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सट्टा खेलने वालों को समाज सम्मान से नहीं देखता-आलेख


सच बात तो यह है कि सट्टा एक विषय है जिस पर अर्थशास्त्र में विचार नहीं किया जाता। पश्चिमी अर्थशास्त्र अपराधियों, पागलों और सन्यासियों को अपने दायरे से बाहर मानकर ही अपनी बात कहता है। यही कारण है कि क्रिकेट पर लगने वाले सट्टे पर यहां कभी आधिकारिक रूप से विचार नहीं किया जाता जबकि वास्तविकता यह है कि इससे कहीं कहीं देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिति प्रभावित हो रही है।
पहले सट्टा लगाने वाले आमतौर से मजदूर लोग हुआ करते थे। अनेक जगह पर सट्टे का नंबर लिखा होता था। सार्वजनिक स्थानों-खासतौर से पेशाबघरों- पर सट्टे के नंबर लिखे होते थे। सट्टा लगाने वाले बहुत बदनाम होते थे और उनके चेहरे से पता लग जाता था कि उस दिन उनका नंबर आया है कि नहीं। उनकी वह लोग मजाक उड़ाते थे जो नहीं लगाते थे और कहते-‘क्यों आज कौनसा नंबर आया। तुम्हारा लगा कि नहीं।’
कहने का तात्पर्य यह है कि सट्टा खेलने वाले को निम्नकोटि का माना जाता था। चूंकि वह लोग मजदूर और अल्प आय वाले होते थे इसलिये अपनी इतनी ही रकम लगाते थे जिससे उनके घर परिवार पर उसका कोई आर्थिक प्रभाव नहीं पड़े।

