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कन्या भ्रुण हत्या से मध्ययुगीन स्थिति की तरफ बढ़ता समाज-हिन्दी लेख (kanya bhrun hatya aur madhya yugin samaj-hindi lekh


              हो सकता है कि कुछ लोग हमारी बुद्धि पर ही संशय करें, पर इतना तय है कि जब देश के बुद्धिजीवी किसी समस्या को लेकर चीखते हैं तब उसे हम समस्या नहीं बल्कि समस्याओं या सामाजिक विकारों का परिणाम मानते हैं। टीवी और समाचार पत्रों के समाचारों में लड़कियों के विरुद्ध अपराधों की बाढ़ आ गयी है और कुछ बुद्धिमान लोग इसे समस्या मानकर इसे रोकने के लिये सरकार की नाकामी मानकर हो हल्ला मचाते हैं। उन लोगों से हमारी बहस की गुंजायश यूं भी कम हो जाती हैं क्योंकि हम तो इसे कन्या भ्रुण हत्या के फैशन के चलते समाज में लिंग असंतुलन की समस्या से उपजा परिणाम मानते है। लड़की की एकतरफ प्यार में हत्या हो या बलात्कार कर उसे तबाह करने की घटना, समाज में लड़कियों की खतरनाक होती जा रही स्थिति को दर्शाती हैं। इस पर चिंता करने वाले कन्या भ्रूण हत्या के परिणामों को अनदेखा करते हैं।
        इस देश में गर्भ में कन्या की हत्या करने का फैशन करीब बीस-तीस साल पुराना हो गया है। यह सिलसिला तब प्रारंभ हुआ जब देश के गर्भ में भ्रुण की पहचान कर सकने वाली ‘अल्ट्रासाउंड मशीन’ का चिकित्सकीय उपयोग प्रारंभ हुआ। दरअसल पश्चिम के वैज्ञानिकों ने इसका अविष्कार गर्भ में पल रहे बच्चे तथा अन्य लोगों पेट के दोषों की पहचान कर उसका इलाज करने की नीयत से किया था। भारत के भी निजी चिकित्सकालयों में भी यही उद्देश्य कहते हुए इस मशीन की स्थापना की गयी। यह बुरा नहीं था पर जिस तरह इसका दुरुपयोग गर्भ में बच्चे का लिंग परीक्षण कराकर कन्या भ्रुण हत्या का फैशन प्रारंभ हुआ उसने समाज में लिंग अनुपात की  स्थिति को बहुत बिगाड़ दिया। फैशन शब्द से शायद कुछ लोगों को आपत्ति हो पर सच यह है कि हम अपने धर्म और संस्कृति में माता, पिता तथा संतानों के मधुर रिश्तों की बात भले ही करें पर कहीं न कहीं भौतिक तथा सामाजिक आवश्यकताओं की वजह से उनमें जो कृत्रिमता है उसे भी देखा जाना चाहिए। अनेक ज्ञानी लोग तो अपने समाज के बारे में साफ कहते हैं कि लोग अपने बच्चों को हथियार की तरह उपयोग करना चाहते हैं जैसे कि स्वयं अपने माता पिता के हाथों हुए। मतलब दैहिक रिश्तों में धर्म या संस्कृति का तत्व देखना अपने आपको धोखा देना है। जिन लोगों को इसमें आपत्ति हो वह पहले कन्या भ्रुण हत्या के लिये तर्कसंगत विचार प्रस्तुत करते हुए उस उचित ठहरायें वरना यह स्वीकार करें कि कहीं न कहीं अपने समाज के लेकर हम आत्ममुग्धता की स्थिति में जी रहे हैं।
