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चिराग का दर्द-हिन्दी शायरी (chirag ka dard-hindi shayari)


जब तक कांटों के साथ था
गुलाब जिंदा रहा
अलग हुआ तो मुरझा गया,
वह चिराग क्या अपना दर्द बयान करे
जिसको जलाने वाला ही बुझा गया।
पल पल रंग बदलती इस जिंदगी में
कभी खुशनुमा पल तो
कभी हादसे भी पेश आते हैं,
उम्मीद में छा जाता ग़म का अंधेरा
जहां टूटे सपने चुभोते हैं नश्तर
वहां तिनके भी फरिश्ते बन जाते हैं,
अपनों ने बढ़ायी हैं जहां उलझने
वहां कोई गैर मसले सुलझा गया।
—————-

कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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नेपाल की उठापठक और हिंदुत्व-हिंदी लेख


नेपाल कभी हिन्दू राष्ट्र था जिसे अब धर्मनिरपेक्ष घोषित किया गया है। वहां की निवासिनी और भारतीय हिन्दी फिल्मों की अभिनेत्री मनीक्षा कोइराला ने अब जाकर इसकी आलोचना की है। उनका मानना है कि नेपाल को एक हिन्दू राष्ट्र ही होना चाहिए था। दरअसल नेपाल की यह स्थिति इसलिये बनी क्योंकि वह राजशाही का पतन हो गया। वहां के राजा को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता था या हम कहें कि उनको ऐसी प्रतिष्ठा दी जाती थी। दूसरी बात यह है कि नेपाल के हिन्दू राष्ट्र के पतन को एक व्यापक रूप में देखा जाना चाहिए न कि इसके केवल सैद्धान्तिक स्वरूप पर नारे लगाकर भ्रम फैलाना चाहिये। इसलिये यह जरूरी है कि हम हिन्दुत्व की मूल अवधारणाओं को समझें।
वैसे हिन्दुत्व कोई विचाराधारा नहीं है और न ही यह कोई नारा है। अगर हम थोड़ा विस्तार से देखें तो हिन्दुत्व दूसरे रूप में प्राकृतिक रूप से मनुष्य को जीने की शिक्षा देने वाला एक समग्र दर्शन है। अंग्रेजों और मुगलों ने इसी हिन्दुत्व को कुचलते हुए भारतवर्ष में राज्य किया किया। अनेक डकैत और खलासी यहां आकर राजा या बादशाह बन गये। अंग्रेजों ने तो अपनी ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जिससे कि यहां का आदमी उनके जाने के बाद भी उनकी गुलामी कर रहा है। देश के शिक्षित युवक युवतियां इस बात के लिये बेताब रहते हैं कि कब उनको अवसर मिले और अमेरिका या ब्रिटेन में जाकर वहां के निवासियों की गुलामी का अवसर मिले।
मुगलों और अंग्रेजों ने यहां के उच्च वर्ग में शासक बनने की ऐसी प्रवृत्ति जगा दी है कि वह गुलामी को ही शासन समझने लगे हैं। अक्सर समाचार पत्र पत्रिकाओं में ऐसी खबरे आती हैं कि अमुक भारतवंशी को नोबल मिला या अमुक को अमेरिका का यह पुरस्कार मिला। अमुक व्यक्ति अमेरिका की वैज्ञानिक संस्था में यह काम कर रहा है-ऐसी उपलब्धियों को यहां प्रचार कर यह साबित किया जाता है कि यहां एक तरह से नकारा और अज्ञानी लोग रहते हैं। सीधी भाषा में बात कहें तो कि अगर आप बाहर अपनी सिद्धि दिखायें तभी यहां आपको सिद्ध माना जायेगा। उससे भी बड़ी बात यह है कि आप अंग्रेजी में लिख या बोलकर विदेशियों को प्रभावित करें तभी आपकी योग्यता की प्रमाणिकता यहां स्वीकार की जायेगी। नतीजा यह है कि यहां का हर प्रतिभाशाली आदमी यह सोचकर विदेश का मुंह ताकता है कि वहां के प्रमाणपत्र के बिना अपने देश में नाम और नामा तो मिल ही नहीं सकता।
मुगलों ने यहां के लोगों की सोच को कुंद किया तो अंग्रेज अक्ल ही उठाकर ले गये। परिणाम यह हुआ कि समाज का मार्ग दर्शन करने का जिम्मा ढोने वाला बौद्धिक वर्ग विदेशी विचाराधाराओं के आधार पर यहां पहले अपना आधार बनाकर फिर समाज को समझाना चाहता है। कहने को विदेशी विचारधाराओं की भी ढेर सारी किताबें हैं पर मनुष्य को एकदम बेवकूफ मानकर लिखी गयी हैं। उनके रचयिताओं की नज़र में मनुष्य को सभ्य जीवन बिताने के लिये ऐसे ही सिखाने की जरूरत है जैसे पालतु कुत्ते या बिल्ली को मालिक सिखाता है। मनुष्य में मनुष्य होने के कारण कुछ गुण स्वाभाविक रूप से होते हैं और उसे अनेक बातें सिखाने की जरूरत नहीं है। जैसे कि अहिंसा, परोपकार, प्रेम तथा चिंतन करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियां हैं। कोई भी मनुष्य मुट्ठी भींचकर अधिक देर तक नहीं बैठ सकता। उसे वह खोलनी ही पड़ती हैं।
