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गुरु पूर्णिमा-तत्वज्ञान दे वही होता है सच्चा गुरु (article in hindi on guru purnima


गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेले दांव।
दो बूड़े वापूरे,चढ़ि पाथर की नाव

         जहां गुरु लोभी और शिष्य लालची हों वह दोनों ही अपने दांव खेलते हैं पर अंततः पत्थर बांध कर नदिया पर करते हुए उसमें डूब जाते हैं।

            आज पूरे देश में गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है। भारतीय अध्यात्म में गुरु का बहुत महत्व है और बचपन से ही हर माता पिता अपने बच्चे को गुरु का सम्मान करने का संस्कार इस तरह देते हैं कि वह उसे कभी भूल ही नहीं सकता। मुख्य बात यह है कि गुरु कौन है?
दरअसल सांसरिक विषयों का ज्ञान देने वाला शिक्षक होता है पर जो तत्व ज्ञान से अवगत कराये उसे ही गुरु कहा जाता है। यह तत्वज्ञान श्रीगीता में वर्णित है। इस ज्ञान को अध्ययन या श्रवण कर प्राप्त किया जा सकता है। अब सवाल यह है कि अगर कोई हमें श्रीगीता का ज्ञान देता है तो हम क्या उसे गुरु मान लें? नहीं! पहले उसे गुरु मानकर श्रीगीता का ज्ञान प्राप्त करें फिर स्वयं ही उसका अध्ययन करें और देखें कि आपको जो ज्ञान गुरु ने दिया और वह वैसा का वैसा ही है कि नहीं। अगर दोनों मे साम्यता हो तो अपने गुरु को प्रणाम करें और फिर चल पड़ें अपनी राह पर।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता में गुरु की सेवा को बहुत महत्व दिया है पर उनका आशय यही है कि जब आप उनसे शिक्षा लेते हैं तो उनकी दैहिक सेवा कर उसकी कीमत चुकायें। जहां तक श्रीकृष्ण जी के जीवन चरित्र का सवाल है तो इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि उन्होंने अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त कर हर वर्ष उनके यहां चक्कर लगाये।
गुरु तो वह भी हो सकता है जो आपसे कुछ क्षण मिले और श्रीगीता पढ़ने के लिये प्रेरित करे। उसके बाद                    अगर आपको तत्वज्ञान की अनुभूति हो तो आप उस गुरु के पास जाकर उसकी एक बार सेवा अवश्य करें। हम यहां स्पष्ट करें कि तत्वज्ञान जीवन सहजता पूर्ण ढंग से व्यतीत करने के लिये अत्यंत आवश्यक है और वह केवल श्रीगीता में संपूर्ण रूप से कहा गया है। श्रीगीता से बाहर कोई तत्व ज्ञान नहीं है। इससे भी आगे बात करें तो श्रीगीता के बाहर कोई अन्य विज्ञान भी नहीं है।
इस देश के अधिकतर गुरु अपने शिष्यों को कथायें सुनाते हैं पर उनकी वाणी तत्वाज्ञान से कोसों दूर रहती है। सच तो यह है कि वह कथाप्रवचक है कि ज्ञानी महापुरुष। यह लोग गुरु की सेवा का संदेश इस तरह जैसे कि हैंण्ड पंप चलाकर अपने लिये पानी निकाल रहे हैं। कई बार कथा में यह गुरु की सेवा की बात कहते हैं।
सच बात तो यह है गुरुओं को प्रेम करने वाले अनेक निष्कपट भक्त हैं पर उनके निकट केवल ढोंगी चेलों का झुंड रहता है। आप किसी भी आश्रम में जाकर देखें वहा गुरुओं के खास चेले कभी कथा कीर्तन सुनते नहीं मिलेंगे। कहीं वह उस दौरान वह व्यवस्था बनाते हुए लोगों पर अपना प्रभाव जमाते नजर आयेंगे या इधर उधर फोन करते हुए ऐसे दिखायेंगे जैसे कि वह गुरु की सेवा कर रहे हों।

कबीरदास जी ने ऐसे ही लोगों के लिये कहा है कि

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जाका गुरु आंधरा, चेला खरा निरंध।
अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फंद।

      “जहां गुरु ज्ञान से अंधा होगा वहां चेला तो उससे भी बड़ा साबित होगा। दोनों अंधे मिलकर काल के फंदे में फंस जाते है।”

