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विभिन्न समाजों का पुराने ढर्रे पर चलना अब कठिन-आलेख


जाति, धर्म, भाषा और वर्ण के आधार पर हमारे देश में अनेक वर्षों से संगठित समाज चले आ रहे हैं और इसकी आदत वंशानुगत रूप से हमारे रक्त में ही उपस्थित है। हम कभी अपने को अपने समाज से अलग नहीं देख पाते। जबकि वास्तविकता यह है कि आधुनिक समय में इन समाजों का अस्तित्व केवल नाम को रह गया है और हमारे जीवन में समाज के होने की अनुभूति केवल शादी के लिये वर और वधू ढूंढने के समय ही हो पाती है अन्यथा जीवन में कोई अन्य मजबूत संपर्क अपने समाज से शायद ही रह पाता है। इसके बावजूद लोग अपना अस्तित्व इन खंडित समाजो में तलाश रहे हैं। हम अक्सर अपने पुराने लोगों पर अपढ़ और अनगढ़ का आरोप लगाते हैं पर शिक्षित होने के बावजूद कितना इन समाजों के दबाव से उबर पाये है यह कभी विचार नहीं कर पाते। इसके अलावा कुछ लोग अभी भी अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये समाजों का ही उपयोग करना श्रेयस्कर समझते हैं।

पुराने समय के शहर और गांव का परिदृश्य देखें तो संयुक्त परिवार की प्रथा तो थी ही साथ ही एक ही समाज के लोगों का घर और व्यवसायिक स्थल भी एक ही जगह स्थित होते थे। गलियां और मोहल्ले उनके समाजों के नाम से भी पुकारे जाते थे। वहां समाज एक सुव्यस्थित और संगठित रूप से दिखता था और लोग अपनी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिये एक दूसरे के साथ जुड़े रहते थे। आधुनिक समय में स्थिति बदलाव की तरफ बढ़ रही है। अब नये ढंग से कालोनी और बाजार बने हैं जहां विभिन्न समाजों के लोग केवल आर्थिक और व्यवसायिक कारणो के साथ ही अपनी रुचियों के अनुसार ही वहां रहते हैं। अपने समाज का व्यक्ति हो पास हो यह सब की इच्छा होती है पर न भी हो तो वह भय नहीं खाता।
नौकरी और व्यवसाय में संपर्क स्थापित करने वाले व्यक्तियों में कोई भी किसी जाति और धर्म का हो सकता है-अनेक स्थानों पर हमारे मित्र समूह होते हैं पर उनमें अपनी जति, धर्म या भाषा आधार न होकर व्यक्तिगत रूचियां, कार्य की प्रकृति और स्वभाव होता है। कहीं छह या आठ मित्रों का समूह होता है जहां जाति, भाषा, और धर्म के आधार पर सभी लोग अलग होते हैं पर उनका आपसी संपर्क कभी उसे उजागर नहीं कर पाता।
ऐसे बदलाव के बावजूद भी लोग खंडित समाज की तरफ ताकते हैं पर उनमें निराशा का बोध उत्पन्न होता है। आजकल के प्रतियोगिता के युग में सभी लोग एक दूसरे को पीछे छोड़ना चाहते हैं और ऐसे में कोई किसी के साथ रियायत नहीं करता पर चाहते सभी हैं कि समाजों से उनको सहयोग मिले। सबसे अधिक समस्या शादी विवाह में आती है पर जैसे अंतर्जातीय विवाहों की प्रवत्ति बढ़ रही है समाजों वह खंडित ढांचा अपने अस्त्तिव को खोता नजर आ रहा है।
समाज में कुछ माता पिता अपने बेटी और बेटे के लिये अंतर्जातीय विवाह करने को तैयार हो जाते हैं तो इसमें कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं है यह अलग बात है इसमें उनके प्रयास कम उनके बच्चों का आपसी प्रेम ही इसका प्रेरक होता है। धीरे-धीरे लोग अब भौतिकता के युग में समाज द्वारा अपने सदस्य होने के नाते जो व्यक्ति आर्थिक दायित्व पूरे करने का जो दबाव बन रहा है, उसे अपनी सहनशक्ति से बाहर अनुभव करने लगे हैं और ऐसी कई घटनायें सामने आ रही है जिसमें माता पिता न केवल बच्चों को अंतर्जातीय विवाह की अनुमति देते बल्कि उसमें स्वयं ही दोनों पक्ष भी शामिल हो रहे हैं। ऐसी घटनायें नगण्य हैं पर वह इस बात का संकेत हैं कि विभिन्न समाज अपने पुराने ढर्रे पर अधिक नहीं चल पायेंगें। किसी भी समाज केे शीर्षस्थ लोग कितना भी अपने समाज का गुणगान कर लें पर वह इस तथ्य का नकार नहीं सकते कि भौतिकतावाद ने उनके समाज के सदस्यों को अलग करना शुरू कर दिया है। अब तो ऐसा लगता है कि समाजों का आधार केवल शादी विवाह ही था और जैसे जैसे अंतर्जातीय विवाहों को सामाजिक स्वीकृति मिलती जायेगी उनके अस्तित्व का संकट बढ़ता ही जायेगा। यही कारण है कि आज भी सभी समाज के शीर्षस्थ बाहुबली अपने समाज में अंतर्जातीय विवाह करने वाले युगलों और उनके परिवारों को दंडित करने का प्रयास करते है। देखा जाये तो सभी समाजों का छोटे और मध्यम वर्ग के लोगों का बौद्धिक, आर्थिक और शारीरिक दोहन कई बरसों से किया जाता रहा पर अब आधुनिक समय में जब लोगों को इससे मुुक्ति पाने का अवसर मिला तो वह इससे मुक्त हो रहे हैं-यह गति धीमी है पर आगे नये समाज के निर्माण के संकेत तो अब मिलने लगे है।
फिर भी कुछ बौद्धिक, प्रबुद्ध, धनी और प्रतिष्ठित होने के साथ ही कुंठित लोगों का एक वर्ग है जो अपने स्वार्थ और अज्ञान के कारण इस बदलते समाज को रोकना चाहता है। ऐसे कुंठित और अल्पाज्ञानी लोग अभी भी अपने समाज के सदस्यों को उसके आधार पर अपने साथ करने का प्रयास करते हैं। लोग उनके सामने हामी भर भी देते हैं पर दोनों ही दिल से जानते हैं कि यह एक दिखावा है।

