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साधू, शैतान और इन्टरनेट-हिंदी हास्य व्यंग्य कविता


शैतान ने दी साधू के आश्रम पर दस्तक
और कहा
‘महाराज क्या ध्यान लगाते हो
भगवान के दिए शरीर को क्यों सुखाते हो
लो लाया हूँ टीवी मजे से देखो
कभी गाने तो कभी नृत्य देखो
इस दुनिया को भगवान् ने बनाया
चलाता तो मैं हूँ
इस सच से भला मुहँ क्यों छुपाते हो’

साधू ने नही सुना
शैतान चला गया
पर कभी फ्रिज तो कभी एसी ले आया
साधू ने कभी उस पर अपना मन नहीं ललचाया
एक दिन शैतान लाया कंप्यूटर
और बोला
‘महाराज यह तो काम की चीज है
इसे ही रख लो
अपने ध्यान और योग का काम
इसमें ही दर्ज कर लो
लोगों के बहुत काम आयेगा
आपको कुछ देने की मेरी
इच्छा भी पूर्ण होगी
आपका परोपकार का भी
लक्ष्य पूरा हो जायेगा
मेरा विचार सत्य है
इसमें नहीं मेरी कोई माया’

साधू ने इनकार करते हुए कहा
‘मैं तुझे जानता हूँ
कल तू इन्टरनेट कनेक्शन ले आयेगा
और छद्म नाम की किसी सुन्दरी से
चैट करने को उकसायेगा
मैं जानता हूँ तेरी माया’

शैतान एकदम उनके पाँव में गिर गया और बोला
‘महाराज, वाकई आप ज्ञानी और
ध्यानी हो
मैं यही करने वाला था
सबसे बड़ा इन्टरनेट तो आपके पास है
मैं इसलिये आपको कभी नहीं जीत पाया’
साधू उसकी बात सुनकर केवल मुस्कराया

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महिलाओं विरुद्ध बढ़ते अपराध चिंता का विषय-हिन्दी लेख