 
बहुत कटु सत्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान एक स्वर्णिम शब्दों का बड़ा भारी भंडार है जिसकी रोशनी में ही यह ढोंगी संत चमक रहे हैं। इसलिये ही भारत में अध्यात्म एक व्यापार बन गया है। श्रीगीता के ज्ञान को एक तरह से ढंकने के लिये यह संत लोग लोगों को सकाम भक्ति के लिये प्रेरित करते हैं। भगवान श्रीगीता में भगवान ने अंधविश्वासों से परे होकर निराकर ईश्वर की उपासना का संदेश दिया और प्रेत या पितरों की पूजा को एक तरह से निषिद्ध किया है परंतु कथित रूप से श्रीकृष्ण के भक्त हर मौके पर हर तरह की देवता की पूजा करने लग जाते हैं। गुरु पूर्णिमा पर इन गुरुओं की तो पितृ पक्ष में पितरों को तर्पण देते हैं।
मुक्ति क्या है? अधिकतर लोग यह कहते हैं कि मुक्ति इस जीवन के बाद दूसरा जीवन न मिलने से है। यह गलत है। मुक्ति का आशय है कि इस संसार में रहकर मोह माया से मुक्ति ताकि मृत्यु के समय उसका मोह सताये नहीं। सकाम भक्ति में ढेर सारे बंधन हैं और वही तनाव का कारण बनते हैं। निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया ऐसे ब्रह्मास्त्र हैं जिनसे आप जीवन भर मुक्त भाव से विचरण करते हैं और यही कहलाता मोक्ष। अपने गुरु या पितरों का हर वर्ष दैहिक और मानसिक रूप से चक्कर लगाना भी एक सांसरिक बंधन है। यह बंधन कभी सुख का कारण नहीं होता। इस संसार में देह धारण की है तो अपनी इंद्रियों को कार्य करने से रोकना तामस वृत्ति है और उन पर नियंत्रण करना ही सात्विकता है। माया से भागकर कहीं जाना नहीं है बल्कि उस पर सवारी करनी है न कि उसे अपने ऊपर सवार बनाना है। अपनी देह में ही ईश्वर है अन्य किसी की देह को मत मानो। जब तुम अपनी देह में ईश्वर देखोगे तब तुम दूसरों के कल्याण के लिये प्रवृत्त होगे और यही होता है मोक्ष।
इस लेखक के गुरु एक पत्रकार थे। वह शराब आदि का सेवन भी करते थे। अध्यात्मिक ज्ञान तो कभी उन्होंने प्राप्त नहीं किया पर उनके हृदय में अपनी देह को लेकर कोई मोह नहीं था। वह एक तरह से निर्मोही जीवन जीते थे। उन्होंने ही इस लेखक को जीवन में दृढ़ता से चलने की शिक्षा दी। माता पिता तथा अध्यात्मिक ग्रंथों से ज्ञान तो पहले ही मिला था पर उन गुरु जी जो दृढ़ता का भाव प्रदान किया उसके लिये उनको नमन करता हूं। अंतर्जाल पर इस लेखक को पढ़ने वाले शायद नहीं जानते होंगे कि उन्होंने अपने तय किये हुए रास्ते पर चलने के लिये जो दृढ़ता भाव रखने की प्रेरणा दी थी वही यहां तक ले आयी। वह गुरु इस लेखक के अल्लहड़पन से बहुत प्रभावित थे और यही कारण है कि वह उस समय भी इस तरह के चिंतन लिखवाते थे जो बाद में इस लेखक की पहचान बने। उन्हीं गुरुजी को समर्पित यह रचना।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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योग साधना मजाक का विषय नहीं होती-अन्ना हज़ारे के आंदोलन पर विशेष लेख-2 (yoga sadhna mazak ka vishya nahin-special article on anna hazare anti corruption moovment part 2)


अन्ना हजारे के आंदोलन के चलते जनलोकपाल कानून का प्रारूप बनाने वाली समिति मे न्यायविद् पिता पुत्र के शामिल होने पर आपत्ति कर बाबा रामदेव ने गलती की या नहीं कहना कठिन है। इतना तय है कि वह श्रीमद्भागवत गीता का ‘गुण ही गुणों में बरतते हैं’ और ‘इद्रियां ही इंद्रियों में बरतती हैं’ के सिद्धांतों को नहीं समझते। वह दैहिक रूप से बीमार समाज के विकारों को जानते हैं पर मानसिक विकृतियों को नहंी जानते। दरअसल उनका योग लोगों को स्वस्थ रखने तक ही सीमित हो जाता है। उनका मानना है कि स्वस्थ शरीर में ही ही स्वस्थ मन रहता है इसलिये देश के लोग स्वस्थ रहेगा। यह ठीक है पर मन की महिमा भी होती है। भौतिकता में उसे लिप्त रहना भाता है जिससे अंततः विकार पैदा होते हैं। इस मन पर निंयत्रण करने की विधा भी योग में है पर उसके लिये जरूरी है कि योग साधक योग के आठ अंगो को समझे। उसके बाद श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करे। बाबा रामदेव अनेक बाद श्रीगीता के संदेश सुनाते हैं वह अभी ‘गीता सिद्ध’ नहीं बन पाये। यही कारण है कि वह अनेक घटनाओं पर तत्कालिक रूप से अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। कहीं न कहीं प्रचार की भूख में उनके मन के लिप्त होने का प्रमाण है। है। उनको यह मालुम नहीं कि यह देश नारों पर चलता है घोषणाओं पर खुश हो जाता है लोग सतही विषयों बहसों में मनोरंजन करने की आदत को जागरुकता का प्रमाण मान लेते हैं। सच तो यह है कि बाबा रामदेव की सोच भी समाज से आगे नहीं बढ़ पायी है। अन्ना हजारे के आंदोलन से अस्तित्व में आई लोकजनपाल समिति में जनप्रतिनिधियों के नाम पर ‘वंशवाद’ की बात कर बाबा रामदेव ने अपने वैचारिक क्षमताओं के कम होने कप प्रमाण दिया है। इस समिति का पद कोई सुविधा वाला नहीं है न ही इस पर बैठने वाले को कोई नायकत्व की प्राप्ति होने वाली है। फिर सवाल यह है कि इसमें शामिल होने का मतलब क्या कोई सम्मान मिलना है या उसमें जिम्मेदारी निभाने वाली भी कोई बात है। बाबा रामदेव ने पूर्व महिला पुलिस अधिकारी के शामिल न होने पर निराशा जताई पर वह जरा यह भी बता देते कि क्या वह यह मानते हैं कि वह अपनी जिम्मेदार जनता की इच्छा के अनुरूप निभाती क्योंकि उनमें ऐसा सामर्थ्य भी है।

