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हिंदी अध्यात्म सन्देश-बुरे काम से दूर होकर ही अच्छाई समझना संभव (hindu adhyatm sandesh)


अर्थसिद्धि परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत्।
न हि धर्मदपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम्।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में अर्थ प्राप्त करने की इच्छा है उसे धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करना चाहिए। जिस तरह स्वर्ग से अमृत दूर नहीं होता उसी प्रकार धर्म से अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता।

यस्यात्मा विरतः पापाद कल्याणे च निवेशितः।
तेन स्र्वमिदं बुद्धम् प्रकृतिर्विकृतिश्चय वा।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिसकी बुद्धि पाप से परे होकर कल्याण के मार्ग पर आ जाये वह इस संसार में हर वस्तु कि प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह से जान लेता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह कहना गलत है धर्म के मार्ग पर अर्थ की प्राप्ति नहीं हो सकती। धर्म-ईमानदारी, सहजता, परमार्थ, और अपने कर्तव्य से प्रतिबद्धता-का परिणाम ही अर्थ की प्राप्ति ही है। यह अलग बात है कि जल्दी अमीर बनने या आवश्यकता से अधिक धनार्जन के के लिये लोग अपने जीवन में आक्रामक और बेईमानी की प्रवृत्ति अपना लेते हैं। इस संसार में ऐसे लोग भी है जो बेईमानी से धन कमाकर कथित रूप से प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व का आकर्षण समाज के युवाओं को आकर्षित करता है पर उनको यह समझ लेना चाहिये कि बेईमान और भ्रष्ट लोगों को धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल की शक्ति की वजह से सामने कोई कुछ नहीं कहता पर पीठ पीछे सभी लोग उनके प्रति घृणा का भाव दिखाने से नहीं चूकते। फिर भ्रष्ट और बेईमान लोग का धन जिस तरह बर्बाद होता है उसे भी देखना चाहिये।

नीति विशारद विदुर जी के अनुसार जिस व्यक्ति ने ज्ञान प्राप्त कर लिया वह इस संसार में व्यक्तियों, वस्तुओं और स्थितियों की प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह समझ जाते हैं। इस ज्ञान से वह विकृतियेां से परे रहने में सफल रहते हैं और प्रकृतियां उनका स्वतः ही मार्ग प्रशस्त करती हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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व्यक्ति में चेतना लाने से ही समाज जागृत होगा-चिंतन


