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गुरु पूर्णिमा-तत्वज्ञान दे वही होता है सच्चा गुरु (article in hindi on guru purnima


गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेले दांव।
दो बूड़े वापूरे,चढ़ि पाथर की नाव

         जहां गुरु लोभी और शिष्य लालची हों वह दोनों ही अपने दांव खेलते हैं पर अंततः पत्थर बांध कर नदिया पर करते हुए उसमें डूब जाते हैं।

            आज पूरे देश में गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है। भारतीय अध्यात्म में गुरु का बहुत महत्व है और बचपन से ही हर माता पिता अपने बच्चे को गुरु का सम्मान करने का संस्कार इस तरह देते हैं कि वह उसे कभी भूल ही नहीं सकता। मुख्य बात यह है कि गुरु कौन है?
दरअसल सांसरिक विषयों का ज्ञान देने वाला शिक्षक होता है पर जो तत्व ज्ञान से अवगत कराये उसे ही गुरु कहा जाता है। यह तत्वज्ञान श्रीगीता में वर्णित है। इस ज्ञान को अध्ययन या श्रवण कर प्राप्त किया जा सकता है। अब सवाल यह है कि अगर कोई हमें श्रीगीता का ज्ञान देता है तो हम क्या उसे गुरु मान लें? नहीं! पहले उसे गुरु मानकर श्रीगीता का ज्ञान प्राप्त करें फिर स्वयं ही उसका अध्ययन करें और देखें कि आपको जो ज्ञान गुरु ने दिया और वह वैसा का वैसा ही है कि नहीं। अगर दोनों मे साम्यता हो तो अपने गुरु को प्रणाम करें और फिर चल पड़ें अपनी राह पर।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता में गुरु की सेवा को बहुत महत्व दिया है पर उनका आशय यही है कि जब आप उनसे शिक्षा लेते हैं तो उनकी दैहिक सेवा कर उसकी कीमत चुकायें। जहां तक श्रीकृष्ण जी के जीवन चरित्र का सवाल है तो इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि उन्होंने अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त कर हर वर्ष उनके यहां चक्कर लगाये।
गुरु तो वह भी हो सकता है जो आपसे कुछ क्षण मिले और श्रीगीता पढ़ने के लिये प्रेरित करे। उसके बाद                    अगर आपको तत्वज्ञान की अनुभूति हो तो आप उस गुरु के पास जाकर उसकी एक बार सेवा अवश्य करें। हम यहां स्पष्ट करें कि तत्वज्ञान जीवन सहजता पूर्ण ढंग से व्यतीत करने के लिये अत्यंत आवश्यक है और वह केवल श्रीगीता में संपूर्ण रूप से कहा गया है। श्रीगीता से बाहर कोई तत्व ज्ञान नहीं है। इससे भी आगे बात करें तो श्रीगीता के बाहर कोई अन्य विज्ञान भी नहीं है।
इस देश के अधिकतर गुरु अपने शिष्यों को कथायें सुनाते हैं पर उनकी वाणी तत्वाज्ञान से कोसों दूर रहती है। सच तो यह है कि वह कथाप्रवचक है कि ज्ञानी महापुरुष। यह लोग गुरु की सेवा का संदेश इस तरह जैसे कि हैंण्ड पंप चलाकर अपने लिये पानी निकाल रहे हैं। कई बार कथा में यह गुरु की सेवा की बात कहते हैं।
सच बात तो यह है गुरुओं को प्रेम करने वाले अनेक निष्कपट भक्त हैं पर उनके निकट केवल ढोंगी चेलों का झुंड रहता है। आप किसी भी आश्रम में जाकर देखें वहा गुरुओं के खास चेले कभी कथा कीर्तन सुनते नहीं मिलेंगे। कहीं वह उस दौरान वह व्यवस्था बनाते हुए लोगों पर अपना प्रभाव जमाते नजर आयेंगे या इधर उधर फोन करते हुए ऐसे दिखायेंगे जैसे कि वह गुरु की सेवा कर रहे हों।

कबीरदास जी ने ऐसे ही लोगों के लिये कहा है कि

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जाका गुरु आंधरा, चेला खरा निरंध।
अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फंद।

      “जहां गुरु ज्ञान से अंधा होगा वहां चेला तो उससे भी बड़ा साबित होगा। दोनों अंधे मिलकर काल के फंदे में फंस जाते है।”

 