ऐसा लगता है कि बाबा रामदेव प्रचार माध्यमों में रचित ‘रामदेव विरुद्ध हज़ारे’ मैच के खेल में फंस गये। प्रचार माध्यम तो यह चाहते होंगे कि यह मैच लंबा चले। दरअसल बाबा रामदेव और श्री अन्ना हज़ारे एक ही स्वयंसेवी बौद्धिक समूह के संचालित आंदोलन के नायक बन गये जो बहुत समय से देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के लिये जूझ रहा है। पहले वह स्वामी रामदेव को अपने मंच पर ले आया तो अब स्वप्रेरणा से दिल्ली में आये अन्ना हज़ारे के आमरण अनशन शिविर में अपना मंच लेकर ही पहुंच गया। बाबा रामदेव का अभियान एकदम आक्रामक नहीं हो पाया पर अन्ना जी का आमरण अनशन तीव्र सक्रियता वाला साबित हुआ जिससे स्वयंसेवी बौद्धिक समूह को स्वाभाविक रूप से जननेतृत्व करने का अवसर मिला। उसमें कानूनविद भी है और जब कोई बात कानून की होनी है तो उनको बढ़त मिली है इसमें बुरा नहीं है। फिर अगर कानून बनाने वाली समिति में पिता पुत्र हों तो भी उसमें बिना जाने बूझे वंशवाद का दोष देखना अनुचित है। खासतौर से तब जब काम अभी शुरु ही नहीं हुआ है।
अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के व्यक्तित्व में कोई समानता नहीं है। ंअन्ना जी सच्चे समाज सेवक का प्रतीक हैं जिनका अभी तक कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र तक सीमित था। इसके विपरीत बाबा रामदेव का व्यक्त्तिव और कृतित्व विश्व व्यापी है। दोनों एक ही लक्ष्य के लिये एक साथ आये जरूर हैं पर दोनों की भूमिका इतिहास अलग अलग रूप से दर्ज करेगा वह भी तब जब आंदोलन अपनी एतिहासिक भूमिका साबित कर सका।
जब श्री अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आमरण अनशन पर थे तब वह प्रचार माध्यमों में छा गये जिससे उनकी जनता में नायक की छवि बनी। जबकि ऐसी छवि अभी तक अकेले स्वामी रामदेव की थी। ऐसे में उनको लगा कि वह पिछडे रहे हैं। वह अन्ना हजारे के शिविर में भी अंतिम दिन आये। उन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया कि वह इस आंदोलन में अन्ना हजारे के साथ हैं। सच तो यह है कि उनका बयान इस तरह था कि जैसे अन्ना हजारे उनके ही अभियान को आगे बढ़ाने आये हैं। यह इसी कारण लगा कि वहां वही बौद्धिक समूह उपस्थित था जो कि पहले बाबा रामदेव के साथ रहा है।
वैसे अन्ना हजारे बाबा रामदेव से योग न सीखें पर राजनीतिक दृढ़ता के बारे में उनको हजारे जी का अनुकरण करना चाहिए। एक भी बयान चालाकी से नहीं दिया और अपनी निच्छलता से ही योग होने का प्रमाण प्रस्तुत किया। अब तो ऐसा लगने लगा है कि बाबा रामदेव योग से इतर अलग अपनी गतिविधियों में अपनी श्रेष्ठता के प्रचार में फंसने लगे हैं।
बाबा रामदेव को यह बात समझ लेना चाहिए कि अभी भारतीय समाज नारों और घोषणाओं में ही सिमटने का आदी है। ऐसे में एक वाक्य और शब्द का भी कोई दुरुपयोग कर सकता है। अतः जहां तक हो सके अधिक बयानबाजी से बचना चाहिए। आप कहीं पचास वाक्य बोलें पर यहां आदमी एक पंक्ति या शब्द ढूंढेगा जिसको लेकर वह आप भड़क सके।
मान लीजिये आपने यह कहा कि ‘अपने घर में बेकार पड़े पत्थर मै। किसी दिन बाहर सड़क पर फैंक दूंगा।’

ऐसे में आपको बदनाम करने के लिये कोई भी आदमी बाहर कहता फिरेगा कि वह कह रहे हैं कि‘ मैं पत्थर किसी सड़क पर फैंक दूंगा। अब आप बताओ किसी को लग गया तो, कोई घायल हो गया तो, चलो उसके घर पर प्रदर्शन करते हैं।’
यहां अनेक बुद्धिजीवियों और प्रचारकों ने इस झूठे प्रचार में महारत हासिल कर रखा है। दरअसल भ्रष्टाचार देश के समाज में घुस गया है। यही कारण है कि यथास्थिति सुविधाभोगी जीव इस आंदोलन से आतंकित है। ऐसे में वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनकारियों के नेतृत्व के शब्दों और वाक्यों का अपनी सुविधा से इस्तेमाल कर सकते हैं। श्री अन्ना हजारे के समर्थकों को अभी यह अंदाजा नहीं है कि उनका अभी कैसे कैसे वीरों से सामना होना है जो यथास्थितिवादियों के समर्थक या किराये पर लाये जायेंगे। एक बात तय रही है कि यह घटना सामान्य लगती है पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोर्चा लेने वाले अग्रिम पंक्ति के सभी बड़े लोगों को यह बात समझना चाहिए कि यह उन लोगों की तरफ से भी प्रतिरोध होगा जो यथास्थितिवादी हैं।
बाबा रामदेव ने गलती की तो न्यायविद् पिता पुत्र भी पीछे नहीं रहे। कानून का प्रारूप बनाना योग सिखाने से अधिक कठिन है। विशुरु रूप से मजाकिया वाक्य है भले ही गंभीरता से कहा गया है। बात वहीं आकर पहुंचती है कि योग पर वही लोग अधिक बोलते हैं जिनको इसका ज्ञान नहीं है। कानून बनाना कठिन काम हो सकता है पर अपने देश में इतने सारे कानून बनते रहे हैं। कुछ हटते भी रहे हैं। मतलब कानून बनाने वाले बहुत हैं पर योग सिखाने वाले बहुत कम हैं। बाबा रामदेव जैसे तो विरले ही हैं। भ्रंष्टाचार विरोधी आंदोलन का योग से कोई वास्ता नहीं है। अगर आप बाबा रामदेव पर योग का नाम लेकर प्रहार करेंगे तो तय मानिए इस देश में योग साधकों का एक बहुत बड़ा वर्ग आप पर हंसेगा और बनी बनाई छवि मिट्टी में मिलते देर नहीं लगेगी। अभी भारतीय योग साधना का प्रचार अधिक हो रहा है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि टीवी पर योगासन और प्राणायाम देख सुनकर उसके बारे में पारंगत होने का दावा कर लें। अगर कोई सच्चा योगी है तो उसके लिये कानून बनाना किसी न्यायविद् से भी ज्यादा आसान है क्योंकि आष्टांग योग के साधक वैचारिक योग में भी बहुत माहिर हो जाते हैं। न्यायविद् तात्कालिक हालत देखकर कानून बनाता है और योगी भविष्य का भी विचार कर लेता है। इसका प्रमाण यह है कि योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने आज से हजारों वर्ष पूर्व श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान दिया था वह आज भी प्रासंगिक लगता है।

