Category Archives: Deepak bharatdeep

गुरु पूर्णिमा-तत्वज्ञान दे वही होता है सच्चा गुरु (article in hindi on guru purnima


गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेले दांव।
दो बूड़े वापूरे,चढ़ि पाथर की नाव

         जहां गुरु लोभी और शिष्य लालची हों वह दोनों ही अपने दांव खेलते हैं पर अंततः पत्थर बांध कर नदिया पर करते हुए उसमें डूब जाते हैं।

            आज पूरे देश में गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है। भारतीय अध्यात्म में गुरु का बहुत महत्व है और बचपन से ही हर माता पिता अपने बच्चे को गुरु का सम्मान करने का संस्कार इस तरह देते हैं कि वह उसे कभी भूल ही नहीं सकता। मुख्य बात यह है कि गुरु कौन है?
दरअसल सांसरिक विषयों का ज्ञान देने वाला शिक्षक होता है पर जो तत्व ज्ञान से अवगत कराये उसे ही गुरु कहा जाता है। यह तत्वज्ञान श्रीगीता में वर्णित है। इस ज्ञान को अध्ययन या श्रवण कर प्राप्त किया जा सकता है। अब सवाल यह है कि अगर कोई हमें श्रीगीता का ज्ञान देता है तो हम क्या उसे गुरु मान लें? नहीं! पहले उसे गुरु मानकर श्रीगीता का ज्ञान प्राप्त करें फिर स्वयं ही उसका अध्ययन करें और देखें कि आपको जो ज्ञान गुरु ने दिया और वह वैसा का वैसा ही है कि नहीं। अगर दोनों मे साम्यता हो तो अपने गुरु को प्रणाम करें और फिर चल पड़ें अपनी राह पर।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता में गुरु की सेवा को बहुत महत्व दिया है पर उनका आशय यही है कि जब आप उनसे शिक्षा लेते हैं तो उनकी दैहिक सेवा कर उसकी कीमत चुकायें। जहां तक श्रीकृष्ण जी के जीवन चरित्र का सवाल है तो इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि उन्होंने अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त कर हर वर्ष उनके यहां चक्कर लगाये।
गुरु तो वह भी हो सकता है जो आपसे कुछ क्षण मिले और श्रीगीता पढ़ने के लिये प्रेरित करे। उसके बाद                    अगर आपको तत्वज्ञान की अनुभूति हो तो आप उस गुरु के पास जाकर उसकी एक बार सेवा अवश्य करें। हम यहां स्पष्ट करें कि तत्वज्ञान जीवन सहजता पूर्ण ढंग से व्यतीत करने के लिये अत्यंत आवश्यक है और वह केवल श्रीगीता में संपूर्ण रूप से कहा गया है। श्रीगीता से बाहर कोई तत्व ज्ञान नहीं है। इससे भी आगे बात करें तो श्रीगीता के बाहर कोई अन्य विज्ञान भी नहीं है।
इस देश के अधिकतर गुरु अपने शिष्यों को कथायें सुनाते हैं पर उनकी वाणी तत्वाज्ञान से कोसों दूर रहती है। सच तो यह है कि वह कथाप्रवचक है कि ज्ञानी महापुरुष। यह लोग गुरु की सेवा का संदेश इस तरह जैसे कि हैंण्ड पंप चलाकर अपने लिये पानी निकाल रहे हैं। कई बार कथा में यह गुरु की सेवा की बात कहते हैं।
सच बात तो यह है गुरुओं को प्रेम करने वाले अनेक निष्कपट भक्त हैं पर उनके निकट केवल ढोंगी चेलों का झुंड रहता है। आप किसी भी आश्रम में जाकर देखें वहा गुरुओं के खास चेले कभी कथा कीर्तन सुनते नहीं मिलेंगे। कहीं वह उस दौरान वह व्यवस्था बनाते हुए लोगों पर अपना प्रभाव जमाते नजर आयेंगे या इधर उधर फोन करते हुए ऐसे दिखायेंगे जैसे कि वह गुरु की सेवा कर रहे हों।

कबीरदास जी ने ऐसे ही लोगों के लिये कहा है कि

—————-

जाका गुरु आंधरा, चेला खरा निरंध।
अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फंद।

      “जहां गुरु ज्ञान से अंधा होगा वहां चेला तो उससे भी बड़ा साबित होगा। दोनों अंधे मिलकर काल के फंदे में फंस जाते है।”