भारतीय महिला हॉकी खिलाड़ियों के यौन शोषण की घटना अत्यंत शर्मनाक है। इस घटना को सुनकर एक फिल्म की याद आ रही है जिसमें एक कल्पित कहानी पर बनी फिल्म की याद रही है जिसमें भारतीय महिला हॉकी टीम को विश्व विजेता बनाया गया था। वह फिल्म हिट रही थी। उसके गाने के बोल ‘चक दे इंडिया’ का भारतीय प्रचार माध्यमों में अपने विज्ञापनो के साथ ही कार्यक्रमों में तब तक इसका इस्तेमाल  किया जब तक करोड़पति फिल्म का गाने के ‘जय हो’ बोल प्रचलित नहीं हुए थे।
इससे पहले भी हरियाणा की एक युवती खिलाड़ी के यौन शोषण के कारण आत्महत्या करने का प्रकरण काफी चर्चा में रहा है जिसके लिये एक पुलिस अधिकारी को कई वर्षों बाद कानून का शिकंजा कसा गया। ऐ्रसी अनेक घटनायें हैं जिसमें महिलाओं का यौन शोषण करने के आरोप सामने आते हैं। इनमें कुछ पर कार्यवाही होती है तो कुछ पर नहीं जबकि आवश्यकता इस बात की है कि इसे अत्यंत गंभीरत से लिया जाना चाहिए। इस घटना से यह तो सिद्ध हो जाता है कि चाहे किसी भी क्षेत्र में थोड़ा बहुत आकर्षण है तो वहां बैठे शिखर पुरुष कुछ भी कर सकते हैं ।
वैसे देखा जाये तो प्रचार माध्यमों से जनचर्चा में आये यौन शोषण के प्रकरणों से अधिक उनकी संख्या है जो समाज के सामने नहीं आते। इसमें यौन शोषक तो खैर स्वयं सामने आने से रहा पर पीड़िता भी चुप रह जाती हैं और इसमें उनके परिवार वाले भी इज्जत के मारे अपनी जिम्मेदारी निभाने से कतराते हैं। हम यहां यौन शोषण की घटनाओं को एकांगी या एकतरफा प्रयास मानकर चलते हैं पर हमे यहां यह भी देखना चाहिए कि आखिर कथित रूप से सभ्य हो रहा समाज आखिर कथित रूप इस पर संवेदनहीन क्यों होता जा रहा है कि उसमें दौलत, ओहदा तथा शौहरत पाने वालों में अनेक लोग औरत को खिलौना समझने से बाज नहीं आते।
वैसे देखा जाये तो भारत में जब स्त्रियों की दशा को लेकर अनेक प्रकार की चर्चायें होती हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि भारत में स्त्रियों को दबाकर रखा जाता है। हम इस तर्क से इंकार नहीं कर सकते पर सच यह भी है कि महिलाओं के यौन शोषण की घटनायें पहले इतनी नहीं होती थी जितनी आज हो रही है। आधुनिक शिक्षा पद्धति के चलते महिलायें हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं पर उनकी संख्या पर्याप्त नहीं है क्योंकि हम शिक्षा को नौकरी से जोड़कर देखते हैं। पहले सरकारी नौकरियों और अब निजी क्षेत्र में नौकरियों की संख्या कम है और मांगने वाले बेरोजगारों की अधिक। फिर इधर शिक्षित महिलाओं की संख्या बढ़ी है और यकीनन रोजगार का संकट उनके सामने वैसा ही ही है जैसा पुरुषों के लिये। फिर एक बात है कि नौकरी की सुरक्षा के चलते सरकारी क्षेत्र में यौन शोषण की घटनायें येनकेन प्रकरेण ही होती हैं पर निजी क्षेत्र के बढ़ते दायरे के साथ ऐसी घटनायें बढ़ती जा रही है। जहां भी किसी व्यवसाय में थोड़ा आकर्षण हैं वहां महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार तथा यौन शोषण की शर्मनाक घटनायें हो जाती हैं। अखबारों तथा अंतर्जाल पर लगातार ऐसा पढ़ने कों मिलता है जिससे लगता है कि टीवी चैनल, पत्रकारिता फिल्म तथा खेलों में महिलाओं का यौन शोषण एक आम बात हो गयी है। एक फिल्म अभिनेता का तो बकायदा स्टिंग ऑपरेशन किया गया था। जिस पर बहुत बहस होती रही थी।