अक्सर यह सुनने को मिलता है कि ‘महाभारत घर में नहीं रखना चाहिए क्योंकि इससे क्लेश होता है’। हो सकता है या सच हो या भ्र्म! एक बात जरूर है कि जैसा साहित्य आप पढ़ते हैं वैसे ही आपकी बुद्धि भी हो जाती है। शायद यही कारण है कि घर में महाभारत रखने के लिये रोका जाता है कि घर में अगर होगी तो पढ़ी जाएगी और फिर लोगों में क्लेश की भावना पैदा हो सकती है। शायद इसीलिये हमारे देश के अध्यात्मिक चिंतकों ने महाभारत से श्रीगीता को अलग कर दिया। इसक मतलब सीधा है कि उसमें कुछ ऐसे प्रसंग है जिनका दुहराव हमारे समाज में पसंद नहीं किया जायेगा। महाभारत प्रायः घरों में नहीं रखा जाता है पर शायद ही ऐसा घर हो जहां श्रीमदभागवत गीता नहीं रखी जाती हो। सच बात तो यह है कि श्रीगीता न केवल चारों वेदों का सार संग्रह है बल्कि वह हमारे अध्यात्मिक ज्ञान का खजाना होने के साथ ही सभ्य संस्कृति और पवित्र संस्कारों के निर्माण का स्तोत्र भी है।
मजे की बात यह है कि श्रीगीता को जाने बिना ही संस्कार और संस्कृति बचाने के लिये कुछ लोग अनवरत अभियान छेड़े रहते हैं पर अगर उनसे उसका स्वरूप पूछा जाये तो उनकी हवा निकल आयेगी। पाश्चात्य सभ्यता से खतरा बतारने वाले लेाग बताते हैं कि-
1.पश्चिम में माता पिता और गुरु को सम्मान नहीं दिया जाता पर हमारे यहां उसकी परंपरा है। बच्चे अगर अपने संस्कारों ओर संस्कृति से परिचित नहीं होंगे तो बिगड़ जायेंगे और हमारे समाज का ढांचा बिगड़ जायेगा।
2.स्त्रियों को वह वस्त्र पहनने चाहिये जो पूरा शरीर ढंकते हों। अर्द्धनग्न होकर घूमने वाली स्त्रियों इस देश के लिये बहुत बड़ा खतरा है।
3.देश में केवल पुराने त्यौहार ही मनाने चाहिये ताकि संस्कृति बची रहे। पश्चिम के त्यौहार मनाने की प्रवृत्ति नहीं होना चाहिये।
शायद और भी बहुत सारी बातें बतायेंगे। पुत्र के रूप में श्रवण कुमार और भगवान श्रीराम जी और बहु के रूप में श्रीसीता जी का उदाहरण देंगे। यह सब ठीक है। हमारे देश के अनेक धार्मिक गुरु भी खूब उनका बखान करते हैं। देखो कैसे श्रवण कुमार ने माता पिता की सेवा की और भगवान श्रीराम ने पिता की आज्ञा का पालन किया। पत्नी के रूप में स्त्री से पतिव्रता की आशा की जाती है। गौर करें तो पायेंगे कि केवल सारी शिक्षा शासित होने वाले संबंधों पर है और वैसा न होने पर सजा का भी प्रावधान किया गया है ‘रौरव नरक का’। मगर शासक संबंधों का कोई वर्णन नहीं करना चाहता क्योंकि बूढ़े लोग ही धर्म के अधिक सहायक होते हैं और युवाओं से ऐसी अपेक्षा नहीं की जाती। एक अच्छी माता और पिता बनने की शिक्षा युवाओं को शायद ही कोई देता हो और शायद ही कोई ऐसा आदमी मिले जो अच्छे माता पिता न बनने पर उसकी सजा भुगतने की चेतावनी देने का साहस करता हो।
हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि ‘जैसा आदमी कर्म करता है वैसा ही फल उसके सामने आता है’। संस्कृति और संस्कारों के रक्षक यहां आकर खामोश हो जाते हैं। अगर कोई व्यक्ति अच्छा पिता नहीं बना तो उससे कुपुत्र के दुष्कर्मों या अपने प्रति उपेक्षा का भाव उसे झेलना ही है। इसमें पश्चिम संस्कृति के प्रभाव जैसी कोई बात नहीं है। जब वह अपने अकर्मण्यता या दुष्कर्म का दुष्परिणाम भोग रहा है तब उसके साथ सहानुभूति जताते हुए यह कहने का कोई मतलब नहीं है कि‘आजकल जमाना खराब आ गया।’
ऐसा नहीं है कि पश्चिमी सभ्यता आने के पहले कोई इस देश में सभी पुत्र श्रवण कुमार, भगवान श्रीराम तथा अन्य महापुरुषों जैसे थे। अगर होते तो फिर इनके अलावा उनका नाम भी कहीं आता।
सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे समाज में अपनी संतानों को हथियार की तरह उपयोग करने की प्रवृत्ति है वह बहुत खतरनाक है और इस कारण लेाग अपने बच्चों को अपने जीवन मेें केवल एक ही बात सिखाते हैं कि किसी भी तरह कमाओ। उसके बाद जब बच्चे आत्मनिर्भर होते हैं तो उनसे अपेक्षा करने लगते हैं कि वह संस्कार और संस्कृति से परिचित हों। जब बच्चे में संस्कार भरने का समय था तब तो भरा नहीं और जब समय आया तो फिर ऐसे फल की कामना करने लगे जो उन्होंने बोया ही नहीं।
कहने का तात्पर्य यह है कि हम जिस प्रकार की संस्कृति की बात करते हैं वह एक सामान्य आचार और व्यवहार का भाग मात्र है जो हमारे ही कर्म के आधार पर निर्धारित होता है। हम जैसा व्यवहार दूसरों से करते हैं वैसा ही हमें मिलता है। हम अपने से शासित लोगों से अपेक्षायें तो करते हैं पर सिखाते कुछ नहीं। फिर हम मानवीय रिश्तों के निर्वहन और पहनावे में जिस प्रकार संस्कृति और संस्कारों के मूल तत्व ढूंढते हैं वह तो पश्चिम में भी हैं। ऐसा नहीं है कि पश्चिम में पुत्री और पुत्र माता पिता को प्रेम और आदर नहीं देते। अपनी सफलताओं पर वह भी अपने माता पिता का ही नाम लेते हैं। तात्पर्य यह है कि केवल पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों की कथित पवित्रता को ही संस्कृति या संस्कार से को जोड़ना ठीक नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अपने इन रिश्तों के निर्वाह से प्रथक किस तरह का आचार और व्यवहार करते हैं वह भी संस्कारों और संस्कृति से जुड़ा है-मसलन परिवार का भरण भोषण के लिये प्राप्त धन के स्तोत्र पवित्र होना, दूसरे की संपत्ति पर बुरी नजर न डालना तथा निष्काम भाव से दूसरों की सहायता करना।
पश्चिमी पहनावे या उत्सवों को अपनाने से अगर हमारी संस्कृति ढहने वाली होती तो शायद हम आज अपने सारे पवित्र ग्रथों का अध्ययन नहीं करते-जबकि उनका अध्ययन सामान्य शिक्षा में प्रचलित नहीं है। पश्चिमी परिधान पहनने वाले युवक युवतियां मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थानों पर दर्शनार्थ जाते हुए देखे जा सकते हैं। उनकी चारित्रिक दृढ़ता वैसे ही जैसे पहले की पीढ़ी में होती है। वह लोग वैलंटाईन डे मनाते हैं पर इसका मतलब यह नहीं है कि उनको दीपावली याद नहीं हैं। हां, यह सही है कि बाजार के प्रभाव में पश्चात्य उत्सवों को भी कुछ युवक युवतियां मनाते हैं-देश की जनसंख्या की दृष्टि से उनकी संख्या नगण्य है-पर इससे उनके स्वयं के संस्कार तो नष्ट नहीं हो जाते। फिर जो बाजार उनका प्रेरक है वह उन लोगों के दान और चंदे का स्तोत्र भी है जो संस्कृति और संस्कारों की रक्षा और धर्म के प्रचार के लिये कार्यरत हैं। इसलिये धर्म और संस्कृति रक्षकों को अपने अभियान में एक हद के अंदर तो रहना ही पड़ता है क्योंकि वह उस बाजार से अधिक देर तक लड़ नहीं सकते जो उनका भी मददगार है।
हमारे अध्यात्मिक ज्ञान में विराट शक्ति है क्योंकि वह सृष्टि और जीवन के उस सत्य के निकट है जिसके पास अभी पश्चिम का विज्ञान पहुंच रहा है। यही कारण है कि पश्चिम में भारतीय धर्मग्रथों का अध्ययन अब नये सिरे से किया जा रहा है। यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि अगर हम इस समय देश का आचरण देखें तो शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो यह सके कि वह संतुष्ट है। हमें आत्मंथन करना चाहिये कि क्या हम जिस प्रकार का आचरण कर रहे हैं क्या वाकई पूरी तरह से पवित्र और शुद्ध है। केवल धर्म, संस्कृति और संस्कारों की रक्षा का नारा लगाने से काम नहीं चलने वाला। हमारा अध्यात्मिक दर्शन खाने या पहनने के मामले में कोई प्रतिबंध नहीं लगाता सिवाय इसके कि वह देह के स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिये उचित हो। सबसे बड़ा सवाल आचरण और व्यवहार के लिये है और उसके लिये किसी अभियान की बजाय ऐसे सम्मेलनों की जरूरत है जहां मिलकर लोग अपने आचार विचार पर आत्म मंथन कर उसमें सुधार सकें। मुख्य बात समाज को नहीं बल्कि व्यक्ति को सुधारने की की है। उसमें भी दूसरे पर नहीं बल्कि स्वयं पर दृष्टि डालने की है। समूहों में अभियान चलाने से शुद्धता नहीं आ सकती बल्कि उसके लिये स्वयं के स्तर पर प्रयास करना चाहिये।
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अध्यात्मिक केंद्र हैं कि व्यापारिक-आलेख