अब हालात बदल गये हैं। दिन ब दिन ऐसी घटनायें हो रही हैं जिसमें सट्टा लगाकर बरबाद हुए लोग अपराध या आत्महत्या जैसे जघन्य कार्यों की तरफ अग्रसर हो रहे हैं। इतना ही नहीं कई जगह तो ऐसे सट्टे से टूटे लोग अपने ही परिवार के लोगों पर आक्रमण कर देते हैं। केवल एक ही नहीं अनेक घटनायें सामने आयी हैं जिसमें सट्टे में बरबाद हुए लोगों ने आत्मघाती अपराध किये। होता यह है कि यह खबरें आती हैं तो सनसनी कुछ यूं फैलायी जाती है जिसमें रिश्तों के खून होने की बात कही जाती है। कहा जाता है कि ‘अमुक ने अपने माता पिता को मार डाला’, अमुक ने अपनी पत्नी और बच्चों सहित जहर खा लिया’, ‘अमुक ने अपनी बहन या भाई के के घर डाका डाला’ या ‘अमुक ने अपने रिश्ते के बच्चे का अपहरण किया’। उस समय प्रचार माध्यम सनसनी फैलाते हुए उस अपराधी की पृष्ठभूमि नहीं जानते पर जब पता लगता है कि उसने सट्टे के कारण ऐसा काम किया तो यह नहीं बताते कि वह सट्टा आखिर खेलता किस पर था।’
सच बात तो यह है कि सट्टे में इतनी बरबादी अंको वाले खेल में नहीं होती। फिर सट्टे में बरबाद यह लोग शिक्षित होते हैं और वह पुराने अंकों वाले सट्टे पर शायद ही सट्टा खेलते हों। अगर खेलते भी हों तो उसमें इतनी बरबादी नहीं होती। बहुत बड़ी रकम पर सट्टा संभवतः क्रिकेट पर ही खेला जाता है। प्रचार माध्यम इस बात तो जानकर छिपाते हैं यह अनजाने में पता नहीं। हो सकता है कि इसके अलावा भी कोई अन्य प्रकार का सट्टा खेला जाता हो पर प्रचार माध्यमों में जिस तरह क्रिकेट पर सट्टा खेलने वाले पकड़े जाते हैं उससे तो लगता है कि अधिकतर बरबाद लोग इसी पर ही सट्टा खेलते होंगे।
अनेक लोग क्रिकेट खेलते हैं और उनसे जब यह पूछा गया कि उनके आसपास क्या कुछ लोग क्रिकेट पर सट्टा खेलते है तो वह मानते हैं कि ‘ऐसा तो बहुत हो रहा है।’
सट्टे पर बरबाद होने वालों की दास्तान बताते हुए प्रचार माध्यम इस बात को नहीं बताते कि आखिर वह किस पर खेलता था पर अधिकतर संभावना यही बनती है कि वह क्रिकेट पर ही खेलता होगा। लोग भी सट्टे से अधिक कुछ जानना नहीं चाहते पर सच बात तो यह है कि क्रिकेट पर सट्टा खेलना अपने आप में बेवकूफी भरा कदम है। सट्टा खेलने वालों को निम्न श्रेणी का आदमी माना जाता है भले ही वह कितने बड़े परिवार का हो। सट्टा खेलने वालों की मानसिकता सबसे गंदी होती है। उनके दिमाग में चैबीसों घंटे केवल वही घूमता है। देखा यह गया है कि सट्टा खेलने वाले कहीं से भी पैसा हासिल कर सट्टा खेलते हैं और उसके लिये अपने माता पिता और भाई बहिन को धोखा देने में उनको कोई संकोच नहीं होता। इतना ही नहीं वह बार बार मरने की धमकी देकर अपने ही पालकों से पैसा एैंठते हैं। कहा जाता है कि पूत अगर सपूत हो तो धन का संचय क्यों किया जाये और कपूत हो तो क्यों किया जाये? अगर धन नहीं है तो पूत ठीक हो तो धन कमा लेगा इसलिये संचय आवश्यक नहीं है और कपूत है तो बाद में डांवाडोल कर देगा पर अगर सट्टेबाज हुआ तो जीते जी मरने वाले हालत कर देता है।
देखा जाये तो कोई आदमी हत्या, चोरी, डकैती के आरोप में जेल जा चुका हो उससे मिलें पर निकटता स्थापित नहीं करे पर अगर कोई सट्टेबाज हो तो उसे तो मिलना ही व्यर्थ है क्योंकि इस धरती पर वह एक नारकीय जीव होता है। एक जो सबसे बड़ी बात यह है कि क्रिकेट पर लगने वाला सट्टा अनेक बड़े चंगे परिवारों का नाश कर चुका है और यकीनन कहीं न कहीं इससे देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। देश से बाहर हो या अंदर लोग क्रिकेट पर सट्टा लगाते हैं और कुछ लोगों को संदेह है कि जिन मैचों पर देश का सम्मान दांव पर नहीं होता उनके निर्णय पर सट्टेबाजों का प्रभाव हो सकता है। शायद यही कारण है कि देश की इज्जत के साथ खेलकर सट्टेबाजों के साथ निभाने से खिलाड़ियों के लिये जोखिम भरा था।
इसलिये अंतर्राष्ट्रीय मैचों के स्थान पर क्लब स्तर के मैचों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। क्लब स्तर की टीमों मे देश के सम्मान का प्रश्न नहीं होता। सच क्या है कोई नहीं जानता पर इतना तय है कि क्रिकेट पर लगने वाला सट्टा देश को खोखला कर रहा है। जो लोग सट्टा खेलते हैं उन्हें आत्म मंथन करना चाहिये। वैसे तो पूरी दुनियां के लोग भ्रम में जी रही है पर सट्टा खेलने वाले तो उससे भी बदतर हैं क्योंकि वह इंसानों के भेष में कीड़े मकौड़ों की तरह जीवन जीने वाले होते हैं और केवल उसी सोच के इर्दगिर्द घूमते हैं और तथा जिनकी बच्चे, बूढे, और जवान सभी मजाक उड़ाते हैं।
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क्या क्रिकेट की पुनःप्रतिष्ठा इंटरनेट के लिये चुनौती है?