यौन शोषण के आरोपों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि घटना के बहुत समय बाद सामने आते हैं। इसके विपरीत बलात्कार की शिकायत तत्काल सामने आती है। ऐसे में यौन शोषण के मामलों में पीड़िता को लोग सहानुभूति तो देते हैं पर पर विलंब से आई खबर उनको सोचने के लिये मजबूर कर देती है कि कहीं किसी हद तक किसी लालच या लोभ में पीड़िता कहीं शोषण के जाल में स्वयं तो नहीं फंस गयी।
यही सोचकर यह बात मन में आती है कि आधुनिक युवतियों और महिलाओं को सफलता के लिये ‘संक्षिप्त मार्ग’  (short cut root) अपनाने बचने के साथ ही अपनी प्रतिभा और योग्यता पर भरोसा रखने तथा उसे निखारते रहने का प्रयास करने की राय भी दी जानी चाहिए। बच्चियों को शुरुआत में ही यह समझाना चाहिए कि अगर वह अपने बजाय किसी अन्य पर भरोसा करने के अपनी योग्यता और प्रतिभा निखारने के लिये न केवल अपने कार्य का अभ्यास करें बल्कि अपनी प्रतिबद्धता भी उसी से रखें।
हर मनुष्य में देवता और राक्षस रहता है। अब यह अलग बात है कि अपने कर्म से कौन अपनी पहचान कैसी बनाता है? उसस्रे भी अलग एक स्थित यह है कि मनुष्य सामान्य जीवन एक आम व्यक्ति के रूप में गुजारता है। लेखक, पत्रकार, फिल्म कलाकर, चित्रकार, राजनीतिक व्यक्ति, प्रशानस में उच्च पद पर बैठे लोगों के प्रति स्वाभाविक रूप से आकर्षण होता है क्योंकि उनका चरित्र लोगों की आंखों के सामने सक्रिय रहता है। इनमें अधिकतर भले हैं पर इनमें कुछ लोगों को सफलता हज़म नहीं हो्रती और वह जब शिखर पर पहंुचते हैं तो फिर दूसरों के गुरु-आजकल धर्मपिता यानि गॉडफादर बनने की को्रशिश करते हैं। सच बात तो यह लोग शिखर पर पहुंचते ही चालाकियों से हैं इसलिये उनमें देवत्व ढूंढना अपने आपको धोखा देना है। सबसे बड़ी बात यह कि वह किसी दूसरे को शिखर पर पहुंचा दें यह उनकी न तो नीयत में होता है और न ही क्षमता के अनुकूल। दूसरी बात यह है कि अपनी प्रतिभा पर यकीन न करने वाले युवक युवतियों ही इनकी शरण लेते हैं न कि प्रतिभाशाली।
ऐसे में देश की युवतियों और महिलाओं को एक बात यह भी सोचना चाहिए कि प्रतिभा तो पत्थर का पहाड़ हो या लोहे का छप्पर उसे फाड़कर बाहर आती है। जहां तक हो सके अपने लक्ष्य पर ही नज़र रखें। यह सच है कि देश के सभी प्रकार के सामाजिक, आर्थिक तथा खेल नियंत्रण प्रतिष्ठानों में ऐसे कुछ शिखर पुरुघ हैं जो दूसरों को सफलता दिलाने का दावा करते हैं पर आप गौर करें तो शायद ही कोई ऐसा कर पाया हो। अलबत्ता अल्प योग्य प्रतिभाओं का दोहन वह खूब कर लेते हैं।
जीवन की सफलता का मूलमंत्र परिश्रम, लगन, एकाग्रता तथा अपने कर्म से प्रतिबद्धता से ही संभव है। अपने माता पिता के अलावा किसी को गॉडफादर बनाना अपने आपको धोखा देना है। दरअसल जब यौन शोषण की घटनायें सामने आती हैं तब मासूम पीड़िताओं की व्यथा मन को व्यग्र कर देती है और तब लगता है कि जीवन के यथार्थ का ज्ञान होना सभी को जरूरी है ताकि इस देश की महिलायें और युवतयों दृढ़ता पूर्वक जीवन यापन करते हुए सफलता की सीढ़यां चढें। अपने माता पिता तथा परिवार के सानिध्य में पली बढ़ी लढ़कियां आज के युग मे आगे बढ़ें ताकि समाज का आधा अधूरापन खत्म हो। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने अंदर दृढ़ संकल्प और परिश्रम से प्रतिबद्धता मन में रखें।
दूसरी बात यह है कि यौन शोषकों को अपनी औकात समाज की बतलाये और उनका सामाजिक बहिष्कार करे। चाहे वह कितने भी बड़ा दौलतमंद, उच्च पदस्थ या प्रतिष्ठित हो उसका सम्मान न करें तभी इस समस्या से छुटकारा मिल सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस बारे में पहल बुद्धिमान महिलाओं को ही करनी होगी क्योंकि पुरुषों में अनेक इस मामले में केवल दिखावटी हमदर्दी दिखाते हैं।