भारत में अधिकतर लोगों का अध्यात्म के प्रति झुकाव स्वाभाविक कारणों से होता है। मात पिता और अन्य बुजुर्गों की प्रेरणा से अपने देवताओं की तस्वीरों के प्रति उनका आकर्षण इतना रहता है कि बचपने में ही उनके अध्ययने की किताबों और कापियों पर उनकी झाकियां देखी जा सकतीं हैं। मुझे याद है कि बचपन में जब कापियां खरीदने जाता तो भगवान की तस्वीरों की ही खरीदता था। एक बार अपनी मां से पैसे लेकर एक मोटी कापी लेने बाजार गया वहां पर भगवान की तस्वीर वाली कापी तो नहीं मिली हां एक कापी पर ‘ज्ञान संचय’ छपा था वह खरीद ली। वह घर लाया तो ‘ज्ञान’ शब्द ने दिमाग पर ऐसा प्रभाव डाला कि उस कुछ ऐसे ही लिखना शुरू कर दिया। फिर एक छोटी कहानी लिखने का प्रयास किया। तब मैंने सोचा कि इस पर तो मैं कुछ और लिखूंगा और विद्यालय का काम उस पर न करने का विचार किया। इसलिये फिर अपनी मां से दूसरी कापी लेने बाजार गया और अपने मनोमुताबिक भगवान जी की तस्वीर वाली किताब ले आया। वह ज्ञान संचय वाली किताब मुझे लेखक बनाने के काम में आयी।