बहरहाल बाबा रामदेव ने श्री अन्ना हजारे का सम्मान करते हुए अनेक बातें कही हैं तो श्री अन्ना हजारे ने भी निच्छलता से स्वामी रामदेव के बारे के प्रति अपना विश्वास दोहराया है। यह अच्छी बात है। हम जैसा आम आदमी और फोकटिया लेखक दोनों महानुभावों के कृत्यों पर अपनी दृष्टि जिज्ञासावश रखता है तब यह जानने की उत्सुकता बढ़ती जाती है कि आखिर समाज में बदलाव की चल रही मुहिम कैसे आगे बढ़ रही है।
चलते चलते
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चलते चलते एक बात! पता नहीं यह बात इस विषय से संबंधित है कि नहीं! एक योगसाधक के रूप में हम यह दावा कर सकते हैं कि योग साधना मजाक  का विषय नहीं है। टीवी पर चल रहे एक कामेडी कार्यक्रम में इस पर फब्तियां कसी गयीं। यह देखकर यह विचार आया। हमें भी हंसी आई पर कामेडियनों पर नहीं बल्कि उन पटकथा लेखकों पर जो बिचारे अपनी व्यवसायिक बाध्यताओं की वजह से ऐसा लिखते हैं। हमारे लिए  वह अपने अज्ञान की वजह से दया के पात्र हैं क्रोध का नहीं।

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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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कन्या भ्रुण हत्या से मध्ययुगीन स्थिति की तरफ बढ़ता समाज-हिन्दी लेख (kanya bhrun hatya aur madhya yugin samaj-hindi lekh


