इनके प्रचार प्रसार की संख्या का किसी को अनुमान नहीं है पर मैं आंकड़ों के खेल से इसलिये परे रहता हूं क्योंकि जो सामने देख रहा हूं उसके लिये प्रमाण की क्या जरूरत हैं। अधिकतर घरों में मैंने ऐसी आध्यात्मिक पत्रिकायें और अन्य उत्पाद देखे हैं और लगता है कि अगर यह अध्यात्मिक संस्थान उन वस्तुओं के उत्पाद और वितरण से परे रहते तो शायद रोजगार के अवसर समाज में और बढ़ते।

अपने अध्यात्मिक विषयों में मेरी रुचि किसी से छिपी नहीं है मै अंधविश्वास और अंध भक्ति में यकीन नहींे करता और मेरा स्पष्ट मत है कि अध्यात्म के विषयों का अन्य विषयों के कोई संबंध नहीं है। अगर आप ज्ञान और सत्संग का प्रचार कर रहे हैं तो किसी अन्य विषय से संबंध रखकर अपनी विश्वसीनयता गंवा देते हैं। यही वजह है कि आजकल लोग संतों पर भी जमकर आक्षेप कर रहे हैं। मै संतों पर आक्षेप के खिलाफ हूं पर जिस तरह अध्यात्मिक संस्थान अन्य सांसरिक उत्पादों के निर्माण और वितरण का कार्य छोटे लोगों को रोजगार के अवसरों को नष्ट कर रहे हैं उसके चलते किसी को ऐसे आक्षेपों से रोकना भी मुश्किल है। अगर लोगों के किसी कारण रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं तो उस पर आक्षेप करना उनका अधिकार है।

बाजार अगर लोगों की भावनाओं को भुनाता है तो उससे बचने के लिये लोगों को अध्यात्म का ज्ञान कराकर बचाया जा सकता है पर अगर अध्यात्मिक संस्थान ही इसकी आड़ में अपना बाजार चलाने लगें तो फिर उनको अध्यात्म ज्ञान देना भी कठिन क्योंकि उनके चिंतन और अध्ययन की बौद्धिक क्षमता का हरण उनके कथित गुरू अपने उपदेशों से पहले कर चुके हैं।

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

सतर्कता रखना जरूरी


हर कहानी रोज दोहराई जा रही है फिर भी लोग हैं कि भूल जाते हैं। अपने लोगों में ही दुश्मन छिपे हैं और देख नहीं पाते। कहीं लड़की के साथ व्याभिचार का समाचार आता है तो कहीं बच्चे का अपहरण जान-पहचान या रिश्ते के लोग ही कर लेते हैं। कई खबरें मुझे इतनी हृदय विदारक लगती हैं की सोचने लगता हूँ की जब समाज के यही हालत हैं तो यकीन किस पर किया जाय? इस दुनियाँ में माता-पिता और गुरु के बाद मित्र ही वह जीव है जिस पर विश्वास किया जा सकता है, पर अगर मित्र ही पीठ में छुरा घोंपने लगे तो आदमी के मन में विश्वास उठ जाता है।

समय के साथ समाज में कई तरह के विघटन हुए हैं। संयुक्त परिवारों की जगह विघटित परिवारों ने ले ली है। कई बच्चे तो ऐसे हैं जिन्हें केवल रिश्तों के नाम पता है पर न तो उन्हें उसके प्यार की अनुभूति होती है और न ही उसके महत्व का पता है। कहते हैं की जो चूल्हे के निकट होता है वही दिल के भी होता है। पहले तो लोग घर में ही चूल्हे अलग कर ऐक ही मकान में रहते थे पर शहरों में भूमि की समस्या ने अब घरों को भी अलग कर दिया है। स्थिति यह है की जिस माँ-बाप को ऐक ही बेटा है वह भी उनसे अलग हो जाता है क्योंकि समाज में विचारों के टकराव भी अब पहले से अधिक विस्फोटक रुप से बाहर आने लगे है। तमाम तरह के विवादों के चलते लोग अपने रिश्तेदारों के यहाँ कम मित्रो और परिचितों में आत्मीयता का भाव ढूंढने लगे हैं।