यह इस ब्लाग दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका पर लिखी गया पाठ है। इसके कहीं अन्य प्रकाशन की अनुमति नहीं है। अगर कहीं अन्य प्रकाशित करने की जानकारी मिलें तो इस पते पर सूचना दें।
दीपक भारतदीप, लेखक एवं संपादक

अब समय बदल गया है भले ही कुछ लोग जानते हुए भी उससे मूंह फेरना चाहते हैं। अब तो इंटरनेट का युग हैं इसमेें भी कुछ लोग ऐसे व्यवहार करना चाहते हैं जैसे कि पहले लोग किया करते थे। मगर कुछ समझदार लोग हैं जो अपनी व्यवाहारिक कठिनाईयों से जूझते हुए यह अनुभव करते हैं कि समाज अब उनका सहायक नहीं है और वह भले ही मजबूरी में ही सही उससे अलग होने को तैयार हो जाते हैं। कई जगह उनका विरोध होता है पर ऐसा करने वाले लोगों की व्यवहारिक कठिनाईयों को दूर करने का माद्दा नहीं रखते। इसलिये जिन लोगों को अपने समाज से दूरी बनाने में झिझक हो उसे अब अपने हृदय से मिटा देना चाहिए। अगर उनके बच्चों ने विजातीय विवाह का संकल्प लिया है तो उसमें उसका सहायक होने में झिझक नहीं करना चाहिए। इसके कारण यह है कि विवाह के बाद भी बच्चों को अपने अभिभावकों की आवश्यकता होती है और अगर उनके साथ वह दूरी बनायेंगे तो हो सकता है कि वह अपना वैवाहिक जीवन अच्छी तरह नहीं गुजार सकें। ऐसे में समाज तो उनके पास आने से रहा और वैसे ही सजातीय विवाह करने पर कौन कोई किसके पास कठिनाई में आता है? ऐसे में अभिभावकों को अपनी जिद्द छोड़ना चाहिए। इस लेखक ने कुछ ऐसे अंतर्जातीय विवाहों में शामिल होकर यही अनुभव किया है कि जिसमें माता पिता स्वयं शरीक होते हैं वह बच्चे आगे भी खुश रहते हैं। बदलते समय में समाज का बदलना स्वभाविक है और उसे रोकना अपने लिये कठिनाई उत्पन्न करना है।
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अच्छा स्वास्थ्य भी धन है, छिपा कर रखें:हास्य-व्यंग्य