चार साल का बच्चा घर के बाहर खड़ा है। कोई पथिक उससे पीने के लिये पानी मांगता है। वह बिना किसी सोच के उसे अपने घर के अंदर से पानी लाकर देता है। उस बच्चे ने न तो को पवित्र पुस्तक पढ़ी है और न ही उसे किसी ने सिखाया है कि ‘प्यासे को पानी पिलाना चाहिये’ फिर भी वह करता है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य अपनी सहज प्रवृत्तियों की वजह से सज्जन तो रहता ही है पर समाज का एक वर्ग उसकी जेब से पैसा निकालने या उससे सस्ता श्रम कराने के लिये उसे असहज बनाने का हर समय प्रयास करता है। विदेशी विचारधाराओं तथा बाजार से मनुष्य को काल्पनिक स्वप्न तथा सुख दिखकार उसे असहज बनाने का हमारे देश के लोगों ने ही किया है। इन्ही विचाराधाराओं में एक है साम्यवाद।
इसी साम्यवादी की प्रतिलिपि है समाजवाद। इनकी छत्रछाया में ही बुद्धिजीवियों के भी दो वर्ग बने हैं-जनवादी तथा प्रगतिशील। नेपाल को साम्यवादियों ने अपने लपेटे में लिया और उसका हिन्दुत्व का स्वरूप नष्ट कर दिया। सारी दुनियां को सुखी बनाने का ख्वाब दिखाने वाली साम्यवादी और समाजवादी विचारधाराओं में मूल में क्या है, इस पर अधिक लिखना बेकार है पर इनकी राह पर चले समाज सेवकों और बुद्धिजीवियों ने अपने अलावा किसी को खुश रखने का प्रयास नहीं किया। सारी दुनियां में एक जैसे लोग हो कैसे सकते हैं जब प्रकृत्ति ने उनको एक जैसा नहीं बनाया जबकि कथित विकासवादी बुद्धिजीवी ऐसे ही सपने बेचते हैं।
अब बात करें हम हिन्दुत्व की। हिन्दुत्व वादी समाज सेवक और बुद्धिजीवी भी बातें खूब करते हैं पर उनकी कार्य और विचार शैली जनवादियों और प्रगतिशीलों से उधार ली गयी लगती है। हिन्दुत्व को विचाराधारा बताते हुए वह भी उनकी तरह नारे गढ़ने लगते हैं। नेपाल में हिन्दुत्व के पतन के लिये साम्यवाद या जनवाद पर दोषारोपण करने के पहले इस बात भी विचार करना चाहिये कि वहां के हिन्दू समाज की बहुलता होते हुए भी ऐसा क्यों हुआ?
हिन्दुत्व एक प्राकृतिक विचाराधारा है। हिन्दू दर्शन समाज के हर वर्ग को अपनी जिम्मेदारी बताता है। सबसे अधिक जिम्मेदारी श्रेष्ठ वर्ग पर आती है। यह जिम्मेदारी उसे उठाना भी चाहिए क्योंकि समाज की सुरक्षा से ही उसकी सुरक्षा अधिक होती है। इसके लिये यह जरूरी है कि वह योग्य बुद्धिजीवियों को संरक्षण देने के साथ ही गरीब और मजदूर वर्ग का पालन करे। यही कारण है कि हमारे यहां दान को महत्व दिया गया है। श्रीमद्भागवत गीता में अकुशल श्रम को हेय समझना तामस बुद्धि का प्रमाण माना गया है।
मगर हुआ क्या? हिन्दू समाज के शिखर पुरुषों ने विदेशियों की संगत करते हुए मान लिया कि समाज कल्याण तो केवल राज्य का विषय है। यहीं से शुरु होती है हिन्दुत्व के पतन की कहानी जिसका नेपाल एक प्रतीक बना। आर्थिक शिखर पुरुषों ने अपना पूरा ध्यान धन संचय पर केंद्रित किया फिर अपनी सुरक्षा के लिये अपराधियों का भी महिमा मंडन किया। भारत के अनेक अपराधी नेपाल के रास्ते अपना काम चलाते रहे। वहां गैर हिन्दुओं ने मध्य एशिया के देशों के सहारे अपना शक्ति बढ़ा ली। फिर चीन उनका संरक्षक बना। यहां एक बात याद रखने लायक है कि अनेक अमेरिकी मानते हैं कि चीन के विकास में अपराध से कमाये पैसे का बड़ा योगदान है।
भारत के शिखर पुरुष अगर नेपाल पर ध्यान देते तो शायद ऐसा नहीं होता पर जिस तरह अपने देश में भी अपराधियों का महिमामंडन देखा जाता है उससे देखते हुए यह आशा करना ही बेकार है। सबसे बड़ी बात यह है कि नेपाल की आम जनता ने ही आखिर ऐसी बेरुखी क्यों दिखाई? तय बात है कि हिन्दुत्व की विचारधारा मानने वालों से उसको कोई आसरा नही मिला होगा। नेपाल और भारत के हिन्दुत्ववादी आर्थिक शिखर पुरुष दोनों ही देशों के समाजों को विचारधारा के अनुसार चलाते तो शायद ऐसा नहीं होता। हिन्दुत्व एक विचाराधारा नहीं है बल्कि एक दर्शन है। उसके अनुसार धनी, बुद्धिमान और शक्तिशाली वर्ग के लोगों को प्रत्यक्ष रूप से निम्न वर्ग का संरक्षण करना चाहिये। कुशल और अकुशल श्रम को समान दृष्टि से देखना चाहिये पर पाश्चात्य सभ्यता को ओढ़ चुका समाज यह नहीं समझता। यहां तो सभी अंग्रेजों जैसे साहब बनना चाहते हैं। जो गरीब या मजदूर तबका है उसे तो कीड़े मकौड़ों की तरह समझा जाता है। इस बात को भुला दिया गया है कि धर्म की रक्षा यही गरीब और मजदूर वर्ग अपने खून और पसीने से लड़कर समाज रक्षा करता है।