बहुत कटु सत्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान एक स्वर्णिम शब्दों का बड़ा भारी भंडार है जिसकी रोशनी में ही यह ढोंगी संत चमक रहे हैं। इसलिये ही भारत में अध्यात्म एक व्यापार बन गया है। श्रीगीता के ज्ञान को एक तरह से ढंकने के लिये यह संत लोग लोगों को सकाम भक्ति के लिये प्रेरित करते हैं। भगवान श्रीगीता में भगवान ने अंधविश्वासों से परे होकर निराकर ईश्वर की उपासना का संदेश दिया और प्रेत या पितरों की पूजा को एक तरह से निषिद्ध किया है परंतु कथित रूप से श्रीकृष्ण के भक्त हर मौके पर हर तरह की देवता की पूजा करने लग जाते हैं। गुरु पूर्णिमा पर इन गुरुओं की तो पितृ पक्ष में पितरों को तर्पण देते हैं।
मुक्ति क्या है? अधिकतर लोग यह कहते हैं कि मुक्ति इस जीवन के बाद दूसरा जीवन न मिलने से है। यह गलत है। मुक्ति का आशय है कि इस संसार में रहकर मोह माया से मुक्ति ताकि मृत्यु के समय उसका मोह सताये नहीं। सकाम भक्ति में ढेर सारे बंधन हैं और वही तनाव का कारण बनते हैं। निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया ऐसे ब्रह्मास्त्र हैं जिनसे आप जीवन भर मुक्त भाव से विचरण करते हैं और यही कहलाता मोक्ष। अपने गुरु या पितरों का हर वर्ष दैहिक और मानसिक रूप से चक्कर लगाना भी एक सांसरिक बंधन है। यह बंधन कभी सुख का कारण नहीं होता। इस संसार में देह धारण की है तो अपनी इंद्रियों को कार्य करने से रोकना तामस वृत्ति है और उन पर नियंत्रण करना ही सात्विकता है। माया से भागकर कहीं जाना नहीं है बल्कि उस पर सवारी करनी है न कि उसे अपने ऊपर सवार बनाना है। अपनी देह में ही ईश्वर है अन्य किसी की देह को मत मानो। जब तुम अपनी देह में ईश्वर देखोगे तब तुम दूसरों के कल्याण के लिये प्रवृत्त होगे और यही होता है मोक्ष।
इस लेखक के गुरु एक पत्रकार थे। वह शराब आदि का सेवन भी करते थे। अध्यात्मिक ज्ञान तो कभी उन्होंने प्राप्त नहीं किया पर उनके हृदय में अपनी देह को लेकर कोई मोह नहीं था। वह एक तरह से निर्मोही जीवन जीते थे। उन्होंने ही इस लेखक को जीवन में दृढ़ता से चलने की शिक्षा दी। माता पिता तथा अध्यात्मिक ग्रंथों से ज्ञान तो पहले ही मिला था पर उन गुरु जी जो दृढ़ता का भाव प्रदान किया उसके लिये उनको नमन करता हूं। अंतर्जाल पर इस लेखक को पढ़ने वाले शायद नहीं जानते होंगे कि उन्होंने अपने तय किये हुए रास्ते पर चलने के लिये जो दृढ़ता भाव रखने की प्रेरणा दी थी वही यहां तक ले आयी। वह गुरु इस लेखक के अल्लहड़पन से बहुत प्रभावित थे और यही कारण है कि वह उस समय भी इस तरह के चिंतन लिखवाते थे जो बाद में इस लेखक की पहचान बने। उन्हीं गुरुजी को समर्पित यह रचना।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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महिलाओं विरुद्ध बढ़ते अपराध चिंता का विषय-हिन्दी लेख


भारतीय महिला हॉकी खिलाड़ियों के यौन शोषण की घटना अत्यंत शर्मनाक है। इस घटना को सुनकर एक फिल्म की याद आ रही है जिसमें एक कल्पित कहानी पर बनी फिल्म की याद रही है जिसमें भारतीय महिला हॉकी टीम को विश्व विजेता बनाया गया था। वह फिल्म हिट रही थी। उसके गाने के बोल ‘चक दे इंडिया’ का भारतीय प्रचार माध्यमों में अपने विज्ञापनो के साथ ही कार्यक्रमों में तब तक इसका इस्तेमाल  किया जब तक करोड़पति फिल्म का गाने के ‘जय हो’ बोल प्रचलित नहीं हुए थे।
इससे पहले भी हरियाणा की एक युवती खिलाड़ी के यौन शोषण के कारण आत्महत्या करने का प्रकरण काफी चर्चा में रहा है जिसके लिये एक पुलिस अधिकारी को कई वर्षों बाद कानून का शिकंजा कसा गया। ऐ्रसी अनेक घटनायें हैं जिसमें महिलाओं का यौन शोषण करने के आरोप सामने आते हैं। इनमें कुछ पर कार्यवाही होती है तो कुछ पर नहीं जबकि आवश्यकता इस बात की है कि इसे अत्यंत गंभीरत से लिया जाना चाहिए। इस घटना से यह तो सिद्ध हो जाता है कि चाहे किसी भी क्षेत्र में थोड़ा बहुत आकर्षण है तो वहां बैठे शिखर पुरुष कुछ भी कर सकते हैं ।
