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ख्वाबों का व्यापार-हिंदी शायरी


सूरज की रौशनी लेकर
चमकता हुआ पत्थरों का पहाड़ चांद
गीतों और गजलों में
नायक बन गया,
किसी ने साजन का चेहरा
चांद जैसा माना,
किसी ने सजनी जैसा
खूबसूरत माना,
जिसने लफ्जों को दिया सुर
वह गायक बन गया।
कहें दीपक बापू
ख्वाबों का देखना बुरा नहीं है
मुश्किल यह है कि
दहलाने वाली हकीकतें भी खड़ी वहीं हैं,

बाज़ार में बिकते है सपने

सौदागरों के हाथ में आ गये दिल अपने,
बहलाने के लिये कभी कपड़े बदले जाते,
कहीं पुराने पुतले हटते ही अगले आते
ख्वाबों में होती नये ज़माने की सजावट
जिंदगी के अमिट सच में कुछ नया नहीं है।

————————————————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप

ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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कैमरे पर यकीन-हिंदी व्यंग्य


       यह तो एक माना हुआ सत्य है कि कैमरा किसी भी वस्तु, व्यक्ति या दृश्य की सुंदरता को बयान कर सकता है पर वह आंतरिक खूबसूरती वह नहीं देख पाता।  अनेक बार इंटरनेट पर ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं जिनमें कोई वस्तु, प्राकृतिक दृश्य या व्यक्ति का आकर्षण देखते ही बनता है।  खासतौर से जिन कैमरों के पास कृत्रिम रोशनी है वह चेहरे को गुलाबी बना देते हैं।  हमने देखा है कि अनेक वस्तुओं, व्यक्तियों या प्रकृतिक दृश्यों की खूबसूरती तस्वीर में दिखती हे पर वास्तविकता में निकट जाने पर वैसा अहसास नहीं रहता।  कहते हैं कि कैमरा धोखा नहीं खाता पर वह देता है यह बात तय है।

हमने अपने शहर के एक चौराहे का फोटो देखा। बहुत खूबसूरत दिखता है पर जब वहां जाते हैं तो वह अहसास नहीं रहता।  इसका कारण यह है कि कैमरे पर दिख रहे फोटो में केवल आंख काम कर रही होती है जबकि उस चौराहे पर खड़े होने पर हमारे कान, नाक तथा पांव भी सक्रिय रहते हैं।  नाक में वाहनों से निकल रहा धुंआं, कानों में पों पों का गरजता स्वर और भीड़ में अपनी जगह तलाश रहे पांव दिमाग के लिये तनाव का कारण बनते हैं।  उस समय वहां का दृश्य कोई सौंदर्य पैदा करता नज़र नहीं आता। तब लगता है कि किसी तरह अपना काम हो तो वहां से चलते बने।

दूर की बात क्या करें? पास में ही ताजमहल है।  अनेक मौसमों में जाने का अवसर मिला है।  कभी गर्मी में गये तो कभी बरसात में कभी सर्दी में वहां जाकर दृश्य निहारा।  गर्मी में हवायें अपना रौद्र रूप दिखाते हुए शरीर को हिला देती हैं।  बरसात में नमी से शरीर में निकलता पसीना सांस लेना दूभर कर देता है।  सर्दी में जरूर राहत मिलती है पर चिंता इस बात की रहती है कि रात होते होते शरीर सर्दी हो जायेगी और हम अपने सुरक्षित स्थान की तरफ निकल पड़ते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि पर्यावरण प्रदूषण से वहां पीले होते ताजमहल को देखकर यह लगता है कि इससे तो इसकी तस्वीर ही अच्छी थी।

तस्वीरें सच बोलती हैं पर उसके दृश्य वास्तविकता निकट होने पर वैसा ही आनंद दे पायेंगे इस पर यकीन करना कठिन है।

फिल्मों में अनेक सुंदरियां देश के युवा जनमानस पर राज कर रही हैं।  उस दिन एक चैनल ने बिना मेकअप की यही सुंदरियां दिखाईं।  हैरानी की बात है कि इनमें से एक को भी पहचानना कठिन हो रहा था।  अनेक पुरानी नायिकायें जब पर्दे पर भूले भटके दिखती हैं तब उन्हें पहचानने के लिये अपने चक्षुओं को भारी कष्ट देना पड़ता है। उनके सौंदर्य पर पुराना यकीन जब टूटताा तो दिल अकेला ही खड़ा होकर कांपता दिखता है।

अरे साहब, हम दूसरों की क्या बात करें? अपना हाल भी ऐसा ही कुछ है।  फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग पर हमने टोपी पहने फोटो प्रकाशित कर रखें हैं।  उनमें अपनी सूरत देखकर खूशी होती है पर सच्चाई हम जानते हैं।  कभी कभी आइने में गौर से शक्ल देखते हैं तो मन में भारी निराशा होती है।  तब मोबाईल में अपना फोटो देखकर तसल्ली करते हैं कि हमारा चेहरा इतना बुरा भी नहीं है।  उस दिन एक पत्रिका के संपादक ने ईमेल कर हमारा फोटा मांगा। हमने लिख कर भेजा कि अभी तत्काल रूप से कोई फोटो तो उपलब्ध नहीं है और जब उसे कंप्युटर पर लायेंगे तो भेज देंगे।  वैसे भी हमारा बचपन से एक ही ख्वाब रहा है कि लोग भले ही लेखन की वजह से हमारा नाम पहचाने पर चेहरा न देखें तो ठीक ही है।  चेहरा इतना बुरा नहीं है पर वह किसी को सौंदर्य बोध भी नहीं कराता।

कैमरे के साथ कैमरामेन की कलाकारी भी होती है।  यही कारण है कि फिल्मों और टीवी चैनलों पर दिखने वाली अनेक सामग्रियों में जवान लोग बूढ़े का पात्र निभाते हैं। चेहरे पर एक भी झुर्री नहीं होती बस थोड़े बहुत बाल काले रंग से रंगे होते हैं।  महिला पात्रों की स्थिति तो अधिक दिलचस्प होती है।  फिल्म और धारावाहिकों में परदादी तक का पात्र निभाने वाली महिला पात्रों के बाल काले होते हैं।  आखिर हमें कैमरे पर इतनी बातें लिखने का विचार कैसे आया?  दरअसल हमने अपने मोबाइल से अपनी एक पुरानी टेबल का फोटो खींचा।  उस पर कुछ लिखना तो दूर कागज रखना भी हम जैसे महान लेखक के लिये अपमानजनक है।  फोटो में दूर से वह टेबल इतनी आकर्षित लग रही थी कि लिखा जाये तो बस इसी टेबल पर!  कभी हम उस टेबल की तरफ देखते तो कभी मोबाइल में उसकी फोटो पर!  तब मन में यह विचार आया कि कैमरा धोखा नहीं खाता पर देता तो है!

 लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप

ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

 

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धनपति में दान और गरीब में संकट सहने की शक्ति होना चाहिए-हिन्दू धर्मं दर्शन


                  फिल्म और टीवी धारावाहिकों पर अनेक तरह के ऐसे कार्यक्रम प्रसारित होते हैं जिनकी कहानियों का कोई सिर पैर नहीं होता। स्थिति यह है कि टीवी में धनाढ्य वर्ग की पृष्ठभूमि पर आधारित कार्यक्रमों में उनके सानिध्य में पल रहे नौकर पात्रों की वेशभूषा भी अत्यंत महंगी होती है। कई बार तो ऐसा होता है कि किसी पात्र को अपनी जिंदगी से परेशान हाल दिखाया जाता है पर उसके हर पल बदलते कपड़े इस बात को प्रमाणित नहीं करते कि वह वाकई परेशान हाल समाज का प्रतिबिंब है। यह अलग बात है कि यह सब दिखाने वाले साहित्य को समाज का दर्पण बताते हुए अपनी कहानियों के प्रमाणिक होने का दावा करते हैं। हमारे देश के अनेक अभिनेता गरीब से उठकर अमीर बनने की कहानियों को अपने नायकत्व से सुसज्जित कर महानायक बन गये हैं। अनेक तो शताब्दी के नायक और महानायक की छवि बना चुके हैं। मगर यह सब कल्पित कहानियों के पात्र हैं। उनमें समाज की सत्यता देखना स्वयं को तकलीफ देना है।
          समाज का सच यह है कि हमारे यहां जड़तावाद फैला है। वंशवाद इस तरह बढ़ा है कि कोई विरला ही होता है जो अपने बल, पराक्रम तथा कौशल से शून्य से शिखर पर पहुंचता है। चाटुकारिता की वजह से बस इतनी सफलता मिलती है कि शिखर पुरुष की चरणवंदना करते हुए समाज देख सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि हम प्रचार माध्यमों में जिस तरह का वातावरण देखते हैं वह प्रायोजित है और आम इंसान का ध्यान बंटाने के लिये है जिससे वह विद्रोह की प्रवृत्तियों से दूर रहे और समाज यथारूप से स्थित रहे। भौतिक परिवर्तन आयें पर उससे शिखर पुरुषों के परिवार की रक्षा होती रहे।
               विदुर नीति में कहा गया है कि
               ————–
              द्वाविमौ कपटकी तीक्ष्णौ शरीरपरिशोधिणौ।
                 यश्चाधनः कामयते यश्च कुप्यस्यनीश्वरः।।
              ‘‘गरीब मनुष्य जब अपने पास उपलब्ध धन से अधिक मूल्यवान वस्तु की कामना करता है और अस्वस्थ या कमजोर होने पर क्रोध की शरण लेता है तब वह अपने ही शरीर को सुखाने का काम करता है।’’
               द्वावम्भसि निचेष्टच्यौ गलै बध्वा दृढां शिलाम्।
            धनवन्तमदातारं दरिद्र चापस्विनम्।।
          ‘‘मनुष्य धन होने पर दान न करे और गरीब होने पर कष्ट सहन न कर सके उसे गले में पत्थर मजबूत पत्थर बांधकर पानी में डुबा देना चाहिए।’’
           इसलिये जहां तक हो सके मनोरंजन के लिये बने इस तरह के कार्यक्रम देखें पर उनको दिल और दिमाग में इस तरह न स्थापित होने दें कि पूरा समय कल्पना में खोकर अपना जीवन नष्ट कर डालें। मूल बात यह है कि हमें अपने चरित्र पर दृढ़ रहना चाहिए। अपने अंदर यह आत्मविश्वास होना चाहिए कि जैसी भी स्थिति हमारे सामने आयेगी उससे निपट लेंगे। यह दुनियां पल पल रंग बदलती है और अगर कभी भूख है तो कभी रोटी का अंबार भी लग सकता है। कभी प्यास है तो सामने शीतल जल का तालाब भी आ सकता है। इसलिये छल, कपट या चाटुकारिता से सफलता प्राप्त कर अपने लिये संकट को आमंत्रण नहीं देना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

मनु स्मृति से सन्देश-नारियों को सताने वालों को कठोर दंड दें


                 भारतीय प्रचार माध्यमों को संवेदनशील मामलों में अक्सर तालिबान का महत्व देने की आदत है। जब कहीं देश में कहीं स्त्रियों के साथ बलात्कार, मारपीट या अन्य घटना होती है तब हमारे प्रचार माध्यम तालिबानी प्रकार की सजा देने की मांग करते हुए अनेक लोगों को दिखाकर अपने संवेदनशील होने का प्रमाणपत्र जुटाते हैं। उद्घोषक कहते हैं कि ‘‘आपका मतलब है कि तालिबानी तरह की सजा देना चाहिये।’
          यह इस बात का प्रमाण है कि हमारे अध्यात्म ग्रंथों तथा दार्शनिक स्मृतियों का ज्ञान हमारे कथित बुद्धिजीवियों ने भुला दिया है।  जब समाज में कठोरता पूर्वक शासन करने की बात आती है तो उनको हिटलर, मुसोलनी और चीन जैसे तानाशाह महान दिखते हैं या वह फिर तालिबान के तौरतरीकों में वह शांति ढूंढते हैं।  इन लोगों को यह पता नहीं है कि जिन तालिबानों की वह बात करते हैं उनका प्रचार शायद कुछ भी हो वह उल्टे पीड़ित महिलाओं को ही दंड देते हैं।  ऐसे अनेक समाचार आते रहते हैं। देश के वह बुद्धिजीवी जो अब तक अखबारों और टीवी चैनलों पर स्त्रियों के प्रति अपराध पर कठोर सजा देने के लिये रोये जाते हैं वह भारतीय अध्यात्म ग्रंथों से बहुत दूर हैं।  उनको यह मालुम नहीं है कि न्याय और दंड के जो विधान हमारी प्राचीन राज्य

प्रणालियों  में रहे हैं वह इतने कठोर हैं कि मनुष्य अपराध करने की सोच भी नहीं सकता।  दरअसल अंग्रेज यहां से चले गये पर अपनी संस्कृति और शिक्षा इस तरह इस देश में छोड़ गये कि उनके  अनुज ही अब हमारे सिर पर सवार हो गये हैं। उनके यह अनुज भारत के भूतकाल को केवल भूतों और सांपों से संपन्न मानते हैं और विदेशी अखबारों और टीवी चैनलों से प्रेरणा लेकर देश के भौतिक विकास का अद्भुत सपना देखते हैं।  जबकि सच्चाई यह है कि हमारे देश की प्रबंध व्यवस्था में छिद्रो की वजह से समाज का वातावरण बिगड़ा है। ऐसा नहीं है कि कानून में कोई कमी है पर उनको लागू करने वाली संस्थाओं की कार्यप्रणाली में प्रबंधकीय दोष हैं जिनकी वजह से हालत बदतर होते गये हैं।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

योऽकामां दूषयेत्कन्यां स सद्यो वधमर्हति।

सकामां दूष्येस्तुल्यो न वधं प्रापनुयान्नरः।।

                हिन्दी में भावार्थ-अगर कोई मनुष्य किसी कन्या से उसकी इच्छा के विपरीत बलात् संभोग करता है तो उसे तत्काल मृत्युदंड दिया जाना चाहिए। अगर कोई कन्या की इच्छा से संभोग करता है तो भी उसे मृत्यु दंड न देकर कोई दूसरा दंड अवश्य देना चाहिए।

सकामा्र दूष्येस्तुल्यो नांगुलिच्छेदमाप्नुयात्।

द्विशतं तु दमं दाप्यः प्रेसङ्गविनिवृत्तये।।

               हिन्दी में भावार्थ-यदि कोई मनुष्य स्त्री की इच्छा होने पर भी उससे संभोग करता है तो उसे भी दंडित करना चाहिए।

स्त्रियां स्पृशेद्देशे यः स्पृष्टो वा मर्थयेन्तथा।

परस्परस्यानृमते सर्व संग्रहणं स्मृतम्।।

                         हिन्दी में भावार्थ-दूसरे की स्त्री के अंगों को छूने का सुख उठाना भी  एक तरह से अपराध है।

