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द्युतक्रीड़ा से पूरा विश्व शिकार-हास्य व्यंग्य (jua ke shikar duniyan


राजा नल ने जुआ खेली और उसमें हारने पर राज्य और परिवार त्यागकर वन में जाकर दूसरे की सेवा करनी पड़ी। अति सुंदर रुक्मी इंद्र जैसा बलशाली और महान धनुर्धर था पर जुए में खेलने के कारण ही बलराम जी के हाथ से मारा गया। कौशिक राजा मंदबुद्धि दंतवक्र जुए की सभा में बैठने के कारण ही बलराम जी पर हंसने के कारण अपना दांत तुड़ा बैठा। धर्मराज युद्धिष्ठर ने भी हुआ खेला ओर उसके बाद जो उन्होंने और उनके परिवार ने कष्ट झेले उसे सभी जानते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि द्यूत या जुआ कभी भी फलदायी नहीं होता पर आदमी है कि उसके पीछे ही पड़ा रहता है। इधर आजकल तो लग रहा है कि लोगों को जुए का मतलब ही नहीं मालुम। टीवी चैनलों के धारावाहिक हों या दूसरे खेल सट्टे के आगोश में फंसे हैं पर लोग उसे मजे लेकर देख रहे हैं।
जुआ या द्यूत यानि क्या? समझाना पड़ेगा वरना लगता नहीं कि लोग इसका मतलब अधिक जानते है। वरना लोग तो जुआ केवल ताश या पांसा खेलना ही समझते हैं। बहुत कम लोगों को मालुम होगा कि आज भी अनेक लोग यह खेल मुफ्त में खेलकर जीवन गुजार रहे हैं। जुआ का पूरा आशय जान लेंगे तो समझ में आयेगा कि आज तो पूरा वातावरण ही द्यूतमय हो रहा है। पहले तो कभी कभार ही जुए होते थे-वह भी बड़े लोगों के बीच- इसलिये इतिहास में दर्ज हो गये। दर्ज तो आज भी होते हैं पर जुए का स्वरूप सामने नहीं आता। कोई ताश मे हारा या पांसों में पता नहीं लगता। वैसे आज एक अंक का दूसरा क्रिकेट का सट्टा अधिक खेला जाता है। अनेक बार सुनने में आता है कि अमुक आदमी ने अपनी पत्नी को मारा, पिता को मारा या मां को मारा क्योंकि वह सट्टा खेलता था समाचार देने वाले चालाक हैं यह नहीं बताते कि वह कथित अपराधी क्रिकेट के पर सट्टा लगाकर बरबाद हुआ जिस कारण उसने यह जघन्य अपराध किया, क्योंकि इस खेल से भी उनको विज्ञापन और पैसा मिलता है फिर वह जिन नायकों के सहारे पैसा कमा रहे हैं उनकी खलनायकी कैसे दिखा सकते हैं

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कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार
अर्थ का नाश, धर्मक्रिया का लोप, कर्मों में अप्रवृत्ति,सत्पुरुषों के समागम से विरक्ति, दुष्टों के साथ उठना बैठना,
हर समय क्रोध, हर्ष और संताप होना और क्लेख करना
स्नानादि शरीर संस्कार और उसके भोग में अनादर, व्यायाम न करना, अंगों की दुर्बलता,शास्त्र के अर्थ को देखना
मूत्रपूरीध के वेग को रोकना, भूख प्यास से अपने को ही पीड़ा देना
यह सभी प्रमाण द्यूत या जुए के लक्षण हैं
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पहले तो लोग भला नित प्रतिदिन अपने ग्रंथों का अध्ययन करते थे तब कुछ ज्ञान तो उनमें आ ही जाता था पर आज की पीढ़ी ने तो बस ग्रंथों के नाम ही सुने हैं बाकी तो उनके सामने हैं क्रिकेट या फिर टीवी चैनलों के वास्तविक शो जो किसी भी तरह से द्यूत जैसे नहीं दिखते पर उनसे कम नहीं हैं। इधर अंग्रेजी शिक्षा पद्धति और फिर बाद में वैसा ही रहन सहन जड़ बुद्धि ही बनाता है। कहने को तो अपने देश के बुद्धिजीवियों ने अच्छे अच्छे नारे गड़ रखे हैं पर पर आसमान में हवा की तरह उड़ते दिखते हैं जमीन पर उनका प्रभाव कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। समाज सुधारक बुद्धिजीवियों को आज के समय के ऐसे खेल जुए की तरह नहीं लगते जिनमें पैसा का व्यय हो रहा है। हो सकता है यह विज्ञापन या चंदे का परिणाम हो कि हमारे समाज सुधारकों के समूह की दृष्टि उन पर वैसी न जाती हो जैसे ताश या पांसे के जूए पर जाती है।