              हो सकता है कि कुछ लोग हमारी बुद्धि पर ही संशय करें, पर इतना तय है कि जब देश के बुद्धिजीवी किसी समस्या को लेकर चीखते हैं तब उसे हम समस्या नहीं बल्कि समस्याओं या सामाजिक विकारों का परिणाम मानते हैं। टीवी और समाचार पत्रों के समाचारों में लड़कियों के विरुद्ध अपराधों की बाढ़ आ गयी है और कुछ बुद्धिमान लोग इसे समस्या मानकर इसे रोकने के लिये सरकार की नाकामी मानकर हो हल्ला मचाते हैं। उन लोगों से हमारी बहस की गुंजायश यूं भी कम हो जाती हैं क्योंकि हम तो इसे कन्या भ्रुण हत्या के फैशन के चलते समाज में लिंग असंतुलन की समस्या से उपजा परिणाम मानते है। लड़की की एकतरफ प्यार में हत्या हो या बलात्कार कर उसे तबाह करने की घटना, समाज में लड़कियों की खतरनाक होती जा रही स्थिति को दर्शाती हैं। इस पर चिंता करने वाले कन्या भ्रूण हत्या के परिणामों को अनदेखा करते हैं।
        इस देश में गर्भ में कन्या की हत्या करने का फैशन करीब बीस-तीस साल पुराना हो गया है। यह सिलसिला तब प्रारंभ हुआ जब देश के गर्भ में भ्रुण की पहचान कर सकने वाली ‘अल्ट्रासाउंड मशीन’ का चिकित्सकीय उपयोग प्रारंभ हुआ। दरअसल पश्चिम के वैज्ञानिकों ने इसका अविष्कार गर्भ में पल रहे बच्चे तथा अन्य लोगों पेट के दोषों की पहचान कर उसका इलाज करने की नीयत से किया था। भारत के भी निजी चिकित्सकालयों में भी यही उद्देश्य कहते हुए इस मशीन की स्थापना की गयी। यह बुरा नहीं था पर जिस तरह इसका दुरुपयोग गर्भ में बच्चे का लिंग परीक्षण कराकर कन्या भ्रुण हत्या का फैशन प्रारंभ हुआ उसने समाज में लिंग अनुपात की  स्थिति को बहुत बिगाड़ दिया। फैशन शब्द से शायद कुछ लोगों को आपत्ति हो पर सच यह है कि हम अपने धर्म और संस्कृति में माता, पिता तथा संतानों के मधुर रिश्तों की बात भले ही करें पर कहीं न कहीं भौतिक तथा सामाजिक आवश्यकताओं की वजह से उनमें जो कृत्रिमता है उसे भी देखा जाना चाहिए। अनेक ज्ञानी लोग तो अपने समाज के बारे में साफ कहते हैं कि लोग अपने बच्चों को हथियार की तरह उपयोग करना चाहते हैं जैसे कि स्वयं अपने माता पिता के हाथों हुए। मतलब दैहिक रिश्तों में धर्म या संस्कृति का तत्व देखना अपने आपको धोखा देना है। जिन लोगों को इसमें आपत्ति हो वह पहले कन्या भ्रुण हत्या के लिये तर्कसंगत विचार प्रस्तुत करते हुए उस उचित ठहरायें वरना यह स्वीकार करें कि कहीं न कहीं अपने समाज के लेकर हम आत्ममुग्धता की स्थिति में जी रहे हैं।
           जब कन्या भ्रुण हत्या का फैशन की शुरुआत हुई तब समाज के विशेषज्ञों ने चेताया था कि अंततः यह नारी के प्रति अपराध बढ़ाने वाला साबित होगा क्योंकि समाज में लड़कियों की संख्या कम हो जायेगी तो उनके दावेदार लड़कों की संख्या अधिक होगी नतीजे में न केवल लड़कियों के प्रति बल्कि लड़कों में आपसी विवाद में हिंसा होगी। इस चेतावनी की अनदेखी की गयी। दरअसल हमारे देश में व्याप्त दहेज प्रथा की वजह से लोग परेशान रहे हैं। कुछ आम लोग तो बड़े आशावादी ढंग से कह रहे थे कि ‘लड़कियों की संख्या कम होगी तो दहेज प्रथा स्वतः समाप्त हो जायेगी।’
                  कुछ लोगों के यहां पहले लड़की हुई तो वह यह सोचकर बेफिक्र हो गये कि कोई बात नहीं तब तक कन्या भ्रुण हत्या की वजह से दहेज प्रथा कम हो जायेगी। अलबत्ता वही दूसरे गर्भ में परीक्षण के दौरान लड़की होने का पता चलता तो उसे नष्ट करा देते थे। कथित सभ्य तथा मध्यम वर्गीय समाज में कितनी कन्या भ्रुण हत्यायें हुईं इसकी कोई जानकारी नहीं दे सकता। सब दंपतियों के बारे में तो यह बात नहीं कहा जाना चाहिए पर जिनको पहली संतान के रूप में लड़की है और दूसरी के रूप में लड़का और दोनों के जन्म के बीच अंतर अधिक है तो समझ लीजिये कि कहीं न कहंी कन्या भ्रुण हत्या हुई है-ऐसा एक सामाजिक विशेषज्ञ ने अपने लेख में लिखा था। अब तो कई लड़किया जवान भी हो गयी होंगी जो पहली संतान के रूप में उस दौर में जन्मी थी जब कन्या भ्रुण हत्या के चलते दहेज प्रथा कम होने की आशा की जा रही थी। मतलब यह कि यह पच्चीस से तीस साल पूर्व से प्रारंभ  सिलसिला है और दहेज प्रथा खत्म होने का नाम नहीं ले रही। हम दहेज प्रथा समाप्ति की आशा भी कुछ इस तरह कर रहे थे कि शादी का संस्कार बाज़ार के नियम पर आधारित है यानि धर्म और संस्कार की बात एक दिखावे के लिये करते हैं। अगर लड़कियां कम होंगी तो अपने आप यह प्रथा कम हो जायेगी, पर यह हुआ नहीं।
            इसका कारण यह है कि देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। मध्यम वर्ग के लोग अब निम्न मध्यम वर्ग में और निम्न मध्यम वर्ग के गरीब वर्ग में आ गये हैं पर सच कोई स्वीकार नहीं कर रहा। इस कारण लड़कों से रोजगार के अवसरों में भी आकर्षण शब्द गायब हो गया है। लड़कियों के लिये वर ढूंढना इसलिये भी कठिन है क्योंकि रोजगार के आकर्षक स्तर में कमी आई है। अपनी बेटी के लिये आकर्षक जीवन की तलाश करते पिता को अब भी भारी दहेज प्रथा में कोई राहत नहीं है। उल्टे शराब, अश्लील नृत्य तथा विवाहों में बिना मतलब के व्यय ने लड़कियों की शादी कराना एक मुसीबत बना दिया है। इसलिये योग्य वर और वधु का मेल कराना मुश्किल हो रहा है।
           फिर पहले किसी क्षेत्र में लड़कियां अधिक होती थी तो दीवाने लड़के एक नहीं  तो दूसरी को देखकर दिल बहला लेते थे। दूसरी नहीं तो तीसरी भी चल जाती। अब स्थिति यह है कि एक लड़की है तो दूसरी दिखती नहीं, सो मनचले और दीवाने लड़कों की नज़र उस पर लगी रहती है और कभी न कभी सब्र का बांध टूट जाता है और पुरुषत्व का अहंकार उनको हिंसक बना देता है। लड़कियों के प्रति बढ़ते अपराध कानून व्यवस्था या सरकार की नाकामी मानना एक सुविधाजनक स्थिति है और समाज के अपराध को दरकिनार करना एक गंभीर बहस से बचने का सरल उपाय भी है।

हम जब स्त्री को अपने परिवार के पुरुष सदस्य से संरक्षित होकर राह पर चलने की बात करते हैं तो नारीवादी बुद्धिमान लोग उखड़ जाते हैं। उनको लगता है कि अकेली घूमना नारी का जन्मसिद्ध अधिकार है और राज्य व्यवस्था उसको हर कदम पर सुरक्षा दे तो यह एक काल्पनिक स्वर्ग की स्थिति है। यह नारीवादी बुद्धिमान नारियों पर हमले होने पर रो सकते हैं पर समाज का सच वह नहीं देखना चाहते। हकीकत यह है कि समाज अब नारियों के मामले में मध्ययुगीन स्थिति में पहुंच रहा है। हम भी चुप नहीं  बैठ सकते क्योंकि जब नारियों के प्रति अपराध होता है तो मन द्रवित हो उठता है और लगता है कि समाज अपना अस्तित्व खोने को आतुर है।

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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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पेट्रोल में विदेशी और साइकिल में स्वदेशी का भाव-हिन्दी व्यंग्य लेख