स्वास्थ्य भी एक धन होता है और जिस तरह लोगों से धन छिपाया जाता है उसी तरह अपना अच्छा स्वास्थ्य भी अब छिपाना चाहिए। आजकल धन तो कई लोगों के पास मिल जाता है पर अच्छा स्वास्थ्य सभी के पास नहीं होता। अगर आप कार्यालय या परिवार में किसी काम से पीछा छुड़ाना चाहते हैं तो खराब स्वास्थ्य का बहाना बना दीजिये।

समय ने करवट ली है। कहां तो लोग अपने आपको स्वस्थ साबित करने के लिए अपनी बीमारी छिपाते थे और कहां आजकल अपने को समस्याओं से बचने के लिए बीमार घोषित कर देते हैं।

आम तौर से मैं कभी भी बीमार होते हुए भी बीमारी का बहाना नहीं करता। कारण यह है कि कुछ बीमारियां तो काम करने से स्वतः ही दूर हो जातीं है। आलस्य से सोने या कम न करने से कई बीमारियां बिना बुलाये आ जातीं है। हालांकि मैं देखता आ रहा हूं कई लोग मेरी इस प्रवृत्ति का लाभ उठाते हुए मुझे कई ऐसे काम देते हैं जो वह स्वयं कर सकते हैं। कहते हैं-‘तुम जरा यह कर देना। मैं आज ठीक नहीं हूं। मेरे घर में शादी है तुम मेरे लिए सब्जी ले आना।’ या कहते हैं कि ‘तुम अपने काम से जाते हो, उससे थोड़ा दूर हमारी दवा मिलती हैं, थोड़ा चलकर हमारी दवा ले आना। हम तो चल नहीं सकते’
आशय यह है कि तुम ठीक हो तो हमारा काम कर दो। कार, मोटर सायकिल और स्कूटर की सुविधा होते हुए भी लोग चलने से लाचार हैं। एक बार एक शादी में शामिल होने हम सुबह ही एक निजी व्यक्ति के घर पहुंचे। उसके पास कार स्कूटर और मोटर सायकिल सब हैं। मुझे देखते ही वह बोला-‘‘यार अच्छा हुआ तुम आये। मेरे घर मेहमान हैं। कहीं काम से नहीं जा पा रहा हूं। तुम तो एकदम निजी आदमी हो, मेरे लिए किराये का सामान ले आओ।’
हमने अपनी पत्नी को वहीं छोड़ा और उसके किराये का सामान लाने के लिए स्कूटर चालू किया तो वह बोला-‘‘तुम अपना स्कूटर यहीं छोड़ जाओ। मैं अपने बेटे के साथ कुछ रिश्तेदारों के पास जा रहा हूूं। तुम भले ही आटो या टेम्पो से चले जाओ। हमारी कार, स्कूटर और मोटरसायकिल खराब पड़ी हैं। फिर तुम्हें पता है कि बीमार रहता हूं। आटो में चल नहीं सकता। तुम तो स्वस्थ हो चले जाओगे।’