जुए का आशय यही है कि किसी खेल में परिणाम पर धन का लेन देन उसके जुआ होने का प्रमाण है। कोई किसी भी प्रकार के खेल में हिस्सेदारी करे पर उसके परिणाम पर अगर धन का लेनदेन करता है तो वह द्यूतक्रीड़ा में लिप्त है। सीधी बात कहें तो खेल में धन खर्च करना या लेना द्यूतक्रीड़ा या जुआ है। जुआ खेलना ही नहीं देखना भी विषप्रद है। हम अपनी इंद्रियों से जो ग्रहण करते हैं वैसा ही बाहर अभिव्यक्त भी होते हैं। वह चाहे हाथों से ग्रहण करें या नाक, कान, या आंख से। अगर कोई जुआ खेल रहा है और हम देख रहे हैं तो यकीन मानिए उसका दुष्परिणाम हमें भी कहीं न कहीं भोगना है। याद रखिये हमारी घर गतिविध का हम पर मानसिक प्रभाव पड़ता है। अरे यार, यह उपदेश नहीं है। यह सच है। सोचो जब कहीं भयानक आवाज होती है हमारे कान फटते हैं कि नहीं। कहीं से निकल रहे हैं और बदबू नाक में प्रवेश करती है तो कैसा लगता है? वही हाल विचार का भी है। जुआ देखोगे तो विचारों में कलुषिता तो आयेगी तब हम भले ही जूआ न खेलें किसी अन्य रूप में अवश्य प्रकट होगी। क्रिकेट के सट्टे पर कितने लोग बरबाद हो चुके हैं कोई नहीं बता सकता।
क्रिकेट का हाल तो सभी जानते हैं। एक प्रतियोगिता होती है उसमें कोई टीम बहुत अच्छा खेली। उसे ठीक अगली प्रतियोगिता में वह नाकाम होती है। विशेषज्ञ इसे इंगित कर आश्चर्य व्यक्त करते हैं। दूनियां भर की टीमों पर मैच को पूर्वनिर्धारित करने का आरोप लग चुका है। कोई सामान्य आदमी कह भी क्या सकता है जब इसी नये प्रकार के जुआ के बारे में उन्हीं प्रचार माध्यमों में आता है जो इसका प्रचार भी करते हुए विज्ञापन भी पाते हैं। अभी कुछ दिनों पहले टैनिस में भी ऐसी ही बातें आयीं थीं। फुटबाल पर भी संशय किया जाने लगा है। इन सबकी कभी पूरी सच्चाई सामने न आती है न आयेगी क्योंकि पूरा विश्व ही द्यूतमय हो रहा है। कई लोगों को तो यह पता ही नहीं कि जुआ होता क्या है?
इधर टीवी चैनलों पर वास्वविक धारावाहिक प्रदर्शित होते हैं। कई लोग तो उन पर भी पूर्वनिर्धारित होने का आरोप लगाते हैं। लिपपुते चेहरे और आकर्षक दृश्यों की चकाचैंध हमारे कौटिल्य महाराज का यह संदेश नहीं बदल सकती कि द्यूत अनर्थकारी होता है। आप बताईये आखिर हर मैच पर सटोरिये पकड़ जा रहे हैं इसका मतलब यह है कि अभी भी इस पर दांव लगाने वाले बहुत लोग हैं। इधर टीवी चैनलों पर वास्तविक धारावाहिकों के प्रसारण में लोगों से फोन पर संदेश और वोट मांगा जाता है उस पर क्या उनके फोन पर पैसे नहीं खर्च करते। वह मुफ्त में तो नहीं होता। अब यह तो हो गया टीवी चैनल वालों का व्यवसाय पर मनोरंजन करने पर वह भी प्रतिस्पर्धियों के बीच निर्णय कराने के लिये पैसा खर्च करना द्यूत हुआ कि नहीं। कहने को तो हम फिल्म पर भी पैसा खर्च करते हैं पर वहां कोई प्रतिस्पर्धी नहीं होता। सीधा आशय यह है कि मनोरंजन के लिये खेल पर पैसा खर्च करना या लेना द्यूतमय है और देखें तो आज पूरा विश्व उसमे लिप्त हो रहा है। ताश से जुआ खेलने वाले पकड़े जाते हैं क्योंकि उनका अपराध दिखता है पर प्रतिस्पर्धा खेल में पर्दे के पीछे क्या हो रहा है कौन देखने जाता है।
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महात्मा गांधी जयंती-विशेष हिंदी लेख (special hindi article on gandhi jayanti)


  महात्मा गांधी के दर्शन की प्रासंगिकता आज भी है। इसमें संदेह नहीं है। अगर कहें आज अधिक है तो भी कोई बुरा नहीं है। पूरे विश्व में महात्मा गांधी को अहिंसा के पुजारी के रूप में याद किया जाता है या कहें कराया जाता है पर उस पर चलना कौन चाहता है? हम शेष विश्व  की क्या बात करें हमारे भारत में हिंसा का बोलबाला है।