           जब कन्या भ्रुण हत्या का फैशन की शुरुआत हुई तब समाज के विशेषज्ञों ने चेताया था कि अंततः यह नारी के प्रति अपराध बढ़ाने वाला साबित होगा क्योंकि समाज में लड़कियों की संख्या कम हो जायेगी तो उनके दावेदार लड़कों की संख्या अधिक होगी नतीजे में न केवल लड़कियों के प्रति बल्कि लड़कों में आपसी विवाद में हिंसा होगी। इस चेतावनी की अनदेखी की गयी। दरअसल हमारे देश में व्याप्त दहेज प्रथा की वजह से लोग परेशान रहे हैं। कुछ आम लोग तो बड़े आशावादी ढंग से कह रहे थे कि ‘लड़कियों की संख्या कम होगी तो दहेज प्रथा स्वतः समाप्त हो जायेगी।’
                  कुछ लोगों के यहां पहले लड़की हुई तो वह यह सोचकर बेफिक्र हो गये कि कोई बात नहीं तब तक कन्या भ्रुण हत्या की वजह से दहेज प्रथा कम हो जायेगी। अलबत्ता वही दूसरे गर्भ में परीक्षण के दौरान लड़की होने का पता चलता तो उसे नष्ट करा देते थे। कथित सभ्य तथा मध्यम वर्गीय समाज में कितनी कन्या भ्रुण हत्यायें हुईं इसकी कोई जानकारी नहीं दे सकता। सब दंपतियों के बारे में तो यह बात नहीं कहा जाना चाहिए पर जिनको पहली संतान के रूप में लड़की है और दूसरी के रूप में लड़का और दोनों के जन्म के बीच अंतर अधिक है तो समझ लीजिये कि कहीं न कहंी कन्या भ्रुण हत्या हुई है-ऐसा एक सामाजिक विशेषज्ञ ने अपने लेख में लिखा था। अब तो कई लड़किया जवान भी हो गयी होंगी जो पहली संतान के रूप में उस दौर में जन्मी थी जब कन्या भ्रुण हत्या के चलते दहेज प्रथा कम होने की आशा की जा रही थी। मतलब यह कि यह पच्चीस से तीस साल पूर्व से प्रारंभ  सिलसिला है और दहेज प्रथा खत्म होने का नाम नहीं ले रही। हम दहेज प्रथा समाप्ति की आशा भी कुछ इस तरह कर रहे थे कि शादी का संस्कार बाज़ार के नियम पर आधारित है यानि धर्म और संस्कार की बात एक दिखावे के लिये करते हैं। अगर लड़कियां कम होंगी तो अपने आप यह प्रथा कम हो जायेगी, पर यह हुआ नहीं।
            इसका कारण यह है कि देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। मध्यम वर्ग के लोग अब निम्न मध्यम वर्ग में और निम्न मध्यम वर्ग के गरीब वर्ग में आ गये हैं पर सच कोई स्वीकार नहीं कर रहा। इस कारण लड़कों से रोजगार के अवसरों में भी आकर्षण शब्द गायब हो गया है। लड़कियों के लिये वर ढूंढना इसलिये भी कठिन है क्योंकि रोजगार के आकर्षक स्तर में कमी आई है। अपनी बेटी के लिये आकर्षक जीवन की तलाश करते पिता को अब भी भारी दहेज प्रथा में कोई राहत नहीं है। उल्टे शराब, अश्लील नृत्य तथा विवाहों में बिना मतलब के व्यय ने लड़कियों की शादी कराना एक मुसीबत बना दिया है। इसलिये योग्य वर और वधु का मेल कराना मुश्किल हो रहा है।
           फिर पहले किसी क्षेत्र में लड़कियां अधिक होती थी तो दीवाने लड़के एक नहीं  तो दूसरी को देखकर दिल बहला लेते थे। दूसरी नहीं तो तीसरी भी चल जाती। अब स्थिति यह है कि एक लड़की है तो दूसरी दिखती नहीं, सो मनचले और दीवाने लड़कों की नज़र उस पर लगी रहती है और कभी न कभी सब्र का बांध टूट जाता है और पुरुषत्व का अहंकार उनको हिंसक बना देता है। लड़कियों के प्रति बढ़ते अपराध कानून व्यवस्था या सरकार की नाकामी मानना एक सुविधाजनक स्थिति है और समाज के अपराध को दरकिनार करना एक गंभीर बहस से बचने का सरल उपाय भी है।

हम जब स्त्री को अपने परिवार के पुरुष सदस्य से संरक्षित होकर राह पर चलने की बात करते हैं तो नारीवादी बुद्धिमान लोग उखड़ जाते हैं। उनको लगता है कि अकेली घूमना नारी का जन्मसिद्ध अधिकार है और राज्य व्यवस्था उसको हर कदम पर सुरक्षा दे तो यह एक काल्पनिक स्वर्ग की स्थिति है। यह नारीवादी बुद्धिमान नारियों पर हमले होने पर रो सकते हैं पर समाज का सच वह नहीं देखना चाहते। हकीकत यह है कि समाज अब नारियों के मामले में मध्ययुगीन स्थिति में पहुंच रहा है। हम भी चुप नहीं  बैठ सकते क्योंकि जब नारियों के प्रति अपराध होता है तो मन द्रवित हो उठता है और लगता है कि समाज अपना अस्तित्व खोने को आतुर है।

—————–

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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गरीबी की रेखा और विकास का मुखौटा- हास्य कविताएँ (blow powrty lin and devlopment-hindi comic satire poem)


दूसरों के घर की रौशनी चुराकर
अंधेरों को वहां सुलाने लगे,
नौनिहालों के दूध में जहर मिलाकर
ज़माने को दिखाने के लिये
अपनी दौलत से अपना  कद
ऊंचा उठाने लगे।
इंसानों जैसे दिखते हैं वह शैतान
पेट से बड़ी है उनकी तिजोरी
जंगलों की हरियाली चुराकर
भरी है नोटों से उन्होंने अपनी बोरी,
अब गरीबी और बेबसी को
विकास का मुखौटा पहनाकर बुलाने लगे।
——-
गरीबी की रेखा के ऊपर बैठे लोग ही
पूरा हिस्सा खा जाते हैं
इसलिये ही नीचे वाले
नहीं उठ पाते ऊपर
कहीं अधिक नीचे दब जाते हैं।
———
गरीबी रेखा के ऊपर बसता है इंडिया
नीचे भारत के दर्शन हो जाते हैं,
शायद इसलिये बुद्धिजीवी अब
इंडिया शब्द का करते हैं इस्तेमाल
भारत कहते हुए शर्माते हैं।
————-
गरीबी की रेखा पर कुछ लोग
इसलिये खड़े हैं कि
कहीं अन्न का दाना नीचे न टपक जाये
जिस भूखे की भूख का बहाना लेकर
मदद मांगनी है दुनियां भर से
उसका पेट कहीं भर न जाये।
——-
गरीबी रेखा के नीचे बैठे लोगों का
जीवन स्तर भला वह क्यों उठायेंगे,
ऐसा किया तो
रुपये कैसे डालर में बदल पायेंगे,
फिर डालर भी रुपये का रूप धरकर
देश में नहीं आयेंगे,
इसलिये गरीबी रेखा के नीचे बैठे
इंसानों को बस आश्वासन से समझायेंगे।
————-
अपना पेट भरने के लिये
गरीबी की रेखा के नीचे
वह इंसानों की बस्ती हमेशा बसायेंगे,
रास्ते में जा रही मदद की
लूट तभी तो कर पायेंगे।
———-