वैसे देखा जाये तो प्रचार माध्यमों से जनचर्चा में आये यौन शोषण के प्रकरणों से अधिक उनकी संख्या है जो समाज के सामने नहीं आते। इसमें यौन शोषक तो खैर स्वयं सामने आने से रहा पर पीड़िता भी चुप रह जाती हैं और इसमें उनके परिवार वाले भी इज्जत के मारे अपनी जिम्मेदारी निभाने से कतराते हैं। हम यहां यौन शोषण की घटनाओं को एकांगी या एकतरफा प्रयास मानकर चलते हैं पर हमे यहां यह भी देखना चाहिए कि आखिर कथित रूप से सभ्य हो रहा समाज आखिर कथित रूप इस पर संवेदनहीन क्यों होता जा रहा है कि उसमें दौलत, ओहदा तथा शौहरत पाने वालों में अनेक लोग औरत को खिलौना समझने से बाज नहीं आते।
वैसे देखा जाये तो भारत में जब स्त्रियों की दशा को लेकर अनेक प्रकार की चर्चायें होती हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि भारत में स्त्रियों को दबाकर रखा जाता है। हम इस तर्क से इंकार नहीं कर सकते पर सच यह भी है कि महिलाओं के यौन शोषण की घटनायें पहले इतनी नहीं होती थी जितनी आज हो रही है। आधुनिक शिक्षा पद्धति के चलते महिलायें हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं पर उनकी संख्या पर्याप्त नहीं है क्योंकि हम शिक्षा को नौकरी से जोड़कर देखते हैं। पहले सरकारी नौकरियों और अब निजी क्षेत्र में नौकरियों की संख्या कम है और मांगने वाले बेरोजगारों की अधिक। फिर इधर शिक्षित महिलाओं की संख्या बढ़ी है और यकीनन रोजगार का संकट उनके सामने वैसा ही ही है जैसा पुरुषों के लिये। फिर एक बात है कि नौकरी की सुरक्षा के चलते सरकारी क्षेत्र में यौन शोषण की घटनायें येनकेन प्रकरेण ही होती हैं पर निजी क्षेत्र के बढ़ते दायरे के साथ ऐसी घटनायें बढ़ती जा रही है। जहां भी किसी व्यवसाय में थोड़ा आकर्षण हैं वहां महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार तथा यौन शोषण की शर्मनाक घटनायें हो जाती हैं। अखबारों तथा अंतर्जाल पर लगातार ऐसा पढ़ने कों मिलता है जिससे लगता है कि टीवी चैनल, पत्रकारिता फिल्म तथा खेलों में महिलाओं का यौन शोषण एक आम बात हो गयी है। एक फिल्म अभिनेता का तो बकायदा स्टिंग ऑपरेशन किया गया था। जिस पर बहुत बहस होती रही थी।
यौन शोषण के आरोपों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि घटना के बहुत समय बाद सामने आते हैं। इसके विपरीत बलात्कार की शिकायत तत्काल सामने आती है। ऐसे में यौन शोषण के मामलों में पीड़िता को लोग सहानुभूति तो देते हैं पर पर विलंब से आई खबर उनको सोचने के लिये मजबूर कर देती है कि कहीं किसी हद तक किसी लालच या लोभ में पीड़िता कहीं शोषण के जाल में स्वयं तो नहीं फंस गयी।
यही सोचकर यह बात मन में आती है कि आधुनिक युवतियों और महिलाओं को सफलता के लिये ‘संक्षिप्त मार्ग’  (short cut root) अपनाने बचने के साथ ही अपनी प्रतिभा और योग्यता पर भरोसा रखने तथा उसे निखारते रहने का प्रयास करने की राय भी दी जानी चाहिए। बच्चियों को शुरुआत में ही यह समझाना चाहिए कि अगर वह अपने बजाय किसी अन्य पर भरोसा करने के अपनी योग्यता और प्रतिभा निखारने के लिये न केवल अपने कार्य का अभ्यास करें बल्कि अपनी प्रतिबद्धता भी उसी से रखें।