हमारे देश में कई ऐसे संगठन हैं जो हिन्दुत्व की विचारधारा अपनाते हुए अब गरीबों और मजदूरों के संरक्षण कर रहे हैं। उनको चाहिये कि वह अपने कार्य का विस्तार करें और भारत से बाहर भी अपनी भूमिका निभायें पर वह केवल नारे लगाने तक नहीं रहना चाहिये। इन हिन्दू संगठनों को परिणामों में शीघ्रता की आशा न करते हुए दूरदृष्टि से अपने कार्यक्रम बनाना चाहिये।
नेपाल का हिन्दू राष्ट्र न रहना इतनी बड़ी समस्या नहीं है जितनी परेशानी इस बात पर होने वाली है कि वह एक अप्राकृतिक विचाराधारा की तरफ बढ़ गया है जो वहां की संस्कृति और धर्म के वैसे ही नष्ट कर डालेगी जैसे कि चीन में किया है। भारत और नेपाल के आपस में जैसे घनिष्ट संबंध हैं उसे देखते हुए यहां के आर्थिक, सामाजिक तथा बौद्धिक शिखर पुरुषों को उस पर ध्यान देना चाहिये।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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गरीब कैसे दिखें-हिंदी हास्य व्यंग्य (grib saise dikhe-hindi hasya vyangya)


आस्ट्रेलिया के एक पुलिस अधिकारी ने भारतीयों को हमले से बचने के लिये गरीब दिखने की सलाह क्या दी, उस पर भारत के बुद्धिजीवी समुदाय में  बावेला मच गया है।  कोई इस सलाह को लेकर  उसकी नाकामी पर बरस रहा है तो कोई उसे बेवकूफ बता रहा है।  अपनी समझ में उसने एक बहुत गज़ब का विचार व्यक्त किया है। दरअसल यह कोई उसका विचार नहीं बल्कि यह तो पुराना ही दर्शन है। अगर अपनी रक्षा करनी है तो उसके लिये सबसे पहला उपाय स्वयं को ही करना है पर विकासवादियों की संगत में सभी प्रकार के बुद्धिजीवियों की सोच केवल अब इसी बात पर रहती है कि ‘आदमी चाहे कैसे भी चले,, उसे रास्ता या अदायें बदलने की सलाह देना उसकी आजादी का उल्लंघन है क्योंकि हर आदमी को सुरक्षा देना राज्य का काम है।’
इस प्रवृत्ति ने लोगों को अपंग बना दिया है और न तो कोई अपनी रक्षा के लिये शारीरिक कला में रुचि लेता है और न ही इस बात का प्रयास करता है कि उसकी संपत्ति भले ही कितनी भी क्यों न हो, पर उसका प्रदर्शन न करें ताकि अभावों से ग्रसित आसपास के लोगों के समुदाय में कुंठा का भाव न आये-यही भाव अंततः धनपति समाज के प्रति कभी निराशा के रूप में अभिव्यक्त होता है तो कभी क्रोध से उपजी हिंसा के रूप  मे।
मगर नहीं! भारत में बहुत कम लोग हैं जिनको ऐसी सलाह का मतलब समझ में आयेगा। वैसे उस आस्ट्रेलियाई पुलिस अधिकारी के अज्ञान पर तरस भी आ रहा है। वह किसी अफ्रीकी देश के लोगों को कहता तो समझ में आ सकता था मगर भारतीयों को ऐसी सलाह उसने यह विचार किये बिना ही दी है कि यहां के लोग पैसा कमाते ही इसलिये है कि उसका प्रदर्शन कर दूसरों के मुकाबले अपने आपको श्रेष्ठ साबित करें।  एक आदमी को जिंदा रहने के लिये क्या चाहिये! पेट भर रोटी, पूरा तन ढंकने के लिये कपड़े-यहां फैशन से कम कपड़ा पहनने वालों की बात नहीं हो रही’-और सिर ढंकने के लिये छत।  देश में हजारों मजदूर परिवार हैं जो  ईंटों के कच्चे घर बनाकर रहते हैं।  उनकी बीवियां सुबह उठकर खाना बनाती हैं, बच्चे पालती हैं और फिर पति के साथ ईंटें और रेत ढोने का भी का करती हैं  फिर भी  वह उनके चेहरा पर संतुष्टि के भाव रहते  हैं।  यही कारण है कि भारत का ऐसा मजदूर वर्ग  बाजार और प्रचार के लक्ष्य के दायरे से बाहर का समाज है।  अपने यहां एक अभिनेता सभी संतुष्टों को असंतुष्ट होने का संदेश एक विज्ञापन में देता है।  ‘डोंट बी संतुष्ट’ का नारा लगाने वाले  अभिनेता के उस विज्ञापन का लक्ष्य तो केवल वह लोग हैं जिनका पैसे के मामलें में हाजमा खराब है।  यही कारण है कि उसके संदेश का आशय यही है कि आदमी को कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिये, बल्कि असंतुष्ट होकर खरीददारी करना चाहिए।