आशय यह है कि पहले बाजार लोगों की भावनाओं को भुनाता था और ऐसी देवी देवताओं की तस्वीर वाली किताबें और कापियां छापता था जिससे लोग खरीदें। बाजार आज भी यही करता है और मैं उस पर कोई आक्षेप भी नहीं करता क्योंकि उसका यही काम है पर उसके सामने अब दूसरा संकट है कि आज के अनेक अध्यात्मिक संतों ने अपना ठेका समझकर अनेक वस्तुओं का उत्पादन और वितरण अपने हाथ के लिया है जिनका अध्यात्म से कोई संबंध नहीं और इस तरह उसने बाजार में बिकने वाली वस्तुओं की बिक्री में से बहुत बड़ा भाग छीन लिया है। दवायंे, कैलेंडर, पेन, चाबी के छल्ले, डायरी और कापियां भी ऐसे आध्यात्मिक संस्थान बेचने लगे हैं जिन्हें केवल प्रचार का काम करना चाहिए।

उस दिन एक कापी और किताब बेचने वाले मेरे मित्र से मेरी मुलाकात हुई। मैं स्कूटर पर उसकी दुकान पर गया और कोई सामान उसे देने के लिये ले गया। उससे जब मैंने धंधे के बारे में पूछा तो उसने बातचीत में बताया कि अब अगर अध्यात्म लोग पेन, डायरियां और कापियां बेचेंगे तो हमसे कौन लेगा? अब तो संतों के शिष्य अधिक हो गये हैं और वह कापियां और पेन बेचते हैं। अगर कहो तो उनके भक्त घर पर भी दे जाते हैं।

मै सोच में पड़ गया क्योंकि मात्र पंद्रह मिनट पहले ही मुझे मेरे एक साथी ने एक रजिस्टर दिया था और और वह अध्यात्मिक संस्थान द्वारा प्रकाशित था। उस पर अध्यात्मक संत का चित्र भी था। मैनें उससे कई बार ऐसा रजिस्टर लिया है। वह और उस जैसे कई लोग आध्यात्मिक संस्थाओं को उत्पादों को सेवा भाव से ऐसी वस्तुऐं उपलब्ध कराते हैं। देखा जाये तो वह अध्यात्मिक कंपनियों के लिये भक्त लोग मुफ्त में हाकर की भूमिका अपने भक्ति भाव के कारण निभाते हैं। कई जगह इन अध्यात्मिक संस्थानों की बसें अपने उत्पाद बेचने के लिये आतीं हैं। कई संस्थान अपनी मासिक पत्रिकायें निकालते हें लोग पढ़ें या नहीं पर भक्ति भाव के कारण खरीदते हैं। इस तरह जहां घरों में पहले साहित्यक या सामाजिक पत्र पत्रिकाओं की जगह थी वहां इन धार्मिक पत्रिकाओं ने ले ली है। शायद कुछ हंसें पर यह वास्तविकता है कि पहलंे और अब का यह फर्क मेरा बहुत निकट से कई घरों में देखा हुआ है।