मुझे याद है जब पिछली बार मैं ब्लाग बनाने के लिये प्रयास कर रहा था तब वेस्टइंडीज में विश्वकप शुरू हो चुका था और मैने यह सोचा कि लीग मैचों में भारतीय (जिसे अब मैं बीसीसीआई की टीम कहता हूं) क्रिकेट टीम   तो ऐसे ही जीत जायेगी। इतना ही नहीं मैने  इस टीम के खेल पर संदेह होने कारण एक व्यंग्य भी लिखा था ‘क्रिकेट में सब चलता है यार’ पर वह कोई नहीं पढ़ पाया। बहरहाल यह टीम लीग मैचों में ही बाहर हो गयी। तब  मेरा ब्लाग तैयार हो चुका था पर उसे पढ़ कोई नहीं पा रहा था पर हां क्रिकेट पर लिखी सामग्री नारद पर चली जाती थी पर यूनिकोड में न होने के कारण कोई पढ़ नहीं पाता था। नारद ने बकायदा एक अलग काउंटर बना दिया था।

मुझे उस समय यह देखकर हैरानी हो रही थी कि जो नारद मुझे पंजीकृत नही कर रहा है वह मेरे क्रिकेट से संबंंधित ब्लाग क्यों अपने यहां दिखा रहा है। बहरहाल भारतीय क्रिकेट टीम के हारते ही नारद ने अपना काउंटर भी वहां से हटा लिया और मैं फिर वहां से बाहर हो गया। भारतीय क्रिकेट टीम हारी लोगों की हवा ही निकल गयी। ऐसे में कई लोगों के विज्ञापन तक रुक गये।

मैं पिछले 25 बरसों से इस टीम का खेल देख रहा हूं और पिछले साल गयी टीम की जीत की भविष्यवाणी करने वालें से मैं एक ही सवाल करता था कि ‘आप मुझे टीम का एक भी ऐसा पक्ष बतायें जिसकी वजह से इस टीम को संभावित विजेता मान सकें। टीम हारी लोगों की दुनियां ही लुट गयी। संयोगवश मैं यूनिकोड में लिखना शूरू कर चुका था और लिखने बैठा तो एक तो मुझे इस हार के गम से नहीं गुजरना पड़ा तो दूसरे खिसियाये लोग इंटरनेट की तरह आते दिखे।  सभी लोग पढ़ने नहीं आये तो सभी ऐसे वैसे फोटो देखने भी नहीं आये। पिछले साल से इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ा है।
मैने अपने ब्लाग पर हिट्स और व्यूज तेजी से बढ़ते देखे हैं और एक समय तो मुझे लगा कि हो सकता है कि 2008 के अंत तक किसी एक ब्लाग पर एक दिन में पांच सौ व्यूज भी हो सकते हैं। वर्डप्रेस के हर ब्लाग पर व्यूज सौ से ऊपर निकलते देखे हैं।  एक ब्लाग पर तो दो दिन तक 200 व्यूज आते दिखे। आज हालत वैसी नहीं है। अपने हिसाब से थोड़ा विश्लेषण किया तो कुछ स्मृतियां मेरे मन में आयी है।

अचानक भारतीय टीम ने ट्वंटी-ट्वंटी विश्व कप जीत लिया और उस समय मैने लिखा भी था कि क्रिकेट फिर जनचर्चा का विषय बना। एक हास्य कविता भी लिखी कि अब बीस का नोट पचास में चलायेंगे-आशय यह था कि पचास ओवरों के विश्व कप में पिट गये तो अब बीस का जीतकर फिर क्रिकेट को जीवित करने की कोशिश होगी। यही हुआ और उसके बाद कई खिलाड़ी जो हाशियं पर जा रहे थे वापस चर्चा में आ गये और तीन वरिष्ठ खिलाड़ी जो ट्वंटी-ट्वंटी विश्व कप में नहीं थे फिर मैदान में जम गये। इधर यह भी दिखाई   दिया कि भारतीय क्रिकेट टीम ने घरेलू श्रंखलाओं में जीत दर्ज की तो नवयुवक को एक वर्ग उस पर फिदा हो रहा है। साथ भी मैने यह अनुभव किया कि पिछले चार माह में ब्लाग पर हिट और व्यूज  की संख्या कम होती जा रही है।

अब यह जो नयी प्रतियागिता शुरू हुई है उसके बाद मुझे लग रहा है कि व्यूज और कम होते जा रहे हैं। पहले सौ के आसपास रहने वाले व्यूज साठ से सतर और तीस  से पचास तक सिमट रहे हैं।  मैने ब्लागवाणी पर भी जाकर अनुभव किया कि वहां भी सभी ब्लाग पर व्यूज कम हैं।  हो सकता है यह मेरा मतिभ्रम हो पर मुझे लगता है कि कुछ ब्लागर भी यह मैच देखने में लग गये हैं। मैने आज अपने साइबर कैफे के मालिक अपने मित्र से पूछा-‘‘क्या तुम्हें ऐसा लगता है कि इन मैचों की वजह से तुम्हारे यहां आने वाले लोगों की संख्या कम हुई है?’’

