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पति पत्नी के बीच में दखल और कानून-हिन्दी लेख


श्रीमद्भागवत गीता ‘भेदात्मक बुद्धि’ रखने वालों को आसुरी प्रवृत्ति का मानती है। इसलिये किसी भी ज्ञानी ध्यानी को मनुष्यों के कर्म पर बोलते या लिखते समय उसकी जाति, भाषा या कथित धर्म-इनको भ्रम भी कहा जा सकता है-का उल्लेख नहीं करते। मुश्किल तब शुरु होती है जब कोई आदमी अपनी जाति, भाषा, धर्म या क्षेत्र के नाम से ही परिचय देकर इस बात की जिद्द करता है कि उसे अपने समूह से जोड़कर देखा जाये। ऐसी बाध्यता अगर सामने है तो फिर अपनी बात कहने में रुकना भी नहीं चाहिये।
यह लेखक पहली बार मुसलमान समाज पर इसलिये लिख रहा है क्योंकि इसके ब्लाग पर अनेक बार इसी समाज से जुड़े लोग टिप्पणी करते हैं। दूसरी बात यह कि उनमें भारतीय अध्यात्म के प्रति झुकाव भी देखा गया है। टिप्पणियाों की संख्या पाठकों की संख्या से बहुत कम होती है। ऐसे में यह मानना पड़ता है कि इस लेखक के पाठों पर मुस्लिम समाज के पाठकों की संख्या देश की आबादी के अनुरूप ही होगी। इसी विश्वास के कारण यह लिखा जा रहा है। इसमें आलोचना हो सकती है पर यह परंपरागत रूप से वैसी नहीं होगी जैसी अक्सर चिढ़ाने वाली होती है। कोई नाखुश बंदा इस लेख का गलत अर्थ न लगाये इसलिये यह सफाई लिखनी पड़ रही है।
हम पति पत्नी और मियां बीवी के-यह लेखक लकीर का फकीर है इसलिये जैसा कि धर्म के ठेकेदार भाषा से उसको जोड़ते हैं इसलिये यह बताना जरूरी है कि हिन्दू में पति पत्नी और मुसलमानों में मियां बीवी-रिश्तों में अक्सर धर्म के कथित तत्वों को देखना चाहते हैं। यह इच्छा दो ही कारण से पैदा होती है। एक तो अपने आंख, कान तथा दिमाग को दूसरे के घर में आग देखकर प्रसन्नता के कारण होती है। दूसरा स्वयं को ज्ञानी साबित करने के लिये पंच होकर जाने का अवसर मिलता है। हिन्दू धर्म कभी एक संगठन के रूप में नहीं रहा इसलिये उसमें किसी भी संस्था द्वारा नियम बनाने का प्रावधान नहीं है और न ही पति पत्नी के संबंधों में राज्य, समाज या किसी समूह द्वारा हस्तक्षेप का प्रावधान है। पति पत्नी के संबंध टूटें या जुड़ें इसके लिये वह जिम्मेदार होते हैं। सदियों तक तो यह कायदा रहा है कि घर से विवाह कर जाती हुई बेटी को बाप कहता है कि ‘बेटी, जिस घर तेरी डोली जा रही है, वहीं से तेरी अर्थी उठेगी।’
इसके बावजूद हिन्दुओं के लिये विवाह विच्छेद का कानून बना पर इसका किसी ने विरोध नहीं किया क्योंकि कोई व्यक्ति या संगठन ऐसा करने का न तो आधार रखता है और न उसके पास जनसमर्थन होता है। इसलिये ही हिन्दुओं के विवाह और तलाक के विषय आज के आधुनिक बाजार आधारित प्रचार माध्यमों के लिये कोई विषय नहीं बनते। मगर हाल ही में पाकिस्तान के एक दूल्हे को लेकर भारत की दो लड़कियों के बीच जो जंग हुई उसमें तलाक और शादी दोनों ही इसलिये ही प्रचार का विषय बने क्योंकि तीनों ही मुसलमान थे। इस पर नियम से काम करने वाला उनका संगठन है जिसमें शायद काजी और मौलवी होते हैं। मुसलमानों में तलाक जितनी आसानी से मुंहजबानी होता है वैसा हिन्दुओं में नहीं है। यह अच्छी बात है पर जिस तरह तलाक का नाटक उक्त प्रकरण में देखने को मिला उससे जरूर मुस्लिम ज्ञानी भी नाराज हुए होंगे। मगर उनको यह समझ लेना चाहिये कि उनके नियमों ने ही आधुनिक बाजार आधारित प्रचार माध्यमों को यह अवसर प्रदान किया। इस लेखक का मानना है कि जहां विवाह न निभता हो वहां तलाक आसानी से होने देना चाहिये पर जिस तरह पाकिस्तानी क्रिकेटर की पहली बीवी अपने मियां से तलाक लेकर दूसरी शादी करने के लिये दबाव बना रही थी और दूसरी होनी वाली बीवी पहली वाली का मजाक बना रही थी वह चर्चा का विषय बना। सच तो यह है कि जिस तरह इसमें क्रिकेट और मध्य एशिया देशों के नाम आये उससे लगा कि कहीं न कहीं इसमें प्रायोजन है-पाकिस्तानी क्रिकेटर पर दूसरी लड़की को प्रभावित करने के लिये 16 करोड़ का खर्च तथा तलाक के लिये पहली बीवी को पंद्रह करोड़ देने जैसी बातें यह समाचार माध्यम करेंगे तो यह शक होना स्वाभाविक है।
अब आते हैं असली बात पर! जब यह प्रकरण चल रहा था तब पाकिस्तानी क्रिकेटर की पहली बीवी ने तलाक न देने के कारण अपने ही देश की दूसरी लड़की से निकाह करने अपने ही शहर में आये उस शौहर पर ‘घरेलू हिंसा’ का मामला दायर कर दिया। मामला पुलिसा तक ही रहा। इस मामले के अदालत में जाने की संभावना नगण्य ही थी क्योंकि तब यह पेचीदा हो जाता। चूंकि तलाक होना था और निकाह भी इसलिये पर्दे के पीछे खेल चलता रहा।
इधर बहस भी हो रही थी। जिसमें कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवी, पत्रकार, तथा मुल्ला मौलवी भी शामिल थे। वह अपनी किताबों के अनुसार बहस कर रहे थे पर वह नहीं जानते थे कि वह ऐसा कर कानूनी संकट को न्यौता भी दे रहे थे। चलो यह प्रकरण तो चूंकि बाज़ार और प्रचार का संयुक्त प्रायोजन था-यह भी संभव है कि इन दोनों की सयुक्त समर्थक कोई लॉबी इससे जुड़ी हुई हो-इसलिये यह सब चल गया। भविष्य में वह याद रखें कि भारत में अब दहेज विरोधी कानून तथा घरेलू हिंसा ऐसे कानून हैं जो पति पत्नी तथा मियां बीवी पर समान रूप से लागू होते हैं। दहेज एक्ट तो केवल परिवार तथा रिश्तेदारों तक ही सीमित रहता है पर यह घरेलू हिंसा कानून तो किसी को भी लपेटे में ले सकता है।
उक्त बहस में पहली बीवी की शादी की वैधानिकता पर सवाल उठाने वाले बहुत जोखिम ले रहे थे। एक पुराने अभिनेता की शायद मुराद थी कि क्रिकेटर की शादी दूसरी वाली लड़की से हो जाये इसलिये उसने पहली वाली पर सवाल उठाया कि ‘निकाह नामे में गवाहों की वल्दियत है पर दूल्हा दुल्हन का नाम नहीं है। इसलिये यह शादी नहीं मानी जा सकती।’
यह निकाहनामा दूल्हे ने पाकिस्तान में बनवाया था। मुस्लिम कानून के हिसाब से यह शादी अवैध भी होती तो भी वह घरेलू हिंसा के आरोप से बच नहीं सकता था उल्टे यही उसके खिलाफ सबूत भी बन सकता था कि उसने चालाकी की। बात यहीं नहीं रुकती। पीड़ित लड़की अगर उस समाचार की सीडी वगैरह लेकर अदालत में सीधे ‘घरेलू हिंसा’ का मामला दूल्हे पर दायर करती और साथ में अभिनेता का भी नाम यह कहते हुए देती कि यह भी हैं हमारे पाकिस्तानी क्रिकेटर मियां के भारतीय अभिनेता समर्थक।’ तब उनके लिये मुश्किल हो सकती थी। बाद में फैसला चाहे जो भी होता पर फिलहाल उनको अदालत में तो जाना ही पड़ सकता था।
कुछ मुल्ला मौलवी भी पहली बीवी के निकाह पर शक कर रहे थे पर यह उनके लिये परेशानी का कारण बन सकता था। कारण दहेज निरोध तथा घरेलू हिंसा कानून ऐसे हैं जिनमें किसी धर्म की पुस्तक का अध्ययन शामिल नहीं है। यही सही है कि इन कानूनों का दुरुपयोग इसलिये न्यायाधीश तथा पुलिस वाले बहुत सतर्कता पूर्वक विवेचना कर निर्णय तथा कार्यवाही करते हैं पर अगर उनको यकीन हो जाये कि महिला वाकई पीड़ित है तो उसके बाद जो होता है वह अभियुक्त के लिये तकलीफदेह हो सकता है।
इस प्रसंग में एक दिलचस्प बात पता चली कि पाकिस्तान में भी एक कानून है कि पहली पत्नी के रहते दूसरा विवाह करने पर वहां एक साल की सजा है। अनेक गैर मुस्लिम यहां ऐसा कानून न होने पर आपत्तियां कर रहे हैं। उनको शायद अंदाजा नहीं है कि घरेलू हिंसा तथा दहेज निरोध कानून ऐसे हैं जिनके चलते ऐसा कानून न होना कोई मायने नहीं रखता। अभी तक मुस्लिम समाज को लेकर अनेक ऐसे प्रायोजित समाचार और बहसें सुनने में आती हैं जिनका निष्कर्ष कुछ नहीं निकलता। मुल्ला मौलवी भी वहां आकर अपने धार्मिक कानून की वकालत करते हैं। अब उनके पास ऐसे अवसर आये तो वह पहले इस बात की तहकीकात कर लें कि जिस बहस में वह जा रहे हैं वह तथा जिस समाचार के लिये हो रही है वह प्रायोजित है। यह भी पक्का कर लें कि वह न्यायालय में नहीं जायेगा। कहने का आशय यह है कि नकली मुठभेड़ हो। अगर कहीं असली वाक्या हुआ और वह इसी तरह ही बयानबाजी करते रहे, उधर कोई महिला अत्यंत दुःखी है और इस तरह का अपमान होने पर वह क्रुद्ध हो उठी तो यह दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा ऐसे कानून हैं कि उनको भी दायरे में वह पति उसके परिवार तथा सहयोगियों को भी ले सकती है। वैसे मुस्लिम महिलाओं की स्थिति देखते हुए ऐसी संभावना कम ही लगती है क्योंकि अभी भी मुस्लिम महिलायें सामाजिक शिकंजे में फंसी है जो मुक्त है वह ऐसे प्रायोजित प्रचारकों के दायरे बाहर रहती हैं।
यह सही है कि मुसलमानों के लिये अलग से व्यक्तिगत कानून हैं पर दहेज एक्ट तथा घरेलू हिंसा कानून आने से महिलाओं पर दबाव बनाये रखने की मुस्लिम शिखर पुरुषों की शक्ति अब वैसी नहीं रही। वैसे इन दोनों कानूनों में अधिकतर मामले हिन्दू समाज के ही दर्ज होने का अनुमान लगता है-सच का पता किसी को नहीं है-पर उस पाकिस्तानी दूल्हे की एक लड़की से बेवफाई तथा दूसरी से प्यार के नाटक में ‘घरेलू हिंसा’ कानून का उल्लेख होने के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। सो न केवल बहसों से बचें बल्कि मियां बीवी के निजी मसलों पर लिखित रूप से भी न कहें क्योंकि उसका इस्तेमाल सबूत के रूप में किसी महिला को पीड़ित करने में सहयोग करने के आरोप को सिद्ध करने में हो सकता है। यह लेखक न वकील है न इसे कोई धार्मिक प्रचारक, केवल इधर उधर देखे गये मामलों पर यह लिखा गया है। इसका पाठ का एक उद्देश्य अपने मुस्लिम समुदाय के पाठकों को यह समझाना भी है कि वह देशकाल की स्थिति को देखकर ही आगे चलें। जहां तक हो सके अपने घर की महिलाओं के प्रति सद्भाव रखें तथा दूसरे के पारिवारिक झगड़ों में पंचायत करने से बचें क्योंकि यह उनके लिये परेशानी का कारण बन सकता है। अब पुराना समय नहीं रहा और न चाहते हुए भी उनको अपनी सोच बदलनी होगी।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
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स्वर्ग की चाहत-हिन्दी व्यंग्य शायरी


स्वर्ग की परियां किसने देखी

स्वयं जाकर

बस एक पुराना ख्याल है।

धरती पर जो मिल सकते हैं,

तमाम तरह के सामान

ऊपर और चमकदार होंगे

यह भी एक पुराना ख्याल है।

मिल भी जायें तो

क्या सुगंध का मजा लेने के लिये

नाक भी होगी,

मधुर स्वर सुनने के लिये

क्या यह कान भी होंगे,

सोना, चांदी या हीरे को

छूने के लिये हाथ भी होंगे,

परियों को देखने के लिये

क्या यह आंख  भी होगी,

ये भी  जरूरी  सवाल है।

धरती से कोई चीज साथ नहीं जाती

यह भी सच है

फिर स्वर्ग के मजे लेने के लिये

कौनसा सामान साथ होगा

यह किसी ने नहीं बताया

इसलिये लगता है स्वर्ग और परियां

बस एक ख्याल है।


कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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सच का सामना और हास्य कवि-हास्य व्यंग्य कविता (face for trutu and hindi poet-hasya kavita


उन सज्जन ने सच की पहचान करने वाली
मशीन की दुकान लगाई
पर उसके उद्घाटन के लिये
कोई तैयार नहीं हुआ भाई।
न नेता
न अभिनेता
न अधिकारी
न व्यापारी
उसे जो भी मिले सभी थे
दिखाने के लिये सच के भक्त
पर थे झूठे दरबारी
तब उसे याद आया अपना
भूला बिसरा दोस्त
जो करता था हास्य कविताई।
उसने हास्य कवि से आग्रह किया
‘करो मेरी सच की मशीन का उद्घाटन
तो करूं कमाई।
कोई नहीं मिला
इसलिये तुम्हारी याद आई।
फ्लाप कवि हो तो क्या
हिट है जों उनकी असलियत भी देख ली
अब तुम दिखाओ अपना जलवा
मत करना ना कर बेवफाई।’

सुनकर हास्य कवि बोला-
‘मेरे भूले बिसरे जमाने के मित्र
तुम्हें अब मेरी याद आई।
तुम्हारे धोखे की वजह से
करने लगा था मैं हास्य कविताई।
वैसे भी तुम पहले नहीं थे
न तुम आखिरी हो जिससे धोखा खाया
फिर दाल रोटी के चक्कर में
बहुत से सच सामने आते हैं
उन्हें भुलाने के लिये शब्द भी चले आते हैं
लिखते नहीं नाम किसी का
इशारों में तो बहुत कुछ कह जाता हूं
लोग भागते हैं
पर मैं अपने सच से स्वयं लड़ता जाता हूं
मुझे तो कोई डर नहीं है
सच पहचाने वाली मशीन की
गर्म कुर्सी पर बैठ जाऊंगा
पर जो जेहन में हैं मेरे
उन लोगों के नाम भी आ जायेंगे
उनमें तुम्हारा भी होगा
बोलो झेल सकोगे जगहंसाई।’

मित्र भाग निकला यह सुनकर
फिर पीछे देखने की सोच भी उसमें न आई।

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गणेश चतुर्थी पर उनके गुणों का स्मरण-आलेख (hindi article on ganesh ji)


भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में भगवान शिव को सत्य का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा एक बात महत्वपूर्ण है कि भारतीय अध्यात्म में अनेक प्रकार के भगवत् स्वरूपों की चर्चा आती है पर उनमें शायद ही कोई अन्य स्वरूप हो जिसके पूरे परिवार के समस्त सदस्य ही जनमानस द्वारा सहज रूप से भगवत्रूप मान लिये जाते हैं। भगवान शिव और पार्वती के साथ उनके पुत्र श्री कार्तिकेयन और श्री गणेश दोनों ही भगवतस्वरूप भारतीय जनमानस के हृदय में विद्यमान हैं। कार्तिकेयन को देवताओं का सेनापति माना जाता है और यही देवता इस प्रथ्वी का भरण भोषण करते हैं।
भगवान श्रीगणेश जी एक लीला की बहुत चर्चा होती है। वह यह है कि एक बार देवताओं में यह होड़ लगी कि उनमें कौन श्रेष्ठ है। तब यह तय हुआ कि जो प्रथ्वी का चक्कर पहले लगा लेगा उसे ही श्रेष्ठ माना जायेगा। दावेदारों में श्रीगणेश जी ने भी अपना नाम लिखाया। बाकी सभी देवता तो चक्कर लगाने चले गये पर महाराज गणेश जी वहीं जमे रहे। इधर उनके समर्थक इस बात को लेकर चिंतित थे कि श्री गणेश जी एक तो वैसे ही भारी है तिस पर बड़े आराम से अपने माता पिता के पास ही बैठकर आराम फरमा रहे हैं। ऐसे में यह जीतेंगे कैसे? आखिर जब बहुत देर हो गयी तो श्रीगणेश जी उठे और अपने माता पिता की प्रदक्षिणा कर फिर वही बैठ गये और कहा कि मैने तो पूरी सृष्टि का चक्क्र लगा लिया।
वह विजेता घोषित किये गये। यही कारण है कि कहीं भी पूजा करने से पहले भगवान श्रीगणेशजी की स्तुति गायी जाती है। मगर उपरोक्त कथा ही परिचय के रूप में पर्याप्त नहीं है। माता पिता की प्रदक्षिणा करने से अधिक महत्व का कार्य तो उन्होंने भगवान श्री वेदव्यास का महाभारत जैसा महाग्रंथ स्वयं लिख कर पूरा किया। सच बात तो यह है कि यही महाभारत जैसा महाग्रंथ-जिसमें शामिल श्री मद्भागवत् जैसा वह उपग्रंथ शामिल है जिसमें जीवन और सृष्टि के ऐसे रहस्य शामिल हैं जो आज भी प्रमाणिक माने जाते हैं-भारतीय जनमानस के लिये एक ऐसा ग्रंथ है जो उनके लिये एतिहासिक और अध्यात्मिक धरोहर है।
इस तरह भगवान श्री गणेशजी एक तरह से दिव्य लेखक हैं और उन्होंने अपनी उस महान रचना के लिये कोई पारिश्रमिक नहीं मांगा। महाभारत की रचना लिखवाने के लिये भगवान श्री वेदव्यास ने श्री गणेश की तपस्या की थी। जब वह प्रकट हुए तो वेदव्यास की समक्ष यह शर्त रखी कि ‘वह निरंतर लिखेंगे और अगर श्री वेदव्यास की वाणी कहीं अवरुद्ध हो गयी तो वह उसे बीच में ही छोड़ देंगे।’
इस तरह वह वह अनुपम ग्रंथ पूरा हुआ। सरस्वती देवी बुद्धि की देवी मानी जाती है और अनेक भक्त सदबुद्धि पाने के लिये उनकी आराधना करते हैं पर सच तो यह है कि अच्छी या बुरी बुद्धि के लिये सरस्वती देवी जी का न दायित्व है न दोष। वह तो सभी को बुद्धि प्रदान करने वाली हैं-अच्छी भी और बुरी भी- जिनको इससे वंचित रखती हैं उनका जीना न जीना बराबर हो जाता है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग मनुष्य के रूप में पैदा होते हैं पर उनकी बौद्धिक विकलांगता उनके साथ ही उनके परिवार के लिये भी कष्टदायक होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि सरस्वती देवी तो बुद्धि की देवी हैं। कभी कभी वह देवताओं के कहने पर बुद्धि को दोष पूर्ण भी बना सकती हैं जैसे देवताओं के आग्रह पर कैकयी की दासी मंथरा की बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी ताकि भगवान श्रीराम बनवास जाकर राक्षसों का संहार कर सकें।
इसी बुद्धि को नियंत्रण कर बड़े बड़े काम करने के लिये ही श्रीगणेश जी की उपासना की जाती है। हर अच्छा काम करने से पूर्व इसलिये ही श्रीगणेश जी की स्तुति की जाती है ताकि भक्त की बुद्धि और बल का समन्वय बना रहे। अगर बुद्धि में शुद्धता नहीं है तो कोई शुभ काम पूर्ण हो ही नहीं सकता-इसी कारण श्रीगणेश जी की स्तुति की जाती है।

देश में अनेक भगवत्स्वरूपों के स्मरण करते हुए पर्व मनाये जाते हैं पर इस दौरान केवल शोरशराबा कर भक्ति का दिखावा करना एक तरह से स्वयं को धोखा देना है। हमारे अध्यात्मिक दर्शन में वर्णित सभी भगवत्स्वरूपों में प्रथक प्रथक गुण हैं और शायद इसलिये ही सभी का स्मरण करने की परंपरा प्रारंभ हुई है कि उनके गुणों की चर्चा कर मनुष्य अपने अंदर उनको स्थापित करे पर इसके विपरीत केवल उनका नाम लेकर दिखावा कर स्वयं को भक्त होने का धोखा देते हैं। दरअसल यह अवसर होता है कि सत्संग कर उनके देवस्वरूपों की चर्चा कर उनके गुणों की चर्चा की जाये। इस तरह की चर्चा करने से भी गुणों का समावेश अपने अंदर होता है। बाहर से अंदर गुण ले जाने के लिये तीन प्रक्रियायें हैं, दर्शन(तस्वीर को देखते हुए भगवान के गुणों का स्मरण), अध्ययन और श्रवण। यह तभी संभव है जब ऐसा संकल्प हो।
कुछ लोग कहते हैं हिन्दू धर्म में ढेर सारे भगवान हैं यह गलत है। यह कहने वाले अज्ञानी हैं। सच तो यह है कि ऐसा करने से भक्तों को सत्संग की सुविधा मिल जाती है। सभी भगवत्स्वरूपों में अलग अलग गुण हैं। चूंकि सभी मानव लीला में रूप में प्रकट होते हैं तो उनमें इसलिये उनकी देह सर्वगुण संपन्न नहीं होती। सत्संग में उनके गुणों की चर्चा भी हो तो उनकी लीलाओं में मानवीय चूकों पर भी विचार हो जाता है। चूंकि होते तो सभी भक्त ही हैं और किसी न किसी स्वरूप पर उनका मस्तिष्क स्थिर रहता ही है इसलिये वार्तालाप युद्ध में नहीं बदलता। इसके विपरीत अन्य धर्मों में बस एक ही महापुरुष के नाम पर ही सारा समाज खड़ा है और वहां इसलिये सत्संग नहीं हो पाता क्योंकि उस दौरान किसी प्रकार की कमी की चर्चा अपराध हो जाता है। हमारे समाज में सत्संग की जो परंपरा है वही उसे एक किये रहती है। विभिन्न जातियों, भाषाओं, क्षेत्रों और समूहों को सत्संग की छत्रछाया में बैठकर आनंद लेते हुए देखा जा सकता है।
इस अवसर पर सभी ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को बधाई इस संदेश के साथ कि भगवान श्रीगणेश की ध्यान अवश्य करें। उनके गुणों का स्मरण स्वयं करने के साथ ही अपने परिवार के सदस्यों को भी इसके लिये प्रेरित करें। वर्तमान युग में जो हालत हैं उनको हम नहीं बदल सकते पर उनसे होने वाले तनाव से मुक्ति तभी संभव है जब हमारा बुद्धि पर नियंत्रण हो।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

बजट का कटु सत्य-हास्य व्यंग्य (hindi vyangya on budget)


उन्होंने जैसे ही दोपहर में बजट देखने के लिये टीवी खोला वैसे ही पत्नी बोली-‘सुनते हो जी! कल तुमने दो हजार रुपये दिये थे सभी खर्च हो गये। अब कुछ पैसे और दो क्योंकि अभी डिस्क कनेक्शन वाला आने वाला होगा। कुछ देर पहले आया तो मैंने कहा कि बाद में आना।’
उन्होंने कहा-‘अरे, अब तो बैंक से पैसे निकालने पड़ेंगे। अभी तो मेरी जेब में पैसा नहीं है। अभी तो टीवी परबजट सुन लूं।’
पत्नी ने कहा-‘इस बजट की बजाय तुम अपने घर का ख्याल करो। अभी डिस्क कनेक्शन वाले के साथ धोबी भी आने वाला है। मुन्ना के स्कूल जाकर फीस जमा भी करनी है। आज आखिरी तारीख है।’
वह टीवी बंदकर बाहर निकल पड़े। सोचा पान वाले के यहां टीवी चल रहा है तो वहां पहुंच गये। दूसरे लोग भी जमा थे। पान वाले ने कहा-‘बाबूजी इस बार आपका उधार नहीं आया। क्या बात है?’
उन्होंने कहा-‘दे दूंगा। अभी जरा बजट तो सुन लूं। घर पर लाईट नहीं थी। अपना पर्स वहीं छोड़ आया।’
उनकी बात सुनते ही पान वाला खी खी कर हंस पड़ा-‘बाबूजी, आप हमारे बजट की भी ध्यान रखा करो।’
दूसरे लोग भी उनकी तरफ घूरकर देखने लगे जैसे कि वह कोई अजूबा हों।
वह अपना अपमान नही सह सके और यह कहकर चल दिये कि‘-अभी पर्स लाकर तुमको पैसा देता हूं।’
वहां से चले तो किराने वाले के यहां भी टीवी चल रहा था। वह वहां पहुंचे तो उनको देखते ही बोला-‘बाबूजी, अच्छा हुआ आप आ गये। मुझे पैसे की जरूरत थी अभी थोक दुकान वाला अपने सामान का पैसा लेने आता होगा। आप चुका दें तो बड़ा अहसान होगा।’
उन्होंने कहा-‘अभी तो पैसे नहीं लाया। बजट सुनकर चला जाऊंगा।’
किराने वाले ने कहा-‘बाबूजी अभी तो टीवी पर बजट आने में टाईम है। अभी घर जाकर ले आईये तो मेरा काम बन जायेगा।’
वहां भी दूसरे लोग खड़े थे। इसलिये तत्काल ‘अभी लाया’ कहकर वह वहां से खिसक लिये।
फिर वह चाय के होटल की दुकान पर पहुंचे। वहां चाय वाला बोला-‘बाबूजी, क्या बात इतने दिन बाद आये। न आपने चाय पी न पुराना पैसा दिया। कहीं बाहर गये थे क्या?’
दरअसल अब उसकी चाय में मजा नहीं आ रहा था इसलिये उन्होंने दो महीने से उसके यहां चाय पीना बंद कर दिया था। फिर इधर डाक्टर ने भी अधिक चाय पीने से मना कर दिया था। चाय पीना बंद की तो पैसा देना भी भूल गये।
वह बोले-यार, अभी तो पैसा नहीं लाया। हां, बजट सुनकर वापस घर जाकर पर्स लेकर तुम्हारा पैसा दे जाऊंगा।’
चाय वाला खी खी कर हंस पड़ा। एक अन्य सज्जन भी वहां बजट सुनने वहां बैठे थे उन्होंने कहा-‘आईये बैठ जाईये। जनाब! पुराना शौक इसलिये छूटता नहीं इसलिये बजट सुनने के लिये घर से बाहर ही आना पड़ता है। घर पर बैठो तो वहां इस बजट की बजाय घर के बजट को सुनना पड़ता है।’
यह कटु सत्य था जो कि सभी के लिये असहनीय होता है। अब तो उनका बजट सुनने का शौक हवा हो गया था। वह वहां से ‘अभी लाया’ कहकर निकल पड़े। जब तक बजट टीवी पर चलता रहा वह सड़क पर घूमते रहे और भी यह बजट तो कभी वह बजट उनके दिमाग में घूमता रहा।
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