 
बहुत कटु सत्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान एक स्वर्णिम शब्दों का बड़ा भारी भंडार है जिसकी रोशनी में ही यह ढोंगी संत चमक रहे हैं। इसलिये ही भारत में अध्यात्म एक व्यापार बन गया है। श्रीगीता के ज्ञान को एक तरह से ढंकने के लिये यह संत लोग लोगों को सकाम भक्ति के लिये प्रेरित करते हैं। भगवान श्रीगीता में भगवान ने अंधविश्वासों से परे होकर निराकर ईश्वर की उपासना का संदेश दिया और प्रेत या पितरों की पूजा को एक तरह से निषिद्ध किया है परंतु कथित रूप से श्रीकृष्ण के भक्त हर मौके पर हर तरह की देवता की पूजा करने लग जाते हैं। गुरु पूर्णिमा पर इन गुरुओं की तो पितृ पक्ष में पितरों को तर्पण देते हैं।
मुक्ति क्या है? अधिकतर लोग यह कहते हैं कि मुक्ति इस जीवन के बाद दूसरा जीवन न मिलने से है। यह गलत है। मुक्ति का आशय है कि इस संसार में रहकर मोह माया से मुक्ति ताकि मृत्यु के समय उसका मोह सताये नहीं। सकाम भक्ति में ढेर सारे बंधन हैं और वही तनाव का कारण बनते हैं। निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया ऐसे ब्रह्मास्त्र हैं जिनसे आप जीवन भर मुक्त भाव से विचरण करते हैं और यही कहलाता मोक्ष। अपने गुरु या पितरों का हर वर्ष दैहिक और मानसिक रूप से चक्कर लगाना भी एक सांसरिक बंधन है। यह बंधन कभी सुख का कारण नहीं होता। इस संसार में देह धारण की है तो अपनी इंद्रियों को कार्य करने से रोकना तामस वृत्ति है और उन पर नियंत्रण करना ही सात्विकता है। माया से भागकर कहीं जाना नहीं है बल्कि उस पर सवारी करनी है न कि उसे अपने ऊपर सवार बनाना है। अपनी देह में ही ईश्वर है अन्य किसी की देह को मत मानो। जब तुम अपनी देह में ईश्वर देखोगे तब तुम दूसरों के कल्याण के लिये प्रवृत्त होगे और यही होता है मोक्ष।
इस लेखक के गुरु एक पत्रकार थे। वह शराब आदि का सेवन भी करते थे। अध्यात्मिक ज्ञान तो कभी उन्होंने प्राप्त नहीं किया पर उनके हृदय में अपनी देह को लेकर कोई मोह नहीं था। वह एक तरह से निर्मोही जीवन जीते थे। उन्होंने ही इस लेखक को जीवन में दृढ़ता से चलने की शिक्षा दी। माता पिता तथा अध्यात्मिक ग्रंथों से ज्ञान तो पहले ही मिला था पर उन गुरु जी जो दृढ़ता का भाव प्रदान किया उसके लिये उनको नमन करता हूं। अंतर्जाल पर इस लेखक को पढ़ने वाले शायद नहीं जानते होंगे कि उन्होंने अपने तय किये हुए रास्ते पर चलने के लिये जो दृढ़ता भाव रखने की प्रेरणा दी थी वही यहां तक ले आयी। वह गुरु इस लेखक के अल्लहड़पन से बहुत प्रभावित थे और यही कारण है कि वह उस समय भी इस तरह के चिंतन लिखवाते थे जो बाद में इस लेखक की पहचान बने। उन्हीं गुरुजी को समर्पित यह रचना।
…………………………………

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Advertisements

स्त्रियों के प्रति अपराध करने वालों के लिये क्रूर सजायें जरूरी-हिन्दी लेख (crural punishment must for crime against woman-hindi article)