तो उसने कहा-‘‘हां, पर गर्मिंयां और छुट्टियां होने से भी यह हो सकता है पर मुझे लगता है मैचों वाले समय में संख्या कम हो रही है।’

इधर मुझे भी लगता है कि कुछ ऐसे लोग भी मैच देखने में लग गये हैं जो बिल्कुल इससे विरक्त हो गये थे। शायद इसका कारण यह भी है कि लोगों के पास समय पास करने के लिये और कोई जरिया भी तो नहीं है। इसलिये अब इस खेल में मनोरंजन का भी इंतजाम किया गया है। मैं उन लोगों में हूं जिनका मोह तभी इस खेल से भंग होता गया जब इस संदेह के बादल लहराने लगे थे। इसके बावजूद मैं आधिकारिक मैच मैं देखता हूं और यह प्रतियोगिता मुझे अधिक प्रभावित नहीं कर पा रही। मैं पहले भारत का वासी हूं और फिर मध्यप्रदेश का ओर दोनों का वहां कोई वजूद नहीं देखता इसलिये मुझे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। हां, इधर जब ब्लागवाणी पर दूसरे ब्लाग और वर्डप्रेस के अपने ब्लाग पर घटते व्यूज देखे तो विचार आया कि कहीं अंतर्जाल की वेबसाईटों और ब्लागों पर क्या लोगो की आमद कम हो जायेगी? इस तरह क्या इंटरनेट को क्रिकेट की पुनःप्रतिष्ठा से कोई चुनौती मिलने वाली है। 

यह बात याद रखने वाली है कि आदमी को चलाता मन ही है और इधर इंटरनेट पर जो लोग आये वह कोई आसमान से नहीं आये। मैं क्रिकेट, अखबार और टीवी से हटकर यहां आया तो और भी आये। मैं वहां नहीं जा रहा क्योंकि मुझे लिखने में मजा आ रहा है पर दूसरे तो जा सकते हैं। फिलहाल तो ऐसा लग रहा है पर कालांतर में फिर लोग इधर आयेंगे। मेरे जो मित्र पहले क्रिकेट से विरक्त हो चुके थे और यह मैच देख रहे हैं उनका कहना था कि ‘यह मैच अधिक समय तक लोकप्रिय नहीं रहेंगे क्यांेंकि इनमें राष्ट्रप्रेम का वह जज्बा नहीं है जिसकी वजह से क्रिकेट इस देश में लोकप्रिय हुआ था’। यह प्रतियोगिता समाप्त होते ही फिर लोग अपने पुराने ढर्रे पर वापस आ जायेंगे और अगर मुझे लगता है कि इन मैचों की वजह से इंटरनेट पर लोगों की आमद कम है तो वह निश्चित रूप से बाद में बढ़ेगी। यहां याद रखने वाली बात यह है कि लोग अपना समय केवल खेल देखने में ही नहीं बल्कि उसके बाद होने वाली चर्चाओं पर भी व्यय करते हैं और ऐसे में अगर इंटरनेट पर लोगों की आमद कम हो रही हो तो आश्चर्य की बात नहीं है।

मेरी स्थिति तो यह है कि हरभजन सिंह को टीम से निकाला गया-यह खबर भी मुझे बहुत  हल्की लगी। अगर यही अगर उसे किसी अतर्राष्ट्रीय एक दिवसीय मैच से निकाला जाता तो शायद मैं कुछ जरूर  लिखता। इस प्रतियोगिता में खेल रही टीमों में कोई दिलचस्पी नहीं होने के कारण कोई भी समाचार मेरे दिमाग में जगह नहीं बना पाता।

प्रतिबंध के बाद लगाये शोएब अख्तर ने फिक्सिंग के आरोप


शोएब अख्तर पर अनुशासनहीनता के आरोप में पांच साल क्रिकेट खेलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके बाद तैंतीय वर्षीय इस खिलाड़ी का क्रिकेट कैरियर लगभग समाप्त ही है। मुझे उससे सहानुभूति है और अब तो उसने जिस तरह फिक्सिंग का मामला उछाला है उससे तो नहीं लगता कि उसकी वापसी इतनी आसानी से होगी।