हमारे देश के टीवी चैनल, फिल्में और रेडियो ऐसे असंतोष फैलाने वाले संदेशवाहक की छबि बनाने में जुटे हैं। सभी जानते हैं कि इस तरह के  का प्रभाव हमारे देश के लोगों के दिमाग पर होता है-टीवी, फिल्म और रेडियो के प्रभाव सभी जानते हैं।
लोग बाहर जा इसलिये ही रहे हैं कि उनमें असंतोष है।  हालत यह है कि बाहर जाने के लिये लोग पैसा खर्च कर रहे हैं। यह राशि इतनी अधिक होती है कि अनेक माध्यम और गरीब लोग यह सोचते हैं कि इतना पैसा होने पर वह स्वयं विदेश जाने की तो सोचते ही नहीं।
ऐसे धनाढ्य लोग इतना पैसा देश में रखकर क्या करेंगे? फिर इधर कर वसूलने वालों की नज़रे भी लगी रहती हैं। इसलिये कोई पैसा बाहर भेज रहा है तो कोई खुद ही जा रहा है। कहीं पैसे को अपने पीछे कोई छिपा रहा है तो कोई पैसे के पीछे छिप रहा है। 
देश में आदमी दिखाता है कि ‘देखो फारेन जा रहा हूं।’  उधर आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और अमेरिका में भी वह अपनी दौलत दिखाता है यह प्रदर्शित करने के लिये कि उसे वहां के लोग ऐरा गैरा भारतीय न समझें।  हमारे देश के एक माननीय व्यक्ति ने बस इतना कहा कि ‘भारत के छात्र ऐसे विषयों के लिये बाहर जाते ही क्यों है, जो यहां भी उपलब्ध हैं। जैसे बच्चों की हजामत बनाना या बीमारों की सेवा करना।’
उस पर भी बावेला मच गया।  मतलब समझाओ नहीं!  हमारे पास इतना पैसा है उसका प्रदर्शन न करें तो फिर फायदा क्या, पता नहीं वह कैसे (?) तो कमाया है? यहां खर्च नहीं कर सकते क्योंकि टैक्स बचाने से अधिक यह बताने की चिंता है कि वह आया कहां से?’ बाहर जाने पर   ऐसी समस्या नहीं आती है पर वहां भी उसका दिखावा न करें तो इतना पैसा हमने या हमारे पिताजी ने  कमाया किसलिए?
इस मामले में हमारे बुजुर्गों ने जो सिखाया सादगी और चालाकी का पाठ  याद आता है।   यह लेखक  अपने ताउजी के साथ दूसरे शहर जा रहे था।  उनके पास बड़ी रकम थी-आज वह अधिक नहीं दिखती पर उस समय कोई कम नहीं  थी। उन्होंने लेखक को बताया कि उनका पैसा एक पुराने थैले में है जिसमें खाने का सामान रखा है जिसका उपयोग वह बस में ही करेंगे।
अटैची उन्होंने अपने हाथ में पकड़कर  रखी पर थैला टांग दिया।  कभी कभी वह थैले से  सामान निकालते और फिर उसे वहीं टांग देते।  ऐसे दिखा रहे थे की जैसे उनको थैले की परवाह ही नहीं है
अनेक बार हम बस से दोनों साथ उतरे और वह इतनी  बेपरवाही से चल रहे थे कि किसी को अंदाज ही नहीं हो सकता था कि उनके उस पुराने मैले थैले में खाने के सामान के नीचे एक बहुत बड़ी रकम है।   उनसे सीख मिली तो अब हम भी जब बाहर जाते हैं तो अपना कीमती सामान कभी अटैची में न रखकर खाने के सामान के साथ पुराने थैले में रख देते हैं, पर्स तो करीब करीब खाली ही रखते हैं।  कहीं पर्स खोलते हैं तो पांच दस रुपये कागजों से ऐसे निकालते हैं कि जैसे बड़े बुरे दिन से गुजर रहे हैं।
अपना अपना विचार है। हर आदमी इस पर चले या नहीं। आस्ट्रेलिया के उस पुलिस अधिकारी ने सलाह अपने किसी अन्य दृष्टिकोण से दी होगी पर उस पर हमारा भी अपना  एक दृष्टिकोण है? साथ ही यह भी जानते हैं कि अपने देश में बहुत कम लोगों को  इस दृष्टिकोण से संतुष्ट कर पायेंगे? हर शहर में नारियों के गले से मंगलसूत्र या सोने का हार खींच लेने की घटनायें होती हैं पर इससे क्या फर्क पड़ता है! एक गया तो दूसरा आ जाता है।  अनेक बार प्रशासन अपने इशारे अखबार में छपवाता है कि त्यौहार का अवसर है इसलिये थोड़ा ध्यान रखें!’ मगर सुनता कौन है? अपना अपना दृष्टिकोण है

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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प्रजातंत्र में ब्लॉग की महत्वपूर्ण भूमिका-हिंदी लेख (democracy and hindi blog-hindi article)


भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या सात करोड़ से ऊपर है-इसका सही अनुमान कोई नहीं दे रहा। कई लोग इसे साढ़े बारह करोड़ बताते हैं। इन प्रयोक्ताओं को यह अनुमान नहीं है कि उनके पास एक बहुत बड़ा अस्त्र है जो उनके पास अपने अनुसार समाज बनाने और चलाने की शक्ति प्रदान करता है-बशर्ते उसके उपयोग में संयम, सतर्कता और चतुरता बरती जाये, अन्यथा ऐसे लोगों को इस पर नियंत्रण करने का अवसर मिल जायेगा जो समाज को गुलाम की तरह चलाने के आदी हैं।

यह इंटरनेट न केवल दृश्य, पठन सामग्री तथा समाचार प्राप्त करने के लिये है बल्कि हमें अपने फोटो, लेखन सामग्री तथा समाचार संप्रेक्षण की सुविधा भी प्रदान करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि हम केवल प्रयोक्ता नहीं निर्माता और रचयिता भी बन सकते हैं। अनेक वेबसाईट-जिनमें ब्लागस्पाट तथा वर्डप्रेस मुख्य रूप से शामिल हैं- ब्लाग की सुविधा प्रदान करती हैं। अधिकतर सामान्य प्रयोक्ता सोचते होंगे कि हम न तो लेखक हैं न ही फोटोग्राफर फिर इन ब्लाग की सुविधा का लाभ कैसे उठायें? यह सही है कि अधिकतर साहित्य बुद्धिजीवी लेखकों द्वारा लिखा जाता है पर यह पुराने जमाने की बात है। फिर याद करिये जब हमारे बुजुर्ग इतना पढ़े लिखे नहीं थे तब भी आपस में चिट्ठी के द्वारा पत्राचार करते थे। आप भी अपनी बात इन ब्लाग पर बिना किसी संबंोधन के एक चिट्ठी के रूप में लिखने का प्रयास करिये। अपने संदेश और विचारों को काव्यात्मक रूप देने का प्रयास हर हिंदी नौजवान करता है। इधर उधर शायरी या कवितायें लिखवाकर अपनी मित्र मंडली में प्रभाव जमाने के लिये अनेक युवक युवतियां प्रयास करते हैं। इतना ही नहीं कई बार अपने ज्ञान की अभिव्यक्ति के लिये तमाम तरह के किस्से भी गढ़ते हैं। यह प्रयास अगर वह ब्लाग पर करें तो यह केवल उनकी अभिव्यक्ति को सार्वजनिक रूप ही नहीं प्रदान करेगा बल्कि समाज को ऐसी ताकत प्रदान करेगा जिसकी कल्पना वह नहीं कर सकते।

आप फिल्म, क्रिकेट,साहित्य,समाज,उद्योग व्यापार, पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनल तथा उन अन्य क्षेत्रों को देखियें जिससे बड़े वर्ग द्वारा छोटे वर्ग पर प्रभाव डाला जा सकता है वहां पर कुछ निश्चित परिवारों या गुटों का नियंत्रण है। यहां प्रभावी लोग जानते हैं कि यह सभी प्रचार साधन उनके पास ऐसी शक्ति है जिससे वह आम लोगों को अपने हितों के अनुसार संदेश देख और सुनाकर उनको अपने अनुकूल बनाये रख सकते हैं। क्रिकेट में आप देखें तो अनेक वर्षों तक एक खिलाड़ी इसलिये खेलता  है क्योंकि उसे पीछे खड़े आर्थिक शिखर पुरुष उसका व्यवसायिक उपयोग करना चाहते हैं। फिल्म में आप देखें तो अब घोर परिवारवाद आ गया है। सामान्य युवकों के लिये केवल एक्स्ट्रा में काम करने की जगह है नायक के रूप में नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे आर्थिक, सामाजिक तथा प्रचार के शिखरों पर जड़ता है। आप पत्र पत्रिकाओं में अगर लेख पढ़ें तो पायेंगे कि उसमें या तो अंग्रेजी के पुराने लेखक लिख रहे हैं या जिनको किसी अन्य कारण से प्रतिष्ठा मिली है इसलिये उनके लेखन को प्रकाशित किया जा रहा है। पिछले पचास वर्षों में कोई बड़ा आम लेखक नहीं आ पाया। यह केवल इसलिये कि समाज में भी जड़ता है। याद रखिये जब राजशाही थी तब यह कहा जाता था कि ‘यथा राजा तथा प्रजा’, पर लोकतंत्र में ठीक इसका उल्टा है। इसलिये इस जड़ता के लिये सभी आम लोग जिम्मेदार हैं पर वह शिखर पर बैठे लोगों को दोष देकर अपनी असमर्थता जाहिर करते हैं कि ‘क्या किया जा सकता है।’

