Category Archives: mastram

गुरु पूर्णिमा-तत्वज्ञान दे वही होता है सच्चा गुरु (article in hindi on guru purnima


गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेले दांव।
दो बूड़े वापूरे,चढ़ि पाथर की नाव

         जहां गुरु लोभी और शिष्य लालची हों वह दोनों ही अपने दांव खेलते हैं पर अंततः पत्थर बांध कर नदिया पर करते हुए उसमें डूब जाते हैं।

            आज पूरे देश में गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है। भारतीय अध्यात्म में गुरु का बहुत महत्व है और बचपन से ही हर माता पिता अपने बच्चे को गुरु का सम्मान करने का संस्कार इस तरह देते हैं कि वह उसे कभी भूल ही नहीं सकता। मुख्य बात यह है कि गुरु कौन है?
दरअसल सांसरिक विषयों का ज्ञान देने वाला शिक्षक होता है पर जो तत्व ज्ञान से अवगत कराये उसे ही गुरु कहा जाता है। यह तत्वज्ञान श्रीगीता में वर्णित है। इस ज्ञान को अध्ययन या श्रवण कर प्राप्त किया जा सकता है। अब सवाल यह है कि अगर कोई हमें श्रीगीता का ज्ञान देता है तो हम क्या उसे गुरु मान लें? नहीं! पहले उसे गुरु मानकर श्रीगीता का ज्ञान प्राप्त करें फिर स्वयं ही उसका अध्ययन करें और देखें कि आपको जो ज्ञान गुरु ने दिया और वह वैसा का वैसा ही है कि नहीं। अगर दोनों मे साम्यता हो तो अपने गुरु को प्रणाम करें और फिर चल पड़ें अपनी राह पर।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता में गुरु की सेवा को बहुत महत्व दिया है पर उनका आशय यही है कि जब आप उनसे शिक्षा लेते हैं तो उनकी दैहिक सेवा कर उसकी कीमत चुकायें। जहां तक श्रीकृष्ण जी के जीवन चरित्र का सवाल है तो इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि उन्होंने अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त कर हर वर्ष उनके यहां चक्कर लगाये।
गुरु तो वह भी हो सकता है जो आपसे कुछ क्षण मिले और श्रीगीता पढ़ने के लिये प्रेरित करे। उसके बाद                    अगर आपको तत्वज्ञान की अनुभूति हो तो आप उस गुरु के पास जाकर उसकी एक बार सेवा अवश्य करें। हम यहां स्पष्ट करें कि तत्वज्ञान जीवन सहजता पूर्ण ढंग से व्यतीत करने के लिये अत्यंत आवश्यक है और वह केवल श्रीगीता में संपूर्ण रूप से कहा गया है। श्रीगीता से बाहर कोई तत्व ज्ञान नहीं है। इससे भी आगे बात करें तो श्रीगीता के बाहर कोई अन्य विज्ञान भी नहीं है।
इस देश के अधिकतर गुरु अपने शिष्यों को कथायें सुनाते हैं पर उनकी वाणी तत्वाज्ञान से कोसों दूर रहती है। सच तो यह है कि वह कथाप्रवचक है कि ज्ञानी महापुरुष। यह लोग गुरु की सेवा का संदेश इस तरह जैसे कि हैंण्ड पंप चलाकर अपने लिये पानी निकाल रहे हैं। कई बार कथा में यह गुरु की सेवा की बात कहते हैं।
सच बात तो यह है गुरुओं को प्रेम करने वाले अनेक निष्कपट भक्त हैं पर उनके निकट केवल ढोंगी चेलों का झुंड रहता है। आप किसी भी आश्रम में जाकर देखें वहा गुरुओं के खास चेले कभी कथा कीर्तन सुनते नहीं मिलेंगे। कहीं वह उस दौरान वह व्यवस्था बनाते हुए लोगों पर अपना प्रभाव जमाते नजर आयेंगे या इधर उधर फोन करते हुए ऐसे दिखायेंगे जैसे कि वह गुरु की सेवा कर रहे हों।

कबीरदास जी ने ऐसे ही लोगों के लिये कहा है कि

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जाका गुरु आंधरा, चेला खरा निरंध।
अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फंद।

      “जहां गुरु ज्ञान से अंधा होगा वहां चेला तो उससे भी बड़ा साबित होगा। दोनों अंधे मिलकर काल के फंदे में फंस जाते है।”

 
बहुत कटु सत्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान एक स्वर्णिम शब्दों का बड़ा भारी भंडार है जिसकी रोशनी में ही यह ढोंगी संत चमक रहे हैं। इसलिये ही भारत में अध्यात्म एक व्यापार बन गया है। श्रीगीता के ज्ञान को एक तरह से ढंकने के लिये यह संत लोग लोगों को सकाम भक्ति के लिये प्रेरित करते हैं। भगवान श्रीगीता में भगवान ने अंधविश्वासों से परे होकर निराकर ईश्वर की उपासना का संदेश दिया और प्रेत या पितरों की पूजा को एक तरह से निषिद्ध किया है परंतु कथित रूप से श्रीकृष्ण के भक्त हर मौके पर हर तरह की देवता की पूजा करने लग जाते हैं। गुरु पूर्णिमा पर इन गुरुओं की तो पितृ पक्ष में पितरों को तर्पण देते हैं।
मुक्ति क्या है? अधिकतर लोग यह कहते हैं कि मुक्ति इस जीवन के बाद दूसरा जीवन न मिलने से है। यह गलत है। मुक्ति का आशय है कि इस संसार में रहकर मोह माया से मुक्ति ताकि मृत्यु के समय उसका मोह सताये नहीं। सकाम भक्ति में ढेर सारे बंधन हैं और वही तनाव का कारण बनते हैं। निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया ऐसे ब्रह्मास्त्र हैं जिनसे आप जीवन भर मुक्त भाव से विचरण करते हैं और यही कहलाता मोक्ष। अपने गुरु या पितरों का हर वर्ष दैहिक और मानसिक रूप से चक्कर लगाना भी एक सांसरिक बंधन है। यह बंधन कभी सुख का कारण नहीं होता। इस संसार में देह धारण की है तो अपनी इंद्रियों को कार्य करने से रोकना तामस वृत्ति है और उन पर नियंत्रण करना ही सात्विकता है। माया से भागकर कहीं जाना नहीं है बल्कि उस पर सवारी करनी है न कि उसे अपने ऊपर सवार बनाना है। अपनी देह में ही ईश्वर है अन्य किसी की देह को मत मानो। जब तुम अपनी देह में ईश्वर देखोगे तब तुम दूसरों के कल्याण के लिये प्रवृत्त होगे और यही होता है मोक्ष।
इस लेखक के गुरु एक पत्रकार थे। वह शराब आदि का सेवन भी करते थे। अध्यात्मिक ज्ञान तो कभी उन्होंने प्राप्त नहीं किया पर उनके हृदय में अपनी देह को लेकर कोई मोह नहीं था। वह एक तरह से निर्मोही जीवन जीते थे। उन्होंने ही इस लेखक को जीवन में दृढ़ता से चलने की शिक्षा दी। माता पिता तथा अध्यात्मिक ग्रंथों से ज्ञान तो पहले ही मिला था पर उन गुरु जी जो दृढ़ता का भाव प्रदान किया उसके लिये उनको नमन करता हूं। अंतर्जाल पर इस लेखक को पढ़ने वाले शायद नहीं जानते होंगे कि उन्होंने अपने तय किये हुए रास्ते पर चलने के लिये जो दृढ़ता भाव रखने की प्रेरणा दी थी वही यहां तक ले आयी। वह गुरु इस लेखक के अल्लहड़पन से बहुत प्रभावित थे और यही कारण है कि वह उस समय भी इस तरह के चिंतन लिखवाते थे जो बाद में इस लेखक की पहचान बने। उन्हीं गुरुजी को समर्पित यह रचना।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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अंग्रेज आज भी कर रहे राज-हिन्दी हास्य कविताऐं


फिर एक बार वह लोग
स्वतंत्रता दिवस मनायेंगे,
अपनी गुलामी के जख्म याद कर
उससे मुक्ति पर मुस्करायेंगे।
जिनसे मुक्ति पाई थी
उनको एक दिन दे लेंगे गालियां,
बजेंगी फिर तालियां,
मगर फिर छोड़ी है जो मालिकों ने वसीयत
गुलामों को बांटने की
मुखिया और बंधुआ को छांटने की
उसे पूरा करने में जुट जायेंगे।
———
कुछ लोग कहते हैं कि
अंग्रेज भारत छोड़ गये,
कुछ उनका शुक्रिया अदा करते हैं कि
वह भारत को जोड़ गये।
सच तो यह है कि
अंग्रेज आज भी कर रहे राज
बस,
नाम का स्वराज छोड़ गये।
———–
गुलाम बनाने के कानून में
आज़ादी की असलियत तलाश रहे हैं,
मालिक छोड़ गये राज
मगर सिंहासन पर चरण पादुकाऐं छोड़े गये
उसमें खुद मुख्तियारी की आस कर रहे हैं।
————————

कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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वैश्विक उदारीकरण-हिन्दी व्यंग्य कविता


वैश्विक उदारीकरण के चलते
बाज़ार एक हो गया है,
सभी को खुश करते सौदागरों ने
सजा दिये हैं बुत
कहीं धर्म के उदारपंथी
पेशेवराना ममता बरसा रहे हैं
कहीं कट्टरपंथी पाकर मदद
मचाते हैं आतंक
शांति के लिए तरसा रहे हैं।
पहेली बूझ रहे हैं सिद्धांतों की
कुछ प्रायोजित बुद्धिमान लोग
जिनकी चर्चा सौदागरों के भौंपू
चहूं फैलाते हैं,
विज्ञापनों में ही अमन की अपील
और सनसनी दिखलाते हैं,
शक होता है यह देखकर
दंगों की तरह जंग भी
तयशुदा लड़ी जाती होगी,
हादसों की भी कोई पहले रूपरेखा होगी,
मरेगा तो सभी जगह आम आदमी
खरीदेगा भी वही मोमबत्तियां
इसलिये तो हादसों, जंगों और दंगों की
बरसी जोरशोर से मनवाते हैं,
भौंपूओं से आवाज भी लगवाते है,
कसा रहे शिकंजा पाले हुए खास लोगों का
पूरी दुनियां पर
सौदागर इसलिये कर्ज भी बरसा रहे हैं।
————–

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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महिलाओं विरुद्ध बढ़ते अपराध चिंता का विषय-हिन्दी लेख


भारतीय महिला हॉकी खिलाड़ियों के यौन शोषण की घटना अत्यंत शर्मनाक है। इस घटना को सुनकर एक फिल्म की याद आ रही है जिसमें एक कल्पित कहानी पर बनी फिल्म की याद रही है जिसमें भारतीय महिला हॉकी टीम को विश्व विजेता बनाया गया था। वह फिल्म हिट रही थी। उसके गाने के बोल ‘चक दे इंडिया’ का भारतीय प्रचार माध्यमों में अपने विज्ञापनो के साथ ही कार्यक्रमों में तब तक इसका इस्तेमाल  किया जब तक करोड़पति फिल्म का गाने के ‘जय हो’ बोल प्रचलित नहीं हुए थे।
इससे पहले भी हरियाणा की एक युवती खिलाड़ी के यौन शोषण के कारण आत्महत्या करने का प्रकरण काफी चर्चा में रहा है जिसके लिये एक पुलिस अधिकारी को कई वर्षों बाद कानून का शिकंजा कसा गया। ऐ्रसी अनेक घटनायें हैं जिसमें महिलाओं का यौन शोषण करने के आरोप सामने आते हैं। इनमें कुछ पर कार्यवाही होती है तो कुछ पर नहीं जबकि आवश्यकता इस बात की है कि इसे अत्यंत गंभीरत से लिया जाना चाहिए। इस घटना से यह तो सिद्ध हो जाता है कि चाहे किसी भी क्षेत्र में थोड़ा बहुत आकर्षण है तो वहां बैठे शिखर पुरुष कुछ भी कर सकते हैं ।
वैसे देखा जाये तो प्रचार माध्यमों से जनचर्चा में आये यौन शोषण के प्रकरणों से अधिक उनकी संख्या है जो समाज के सामने नहीं आते। इसमें यौन शोषक तो खैर स्वयं सामने आने से रहा पर पीड़िता भी चुप रह जाती हैं और इसमें उनके परिवार वाले भी इज्जत के मारे अपनी जिम्मेदारी निभाने से कतराते हैं। हम यहां यौन शोषण की घटनाओं को एकांगी या एकतरफा प्रयास मानकर चलते हैं पर हमे यहां यह भी देखना चाहिए कि आखिर कथित रूप से सभ्य हो रहा समाज आखिर कथित रूप इस पर संवेदनहीन क्यों होता जा रहा है कि उसमें दौलत, ओहदा तथा शौहरत पाने वालों में अनेक लोग औरत को खिलौना समझने से बाज नहीं आते।
वैसे देखा जाये तो भारत में जब स्त्रियों की दशा को लेकर अनेक प्रकार की चर्चायें होती हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि भारत में स्त्रियों को दबाकर रखा जाता है। हम इस तर्क से इंकार नहीं कर सकते पर सच यह भी है कि महिलाओं के यौन शोषण की घटनायें पहले इतनी नहीं होती थी जितनी आज हो रही है। आधुनिक शिक्षा पद्धति के चलते महिलायें हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं पर उनकी संख्या पर्याप्त नहीं है क्योंकि हम शिक्षा को नौकरी से जोड़कर देखते हैं। पहले सरकारी नौकरियों और अब निजी क्षेत्र में नौकरियों की संख्या कम है और मांगने वाले बेरोजगारों की अधिक। फिर इधर शिक्षित महिलाओं की संख्या बढ़ी है और यकीनन रोजगार का संकट उनके सामने वैसा ही ही है जैसा पुरुषों के लिये। फिर एक बात है कि नौकरी की सुरक्षा के चलते सरकारी क्षेत्र में यौन शोषण की घटनायें येनकेन प्रकरेण ही होती हैं पर निजी क्षेत्र के बढ़ते दायरे के साथ ऐसी घटनायें बढ़ती जा रही है। जहां भी किसी व्यवसाय में थोड़ा आकर्षण हैं वहां महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार तथा यौन शोषण की शर्मनाक घटनायें हो जाती हैं। अखबारों तथा अंतर्जाल पर लगातार ऐसा पढ़ने कों मिलता है जिससे लगता है कि टीवी चैनल, पत्रकारिता फिल्म तथा खेलों में महिलाओं का यौन शोषण एक आम बात हो गयी है। एक फिल्म अभिनेता का तो बकायदा स्टिंग ऑपरेशन किया गया था। जिस पर बहुत बहस होती रही थी।
यौन शोषण के आरोपों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि घटना के बहुत समय बाद सामने आते हैं। इसके विपरीत बलात्कार की शिकायत तत्काल सामने आती है। ऐसे में यौन शोषण के मामलों में पीड़िता को लोग सहानुभूति तो देते हैं पर पर विलंब से आई खबर उनको सोचने के लिये मजबूर कर देती है कि कहीं किसी हद तक किसी लालच या लोभ में पीड़िता कहीं शोषण के जाल में स्वयं तो नहीं फंस गयी।
यही सोचकर यह बात मन में आती है कि आधुनिक युवतियों और महिलाओं को सफलता के लिये ‘संक्षिप्त मार्ग’  (short cut root) अपनाने बचने के साथ ही अपनी प्रतिभा और योग्यता पर भरोसा रखने तथा उसे निखारते रहने का प्रयास करने की राय भी दी जानी चाहिए। बच्चियों को शुरुआत में ही यह समझाना चाहिए कि अगर वह अपने बजाय किसी अन्य पर भरोसा करने के अपनी योग्यता और प्रतिभा निखारने के लिये न केवल अपने कार्य का अभ्यास करें बल्कि अपनी प्रतिबद्धता भी उसी से रखें।
हर मनुष्य में देवता और राक्षस रहता है। अब यह अलग बात है कि अपने कर्म से कौन अपनी पहचान कैसी बनाता है? उसस्रे भी अलग एक स्थित यह है कि मनुष्य सामान्य जीवन एक आम व्यक्ति के रूप में गुजारता है। लेखक, पत्रकार, फिल्म कलाकर, चित्रकार, राजनीतिक व्यक्ति, प्रशानस में उच्च पद पर बैठे लोगों के प्रति स्वाभाविक रूप से आकर्षण होता है क्योंकि उनका चरित्र लोगों की आंखों के सामने सक्रिय रहता है। इनमें अधिकतर भले हैं पर इनमें कुछ लोगों को सफलता हज़म नहीं हो्रती और वह जब शिखर पर पहंुचते हैं तो फिर दूसरों के गुरु-आजकल धर्मपिता यानि गॉडफादर बनने की को्रशिश करते हैं। सच बात तो यह लोग शिखर पर पहुंचते ही चालाकियों से हैं इसलिये उनमें देवत्व ढूंढना अपने आपको धोखा देना है। सबसे बड़ी बात यह कि वह किसी दूसरे को शिखर पर पहुंचा दें यह उनकी न तो नीयत में होता है और न ही क्षमता के अनुकूल। दूसरी बात यह है कि अपनी प्रतिभा पर यकीन न करने वाले युवक युवतियों ही इनकी शरण लेते हैं न कि प्रतिभाशाली।
ऐसे में देश की युवतियों और महिलाओं को एक बात यह भी सोचना चाहिए कि प्रतिभा तो पत्थर का पहाड़ हो या लोहे का छप्पर उसे फाड़कर बाहर आती है। जहां तक हो सके अपने लक्ष्य पर ही नज़र रखें। यह सच है कि देश के सभी प्रकार के सामाजिक, आर्थिक तथा खेल नियंत्रण प्रतिष्ठानों में ऐसे कुछ शिखर पुरुघ हैं जो दूसरों को सफलता दिलाने का दावा करते हैं पर आप गौर करें तो शायद ही कोई ऐसा कर पाया हो। अलबत्ता अल्प योग्य प्रतिभाओं का दोहन वह खूब कर लेते हैं।
जीवन की सफलता का मूलमंत्र परिश्रम, लगन, एकाग्रता तथा अपने कर्म से प्रतिबद्धता से ही संभव है। अपने माता पिता के अलावा किसी को गॉडफादर बनाना अपने आपको धोखा देना है। दरअसल जब यौन शोषण की घटनायें सामने आती हैं तब मासूम पीड़िताओं की व्यथा मन को व्यग्र कर देती है और तब लगता है कि जीवन के यथार्थ का ज्ञान होना सभी को जरूरी है ताकि इस देश की महिलायें और युवतयों दृढ़ता पूर्वक जीवन यापन करते हुए सफलता की सीढ़यां चढें। अपने माता पिता तथा परिवार के सानिध्य में पली बढ़ी लढ़कियां आज के युग मे आगे बढ़ें ताकि समाज का आधा अधूरापन खत्म हो। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने अंदर दृढ़ संकल्प और परिश्रम से प्रतिबद्धता मन में रखें।
दूसरी बात यह है कि यौन शोषकों को अपनी औकात समाज की बतलाये और उनका सामाजिक बहिष्कार करे। चाहे वह कितने भी बड़ा दौलतमंद, उच्च पदस्थ या प्रतिष्ठित हो उसका सम्मान न करें तभी इस समस्या से छुटकारा मिल सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस बारे में पहल बुद्धिमान महिलाओं को ही करनी होगी क्योंकि पुरुषों में अनेक इस मामले में केवल दिखावटी हमदर्दी दिखाते हैं।

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दौलत भक्ति-हास्य कविताएँ (dualat bhakti-hasya kavitaen)


पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी पर
देश भक्ति के गीत गाना
हास्यास्पद दिखता है,
जिन्होंने हथिया लिये दौलत और शौहरत के शिखर
वह हर शख्स
दौलत भक्ति करता दिखता है,
बातें कर चाहे कोई भी कितनी आदर्श की
मौका पड़े तो वह शख्स
देश को बेचने का सौदा भी लिखता है।
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महंगाई यूं बड़ी तो
पीतल सोने के भाव बिक जायेगा।
चांदी के भाव लोहा लिख जायेगा,
मोटे पेट वाले सेठ
कपड़े की गांठों पर बैठे रहेंगे,
गरीब हर जगह नंगा दिख जायेगा।
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महंगाई न केवल कमर तोड़ गयी
बल्कि पांव में पत्थर भी जोड़ गयी,
जिंदा रहना तो मुश्किल हो गया
मौत भी इंसान से मुंह मोड़ गयी।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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