करीब दो वर्ष तीन माह से अब लीटर की नाप की जगह दाम बताकर पेट्रोल भरवाना प्रारंभ कर दिया है। उसमें तेल नहीं डलता। दाम बताकर पेट्रोल भरवाते हैं इसलिये उसका सही दाम नहीं मालुम। दरअसल हमने आलोच्य अवधि में ही स्कूटर छोड़कर नया दुपहिया वाहन लिया। जिसमें मीटर बताता है कि गाड़ी में पेट्रोल कितना है। जैसे ही मीटर के लाल संकेत की ऊपर वाली लाईन के पास कांटा आता है हम पेट्रोल भरवा लेते हैं। हमेशा ही सौ रुपये का भरवाते हैं और देख रहे हैं कि भाव बढ़ते बढ़ते पेट्रोल भरने के बाद कांटा अब पूर्णता के संकेत से नीचे आता जा रहा है। मतलब पेट्रोल के भाव बढ़ रहे हैं।
कल एटीएम से पैसे निकालने से पहले पेट्रोल भरवाया। जेब मे एक सौ क और एक पचास का नोट था। इसलिये पचास का ही भरवाया। कांटा कुछ ही ऊपर गया पर आज शाम घर आये तो लगा कि तेल संकेतक कांटा फिर अपनी जगह पेट्रोल भरवाने से पहले वाली लाईन पर आ गया है। मतलब एक दिन में पचास रुपये का पेट्रोल फूंक दिया। यह दाम जेब की लाल रेखा से ऊपर जा रहा है। अभी कुछ दिन पहले पुरानी साइकिल बेचकर नई ली थी। वह भी लाल है पर जेब की की हरियाली बनाये रखने का काम करती है। बरसों से काम पर साइकिल से गये पर अब स्कूटर की आदत हो गयी है, मगर साइकिल चलाना जारी है। मुश्किल यह है कि वह नियमित आदत नहीं रही। नई साइकिल को हम रोज निहारते हैं क्योंकि मालुम है कि संकट की सच्ची साथी है। फिर टांगों को भी निहारते हैं जिन पर अब पहले से कम यकीन रहा है। इसलिये कभी कभी चार से पांच किलोमीटर साइकिल चला लेते हैं। चार पांच दिन के अंतराल से चलाने पर घुटने कुछ नाराजगी जताते हैं पर दम नहीं तोड़ते। लगातार तीन चार दिन चलाओ तो लगता है कि आदत बन रही है मगर छोड़ दें तो फिर मुश्किल आती है।
यह साइकिल करीब तीन हजार रुपये की छह माह पूर्व खरीदी थी पर उसका पैसा वसूलने के लिये समय चाहिए। हमारा अंदाजा है कि पिछले छह माह में सात सौ किलोमीटर से अधिक नहीं चलायी होगी-यह दूरी कम भी हो सकती है।
हमारा मानना है कि उसे तीन हजार किलोमीटर चलाकर ही कीमत की वसूली हो सकती है। अगर वह साइकिल हम काम पर भी ले जायें तो कम से कम पांच माह नियमित रूप से चलानी होगी तभी कीमत की वसूली मानी जा सकती है।
जिस दिन खरीदी थी उस दिन दुकानदार ने बताया था कि साइकिल किसी भी कंपनी की हो मगर वह बनती पंजाब में ही है। बताते हैं कि पंजाब में बनी साइकिलें विदेशों में निर्यात भी होती हैं। मतलब स्वदेशी हैं इसलिये इसमें संदेह नहीं है कि देश का भविष्य वही संभाले रहेंगी। पेट्रोल विदेशी उत्पाद है और कभी भी साथ छोड़ सकता है। आज सोच रहे हैं कि अब साइकिल पर अपनी आदत बढ़ाई जाये।
प्रसंगवश आज एक मित्र ने अपनी कार दिखाई जो उन्होंने एक वर्ष पूर्व खरीदी थी। अभी उन्होंने चलाना सीखा है और रास्ते में मिलने पर उन्होंने बताया कि उनकी गाड़ी डीजल से चलती है और एक किलोमीटर में बीस लीटर! डीजल 42 रुपयेे लीटर है और उनके अनुसार कहीं किराये से आने जाने पर लगने वाले पैसे से कम इस पर खर्च होता है।
सद्भावना से उन्होंने कहा कि-‘तुम भी कार खरीद क्यों नहीं लेते!’
हमने मित्र से कहा कि-‘आपके घर के मार्ग की सड़के सही और चौड़ी हैं और हम दूर रहते हैं। हमारा पेट्रोल तो सड़क जाम में ही खत्म हो जायेगा।’’
वह बोले-‘हां, यह तो ठीक है।’
हमने हंसते हुए कहा कि-‘हमने तो नई साइकिल खरीदी है। सड़क जाम में पेट्रोल फूंकते फूंकते तो लगता है कि वही चलाया करें!’
वह बोले-‘हां, आपके घर का मार्ग वाकई बहुत खराब है।’
बातचीत खत्म घर आये। समाचार चैनल खोले। कहीं क्रिकेट तो कहीं फिल्म तो कहीं कोई दूसरी बकवास चल रही थी। हर बार हम समाचार सुनने के लिये खोलते हैं। मालुम है कि देखाने सुनने को नहीं मिलेंगे पर आदत तो आदत है। वहीं एक जगह ब्रेकिंग न्यूज आ रही थी कि मिस्र के जनआंदोलन की वजह से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का असर भारत में जल्दी महसूस किया जायेगा। यह सुनते ही मित्र से हुए वार्तालाप का स्मरण हुआ और हम गैलरी में खड़ी साइकिल के पास गये। उसे परसों ही चलाया था। उस पर हाथ फेरा जैसे निर्देश दे रहे हों कि तैयार हो जाओ स्वदेशी चाल पर चलने के लिये।