इस इंटरनेट पर जरा गौर करें। अक्सर आप लोग देखते होंगे कि समाचार पत्र पत्रिकाओं में में उसकी चर्चा होती है। आप सुनकर आश्चर्य करेंगे कि इनमें से कई ऐसे आलेख होते हैं जिनको इंटरनेट पर ब्लाग से लिया जाता है-जब किसी का नाम न दिखें तो समझ लें कि वह कहीं न कहीं इंटरनेट से लिया गया है। यह सब इसलिये हो रहा है क्योंकि अधिकतर इंटरनेट प्रयोक्ता केवल फोटो देखने या अपने पढ़ने के लिये बेकार की सामग्री पढ़ने में व्यस्त हैं। उनकी तरफ से हिंदी भाषी लेखकों के लिये प्रोत्साहन जैसा कोई भाव नहीं है। ऐसा कर आप न अपना समय जाया कर रहे हैं बल्कि अपने समाज को जड़ता से चेतन की ओर ले जाने का अवसर भी गंवा रहे हैं। वह वर्ग जो समाज को गुलाम बनाये रखना चाहता है कि फिल्मी अभिनेता अभिनेत्रियों के फोटो देखकर आप अपना समय नष्ट करें क्योंकि वह तो उनके द्वारा ही तय किये मुखौटे हैं। आपके सामने टीवी और समाचार पत्रों में भी वही आ रहा है जो उस वर्ग की चाहत है। ऐसे में आपकी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं था तो झेल लिये। अब इंटरनेट पर ब्लाग और ट्विटर के जरिये आप अपना संदेश कहीं भी दे सकते हैं। इस पर अपनी सक्रियता बढ़ाईये। जहां तक इस लेखक का अनुभव है कि एक एस. एम. एस लिखने से कम मेहनत यहां पचास अक्षरों का एक पाठ लिखने में होती है। जहां तक हो सके हिंदी में लिखे गये ब्लाग और वेबसाईट को ढूंढिये। स्वयं भी ब्लाग बनाईये। भले ही उसमें पचास शब्द हों। लिखें भले ही एक माह में एक बार। अगर आप समाज के सामान्य आदमी है तो बर्हिमुखी होकर अपनी अभिव्यक्ति दीजिये। वरना तो समाज का खास वर्ग आपके सामने मनोरंजन के नाम पर कार्यक्रम प्रस्तुत कर आपको अंतर्मुखी बना रहा है ताकि आप अपनी जेब ढीली करते रहें। आप किसी से एस. एम. एस. पर बात करने की बजाय अपने ब्लाग पर बात करें वह भी हिंदी में। ऐसे टूल उपलब्ध हैं कि आप रोमन में लिखें तो हिंदी हो जाये और हिंदी में लिखें तो यूनिकोड में परिवर्तित होकर प्रस्तुत किये जा सकें।
याद रखें इस पर अपनी अभिव्यक्ति वैसी उग्र या गालीगलौच वाली न बनायें जैसी आपसी बातचीत में करते हैं। ऐसा करने का मतलब होगा कि उस खास वर्ग को इस आड़ में अपने पर नियंत्रण करने का अवसर देना जो स्वयं चाहे कितनी भी बदतमीजी कर ले पर समाज को तमीज सिखाने के लिये हमेशा नियंत्रण की बात करते हुए धमकाता है।
प्रसंगवश यहां यह भी बता दें कि यह ब्लाग भी पत्रकारिता के साथ ही चौथा स्तंभ है पांचवां नहीं जैसा कि कुछ लोग कह रहे हैं। सीधी सी बात है कि विधायिका, कार्यपालिका, न्याय पालिका और पत्रकारिता चार स्तंभ हैं। इनमें सभी में फूल लगे हैं। विधायिका में अगर हम देखें तो संसद, विधानसभा, नगर परिषदें और ग्राम पंचायतें आती हैं। कार्यपालिका में मंत्री, संतरी,अधिकारी और लिपिक आते हैं। न्याय पालिका के विस्तारित रूप को देखें तो उसमें भी माननीय न्यायाधीश, अधिवक्ता, वादी और प्रतिवादी होते हैं। उसी तरह पत्रकारिता में भी समाचार पत्र, पत्रिकायें, टीवी चैनल और ब्लाग- जिसको हम जन अंतर्जाल पत्रिका भी कह सकते हैं- आते हैं। इसे लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ केवल अभिव्यक्ति के इस जन संसाधन का महत्व कम करने के लिये प्रचारित किया जा रहा है ताकि इस पर लिखने वाले अपने महत्व का दावा न करे।

कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी के ब्लाग जगत में आपकी सक्रियता ही इंटरनेट या अंतर्जाल पर आपको प्रयोक्ता के साथ रचयिता बनायेगी। जब ब्लाग आम जन के जीवन का हिस्सा हो जायेगा तक अब सभी क्षेत्रों में बैठे शिखर पुरुषों का हलचल देखिये। अभी तक वह इसी भरोसे हैं कि आम आदमी की अभिव्यक्ति का निर्धारण करने वाला प्रचारतंत्र उनके नियंत्रण में इसलिये चाहे जैसे अपने पक्ष में मोड़ लेंगे। हालांकि अभी हिंदी ब्लाग जगत अधिक अच्छी हालत में नहीं है- इसका कारण भी समाज की उपेक्षा ही है-तब भी अनेक लोग इस पर आंखें लगाये बैठे हैं कि कहीं यह माध्यम शक्तिशाली तो नहीं हो रहा। इसलिये पांचवां स्तंभ या रचनाकर्म के लिये अनावश्यक बताकर इसकी उपेक्षा न केवल स्वयं कर रहे हैं बल्कि समाज में भी इसकी चर्चा इस तरह कर रहे हैं कि जैसे इसको बड़े लोग-जैसे अभिनेता और प्रतिष्ठत लेखक-ही बना सकते हैं। जबकि हकीकत यह है कि अनेक ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो अपने रोजगार से जुड़े काम से आने के बाद यहां इस आशा के साथ यहां लिखते