     हमारे देश में कथित आर्थिक उदारीकरण के चलते जहां समाज का बाह्य रूप अत्यंत आकर्षक दिख रहा है वहीं आंतरिक रूप भयानक होता जा रहा है। सड़कों पर चमचमाती बसें, कार तथा मोटर सायकलें, शहरों में छोटी दुकानों की जगह बड़े बड़े संगठित बाज़ार के साथ  सड़कों के किनारे बने छोटे मकानों की जगह बड़ी बड़ी इमारतें भले ही देश का चमकदार रूप दिखाती हैं बढ़ती हुई बलात्कार, हत्या, आत्महत्या तथा भ्रष्टाचार की घटनायें इस बात का प्रमाण है कि आर्थिक संपन्नता ने हमारे समाज को मानसिक रूप से दिवालिया बना दिया है।  विकास दर भले ही बढ़ी हो पर परिवार तथा समाज न केवल आर्थिक वरन मानसिक रूप से भी अस्थिर हो गये हैं। सुविधाओं के लिये वीरतापूर्वक जूझने वाले लोग सामाजिक बदलावों में  कायरतापूर्वक व्यवहार कर रहे हैं।  वह लोग समाज के लिये रक्षा करते हुए क्या वीरता दिखायेंगे जो अपनी सुविधाओं खोने के भय से ग्रसित हैं।  देश के बड़े शहरों के बुद्धिजीवी अपनी पॉश कालोनियों में संपूर्ण समाज का दर्शन करने का दावा करते हैं पर उनको मालुम नहीं कि छोटे शहरों के लोगों का संघर्ष उनसे अलग है।
         आज के नवीनतम आर्थिकयुग में महिलाओं पर न केवल घर संभालने का जिम्मा पहले की भांति रहता ही है बल्कि उन पर बाहर से कमाने बोझ भी आ पड़ा है।  इतना ही नहीं हमारे देश में कॉलोनियां तो बहुत बन गयी हैं पर उनके पार्क कूड़ेदानों के लिये हो गये हैं।  घूमने फिरने के लिये लोगों को अपने घर से बहुत दूर जाने के लिये बाध्य होना पड़ता है। ऐसे में सड़कों पर इंसानों के वेश में राक्षसों से सामना होता है तो उनके लिये मुश्किल होती है।  छेड़छाड़ की घटनायें तो आम बात हैं।  गाड़ियों पर चलती बालिकाओं को मोटरसाइकिलों पर चल रहे निकम्मे लड़कों से अक्सर जूझना पड़ता है।  यह सब इसलिये कि समाज में यह धारणा बन गयी है कि कानून को पैसे के इशारे पर नचाया जा सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि हम यहां संविधान के कमजोर होने की बात नहीं मान सकते बल्कि हमारी चर्चा का  मुख्य विषय उन प्रबंधकीय संस्थाओें की कार्यकुशलता पर होना चाहिये जिन पर समाज में शांति तथा सद्भावना बनाये रखने का है।  स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराध अत्यंत खतरनाक विषय हैं।  खासतौर से जब हमारे देश में कन्या भ्रुण हत्या फैशन की तरह चलती रही हो।  बलात्कार की घटनायें उन लोगों के लिये चिंता का विषय हो सकती हैं जो लाड़लियों के पितृत्व में सुख देखते हैं।  वैसे ही हमारा भारत लड़के और लड़कियों के अनुपात कम होने की भयावह समस्या को झेल रहा है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप
ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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रिश्ते बाज़ार में सजा दिए-हिंदी व्यंग्य कविता


चंद रुपयों के लिये उन्होंने

अपने रिश्ते बाज़ार में सजा दिये

फिर भी मन नहीं भरा

दोस्तों के राज सभी को बता दिये,

उनको चिंता इस बात की नहीं थी

अब वह अकेले हो जायेंगे,

खुशी थी कि लेकर कीमत

वह दौलत की बुलन्दियों पर छा जायेंगे,

इसलिये ऊंचे भाव लगा दिये।

कहें दीपकबापू समय समय की बात है

जिन संस्कारों पर उछलता था समाज

आजादी के नाम पर

मस्ती के लिये  सभी बहा दिये।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

http://rajlekh.blogspot.com 

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