                  ईरान में अपनी प्रेमिका के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करने वाले एक शख्स की आंखें फोड़ दी गयी हैं। ऐसा वहां की न्यायपालिका की सजा के आधार पर किया गया है। आमतौर से ईरान को एक सभ्य राष्ट्र माना जाता है और वहां ऐसी बर्बर सजा देना आम नहीं है। अलबत्ता कभी कभी धर्म आधार पर वहां ऐसे समाचार आते रहते हैं जिसमें सजायें दिल दहलाने वाली होती हैं। उनकी खूब आलोचना भी होती है। वहां की धर्म आधार व्यवस्था के अनुसार चोरी की सजा हाथ काटकर दी जाती है। इससे कुछ लोग सहमत नहीं होते। खासतौर से जब कोई बच्चा रोटी चुराते पकड़ा जाये और उसको ऐसी सजा देने की बात सामने आये तब यह कहना पड़ता है कि यह सजा बर्बर है। अपना पेट भरना हर किसी का धर्म है इसलिये धन चुराने और रोटी चुराने के अपराध में फर्क किया जाना चाहिए। मानवीय आधार पर कहें तो मजबूरीवश रोटी चुराना अपराध नहीं माना जा सकता।
अपनी प्रेमिका की आंखें फोड़ने वाले आशिक की आंखें फोड़ने की सजा को शायद कुछ लोग बर्बर मानेंगे पर सच बात यह है कि इसके अलावा अब कोई रास्ता दुनियां में नज़र नहीं आता। बात चाहे ईरान की हो या भारत की हम स्त्रियों के प्रति बढ़ते क्रूर अपराधों की अनदेखी नहीं कर सकते। अब यहां पर कुछ मानवाधिकारी विद्वान दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं। वह कहते हैं कि क्रूर सजा अपराध नहीं रोक सकती। अलबत्ता ऐसा दावा करने वाले फंासी जैसी सरल सजा पर ही सोचते हैं। फांसी से आदमी मर जाता है उसके बाद उसका कोई दर्द शेष नहीं रह जाता। हाथ काटना या आंख फोड़ना मनुष्य के लिये मौत से बदतर सजा है इस बात को पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित विद्वान नहीं जानते। कम से कम स्त्रियों के प्रति क्रूर अपराध रोकने के लिये ऐसी सजायें तो अपनानी होंगी।
                 हम एशियाई देशों में स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराधों को देखें तो ऐसी क्रूर सजाओं को अलावा कोई रास्ता नज़र नहीं आता। एशियाई देशों के अ्रग्रेजी संस्कृति समर्थक विद्वान अक्सर पश्चिमी और पूर्वीै समाज में अंतर नहीं करते। वह सोचते है कि जिस तरह वह पश्चिमी संस्कृति में ढले है वैसे ही पूरा एशियाई समाज भी हो गया है। हम शहरी भारतीय समाज को देखें तो यहां स्पष्टतः दो भागों में बंटा समाज है। एक तो वह जो पाश्चात्य ढंग का पहनावा अपनाने के साथ ही विचारधारा भी वैसी रखते हैं। दूसरा वह जो दिखता तो पश्चिमी सभ्यता से रंगा है पर उसकी मानसिकता ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली है। ऐसे नवपश्चात्यवादी उसी तरह ही खतरनाक हो रहे हैं जैसे कि नवधनाढ्य! हम ग्रामीण परिवेश में रहने वाले समाजों के लोगों की बात करें तो उनमें भी कुछ लोग नारियों के प्रति क्रूरता का व्यवहार करते हैं पर वह मारपीट तक ही सीमित होते हैं या हथियार से मारकर एक बार ही दर्द देने वाले होते हैं। जबकि नवपाश्चात्यवादी तेजाब फैंककर या बलात्कार ऐसी सजा स्त्री को देते हैं जो उसकी जिंदगी को मौत से बदतर बना देती हैं। पश्चिमी विचारधारा के विद्वान इस बात को नहीं देखते।
                    दूसरी यह भी बात है कि पाश्चात्य देशों की समशीतोष्ण जलवायु की बनिस्बत एशियाई देशों की ग्रीष्मोष्ण जलवायु के कारण हमारे यहां के लोगों के दिमाग भी अधिक गर्म रहते हैं। ऐसा नहंी है कि पाश्चात्य देशों में स्त्रियों के प्रति अपराध नहीं होते पर वहां तेजाब डालकर असुंदर या अंधा बनाने जैसी घटनाओं की जानकारी नहीं मिलती जबकि हमारे भारत में निरंतर ऐसी घटनायें हो रही हैं। हम स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराधों के कारणों पर नज़र डालें तो ऐसा लगता है कि अब कठोर सजाओं की नहीं बल्कि क्रूर सजाओं की आवश्यकता है।
             हमारे देश में कुछ ऐसे कारण हैं जो देश में महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ा रहे हैं।