हैं कि आज नहीं तो कल यह समाज में जनजन का हिस्सा बनेगा तब वह भी आम लोगों के साथ इस समाज को एक नयी दिशा में ले जाने का प्रयास करेंगे। इसलिये जिन इंटरनेट प्रयोक्ताओं की नजर में यह आलेख पड़े वह इस बात का प्रचार अपने लोगों से अवश्य करें। याद रखें यह लेख उस सामान्य लेखक है जो लेखन क्षेत्र में कभी उचित स्थान न मिल पाने के कारण यह लिखने आया है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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शिशुओं का क्रीड़ाश्रम और मिठाई-हिन्दीहास्य व्यंग (child story and sweats-hindi vyanga


सुबह दीपक बापू सड़कों पर पानी से भरे गड्ढों में गिरने से बचते हुए जल्दी जल्दी ही आलोचक महाराज के घर पहुंचे। उस दिन बरसात होने से उनको आशा थी कि आलोचक महाराज प्रसन्न मुद्रा में होंगे। इधर उमस के मारे सभी परेशान थे तो आलोचक महाराज भी भला कहां बच सकते थे। ऐसे में दीपक बापू को यह आशंका थी उनकी कविताओं पर आलोचक महाराज कुछ अधिक ही निंदा स्तुति कर देंगे। वैसे भी दीपक बापू की कविताओं पर आलोचक महाराज ने कभी कोई अच्छी मुहर नहीं लगायी पर दीपक बापू आदत से मजबूर थे कि उनको दिखाये बगैर अपनी कवितायें कहीं भेजते ही नहीं थे।

सड़क से उतरकर जब उनके दरवाजे तक पहुंचे तो दीपक बापू के मन में ऐसे आत्मविश्वास आया जैसे कि मैराथन जीत कर आये हों। इधर मौसम ने भी कुछ ऐसा आत्मविश्वास उनके अंदर पैदा हुआ कि उनको लगा कि ‘वाह वाह’ के रूप में उनको एक कप मिल ही जायेगा। उन्होंने दरवाजे के अंदर झांका तो देखा आलोचक महाराज सोफे पर जमे हुए सामने टीवी देख रहे थे। वहां से बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी। उन्होंने आलोचक महाराज
को हाथ जोड़कर नमस्ते की भी और मुख से उच्चारण कर उनका ध्यान आकर्षित करने का भी प्रयास किया-यह करना ही पड़ता है जब आदमी आपकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा हो।
आलोचक महाराज ने उनकी तरफ ध्यान ही नहीं दिया। दीपक बापू ने जरा गौर से देखा तो पाया कि उनकी आंखों से आंसु निकल रहे थे। दीपक बापू सहम गये। क्या सोचा था क्या हो गया। कहां सोचा था कि मौसम अच्छा है आलोचक महाराज का मूड भी अच्छा होगा। पहली बार अपनी कविताओं पर ‘वाह वाह रूपी कविताओं का कप’ ले जायेंगे। कहां यह पहले से भी बुरी हालत में देख रहे हैं। वैसे दीपक बापू ने आलोचक महाराज को कभी हंसते हुए नहीं देखा था-तब भी जब उनका सम्मान हुआ था। आज इस तरह रोना!
‘क्या बात है आलोचक महाराज! मौसम इतना सुहाना है और आप है कि रुंआसे हो रहे हैं।‘दीपक बापू बोले।
आलोचक महाराज ने कहा-‘देखो सामने! टीवी पर बच्चा रो रहा है। इसके माता पिता ने इसको खुद ऐसे लोगों को सौंपा है जो इस वास्तविक शो में नकली माता पिता की भूमिका निभा रहे हैं। वह लोग इतने नासमझ हैं कि उनको पता ही नहीं कि बच्चा अपनी माता के बिना कभी खुश नहीं रह सकता।’
दीपक बापू ने कहा-‘महाराज! यह तो सीन ही नकली है! आप कहां चक्कर में पड़ गये। अब यह टीवी बंद कर दीजिये। हम अपने साथ मिठाई का डिब्बा साथ में ले आयें हैं ताकि आप उनको खाते हुए हमारी यह दो कविताओं पर अपना विचार व्यक्त कर सकें।’
आलोचक महाराज ने कहा-‘बेवकूफ आदमी! समाज में कैसी कैसी घटनायें हो रही हैं उस पर तुम कभी सोचते ही नहीं हो। अरे, देखो इन बच्चों की चीत्कार हमारा हृदय विदीर्ण किये दे रही है। अरे, हमें इसके माता पिता मिल जायें तो उनको ऐसी सुनायें जैसी कभी तुम्हारी घटिया कविताओं पर भी नहीं सुनाई होगी।’
दीपक बापू ने कहा-‘महाराज हमारी कविताओं पर हमें क्या मिलता है? उनको तो इस बच्चे के अभिनय पर पैसा मिला होगा। ऐसे कार्यक्रमों में पहुंचना भी भाग्य समझा जाता है। इन शिशुओं ने जरूर अपने पूर्व जन्म में कोई पुण्य किया होगा कि पैदा होते ही यह कार्यक्रम उनको मिल गया। बिना कहीं प्रशिक्षण लिये ही अभिनय करने का अवसर मिलना कोई आजकल के जमाने में आसान नहीं है। खासतौर से जब आपके माता पिता ने भी यह नहीं किया हो।’