क्रिकेट में फिक्सिंग का आरोप पाकिस्तान से विकेटकीपर बैटसमेन राशिद लतीफ ने सबसे पहले लगाया था और उसमें उसने भारतीय खिलाडियों का नाम लिया था। उस समय उसकी बात को भारतीय प्रचार माध्यमों ने यह कहते हुए तवज्जो नहीं दी कि हर पाकिस्तानी आमतौर से भारत का स्वाभाविक विरोधी होता है। देशभक्ति के डर के मारे किसी ने उसके बारे में अधिक नहीं लिखा मगर इसी दौरान न्यूजीलैंड के अखबार में भी भारतीय खिलाडि़यों पर फिक्सिंग का आरोप लगा तो फिर मामला लंबा खिंच गया। इस देश के लोगों की मानसिकता है कि अगर गोरे लोग गलत बात भी कहें तो उसे सही मानेंगे। बहरहाल उस समय हमने राशिद लतीफ के आरोपों को बहुत गंभीरता से लिया था क्योंकि हम तब भी जानते थे कि भले ही पाकिस्तानी हर तरह से भारत के विरोधी हों पर क्रिकेट के मामलें वह हमेशा दोस्ती निभाते हैं-भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी भी अब तक यही दावे करत रहेे हैं।

आज अखबार में भारतीय क्रिकेट टीम के दक्षिण अफ्रीका के विरुद्ध 76 रन पर ढेर होने के समाचार प्रमुखता से छपा था तो शोएब का यह आरोप भी कि उसे भारत में मैच फिक्स करने के लिये प्रस्ताव दिया गया था, इसे भी प्रथम पृष्ठ पर छापा गया था। कल किसी टीवी चैनल पर मैने यह समाचार नहीं देखा था पर आज अखबार में उसका आरोप देखकर मुझे कोई हैरानी नहीं हुई। एक तो यह कि उससे उसकी रोजीरोटी छीनी गयी है तो उसको गुस्सा आना स्वाभाविक है। दूसरे यह कि उस पर लगे आरोप ऐसे नहीं थे जिस पर उसे इतनी बड़ी सजा मिलती। वैसे भी पाकिस्तान के क्रिकेट अधिकारी कौन दूध के धुले हैं जो इतनी कठोरता दिखा रहे हैं।

शोएब अख्तर के आरोपों पर अपने देश में कुछ लोग सवाल उठा सकते हैं क्योंकि इस बार देशभक्ति का कार्ड नहीं चलेगा। आखिर उसे इस देश की ही एक टीम में जगह दी गयी थी जहां प्रवेश होने से पहले ही उसकी विदाई हो गयी। जब इस देश के क्रिकेट के कर्णधार किसी पाकिस्तानी को यहां की किसी टीम में शामिल करते हैं तो फिर उसके कहे पर किसी के सवाल करने पर उसे देशभक्ति की घुटी नहीं पिला सकते।

किसी समय हम क्रिकेट के लिये हद दर्जे के दीवाने थे। कई रातें और दिन खराब किये। जब एक के बाद एक इस खेल पर फिक्सिंग के आरोप लगे तो हमारा मन खराब हो गया। कई खिलाडि़यों ने एक दूसरे पर आरोप लगाये तो कुछ पर प्रतिबंध भी लगे। आज क्रिकेट को लेकर न तो कोई आकर्षण है और न इसके प्रति कोई देशभक्ति का भाव है। यही सचिन जब बल्लेबाजी करता था तो अपने सारे काम छोड़कर हम घर में ही जम जाते थे और आज हालत यह कि टीवी और अखबारों से ही पता पड़ता है कि उसने कोई कारनामा किया है। शोएब अख्तर के आरोप पर आगे भी बहस होगी। अगर उसकी टीम में वापसी हो जाती है तो ठीक नहीं तो वह अपने आरोपों को आगे बढ़ाकर वह सनसनी फैला सकता है। हो सकता है यह नाटक हो केवल क्रिकेट को खबरों के बनाये रखने के लिये। जिस तरह पाकिस्तान के नये प्रधानमंत्री ने शोएब के बारे में वहां के क्रिकेट अधिकारयों को उसको दी गयी सजा पर पुनर्विचार करने को कहा है उससे तो लगता है कि वह बहाल भी सकता है। सब जानते हैं कि किसी देश के प्रधानमंत्री के ऐसे संदेशों का टाल पाना व्यवसायिक रूप ले चुके इस खेल के कर्णधारों के लिये कठिन होता है। यह भी हो सकता है कि वहां के प्रधानमंत्री की जनप्रिय मामलों में सक्रियता दिखाने के लिये यह मामला बनाया गया हो। तब तक शोएब अख्तर ने यह मामला उठाकर सनसनी फैला दी । अपनी वापसी पर वह ऐसे ही चुप हो जायेगा जैसे राशिद लतीफ चुप हो जायेगा। देखना यह है कि यह मामला किस तरह आगे बढ़ता है। एकदम कुछ कह पाना कठिन है क्योंकि क्रिकेट में सब कुछ चलता है यार!

