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अन्ना भक्तों के राजनीतिक क्षमताओं की परीक्षा अभी बाकी-हिंदी चिन्तन लेख


            अभी हाल ही में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न हुए।  इन चुनावों के परिणाम आने के साथ ही नयी सरकारों के गठन की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है।  एक स्वतंत्र फोकटिया लेखक होने के कारण हमने इन चुनावों पर एक आम आदमी की तरह दिलचस्पी ली।  मध्यप्रदेश, राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ राज्यों के चुनाव तथा उसके परिणामों में इस लेखक की  स्वाभाविक दिलचस्पी थी। मध्यप्रदेश तो स्वयं का राज्य है और छत्तीसगढ़ कभी चूंकि इसी प्रदेश का भाग था तो उससे अभी भी आत्मीयता बरकरार है। राजस्थान एक तो पड़ौसी राज्य है दूसरा वहां इस लेखक की ससुराल है इस कारण उसमें भी रुचि होना स्वभाविक है।  अब कौनसा दल हारा और कौनसा जीता, यह तो बड़े विद्वानों के लिये विश्लेषण का विषय है मगर  अपनी दिलचस्पी तो बस इतनी है कि शासन सहजता से चले ताकि अपना जीवन शांति से चलता रहे।  चुनाव तो दिल्ली में भी हुए पर उसे हम अधिक महत्व नहीं दे रहे थे।  इसका कारण यह था कि वहां के विधानसभा के एक चुनाव क्षेत्र की शायद जितनी सीमा होगी वह मध्यप्रदेश में कुछ नगरनिगमों के एक वार्ड से भी कम होगी।   बहुत कम लोगों को पता होगा कि संसद की सीटों का राज्यों के गठन के समय निर्धारण जनसंख्या के आधार पर हुआ था जो कि आज तक चल रहा है। उस कारण क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य होने के बावजूद मध्यप्रदेश के लिये कम संसदीय क्षेत्र बने जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों को अधिक स्थान मिले।  दिल्ली की सात लोकसभा क्षेत्रों का जितना क्षेत्र है वह मध्यप्रदेश दो नहीं तो तीन लोकसभा क्षेत्रों से भी कम होगा। सही क्षेत्रफल का आंकड़ा नहीं वरना हम कह सकते थे कि मध्यप्रदेश का कोई लोकसभा क्षेत्र दिल्ली के सात लोकसभा क्षेत्रों के बराबर भी हो सकता है।

            आमतौर से भारतीय प्रचार माध्यम बृहद शहरों को ही भारत का प्रतीक मानते हैं पर हम उनसे सहमत नहीं हो पाते। वजह जब हम उन पर प्रसारित समाचारों तथा बहस की विषयों को देखते हैं तो लगता है कि वह भारी गलतफहमी में रहते हैं। उनके अनेक विषयों में हमारे शहर के बहुत कम लोग रुचि लेते दिखते हैं।  अभी दिल्ली में हुए चुनावों के परिणाम बहुत दिलचस्प थे पर इतने नहीं कि उसमें देश के लिये कोई विशेष संदेश ढूंढा जा सके।  ऐसा नहीं है कि हमारी दिलचस्पी दिल्ली के चुनावों के कतई नहीं थी पर चूंकि उससे अपना कुछ बनता बिगड़ता नहीं है इसलिये मन में उत्साह नहीं था।  अन्ना भक्तों ने इस चुनाव में सफलता इतनी प्राप्त की है कि वह वहां एक राष्ट्रीय दल को तीसरे स्थान पर पहुंचा सके तो दूसरा बहुमत से वंचित हो गया।  यह अलग बात है कि यह दल अन्ना भक्तों से आगे रहा है।  हमने अन्ना भक्त इसलिये कहा क्योंकि हम उनकी पहचान इसी तरह करते हैं, यह अलग बात है कि अन्ना हजारे ने किसी राजनीतिक दल से संपर्क न रखने के निर्णय के चलते उनसे नाता तोड़ लिया है।  एक बात तय है कि अन्ना हजारे का आंदोलन देश में व्यापक भावनात्मक प्रभाव डालने में सफल रहा है तो यह भी सत्य है कि अन्ना के भक्त से राजनीतिक चोला पहनने वाले इन लोगों ने उनसे अपने पुराने संबंधों को पूरी तरह से चुनावों में अधूरी सफलता प्राप्त कर भुना ही लिया।  अब अन्ना हजारे साहब  ने इनके बिना अपना अनशन जनलोकपाल के लिये पुनः प्रारंभ कर लिया है और यकीनन अन्ना भक्तों को अब उनके साथ किये गये प्रयासों को लाभ नहीं मिलने वाला।  सीधी बात कहें तो अन्ना हजारे जी के साथ आंदोलन करने के लिये जो उन्होंने श्रमदान किया उसका पूरा पुण्य कमा चुके हैं और जब वह अपने राजनीतिक अभियान को दिल्ली से चलाकर पूरे देश में चलाने की बात कह रहे हैं तो उन्हें अब उन्हें श्रमदान के नये प्रयास करने होंगे।

            भारत के आंदोलनों से बने नेता लोकप्रिय बनते हैं। चुनावों में उनकी सफलता कदम भी चूमती है पर एक प्रशासक के रूप में सभी की छवि धवल बनी रहे, यह कभी नहीं देखा गया।  कुछ की छवि जहां जनहित करने वाली बनी तो कुछ की छवि मलिन होती भी देखी गयी है।  अन्ना भक्तों ने दो राष्ट्रीय दलों का सामना अपने इष्ट के साथ खड़ी तस्वीरों के साथ ही किया यह भूलना नहीं चाहिये।  अन्ना भक्तों की छवि इसलिये अभी तक धवल है क्योंकि उन्होंने अभी राजकाज के क्षेत्र में कदम ही नहीं रखा। दिल्ली में उनको इतनी सीटें मिली है कि एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के बिना शर्त समर्थन से वह सरकार बना सकते हैं पर वह इसके लिये तैयार नहीं है।  उनका मानना है कि दोबारा चुनाव हों ताकि किसी एक दल के पक्ष में फैसला हो सके।  उनको अपनी धवल छवि का इतना भरोसा है दोबारा चुनाव पर उनको पूर्ण बहुमत मिल जायेगा पर राजनीतिक समझ रखने वाले लोगों को लगता है कि यह अतिआत्मविश्वास है।  एक डेढ़ वर्ष से सक्रिय प्रयासों से उन्होंने यह सफलता प्राप्त की। अब दोबारा चुनाव तक वह उसे जारी रख पायेंगे इसमें संदेह न भी हो पर मतदाता की लगातार उनमें दिलचस्पी रहे यह शंकास्पद है।  अन्ना भक्त देश में बदलाव लाने की प्रक्रिया में निंरतर लग गये हैं पर आम आदमी अपना मनोबल बनाये रखेगा इसमें संदेह है।  मुख्य बात यह है कि दिल्ली की जिस सफलता पर वह पूरे देश में छाने की बात कह रहे हैं वह वैसी नहीं है जैसा वह तथा उनके समर्थक प्रचार माध्यम कह रहे है।  दिल्ली में अगर सरकार नहीं बनती तो  अन्ना भक्तों की विजेता की छवि नहीं बनती दिखती  जो आगे के अभियान में  सहायक होने वाली थी।  जनता संघर्ष करने वाले को देखते प्रसन्न होती है पर वह उसे विजेता भी देखना चाहती है।  अगर उनसे अधिक स्थान प्राप्त राष्ट्रीय दल भी सरकार नहीं बनाता तो यह अनिर्णय की स्थिति जनता में चिढ़ पैदा करेगी।  सीधी बात कहें तो अन्ना भक्त या तो विजेता के रूप में जायें या पराजित योद्धा की छवि के साथ आगे जायें।  इसमें भी पैचं है। अगर सबसे अधिक स्थान प्राप्त राष्ट्रीय दल ने सरकार बना ली तो अन्ना भक्त हारे दिखेंगे तब भारतीय जनमानस की उनसे सहानुभूति होगी या नहीं कहना कठिन है। जिस दिल्ली के चुनाव में दूसरे स्थान पर रहकर अन्ना भक्त प्रसन्न हैं हमारे हिसाब से वही उनके लिये उलझा विषय बनने वाला है।  दूसरों की क्या कहें अपने अनेक वर्ग के अनेक लोगों से अन्ना भक्तों की छवि पर मन टटोला। सभी उनकी सफलता पर चमत्कृत तो हैं पर यह प्रश्न भी उठा रहे हैं कि क्या वह सरकार बनायेंगे?

            लोकतंत्र में आंदोलनों का महत्व तो है पर सरकार और विपक्ष का भी महत्व है। चुनाव के बाद किसी भी राजनीतिक दल के पास यही भूमिकायें होती हैं।  जिस दल का पहला चुनाव हो उसे सरकार या विपक्ष में रहकर अपनी प्रतिभा दिखानी होती है और दिल्ली में अन्ना भक्तों को वही कर दिखाने का अवसर है। उनमें जीत का उत्साह है और प्रचार माध्यम भी उनके साथ हैं पर क्या यह सब  भारतीय जनमानस वैसे ही ले रहा है जैसा वह चाहते हैं यह भी देखना होगा।  अगर विधानसभा त्रिशंकु रही तो लोग पूछेंगे कि कौनसी सफलता हासिल करके आ रहे हो और अगर सरकार बनायी तो दिल्ली में उलझे रहेंगे। विपक्ष में बैठे तो लोग पहले उनकी वहां की भूमिका जांचेंगे।  दूसरी बात यह कि पहला पत्थर रखने पर मूहूर्त होता है तब फावड़ा चलाया जाता है।  चुनावों के बाद सरकार या विपक्ष की भूमिका में बैठना इसी तरह का है।  कोई मकान बनाया जाता है तो भी उसका मूहूर्त किया जता है। अन्ना भक्त अभी भी आंदोलन की भूमिका है।  एक पत्थर लगाया और दूसरा लगाने चल पड़े। एक मकान बनाया और ताला लगाकर दूसरा बनाने चल पड़े।  लोग तो पहले के काम का हिसाब पूछेंगे कि वहां क्या कर आये हो?’

            पुराने प्रतिष्ठित दलों राजनीतिक दलों पर यह अन्ना भक्त अभी तक बरसते थे तब चूंकि चुनावी राजनीति से दूर थे इसलिये लोग उनकी बात ध्यान से सुनते थे पर जब वह इस क्षेत्र में आ ही गये हैं तो उन्हें अपनी सफलतायें पहले चुनाव से ही बतानी पड़ेंगी।  दूसरी बात यह भी कि इन स्थापित राजनीतिक दलों को अब उन पर व्यंग्य बाण छोड़ने की सुविधा भी होगी जिनका सामना करने के लिये उन्हें अब अतिरिक्त ऊर्जा चाहिये। अन्ना हजारे की जनलोकपाल की मांग से अब काम चलने वाला नहीं है। बहरहाल हमारे समझ में यह नहीं आया कि वह लिख क्या गये? फिर सोचते हैं कि हमने लिखा भी तो ऐसे लोगों के बारे में जिनको यही पता नहीं कि वह कर क्या रहे हैं।

            बहरहाल अन्ना हजारे और उनके राजनीतिक भक्तों में हमारी दिलचस्पी है सो उनकी गतिविधियां हमेंशा कुछ न कुछ लिखने को बाध्य करती हैं।  बहरहाल पांच चुनावों में जिन लोगों ने मतदाता के रूप में भाग लिया उनको ढेर सारी बधाई।  उन्होंने चाहे जिस दल को मत दिया हमें इससे हमारा कोई संबंध नहीं है पर उन्होंने एक निष्काम कर्म हृदय से किया यह पुण्य का काम है। मानव समाज में एक राजा का होना अनिवार्य है।  हम यह कहते हैं कि नेता कुछ काम नहीं कर रहे पर कम से कम राज्य व्यवस्था तो बनाये हुए हैं क्योंकि अगर यह नहीं हो तो उसका परिणाम क्या होगा, यह हम सभी जानते हैं। जब हम मत डालते हैं तो कम से कम एक राज्य व्यवस्था को बनाये रखने का समर्थन करते हैं तो मानव समाज में अनुशासन बनाये रखने के लिये आवश्यक है।

 

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप

ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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वेलंटाईन डे संग बसंत पंचमी-हिन्दी लेख


             आज बसंत पंचमी और वेलंटाईन डे एक ही दिन हमारे सामने उपस्थित हैं।  देखा जाये तो दोनों का भाव एक जैसा दिखता है पर यह एक भ्रम है। वेलंटाईन डे यहां दो देहों के आपसी सहृदयता का प्रतीक है वहीं बसंत पंचमी के साथ सामाजिक और अध्यात्मिक भाव भी जुड़े हैं।  देखा जाये तो हमारे देश में कोई पर्व, दिन या दूसरा विषय अध्यात्म से जुड़ा नहीं है तो वह रसहीन है। अध्यात्म का मतलब होता है हमारी देह धारण करने वाला आत्मा।  अब यह कहना कठिन है कि यह हमारी भारतीय भूमि का अन्न, जल और वातावरण की देन है या लोगों के अंदर बरसों से रक्त में प्रवाहित संस्कार का प्रभाव कि यहां अभी भी बिना अध्यात्मिक रस के कोई भी विषय न शोभायमान होता है न स्वादिष्ट।  वेलेंटाईन डे के मनाने वालों को उसका कारण भी नहीं होता। उसकी वह जरूरत भी अनुभव नहीं करते क्योकि शुद्ध रूप से उपभोग पर जब इंद्रियां केंद्रित होती हैं तो आदमी की बुद्धि अध्यात्म से परे हो जाती है।  हमारे बाज़ार तथा प्रचार समूह के प्रबंधकों का मुख्य लक्ष्य युवा पीढ़ी होती है।  फिर जब हमारे देश में  नयी शिक्षा पद्धति में भारत के प्राचीन अध्यात्म ज्ञान शामिल न होने से आधुनिक लोग वैसे भी अपने पुराने इतिहास से दूर हो गये हैं तब उनसे यह आशा करना कि वह बसंत पंचमी के अवसर पर उपभोग के लिये प्रेरित होंगे बेकार है।

फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग पर वेलेंटाईन डे की धूम है।  कुछ लोग हैं जो उसे नकारते हैं तो कुछ उसे नारियों की रक्षा जैसे विषय से जोड़ते हुए झूमते हैं।  कुछ लोग वेलेंटाईन डे के विरोध में प्रदर्शन करते हुए यह जताते हैं कि वह प्राचीन भारतीय संस्कृति के उपासक हैं।  इससे भी वेलेंटाईन डे को प्रचार में जगह मिलती है।  हमने देखा है कि अगर यह विरोध  न हो तो यह दिन प्रचार माध्यमों में फ्लाप हो जाये।  कभी कभी तो लगता है कि इस दिन के समर्थक और विरोधी सामाजिक कार्यकर्ता आमजन का ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिये सड़कों पर आते हैं। खास बात यह है कि वेलेंटाईन डे को बाज़ार और प्रचार समूहों से प्रेरणा की आवश्यकता होती है जबकि बसंत पंचमी का दिन स्वयं ही जनमानस में स्फूर्ति पैदा होती है।  शरद ऋतु के प्रस्थान और ग्रीष्म ऋतु के आगमन के बीच का यह समय बिना प्रयास किये ही देह को आनंद देता है।  सामान्य लोगों के लिये यह दिन जहां खुशी का होता वहीं योग, ध्यान, और ज्ञान साधकों के लिये अपने अभ्यास में सहजता प्रदान करने वाला होता है।  जहां सामान्य व्यक्ति परंपरागत भौतिक साधनों से बसंत पंचमी मनाता है वहीं अध्यात्मिक साधक  अपनी विद्या से मन से मन में ही रमकर आनंद उठाता है।  सच बात तो यह है कि जब इसका अभ्यास हो जाता है तो आनंद हर दिन मिलता है पर किसी खास अवसर पर वह दूना हो जाता है।  हमारी तरफ से बसंत पंचमी की पाठकों और ब्लॉग लेखकों और मित्रों को बधाई।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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बाज़ार बोले सो सब बोलें-हिंदी लेख


            यह हैरानी की बात है कि दिल्ली में एक युवती के साथ सामुहिक दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या की घटना के बाद जहां सारे देश में आक्रोश फैला वहीं अनेक लोगों को अपना नाम चमकाने के लिये बहसें करने के साथ ही बयान देने का अवसर मिला।  बाज़ार के सौदागरों के उत्पाद बिकवाने वाले प्रचार माध्यमों ने इस अवसर पर खूब नाटकबाजी की।  कहने को तो प्रचार माध्यमों में प्रस्तोता और बहसकर्ता शोकाकुल थे पर कहीं न कहीं जहां विज्ञापनों के माध्यम से कमाई हो रही थी तो विवादस्पद बयानों के माध्यम से अनेक लोगों को चमकाया जा रहा था।

           इस मामले में एक ऐसे गायक कलाकार  का नाम सामने आया जिसका नाम आम लोगों में तब तक प्रचलित नहीं था। उस गायक कलाकार के गीत में महिलाओं को लेकर कोई अभद्र टिप्पणी थी।  संभव है देश के कुछ युवा लोग उसका नाम जानते हों पर पर सामान्य रूप से वह इतना प्रसिद्ध नहीं था।  प्रचार माध्यम उसके पीछे हाय हाय करके पड़ गये। बाद में उस गायक कलाकार ने दावा किया कि वह गीता उसका गाया हुआ ही नहीं है।  यह मामला थम गया पर उस गायक कलाकार का नाम तब तक सारा देश जान गया।  क्या इसमें कोई व्यवसायिक चालाकी थी, यह कहना कठिन है।

      प्रचार माध्यमों ने पीड़िता का नाम गुप्त रखने की कानूनी बाध्यता जमकर बखानी।  यह सही है कि दैहिक जबरदस्ती की शिकार का नाम नहीं दिया जाना चाहिये पर यह शर्त इसलिये डाली गयी है ताकि उसे भविष्य में सामाजिक अपमान का सामना न करना पड़े।  जिसका देहावसान हो गया हो उसके लिये फिर मान अपमान का प्रश्न ही कहां रह जाता है?  हां, उसके माता पिता के लिये थोड़ा परेशानी का कारण होता है पर दिल्ली में दरिंदों की शिकार उस बच्ची का नाम उसके पिता ने ही उजागर कर दिया है। इंटरनेट पर ट्विटर पर आई एक मेल में एक अखबार की चर्चा है जिसमें उसके पिता का बयान भी है।  हम नाम नहीं लिखते क्योंकि हमारा उद्देश्य किसी घटना में समाज के उन पहलुओं पर विचार करना होता है जिन्हें लोग अनदेखा कर देते हैं-नाम अगर सार्वजनिक हुआ हो तो भी नहीं लिखते।

      इधर हम देख रहे हैं कि सामूहिक दुष्कर्म पर अनेक लोग बयानबाजी कर रहे हैं।  हमें अफसोस होता है यह देखकर कि वह बच्ची तो अपने दुर्भाग्य का शिकार हो गयी पर उसे विषय बनाकर लोग जाने क्या क्या कर रहे हैं।  हमने पहले भी यह कहा था कि यह घटना आम घटनाओं से अलग है। कहीं न कहीं इसमें राज्य प्रबंध का दोष है। अब तो यह भी मानने है कि समाज का भी इसमें कम दोष नहीं। लड़की के साथ जो लड़का था वह बच गया और उसके जो बयान आये हैं वह दूसरा पक्ष भी रख रहे हैं।  वह उसे दुर्भाग्यशाली बच्ची ने दरिंदों की क्रुरता तो झेली ही सज्जनों की उपेक्षा को भी झेला।  लड़की साथ वाले लड़के के अनुसार वह घायलवास्था में  सड़क पर पड़े आते जाते लोगों से मदद की याचना करता रहा पर लोग देखकर जाते रहे।  दुर्जनों की सक्रियता और सज्जनों की निष्क्रियता दोनों को उन दोनों ने जो रूप देखा वह हैरान करने वाला है।  उनकी उपेक्षा करने वाले मनुष्य थे कोई गाय या भैंस नहीं।

          इस  पर एक वाक्य याद आ रहा है। हमें पता नहीं किसी फिल्म में था या कहीं पढ़ा है।  इसमें एक धर्म विशेष को लेकर कहा गया कि ‘………धर्म हमें या तो आतंकवादी बनाता है या फिर बेबस’!

    यह वाकया देखकर हमें लग रहा है कि नाम से पहचाने जाने वाले सारे धर्मो की स्थिति यही है।  जहां तक भारतीय अध्यात्म का प्रश्न है वह पवित्र आचरण तथा अच्छे व्यवहार को ही धर्म मानता है।  श्रीमद्भागवत गीता में धर्म का कोई नाम नहीं बल्कि आचरण से उसे जोड़ा गया है।  कष्टकारक बात यह है कि श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ने  का दावा करने वाले लोग यह मानते है कि वह महाज्ञानी हो गये और फिर वह उसकी व्याख्या मनमाने तरीके से करते हैं। उससे भी ज्यादा हैरान यह बात करती है कि जिन लोगों का यह दावा कि वह भारतीय धर्मो की समझ रखते हैं वही ऐसी बातें करते हैं जिनका सिर पैर नहीं होता।

    सामूहिक दुष्कर्म की घटना में वास्तविक रूप से क्या हुआ, यह तो वह लड़का भी एकदम पूरी तरह से नहीं बता सकता जो उस समय लड़की के साथ था।  अपने ऊपर वार होने की वजह से वह घायल होकर अपनी सुधबुध खो बैठा था  हालांकि पूरे हादसे के समय वह उस पीड़ा झेल रहा था। ऐसे में यह कहना कि उस लड़की को यह करना चाहिये था यह वह करना चाहिए था यह हास्यास्पद है।  इस घटना के परिप्रेक्ष्य में संपूर्ण समाज की स्थिति में देखना भी ठीक नहीं है।  जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा के आधार पर अपराध और पीड़ित को देखने वाले केवल दुर्भाग्यशाली पीड़िता के नाम के साथ अन्याय कर रहे हैं।  यह सच है कि मनुष्य एक शक्तिशाली जीव है पर भाग्य का अपना रूप है।  एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर जो लोग टिप्पणी कर रहे हैं उनका मुख्य उद्देश्य पर्दे पर अपना चेहरा और कागजों पर नाम चमकते देखने के अलावा कुछ नहीं है।  उनको ऐसा लगता है कि अगर हमने इस पर कुछ नहीं बोला तो प्रचार युद्ध में हम अपने प्रतिद्वंद्वियों से  पिछड़ जायेंगे।  फिर हम प्रचार माध्यमों की तरफ देखते हैं कि अगर उनके पास सनसनी पूर्ण समाचार और विवादास्पद बहसें नहीं होंगी तो उनके विज्ञापन का समय कैसे पास होगा।  बाज़ार के पास प्रचार है तो बोलने वाले बुत भी हैं। यह बुत अपना मुख प्रचार के भोंपुओं की तरफ हमेशा किये खड़े रहते हैं, मानो कह रहे हों कि ‘बोल बाज़ार।’

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप

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राजनीति में संधाय आसन की प्रासंगिकता-हिंदी लेख


                बाबा रामदेव ने फिर अपना आंदोलन प्रारंभ किया है।  उन्होंने तारीख चुनी है नौ अगस्त जिस दिन स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारत अंग्रेजों का नारा बुलंद किया गया था।  मूलतः बाबा रामदेव एक योग शिक्षक हैं यह अलग बात है कि उन्होंने अपने व्यवसायिक प्रयासों ने भारतीय योग विद्या को जिस तरह प्रचार माध्यमों में प्रतिष्ठित किया उससे उनके भक्त उनमें देवत्व के दर्शन करते हैं।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनके योग प्रचार की क्षमताओं को कोई चुनौती नहीं देता।  देना चाहिए भी नहीं क्योंकि उन्होंने जो किया है वह आसानी से नहीं किया जा सकता।

योगासन और प्राणायाम से मनुष्य के अंदर जिस मनुष्यत्व की स्थापना स्वतः होती है उसका अनुभव तो केवल गुरु और उनके साधक ही कर सकते हैं। इसमें संदेह नहीं है मगर इसका आशय यह कतई नहीं है कि योग साधक या गुरु मनुष्यत्व में ज्ञान तत्व की स्थापना कर सकें।  हमारे देश में एक बात देखी जाती है कि लोग हर विषय में ज्ञानी होने का दावा करते हैं। स्थिति यह है कि कोई भी किसी भी व्यवसाय में कूद जाता है।  अगर कोई सार्वजनिक महत्व का काम हो तो सभी अपना महत्व सिद्ध करने  लगते हैं।  खासतौर से जब ज्ञान की बात हो तो प्राचीन ग्रंथों से पढ़ी बात को कोई भी सुना सकता है।

बाबा रामदेव आष्टांग योग में आसन और प्राणायाम में सिद्ध हस्त हैं पर जिस तरह वह जिस सामाजिक अभियान को चला रहे हैं उसके लिये राजनीति शास्त्र का ज्ञान होना आवश्यक है।  वही क्या हमारा मानना है कि राजनीति में आने वाले हर व्यक्ति को राजनीति शास्त्र का ज्ञान होना चाहिए।  हमारे यहां पद प्राप्ति को ही राजनीतिक लक्ष्य और उपलब्धि माना जाता है। इतना ही नहीं जो बरसों से पदासीन रहे उसे चाणक्य तक कहा जाता है।  राज्य में पद प्राप्त करने वाले की प्रजा के प्रति जो जिम्मेदारी होती है और उसका निर्वाह करने के लिये जो तरीके हैं उसका ज्ञान कितनों को होता है यह अलग से विचार का विषय है।

बाबा रामदेव के बारे में हमारी धारणा है कि उनके अंदर किसी सामान्य मनुष्य की अपेक्षा अधिक दैहिक तथा मानसिक शक्ति है जो योग साधना का परिणाम है।  इस शक्ति का उपयोग करने के लिये जिस ज्ञान की आवश्यकता होती है उसमें अवश्य संदेह होता है।  इसके लिये आवश्यक होता है संबंधित विषय का ज्ञान होना और बाबा रामदेव राजनीति शास्त्र के अध्ययन के बिना राष्ट्रहित का आंदोलन चलाने निकल पड़े हैं।

इस बार के आंदोलन में उनका ध्येय अस्पष्ट है।  तेवर ढीले हैं।  अन्ना हजारे के साथ उन्होंने कुछ ही दिन पहले संयुक्त रूप से पत्रकार वार्ता की थी उसमें दोनों ने साथ साथ रहने की कसम खाई थी।  अन्ना हजारे अपना आंदोलन बीच में खत्म कर अपने गांव वापस चले गये।  उन्होंने जिस तरह अपना आंदोलन खत्म किया वह अत्यंत निराशाजनक था।  हमारे जैसे निष्पक्ष आम लेखकों का मानना है कि अन्ना हजारे हों या स्वामी रामदेव इन दोनों के राष्ट्र सुधार के लिये किये गये आंदोलन केवल प्रचार माध्यमों के सहारे ही लंबे चले।  तब दोनों आंदोलनों के समाचारों और बहसों के बीच हर मिनट में विज्ञापन के दर्शन होते थे।  चूंकि आंदोलन गंभीर मुद्दों पर सतही योजना पर आधारित रहे हैं इसलिये लोगों की इनमें दिलचस्पी अधिक नहीं रही।  यही कारण है कि अब प्रचार माध्यम इनसे दूरी बना रहे हैं क्योंकि उनके प्रबंधकों को नहीं लगता कि दिन भर इनके सहारे विज्ञापनों का समय पास किया जा सकता है।

बहरहाल बाबा रामदेव दिल्ली के रामलीला मैदान में जो आंदोलन कर रहे हैं उसमें वह संधाय आसन करते हुए दिख रहे हें

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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अरेश्व विजिगीषोश्व विग्रहे हीयामानयोः।

सन्धाय यदवस्थानं सन्धायान्मुच्यते।।

हिन्दी में भावार्थ- जब दोनों शत्रु युद्ध में हीन हो उस समय मिल बैठ रहने को संधाय आसन कहते हैं।

पहले जब वह अनशन पर बैठे थे तब विदेशों में जमा भारत के  काले धन को देश में लाने के मुद्दे पर जमकर गरजे थे।  उनके शत्रु कौन है यह तो पता नहीं पर काले धन को लेकर वह जब आक्रामक रवैया अपनाये हुए थे तब लग रहा था कि  पर्दे के पीछे कोई न कोई शत्रु है जिससे वह ललकार रहे हैं।  विदेशों में काला धन रखने वालों को उन्होंने राष्ट्र का शत्रु तक घोषित कर दिया था। इतना ही नहीं उन्होंने उनके नाम तक अपने पास होने का दावा करते हुए कहा था कि समय आने पर बता दूंगा।  इस बार वह केवल हवा में अपनी बातें उछाल रहे हैं।  हम किसी के विरोधी नहीं है।  हमारा कोई शत्रु नहीं है।  आदि आदि मीठी बातें करते हुए वह ऐसे लगते हैं जैसे कि सामने बैठी भीड़ की बजाय कहीं दूर बैठे अज्ञात लोगों को प्रसन्न कर रहे हैं।

बाबा रामदेव के  विरुद्ध कोई बड़ी कार्यवाही की संभावना भी नहीं लगती। ऐसा लगता है कि पर्दे के पीछे विराजमान उनके शत्रु भी अब शांत हो गये हैं।  कम से कम अभी तक बाबा रामदेव ऐसे लग रहे हैं कि जैसे कि खानापूरी करने आये हों और उनके अभियान से किसी को डरने की आवश्यकता नहीं है।  बाबा रामदेव को शायद पता नहीं होगा  आसनों के प्रकार पतंजलि योग में कहीं नहीं बताये गये पर के कौटिल्य महाराज ने अपने शास्त्र में अनेक आसनों का जिक्र किया है।  उनसे यह भी पता चलता है कि बैठने या उठने के ही आसन नहीं होते बल्कि मनुष्य की मानसिक तथा शारीरिक क्रियाओं के साथ ही व्यवहार के भी आसन होते हैं।  रामलीला मैदान में आंदोलन समाप्त होने के बाद वह आपस में द्वंद्वरत लोगों को हिंसा की बजाय संधाय आसन करने की प्रेरणा दे सकते हैं ताकि देश में मैत्रीवत भावना का विकास हो।

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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निर्मल बाबा के समागमों के प्रचार का डर किसको था-हिन्दी लेख (hindi lekh and article on nirmal baba sawagam)


            निर्मल बाबा का प्रचार कम हो गया है। उनके समागमों का तूफानी गति से चलने वाला विज्ञापन अब अनेक चैनलों में दिखाई नहीं देता है। उनके बारे में कहा गया कि वह समाज में अंधविश्वास फैला रहे हैं। लोगों को उनकी समस्याओं के निराकरण के लिये आईस्क्रीम, रसगुल्ले और समौसा खाने के इलाज बता कर पैसा वसूल कर रहे हैं। सच बात तो यह है कि निर्मल बाबा का प्रचार केवल उनके विज्ञापनों के कारण हो रहा था जिसके लिये वह सभी हिन्दी समाचार चैनलों को भारी भुगतान कर रहे थे। मतलब यह कि उनका प्रचार स्वप्रायोजित होने के साथ अतिरेक से परिपूर्ण था। अचानक ही हिन्दी समाचार चैनलों को लगा कि निर्मल बाबा तो अंधविश्वास फैला रहे हैं तो उन्होंने उनके विरुद्ध प्रचार शुरु किया। लंबे समय तक यह चैनल विरोधाभास में सांस लेते रहे। एक तरफ निर्मल बाबा का विज्ञापन चल रहा था तो दूसरी तरफ चैनल वाले अपना समय खर्च कर उस पर बहस कर रहे थे-यह अलग बात है कि उस समय भी निर्मल बाबा के खलनायक साबित करते हुए वह दूसरे विज्ञापन चला कर पैसा वसूल कर रहे थे। निर्मल बाबा को अंधविश्वास का प्रवर्तक बताकर इन चैनलों ने अपने ही प्रायोजित बुद्धिजीवियों से बहस कराकर व्यवसायिक सिद्धांतों के प्रतिकूल जाने का साहस करते हुए उनमें भी अतिरेक से पूर्ण सामग्री प्रस्तुत की।

              बहरहाल निर्मल बाबा का जलवा कम हो गया है और यह सब उन हिन्दी समाचार चैनलों की वजह से ही हुआ है जिन्होंने विज्ञापन लेते समय केवल अपना लाभ देखा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन टीवी चैनलों ने वास्तव में क्या कोई समाज के प्रति भक्ति दिखाते हुए निर्मल बाबा के विरुद्ध दुष्प्रचार कर कोई साहस का काम किया है या फिर निर्मल बाबा के प्रचार से मिलने वाले धन से अधिक कहीं उनकी हानि हो रही थी जिससे वह घबड़ा गये थे। इसी वजह से समाज को जाग्रत करने के लिये कथित रूप से अभियान छेड़ दिया था। 

           निर्मल बाबा पिछले कई महीनों से छाये हुए थे। हमने देखा कि उनकी चर्चा सार्वजनिक स्थानों पर होने लगी थी। स्थिति यह थी कि देश के ज्वलंत राजनीतिक विषयों से अधिक लोग निर्मल बाबा की चर्चा करने लगे थे। महंगाई और मिलावट से परेशान समाज के लिये निर्मल बाबा का समागम एक मन बहलाने वाला साधन बन गया था। देखने वालों की संख्या बहुत थी पर इसका मतलब यह कतई नहीं लिया जाना चाहिए कि सभी उनके शिष्य बन गये थे। फिर हम यह भी देख रहे थे महंगाई, बेरोजगारी, दहेजप्रथा तथा पारिवारिक वातावरण की प्रतिकूलता से परेशान लोगों की संख्या समाज में गुणात्मक रूप से बढ़ी है जिससे लोग राहत पाने के लिये इधर उधर ताक रहे थे। ऐसे में हर चैनल पर छाये हुए निर्मल बाबा की तरफ अगर एक बहुत दर्शक वर्ग आकर्षित हुआ तो उसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं थी। इससे हमारे देश के बुद्धिजीवियों को कोई परेशानी भी नहीं थी मगर समस्या यह थी कि टीवी का एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग केवल निर्मलबाबा के समसमों की तरफ खिंच गया था। उस दौरान आईपीएल जैसी क्रिकेट प्रतियोगिता तथा टीवी के यस बॉस कार्यक्रम की चर्चा सार्वजनिक स्थानों से गायब हो गयी थी। निर्मल बाबा ने चैनलों से अपने समागमों के विज्ञापन का समय भी इस तरह लिया था कि वह एक न एक चैनल पर आते ही थे। स्थिति यह लग रही थी कि लोग चैनलों पर उन समागमों के प्रसारण का समय इस तरह याद रखते थे जैसे कि सारे चैनल ही निर्मलबाबा के खरीदे हुए हों। हमारा अनुमान तो यह है कि निर्मल बाबा से मिलने वाले आर्थिक लाभ से कहीं उनको अपने अन्य प्रसारणों पर हानि होने का डर था। उनके अन्य कार्यक्रम की लोकप्रियता इस कदर गिरी होगी कि उनके विज्ञापनादाताओं को लगा होगा कि वह बेकार का खर्च रहे हैं। प्रचार प्रबंधकों से स्पष्ट कहा होगा कि वह या तो निर्मल बाबा का विज्ञापन प्रसारित करें या हमारे लिये दर्शक बचायें। 

            हमने निर्मल बाबा के कार्यक्रंम देखे थे। हमारे अंदर केवल मनोरंजन का भाव रहता था। अगर अंधविश्वास की बात की जाये तो हिन्दी चैनल वाले स्वयं ही अनेक तरह के ऐसे प्रसारण कर रहे हैं जो विश्वास और आस्था की परिधि में नहीं आते। निर्मल बाबा को कोई सुझाव हमारे दिमाग में नहीं आता था। देखा और भूल गये। दरअसल इस विषय पर बहुत पहले लिखना था पर समय और हालातों ने रोक लिया। एक योगसाधक और गीता पाठक होने के नाते हमें पता है कि कोई भी मनुष्य अपने अध्यात्मिक ज्ञान के बिना इस संसार में सहजता से संास नहीं ले सकता। संसार के विषयों में लिप्त आदमी सोचता है कि मैं कर्ता हूं यही से उसक भ्रम प्रारंभ होता है जो अंततः उसे अंधविश्वासों की तरफ ले जाता है। संसार के काम समय के अनुसार स्वतः होते हैं और उनके लिये अधिक सोचना अपनी सेहत और दिमाग खराब करना है।

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

 

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