लोग हादसों की खबर पढ़ते और सुनते हैं
लगातार देखते हुए उकता न जायें
इसलिये विज्ञापनों का बीच में होना जरूरी है।
सौदागारों का सामान बिके बाज़ार में
इसलिये उनका भी विज्ञापन होना जरूरी है।
आतंक और अपराधों की खबरों में
एकरसता न आये इसलिये
उनके अलग अलग रंग दिखाना जरूरी है।
आतंक और हादसों का
विज्ञापन से रिश्ता क्यों दिखता है,
कोई कलमकार
एक रंग का आतंक बेकसूर
दूसरे को बेकसूर क्यों लिखता है,
सच है बाज़ार के सौदागर
अब छा गये हैं पूरे संसार में,
उनके खरीद कुछ बुत बैठे हैं
लिखने के लिये पटकथाऐं बार में
कहीं उनके हफ्ते से चल रही बंदूकें
तो कहीं चंदे से अक्लमंद भर रहे संदूके,
इसलिये लगता है कि
दौलत और हादसों में कोई न कोई रिश्ता होना जरूरी है।

———–
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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अंग्रेज आज भी कर रहे राज-हिन्दी हास्य कविताऐं


फिर एक बार वह लोग
स्वतंत्रता दिवस मनायेंगे,
अपनी गुलामी के जख्म याद कर
उससे मुक्ति पर मुस्करायेंगे।
जिनसे मुक्ति पाई थी
उनको एक दिन दे लेंगे गालियां,
बजेंगी फिर तालियां,
मगर फिर छोड़ी है जो मालिकों ने वसीयत
गुलामों को बांटने की
मुखिया और बंधुआ को छांटने की
उसे पूरा करने में जुट जायेंगे।
———
कुछ लोग कहते हैं कि
अंग्रेज भारत छोड़ गये,
कुछ उनका शुक्रिया अदा करते हैं कि
वह भारत को जोड़ गये।
सच तो यह है कि
अंग्रेज आज भी कर रहे राज
बस,
नाम का स्वराज छोड़ गये।
———–
गुलाम बनाने के कानून में
आज़ादी की असलियत तलाश रहे हैं,
मालिक छोड़ गये राज
मगर सिंहासन पर चरण पादुकाऐं छोड़े गये
उसमें खुद मुख्तियारी की आस कर रहे हैं।
————————

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प्यार का खेल, इज्जत की जंग-हिन्दी हास्य कविता