           1.कन्या भ्रुण हत्याओं की वजह से लिंग संतुलन बिगड़ा है, जिससे विवाहों के लिये सही वर वधु का चुनाव कठिन होता जा रहा है। जिससे युवाओं को बड़ी उम्र तक अविवाहित रहना पड़ता है। लड़कियों की शादी में दहेज भी एक समस्या है।
           2.ग्रीष्मोष्ण जलवायु के कारण पश्चिम के समशीतोष्ण जलवायु में रहने वालो लोगों की बनिस्बत कामोतेजना यहां के लोगों में ज्यादा है।
           3.कानून का भय किसी को नहीं है। आजीवन कारावास से अपराधियों को कोई परेशानी नहंी है और फांसी मिल जाये तो एक बार में सारा दर्द खत्म हो जाता है। फांसी मिल भी जाये तो पहले तो बरसो लग जाते हैं और मिलने वाली हो तो मानवाधिकार कार्यकर्ता नायक बना देते हैं।
           4.हमारे मनोरंजन के साधन कामोतेजना के साथ ही पुरुष के अंदर पुरुषत्व का अहंकार बढ़ाने तथा नारी को उपभोग्या की मान्यता स्थापित करने वाले प्रकाशन और प्रसारण कर रहे हैं।
                कहने का अभिप्राय यह है कि जिस तरह कुछ नवपाश्चात्यवादी अपने आधुनिक होने के अहंकार तथा घर के बाहर की नारी को उपभोग की वस्तु मानकर चल रहे हैं उनके अंदर भय पैदा करने के लिये ऐसी क्रूर सजाऐं जरूरी हैं। यहां स्पष्ट कर दें कि पश्चिमी विद्वान यह दावा करते हैं कि कठोर सजाओं से अपराध नियंत्रित नहीं होते पर क्रूर सजाओं के बारे में उनकी राय साफ नहीं है हालांकि तब वह मानवाधिकारों की बात कर उसे विषय से भटका देते हैं।
—————
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
5हिन्दी पत्रिका

६.ईपत्रिका
७.दीपक बापू कहिन
८.शब्द पत्रिका
९.जागरण पत्रिका
१०.हिन्दी सरिता पत्रिका  

योग साधना मजाक का विषय नहीं होती-अन्ना हज़ारे के आंदोलन पर विशेष लेख-2 (yoga sadhna mazak ka vishya nahin-special article on anna hazare anti corruption moovment part 2)


अन्ना हजारे के आंदोलन के चलते जनलोकपाल कानून का प्रारूप बनाने वाली समिति मे न्यायविद् पिता पुत्र के शामिल होने पर आपत्ति कर बाबा रामदेव ने गलती की या नहीं कहना कठिन है। इतना तय है कि वह श्रीमद्भागवत गीता का ‘गुण ही गुणों में बरतते हैं’ और ‘इद्रियां ही इंद्रियों में बरतती हैं’ के सिद्धांतों को नहीं समझते। वह दैहिक रूप से बीमार समाज के विकारों को जानते हैं पर मानसिक विकृतियों को नहंी जानते। दरअसल उनका योग लोगों को स्वस्थ रखने तक ही सीमित हो जाता है। उनका मानना है कि स्वस्थ शरीर में ही ही स्वस्थ मन रहता है इसलिये देश के लोग स्वस्थ रहेगा। यह ठीक है पर मन की महिमा भी होती है। भौतिकता में उसे लिप्त रहना भाता है जिससे अंततः विकार पैदा होते हैं। इस मन पर निंयत्रण करने की विधा भी योग में है पर उसके लिये जरूरी है कि योग साधक योग के आठ अंगो को समझे। उसके बाद श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करे। बाबा रामदेव अनेक बाद श्रीगीता के संदेश सुनाते हैं वह अभी ‘गीता सिद्ध’ नहीं बन पाये। यही कारण है कि वह अनेक घटनाओं पर तत्कालिक रूप से अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। कहीं न कहीं प्रचार की भूख में उनके मन के लिप्त होने का प्रमाण है। है। उनको यह मालुम नहीं कि यह देश नारों पर चलता है घोषणाओं पर खुश हो जाता है लोग सतही विषयों बहसों में मनोरंजन करने की आदत को जागरुकता का प्रमाण मान लेते हैं। सच तो यह है कि बाबा रामदेव की सोच भी समाज से आगे नहीं बढ़ पायी है। अन्ना हजारे के आंदोलन से अस्तित्व में आई लोकजनपाल समिति में जनप्रतिनिधियों के नाम पर ‘वंशवाद’ की बात कर बाबा रामदेव ने अपने वैचारिक क्षमताओं के कम होने कप प्रमाण दिया है। इस समिति का पद कोई सुविधा वाला नहीं है न ही इस पर बैठने वाले को कोई नायकत्व की प्राप्ति होने वाली है। फिर सवाल यह है कि इसमें शामिल होने का मतलब क्या कोई सम्मान मिलना है या उसमें जिम्मेदारी निभाने वाली भी कोई बात है। बाबा रामदेव ने पूर्व महिला पुलिस अधिकारी के शामिल न होने पर निराशा जताई पर वह जरा यह भी बता देते कि क्या वह यह मानते हैं कि वह अपनी जिम्मेदार जनता की इच्छा के अनुरूप निभाती क्योंकि उनमें ऐसा सामर्थ्य भी है।