मैंने उसकी बात मान ली। रात को शादी में वह सज्जन अपने बेटे की बारात में नाच रहे थे। हमने उसे भी नजरंदाज किया। हमारी पत्नी ने बताया कि-‘वह झूठ बोल रहे थे कि उनकी कार, स्कूटर और मोटर साइकिल खराब पड़ी है। उनकी घर की औरतों से ही पता चला कि बाहर से आए रिश्तदेार शहर घूमने के लिए वाहन न मांगे इसलिए इनको दो दिन के लिए बीमार घोषित किया गया है।’
हमने इस पर भी अनदेखा कर दिया। रात को दो बजे घर लौटते समय हमारा स्कूटर चलते-चलते बंद हो गया तो हमारा माथा ठनका। मेरे स्कूटर का सुरक्षित भंंडार (रिजर्व) का सूचक यंत्र ढंग से काम नहीं कर रहा था। मैंने अपनी जेब से टार्च निकाली तो टंकी को खाली पाया जबकि मैं सुबह ही उनके घर जाते हूए तीन लीटर पैट्रोल भरवाकर ले गये था। तब हम अपने स्कूटर को दो किलोमीटर घसीटते हुए पैट्रोल पंप तक ले आये। हांफते हुए हम इस बात के लिए अपने को कोस रहे थे कि हम क्यों दूसरों के सामने इतने फिट बने रहते है।

उस दिन हमें दूसरे शहर से एक संदेश मिला कि आप हमारी लड़की को आज ही अमुक सामान खरीद कर पहुंचा आओ। उसके ससुराल वालों की यह मांग है कि पहले बच्चे के जन्म दिन पर अमुक-अमुक चीज बहु के मायके से आती हैं। अगली मुलाकात मेंं पैसे का भुगतान कर देंगे।
अपने काम की हानि कर मैं पत्नी को गर्मी में वह सामान बाजार से खरीदकर उनकी लड़की के घर पहुंचा आया। दो दिन बाद वह फोन नाराज हो रहे थे कि आप लोगों ने कितना घटिया सामान वहां पहुंचा दिया। क्या हम पैसा नहीं दे रहे थे।
मैं और पत्नी एक दूसरे का मूंह देखते रहे। कुछ दिन पहले एक सज्जन घर आये और बोले-‘‘सुना है आप दूसरे शहर जा रहे हैं। वहां मेरी बेटी का सामान पहुंचा आयें तो अच्छा रहेगा। मैं तो बीमार होने की वजह से कहीं बाहर जा नहीं पाता।’
पत्नी ने इशारा किया पर हम समझे नहीं और सहमति दे दी। थोड़ी देर बाद वह अपनी कार से चार फलो के टोकरे और दो बड़े थैले निकाल कर लाये तो हमारी सांस रुकती लगी। मैंने उनसे कहा-‘पर हम कोई खुशी में नहीं जा रहे। किसी बीमार का हालचाल जानने जा रहे हैं। वह उस शहर में बहुत दूर है और पहले हमें उनके घर ही जाना हैं। फिर मेरे तो हाथ और पांव में इतना दर्द है कि अपना सामान उठाते ही डर लग रहा है। हां मेरी तुम्हारी भाभी (मेरी पत्नी) इसके लिए सक्षम हो तो पूछ लो। सामान देने भी इनके रिश्तेदार ही जायेंगे। मेरा जाना वहां संभव नहीं होगा।’
मेरी पत्नी ने कहा-‘‘कोई छोटा पैकेट होता तो ठीक है। मैं तो वैसे भी इतना वजन नहीं उठा सकती। रास्ते में भी इसका ध्यान रखना संभव नहीं है।वैसे भी मैं भी आजकल स्वस्थ कहां हूं। वह तो मजबूरी मेें जाना है।
वह सज्जन बोले-‘अगर ऐसा है तो मैं आपको सूची देता हूं उस सामान की खरीद कर हमारी बेटी को देना।’
पिछला अनुभव मैं भूला नहीं था और उससे कहा-‘आजकल मेरे हाथ पांव मौसम की वजह से दर्द कर रहे है। मैं चल ही कहां पाता हूं। कोई छोटा सामान दो तो हम किसी के हाथ से भिजवा देंगे। हम बीमार आदमी को देखने जा रहे हैं और इस तरह किसी का काम करेंगे तो उनको लगेगा कि हम वहां पिकनिक मनाने आये है।
वह चले गये तब हमारी समझ में आया कि लोग अपने को बीमार किसी से काम निकालने के लिए ही धोषित करते हैं। हमें बाद में पता चला कि वह सज्जन पंद्रह दिन में तीन बड़े शहर घूमकर आ चुके हैं। जहां चार लोग मिलते हैं अपने को बीमार साबित कर एक दूसरे से हमदर्दी बटोरते हैं। हम चुपचाप सुनते हैं अपनी बीमारी का इस तरह सार्वजनिक घोषणा करना हमें नहीं आता। एक तरह से अच्छा भी है। कई बार मैंने देखा कि किसी बीमारी को याद करो तो वह आयी ही जाती है। उच्च रक्तचाप तो ऐसा है कि सोचो है तो वह होना ही है। कभी-कभी अपना पाठ लिखने के बाद मैं सोचता हूं कि थक गया हूं तो थकावट लगने लगती है।
अब यह पता नहीं है कि लोग अपने को बीमार घोषित कर लोगों की हमदर्दी जुटाने का सोचते हुए बीमार होते हैं या वाकई बीमार होते हैं। हां, इतना जरूर समझ गया हूं कि अच्छा स्वास्थ्य भी धन है जिसे दूसरों से छिपा कर रखना ही ठीक है।