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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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वह पर्स-हिन्दी हास्य व्यंग्य


एक बेजान पर्स की भी कहानी हो सकती है! क्यों नहीं, अगर वह सब्जी की तरह कटने का जुमला उस पर फिट हो सकता है तो कोई कहानी भी हो सकती है। पर्स में माल होता है और माल के पीछे धमाल! धमाल पर्स नहीं करता, बल्कि आदमी करते हैं इसलिये कहानी तो बन ही जाती है।
उस दिन वह बालिका अपने पिताजी के साथ हमारे घर के बाहर आटो से उतरी। मोबाइल से से पिता पुत्री के आने की खबर मिल गयी सो हम उनका इंतजार कर रहे थे।
उसके पिता से हमसे हाथ मिलाया उन्होंने अपने पर्स से सौ का नोट उसकी तरफ बढ़ाया तो वह बोला-‘साहब खुला साठ रुपया दो।’
हमने अपना पर्स खोला और उसमें से साठ रुपया निकालकर उसकी तरफ बढ़ाया।
पिता पुत्री दोनों घर के अंदर दाखिल होने लगे। बालिका ने कहा-‘वाह मौसा जी, अब तो आपने नया पर्स ले ही लिया। पहले हमारे यहां कितना पुराना पर्स ले आये थे। मैंने आपको टोका था न! इसलिये नया खरीदा होगा।’
हमने कहा-‘नहीं! पुराना कट गया तो नया खरीदना पड़ा।’
बालिका भौचक्की रह गयी-‘कब कटा! उसमें कितने पैसा थे।’
हमने कहा-‘नहीं, उसमेें दस या पंद्रह रुपया था। सबसे खुशी इस बात की है कि तुम्हारे घर से आते समय मैंने अपना ए.टी.एम. कार्ड अपनी शर्ट की जेब में रख लिया था।’
बालिका घर के अंदर दाखिल हुई तो हमारे घर में जान पहचान की एक महिला जो उस समय श्रीमतीजी से मिलकर बाहर जा रही थीं बालिका को देखते ही बोली-‘ तुम आ गयी अपने मौसी और मौसा को लेने। कब ले जायेगी?’
उसके पिता या चाचा हमारे पास छोड़ जाते थे और हम उसे छोड़ने मथुरा जाते थे। यह क्रम कई बरसों से चलता रहा है इसलिये उसके आने का मतलब यही होता है कि हम जरूरी उसे छोड़ने मथुरा जायेंगे।
बालिका ने कहा-‘हां, इस बार केवल सात दिन ही रहूंगी। मेरे अगले सोमवार से पेपर है। आज शुक्रवार है और अगले शुक्रवार चली जाऊंगी।’
हमने सिर खुजलाया, क्योंकि हम अगले सप्ताह सफर करने में मूड में नहीं थे। अलबत्ता अनेक बार अपने मन के विपरीत भी चलना ही पड़ता है।
सोमवार सुबह उसने याद दिलाया कि ‘शुक्रवार को मथुरा चलना है। ताज की टिकिट रिजर्व करवा लें।’
पहले छोटी थी तो वह इतने अधिकार से बात नहीं कहती थी पर बड़ी और सयानी होने के कारण अब उसमें दृढ़ता भी आ गयी थी। सोमवार को हम टिकिट नहीं करवा सके। मंगलवार को जाकर करवा ली।
रात को आकर अपने पर्स से टिकिट निकाला और उससे कहा कि‘सभाल कर रखना।’
सब कुछ ठीक ठाक था। वैसे मथुरा कई बार रेल की सामान्य बोगी में बैठकर अनेक बार सफर किया है पर वह हमेशा मुश्किल रहा है। दो बार आगरा में हमारी जेब कट चुकी है। फिर सामान्य बोगी में भीड़ और रिजर्वेशन डिब्बे में रेल कर्मचारियों से विवाद करने की परेशानियेां से बचने का हमें एक ही उपाय नजर आया कि ताज से ही यात्रा की जाये। वैसे मथुरा वृंदावन की यात्रा करने में हमको मजा आता है पर बीच की परेशानी दुःखदायी यादें बन जाती हैं। टिकिट रिजर्व करवाकर हम निश्चिंत हो गये कि यात्रा सुखदायी होगी, मगर यह केवल सोचना ही था!
जाने के एक दिन पहले बालिका की उससे उम्र में बड़ी एक सहेली का फोन आया कि वह भी उसके साथ चलेगी। बालिका ने हामी भर दी।
रात को उसने बताया कि ‘उसकी सहेली का पति उसे छोड़ने आयेगा। वैसे तो वह अकेली भी चली जाती पर उसके साथ छोटा बच्चा है इसलिये मेरी मदद ले रही है।
हमारा माथा ठनका। हमने कहा-‘देखो, हमारी टिकिट रिजर्व है और मैं नहीं चाहता कि उसकी वजह से टिकिट चेकरों से लड़ता फिरूं। ग्वालियर में तो ठीक है पर आगरा में उनसे जूझना पड़ता है।’
बालिका ने कहा-‘उसका पति भी टिकिट रिजर्वेशन कराकर देगा।’
हमने चुप्पी साध ली।
अगले दिन हम शाम को अपने बालिका तथा श्रीमतीजी के साथ घर से निकले। हमने अपना पर्स देखा। उसमें कुछ पांच और दस के नोट थे। अपना ए. टी. एम. निकाल कर शर्ट की जेब में रखा। कुछ चिल्लर जेब में रखी ताकि कहीं पैसा निकालने के लिये पर्स न निकालना पड़े। स्टेशन पर पहुंचने से पहले ही आटो के पैसे भी जेब से निकाल लिये।
स्टेशन पर उसकी सहेली का पति अपनी पत्नी को छोड़ने आया। दोनोें सहेलियां मिली। उसके पति ने एक टिकिट देकर मुझसे कहा कि ‘यह लीजिये आज ही रिजर्व करवाई है।’
मैंने टिकिट में बोगी का नंबर देखा तो मेरा माथा ठनका। वह हमारी बोगी से बहुत दूर थी। मैंने वह टिकिट अपने रखने के लिये पर्स निकाला और उसमें रखा। तत्काल मुझे अपने पर्स निकालने का पछतावा भी हुआ पर सोचा कि ‘यह तो ग्वालियर है? यहंा कभी पर्स नहीं कटा। इसलिये चिंता की बात नहीं।’
मैंने उसके पति से कहा कि ‘यह तीनों एक साथ बैठ जायेंगी। मैं उसकी जगह पर बैठ जाऊंगा।’
उसने कहा-‘नहीं आप साथ ही बैठना। टीसी से कहना तो वह एडजस्ट कर देगा।’
गाड़ी आयी हम उसमें चढ़े। उसकी सहेली अपने नवजात शिशु के साथ ढेर सारा सामान भी ले आयी थी। उसका सामान चढ़ाने की जल्दी में हम यह भूल गये कि एक अदद पर्स की रक्षा भी करना है।’
अंदर बोगी में पहुंचे तो टिकिट का ख्याल कर हमने पीछे पर्स वाली जगह पर हाथ मारा। वह नदारत था। वह हम चिल्लाये क्योंकि गाड़ी चलने वाली थी और बालिका की सहेली का टिकिट उसी में था।
हमारी आवाज सुनकर वहीं खड़े एक आदमी ने पास ही एक लड़के को पकड़ा और कहा-‘शायद, इसने काटा हो। क्योंकि यह आपके पास आने के बाद बाहर भागने की तैयारी में है।’
लड़का हाथ छुराकर भागा पर बोगी के बाहर ही खड़े सहेली के पति के साथ आये एक मित्र ने जो यह माजरा देख रहा था उसे पकड़ लिया। हमने उसकी तलाशी ली। वह भी ललकार रहा था कि ‘ले लो मेरी जेब की तलाशी।’
वाकई उसकी जेबों में हमारा पर्स नहीं था।
हमारा मन उदास होते होते हाथ उसके पेट पर चले गये। जहां ठोस वस्तु का आभास होने पर हमने वहीं हाथ डाला। हमारा पर्स आ हमारे हाथ में आ गया।
हमने तत्काल उसे अपने हाथ में लिया और ट्रेन में चढ़ आये और वह चल दी।
हमने देखा कुछ दूसरे लोग उसे मार रहे थे। यह माजरा उत्तर प्रदेश का एक सिपाही देख रहा था वह बोला-‘देखो, अब उसके लोग ही दिखाने के लिये मार रहे हैं ताकि दूसरे लोग न मारें।
हमें पर्स से ज्यादा इस बात की खुशी थी कि हमें रेल्वे के कर्मचारियों के सामने चोर नहीं बनना पड़ेगा।
हमारे यहां सुबह लाईट जाने के बाद तब आती है जब हम घर से बाहर निकलने वाले होते हैं। कभी हमारे निकलने से पहले आती है तो अपना ईमेल देख लें। अक्सर नहीं होता पर जब होता है तो हम अपनी जेबें ढंग से देखना भूल जाते हैं। कई बार तो पर्स बाहर स्कूटर पर बैठकर यात्रा करता हुआ मिलता है। उस दिन ऐसा ही हुआ।
हमारी मोबाइल की घंटी बजी। हमारे एक मित्र का था। उसने पूछा‘तुम्हारा पर्स कहां है?’
हमने अपनी जेब पर हाथ फिराया। रास्ते में वह किसी आटो वाले को मिला था जिसने उसमें से एक कागज पर मित्र का नंबर देखकर फोन किया था। उस आटो वाले के मोबाइल पर हमने फोन किया और उससे कहा कि ‘आप, पता दें तो समय मिलने पर मैं ले जाऊंगा। उसमें ए.टी.एम. को छोड़कर कोई खास चीज नहीं है। पैसे तो शायद ही हों!’
उसने कहा कि ‘आप अपना पता दें।’
हमने उसे पता दिया तो वह कहने लगा कि ‘आप उस इमारत के बाहर खड़े हो जाईये मेरे पास उधर की ही सवारी है।’
हमारे साथ खड़े एक दोस्त ने कहा-‘देखो भलाई करने वाले आज भी लोग हैं।’
हम दोनों उस इमारत के बाहर होकर उस आटो वाले का इंतजार करते रहे।
उसका नंबर हमारे पास था। वह आया तो हमने उसके नंबर से पहचान लिया।
उसके साथ बैठा एक लड़का उतरा और बोला-‘लीजिये अपना पर्स! इसमें पैसा एक भी नहीं था। आपका ए.टी.एम किसी दूसरे के हाथ लग जाता तो वह आपका नुक्सान कर सकता था। इसलिये आप हमें दो सौ रुपये दो।’
मेरे दोस्त का गुस्सा आ गया। उसने कहा-‘अरे किसे चला रहे हो। चलो हमारे सामने निकाल कर बताओ ए.टी.एम. से पैसे! यह बैंक पास में ही है। अभी जाकर कैंसिल करा देते। वैसे भी यह ए.टी.एम. पुराना हो चुका है हम इसे बदलवाने वाले हैं।’
मैंने उसे पचास रुपये देने चाहे तो उसने नहीं लिये। सौ रुपये दिये तो नानुकर करने लगा। अंदर से आटो वाला बोला-‘अरे साहब दो सौ रुपया दो। अगर हम यह पर्स अपने पास रख लेते तो!
मैंने हंसकर कहा‘मैं तो कुछ नहीं करता। मगर याद रखना इस पर्स को रखने पर एक आदमी रेल्वे स्टेशन पर पिट चुका है। वैसे यह पर्स चार बार खो चुका हूं पर हर बार वापस आता है। आना तो इसे मेरे पास ही था, अलबत्ता संभव है तुम नहीं तो कोई और लाता। हां, इसकी तुम्हें क्या सजा मिलती पता नहीं। यह लो सौ रुपये और चलते बनो।’
बाद में दोस्त बोला-‘यार, इससे अच्छा तो पर्स वापस लेते ही नहीं। नया ए.टी.एम बनवा लेते।’
मैंने उससे कहा-‘सच तो यह है कि इज्जत का सवाल है। उसने हमारा नाम पता तो ले ही लिया था। दस लोगों को पर्स देखकर बताता कि देखो ऐसे भी लोग हैं जिनके पर्स में एक पैसा भी नहीं होता। यह सबूत वापस लेने के लिये मैंने ऐसा किया।’

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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तरक्की पसंद-हिन्दी व्यंग्य शायरी


 कुछ लोगों की मौत पर

बरसों तक रोने के गीत गाते,

कहीं पत्थर तोड़ा गया

उसके गम में बरसी तक मनाते,

कभी दुनियां की गरीबी पर तरस खाकर

अमीर के खिलाफ नारे लगाकर

स्यापा पसंद लोग अपनी

हाजिरी जमाने के सामने लगाते हैं।

फिर भी तरक्की पसंद कहलाते हैं।

———

लफ्जों को खूबसूरत ढंग से चुनते हैं

अल्फाजों को बेहद करीने से बुनते हैं।

दिल में दर्द हो या न हो

पर कहीं हुए दंगे,

और गरीब अमीर के पंगे,

पर बहाते ढेर सारे आंसु,

कहीं ढहे पत्थर की याद में

इस तरह दर्द भरे गीत गाते धांसु,

जिसे देखकर

जमाने भर के लोग

स्यापे में अपना सिर धुनते हैं।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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महात्मा गांधी नोबल नहीं वरन् ग्लोबल थे-आलेख (mahatma gandhi and noble


नोबल पुरस्कार देने वालों ने वाकई हास्यास्पद स्थिति का निर्माण किया है। उन्होंने अमेरिका के कट्टर विरोधियों को बहुत कुछ आरोप लगाने का अवसर दिया है जो इस अवसर का खूब उपयोग कर रहे हैं। अमेरिका के कट्टर से कट्टर समर्थक भी इस विषय पर उनके सामने टिक नहीं सकता।
आमतौर से भारतीय समाचार माध्यम अप्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से पश्चिम के पुरस्कारों का गुणगान करते हैं पर इस विषय पर वह व्यंग्य कस रहे हैं। कहीं पढ़ने को मिला कि प्रत्येक वर्ष का नोबल उसी वर्ष की एक फरवरी तक के दर्ज नामों पर उसी दिन तक किये गये काम के लिये दिया जाता है। इसका आशय यह है कि उसके बाद किसी ने नोबल लायक कोई काम किया है तो उसे अगले वर्ष वह पुरस्कार दिया जा सकता है। इस आधार पर वर्ष 2009 का शांति पुरस्कार 1 फरवरी 2009 तक के कार्यों के लिये दिया जा रहा है जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा ने 20 फरवरी 2009 का वहां के राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभाला था। मतलब यह कि उन्होंने 11 दिन में ही नोबल पुरस्कार प्राप्त करने का काम कर लिया था।
अगर यह तर्क दिया जाये कि उन्होंने विश्व शांति के लिये उससे पहले काम किया गया तो वह इसलिये भी हास्यस्पद होगा क्योंकि स्वयं नोबल देने वाले मानते हैं कि उनके राष्ट्रपति पद पर किये गये कार्यों के लिये ही यह शांति पुरस्कार दिया गया है। बराक ओबामा यकीनन बहुत प्रतिभाशाली हैं और उनकी नीयत पर संदेह का कोई कारण नहीं है। उनको पुरस्कार देना नोबल समिति की किसी भावी रणनीति का हिस्सा भी हो सकती है। हो सकता है कि वह सोच रहे हैं कि विश्वभर में फैली हिंसा रोकने के लिये शायद यह एक उपाय काम कर सकता है।
हमें बाहरी मसलों से लेनादेना अधिक नहीं रखना चाहिये पर इधर लोग आधुनिक समाज में हिंसा का मंत्र स्थापित करने वाले महात्मा गांधी को नोबल पुरस्कार नहीं देने पर नाराज दिख रहे हैं। दरअसल श्री बराक ओबामा को नोबल देने पर महात्मा गांधी का नाम लेना ही कृतघ्नता है। इस दुनियां में एक बार ही परमाणु बम का प्रयोग किया गया है और उसका अपराध अमेरिका के नाम पर दर्ज है। जब पश्चिम अपनी विज्ञान की शक्ति पर हथियार बनाकर पूर्व को दबा रहा था तब उसकी बढ़त बनाने का श्रेय उन महानुभावों को जाता है जो उसका हिंसक प्रतिरोध कर रहे थे। दरअसल पश्चिमी देश तो चाहते थे कि कोई बंदूक उठाये तो हम उस पर तोप दागें। इतना ही नहीं वह विरोधी को मारकर नायक भी बन रहे थे और सभ्य होने का प्रमाण पत्र भी जुटा लेते थे। उस समय महात्मा गांधी ने अहिंसक आंदोलन चलाकर न उनको बल्कि चुनौती दी बल्कि उनको सभ्यता का मुखौटा पहने रखने के लिये बाध्य किया।
वैसे तो हमारे देश में अहिंसा का सिद्धांत बहुत पुराना है पर आधुनिक संदर्भ में जब पूरे विश्व में कथित रूप से सभ्य लोकतंत्र है-चाहे भले ही कहीं तानाशाही हो पर चुनाव का नाटक वहां भी होता है-तब महात्मा गांधी का अहिंसक आंदोलन करने वाला मंत्र बहुत काम का है। सच तो यह है कि महात्मा गांधी का नाम विश्वव्यापी हो गया है। जहां तक हमें जानकारी नोबल का अर्थ अद्वितीय होता है। इसका मतलब यह है कि जिस क्षेत्र में नोबल पुरस्कार दिया जाता है उसमें कोई दूसरा नहीं होना चाहिये। जबकि यह पुरस्कार हर वर्ष दिया जाता है। इसे देखकर कहें तो यही निष्कर्ष निकलता है कि नोबल लेने के बाद भी कोई अद्वितीय नहीं हो जाता। अगले वर्ष कोई दूसरा आ जाता है। अद्वितीय कहने में एक पैंच है वह यह कि उस समय वह व्यक्ति अद्वितीय है पर आगे कोई होगा इसकी संभावना नहीं जताई जा सकती। गांधी जी के बारे में अगर हम कहें तो अहिंसा का संदेश देने में वह अद्वितीय नहीं थे क्योंकि उसके पहले भी अनेक महापुरुष ऐसा संदेश दे चुके हैं। दूसरा सच यह भी है कि ‘उन जैसा व्यक्ति दूसरा पैदा होगा इसकी संभावना भी नहीं लगती। सीधा मतलब यह है कि वह अद्वितीय थे नहीं और उन जैसा होगा नहीं। वह अलौकिक शक्ति के स्वामी थे। इस लोक के सारे पुरस्कार उनके सामने छोटे थे।
कुछ लोगों को इस बात का अफसोस है कि नोबल पुरस्कार मरणोपरांत नहीं दिये जाते। अगर ऐसा होता तो शायद महात्मा गांधी जी के नाम पर नोबल आ जाता। ऐसा सोच लोगो की संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है जो शायद सतही देशभक्ति भावना से से उपजा है। ऐसा सतही देशभक्ति भाव रखने वालों ने गांधी जी का सही मूल्यांकन नहीं किया है। वह अफसोस करते हैं कि मरणोपरांत नोबल नहीं दिया जाता और महात्मा गांधी को अपने हृदय में स्थान देने वाले इसे अपना भाग्य कहकर सराह रहे हैं कि उनका नाम कम से कम मरणोपरांत अपमानित होने से बच गया। यह पश्चिमी लोग उनको नोबल देकर स्वयं को ही सम्मािनत करते अगर उन्होंने ऐसा नियम नहीं बनाया होता।
गांधी जी को मानने वाले दक्षिण अफ्रीका के नेता नेल्सन मंडेला को यह पुरस्कार मिला पर उनको गांधी के समकक्ष नहीं माना जाता क्योंकि गांधी जी का कृत्य एक कौम या देश की आजादी तक ही सीमित नहीं है वरन् आधुनिक सभ्यता को एक दिशा देने से जुड़ा है। नोबल नार्वे की एक संस्था द्वारा दिया जाता है। जी हां, इस नार्वे के बारे में भी हम अखबार में पढ़ चुके हैं जो श्रीलंका में आतंकवादियों की बातचीत के लिये वहां की सरकार से बातचीत करता था। यही नहीं यही नार्वे ने भारत के नगा विद्रोही नेताओं को भी अपने यहां पनाह देता देता था। नार्वे के बारे में अधिक नहीं मालुम पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि वह अमेरिका का पिट्ठू हो सकता है और ऐसे वहां की नोबल बांटने वाली समिति कोई निर्णय अपने देश की नीतियों के प्रतिकूल लेती होगी यह संभव नहीं है।
लब्बोलुआब यह है कि नोबल कोई ऐसा पुरस्कार नहीं रहा जिसे लेकर हम अपने देश के उन महान लोगों को हल्का समझें जिनको यह नहीं मिला। सच तो यह है कि अगर आप हमसे पूछेंगे कि इस विश्व का आधुनिक महान लेखक कौन है तो हम निसंकोच अपने हिंदी लेखक प्रेमचंद का नाम ले देंगे। जार्ज बर्नाड या शेक्सिपियर को यहां पढ़ने वाले कितने लोग हैं? इस देश के लिये किसकी नीतियां अनुकूल हैं? इस प्रश्न का जवाब इस व्यंग्य में नहीं दिया जा सकता। वह अध्यात्म से जुड़ा है। याद रहे भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान न केवल व्यक्ति बल्कि समाज और राष्ट्र के संचालन के सिद्धांत भी प्रतिपादित करता है। बस, उसे समझने की जरुरत है। इन सिद्धांतों को प्रतिपादित करने वालों को नोबल कोई क्या देगा? वह सभी पहले से ही ग्लोबल (विश्व व्यापी) हैं जिनमें हमारे महात्मा गांधी एक हैं। गांधीजी के नाम पर युग चलता है कोई एक वर्ष नहीं।

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