ऐसा लगता है कि बाबा रामदेव प्रचार माध्यमों में रचित ‘रामदेव विरुद्ध हज़ारे’ मैच के खेल में फंस गये। प्रचार माध्यम तो यह चाहते होंगे कि यह मैच लंबा चले। दरअसल बाबा रामदेव और श्री अन्ना हज़ारे एक ही स्वयंसेवी बौद्धिक समूह के संचालित आंदोलन के नायक बन गये जो बहुत समय से देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के लिये जूझ रहा है। पहले वह स्वामी रामदेव को अपने मंच पर ले आया तो अब स्वप्रेरणा से दिल्ली में आये अन्ना हज़ारे के आमरण अनशन शिविर में अपना मंच लेकर ही पहुंच गया। बाबा रामदेव का अभियान एकदम आक्रामक नहीं हो पाया पर अन्ना जी का आमरण अनशन तीव्र सक्रियता वाला साबित हुआ जिससे स्वयंसेवी बौद्धिक समूह को स्वाभाविक रूप से जननेतृत्व करने का अवसर मिला। उसमें कानूनविद भी है और जब कोई बात कानून की होनी है तो उनको बढ़त मिली है इसमें बुरा नहीं है। फिर अगर कानून बनाने वाली समिति में पिता पुत्र हों तो भी उसमें बिना जाने बूझे वंशवाद का दोष देखना अनुचित है। खासतौर से तब जब काम अभी शुरु ही नहीं हुआ है।
अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के व्यक्तित्व में कोई समानता नहीं है। ंअन्ना जी सच्चे समाज सेवक का प्रतीक हैं जिनका अभी तक कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र तक सीमित था। इसके विपरीत बाबा रामदेव का व्यक्त्तिव और कृतित्व विश्व व्यापी है। दोनों एक ही लक्ष्य के लिये एक साथ आये जरूर हैं पर दोनों की भूमिका इतिहास अलग अलग रूप से दर्ज करेगा वह भी तब जब आंदोलन अपनी एतिहासिक भूमिका साबित कर सका।
जब श्री अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आमरण अनशन पर थे तब वह प्रचार माध्यमों में छा गये जिससे उनकी जनता में नायक की छवि बनी। जबकि ऐसी छवि अभी तक अकेले स्वामी रामदेव की थी। ऐसे में उनको लगा कि वह पिछडे रहे हैं। वह अन्ना हजारे के शिविर में भी अंतिम दिन आये। उन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया कि वह इस आंदोलन में अन्ना हजारे के साथ हैं। सच तो यह है कि उनका बयान इस तरह था कि जैसे अन्ना हजारे उनके ही अभियान को आगे बढ़ाने आये हैं। यह इसी कारण लगा कि वहां वही बौद्धिक समूह उपस्थित था जो कि पहले बाबा रामदेव के साथ रहा है।
वैसे अन्ना हजारे बाबा रामदेव से योग न सीखें पर राजनीतिक दृढ़ता के बारे में उनको हजारे जी का अनुकरण करना चाहिए। एक भी बयान चालाकी से नहीं दिया और अपनी निच्छलता से ही योग होने का प्रमाण प्रस्तुत किया। अब तो ऐसा लगने लगा है कि बाबा रामदेव योग से इतर अलग अपनी गतिविधियों में अपनी श्रेष्ठता के प्रचार में फंसने लगे हैं।
बाबा रामदेव को यह बात समझ लेना चाहिए कि अभी भारतीय समाज नारों और घोषणाओं में ही सिमटने का आदी है। ऐसे में एक वाक्य और शब्द का भी कोई दुरुपयोग कर सकता है। अतः जहां तक हो सके अधिक बयानबाजी से बचना चाहिए। आप कहीं पचास वाक्य बोलें पर यहां आदमी एक पंक्ति या शब्द ढूंढेगा जिसको लेकर वह आप भड़क सके।
मान लीजिये आपने यह कहा कि ‘अपने घर में बेकार पड़े पत्थर मै। किसी दिन बाहर सड़क पर फैंक दूंगा।’