यह बुरा नहीं है पर ऐक बात का विचार करना चाहिये की जिन रिश्तेदारों पर हम जानते हुए भी विश्वास नहीं करते तो अनजान लोगों पर इतनी जल्दी यकीन क्यों कर लेते हैं? हम यह मान लेते हैं जिससे हमारा पैतृक संपति या सामाजिक रिश्ते कि वजह से कोई विवाद या कोइ हमसे सीधा मतलब नहीं है वह हमसे झगड़ा नहीं करेगा पर हम यह भूल जाते हैं की जब उससे संपर्क बढेगा तो मतलब भी बढेगा और फिर रिश्तेदारों जैसे झगडे उसके साथ भी होंगे। देखा जाय तो जहाँ पहले रिश्तेदारों से आदमी के साथ विवाद के चलते मारपीट , ठगी , बेईमानी और अन्य आपराधिक मामलों की शिकायतें आती थीं वैसी ही और उतनी ही अब दोस्ती और जानपहचान में आने लगी हैं।

इसलिये अब वह समय भी नहीं रहा की बिना सोचे समझे अपने पड़ोसी, मित्र और जान पहचान के लोगों के साथ भी संपर्क बढ़ाया जाय और अपनी गुप्त बातें बताई जायें । हमने देखा है की लोग घर के बाहर के स्त्री और पुरुष पर बहुत जल्दी इस आधार पर यकीन कर लेते हैं की वह पड़ोस में रह रहा है कहाँ जायेगा या हमने उसका घर देखा है या बोलता अच्छा है तो उसकी नीयात भी ठीक होगी । यह कोई आधार नहीं है खासतौर से इस कंप्यूटर के युग में तो जितना लोगों की बुद्धि चाकू की तरह तेज हो गये है पर चिंतन और मनन क्षमता बहुत कम हो गयी है। इंटरनेट पर चाट करते हुए ही लोग ऐक दूसरे पर यकीन कर लेते हैं-मुझे यह हास्यप्रद बात लगती है। आजकल शायद यही कारण है कि इंटरनेट पर भी ठगी के नये-नये उदाहरण सामने आ रहे हैं। मैं यह नहीं कहता की सब बुरे हैं पर बुरे लोग अपना हित साधने के लिये उतावले होते हैं यह उनकी पहचान है, इसलिये सतर्क रहते हुए देर-धीरे ही मित्रता की तरफ बढ़ना चाहिये। मेरा मानना है की जब तक आप अपने मित्र का घर स्वयं न देख लें और उसकी पुष्टि के लिये कहीं इधर-उधर पूछताछ न कर लें तब तक उसे मित्र नहीं कहा जा सकता है और साथ ही वह आपके घर ऐक सामान्य सांसारिक व्यक्ति की तरह न आ जाऐ तब तक उस अपने घर की बात भी न कहँ। मैं यहाँ किसी पर अविश्वास करने की बात नहीं कह रहा हूँ बल्कि सतर्क रहने के लिये कह रहा हूँ। मुझे लगता है कि सतर्क न रहने की वजह से लोग अधिक धोखा खाते हैं । विश्वास करें पर सतर्कता के साथ

जब फूलों को देखने के लिए पैसे देने होंगे


अगर एक अखबार की खबर पर यकीन करें तो आगे चलकर प्रकृति को निहारने के लिए भी पैसे देने पड़ेंगे. इस मामले में पर्यावरण और वन विभाग में मतभेद हैं. कुछ लोग पर्यावरण संरक्षण का खर्च निकालने के लिए इसे जरूरी मानते हैं तो दूसरी और फूलों की घाटियों के स्थानीय निवासियों के अधिकार की वकालत करने वाले इसके विरोध में हैं.
यह विषय केवल उन स्थानों तक ही सीमित है जहाँ गर्मियों में भी लोग घूमने जाते हैं-वह लोग जो समयाभाव और धनाभाव के कारण इन स्थानों पर नहीं जाते वह इस बहस से दूर रहना चाहें पर अगर प्रकृति को निहारने के लिए पैसे वसूलने का काम वहाँ शुरू हुआ तो वह धीरे-धीरे उन शहरों के उन स्थानों पर भी आयेगा जहाँ प्रकृति निहारने के लिए लोगों को आमंत्रित करती है. अनेक शहरों में ऐसे बाग़-बगीचे हैं जो पत्थर और कंक्रीट के बुतों के बीच अभी इसलिए अपना अस्तित्व बचाए हुए क्योंकि वहाँ शहर के लोग भी जाना इसलिए पसंद नहीं करते क्योंकि उसमें निहारने के लिए पैसे लगते हैं और अगर वहाँ भी यह काम शुरू हुआ तो लोग ज्यादा जायेंगे ताकि वहाँ से निकलकर लगों पर अपना रुत्वा जमा सके, क्योंकि मुफ्त में लोग ध्यान नहीं देते.