    पूरे विश्व में हिंसा का दौर बढ़ता जा रहा और जितना यह बढ़ेगा उतनी ही बढ़ेगी गांधी जी की अहिंसा सिद्धांत की प्रासंगिकता। महात्मा गांधी ने भारत को आजादी दिलाई यह कहना कुछ अतिश्योक्ति मानते हैं तो कुछ लोग महात्मा गांधी को अप्रासंगिक सिद्ध करने के लिये हिंसा का समर्थन भी करते हैं। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन दौरान  भी एक वर्ग हिंसा का समर्थक   तो दूसरा उदारवादी था जो महात्मा गांडीन  के साथ रहा। मगर यह दोनों ही प्रकार के वर्गों के प्रसिद्ध नाम  घूमते उसी आजादी के आंदोलन के एटिहासिक घेरे में ही हैं जिसका शीर्षक महात्मा गांधी के नाम से लिखा जाता है। इसी आंदोलन के कुछ नेताओं और शहीदों के नाम से कुछ अन्य लोग विचारधारायें चला रहे हैं। कहने का मतलब यह है कि वह भारत जिसकी आयु साठ वर्ष की ही मानते हैं और उनके लिये भारतीय भाषाओं और संस्कृति की आयु भी इतनी ही हैं। इतना ही नहीं भारतीय अध्यात्म ज्ञान तो उनके लिये पुराना पड़ चुका है और उसका अब कोई महत्व नहीं है। जहां तक अध्यात्मवादियों  का सवाल है वह वह भारत को न तो कभी  गुलाम हुआ मानते हैं न ही केवल राजनीतिक आजादीन का उनके लिए कभी महत्व रहा है।  उनके लिए यह केवल राजस बुद्धि वालों का  भ्रम है की वह आपसी संघर्षों से समाज को नियंत्रित करने का दावा करते हैं जबकि यह कार्य प्रकृति  स्वयं करती है। अगर सही आंकलन करें तो आज के समाज में गरीबी, भ्रष्टाचार, भय, और अपराध के विरुद्ध चलने वाले आंदोलनों को इसी अहिंसा के मार्ग पर चलना चाहिये क्योंकि महात्मा गांधी आज के लोकतांत्रिक समाज में राज्य का विरोध करने के लिये हिंसा के पुराने तरीके हिंसक तख्ता पलट की जगह इसे सही मानते थे। आपने इतिहास में देखा होगा कि अनेक प्रकार के राजा जनता की नाराजगी के कारण हिंसा का शिकार हुए या उनका तख्ता पल्टा गया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय का अवलोकन करें तो उस समय कार्ल मार्क्स  का प्रभाव बढ़ रहा था और उसके चेले व्यवस्था का बदलाव हिंसा के सहारे कर रहे थे जबकि लगभग उसी समय महात्मा गांधी ने आंदोलनों को अहिंसा का मार्ग दिखाया। यही पश्चिम के गोरे लोग चाहते थे पर अंततः उनको भी यह देश छोड़ना पड़ा पर वह छोड़ते हुए इस देश में हिंसा का ऐसा इतिहास छोड़ गये जिससे आज तक यहां के निवासी भुगत रहे है।
               मूल बात यही है कि महात्मा गांधी आधुनिक समाज के संघर्षों में हिंसक की बजाय अहिंसक आंदोलन के प्रणेता थे। उनकी याद भले ही सब करते हों पर हथियारों के पश्चिमी सौदागर और विचारों के पूर्वी विक्रेता उनसे खौफ खाते हैं। गनीमत है पश्चिम वाले एक दिन महात्मा को याद कर अपने पाप का प्रायश्चित करते हैं पर पूर्व के लोग तो हिंसावाद को ही समाज में परिवर्तन का मार्ग मानते हैं। यहां यह भी बता दें कि महात्मा गांधी राज्य चलाने के किसी सिद्धांत के प्रवर्तक नहीं थे क्योंकि उसके लिये आपको सत्ता की राजनीति करनी पड़ती है जिसका आंदोलन की राजनीति से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। इसलिये ही सारी दुनियां की सरकारें महात्मा गांधी को याद करती है ताकि उनके विरुद्ध चलने वाले आंदोलन हिंसक न हों।