ऐसे में आपको बदनाम करने के लिये कोई भी आदमी बाहर कहता फिरेगा कि वह कह रहे हैं कि‘ मैं पत्थर किसी सड़क पर फैंक दूंगा। अब आप बताओ किसी को लग गया तो, कोई घायल हो गया तो, चलो उसके घर पर प्रदर्शन करते हैं।’
यहां अनेक बुद्धिजीवियों और प्रचारकों ने इस झूठे प्रचार में महारत हासिल कर रखा है। दरअसल भ्रष्टाचार देश के समाज में घुस गया है। यही कारण है कि यथास्थिति सुविधाभोगी जीव इस आंदोलन से आतंकित है। ऐसे में वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनकारियों के नेतृत्व के शब्दों और वाक्यों का अपनी सुविधा से इस्तेमाल कर सकते हैं। श्री अन्ना हजारे के समर्थकों को अभी यह अंदाजा नहीं है कि उनका अभी कैसे कैसे वीरों से सामना होना है जो यथास्थितिवादियों के समर्थक या किराये पर लाये जायेंगे। एक बात तय रही है कि यह घटना सामान्य लगती है पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोर्चा लेने वाले अग्रिम पंक्ति के सभी बड़े लोगों को यह बात समझना चाहिए कि यह उन लोगों की तरफ से भी प्रतिरोध होगा जो यथास्थितिवादी हैं।
बाबा रामदेव ने गलती की तो न्यायविद् पिता पुत्र भी पीछे नहीं रहे। कानून का प्रारूप बनाना योग सिखाने से अधिक कठिन है। विशुरु रूप से मजाकिया वाक्य है भले ही गंभीरता से कहा गया है। बात वहीं आकर पहुंचती है कि योग पर वही लोग अधिक बोलते हैं जिनको इसका ज्ञान नहीं है। कानून बनाना कठिन काम हो सकता है पर अपने देश में इतने सारे कानून बनते रहे हैं। कुछ हटते भी रहे हैं। मतलब कानून बनाने वाले बहुत हैं पर योग सिखाने वाले बहुत कम हैं। बाबा रामदेव जैसे तो विरले ही हैं। भ्रंष्टाचार विरोधी आंदोलन का योग से कोई वास्ता नहीं है। अगर आप बाबा रामदेव पर योग का नाम लेकर प्रहार करेंगे तो तय मानिए इस देश में योग साधकों का एक बहुत बड़ा वर्ग आप पर हंसेगा और बनी बनाई छवि मिट्टी में मिलते देर नहीं लगेगी। अभी भारतीय योग साधना का प्रचार अधिक हो रहा है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि टीवी पर योगासन और प्राणायाम देख सुनकर उसके बारे में पारंगत होने का दावा कर लें। अगर कोई सच्चा योगी है तो उसके लिये कानून बनाना किसी न्यायविद् से भी ज्यादा आसान है क्योंकि आष्टांग योग के साधक वैचारिक योग में भी बहुत माहिर हो जाते हैं। न्यायविद् तात्कालिक हालत देखकर कानून बनाता है और योगी भविष्य का भी विचार कर लेता है। इसका प्रमाण यह है कि योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने आज से हजारों वर्ष पूर्व श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान दिया था वह आज भी प्रासंगिक लगता है।

बहरहाल बाबा रामदेव ने श्री अन्ना हजारे का सम्मान करते हुए अनेक बातें कही हैं तो श्री अन्ना हजारे ने भी निच्छलता से स्वामी रामदेव के बारे के प्रति अपना विश्वास दोहराया है। यह अच्छी बात है। हम जैसा आम आदमी और फोकटिया लेखक दोनों महानुभावों के कृत्यों पर अपनी दृष्टि जिज्ञासावश रखता है तब यह जानने की उत्सुकता बढ़ती जाती है कि आखिर समाज में बदलाव की चल रही मुहिम कैसे आगे बढ़ रही है।
चलते चलते
————————-
चलते चलते एक बात! पता नहीं यह बात इस विषय से संबंधित है कि नहीं! एक योगसाधक के रूप में हम यह दावा कर सकते हैं कि योग साधना मजाक  का विषय नहीं है। टीवी पर चल रहे एक कामेडी कार्यक्रम में इस पर फब्तियां कसी गयीं। यह देखकर यह विचार आया। हमें भी हंसी आई पर कामेडियनों पर नहीं बल्कि उन पटकथा लेखकों पर जो बिचारे अपनी व्यवसायिक बाध्यताओं की वजह से ऐसा लिखते हैं। हमारे लिए  वह अपने अज्ञान की वजह से दया के पात्र हैं क्रोध का नहीं।

——————

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका

बाबा रामदेव समाज में चेतना लाये बिना सफल नहीं हो सकते-हिन्दी लेख (baba ramdev,bharshtachar aur samajik chetna-hindi lekh