हर मनुष्य में देवता और राक्षस रहता है। अब यह अलग बात है कि अपने कर्म से कौन अपनी पहचान कैसी बनाता है? उसस्रे भी अलग एक स्थित यह है कि मनुष्य सामान्य जीवन एक आम व्यक्ति के रूप में गुजारता है। लेखक, पत्रकार, फिल्म कलाकर, चित्रकार, राजनीतिक व्यक्ति, प्रशानस में उच्च पद पर बैठे लोगों के प्रति स्वाभाविक रूप से आकर्षण होता है क्योंकि उनका चरित्र लोगों की आंखों के सामने सक्रिय रहता है। इनमें अधिकतर भले हैं पर इनमें कुछ लोगों को सफलता हज़म नहीं हो्रती और वह जब शिखर पर पहंुचते हैं तो फिर दूसरों के गुरु-आजकल धर्मपिता यानि गॉडफादर बनने की को्रशिश करते हैं। सच बात तो यह लोग शिखर पर पहुंचते ही चालाकियों से हैं इसलिये उनमें देवत्व ढूंढना अपने आपको धोखा देना है। सबसे बड़ी बात यह कि वह किसी दूसरे को शिखर पर पहुंचा दें यह उनकी न तो नीयत में होता है और न ही क्षमता के अनुकूल। दूसरी बात यह है कि अपनी प्रतिभा पर यकीन न करने वाले युवक युवतियों ही इनकी शरण लेते हैं न कि प्रतिभाशाली।
ऐसे में देश की युवतियों और महिलाओं को एक बात यह भी सोचना चाहिए कि प्रतिभा तो पत्थर का पहाड़ हो या लोहे का छप्पर उसे फाड़कर बाहर आती है। जहां तक हो सके अपने लक्ष्य पर ही नज़र रखें। यह सच है कि देश के सभी प्रकार के सामाजिक, आर्थिक तथा खेल नियंत्रण प्रतिष्ठानों में ऐसे कुछ शिखर पुरुघ हैं जो दूसरों को सफलता दिलाने का दावा करते हैं पर आप गौर करें तो शायद ही कोई ऐसा कर पाया हो। अलबत्ता अल्प योग्य प्रतिभाओं का दोहन वह खूब कर लेते हैं।
जीवन की सफलता का मूलमंत्र परिश्रम, लगन, एकाग्रता तथा अपने कर्म से प्रतिबद्धता से ही संभव है। अपने माता पिता के अलावा किसी को गॉडफादर बनाना अपने आपको धोखा देना है। दरअसल जब यौन शोषण की घटनायें सामने आती हैं तब मासूम पीड़िताओं की व्यथा मन को व्यग्र कर देती है और तब लगता है कि जीवन के यथार्थ का ज्ञान होना सभी को जरूरी है ताकि इस देश की महिलायें और युवतयों दृढ़ता पूर्वक जीवन यापन करते हुए सफलता की सीढ़यां चढें। अपने माता पिता तथा परिवार के सानिध्य में पली बढ़ी लढ़कियां आज के युग मे आगे बढ़ें ताकि समाज का आधा अधूरापन खत्म हो। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने अंदर दृढ़ संकल्प और परिश्रम से प्रतिबद्धता मन में रखें।
दूसरी बात यह है कि यौन शोषकों को अपनी औकात समाज की बतलाये और उनका सामाजिक बहिष्कार करे। चाहे वह कितने भी बड़ा दौलतमंद, उच्च पदस्थ या प्रतिष्ठित हो उसका सम्मान न करें तभी इस समस्या से छुटकारा मिल सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस बारे में पहल बुद्धिमान महिलाओं को ही करनी होगी क्योंकि पुरुषों में अनेक इस मामले में केवल दिखावटी हमदर्दी दिखाते हैं।

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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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फसाद फिक्सिंग-हिन्दी हास्य व्यंग्य (fasad-hindi comic story)


वह समाज सेवक निठल्ले घूम रहे थे। दरअसल अब कंप्यूटर और इंटरनेट आने से चंदा लेने देने का धंधा आनलाईन हो गया था और वह इसमें दक्ष नहीं थे। फिर इधर लोग टीवी से ज्यादा चिपके रहते हैं इसलिये उनके कार्यक्रमों के बारे में सुनते ही नहीं इसलिये चंदा तो मिलने से रहा। पहले वह अनाथ आश्रम के बच्चों की मदद और नारी उद्धार के नाम पर लोगों से चंदा वसूल कर आते थे। पर इधर टीवी चैनलों ने ही सीधे चैरिटी का काम करने वाले कार्यक्रम प्रस्तुत करना शुरु कर दिये हैं तो उनके चैरिटी ट्रस्ट को कौन पूछता? इधर अखबार भी ऐसे समाज सेवकों का प्रचार नहीं करते जो प्रचार के लिये तामझाम करने में असमर्थ हैं।
उन समाज सेवकों ने विचार किया कि आखिर किस तरह अपना काम बढ़ाया जाये। उनकी एक बैठक हुई।
उसमें एक समाज सेवक को बहुत तीक्ष्ण बुद्धि का-सीधी भाषा में कहें तो शातिर- माना जाता था। उससे सुझाव रखने का आग्रह किया गया तो वह बोला-आओ, दंगा फिक्स कर लें।
बाकी तीनों के मुंह खुले रह गये।
दूसरे ने कहा-‘पर कैसे? यह तो खतरनाक बात है?
पहले ने कहा-‘नहीं, दंगा नहीं करना! पहले भी कौनसा सच में समाज सेवा की है जो अब दंगा करेंगे! बस ऐसे तनावपूर्ण हालत पैदा करने हैं कि दंगा होता लगे। बाकी काम मैं संभाल लूंगा।’
तीसरे ने पूछा-‘ पर इसके लिये चंदा कौन देगा।’
पहले ने कहा-‘अरे, इसके लिये परेशान होने की जरूरत नहीं है। हमारे पूर्वज समाज को टुकड़ों में केक की तरह बांट कर रख गये हैं बस हमें खाना है।’
तीसरे ने कहा-‘मगर, इस केक के टुकड़ों में अकल भी है, आखें भी हैं, और कान भी हैं।’
पहला हंसकर बोला-‘यहीं तो हमारी चालाकी की परीक्षा है। अब करना यह है कि दूसरा और तीसरा नंबर जाकर अपने समाजों में यह अफवाह फैला दें कि विपक्षी समाज अपने इष्ट की दरबार सड़क के किनारे बना रहा है। उसका विरोध करना है। सो विवाद बढ़ाओ। फिर अमन के लिये चौथा दूसरे द्वारा और पहले के द्वारा आयोजित समाज की बैठकों मैं जाऊंगा। तब तक तुम दोनो गोष्ठियां करो तथा अफवाहें फैलाओ। समाज के अमीर लोगों के वातानुकूलित कमरों में बैठकें कर उनका माल उड़ाओ। पैसा लो। सप्ताह, महीना और साल भर तक बैठकें करते रहो। कभी कभी मुझे और चौथे नंबर वाले को समाज की बैठकों बुला लो। पहले विरोध के लिये चंदा लो। फिर प्रस्ताव करो कि उसी सड़क के किनारे दूसरे समाज के सामने ही अपने इष्ट का मंदिर बनायेंगे। हम दोनों हामी भरेंगे। संयुक्त बैठक में भले ही दूसरे लोगों को बुलायेंगे पर बोलेंगे हम ही चारों। समझौता करेंगे। दोनों समाजों के इष्ट की दरबार बनायेंगे। फिर उसके लिये चंदा वसूली करेंगे।’
दूसरे ने कहा-‘पर हम चारों ही सक्रिय रहेंगे तो लोगों का शक होगा।’
पहला सोच में पड़ गया और फिर बोला-‘ठीक है। पांचवें के रूप में हम अपने वरिष्ठ समाज सेवक को इस तरह उस बैठक में बुलायेंगे जैसे कि वह कोई महापुरुष हो। लोगों ने उनके बारे में सुना कम है इसलिये मान लेंगे कि वह कोई निष्पक्ष महापुरुष होंगे।’
तीसरे ने कहा-‘पर सड़कों का चौड़ीकरण हो रहा है। अब इतना आसान नहीं रहा है अतिक्रमण करना। अदालतें भी ऐसे विषय पर सख्त हो गयी हैं। कहीं फंस गये तो। इसलिये किसी भी समाज के इष्ट का दरबार नहीं बनेगा।’
पहला हंसकर बोला-‘इसलिये ही मुझे तीक्ष्ण बुद्धि का माना जाता है। अरे, दरबार बनाना किसे है। सड़क पर एक कंकड़ भी नहंी रखना। सारा झगड़ा फिक्स है इसलिये दरबार बनाने का सपना हवा में रखना है। बरसों तक मामला खिंच जायेगा। हम तो इसे समाजसेवा में बदलकर काम करेंगे। अब बताओ कपड़े, बर्तन तथा किताबें गरीबों और मजदूरों में बांटने के लिये कितना रुपया लिया पर एक पैसा भी किसी को दिया। यहां एक पत्थर पर भी खर्च नहीं करना। सड़क पर एक पत्थर रखने का मतलब है कि दंगा करवाना। जब पानी सिर के ऊपर तक आ जाये तब कानूनी अड़चनों का बहाना कर मामला टाल देंगे। फिर कहीं   किसी दूसरी जगह कोई नया काम हाथ में लेंगे। अब जाओ अपनी रणनीति के अनुसार काम करो।’
चारों इस तरह तय झगड़े और समझौते के अभियान पर निकल पड़े।

सूचना-यह लघु व्यंग्य काल्पनिक है तथा इसे मनोरंजन के लिये लिखा गया है। इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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डॉलर से इश्क-हिन्दी व्यंग्य कविता (love and dollar-hindi comic poem)


सच्चा प्यार जो दिल से मिले
अब कहां मिलता है,
अब तो वह डालरों में बिकता है।
आशिक हो मालामाल
माशुका हो खूबसूरत तो
दिल से दिल जरूर मिलता है।
———-
आज के शायर गा रहे हैं
इश्क पर लिखे पुराने शायरों के कलाम,
लिखने के जिनके बाद
गुज़र गयी सदियां
पता नहीं कितनी बीती सुबह और शाम।
बताते हैं वह कि
इश्क नहीं देखता देस और परदेस
बना देता है आदमी को दीवाना,
देना नहीं उसे कोई ताना,
तरस आता है उनके बयानों पर,
ढूंढते हैं अमन जाकर मयखानों पर,
जिस इश्क की गालिब सुना गये
वह दिल से नहीं होता,
डालरों से करे आशिक जो
माशुका को सराबोर
उसी से प्यार होता,
क्यों पाक रिश्ते ढूंढ रह हो
आजकल के इश्क में
होता है जो रोज यहां नीलाम।
———-

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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पति पत्नी के बीच में दखल और कानून-हिन्दी लेख


श्रीमद्भागवत गीता ‘भेदात्मक बुद्धि’ रखने वालों को आसुरी प्रवृत्ति का मानती है। इसलिये किसी भी ज्ञानी ध्यानी को मनुष्यों के कर्म पर बोलते या लिखते समय उसकी जाति, भाषा या कथित धर्म-इनको भ्रम भी कहा जा सकता है-का उल्लेख नहीं करते। मुश्किल तब शुरु होती है जब कोई आदमी अपनी जाति, भाषा, धर्म या क्षेत्र के नाम से ही परिचय देकर इस बात की जिद्द करता है कि उसे अपने समूह से जोड़कर देखा जाये। ऐसी बाध्यता अगर सामने है तो फिर अपनी बात कहने में रुकना भी नहीं चाहिये।
यह लेखक पहली बार मुसलमान समाज पर इसलिये लिख रहा है क्योंकि इसके ब्लाग पर अनेक बार इसी समाज से जुड़े लोग टिप्पणी करते हैं। दूसरी बात यह कि उनमें भारतीय अध्यात्म के प्रति झुकाव भी देखा गया है। टिप्पणियाों की संख्या पाठकों की संख्या से बहुत कम होती है। ऐसे में यह मानना पड़ता है कि इस लेखक के पाठों पर मुस्लिम समाज के पाठकों की संख्या देश की आबादी के अनुरूप ही होगी। इसी विश्वास के कारण यह लिखा जा रहा है। इसमें आलोचना हो सकती है पर यह परंपरागत रूप से वैसी नहीं होगी जैसी अक्सर चिढ़ाने वाली होती है। कोई नाखुश बंदा इस लेख का गलत अर्थ न लगाये इसलिये यह सफाई लिखनी पड़ रही है।
हम पति पत्नी और मियां बीवी के-यह लेखक लकीर का फकीर है इसलिये जैसा कि धर्म के ठेकेदार भाषा से उसको जोड़ते हैं इसलिये यह बताना जरूरी है कि हिन्दू में पति पत्नी और मुसलमानों में मियां बीवी-रिश्तों में अक्सर धर्म के कथित तत्वों को देखना चाहते हैं। यह इच्छा दो ही कारण से पैदा होती है। एक तो अपने आंख, कान तथा दिमाग को दूसरे के घर में आग देखकर प्रसन्नता के कारण होती है। दूसरा स्वयं को ज्ञानी साबित करने के लिये पंच होकर जाने का अवसर मिलता है। हिन्दू धर्म कभी एक संगठन के रूप में नहीं रहा इसलिये उसमें किसी भी संस्था द्वारा नियम बनाने का प्रावधान नहीं है और न ही पति पत्नी के संबंधों में राज्य, समाज या किसी समूह द्वारा हस्तक्षेप का प्रावधान है। पति पत्नी के संबंध टूटें या जुड़ें इसके लिये वह जिम्मेदार होते हैं। सदियों तक तो यह कायदा रहा है कि घर से विवाह कर जाती हुई बेटी को बाप कहता है कि ‘बेटी, जिस घर तेरी डोली जा रही है, वहीं से तेरी अर्थी उठेगी।’