अधिक विस्तार से समझाने की आवश्यकता नहीं है कि दवाओं से लेकर चाबी के छल्ले बेचने वाले अध्यात्मिक संस्थानों की वजह से भी हमारे देश के छोटे कामगारों और व्यवसायियों की रोजी रोटी प्रभावित हुई है। हम अक्सर विदेशी और देशी कंपनियों पर लघु उद्योगों को चैपट करने का आरोप लगाते हैं पर देखा जाय तो उत्पादन से लेकर वितरण तक अपने भक्तों की सहायता से काम करने वाले इन अध्यात्मिक संस्थाओं ने भी कोई कम क्षति पहुंचाई होगी ऐसा लगता नहीं है। हमारा यह विचार कि हिंदी के पाठक कम हैं इसलिये पत्र-पत्रिकायें कम पढ़ी जा रही हैं। वस्तुतः उनकी जगह इन पत्रिकाओं ने समाप्त कर दी है। बढ़ती जनसंख्या के साथ जो पाठक बढ़े उन पर इन आध्यात्मिक पत्रिकाओं ने उन पर नियंत्रण कर लिया। इनके प्रचार प्रसार की संख्या का किसी को अनुमान नहीं है पर मैं आंकड़ों के खेल से इसलिये परे रहता हूं क्योंकि जो सामने देख रहा हूं उसके लिये प्रमाण की क्या जरूरत हैं। अधिकतर घरों में मैंने ऐसी आध्यात्मिक पत्रिकायें और अन्य उत्पाद देखे हैं और लगता है कि अगर यह अध्यात्मिक संस्थान उन वस्तुओं के उत्पाद और वितरण से परे रहते तो शायद रोजगार के अवसर समाज में और बढ़ते।

अपने अध्यात्मिक विषयों में मेरी रुचि किसी से छिपी नहीं है मै अंधविश्वास और अंध भक्ति में यकीन नहींे करता और मेरा स्पष्ट मत है कि अध्यात्म के विषयों का अन्य विषयों के कोई संबंध नहीं है। अगर आप ज्ञान और सत्संग का प्रचार कर रहे हैं तो किसी अन्य विषय से संबंध रखकर अपनी विश्वसीनयता गंवा देते हैं। यही वजह है कि आजकल लोग संतों पर भी जमकर आक्षेप कर रहे हैं। मै संतों पर आक्षेप के खिलाफ हूं पर जिस तरह अध्यात्मिक संस्थान अन्य सांसरिक उत्पादों के निर्माण और वितरण का कार्य छोटे लोगों को रोजगार के अवसरों को नष्ट कर रहे हैं उसके चलते किसी को ऐसे आक्षेपों से रोकना भी मुश्किल है। अगर लोगों के किसी कारण रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं तो उस पर आक्षेप करना उनका अधिकार है।

बाजार अगर लोगों की भावनाओं को भुनाता है तो उससे बचने के लिये लोगों को अध्यात्म का ज्ञान कराकर बचाया जा सकता है पर अगर अध्यात्मिक संस्थान ही इसकी आड़ में अपना बाजार चलाने लगें तो फिर उनको अध्यात्म ज्ञान देना भी कठिन क्योंकि उनके चिंतन और अध्ययन की बौद्धिक क्षमता का हरण उनके कथित गुरू अपने उपदेशों से पहले कर चुके हैं।

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राम मिथक हैं तो यहाँ सत्य कौन है


राम अगर मिथक हैं तो यहाँ सत्य कौन है? शायद इस बात का उत्तर वह लोग भी नहीं दे सकते जो राम को मिथक मानते हुए भी उन्हें मानने को तैयार हैं। एक तरफ वह लोग हैं जो कहते हैं कि राम एक कल्पना हैं दूसरी तरफ वह हैं जो उनके आस्तित्त्व को सत्य मानते हैं। इन दोनों के बीच वह लोग भी जो कहते हैं कि अगर वह मिथक भी हैं तो हम उन्हें मानेंगे-क्योंकि उन्हें लगता है कि भगवान श्री राम के अस्तित्व का कोई वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना तो कठिन है पर राम को काल्पनिक बताने वालों का सामना कराने के लिए यही एक तर्क है।