अब तो यह लगने लगा है कि जैसे सुविधाओं का गुलाम होना ही विदेशी गुलाम होने जैसा है। गांधी जी के स्वेदशी वस्तुओं के उपभोग करने के विचार की पूरा देश खिल्ली उड़ा रहा है। देश की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान है पर कृत्रिम रूप से पेट्रोल प्रधान बना दिया गया है। पेट्रोल के दाम बढ़ते हैं तो हर चीज़ के दाम बढ़ जाते हैं। ऐसी चीजों के दाम भी बढ़ने लगते हैं जिनका पेट्रोल से रिश्ता नहीं है पर मुश्किल यह है कि उसके उत्पादक और विक्रेता मोटर साइकिलों पर घूमते हैं और उनका निजी खर्च बढ़ता है। सो महंगाई बढ़नी है।
ऐसा लगता है कि देश के बाज़ार विशेषज्ञ देश के पांच सौ तथा हजार के नोट लायक बना रहे हैं। यह तभी हो पायेगा जब प्याज एक किलो और पेट्रोल एक लीटर आठ सौ रुपये हो जायेगा।
इसी प्रसंग पर अंतिम बात! लिखते लिखते टीवी पर आ रहे समाचार पर हमारी नज़र गयी। यह समाचार सुबह अखबार में पढ़ा था। ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने एक कृत्रिम पेट्रोल का सृजन किया है जिसका प्रयोग सफल रहा तो वह तीन साल बाद बाज़ार में आ जायेगा। कीमत 15 रुपये लीटर होगी। मगर क्या तीन साल बाद इसकी कीमत इतनी रह पायेगी। भारत के बाज़ार नियंत्रकों के लिये यह खबर नींद उड़ाने वाली होगी क्योंकि तब देश के सभी लोगों को हजार और पांच सौ के उपयोग लायक बनाने के उनके प्रयास संकट में पड़ जायेंगे। यकीनन इस पेट्रोल का भारत में उपयोग रोकने की कोशिश होगी या फिर उसकी कीमत किसी भी तरह तमाक कर तथा अन्य प्रयास पेट्रोल जितनी बना दी जायेगी। इस तेल के खेल को भला कौन समझ पाया? साइकिल पर चले तो फिर समझने की जरूरत भी क्या रह जायेगी?
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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आजकल एक जनसंपर्क कंपनी की बहुत चर्चा है जिसकी संचालिका की एक उद्योगपति से वार्तालाप का टेप मामला तो अदालत में चल रहा है। इधर हम यह सोच रहे हैं कि जार्ज बर्नाड शॉ का यह कथन कितना सत्य है कि बिना बेईमानी के कोई अन्य रास्ता किसी को अमीर नहीं बना जा सकता। मतलब इस धरती पर जितने भी अमीर है वह भले ही अपनी ताकत पर प्रचार माध्यमों में अपने ईमानदार होने का प्रचार करें पर आम आदमी जानता है कि उनका यह ‘खूबसूरत झूठ’ अपने कंधे पर गरीबों की आह का बोझ लिये हुए है।
अभी तक हमारे देश में यह माना जाता था कि उद्योग, व्यापार, फिल्म या मादक द्रव्यों के विक्रय के अलावा अमीर होने का अन्य कोई मार्ग नहीं  है। अब लगता है कि जनसंपर्क का काम भी इसमें शामिल हो गया है। जब हम जनसंपर्क का बात करते हैं तो टीवी तथा समाचार पत्रों का माध्यम उसका एक भाग है। जब कोई जनसंपर्क की बड़ी कंपनी बना रहा है तो तय बात है कि उसके पास टीवी या पत्रकारों का जमावड़ा होना चाहिए। जिस जनसंपर्क कंपनी की संचालिका की चर्चा टेलीकॉम घोटाले में आई है उसके साथ दो पत्रकार भी शामिल है। यह बातचीत सुनकर ऐसा नहीं लगता कि उसका समाचार से अधिक संबंध है। बल्कि उससे तो ऐसा लगता है कि किसी व्यवसाय से जुड़े दलाल आपस में बात कर रहे हैं।
हमें इन पर आपत्ति नहीं है बल्कि हम इशारा कर रहे हैं कि जिस तरह समाज में सामान्य मार्ग से आर्थिक उपलब्धि, सामाजिक प्रतिष्ठा स्थापित करना तथा अन्य लोगों के हित का काम बड़े पैमाने पर करना कठिन बना दिया गया है। ऐसा कोई काम नहीं है जिससे राज्य के सहयोग के बिना आगे बढ़ा जा सके। इसी कारण जिन लोगों को आगे बढ़ना है वह पहले राज्य के शिखर पुरुषों में अपनी पैठ बनाते हैं। ऐसा नहीं है कि पुराने पूंजीपति कोई दूध के धुले हैं। अगर वह इतने ईमानदार होते तो राज्य की व्यवस्था ऐसी नहंी बनने देते जिससे कि नये अमीर बनना बंद हो गया। राज्य चला समाजवाद की राह, जिससे देश में अमीरों का वर्चस्व बना रहा। लोग नौकरियों के लिये पैदा होने लगे। यह आकर्षण इतना था कि लोग अब सेठ बनने की सोचते भी नहीं है। छोटे मोटे व्यवसायियों को तो कोई सम्मान ही नहीं है। इन बड़े व्यवसायियों को देखें तो आप अनेक तरह के सवाल पूछ सकते हैं जिनका कोई जवाब नहीं मिलता।
1-क्या इन्होंने आयकर पूरी तरह से चुकाया होगा?
2-आयात पर पूरा कर भुगता होगा?
3-इन लोगों ने अपने उत्पादों पर जो उत्पाद कर वसूला उसे क्या पूरा जमा किया होगा?
4-धर्म तथा समाज सेवा के नाम पर किये कार्यों के लिये पैसा खर्च कर करों से राहत नहीं ली होगी?
यकीनन इसका जवाब होगा ‘‘नहीं!’’
अब आते हैं जनसंपर्क की असली बात पर! आप जब किसी ए.टी.एम. पर जायें तो वहां पर क्रिकेट खिलाड़ियों के अभिनय वाले विज्ञापन सजे हुए मिलते हैं। यकीनन इन खिलाड़ियों ने इसके लिये ढेर सारा पैसा लिया होगा? क्या देश के इतने बड़े बैंक को को इसकी जरूरत थी?
नहीं! वह बैंक एक भी पैसा विज्ञापन पर न खर्च करे तो भी ग्राहक उसके पास जायेगा। यही स्थिति जीवन बीमा कंपनी की है। तब सवाल यह उठता है कि इतनी बड़ी अर्धसरकारी कंपनियों को विज्ञापन पर पैसा खर्च करने की क्या आवश्यकता है? इसका मतलब साफ है कि उदारीकरण और निजीकरण के चलते राज्य और निजी कंपनियों का स्वरूप एक जैसा ही कर दिया गया है जबकि है नहीं! फिल्म, समाज सेवा, व्यापार तथा उद्योग जगत के शिखर पुरुष सभी जगह अपना चेहरा दिखा रहे हैं। वह क्रिकेट भी देखने बड़े ताम झाम के साथ आते हैं तो फिल्म सम्मेलन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। पूरा समाज अपनी दोनों आंखों को अखबार और टीवी पर रोज देखता है। अब इन शिखर पुरुषों के कार्यक्षेत्र की विशिष्टता देखने के लिये कोई यह प्रश्न नहीं पूछता कि उनका मूल व्यवसाय क्या है?
स्थिति यह है कि समाचार चैनलों पर क्रिकेट और हास्य नाटकों के साथ ही बिग बॉस के अंश भी दिखाकर समय काटा जाता है। कम से कम पौन घंटा तो ऐसा लगता है कि प्रचार माध्यमों के प्रबंधकों ने मान लिया है कि इस देश का आम आदमी बिना अक्ल का है? उसे तो बस आंखों गड़ाकर समाचार देखना है न कि सुनना और समझना है? अब तो यह लगने लगा है कि टीवी चैनलों के कुछ कार्यक्रमों पर विवाद खड़े करना भी फिक्सिंग का हिस्सा है? उन पर कोई बैन लगे या उसके खिलाफ प्रदर्शन हो सभी पैसे देखकर कराया जाता है ताकि उसे प्रचार मिले। ऐसी स्थिति में जनसंपर्क का कार्य केवल दलाली जैसा हो गया है? जब सभी शिखर पुरुषों एक हो गये हैं तो उनके मातहत या साथी के रूप में जनसंपर्क का काम करने वाले इस बात का ध्यान रखते हैं उनके घेरे में रहने वाला ही आदमी विज्ञापन में शक्ल दिखाये, कभी बयान दे तो कभी उसके मामूली से कृत्य पर बड़ी चर्चा की जाये। विज्ञापन की कंपनियां तो चलती ही जनसंपर्क अधिकारियों की कृपा से हैं। जनसंपर्क वाला ही विज्ञापन बनवायेगा और टीवी तथा समाचार चैनलों को देगा। यही कारण है कि क्रिकेट, फिल्म, व्यापार, उद्योग तथा अन्य सामाजिक मनोरंजक क्षेत्रों के शिखर पुरुष अब गिरोह के सरगना की तरह व्यवहार करने लगे हैं और उनका जनसंपर्क कार्यालय एक तरह से उनके लिये सुरक्षा कवच दिलाने का काम करता है।
सच बात तो यह है कि सीधी राह से कोई अमीर नहीं बना। कहीं करचोरी तो कहीं निजी सेवा देकर राज्य के राजस्व के साथ बेईमानी कर सभी अमीर बन रहे हैं। संभव है देश के कुछ मेहनती लोग अमीर बना जाते हैं पर जनसंपर्क के लिये खर्च न करने के कारण उनको वैसी प्रसिद्धि नहीं मिलती क्योंकि उसके लिये तो बेईमानी का पैसा होना आवश्यक है। उद्योग के उत्पाद तथा व्यापार की सेवा में शुद्ध रूप से अमीर बनने के सारे मार्ग बंद हैं, ऐसे में जनसंपर्क का काम केवल दलाल ही चला सकते हैं। टेलीकॉम घोटाले में कुछ पत्रकारों के दलाल के रूप में चर्चा होना बहुत दिलचस्प है। मजे की बात यह है कि हमारे एक राष्ट्रवादी ब्लागर उन पर प्रतिकूल टिप्पणियां बहुत पहले ही कर चुके हैं। उनको शर्मनिरपेक्ष तक कहा गया है क्योंकि इन पत्रकारों ने अपनी छवि धर्मनिरपेक्ष दिखाने की कोशिश की थी। इधर टेलीकॉम घोटाले में विदेशी कंपनियों के शामिल होने की बात की जा रही है तब यह बात भी देखनी होगी कि ऐसे कुछ दलाल कहीं विश्व के कट्टरपंथी धार्मिक देशों से तो नहीं जुड़े थे इसलिये ही यहां धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीट रहे थे ताकि वहां के शिखर पुरुष खुश हों और उनका काम चलता रहे।
वैसे अब तो यह हालत हो गयी है कि टीवी चैनल रोज घोटालों की चर्चा इस तरह करते हैं जैसे कि उनकी खोज हो पर सच तो यह है कि राज्य की ऐजेंसियों का ही काम है जो वह कर रही हैं। एक अच्छी छवि वाले एक उद्योगपति ने इसी मीडिया से कहा कि‘‘ आप जिन घोटालों की चर्चा कर रहे हैं वह आपने नहीं खोजे, सच तो यह है कि देश में खोजी पत्रकारिता नाममात्र की भी नहीं है इसलिये ही यह सब हो रहा है। घोटाले का पता होने पर सब हाथ ताप रहे हैं पर उनकी खोज किसने की है यह भी देखना चाहिए।’’
यह चैनल खोजी पत्रकारिता क्या करेंगे? समाचारों के नाम पर निजी प्रचार का घोटाला वहां रोज देखा जा सकता है। खबर केवल बड़े आदमी की चाहिए? बदनामी बड़े के चाहिए। गरीब मर जाये या लाचार होकर सड़क पर मिले तभी उनको उस पर व्यवसायिक दया आती है। जहां तक खोजी पत्रकारिता कर घोटाले खोजने का काम है यकीनन कौन चैनल का कौन आदमी अपनी नौकरी खोना चाहेगा?
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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