              यहा बता दें की हिंसक या आहिसक आंदोलनों से सत्ता या सरकार  बदलना एक अलग बात है पर राज्य को सुचारु तरीके से चलाना एक अलग विषय है। महात्मा गांधी कम से कम इस विषय में कोई ज्ञान नहीं रखते थे। यही कमी उनको एक पूर्ण राजनेता की पदवी देने से रोकती है।  यः  देश हजारों वर्ष पुराना है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान तो जीवन जीने की ऐसी कला सिखाता है कि पूर्व और पश्चिम दोनों ही उसे नहीं जानते पर अपने ही देश के लोग उसे भूल रहे हैं। दक्षिण एशिया जहां एक नहीं बल्कि तीन तीन अहिंसा के पूजारी और प्रवर्तक हुए वहां हिंसा का ऐसा बोलबाला है जिसकी चर्चा पूरे विश्व में हैं। पाकिस्तान के कबाइली इलाके हों या हमारे पूर्वी हिस्से। धार्मिक और राजनीतिक क्रूर सिद्धांतों की जकड़ में हैं। एक बात यकीनी तौर से मानिए कि आज के संदर्भ में कोई भी आंदोलन गरीबों और शोषकों के नाम पर सफल होता है पर किसी का भला हो यह नहीं दिखता। हकीकत तो यह है कि इन आंदोलनों को पैसा भी मिलता है। अब यह पैसा कौन देता है यह अलग से चर्चा का विषय है। इसी पैसे के लिये व्यसायिक आंदोलनकारी किसी विचाराधारा या नारे को गढ़ लेते हैं। अगर वह हिंसा का समर्थन न करें तो शायद उनको वह पैसा न मिले। साफ बात कहें तो इन हिंसक आंदोलनों की आड़ में पैसा देने वाले कुछ न कुछ आर्थिक लाभ उठाते हैं। ऐसे में उनके लिये गांधी का अहिंसा सिद्धांत का धोखे की टट्टी है। तब भी वह अधिक दूर नहीं जाते। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान शहीद हुए गरमपंथी महापुरुषों की तस्वीरें लगाकर उनका प्रचार करते हैं। साथ ही गांधी जी की आलोचना करने से उनको कोई गुरेज नहीं है।
              सबसे बड़ी बात यह है कि इस देश का इतिहास साठ साल पुराना नहीं है। अब एक दूसरी बात यह है कि हम आजादी की बात करते हैं पर आज जब उस आजादी पर चर्चा होती है तो अनेक प्रकार के सवाल भी आते हैं। आखिर गांधी जी किससे आजादी चाहते थे? केवल गोरी चमड़ी से या उनके राज्य से। याद रखिये आज भी इस देश में अंग्रेजों के बनाये हुए कानून चल रहे हैं। इनमें से तो कई ऐसे हैं जो इस समाज को निंयत्रित करने के लिये यहीं के लोगों ने उनको सुझाये होंगे। इनमें एक वैश्यावृत्ति कानून भी है जिसे अनेक सामाजिक विशेषज्ञ हटाने की मांग करते हैं।  उनका मानना है कि यह कथित रूप से कुछ अंग्रेजपरस्त लोगों ने इस बनवाया था ताकि भारत की सामाजिक गतिविधियों को मुक्त रूप से चलने से रोक जा सके।  डूसरा जूआ का भी कानून है। अनेक विद्वान समाज सुधार में सरकारी हस्तक्षेप के विरोधी हैं और वह मानते हैं कि यह सरकार काम नहीं है। अनेक विद्वान समाज सुधार में सरकारी हस्तक्षेप के विरोधी हैं और वह मानते हैं कि यह सरकार काम नहीं है। अपराधी रोकना सरकार का काम है न कि समाज के संस्कारों की रक्षा करना उसकी कोई जिम्मेदारी है। कुछ लोग कहते हैं कि वैश्यावृत्ति, जुआ या व्यसनों की प्रवृत्ति पर अंकुश रखना सरकार का काम नहीं बल्कि यह समाज का स्वयं का दायित्व है। कहने का मतलब है कि लोग यही मानते हैं कि समाज स्वयं पर नियंत्रण करे न करे तो वही दायी है। जो आदमी व्यसन या बुरा काम करता है तो अपनी हानि करता हैै। हां जहां वह दूसरे की हानि करता है तो बहुत सारे कानून है जो लगाये जा सकते हैं। लोग तो सतीप्रथा वाले कानून पर सवाल उठाते हैं और पूछते हैं कि उस समय या उससे पहले कितनी स्त्रियां इस देश में सती होती थीं। जिनको होना है तो अब भी इक्का दुक्का तो अब भी घटनायें होती है। वैसे ही अगर किसी स्त्री को जबरन सती कर दिया जाता है तो हत्या का अपराध या वह स्वयं होने के लिये तत्पर होती है तो आत्महत्या का कानून उस पर लग सकता है तब सती प्रथा रोकने के लिये अलग से कानून की जरूरत क्या थी?