मैं प्रतिदिन इस विषय पर चल रही बहस को देख रहा हूँ, और तब मुझे आश्चर्य होता है कि राम को हृदय नायक मानने वालों द्वारा देश में राम के विषय में सही ढंग से तर्क प्रस्तुत नहीं किये जा रहे है-भावावेश में आकर अपनी प्रतिक्रिया देने से नकारात्मक सोच वालों को संतुष्ट नहीं किया जा सकता है. हमारे अध्यात्म में इतना गूढ़ ज्ञान है की हम किसी भी ऐसे तर्क का उत्तर दे सकते हैं जिसका प्रतिकार कोई नहीं कर सकता, जो मैंने यह प्रश्न किया है कि राम अगर मिथक है तो सत्य कौन हैं तो इसके पीछे मेरा ध्येय केवल यही है कि मैं जिस धर्म को मानता हूँ और जिस तरह समझ पाया हूँ उसे लेकर अपनी बात कह सकूं। प्रश्न का जवाब भी मैं देता हूँ कि हम राम के अस्तित्त्व का प्रमाण किसे दें? जो माँग रहे हैं पहले वह यह तो साबित करें कि वह स्वयं मिथक या कल्पना नहीं हैं? चक्कर में डाल देने वाली इस बात में कोई चुनौती नहीं है बल्कि सीधा विज्ञान हैं जो हमारे धर्म ग्रंथों में मौजूद हैं। मैं यह दावा नहीं करता कि मैं सही हूँ और मुझे अपनी गलती मानने में कोई झिझक भी नहीं है।

पहले तो यह जानना जरूरी हैं कि हम क्या हैं? इस शरीर को लेकर हम यह कहते हैं ‘हम हैं’। पर आंखों का काम है देखना वह देखती हैं, कानों का काम सुनना है वह सुनते और नाक का काम हैं सांस लेना और सूंघना वह भी करती है। मुख से भोजन को ग्रहण करने से लेकर उसके कचडे में परिवर्तित होकर देह से निष्कासन तक सारा काम शरीर में मौजूद इन्द्रियां करती हैं, अत: एक बात तो रही कि हम यह इन्द्रियां नहीं हैं। पांच तत्वों से बने इस शरीर में ‘मन, बुद्धि और अहंकार’ यह तीन प्रकार की प्रकृतियां होती हैं जिनके सहारे इस धरती पर समस्त देहधारी जीव अपने साथ मौजूद इन्द्रियों के समूह को लेकर विचरण करते हैं। मतलब एक चक्र है जो घूम रहा है और कहते हैं कि इसे हम घुमा रहे हैं। पंच तत्वों के समूह में स्थापित होने के बाद तीनों प्रकृतियां उस पर शासन करती हैं। मैं तो नहीं ढूँढ पाया कि हम कौन हैं पर रामजी के अस्तित्व पर सवाल उठाने वाला पहले इन सब से अलग होकर देख ले तो अपने आप जवाब मिल जाएगा कि राम मिथक थे या सत्य ।

इस धरती पर कुछ भी स्थिर नहीं है, सारा जगत चलायमान है इसलिये इसे मिथ्या और माया के स्वरूप भी कहा जाता है क्योंकि जो हम अपने को समझ रहे हैं वह हैं नहीं और जो हैं उसे जानते नहीं। चलते। फिरते और उठते-बैठते बस यही अहसास कि हम कर रहे हैं पर कर तो रहे हैं पर कर रही है यह देह अपने अन्दर मौजूद इन्द्रियों और प्रकृतियों की सहायता से वह भी उनके वशीभूत होकर। अब पलट कर हम सवाल करेंगे कि पूछ कौन रहा है और जवाब कौन दे?

अब रहा भौतिक प्रमाणों का सवाल। यह धरती कई करोड़ वर्ष से अस्तित्त्व में हैं इसके स्वरूप में परिवर्तन आते रहे हैं। हम ज्यादा दूर क्यों जाएँ अपने ही देश में देख ले ऐसे ढ़ेर सारे महल आज भी दिख जाते हैं जिनमें बैठे राजाओं ने अपने राज्य पर शासन किया और आज वह खँडहर हो गए। जिस समय वहाँ राजा रहते थे और वहाँ परिंदा भी नहीं आ सकता था वहां आज श्वान, गाय और भैसों का भी विचरण आसान हो गया है-और ऐसे महल पचास से पांच सो वर्ष से ज्यादा पुराने भी नहीं होंगे। आशय यह है कि इस धरती के स्वरूप में परिवर्तन आते हैं और मोहन-जोडदो और हडप्पा सभ्यता के अवशेषों से पता चलता है कि विकसित सभ्यता तब भी थी। अब कोई लोग अगर रामजी के होने के अस्तित्व के लिए भौतिक प्रमाण मांग रहे हैं तो उसे अज्ञानता के अलावा और क्या कहा जा सकता है? आखिर में यह बात कहना चाहता हूँ की हम देह या भौतिकता को महत्व नहीं देते इसलिए ही तो हमारे देश में शव को जला देने की प्रथा है ताकि पंचतत्वों से बने शरीर को लेकर कोई अंधविश्वास निमित न हो. यह भौतिक देह नश्वर है पर इसमें विचरने वाली आत्मा अमर है इसी शाश्वत सत्य पर आधारित है हमारा आध्यात्म.