भ्रष्टाचार के विरुद्ध स्वामी रामदेव का अभियान अब देश में चर्चा का विषय बन चुका है। बाबा रामदेव अब खुलकर अपने योग मंच का उपयोग भ्रष्टाचार तथा काले धन के विरुद्ध शब्द योद्धा की तरह कर रहे हैं। हम यह भी देख रहे हैं कि देश की हर समस्या की जड़ में भ्रष्टाचार को जानने वाले जागरुक लोग बाबा रामदेव की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। कुछ लोगों को तसल्ली हो गयी है कि अब कोई नया अवतार उनके उद्धार के लिये आ गया है। हम यहां बाबा रामदेव की अभियान पर कोई विपरीत टिप्पणी नहीं कर रहे क्योंकि यह अब एक राजनीतिक विषय बन चुका है और वह अपना राजनीतिक दल बनाने की घोषणा भी कर चुके हैं। हां, यह सवाल पूछ रहे हैं कि अगर देश की दुर्दशा के लिये भ्रष्टाचार जिम्मेदार हैं तो फिर भ्रष्टाचार के लिये कौन जिम्मेदार हैं? क्या इसकी पहचान कर ली गयी है?
एक बात यहां हम बता दें कि यह लेखक निजी रूप से बाबा रामदेव को नहीं जानता पर टीवी पर उनकी योग शिक्षा की सराहना करता है और उनके वक्तव्यों को समझने का प्रयास भी करता है। दूसरी बात यह भी बता दें कि श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का अध्ययन भी किया है और उनके परिप्रेक्ष्य में बाबा की सभी प्रकार की गतिविधियों को देखने का प्रयास यह लेखक करता है। बाबा रामदेव अब आक्रामक ढंग से राष्ट्रधर्म के निर्वाह के लिये तत्पर दिखते हैं, यह अच्छी बात है पर एक बात यह भी समझना चाहिए कि राजनीतिक क्रांतियां तो विश्व के अनेक देशों में समय समय पर होती रही हैं पर वहां के समाजों को इसका क्या परिणाम मिला इसकी व्यापक चर्चा कोई नहंी करता। इसका कारण यह है कि राष्ट्रधर्म निर्वाह करने वाले लोग अपने देश की समस्याओं का मूल रूप नहीं समझतें।
भारत में भ्रष्टाचार समस्या नहीं बल्कि अनेक प्रकार की सामाजिक, धार्मिक तथा पारिवारिक रूढ़िवादी परंपराओं की वजह से आम आदमी में दूसरे से अधिक धन कमाकर खर्च कर समाज में सम्मान पाने की इच्छा का परिणाम है।
बाबा रामदेव बाबा समाज के शिखर पुरुषों को ही इसके लिये जिम्मेदार मानते हैं पर सच यह है कि इस देश में ईमानदार वही है जिसे बेईमान होने का अवसर नहीं मिलता।
भारत का अध्यात्मिक ज्ञान विश्व में शायद इसलिये ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि सर्वाधिक मूढ़ता यही पाई जाती है जिसे हम भोलेपन और सादगी कहकर आत्ममुग्ध भी हो सकते हैं। हमारे ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों ने समाज के इसी चरित्र की कमियों को देखते हुए सत्य की खोज करते हुए तत्वज्ञान का सृजन किया। शादी, गमी, जन्मदिन और अन्य तरह के सामूहिक कार्यक्रमों में खर्च करते हुए सामान्य लोग फूले नहीं समाते। लोगों को यही नहीं मालुम कि अच्छा क्या है और बुरा क्या है? भ्रष्टाचार को समाज ने एक तरह से शिष्टाचार मान लिया है? क्या आपने कभी सुना है कि किसी रिश्वत लेने वाले अधिकारी याद कर्मचारी को उसके मित्र या परिचित सामने रिश्वतखोर कहने का साहस कर पाते हैं। इतना ही नहीं सभी जानते हैं कि अमुक आदमी रिश्वत लेता है पर उसकी दावतों में लोग खुशी से जाते हैं। समाज में चेतना नाम की भी नहीं है। इसका सीधा मतलब यह कि समाज स्वयं कुछ नहीं करता बल्कि किसी के रिश्वत में पकड़े जाने पर वाह वाह करता है। उसकी जमकर सामूहिक निंदा होती है और इसमें वह लोग भी शामिल होते हैं जो बेईमान हैं पर पकड़े नहीं गये। आज यह स्थिति यह है कि जो पकड़ा गया वही चोर है वरना तो सभी ईमानदार हैं।
आखिर यह भ्रष्टाचार पनपा कैसे? आप यकीन नहीं करेंगे कि अगर देश के सभी बड़े शहरों में अतिक्रमण विरोधी अभियान चल जाये तो पता लगेगा कि वहां चमकती हुए अनेक इमारतें ही खंडहर बन जायेंगी। नई नई कालोनियों में शायद ही कोई ऐसा मकान मिले जो अतिक्रमण न मिले। सभी लोग अपने सामर्थ्य अनुसार भूखंड लेते हैं पर जब मकान बनता है तो इस प्रयास में लग जाते हैं कि उसका विस्तार कैसे हो। पहली मंजिल पर अपनी छत बाहर इस उद्देश्य से निकाल देते हैं कि ऊपर अच्छी जगह मिल जायेगी। बड़े बड़े भूखंड है पर चार पांच फुट उनको अधिक चाहिये वह भी मुफ्त में। यह मुफ्त का मोह कालांतर में भ्रष्टाचार का कारण बनता है। जितना भूखंड है उसमें अगर चैन से रहा जाये तो भी बहुत उन लोगों के लिये बड़ा है पर मन है कि मानता नहीं।
विवाह नाम की परंपरा तो भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा कारण है। बेटे को दुधारु बैल समझकर ं हर परिवार चाहता है कि उसके लिये अच्छा दहेज मिले। लड़की को बेचारी गऊ मानकर उसे धन देकर घर से धकेला जाता है। शादी के अवसर पर शराब आदि का सेवन अब परंपरा बन गयी है। स्थिति यह है कि अधिक से अधिक दिखावा करना, पाखंड करते हुंए धार्मिक कार्यक्रम करना और दूसरों से अधिक धनी दिखने के मोह ने पूरे समाज को अंधा कर दिया है। बाबा रामदेव ने स्वयं ही एक बार बताया था कि जब तक मुफ्त में योग सिखाते थे तब कम संख्या में लोग आते थे। जब धन लेना शुरु किया तो उनके शिष्य और लोकप्रियता दोनों ही गुणात्मक रूप से बढ़े। सीधी सी बात है कि समाज पैसा खर्च करने और कमाने वाले पर ही विश्वास करता है। अज्ञान में भटकते इस समाज को संभालने का काम संत इतिहास में करते रहे हैं पर आज तो पंच सितारे आश्रमों में प्रवचन और दीक्षा का कार्यक्रम होता है। आज भी कोई ऐसा प्रसिद्ध संत कोई बता दे जो कबीर दास और रविदास की तरह फक्कड़ हो तो मान जायें। हम यहां बाबा रामदेव की संपत्ति का मामला नहीं उठाना चाहते पर पतंजलि योग पीठ की भव्यता उनसे जुड़े लोगों की वजह से है यह तो वह भी मानते हैं। हम यहां स्पष्ट करना चाहेंगे कि पतंजलि योग पीठ की भव्य इमारत वह नहीं बनाते तो भी उनका सम्मान आम आदमी में कम नहीं होता। जिस तरह धन आने पर उन्होंने भव्य आश्रम बनाया वैसे ही देश के दूसरी धनी भी यही करते हैं। वह सड़क पर फुटपाथ पर कब्जा कर लेते हैं। फिर उससे ऊपर आगे अपनी इमारत ले जाकर सड़के के मध्य तक पहुंच जाते हैं। धन आने पर अनेक लोगों की मति इतनी भ्रष्ट हो जाती है कि उनको पता ही नहीं चलता कि अतिक्रमण होता क्या है? जमीन से ऊपर उठे तो उनको लगता है कि आकाश तो भगवान की देन है।
मुख्य बात यह है कि अंततः धन माया का रूप है जो अपना खेल दिखाती है। इसके लिये जरूरी था कि धार्मिक संत सामाजिक चेतना का रथ निरंतर चलाते रहें पर हुआ यह कि संतों के चोले व्यापारियों ने पहन लिये और अपने महलों और होटलों को आश्रम का नाम दे दिया। बाबा रामदेव पर अधिक टिप्पणियां करने का हमारा इरादा नहीं है पर यह बता दें कि जब तक समाज में चेतना नहीं होगी तब भ्रष्टाचार नहीं मिट सकता। एक जायेगा दूसरा आयेगा। मायावी लोगों का समूह ताकतवर है और उसे अपना व्यापार चलाने और बढ़ाने के लिये बाबा रामदेव को भी मुखौटा बनाने में झिझक नहीं होगी। अगर समाज स्वयं जागरुक नहीं है तो फिर कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता। यह तभी संभव है कि योग शिक्षा के साथ अध्यात्मिक ज्ञान भी हो। बाबा रामदेव जब अपने विषय में की गयी प्रतिकूल टिप्पणियों को उत्तेजित होकर बयान दे रहे थे तब वह एक तत्वज्ञानी योगी नहीं लगे। उनके चेहरे पर जो भाव थे वह उनके मन की असहजता को प्रदर्शित कर रहे थे। हम यह नहीं कहते कि उत्तेजित होना अज्ञान का प्रमाण है पर कम से उनका स्थिरप्रज्ञ न होना तो दिखता ही है। वह केवल शिखर पुरुषों को कोसते हैं और समाज में व्याप्त मूढ़तापूर्ण स्थिति पर कुछ नहीं कहते। ऐसे में उनसे यह अपेक्षा भी की जा सकती है कि वह समाज को अपने अंदर की व्यवस्था के बारे में मार्गदर्शन दें।
—————
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
5हिन्दी पत्रिका