अब यह खेल आम आदमी का नही रहा-आलेख


क्रिकेट के खिलाडियों की बोली को लेकर लोग आश्चर्य चकित हैं पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं है. बीस ओवरीय विश्वकप में भारत की जीत को भुनाने के लिए कुछ ऐसा होगा इसकी मुझे संभावना लग रही थी. मेरी उत्सुकता इस बात को लेकर थी की भारत के उन तथाकथित स्टार खिलाडियों को कैसे ‘एडजस्ट’ कैसे किया जायेगा जिन्हें उस विश्वकप प्रतियोगिता को महत्वहीन बताते हुए ले नहीं जाया गया था. आज खिलाडियों की बोली देखकर सब समझ में आ गया. उन खिलाडियों की बोली नहीं बल्कि उनको आइकोन बनाया गया कहीं ऐसा न हो कि उनकी कोई बोली नहीं लगाए. इतना ही नहीं क्रिकेट के प्रति राष्ट्र प्रेम का जज्बा न रहे इसलिए विदेशी खिलाडियों की भी बोली लगी. एंड्रू साईमंड जिसे अभी कुछ दिन तक भारत में खलपात्र प्रचारित किया गया वह भी बोली के मामले में दूसरे स्थान पर है.

कुल मिलाकर बीस ओवरीय विश्व कप में भारत की जीत को विस्मृत करने का यह एक प्रयास मात्र है क्योंकि उसमें वरिष्ठ खिलाडियों के लिए कोई स्थान नहीं है और बाजार के लिए वह पसंदीदा लोग हैं. वैसे जिस तरह टीवी पर यह दिखाया जा रहा है उससे अब आदमी को अपने बिकने पर कभी शर्म नहीं आयेगी. खिलाडियों के लिए जिस तरह बिकना-बिकना शब्द का प्रयोग किया जा रहा है उसके बाद सब भले लोग अपने आपको किसी भी क्षेत्र में बिकने के लिए प्रस्तुत करेंगे.

अभी कोई कहेगा कि ”तू बिक गया है तो आदमी लड़ने के लिए तैयार हो जाता है पर अब प्रतिवाद में कहेगा’मुझमें काबलियत है इसलिए बिका,तुझमें नहीं है इसलिए नहीं बिक सकता है और मुझसे जलता है’. कुछ दिन पहले जिन लोगों ने आस्ट्रेलिया में भारतीय टीम के साथ जो व्यवहार हुआ था उस पर अपना गुस्सा दिखाया था आज वह सोच रहे होंगे कि हम कहाँ गलत थे. अगर नहीं सोच रहे तो सोचें उस समय जिसने खलपात्र की भूमिका निभाई वह आज बोली में नंबर दो का हीरो है. अब यह पता नहीं है कि कोई पटकथा पहले की लिखी हुई है या त्वरित गति बदलते हुए दृश्यों के साथ लिखी जा रही है. सुनते हैं कि फिल्मों में तो कोई भी पटकथा दृश्य-दृश्य दर तय होती है और पहले से तयशुदा पटकथा में तमाम तरह के परिवर्तन भी आते हैं. फिल्म वालों के साथ क्रिकेट वालों के सोहबत देखकर मैं पहले भी लिख चुका हूँ कि अब क्रिकेट फिल्म के पैटर्न पर चलेगी. यही हो रहा है.