कंप्यूटर चलाने वालो को योग जरूर करना चाहिए


      आजकल पूरे विश्व के साथ देश में भी कम्प्यूटर का प्रयोग बढ़ता जा रहा है। यह अच्छा भी है और बुरा भी। चूंकि हम भारतीयों की आदत है की हम किसी भी साधन को सध्या समझ लेते हैं और उसका उपयोग चाहे जैसे करने लगते हैं। आजकल कंप्यूटर, मोबाइल तथा पेट्रोल चालित वाहों का उपयोग हम सुविधा के लिए कम विलासिता के लिए अधिक उपयोग कर रहे हैं। इससे शारीरिक और मानसिक विकारों में बढ़ोतरी होने से स्वास्थ विशेषज्ञ बहुत चिंतित हैं।
       ऐसे में पूरे विश्व में भारतीय योग विद्या के निरंतर लोकप्रिय होने का ऐक कारण यह भी है कि मानव जीवन धीरे-धीरे प्रकृति से दूर होता जा रहा है और ऎसी वस्तुओं का उपयोग बढ़ता जा रहा है जो हमारे शरीर के लिए तकलीफ देह होतीं है। हम यहाँ यहाँ किसी अन्य के बात न करते हुए सीधे कंप्यूटर की बात करेंगे। यह तो अलग से चर्चा का विषय है की कितने लोग इसे सुविधा की तरह और कितने विलासिता की तरह उपयोग कर रहे हैं पर इसकी वजह से जो भारी शारीरिक और मानसिक हानि पहुंचती है उसकी चर्चा विशेषज्ञ अक्सर करते हैं। इधर हम कुछ दिनों से कुछ दिनों से कम्प्यूटर और इंटरनेट पर कम करने वाले लोगों की निराशाजनक अभिव्यक्ति को भी देख रहे हैं। इसलिये सोचा कि आज यह बात स्पष्ट कर दें की कि हम अच्छा या बुरा जैसे भी लिख पा रह हैं उसका कारण इस स्थूल शरीर से प्रतिदिन की जाने वाले योगासन और ध्यान से से मिलने वाली शारीरिक और मानसिक ऊर्जा ही है। हालांकि अनेक कारणों से कुछ आसन और प्राणायाम अवधि कम जरूर हुई है पर ऐक बात साफ दिखाई देती है कि इस कम अवधि में भी प्रतिदिन अपने उत्पन्न होने वाले विकारों को निकालने में सफलता मिल जाती है। जब कंप्यूटर पर आते हैं तो ऐसा लगता ही नहीं है कि कल हमने इस पर कुछ काम किया था। ऐसा नहीं है कि हमें कोई स्मृति दोष है जो भूल जाते हैं । हमारा आशय यह है कि जो थकावट कल प्राप्त हुई थी उसे भूल चुके होते हैं। आप में कई लोग होंगे जिन्हे याद होगा कि कल कितना थक गए होंगे, इसका मतलब है कि अब आपको योग साधना शुरू कर देना चाहिऐ। मनुष्य को प्रतिदिन मानसिक और शारीरिक रुप से ताजगी देने के लिए इसके अलावा और भी कोई उपाय है इस पर हम जैसे लोग यकीन नहीं करते।
        पहले हम यहाँ यहाँ स्पष्ट कर दें कि हम कोई योग शिक्षक नहीं हैं और इस स्थूल देह से यह योग साधना पिछले साढ़े साढ़े आठ वर्षों से की जा रहीं है। यह ब्लॉग योगसाधना चार वर्ष करने के बाद प्रारभ हुआ था और अब इसे भी चार वर्ष से ऊपर समय हो गया  है। हमारे गुरू एक सरकारी कर्मचारी हैं और बाकायदा पेंट शर्ट पहनकर घूमने वाले आदमी हैं। मतलब यह जरूरी नहीं है कि धार्मिक भगवा धारी संत ही योग साधना सिखाते हैं बल्कि कुछ लोग ऐसे हैं भी हैं जो सामान्य जीवन में रहते हुए भी योग साधना सिखा रहे हैं।
हमारे देश में इस समय बाबा रामदेव ने इसका बहुत प्रचार किया है और उनकी वजह से भारतीय योग को विश्व में बहुत प्रसिद्धि भी मिली है। उनके अलावा भी कई संत हैं जो इसमे अपनी उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं, इनमे श्री लाल जीं महाराज भी हैं।
       इसके अलावा भारतीय योग संस्थान भी इसमे बहुत सक्रिय है और इस लेखक ने उनके शिविर में ही योग साधना करना सीखा था। इसकी शाखाए देश में कई स्थानों पर लगतीं है और जो इस लेख को पढ़कर योग साधना करने के इच्छुक हौं वह अगर पता करेंगे तो उन्हें अपने आसपास इससे संबंधित शिविर जरूर मिल जायेंगे।
      हम टीवी पर संत बाबा रामदेव और श्री लाल महाराज तथा अन्य गुरुओं को  बहुत समय तक योग साधना कराते हुए देखते हैं तो यह वहम हो जाता है कि सारे आसन कर ही हम अपनी शारीरिक व्याधियों से छुटकारा पा सकते हैं पर दो घंटे का कार्यक्रम करना हमें मुशिकल लगता है। दूसरा यह भी लगता है कि योग केवल व्याधियों से छुटकारा पाने के लिए है और हम तो ठीकठाक हैं फिर क्यों करें? यहाँ हम स्पष्ट कर दें कि ऐक तो हम सुबह ज्यादा नहीं तो पन्द्रह मिनट ही प्राणायाम करें तो भी हमें बहुत राहत मिलती है। दूसरा यह कि यह कि योग साधना से शरीर की व्याधिया दूर होती हैं यह ऐक छोटी बात है। वास्तविकता तो यह है है जीवन में प्रसन्न रहने का इसके अलावा अन्य कोइ उपाय हम तो नहीं देखते। यह तो जीवन जीने की कला है।