वैसे यह खबर मुझे हैरान करने वाले नहीं लगी. जिस तरह आम और खास आदमी ने मिलकर प्रकृति के पुत्र पेडों को काटकर उनकी जगहों पर कब्जा किया है उससे एक न एक दिन ऐसा होना ही है. इस मामले में यह कोई नहीं कह सकता की यह सब उसने किया या इसने किया. जो जगह आँगन में पेडों की थी उन पर सीमेंट और मुजायक के फर्श बिछ गए और उन्हें घर के बाहर सड़क पर जगह दी जाती तो भी ठीक था पर उसे भी हड़पने में लोग आगे हैं. मकान, दुकान और होटल के लिए प्राणवायु का सृजन करने वाले पेडों को काट दिया गया. धन चाहिऐ और किसी भी कीमत पर चाहिए.

अपने अमर होने के भ्रम में आदमी ने उन पेडों को काटा जो उससे न केवल ज्यादा उम्र तक जीते हैं बल्कि दूसरों को भी जिंदा रखते हैं. अभी तक फ्री में सब काम करते रहे इसलिए पेड़-पोधों ने वह सम्मान भी नहीं पाया जो विष वायु बिखेरने वाली मोटर साइकिल, कार, ट्रक और ट्रेक्टर पाते हैं. लोग उन्हें खरीद कर पूजा करते हैं और मिठाई बांटते हैं जो एक पल भी आदमी को सांस न दे सके. कभी कोई पेड़ लगाकर मिठाई बांटता हो यह कभी नहीं देखा. इसके अलावा कुछ बाग़ बीचे हैं जहाँ न गरीब जाता है न अमीर. आजकल कुछ व्यवासायिक केन्द्र बन गए हैं जहाँ पैसे खर्च कर आदमी जाते हैं और बाहर आकर बताते हैं की हम वहाँ गए थे. कहीं किसी ऐसे पार्क में-जहाँ पैसे न लगते हों- जाकर आदमी क्या लोगों को बता सकता है की हम फ्री में मजे लेने गए थे. कई पिकनिक के स्थान ऐसे हैं जहाँ अब लोग इसलिए नहीं जाते क्योंकि अब कुछ शहरों में व्यावसायिक पिकनिक स्थान बन गए हैं. मतलब पैसा कमाते और खर्च करते दिखो-यही आज का नियम हो गया है.

गनीमत है हमारे दर्शन ने पेड़ पोधो को पानी देने के लिए भी पूजा जैसी मान्यता दी है और आज भी शहरों में रहने वाला एक वर्ग उनकी देख भाल करता है और कम संख्या में ही सही पेड़-पोधे बचे हुए हैं, वरना तो शहरों में हरियाली का नामोनिशान तक नहीं मिलता. भौतिकता का जाल ऐसा है कि बहुत काम लोग इस बात को याद रख पाते हैं की हम जो सांस लेते हैं उसे ऑक्सीजन कहते हैं और उसका सृजन पेड़-पोधे करते हैं और जो हम गंदी वायु छोड़ते हैं उसे वह ग्रहण कर हमारा संकट टालते हैं. जहाँ पैसा लगाने की बात चल रही है वह भी कोई आदमी की नहीं बल्कि प्रकृति की स्वयं की रचना है बस उसका कैसे आर्थिक फायदा उठा जाये इसके प्रयास किये जा रहे हैं और उन्हें गलत तो तब ठहराया जाये जब आदमी इसके लिए जागरूक हो. लोहे लंगर के सामान पर सब जगह चर्चा होती है कहते हैं कि ‘मेरे पास मोबाइल है’, ‘मेरे पास कंप्यूटर है’, ‘मेरे पास मोटर साईकिल है’ और ‘मेरे पास अपना मकान है’ आदि-आदि पर यह कोई नहीं कहता की मेरे घर पर एक पेड़ है. जब हरियाली को निहारने के लिए पैसे देने होंगे तब आदमी को समझ में आएगा कि उसकी कीमत क्या है?