मगर हमारे लिए यह क्रिकेट वह खेल है जिसमें बल्ले और बैट के खेल के साथ उसमें हम जैसे दर्शकों के जज्बात भी होते हैं और जिस तरह के क्रिकेट की बात हो रही है उसमें आम आदमी की दिलचस्पी होगी इसमें हमको संदेह है. पहले तो एक ही हीरो को फिल्म वालों ने मैदान पर उतारा था पर अब तो और भी हीरो-हीरोइन इस बोली के मैदान में उतर आये हैं और समझ में नहीं आ रहा कि यह चल क्या रहा है? जो समझ में आ रहा है उसे बिना किसी प्रमाण के अनुमान से कैसे लिखें. अभी तो यह खेल मैदान में खेला जा रहा था पर होटलों में बोलियों का खेल भी इसका हिस्सा हो रहा है जो कि इतनी आसानी से समझा नहीं जा सकता. पहले क्रिकेट के खिलाड़ी फिल्मी स्टाइल में रैंप पर नाचे और अब फिल्म वालों को क्रिकेट में बोली का खेल फिल्मी स्टाइल में खेलते देखकर हैरानी हो रही है.

अजीब दृश्य है. जैसे कभी फिल्मों में हीरो और हीरोइन या उनके माँ-बाप के मकान की कुर्की लगते देखते थे अब टीवी पर खिलाडियों के लिए ऐसे दृश्य देखकर हैरानी हो रही है. कम से कम यह आम आदमी का खेल जैसा पहले था अब नहीं रहा है. अब लोग मैच के स्कोर, खिलाडियों के प्रदर्शन और पिच से अधिक इस पर चर्चा अधिक करेंगे कि किस खिलाड़ी की बाजार रेट क्या है?

धोनी कप्तान की तरह पेश आये


एक दिवसीय मैचों के श्रंखला में आस्ट्रेलिया ने भारत को अभी मैचों में हराकर यह सिद्ध कर दिया है कि अभी भी विश्व में उसके सामने कोई टीम टिक नहीं सकती। बीस ओवर के मैचों में भारत को विश्व विजेता का खिताब क्या मिला लोग फिर एक बार क्रिकेट की तरफ आकर्षित होने लगे थे पर अब इन दो पराजयों से उनकी खुमारी उतरने लगी है। समस्या यह है कि दोनों के खेल नियमों बहुत अंतर है और फिर पचास ओवर में हमेशा खिलाड़ियों के खेल के साथ उनके और कप्तान के रणनीतिक कौशल की भी परीक्षा होती है। इस मामले में भी हमेशा भारतीय खिलाडी कमजोर रहे हैं। कप्तान बनना तो सभी चाहते हैं पर उसके दायित्व को कोई नहीं समझता। सबको यह सम्मान तो चाहिए पर इस पद का निर्वाह कैसे हो यह कोई नहीं जानता। जब टीम जीतती है तो कप्तान वाह-वही लूटने को तैयार है और हारते हैं तो सारा आरोप खिलाडियों पर डाल देते हैं-उसमें भी किसी खिलाडी का नाम लेने से कराते हैं। कभी कोई कप्तान अपने खिलाड़ियों को निर्देश देते नज़र नहीं आते। भारतीय गेंदबाज कभी कप्तान से निर्देश लेकर गेंद डाल रहे हों ऐसा नहीं लगता।