      इस ब्लोग पर हम इसी विषय पर आगे भी लिखते रहेंगे पर अभी यहाँ बताना जरूरी हैं कि योगासन से शरीर, प्राणायाम से मन और ध्यान से विचारों के विकार दूर होते हैं। हमें सुबह उठकर खुली जगह पर कुछ बिछाकर उस पर बैठ जाना चाहिऐ और धीरे-धीरे पेट को पिचकना चाहिऐ और अनुलोम-विलोम प्राणायाम करना चाहिऐ। जिन लोगों को उच्च रक्तचाप या अन्य कोई बीमारी  न हो तो इसी दौरान अन्दर और बाहर कुछ क्षणों के लिए सांस रोक सकते हैं तो यही नाड़ी   शोधन प्राणायाम कहलायेगा। संस अंदर और बाहर रोकने कि प्रक्रिया को कुंभक लगाना भी कहा जाता है। जब हम थोडा पेट पिचकाएँगे तो ऐसा लगेगा कि हमारे शरीर में रक्तप्रवाह तेज हो रहा है और कुछ देर में आंखों को सुख की अनुभूति होने लगेगी ।
         कंप्यूटर पर काम करते हुए     हमारे मस्तिष्क और आंखों बहुत कष्ट उठाना पडता है, और केवल निद्रा से उसे राहत नहीं मिल सकती और न ही सुबह घूमने से कोई अधिक लाभ हो पाता है। इसके अलावा कम करते हुए कुछ देर ध्यान लगाएं तो भी थकावट दूर हो जाएगी। आखिर में हम यही कहना चाहेंगे कि अगर आप कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं तो खुश रहने के लिए योग साधना और ध्यान अवश्य करो -इससे ज्यादा और जल्द लाभ होगा। इसके अलावा प्रतिदिन नवीनता का अनुभव होगा। कभी बोरियत का अनुभव नहीं होगा। 

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप” ,ग्वालियर 
poet,writter and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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