दीपक बापू की इस से आलोचक महाराज को इतना गुस्सा आया कि दुःख अब हवा हो गया और इधर बिजली भी चली गयी। इसने उनका क्रोध अधिक बढ़ा दिया। वह दीपक बापू से बोले-‘रहना तुम ढेर के ही ढेर! यह पूर्व जन्म का किस्सा कहां से लाये। तुम्हें पता है कि अपने देश में बाल श्रम अपराध है।’
दीपक बापू ने स्वीकृति में यह सोचकर हिलाया कि हो सकता है कि आलोचक महाराज की प्रसन्नता प्राप्त हो। फिर आलोचक महाराज ने कहा-‘अरे, इस पर कुछ लिखो। यह बाल श्रम कानून के हिसाब से गलत है। इस पर कुछ जोरदार लिखो।’
दीपक बापू बोले-महाराज, आपके अनेक शिष्य इस पर लिख रहे हैं। हमारे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है। यह शिशु, बालक, नवयुवक, युवक, अधेड़ और वृद्ध का संकट अलग अलग प्रस्तुत किया है जबकि हमें सभी का संकट एक दूसरे से जुड़ा दिखाई देता है। फिर इसमें भी भेद है स्त्री और पुरुष का। हम यह विभाजन कर नहीं पाते। हमने तो देखा है कि एक का संकट दूसरे का बनता ही है। वैसे आपने कहा कि यह बालश्रम कानून के विरुद्ध है पर यह तो शिशु श्रम है। इस विषय पर आप अपने स्थाई शिष्यों से कहें तो वह अधिक प्रकाश डाल सकेंगे। वैसे तो शिशु रोते ही हैं हालांकि उनको इसमें श्रम होता है और इससे उनके अंग खुलते हैं।’
आलोचक महाराज उनको घूरते हुए बोले-‘मतलब तुम्हारे हिसाब से यह ठीक हो रहा है। इस तरह बच्चों के रोने का दृश्य दिखाकर लोगों के हृदय विदीर्ण करना तुम्हें अच्छा लगता है। यह बालश्रम की परिधि में नहीं आता! क्या तुम्हारा दिमाग है कि इसे स्वाभाविक शिशु श्रम कह रहे हो?’
दीपक बापू बोले-‘महाराज, हमने कहां इसे जायज कहा? हम तो आपके शिष्यों के मुताबिक इसका एक विभाजन बता रहे हैं। हम तो कानून भी नहीं जानते इसलिये बालश्रम और शिशुश्रम में अंतर लग रहा है। वैसे माता पिता अपने बच्चे को इस तरह दूसरों को देकर पैसा कमाते होंगे। हालांकि वह भद्र लोग हैं पर इतना तो कर ही सकते हैं कि पैसा मिलने पर बच्चा कुछ देर रोए तो क्या? वैसे आपको तो यह पता ही होगा कि इस देश में इतनी गरीबी है कि लोग अपना बच्चा बेच देते हैं। कई औरतें किराये पर कोख भी देती हैं। यह अलग बता है कि ऐसे मामले पहले गरीबों में पाये जाते थे पर अब तो पैसे की खातिर पढ़े लिखे लोग भी यह करने लगे हैं। अरे, आप कहां इन वास्तविक धारावाहिकों की अवास्तविकताओं में फंस गये। आप तो हमारी कविता पढ़िये जो उमस और बरसात पर लिखी गयी हैं बिल्कुल आज ही!’
आलोचक महाराज ने कागज हाथ में लिये और उसे फाड़ दिये फिर कहा-‘वैसे भी तुम श्रृंगार रस में कभी नहीं लिख पाते। जाओ, इस कथित शिशुश्रम पर कुछ लिखकर लाओ। और हां, हास्य व्यंग्य कविता मत लिख देना। इस पर बीभत्स रस की चाशनी में डुबोकर कुछ लिखना और मुझे पंसद आया तो उसे कहीं छपवा भी दूंगा।’
दीपक बापू बोले-‘महाराज, आपके चेलों का असर आप पर भी हो गया है। यह तो गलत है कि आपके शिष्य बालश्रम, नारी अत्याचार, युवा बेरोजगारी पर लिखते हैं पर शिशु श्रम पर हम लिखें।’
आलोचक महाराज ने घूरकर पूछा-यह बालश्रम और शिशुश्रम अलग अलग कब से हो गये?’
दीपक बापू बोले-‘हमें पता नहीं! पर हां, आपके शिष्यों को पढ़ते पढ़ते हम कभी इस विभाजन की तरफ निकल ही आते हैं। लिखते इसलिये नहीं कि हमें लिखना नहीं आता। वैसे आप कह रहे हो तो लिखकर आते हैं।’
दीपक बापू मिठाई का डिब्बा हाथ में वापस लेकर जाने लगे तो आलोचक महाराज बोले-‘यह मिठाई का डिब्बा वापस कहां लेकर जा रहे हो।’
दीपक बापू बोले-‘अभी आपके कथानुसार दूसरी रचना लिखकर ला रहा हूं। तब यहां खाली हाथ आना अच्छा नहीं लगेगा। इसलिये साथ लेकर जा रहा हूं।’
ऐसा कहते ही दीपक बापू कमरे से बाहर निकल गये क्योंकि उनको आशंका थी कि कहीं वह छीनकर वापस न लें। बाहर निकल कर वह इस बात से खुश हुए कि उनकी कवितायें सुरक्षित थी क्योंकि उनकी कार्बन कापी वह घर पर रख आये थे, वरना तो शिशुश्रम विषय पर उनके साथ ही मिठाई का डिब्बा भी भेंट चढ़ जाने वाला था।

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