६.ईपत्रिका
७.दीपक बापू कहिन
८.शब्द पत्रिका
९.जागरण पत्रिका
१०.हिन्दी सरिता पत्रिका  

जब गुस्से में आयें तब नया मॉडल लायें-हिन्दी हास्य व्यंग्य (cricket mein gussa fixing-hindi hasya vyangya)


आस्ट्रेलिया का कप्तान विश्व कप क्रिकेट कप प्रतियोगिता में जिम्बाब्बे के साथ खेले गये मैच में रनआउट हो गया। यह खबर खास न होती अगर रनआउट होने से खफा उस कप्तान ने अपने डेªसिंग रूप में आकर टीवी को अपना बल्ला न दे मारा होता। टीवी टूटा कि उसका कांच पता नहीं। मगर बताया गया कि टीवी टूट गया।
बिचारा कप्तान क्या करता? जब वह रनआउट होकर आया होगा तो उसने उसका रिप्ले यानि दृश्य का पुर्नःप्रसारण वहां देखा होगा। वह तो मैदान से ही गालियां बकता आया था इसलिये उसके साथियों को टीवी बंद कर देना चाहिए था। ऐसा उन्होंने नहीं किया। वैसे आस्ट्रेलिया के कप्तान का गुस्सा किस बात पर उतरा होगा? क्या वाकई अपने आउट होने के दृश्य के पुर्नप्रसारण पर या फिर उसमें कोई ऐसा विज्ञापन आ रहा था जिसमें अनफिट टीम इंडिया यानि बीसीसीआई के खिलाड़ियों ने काम कर जमकर पैसा कमाया है। बीसीसीआई की टीम में अनेक खिलाड़ी अनफिट हैं ऐसा समाचार आ रहा है पर उनके विज्ञापन के धंधे पर उसका कोई असर नहीं है। ऐसा लगता है कि अनेक खिलाड़ी अनफिट थे और उनको वरदहस्त प्रदान करने वाले आर्थिक शिखर पुरुषों ने अपने विज्ञापनों की इज्जत के लिये टीम में शामिल करवाया। वैसे भी भारतीय खिलाड़ियों को फिटनेस की चिंता नहीं है। उनक ध्येय बस टीम में बने रहना है। उनके आकाओं को भी इसकी चिंता नहीं है क्योंकि उनको पैसा कमाना है।
धनपतियों के प्रबंधक अनफिट खिलाड़ियों को भी नायक बना देते हैं। उससे भी नहीं मन भरता तो भगवान बना देतें हैं। इससे भी काम नहीं बनता तो भगवान को ही भारत रत्न देने की मांग करते हैं। पता लगा कि क्रिकेट का भारतीय भगवान भी अनफिट है पर यह बात अभी दबी हुई है। इस पर प्रचार माध्यम चर्चा तब करेंगे जब विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता निपट जायेगी। मतलब भारत के कुछ कथित क्रिकेट भक्त जब अपना धन और आंखों के साथ ही शारीरिक और मानसिक रूप से फिटनेस कुर्बान कर चुके होंगे और तब वह आंसु बहायेंगे कि क्यों इस तरह अपना समय गंवाया। तब तक यही प्रचार माध्यम काफी धन कमा चुके होंगे।
आस्ट्रेलिया ही नहीं विश्व के अनेक खिलाड़ी इस बात से नाराज हैं कि वह बीसीसीआई की टीम के खिलाड़ियों से अधिक फिट और दमदार हैं पर उनकी कमाई उनसे कहीं बहुत कम है। वह जीतते हैं पर इनाम की राशि से उनका घर वैसा नहीं सजता जैसा टीम इंडिया के खिलाड़ियों का महल बन जाता है। अब उनको कौन समझाये कि उनके देश देश छोटे हैं जबकि भारत बहुत बड़ी जनसंख्या वाला देश है इसलिये उनकी जीत से अधिक बीसीसीआई की टीम पा दांव ज्यादा लगता है। ऐसे में उनको ऐसी अपेक्षा नहीं करना चाहिये-खासतौर से जब ऐसा भी सुनने को मिलता है कि अनेक बार ऐसा अवसर आता है कि जीतने में कम तथा हारने पर अधिक धन मिलने की आशा में खिलाड़ी जीजान से हारने पर ही आमादा हो जाते हैं।
बात आस्ट्रेलिया कप्तान के गुस्से की है और हम मानते हैं कि यह भी फिक्स रहा होगा। जिस तरह फिक्सिंग का भूत क्रिकेट के पीछे पड़ा है उसे देखकर अब कुछ भी संयोग या दुर्योग नहीं लगता। इसलिये इस गुस्से में कहीं न कहीं फिक्सिंग की सुगंध आ रही है-यही लिखना पड़ रहा है क्योंकि लोग अब लोग खुशबु और बदबू का मतलब ही नहीं जानते।
आखिर यह शक क्यों हुआ? इसलिये कि आजकल विश्व में मंदी चल रही है। भारत इससे बचा हुआ है पर इसके बावजूद इलैक्ट्रोनिक्स क्षेत्र में अब मांग वैसी नहीं है जैसी पहले थी। टीवी और एलसीडी की मांग सीमित है। वजह यह कि अब अधिकतर लोग सामान खरीद चुके हैं और महंगाई के इस युग में शादी में देने के लिये आदमी टीवी या एलसीडी खरीदता है या फिर अपना टीवी बिल्कुल बर्बाद हो जाये तब अपनी जेब ढीली करता है। आस्ट्रेलिया के कप्तान के पास कोई बड़ा विज्ञापन नहीं है कि जिससे यह लगे कि वह भारत के चौदहवें नंबर के खिलाड़ी के मुकाबले भी कमाता होगा। यह संख्या भी हम डरते डरते लिख रहे हैं जबकि संभव यह भी है कि संख्या पचास से ऊपर हो। ऐसे में टीवी और एलसीडी उत्पादों से जुड़े मध्यस्थों ने उसे फिक्स किया होगा। कहा होगा कि ‘गुस्से में टीवी तोड़ने का फैशन चलाने का प्रयास करो, अगर सफल रहा तो तुम्हें विज्ञापन दिलवायेंगे।’
वैसे जिस तरह बीसीसीआई की टीम की फिटनेस है और आगे के मैचों के उसके खेल के जो आसार दिख रहे हैं उससे तो लगता है कि भारत के कथित क्रिकेट भक्त भी इतना गुस्सा झेलेंगे। तब वह अपना सिर फोड़ें या बाल नौंचें इससे अच्छा है कि वह कोई चीज तोड़ने का विचार करें-यही इस दृश्य फिक्स करने का मतलब लगता है। हमारा देश बड़ा है और क्रिकेट देखने वाले ज्ञानी भी कम नहीं है और कथित देशप्रेम के जज़्बात पर बुरे खेल का प्रहार होगा तो उनका गुस्सा भड़केगा। यह गुस्सा व्यर्थ नहीं जायेगा, इसलिये वह चीजें तोड़ने का फैशन अपना सकते हैं, खासतौर से जब वह किसी गौरवर्ण व्यक्ति ने अपनाया हो-इससे बाज़ार का मतलब सिद्ध हो जायेगा। टीवी या एलसीडी टूट जायेगा तो फिर दूसरा खरीदना पड़ेगा। इतने बड़े देश में कितने लोगों को गुस्सा आयेगा यह पता नहीं क्योंकि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के तंतु भी देश में जिंदा हैं। जीत में लोग अपने पौरुष का जश्न मनाते हैं तो हार में लोग हरिनाम लेने लगते हैं। मगर बाज़ार के प्रचार प्रबंधक तो नित नये नुस्खे निकालते ही रहते हैं। अगर टीवी और एलसीडी टूटने की घटनायें बाज़ार में गुणात्मक रूप से व्यापर बढ़ा तो आस्ट्रेलियाई कप्तान को टीवी और एलसीडी के बहुत सारे विज्ञापन मिल सकते हैं। उसमें वह जुबां हिलाता नज़र आयेगा। डायलाग अपने ही देश के सुपर स्टार की आवाज में हो सकता है।
‘‘ऐ, जब भी गुस्सा आये टीवी या एलसीडी तोड़ डालो, इससे मन शांत भी हो जायेगा और घर में नया माडल आ जायेगा नया माडल यानि……………..जब भी गुस्सा आये तब………………नया माडल लायें।’
सच बात तो यह है कि अब तो कई घटनायें इस तरह फिक्स लगती हैं कि काल्पनिक व्यंग्य लिखना बेकार लगता है। अनेक बार तो हंसी छूट जाती है। वैसे जिस तरह देश का मनोरंजन क्षेत्र जिस तरह हास्य व्यंग्य के कार्यक्रम पेश करता है उससे तो यही लगता है कि वह समाचार बनाने के लिये ऐसी घटनायें भी कराता है।
————
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
http://dpkraj.wordpress.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका