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भावनाओं का उतर चढ़ाव और श्वान-हिंदी लेख


उसे कई बार समझा चुका था कि ‘ घर से बाहर आते जाते समय मेरे स्कूटर से दूर रहे, वरना कुचला जायेगा।’
आज सुबह भी उससे कहा-‘मान जा प्यारे,  मुझे डर लगता है कि कहीं आगे पीछे करते हुए मेरे स्कूटर के पहिये के नीचे न आ जाये। भाग यहां से।’
कई बार श्रीमती जी उसे हटातीं तो कई बार मैं उसके हटने के इंतजार में खड़ा रहता, मगर यह सावधानी इस मायने ही काम आयी कि उस श्वान शिशु की मृत्यु हमारे स्कूटर से नहीं हुई। आज शाम को घर पहुंचा तो अकेला भूरे रंग का जीवित शिशु घर के अंदर दरवाजे पर पड़ा था। उसे अनेक बार हट हट किया पर वह लापरहवा दिखा। इससे पहले उससे कुछ कहता श्रीमती जी ने बताया कि ‘इसके साथ वाला पिल्ला घर के सामने से ही गुजर रही एक स्कूल बस के नीचे आ गया।
सुबह का मंजर याद आया जब वह मासूम हमारी झिड़की सुनकर स्कूटर से दूर हट कर रास्ता दे रहा था।
उस अकेले भूरे जीवित शिशु को देखा। उसकी माता भी बाहर सो रही थी।  पता नहीं दरवाजे पर पहुंचते ही उन दोनों के अनमने पन का अहसास कैसे हो गया।’ घर के दरवाजे के अंदर बैठा भूरा शिशु बड़ी मुश्किल से दूर हटा जबकि पहले तेजी से हटता था।
जीवन की अपनी धारा है।  लोग सोचते हैं कि जीवन केवल मनुष्य के लिये ही है जबकि पशु, पक्षी तथा अन्य जीव जंतु भी इसे जीते हैं।
हमारे पोर्च में लगा लोहे का दरवाजा किसी भी पशु के लिये दुर्लंघ्य हैं।  उसमें लगी लोहे की एक छड़ का निचला हिस्से का जोड़ टूट गया है। कई दिनों से  की सोची पर इतने छोटे काम के लिये मशीन लाने वाला नहीं मिल पाया है।  यह काम करने पर जोर इसलिये भी नहीं दिया क्योंकि उससे कुछ खास समस्या नहीं रही।
जब सर्दियों का जोर तेजी से प्रारंभ हुआ तब एक रात दरवाजा बजने की आवाज सुनकर हम पति पत्नी बाहर निकले।  दरवाजे पर सो रही मादा श्वान के अलावा कोई  दिखाई नहीं दिया।  तब पोर्च में ही रखे तख्त और दरवाजे के बीच  में खाली पड़े  कोने पर नजर पड़ी तो वहां से तीन श्वान शिशु एक दूसरे पर पड़े हुए  कातर भाव से हमारी तरफ देख रहे थे।
सर्दी बहुत तेज थी।  उनका जन्म संभवत दस से बीस दिन के बीच का रहा होगा-शायद पच्चीस दिन भी।  ठंड से कांपते हुए उन श्वान शिशुओं ने जीवन की तलाश दरवाजे की सींखचों के बीच किया होगा जो टूटी हुई छड़ ने उनको प्रदान किया।
हमारा एक प्रिय श्वान चार वर्ष पहले सिधार गया था।  उसके बाद हमने किसी श्वान को न पालने का फैसला किया। मगर यह जीवन है इसमें फैसले बदलते रहते हैं।  हमने तय किया कि इनमें से किसी को पालेंगे नहीं पर पूरी सर्दी भर इनको यहां आने से रोकेंगे भी नहीं।  हमने एक पुरानी चादर ली और उस कोने में डाल दी ताकि शिशु उस परसो सकें-एक बात याद रखें श्वान को ऊपर से सर्दी नहीं लगती बल्कि पेट पर ही लगती है क्योंकि वह बाल नहीं होते।  
श्वान शिशुओं ने सुबह पोर्च को गंदा कर दिया, गुस्सा आया पर फिर भी सर्दियों में उनको आसरा देने का फैसला बदला नहीं।  तीनों शिशुओं में एक भूरा था दो अन्य के शरीर पर भूरे पर की कहीं धारियां थी पर थे काले रंग के। बच्चे इतनी आयु के थे कि वह मां के दूध पीने के साथ ही ठोस पदार्थ भी ले रहे थे। उनको हम ही नहीं हमारे पड़ौसी भी कुछ न कुछ खाने को देते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि मोहल्ले की साझा जिम्मेदारी बन गयी थी तीनों की सेवा। दिन में वह बाहर मां के साथ घूमते और रात के उसी रास्ते से अंदर आते और जाते।  शाम को  हमारे वापस आने पर अंदर स्कूटर दाखिल होने  पर परेशानी आती फिर भी उनको बाहर नहीं निकालते। तीसरे दिन एक काला श्वान शिशु घिसटता हुआ आया। उसकी कमर पर किसी ने प्रहार किया था।  तब  पास रहने वाले एक ही डाक्टर से गोलियां लेकर उसे दूध में पिलायी तब वह ठीक हुआ।  हालांकि भूरा शिशु उसे पीने नहीं दे रहा था। इसलिये उसे भगाने के लिये भी प्रयास करना पड़ा।
चौथे दिन छत पर योग साधना करने के पश्चात् हमने पास ही खाली पड़े प्लाट पर झांका तो मादा श्वान अपने उसी शिशु के साथ सो रही थी। श्रीमतीजी ने गौर से देखा और कहा -‘ऐसा लग रहा है कि यह काला वाला मर गया।’
हमने कहा-‘नहीं, हो सकता है कि सो रहा हो।’
शाम को पता लगा कि मादा श्वान शिशु उसी काले शिशु का शव खा रही थी। मोहल्ले के लोगों ने उससे छुड़ाकर किसी मजदूर से कहकर उसे दूर फिंकवा दिया।  हमने श्रीमती जी से कहा-‘यकीनन वह बच्चा खा नहीं रही होगी बल्कि उसे जगाने का प्रयास कर रही होगी। श्वान को काम करने के लिये बस मुंह ही तो है। हो सकता है कि मादा श्वान को लगता हो कि इस तरह नौंचने यह जाग जायेगा। वह बिचारी क्या जाने कि यह मर गया है?’
पंद्रह दिन हो गये।  इधर सर्दी भी कम हो गयी। चादर हमने दरवाजे के बाहर  ही डाल दी। फिर भी जीवित दोनों शिशु अंदर आते जाते रहे।  काला शिशु हमेशा ही भूरे से कमजोर रहा।  अब तो ऐसा लगता था कि जैसे कि दोनों की उम्र में भी अंतर हो।  अनेक बार  पपड़ी या अन्य चीज काले शिशु के मुंह से भूरे रंग वाला छीन लेता था।  काले वाले को कुछ देकर उसके खिलाने के लिये भूरे वाले को भगाने का प्रयास भी करना पड़ता था।

पोर्च के बाद वाले दरवाजे कभी खुले होते तो कमरे में सबसे अधिक काला शिशु ही आता था।  एक बार तो वह कंप्यूटर कक्ष तक आ गया था। आज स्कूटर निकालने के लिये दरवाजा खोला और थोड़ी देर अंदर आया तो वह घुस आया। उसे चिल्लाकर भगाया।  उसका भागना याद आता है।
शाम को वह भूरा शिशु ही शेष रह गया।  दरअसल काले शिशु जीवन जीना तो चाहते थे पर किसी से छीनकर नहीं जबकि यह भूरा शिशु आक्रामक है।
जब काले शिशु की मौत हुई तो आसपास की महिलाओं को भारी तकलीफ हुई क्योंकि यही जीव का स्वभाव है कि जो उसके पास रहता है उसके प्रति मन में मोह आ ही जाता है।  पास पड़ौस के लोगों ने उसे भी कहीं दूर फिंकवाने का इंतजाम किया। साथ के कपड़ा और नमक भी उसे दफनाने के लिये दिया गया।  हमेशा ही आक्रामक रहने वाला भूरा शिशु कुछ उदास दिख रहा है। वह शायद लंबा जीवन जियेगा। संभवतः तीन  शिशु कुदरत ने इसलिये ही  साथ भेजे क्योंकि सर्दी में एक दूसरे के सहारे वह जी सकें।  भूरा शिशु हमेशा ही दोनों अन्य शिशुओं के ऊपर सोता था। दोनों काले शिशुओं में भूरे की अपेक्षा  आक्रामकता का नितांत अभाव दिखता था।  ऐसा लगता था कि वह काले शिशु केवल भूरे के जीवन का मार्ग प्रशस्त करने के लिये ही आये हैं। अब भूरे शिशु को शायद गर्मी के आवश्यकता नहीं रही और कुदरत ने उसे भेजा गया सामान वापस ले लिया। 
हमने उसे पालने का फैसला नहीं किया पर कौन जानता है कि आगे क्या होगा। उस भूरे शिशु की आंखों में उदासी का भाव देखकर सोचता हूं कि अब उसे किस पर डाटूंगा क्योकि वह खाने के लिये अकेला बचा है और अपनी मां को दी गयी चीज उससे छीनता नहीं है।  दोनों दरवाजा खोलने पर हमारी तरफ देखते हैं तब लगता है कि उनकी आंखों में  उसी काले शिशू के बाहर होने की आशा झांक रही है। उनको लगता है कि वह अंदर कहीं घुस गया है और निकलेगा जैसे कि पहले डांटने पर हमेशा ही भाग कर निकलता था।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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व्यक्ति में चेतना लाने से ही समाज जागृत होगा-चिंतन


अक्सर यह सुनने को मिलता है कि ‘महाभारत घर में नहीं रखना चाहिए क्योंकि इससे क्लेश होता है’। हो सकता है या सच हो या भ्र्म! एक बात जरूर है कि जैसा साहित्य आप पढ़ते हैं वैसे ही आपकी बुद्धि भी हो जाती है। शायद यही कारण है कि घर में महाभारत रखने के लिये रोका जाता है कि घर में अगर होगी तो पढ़ी जाएगी और फिर लोगों में क्लेश की भावना पैदा हो सकती है। शायद इसीलिये हमारे देश के अध्यात्मिक चिंतकों ने महाभारत से श्रीगीता को अलग कर दिया। इसक मतलब सीधा है कि उसमें कुछ ऐसे प्रसंग है जिनका दुहराव हमारे समाज में पसंद नहीं किया जायेगा। महाभारत प्रायः घरों में नहीं रखा जाता है पर शायद ही ऐसा घर हो जहां श्रीमदभागवत गीता नहीं रखी जाती हो। सच बात तो यह है कि श्रीगीता न केवल चारों वेदों का सार संग्रह है बल्कि वह हमारे अध्यात्मिक ज्ञान का खजाना होने के साथ ही सभ्य संस्कृति और पवित्र संस्कारों के निर्माण का स्तोत्र भी है।
मजे की बात यह है कि श्रीगीता को जाने बिना ही संस्कार और संस्कृति बचाने के लिये कुछ लोग अनवरत अभियान छेड़े रहते हैं पर अगर उनसे उसका स्वरूप पूछा जाये तो उनकी हवा निकल आयेगी। पाश्चात्य सभ्यता से खतरा बतारने वाले लेाग बताते हैं कि-
1.पश्चिम में माता पिता और गुरु को सम्मान नहीं दिया जाता पर हमारे यहां उसकी परंपरा है। बच्चे अगर अपने संस्कारों ओर संस्कृति से परिचित नहीं होंगे तो बिगड़ जायेंगे और हमारे समाज का ढांचा बिगड़ जायेगा।
2.स्त्रियों को वह वस्त्र पहनने चाहिये जो पूरा शरीर ढंकते हों। अर्द्धनग्न होकर घूमने वाली स्त्रियों इस देश के लिये बहुत बड़ा खतरा है।
3.देश में केवल पुराने त्यौहार ही मनाने चाहिये ताकि संस्कृति बची रहे। पश्चिम के त्यौहार मनाने की प्रवृत्ति नहीं होना चाहिये।
शायद और भी बहुत सारी बातें बतायेंगे। पुत्र के रूप में श्रवण कुमार और भगवान श्रीराम जी और बहु के रूप में श्रीसीता जी का उदाहरण देंगे। यह सब ठीक है। हमारे देश के अनेक धार्मिक गुरु भी खूब उनका बखान करते हैं। देखो कैसे श्रवण कुमार ने माता पिता की सेवा की और भगवान श्रीराम ने पिता की आज्ञा का पालन किया। पत्नी के रूप में स्त्री से पतिव्रता की आशा की जाती है। गौर करें तो पायेंगे कि केवल सारी शिक्षा शासित होने वाले संबंधों पर है और वैसा न होने पर सजा का भी प्रावधान किया गया है ‘रौरव नरक का’। मगर शासक संबंधों का कोई वर्णन नहीं करना चाहता क्योंकि बूढ़े लोग ही धर्म के अधिक सहायक होते हैं और युवाओं से ऐसी अपेक्षा नहीं की जाती। एक अच्छी माता और पिता बनने की शिक्षा युवाओं को शायद ही कोई देता हो और शायद ही कोई ऐसा आदमी मिले जो अच्छे माता पिता न बनने पर उसकी सजा भुगतने की चेतावनी देने का साहस करता हो।
हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि ‘जैसा आदमी कर्म करता है वैसा ही फल उसके सामने आता है’। संस्कृति और संस्कारों के रक्षक यहां आकर खामोश हो जाते हैं। अगर कोई व्यक्ति अच्छा पिता नहीं बना तो उससे कुपुत्र के दुष्कर्मों या अपने प्रति उपेक्षा का भाव उसे झेलना ही है। इसमें पश्चिम संस्कृति के प्रभाव जैसी कोई बात नहीं है। जब वह अपने अकर्मण्यता या दुष्कर्म का दुष्परिणाम भोग रहा है तब उसके साथ सहानुभूति जताते हुए यह कहने का कोई मतलब नहीं है कि‘आजकल जमाना खराब आ गया।’
ऐसा नहीं है कि पश्चिमी सभ्यता आने के पहले कोई इस देश में सभी पुत्र श्रवण कुमार, भगवान श्रीराम तथा अन्य महापुरुषों जैसे थे। अगर होते तो फिर इनके अलावा उनका नाम भी कहीं आता।
सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे समाज में अपनी संतानों को हथियार की तरह उपयोग करने की प्रवृत्ति है वह बहुत खतरनाक है और इस कारण लेाग अपने बच्चों को अपने जीवन मेें केवल एक ही बात सिखाते हैं कि किसी भी तरह कमाओ। उसके बाद जब बच्चे आत्मनिर्भर होते हैं तो उनसे अपेक्षा करने लगते हैं कि वह संस्कार और संस्कृति से परिचित हों। जब बच्चे में संस्कार भरने का समय था तब तो भरा नहीं और जब समय आया तो फिर ऐसे फल की कामना करने लगे जो उन्होंने बोया ही नहीं।
कहने का तात्पर्य यह है कि हम जिस प्रकार की संस्कृति की बात करते हैं वह एक सामान्य आचार और व्यवहार का भाग मात्र है जो हमारे ही कर्म के आधार पर निर्धारित होता है। हम जैसा व्यवहार दूसरों से करते हैं वैसा ही हमें मिलता है। हम अपने से शासित लोगों से अपेक्षायें तो करते हैं पर सिखाते कुछ नहीं। फिर हम मानवीय रिश्तों के निर्वहन और पहनावे में जिस प्रकार संस्कृति और संस्कारों के मूल तत्व ढूंढते हैं वह तो पश्चिम में भी हैं। ऐसा नहीं है कि पश्चिम में पुत्री और पुत्र माता पिता को प्रेम और आदर नहीं देते। अपनी सफलताओं पर वह भी अपने माता पिता का ही नाम लेते हैं। तात्पर्य यह है कि केवल पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों की कथित पवित्रता को ही संस्कृति या संस्कार से को जोड़ना ठीक नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अपने इन रिश्तों के निर्वाह से प्रथक किस तरह का आचार और व्यवहार करते हैं वह भी संस्कारों और संस्कृति से जुड़ा है-मसलन परिवार का भरण भोषण के लिये प्राप्त धन के स्तोत्र पवित्र होना, दूसरे की संपत्ति पर बुरी नजर न डालना तथा निष्काम भाव से दूसरों की सहायता करना।
पश्चिमी पहनावे या उत्सवों को अपनाने से अगर हमारी संस्कृति ढहने वाली होती तो शायद हम आज अपने सारे पवित्र ग्रथों का अध्ययन नहीं करते-जबकि उनका अध्ययन सामान्य शिक्षा में प्रचलित नहीं है। पश्चिमी परिधान पहनने वाले युवक युवतियां मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थानों पर दर्शनार्थ जाते हुए देखे जा सकते हैं। उनकी चारित्रिक दृढ़ता वैसे ही जैसे पहले की पीढ़ी में होती है। वह लोग वैलंटाईन डे मनाते हैं पर इसका मतलब यह नहीं है कि उनको दीपावली याद नहीं हैं। हां, यह सही है कि बाजार के प्रभाव में पश्चात्य उत्सवों को भी कुछ युवक युवतियां मनाते हैं-देश की जनसंख्या की दृष्टि से उनकी संख्या नगण्य है-पर इससे उनके स्वयं के संस्कार तो नष्ट नहीं हो जाते। फिर जो बाजार उनका प्रेरक है वह उन लोगों के दान और चंदे का स्तोत्र भी है जो संस्कृति और संस्कारों की रक्षा और धर्म के प्रचार के लिये कार्यरत हैं। इसलिये धर्म और संस्कृति रक्षकों को अपने अभियान में एक हद के अंदर तो रहना ही पड़ता है क्योंकि वह उस बाजार से अधिक देर तक लड़ नहीं सकते जो उनका भी मददगार है।
हमारे अध्यात्मिक ज्ञान में विराट शक्ति है क्योंकि वह सृष्टि और जीवन के उस सत्य के निकट है जिसके पास अभी पश्चिम का विज्ञान पहुंच रहा है। यही कारण है कि पश्चिम में भारतीय धर्मग्रथों का अध्ययन अब नये सिरे से किया जा रहा है। यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि अगर हम इस समय देश का आचरण देखें तो शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो यह सके कि वह संतुष्ट है। हमें आत्मंथन करना चाहिये कि क्या हम जिस प्रकार का आचरण कर रहे हैं क्या वाकई पूरी तरह से पवित्र और शुद्ध है। केवल धर्म, संस्कृति और संस्कारों की रक्षा का नारा लगाने से काम नहीं चलने वाला। हमारा अध्यात्मिक दर्शन खाने या पहनने के मामले में कोई प्रतिबंध नहीं लगाता सिवाय इसके कि वह देह के स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिये उचित हो। सबसे बड़ा सवाल आचरण और व्यवहार के लिये है और उसके लिये किसी अभियान की बजाय ऐसे सम्मेलनों की जरूरत है जहां मिलकर लोग अपने आचार विचार पर आत्म मंथन कर उसमें सुधार सकें। मुख्य बात समाज को नहीं बल्कि व्यक्ति को सुधारने की की है। उसमें भी दूसरे पर नहीं बल्कि स्वयं पर दृष्टि डालने की है। समूहों में अभियान चलाने से शुद्धता नहीं आ सकती बल्कि उसके लिये स्वयं के स्तर पर प्रयास करना चाहिये।
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अध्यात्मिक केंद्र हैं कि व्यापारिक-आलेख


भारत में अधिकतर लोगों का अध्यात्म के प्रति झुकाव स्वाभाविक कारणों से होता है। मात पिता और अन्य बुजुर्गों की प्रेरणा से अपने देवताओं की तस्वीरों के प्रति उनका आकर्षण इतना रहता है कि बचपने में ही उनके अध्ययने की किताबों और कापियों पर उनकी झाकियां देखी जा सकतीं हैं। मुझे याद है कि बचपन में जब कापियां खरीदने जाता तो भगवान की तस्वीरों की ही खरीदता था। एक बार अपनी मां से पैसे लेकर एक मोटी कापी लेने बाजार गया वहां पर भगवान की तस्वीर वाली कापी तो नहीं मिली हां एक कापी पर ‘ज्ञान संचय’ छपा था वह खरीद ली। वह घर लाया तो ‘ज्ञान’ शब्द ने दिमाग पर ऐसा प्रभाव डाला कि उस कुछ ऐसे ही लिखना शुरू कर दिया। फिर एक छोटी कहानी लिखने का प्रयास किया। तब मैंने सोचा कि इस पर तो मैं कुछ और लिखूंगा और विद्यालय का काम उस पर न करने का विचार किया। इसलिये फिर अपनी मां से दूसरी कापी लेने बाजार गया और अपने मनोमुताबिक भगवान जी की तस्वीर वाली किताब ले आया। वह ज्ञान संचय वाली किताब मुझे लेखक बनाने के काम में आयी।

आशय यह है कि पहले बाजार लोगों की भावनाओं को भुनाता था और ऐसी देवी देवताओं की तस्वीर वाली किताबें और कापियां छापता था जिससे लोग खरीदें। बाजार आज भी यही करता है और मैं उस पर कोई आक्षेप भी नहीं करता क्योंकि उसका यही काम है पर उसके सामने अब दूसरा संकट है कि आज के अनेक अध्यात्मिक संतों ने अपना ठेका समझकर अनेक वस्तुओं का उत्पादन और वितरण अपने हाथ के लिया है जिनका अध्यात्म से कोई संबंध नहीं और इस तरह उसने बाजार में बिकने वाली वस्तुओं की बिक्री में से बहुत बड़ा भाग छीन लिया है। दवायंे, कैलेंडर, पेन, चाबी के छल्ले, डायरी और कापियां भी ऐसे आध्यात्मिक संस्थान बेचने लगे हैं जिन्हें केवल प्रचार का काम करना चाहिए।

उस दिन एक कापी और किताब बेचने वाले मेरे मित्र से मेरी मुलाकात हुई। मैं स्कूटर पर उसकी दुकान पर गया और कोई सामान उसे देने के लिये ले गया। उससे जब मैंने धंधे के बारे में पूछा तो उसने बातचीत में बताया कि अब अगर अध्यात्म लोग पेन, डायरियां और कापियां बेचेंगे तो हमसे कौन लेगा? अब तो संतों के शिष्य अधिक हो गये हैं और वह कापियां और पेन बेचते हैं। अगर कहो तो उनके भक्त घर पर भी दे जाते हैं।

मै सोच में पड़ गया क्योंकि मात्र पंद्रह मिनट पहले ही मुझे मेरे एक साथी ने एक रजिस्टर दिया था और और वह अध्यात्मिक संस्थान द्वारा प्रकाशित था। उस पर अध्यात्मक संत का चित्र भी था। मैनें उससे कई बार ऐसा रजिस्टर लिया है। वह और उस जैसे कई लोग आध्यात्मिक संस्थाओं को उत्पादों को सेवा भाव से ऐसी वस्तुऐं उपलब्ध कराते हैं। देखा जाये तो वह अध्यात्मिक कंपनियों के लिये भक्त लोग मुफ्त में हाकर की भूमिका अपने भक्ति भाव के कारण निभाते हैं। कई जगह इन अध्यात्मिक संस्थानों की बसें अपने उत्पाद बेचने के लिये आतीं हैं। कई संस्थान अपनी मासिक पत्रिकायें निकालते हें लोग पढ़ें या नहीं पर भक्ति भाव के कारण खरीदते हैं। इस तरह जहां घरों में पहले साहित्यक या सामाजिक पत्र पत्रिकाओं की जगह थी वहां इन धार्मिक पत्रिकाओं ने ले ली है। शायद कुछ हंसें पर यह वास्तविकता है कि पहलंे और अब का यह फर्क मेरा बहुत निकट से कई घरों में देखा हुआ है।

अधिक विस्तार से समझाने की आवश्यकता नहीं है कि दवाओं से लेकर चाबी के छल्ले बेचने वाले अध्यात्मिक संस्थानों की वजह से भी हमारे देश के छोटे कामगारों और व्यवसायियों की रोजी रोटी प्रभावित हुई है। हम अक्सर विदेशी और देशी कंपनियों पर लघु उद्योगों को चैपट करने का आरोप लगाते हैं पर देखा जाय तो उत्पादन से लेकर वितरण तक अपने भक्तों की सहायता से काम करने वाले इन अध्यात्मिक संस्थाओं ने भी कोई कम क्षति पहुंचाई होगी ऐसा लगता नहीं है। हमारा यह विचार कि हिंदी के पाठक कम हैं इसलिये पत्र-पत्रिकायें कम पढ़ी जा रही हैं। वस्तुतः उनकी जगह इन पत्रिकाओं ने समाप्त कर दी है। बढ़ती जनसंख्या के साथ जो पाठक बढ़े उन पर इन आध्यात्मिक पत्रिकाओं ने उन पर नियंत्रण कर लिया। इनके प्रचार प्रसार की संख्या का किसी को अनुमान नहीं है पर मैं आंकड़ों के खेल से इसलिये परे रहता हूं क्योंकि जो सामने देख रहा हूं उसके लिये प्रमाण की क्या जरूरत हैं। अधिकतर घरों में मैंने ऐसी आध्यात्मिक पत्रिकायें और अन्य उत्पाद देखे हैं और लगता है कि अगर यह अध्यात्मिक संस्थान उन वस्तुओं के उत्पाद और वितरण से परे रहते तो शायद रोजगार के अवसर समाज में और बढ़ते।

अपने अध्यात्मिक विषयों में मेरी रुचि किसी से छिपी नहीं है मै अंधविश्वास और अंध भक्ति में यकीन नहींे करता और मेरा स्पष्ट मत है कि अध्यात्म के विषयों का अन्य विषयों के कोई संबंध नहीं है। अगर आप ज्ञान और सत्संग का प्रचार कर रहे हैं तो किसी अन्य विषय से संबंध रखकर अपनी विश्वसीनयता गंवा देते हैं। यही वजह है कि आजकल लोग संतों पर भी जमकर आक्षेप कर रहे हैं। मै संतों पर आक्षेप के खिलाफ हूं पर जिस तरह अध्यात्मिक संस्थान अन्य सांसरिक उत्पादों के निर्माण और वितरण का कार्य छोटे लोगों को रोजगार के अवसरों को नष्ट कर रहे हैं उसके चलते किसी को ऐसे आक्षेपों से रोकना भी मुश्किल है। अगर लोगों के किसी कारण रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं तो उस पर आक्षेप करना उनका अधिकार है।

बाजार अगर लोगों की भावनाओं को भुनाता है तो उससे बचने के लिये लोगों को अध्यात्म का ज्ञान कराकर बचाया जा सकता है पर अगर अध्यात्मिक संस्थान ही इसकी आड़ में अपना बाजार चलाने लगें तो फिर उनको अध्यात्म ज्ञान देना भी कठिन क्योंकि उनके चिंतन और अध्ययन की बौद्धिक क्षमता का हरण उनके कथित गुरू अपने उपदेशों से पहले कर चुके हैं।

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