                         एसा लगता है कि अंग्रेजों की नजरों में बने रहने के लिये अनेक लोगों ने उस समय अनेक प्रकार के सामाजिक सुधार आंदोलन चलाये होंगे। इस तरह समाज में सरकारी हस्तक्षेप की प्रवृत्ति बढ़ी जिसका अनेक सामाजिक विशेषज्ञ विरोध करते रहे हैं। सीधा मतलब यह है कि अंग्रेज चले गये पर अंग्रेजियत छोड़ गये। वह भी इसलिये कि महात्मा गांधी यहां प्रासगिक नहीं रहें। वैसे भी अपने देश में उनको किस प्रसंग में याद किया जाये? हां, इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज के युग में अपनी अभिव्यक्ति या आंदोलन के लिये उनका सिद्धांत अति प्रासंगिक हैं। उनको इसलिये नमन करने का मन करता है।

बड़े आदमी के सामान्य दर्शन-हास्य व्यंग्य कविता (bade admi ke samanya darshan-hindi comedy satire poem)


सुना है बड़े लोग भी अब
रेलों और विमानों की
सामान्य श्रेणी में यात्रा करेंगे।
आम आदमी हो रहे परेशान
यह सोचकर कि
पहले ही वहां भीड़ बहुत है
अब यात्रा के समय
हम अपना पांव कहां धरेंगे।
पहले तो जल्दी टिकट मिल जाया
करता था
पर अब टिकट बेचने वाले
किसी बड़े आदमी के लिये
अपने पास रखे रहेंगे।
यह भी चल जायेगा पर
जिस आम आदमी को
हो गये बड़े आदमी के दर्शन
वह तो इतरायेगा
यह कैसे सहेंगे।
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बजट का कटु सत्य-हास्य व्यंग्य (hindi vyangya on budget)


उन्होंने जैसे ही दोपहर में बजट देखने के लिये टीवी खोला वैसे ही पत्नी बोली-‘सुनते हो जी! कल तुमने दो हजार रुपये दिये थे सभी खर्च हो गये। अब कुछ पैसे और दो क्योंकि अभी डिस्क कनेक्शन वाला आने वाला होगा। कुछ देर पहले आया तो मैंने कहा कि बाद में आना।’
उन्होंने कहा-‘अरे, अब तो बैंक से पैसे निकालने पड़ेंगे। अभी तो मेरी जेब में पैसा नहीं है। अभी तो टीवी परबजट सुन लूं।’
पत्नी ने कहा-‘इस बजट की बजाय तुम अपने घर का ख्याल करो। अभी डिस्क कनेक्शन वाले के साथ धोबी भी आने वाला है। मुन्ना के स्कूल जाकर फीस जमा भी करनी है। आज आखिरी तारीख है।’
वह टीवी बंदकर बाहर निकल पड़े। सोचा पान वाले के यहां टीवी चल रहा है तो वहां पहुंच गये। दूसरे लोग भी जमा थे। पान वाले ने कहा-‘बाबूजी इस बार आपका उधार नहीं आया। क्या बात है?’
उन्होंने कहा-‘दे दूंगा। अभी जरा बजट तो सुन लूं। घर पर लाईट नहीं थी। अपना पर्स वहीं छोड़ आया।’
उनकी बात सुनते ही पान वाला खी खी कर हंस पड़ा-‘बाबूजी, आप हमारे बजट की भी ध्यान रखा करो।’
दूसरे लोग भी उनकी तरफ घूरकर देखने लगे जैसे कि वह कोई अजूबा हों।
वह अपना अपमान नही सह सके और यह कहकर चल दिये कि‘-अभी पर्स लाकर तुमको पैसा देता हूं।’
वहां से चले तो किराने वाले के यहां भी टीवी चल रहा था। वह वहां पहुंचे तो उनको देखते ही बोला-‘बाबूजी, अच्छा हुआ आप आ गये। मुझे पैसे की जरूरत थी अभी थोक दुकान वाला अपने सामान का पैसा लेने आता होगा। आप चुका दें तो बड़ा अहसान होगा।’
उन्होंने कहा-‘अभी तो पैसे नहीं लाया। बजट सुनकर चला जाऊंगा।’
किराने वाले ने कहा-‘बाबूजी अभी तो टीवी पर बजट आने में टाईम है। अभी घर जाकर ले आईये तो मेरा काम बन जायेगा।’
वहां भी दूसरे लोग खड़े थे। इसलिये तत्काल ‘अभी लाया’ कहकर वह वहां से खिसक लिये।
फिर वह चाय के होटल की दुकान पर पहुंचे। वहां चाय वाला बोला-‘बाबूजी, क्या बात इतने दिन बाद आये। न आपने चाय पी न पुराना पैसा दिया। कहीं बाहर गये थे क्या?’
दरअसल अब उसकी चाय में मजा नहीं आ रहा था इसलिये उन्होंने दो महीने से उसके यहां चाय पीना बंद कर दिया था। फिर इधर डाक्टर ने भी अधिक चाय पीने से मना कर दिया था। चाय पीना बंद की तो पैसा देना भी भूल गये।
वह बोले-यार, अभी तो पैसा नहीं लाया। हां, बजट सुनकर वापस घर जाकर पर्स लेकर तुम्हारा पैसा दे जाऊंगा।’
चाय वाला खी खी कर हंस पड़ा। एक अन्य सज्जन भी वहां बजट सुनने वहां बैठे थे उन्होंने कहा-‘आईये बैठ जाईये। जनाब! पुराना शौक इसलिये छूटता नहीं इसलिये बजट सुनने के लिये घर से बाहर ही आना पड़ता है। घर पर बैठो तो वहां इस बजट की बजाय घर के बजट को सुनना पड़ता है।’
यह कटु सत्य था जो कि सभी के लिये असहनीय होता है। अब तो उनका बजट सुनने का शौक हवा हो गया था। वह वहां से ‘अभी लाया’ कहकर निकल पड़े। जब तक बजट टीवी पर चलता रहा वह सड़क पर घूमते रहे और भी यह बजट तो कभी वह बजट उनके दिमाग में घूमता रहा।
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समलैंगिक संकट-व्यंग्य आलेख (satire on homsexuality)


समलैंगिकों को कानूनी अधिकार क्या मिला इस देश में एक ऐसी बहस चली पड़ी है जिसका आदि या अंत फिलहाल नजर नहीं आता। यहां हम समलैंगिकों के अधिकारों या उनकी मनस्थिति पर विचार न कर यही देखें कि इस पर तर्क क्या दिया जा रहा है?
ऐसा लगता है कि आज थोड़ा हिंदी के उस वीभत्स रूप पर जरा गौर करें जो समलैंगिकों को डरा सकता है। यह डर है गालियों का। अधिकतर शिक्षित लोग गालियां न देते हैं न सुनने का उनमें सामथ्र्य होता है। कुछ लोग देते हैं पर सुनने की हिम्मत नहीं करते।
समलैंगिक एक आकर्षक शब्द लगता है पर यह केवल बड़े शहरों में रहने वाले मनोविकारी लोगों को ही सुहा सकता है। छोटे शहरों और गांवों में अगर समलैंगिक अगर पहुंच जाये तो उसे जो शब्द अपने लिये सुनने को मिलेगा उसे वह समझेगा नहीं और सच बात तो यह है कि उस शब्द का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि आशय ही समलैंगिकता के अधिक निकट है। समलैंगिक संबंध वही बनायेगा जिसने उस शब्द को कभी सुना नहीं होगा।
जब हिंदी के वीभत्य रूप का विचार आया तो यह प्रश्न भी उठा कि क्या जितने भयानक शब्द हिंदी-जिसे विश्व की सर्वाधिक मधुर और वैज्ञानिक भाषा भी अब माना जाने लगा है-में होते हैं उतने किसी अन्य भाषा में भी शायद ही होते होंगे। कम से कम अंग्रेजी में तो नहीं होते होंगे क्योंकि अपने यहां अंग्रेजी में बोलने वाले हेकड़ हमेशा ही गालियों के लिये हिंदी का जिस सहारा लेते हैं उससे तो यही लगता है।
बात से बात यूं निकली कि एक विद्वान ने कहा कि समलैंगिक संबंध बीमारी नहीं है-यह बात विश्व स्वास्थ्य संगठन मानता है। अगर यह सच है तो पश्चिम और पूर्व की संस्कृति में जमीन आसमान का अंतर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। उससे अधिक तो अंतर तो मानवीय सोच में है। अगर इस तरह की सोच ही सभ्यता का प्रतीक है तो हम भारतीय असभ्य भले मगर विश्व के अध्यात्मिक गुरु कहे जाने वाले अपने भारत देश में विश्व संगठन की यह राय कतई स्वीकारी नहीं जा सकती।
अगर हमारे देश के विद्वानों का यह मानना है कि जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन बीमारी नहीं मानता तो उसे हम भी नहीं मानेंगे तो कुछ कहना व्यर्थ है। इस देश के विद्वानों और प्रचार माध्यमों का कहना ही क्या? स्वाईन फ्लू के देश में कुल सौ मरीज भी नहीं है पर आप उसके बारे में पढ़ेंगे और सुनेंगे तो लगेगा कि जैसे पूरा देश ही स्वाईन फ्लू की चपेट में हैं जबकि उससे हजार गुना लोग तो टीवी, पीलिया आंत्रशोध और मलेरिया से पीड़ित हैं उससे बचाव के तरीकों का प्रचार अधिक नहीं होता क्योंकि उसकी दवायें तो ऐसे ही बिक जाती हैं पर स्वाइन फ्लू को एक विज्ञापन की जरूरत है जो जागरुकता पैदा करने के नाम पर ही चलता है। हम तो आज तक यही नहीं समझ पाये कि हेपेटाइटिस और पीलिया में अंतर क्या है? आखिर हैपेटाइटिस के टीके लगते हैं पर वह पीलिया से किस तरह अलग हमें पता नहीं।
बात हम करें समलैंगिक संबंधों की तो उसके लिये जो हिंदी में शब्द है वह इतना वीभत्स है कि हमारा बूता तो यहां लिखने का नहीं हैं। अक्सर एक पुरुष जब दूसरे से नाराज होता है तो वही शब्द कहता है और फिर झगड़ा अधिक बढ़ जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन को उस गाली के बारे में नहीं मालुम होगा! अंग्रेजी में गिटिर पिटिर करने वालों को नहीं पता कि मंकी (बंदर) शब्द उनके लिये जिस तरह नस्लवाद का प्रतीक है वैसे ही पुरुष समलैंगिक संबंधों के लिये ऐसा शब्द हिंदी में है जिस पर कोई भला लेखक तो लिख ही नहीं सकता।
अंतर्जाल पर एक लेखक ने उस भयानक लगने वाले शब्द को अपने ब्लाग पर लिखा था। हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाये जाने वाले फोरम पर जब हमने उसे पढ़ा तो पूरा दिन उस फोरम का रुख नहीं किया। इतना ही नहीं उस फोरम ने बाद में उस लेखक का ब्लाग का लिंक ही अपने यहां से हटा लिया। उससे मन इतना खराब हुआ कि दो आलेख और तीन व्यंग्य कवितायें जब तक नहीं लिख डाली तब चैन नहीं आया। नहीं लिखा तो वह शब्द।
हिंदी वार्तालाप करने वाले सामान्य लोगों में बहुत से लोग गालियों का उपयोग करते हैं। हां, अब शिक्षित होते जाने के साथ ही गालियों का आद्यक्षर कर लिया है जैसे कि अंग्रेजी का संक्षिप्त नाम लिखते हैं। सभ्य लोग इन्ही आद्यक्षरों के सहारे काम चलाकर अपने गुस्से का इजहार कर लेते हैं। इसकी एक दिलचस्प घटना याद आ रही है। आस्ट्रेलिया के साथ एक मैच में एक भारतीय खिलाड़ी ने आस्ट्रेलियो के खिलाड़ी को मंकी (बंदर) कह डाला। इस पर भारी हायतौबा मची। भारतीय खिलाड़ी पर प्रतिबंध भी लगा। आरोप लगाया कि यह तो सरासर नस्लवाद है। भारत में इस पर जमकर विरोध हुआ। कहा गया कि ‘भारतीय कभी नस्लवादी नहीं होते।’