 नये वर्ष के अवसर पर

शहर के नंबर वन

आशिक माशुका के जोड़े को

चुनकर उसे सम्मानित करने की

खबर बड़े जोर से एक महीन पहले ही छाई।

ग्यारह महीने से जो मजे उठा रहे थे

ब्रेिफक्र होकर,  प्यार के मौसम में

सभी की नींद सम्मान ने उड़ाई।

कुछ आशिकों का शक था

अपनी माशुका के साथ इनाम मिलने का,

कुछ माशुकाओं को भी विश्वास नहीं था

अपने जोड़दार के साथ

अपना नाम का फूल शहर में खिलने का,

सभी अपने इश्क के पैगामों में

लिखने वाले संबोधन बदल रहे थे,

जो एक समय में रचाते थे कई प्रसंग

एक  इश्क के व्रत में बहल रहे थे,

प्रविष्टी भरने के अंतिम दिन तक

सभी रच रहे थे

फार्म में भरने के लिये अपने इतिहास,

कुछ गमगीन हो गये तो कुछ करने लगे परिहास,

इश्क करने वाले आशुक बन गये योद्धा,

माशुकायें बन गयीं, संस्कारों की पुरोधा,

दे रहे थे सभी एक दूसरे को नर्ववर्ष की बधाई,

पर अंदर ले रहे थे, जंग के लिये अंगराई।

नये साल में पिछले एक वर्ष के

आशिक माशुका के जोड़े को

इनाम देने के नाम पर चली

इश्क की जंग में 

उथल पुथल से कई दिल टूटे

कहीं माशुका तो कहीं आशिक रूठे,

नहीं रहा कोई रिश्ता स्थाई।

एक दिन प्रतियोगिता के स्थगित

होने की खबर आई।

पता चला युवा आयोजक की पुरानी माशुका ने

अपने नये आशिक के साथ

प्रतियोगिता के लिये अपनी प्रविष्टी दर्ज कराई,

कर ली थी जिसने उसके दुश्मन से सगाई।

नयी माशुका  की एक सहेली को

छोड़ गया था उसका आशिक

उसने भी उसके यहां गुहार लगाई।

नयी माशुका  ने सार्वजनिक रूप से

इस नाटक करने पर कर दी

युवा आयोजक की ठुकाई।

टूट गया वह, उसने बंद कर दिया यह सम्मान

पर शहर में जहां जहां खेला जाता था

इश्क का खेल

सभी जगह जंग के मैदान में नज़र न आई।

नोट-यह एक काल्पनिक हास्य कविता मनोरंजन की दृष्टि से लिखी गयी है। इसक किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।

 
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सम्मेलन पर झगड़ा-हास्य व्यंग्य (hindi sammelan-hasya vyangya)


ब्लागर उस समय सो रहा था कि चेले ने आकर उसके हाथ हिलाकर जगाया। ब्लागर ने आखें खोली तो चेले ने कहा-‘साहब, बाहर कोई आया है। कह रहा है कि मैं ब्लागर हूं।’
ब्लागर एकदम उठ बैठा और बोला-‘जाकर बोल दे कि गुरुजी घर पर नहीं है।’
चेले ने कहा-’साहब, मैंने कहा था। तब उसने पूछा ‘तुम कौन हो’ तो मैंने बताया कि ‘मैं उनका शिष्य हूं। ब्लाग लिखना सीखने आया हूं’। तब वह बोला ‘तब तो वह यकीनन अंदर है और तुम झूठ बोल रहे हो, क्योंकि उसने सबसे पहले तो तुम्हें पहली शिक्षा यही दी होगी कि आनलाईन भले ही रहो पर ईमेल सैटिंग इस तरह कर दो कि आफलाईन लगो। जाकर उससे कहो कि तुम्हारा पुराना जानपहचान वाला आया है। और हां, यह मत कहना कि ब्लागर दोस्त आया है।’

ब्लागर बोला-‘अच्छा ले आ उसे।’
शिष्य बोला-‘आप   निकर छोड़कर पेंट  पहन लो। वरना क्या कहेगा।’
ब्लागर ने कहा-‘ क्या कहेगा ? वह कोई ब्लागर शाह है। खुद भी अपने घर पर इसी तरह तौलिया पहने  कई बार मिलता है। मैं तो फिर भी आधुनिक प्रकार की  नेकर पहने रहता  हूं, जिसे पहनकर लोग सुबह मोर्निंग वाक् पर जाते हैं।’
इधर दूसरे ब्लागर ने अंदर प्रवेश करते ही कहा-‘यह शिष्य कहां से ले आये? और यह ब्लागिंग में सिखाने लायक है क्या? बिचारे से मुफ्त में सेवायें ले रहे हो?’
पहले ब्लागर ने कहा-‘अरे, यह तो दोपहर ऐसे ही सीखने आ जाता है। मैं तुम्हारी तरह लोगों से फीस न लेता न सेवायें कराता हूं। बताओ कैसे आना हुआ।’
दूसरे ब्लागर ने कंप्यूटर की तरफ देखते हुए पूछा-‘यह तुम्हारा कंप्यूटर क्यों बंद है? आज कुछ लिख नहीं रहे। हां, भई लिखने के विषय बचे ही कहां होंगे? यह हास्य कवितायें भी कहां तक चलेंगी? चलो उठो, मैं तुम्हारे लिखने के लिये एक जोरदार समाचार लाया हूं। ब्लागर सम्मेलन का समाचार है इसे छाप देना।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘तुम खुद क्यों नहीं छाप देते। तुम्हें पता है कि ऐसे विषयों पर मैं नहीं लिखता।’
दूसरा ब्लागर बोला-‘अरे, यार मैं अपने काम में इतना व्यस्त रहता हूं कि घर पर बैठ नहीं पाता। इसलिये कंप्यूटर बेच दिया और इंटरनेट कनेक्शन भी कटवा दिया। अब अपने एक दोस्त के यहां बैठकर कभी कभी ब्लाग लिख लेता हूं।’
पहले ब्लागर ने घूरकर पूछा-‘ब्लाग लिखता हूं से क्या मतलब? कहो न कि अभद्र टिप्पणियां लिखने के खतरे हैं इसलिये दोस्त के यहां बैठकर करता हूं। तुमने आज तक क्या लिखा है, पता नहीं क्या?’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘क्या बात करते हो? आज इतना बड़ा सम्मेलन कराकर आया हूं। इसकी रिपोर्ट लिखना है।’
पहले ब्लागर ने इंकार किया तो उसका शिष्य बीच में बोल पड़ा-‘गुरुजी! आप मेरे ब्लाग पर लिख दो।’
दूसरा ब्लागर बोला-‘अच्छा तो चेले का ब्लाग भी बना दिया! चलो अच्छा है! तब तो संभालो यह पैन ड्ाईव और कंप्यूटर खोलो उसमें सेव करो।’
शिष्य ने अपने हाथ में पैन ड्राईव लिया और कंप्यूटर खोला।
पहले ब्लागर ने पूछा-‘यह फोटो कौनसे हैं?
दूसरे ब्लागर ने एक लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा‘-जब तक यह इसके फोटो सेव करे तब तक तुम उसको देखो।
ब्लागर ने फोटो को एक एक कर देखना शुरु किया। एक फोटो देखकर उसने कहा-‘यह फोटो कहीं देखा लगता है। तुम्हारा जब सम्मान हुआ था तब तुमने भाषण किया था। शायद…………….’
दूसरे ब्लागर ने बीच में टोकते हुए कहा-‘शायद क्या? वही है।’
दूसरा फोटो देखकर ब्लागर ने कहा-‘यह चाय के ढाबे का फोटो। अरे यह तो उस दिन का है जब मेरे हाथ से नाम के लिये ही उद्घाटन कराकर मुझसे खुद और अपने चेलों के लिये चाय नाश्ते के पैसे खर्च करवाये थे। मेरा फोटो नहीं है पर तुम्हारे चमचों का…….’’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘अब मैं तुम्हारे इस चेले को भी चमचा कहूं तो तुम्हें बुरा लगेगा न! इतनी समझ तुम में नहीं कि ब्लागिंग कोई आसान नहीं है। जितना यह माध्यम शक्तिशाली है उतना कठिन है। लिखना आसान है, पर ब्लागिंग तकनीकी एक दिन में नहीं सीखी जा सकती। इसके लिये किसी ब्लागर गुरु का होना जरूरी है। सो किसी को तो यह जिम्मा उठाना ही है। तुम्हारी तरह थोड़े ही अपने चेले को घर बुलाकर सेवा कराओ। अरे ब्लागिंग सिखाना भी पुण्य का काम है। तुम तो बस अपनी हास्य कवितायें चिपकाने को ही ब्लागिंेग कहते हो।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘हां, यह तो है! यह तीसरा फोटो तो आइस्क्रीम वाले के पास खड़े होकर तुम्हारा और चेलों का आईस्क्रीम खाने का है। यह आईसक्रीम वाला तो उस दिन मेरे सामने रास्ते पर तुमसे पुराना उधार मांग रहा था। तब तुमने मुझे आईसक्रीम खिलाकर दोनों के पैसे दिलवाकर अपनी जान बचाई थी।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘मेरे फोटो वापस करो।’