मैने एक कप्तान को यह कहते हुए सुना था कि ‘सभी खिलाडी प्रोफेशनल हैं और कोई चीज समझाने की जरूरत नहीं है, वह सब खुद ही जानते है’। मैं सोच रहा था कि फिर अखिर कप्तान आखिर किस मर्ज की दवा है। क्या वह अपने साथी खिलाडियों को सख्ती से अपने मूल स्वरूप के साथ हालत के अनुसार खेलने का निर्देश नहीं दे सकता? ऐसा लगता है कि भारतीय टीम में सीनियर-जूनियर का कहीं न कहीं भेद चलता है इसीलिये ही सीनियर खिलाड़ी चाहे जैसा खेलने लगते हैं क्योंकि इनको वहां समझ या चेतावनी देने वाला कोई नहीं होता। अगर आज हम धोनी से यह अपेक्षा करें कि वह अपनी से वरिष्ठ खिलाडियों पर उनके निराशाजनक खेल पर नाराजगी जताए तो इसकी संभावना नहीं लगती। शायद यह भारतीय टीम के अभ्यास में ही नहीं है कि उसका कप्तान अपने से वरिष्ठ या कनिष्ठ खिलाडी पर ग़ुस्सा जाहिर करे क्योंकि कब सामने वाला उसका कप्तान बनकर आ जाये और फिर बदला लेने। फिर धोनी तो अपनी सामने ही तीन ऐसे भूतपूर्व कप्तानों के खेलते देख रहे हैं जो कभी भी फिर कप्तान बन सकते हैं और ऎसी स्थिति में ‘जैसा चल रहा है वैसे चलने दो’ की नीति पर चलने के अलावा उनके पास कोई चारा भी नहीं है।

बीस ओवर की विश्व कप प्रतियोगिता में धोनी इस मामले में बडे भाग्यशाली थे कि उनके व्यक्तित्व को वहाँ चुनौती देने वाला युवराज के अलावा और कोई नहीं था और उसने भी उनका बखूबी साथ निभाया। पर इन एक दिवसीय मैचों में जिस तरह भारतीय टीम पिट रही हैं उससे तो यह लगता है कि धोनी अपनी ही देश में असफल होने जा रहे हैं और खिलाड़ियों पर उनका कोई नियन्त्रण नहीं है। इस तरह लगतार असफल होने पर अगर वह अपने साथी खिलाडियों पर अगर इस वजह से गुस्सा नहीं हुए कि भविष्य में कोई उनमें से पुन: उनका कप्तान बनकर उनका भी भविष्य चौपट कर सकता है तो इस टीम के खिलाडियों के खेल में कोई सुधार नहीं होने वाला। अगर धोनी चाहते हैं कि उनका नाम सफल कप्तानों की सूची में शामिल हो तो उन्हें वरिष्ठ खिलाड़ियों को भी हालत के अनुसार खेलने के निर्देश देने होंगे।

अभी श्रंखला में हारने से उनकी कप्तानी पर प्रश्न चिन्ह उठना शुरू हो गया हैं-बीस ओवर की विश्व कप में उनकी जो छबि बनी थी अब वह धूमिल होना शुरू हो गयी है-वैसे वहाँ किसी खास रणनीतिक कौशल का प्रदर्शन नहीं किया था और जो अब मिला तो वह उनके हाथ से जा रहा है. एक मामले में उनके स्थिति अन्य भारतीय कप्तानों से अलग है कि आज तक किसी भी कप्तान ने तीन भूतपूर्व कप्तानों का संभालने का काम नहीं किया है

कल ब्लोग पर प्रकाशित कविता यहाँ प्रस्तुत है।
बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा

बीस के शेर
पचास में ढ़ेर
जीतते हैं तो फुलाते सीना
हारें तो कहें’समय का फेर’
समझाया था क्यों करते हो
पचास का आयोजन
जब है बीस का भोजन
क्रिकेट कोई दाल होता तो
पानी मिलाकर चला लेते
कुछ खा लेते तो
बाकी भूखे रह जाते माला फेर
बीस ओवर के खेल पर
बहुत खुश हुए थे कि
दुनिया में जीते अपने शेर
पचास ओवर के खेल में
कंगारुओं की फुर्ती से हुए ढ़ेर
कहैं दीपक बापूलोग पूछ रहें हैं
‘वह मधुर सपना था या
खडा है सामने यह कटु सत्य’
दिन भर पूछने लगे हैं फिर स्कोर
चर्चा करते हैं क्रिकेट की
सांझ हो या भोर
चौबीस साल पुरानी कहानी
फिर सामने आ रही है
जब विश्व विजेता हुए थे
इसी तरह ढ़ेर
अब इस कहानी पर
अगले चौबीस महीने तक भी
नहीं चलेगा खेल
काठ की हांडी बार-बार नहीं चढती
छोटी जीत पर बड़ी हर नहीं फबती
बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा
कितना भी नया हो बीस का ही रहेगा
पोल खुल जायेगी देर-सबेर