सच कहा होगा। आप तो जानते हैं कि चाय के ठेलों, विद्वानों की बैठकों और बाजारों में ऐसे घटनाओं पर खूब चर्चा होती है। एक सज्जन ने कहा-‘हम भारतीय बहुत सज्जन हैं। विदेश में जाकर ऐसी हरकतें करें यह संभव नहीं है। फिर गुस्से में बंदर कहें यह तो संभव ही नहीं है। बंदर तो यहां प्यार से कहा जाता है। हां, यह संभव है कि भारतीय सभ्य खिलाड़ी ने क्रोध में आकर उस गाली का आद्यक्षर प्रयोग किया हो जिसका स्वर मंकी (बंदर) के रूप में सुनाई दिया हो।’
पता नहीं उस आदमी का यह कहना सही था या गलत पर जो लोग उसे सुन रहे थे उनका मानना था कि ऐसा भी हो सकता है।
जब हमने एक विद्वान सज्जन द्वारा समलैंगिकता को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा उसे बीमारी न मानने की बात सुनी तब लगा कि अब हमारे देश के लोग उस हर चीज और विचार पर फिर से दृष्टिपात करें जो उन्होंने अपनाया है। एक भयानक मनोविकार अगर बीमारी नहीं है तो फिर विश्व स्वास्थ्य संगठन किस आधार पर यह कहता है कि ‘इस दुनियां में चालीस फीसदी से अधिक लोग मनोविकारों का शिकार है पर उनको पता नहीं है।’
अगर वह इसे मानसिक रोग नहीं मानता तो उसे जाकर बतायें कि हिंदी में इसके लिये विकट शब्द है जो बहुत भड़काने वाला है। यह शब्द उस मंकी शब्द से अधिक विस्फोटक है जिसे वह लोग नस्लवाद का प्रतीक मानते हैं।
वैसे जब चालीस फीसदी मनोरोगियों के होने की बात विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कही थी तब हमने सोचा कि वह संख्या कम ही बता रहा है क्योंकि इंसान जिस तरह की हरकतें कर रहे हैं उससे तो यह संख्या पचास से अधिक ही लगती है और यह वह लोग हैं जिनके पास धन, प्रतिष्ठा और पद की ताकत है, वह मदांध हो रहा है। किसी को कुचलकर वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहता है। बाकी पचास फीसदी तो गरीब हैं जिनके पास ऐसा कुछ नहीं है जो ऐसे मनोविकार पाल सकें।
अगर हमारी बात पर यकीन न हो तो इस विषय पर टीवी पर चर्चायें सुन लो। अखबार पढ़ लेना। कुछ लोग समलैंगिक अधिकार मिलने पर नाच रहे हैं तो कुछ विरोध में धर्म और संस्कृति की दुहाई दे रहे हैं। जो नाच रहे हैं उनके मनोरोगी होने पर हम क्या कहें? मगर जो विरोध कर रहे हैं वह मनोरोगी हैं या भावनाओं के व्यापारी यह भी देखने वाली बात है।
कह रहे हैं कि
1.इससे समाज भ्रष्ट हो जायेगा।
2.क्या इस देश में माता पिता चाहेंगे कि उनके बच्चे समलैंगिक बन जायें।
3.यह तो पूरी प्रकृति के लिये खतरा है
उनके सारे तर्क हास्यास्पद हैं। हमें तो अपनी मातृभाषा के हिंदी शब्द कोष में अदृश्य रूप से मौजूद वीभत्स शब्दों के साथ ही अपने देश के युवकों और युवतियों में अध्यात्मिकता की तरफ बढ़ते रुझान पर पूरा भरोसा है। बड़े शहरों का पता नहीं छोटे शहरों तथा गांवों में रहने वाले युवक भी उन शब्दों का उपयोग करते हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि समलैंगिक शब्द के लिये कौनसा शब्द है? वैसे भी हमारे महापुरुष कहते हैं कि असली भारती गांवों में बसता है। समलैंगिकता भी वैसा ही रोग है जैसा स्वाईन फ्लू-दिखेगा कम पर प्रचार माध्यमों में चर्चित अधिक होगा। चंद समलैंगिक लोगों की वजह से देश की युवा पीढ़ी को अज्ञानी मान लेना हमें स्वीकार्य नहीं है। इस देश के युवक युवतियां पश्चिमी देशों से अधिक चेतनशील हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो वहां पहुंचकर अपनी योग्यता का लोहा नहीं मनवाते। यह योग्यता मनोविकारी नहीं अर्जित कर सकते।
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