इसके बावजूद हिन्दुओं के लिये विवाह विच्छेद का कानून बना पर इसका किसी ने विरोध नहीं किया क्योंकि कोई व्यक्ति या संगठन ऐसा करने का न तो आधार रखता है और न उसके पास जनसमर्थन होता है। इसलिये ही हिन्दुओं के विवाह और तलाक के विषय आज के आधुनिक बाजार आधारित प्रचार माध्यमों के लिये कोई विषय नहीं बनते। मगर हाल ही में पाकिस्तान के एक दूल्हे को लेकर भारत की दो लड़कियों के बीच जो जंग हुई उसमें तलाक और शादी दोनों ही इसलिये ही प्रचार का विषय बने क्योंकि तीनों ही मुसलमान थे। इस पर नियम से काम करने वाला उनका संगठन है जिसमें शायद काजी और मौलवी होते हैं। मुसलमानों में तलाक जितनी आसानी से मुंहजबानी होता है वैसा हिन्दुओं में नहीं है। यह अच्छी बात है पर जिस तरह तलाक का नाटक उक्त प्रकरण में देखने को मिला उससे जरूर मुस्लिम ज्ञानी भी नाराज हुए होंगे। मगर उनको यह समझ लेना चाहिये कि उनके नियमों ने ही आधुनिक बाजार आधारित प्रचार माध्यमों को यह अवसर प्रदान किया। इस लेखक का मानना है कि जहां विवाह न निभता हो वहां तलाक आसानी से होने देना चाहिये पर जिस तरह पाकिस्तानी क्रिकेटर की पहली बीवी अपने मियां से तलाक लेकर दूसरी शादी करने के लिये दबाव बना रही थी और दूसरी होनी वाली बीवी पहली वाली का मजाक बना रही थी वह चर्चा का विषय बना। सच तो यह है कि जिस तरह इसमें क्रिकेट और मध्य एशिया देशों के नाम आये उससे लगा कि कहीं न कहीं इसमें प्रायोजन है-पाकिस्तानी क्रिकेटर पर दूसरी लड़की को प्रभावित करने के लिये 16 करोड़ का खर्च तथा तलाक के लिये पहली बीवी को पंद्रह करोड़ देने जैसी बातें यह समाचार माध्यम करेंगे तो यह शक होना स्वाभाविक है।
अब आते हैं असली बात पर! जब यह प्रकरण चल रहा था तब पाकिस्तानी क्रिकेटर की पहली बीवी ने तलाक न देने के कारण अपने ही देश की दूसरी लड़की से निकाह करने अपने ही शहर में आये उस शौहर पर ‘घरेलू हिंसा’ का मामला दायर कर दिया। मामला पुलिसा तक ही रहा। इस मामले के अदालत में जाने की संभावना नगण्य ही थी क्योंकि तब यह पेचीदा हो जाता। चूंकि तलाक होना था और निकाह भी इसलिये पर्दे के पीछे खेल चलता रहा।
इधर बहस भी हो रही थी। जिसमें कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवी, पत्रकार, तथा मुल्ला मौलवी भी शामिल थे। वह अपनी किताबों के अनुसार बहस कर रहे थे पर वह नहीं जानते थे कि वह ऐसा कर कानूनी संकट को न्यौता भी दे रहे थे। चलो यह प्रकरण तो चूंकि बाज़ार और प्रचार का संयुक्त प्रायोजन था-यह भी संभव है कि इन दोनों की सयुक्त समर्थक कोई लॉबी इससे जुड़ी हुई हो-इसलिये यह सब चल गया। भविष्य में वह याद रखें कि भारत में अब दहेज विरोधी कानून तथा घरेलू हिंसा ऐसे कानून हैं जो पति पत्नी तथा मियां बीवी पर समान रूप से लागू होते हैं। दहेज एक्ट तो केवल परिवार तथा रिश्तेदारों तक ही सीमित रहता है पर यह घरेलू हिंसा कानून तो किसी को भी लपेटे में ले सकता है।
उक्त बहस में पहली बीवी की शादी की वैधानिकता पर सवाल उठाने वाले बहुत जोखिम ले रहे थे। एक पुराने अभिनेता की शायद मुराद थी कि क्रिकेटर की शादी दूसरी वाली लड़की से हो जाये इसलिये उसने पहली वाली पर सवाल उठाया कि ‘निकाह नामे में गवाहों की वल्दियत है पर दूल्हा दुल्हन का नाम नहीं है। इसलिये यह शादी नहीं मानी जा सकती।’
यह निकाहनामा दूल्हे ने पाकिस्तान में बनवाया था। मुस्लिम कानून के हिसाब से यह शादी अवैध भी होती तो भी वह घरेलू हिंसा के आरोप से बच नहीं सकता था उल्टे यही उसके खिलाफ सबूत भी बन सकता था कि उसने चालाकी की। बात यहीं नहीं रुकती। पीड़ित लड़की अगर उस समाचार की सीडी वगैरह लेकर अदालत में सीधे ‘घरेलू हिंसा’ का मामला दूल्हे पर दायर करती और साथ में अभिनेता का भी नाम यह कहते हुए देती कि यह भी हैं हमारे पाकिस्तानी क्रिकेटर मियां के भारतीय अभिनेता समर्थक।’ तब उनके लिये मुश्किल हो सकती थी। बाद में फैसला चाहे जो भी होता पर फिलहाल उनको अदालत में तो जाना ही पड़ सकता था।