पहले ब्लागर ने सभी फोटो देखकर उसे वापस करते हुए कहा-‘यार, पर इसमें सभी जगह मंच के फोटो हैं जिसमें तुम्हारे जान पहचान के लोग बैठे हैं। क्या घरपर बैठकर खिंचवायी है या किसी कालिज या स्कूल पहुंच गये थे। सामने बैठे श्रोताओं और दर्शकों का कोई फोटो नहीं दिख रहा।’
दूसरे ब्लागर ने पूछा-‘तुम किसी ब्लागर सम्मेलन में गये हो?’
पहले ब्लागर ने सिर हिलाया-‘नहीं।’
दूसरा ब्लागर-‘तुम्हें मालुम होना चाहिये कि ब्लागर सम्मेलन में सिर्फ ब्लागर की ही फोटो खिंचती हैं। वहां कोई व्यवसायिक फोटोग्राफर तो होता नहीं है। अपने मोबाइल से जितने और जैसे फोटो खींच सकते हैं उतने ही लेते हैं। ज्यादा से क्या करना?
पहला ब्लागर-हां, वह तो ठीक है! ब्लागर सम्मेलन में आम लोग कहां आते हैं। अगर वह हुआ ही न हो तो?
दूसरे ब्लागर को गुस्सा आ गया-‘लाओ! मेरे फोटो और पैन ड्राइव वापस करो। तुमसे यह काम नहीं बनने का है। तुम तो लिख दोगे ‘ न हुए ब्लागर सम्मेलन की रिपोर्ट’।
पहला ब्लागर ने कहा-‘क्या मुझे पागल समझते हो। हालांकि तुम्हारे कुछ दोस्त कमेंट में लिख जाते हैं ईडियट! मगर वह खुद हैं! मैं तो लिखूंगा ‘छद्म सम्मेलन की रिपोर्ट!’
दूसरे ब्लागर को गुस्सा आ गया उसने कंप्यूटर में से खुद ही पेनड्राइव निकाल दिया और जाने लगा।
फिर रुका और बोला-‘पर इस ब्लागर मीट पर रिपोर्ट जरूर लिखना। हां, इस ब्लागर सम्मेलन का जिक्र कहीं मत करना। तुम जानते नहीं इंटरनेट लेखकों के सम्मेलन और चर्चाऐं कैसे होती हैं? इंटरनेट पर अपने बायोडाटा से एक आदमी ने अट्ठारह लड़कियों को शादी कर बेवकूफ बनाया। एक आदमी ने ढेर सारे लोगों को करोड़ों का चूना लगाया। इस प्रकार के समाचार पढ़ते हुए तुम्हें हर चीज धोखा लगती है। इसलिये तुम्हें समझाना मुश्किल है। कभी कोई सम्मेलन किया हो तो जानते। इंटरनेट पर कैसे सम्मेलन होते हैं और उनकी रिपोर्ट कैसे बनती है, यह पहले हमसे सीखो। सम्मेलन करो तो जानो।’
पहले ब्लागर ने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा-ऐसे सम्मेलन कैसे कराऊं जो होते ही नहीं।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘होते हैं, करना हमसे सीख लो।’
वह चला गया तो पहला ब्लागर सामान्य हुआ। उसने शिष्य से कहा-‘अरे, यार कम से कम उसके फोटो तो कंप्यूटर में लेना चाहिये थे।’
शिष्य ने कहा-‘ गुरुजी फोटो तो मैंने फटाफट पेनड्राइव से अपने कंप्यूटर से ले लिये।’
पहला ब्लागर कंप्यूटर पर बैठा और लिखने लगा। शिष्य ने पूछा’क्या लिख रहे हैं।
पहले ब्लागर ने कहा-‘जो उसने कहा था।’
शिष्य ने पूछा-‘यही न कि इस मुलाकात की बात लिख देना।’
ब्लागर ने जवाब दिया‘नहीं! उसने कहा था कि ‘इस सम्मेलन का जिक्र कहीं मत करना’।’’
……………………….
नोट-यह व्यंग्य पूरी तरह से काल्पनिक है। किसी घटना या सम्मेलन का इससे कोई लेना देना नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो यह एक संयोग होगा। इसका लेखक किसी दूसरे ब्लागर से ब्लागर से मिला तक नहीं है।
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