कुछ मुल्ला मौलवी भी पहली बीवी के निकाह पर शक कर रहे थे पर यह उनके लिये परेशानी का कारण बन सकता था। कारण दहेज निरोध तथा घरेलू हिंसा कानून ऐसे हैं जिनमें किसी धर्म की पुस्तक का अध्ययन शामिल नहीं है। यही सही है कि इन कानूनों का दुरुपयोग इसलिये न्यायाधीश तथा पुलिस वाले बहुत सतर्कता पूर्वक विवेचना कर निर्णय तथा कार्यवाही करते हैं पर अगर उनको यकीन हो जाये कि महिला वाकई पीड़ित है तो उसके बाद जो होता है वह अभियुक्त के लिये तकलीफदेह हो सकता है।
इस प्रसंग में एक दिलचस्प बात पता चली कि पाकिस्तान में भी एक कानून है कि पहली पत्नी के रहते दूसरा विवाह करने पर वहां एक साल की सजा है। अनेक गैर मुस्लिम यहां ऐसा कानून न होने पर आपत्तियां कर रहे हैं। उनको शायद अंदाजा नहीं है कि घरेलू हिंसा तथा दहेज निरोध कानून ऐसे हैं जिनके चलते ऐसा कानून न होना कोई मायने नहीं रखता। अभी तक मुस्लिम समाज को लेकर अनेक ऐसे प्रायोजित समाचार और बहसें सुनने में आती हैं जिनका निष्कर्ष कुछ नहीं निकलता। मुल्ला मौलवी भी वहां आकर अपने धार्मिक कानून की वकालत करते हैं। अब उनके पास ऐसे अवसर आये तो वह पहले इस बात की तहकीकात कर लें कि जिस बहस में वह जा रहे हैं वह तथा जिस समाचार के लिये हो रही है वह प्रायोजित है। यह भी पक्का कर लें कि वह न्यायालय में नहीं जायेगा। कहने का आशय यह है कि नकली मुठभेड़ हो। अगर कहीं असली वाक्या हुआ और वह इसी तरह ही बयानबाजी करते रहे, उधर कोई महिला अत्यंत दुःखी है और इस तरह का अपमान होने पर वह क्रुद्ध हो उठी तो यह दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा ऐसे कानून हैं कि उनको भी दायरे में वह पति उसके परिवार तथा सहयोगियों को भी ले सकती है। वैसे मुस्लिम महिलाओं की स्थिति देखते हुए ऐसी संभावना कम ही लगती है क्योंकि अभी भी मुस्लिम महिलायें सामाजिक शिकंजे में फंसी है जो मुक्त है वह ऐसे प्रायोजित प्रचारकों के दायरे बाहर रहती हैं।
यह सही है कि मुसलमानों के लिये अलग से व्यक्तिगत कानून हैं पर दहेज एक्ट तथा घरेलू हिंसा कानून आने से महिलाओं पर दबाव बनाये रखने की मुस्लिम शिखर पुरुषों की शक्ति अब वैसी नहीं रही। वैसे इन दोनों कानूनों में अधिकतर मामले हिन्दू समाज के ही दर्ज होने का अनुमान लगता है-सच का पता किसी को नहीं है-पर उस पाकिस्तानी दूल्हे की एक लड़की से बेवफाई तथा दूसरी से प्यार के नाटक में ‘घरेलू हिंसा’ कानून का उल्लेख होने के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। सो न केवल बहसों से बचें बल्कि मियां बीवी के निजी मसलों पर लिखित रूप से भी न कहें क्योंकि उसका इस्तेमाल सबूत के रूप में किसी महिला को पीड़ित करने में सहयोग करने के आरोप को सिद्ध करने में हो सकता है। यह लेखक न वकील है न इसे कोई धार्मिक प्रचारक, केवल इधर उधर देखे गये मामलों पर यह लिखा गया है। इसका पाठ का एक उद्देश्य अपने मुस्लिम समुदाय के पाठकों को यह समझाना भी है कि वह देशकाल की स्थिति को देखकर ही आगे चलें। जहां तक हो सके अपने घर की महिलाओं के प्रति सद्भाव रखें तथा दूसरे के पारिवारिक झगड़ों में पंचायत करने से बचें क्योंकि यह उनके लिये परेशानी का कारण बन सकता है। अब पुराना समय नहीं रहा और न चाहते हुए भी उनको अपनी सोच बदलनी होगी।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
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