हिंदी ब्लागःलेखकों को नाम व नामा मिले बगैर अंतर्जाल पर पाठक जुटाना मुश्किल


अंतर्जाल पर लिखते हुए आप कोई बात दावे से नहीं कह सकते क्योंकि एक तो इसका क्षेत्र बृहद है और इसमें तकनीकी इतनी सूक्ष्म है कि उसमें पारंगत होना सभी के लिये संभव नहीं है। ब्लाग लिखने का विचार मुझे एक अखबार में इस पर प्रकाशित एक लेख से आया था। मुझे तकनीकी रूप से इसकी जानकारी संभवतः छ माह बाद हो पायी। लिखते हुए करीब डेढ़ वर्ष से ऊपर हो गया है और कई बातें मुझे सोचने पर बाध्य कर देतीं हैं। मेरी इस पर शुरूआत मेरे एक मित्र द्वारा एक अंतर्जाल पत्रिका का पता ढूंढ कर उस पर अपनी किताब भिजवाने के लिए व्यवस्था करने के अनुरोध से हुआ। था। मेरी उस मित्र से मुलाकात हुई मैंने उससे पूछा-‘आपको उस पत्रिका का पता किसने दिया था?’

उसने बताया कि वह अब इसे भूल चुका है। वह कंप्यूटर और इंटरनेट के बारे मेंे कुछ नहीं जानता। इसका आशय यह है कि बाहर कुछ लोग हैं जो पहले से ही अंतर्जाल पर हिंदी को बढ़ावा देने के लिये काम कर रहे हैं। यह लोग अंतर्जाल पत्रिकाओं और ब्लाग पर सक्रिय हैं। अपने कार्य को करते हुए वह यह आभास देते हैं कि यह उनका काम केवल शौक की वजह से है और इनको इसमें कोई अन्य लाभ नहीं है। अपने व्यवसायिक रहस्य उजागर न करना उनकी बाध्यता है पर मैं कोई व्यवसायिक ब्लाग लेखक नहीं हूं। मुझे उनसे कोई लाभ भी नहीं है कि मैं उनके इस व्यवसाय पर पर दृष्टिपात नहीं करूं। मैं उन पर प्रहार भी नहीं करना चाहता क्योंकि दूसरे की रोजीरोटी पर प्रहार करने वाला पापी होता है। यहां केवल मैं अपनी लेखकीय प्रतिबद्धता के तहत यह जानना चाहता हूं कि आखिर माजरा क्या है?

मेरा अनुमान है कि अंतर्जाल पर हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में लोगों को लिखने के लिए प्रेरित करने वाली कुछ प्रायोजित संस्थाऐं और लोगों के समूह है और जिन्हें लिखने से आर्थिक लाभ नहीं हैं उनके मित्र बनकर उन्हें प्रेरित करना शायद उनका उद्देश्य है और जिनको वह कुछ भुगतान कर रहे हैं उनको यह उत्तरदायित्व दिया गया है कि वह इन लेखकों के बीच में कुछ पाठ लिखकर और मुफ्त मे लिखने वाले ब्लाग लेखकों के पाठ पर टिप्पणी आदि देखकर प्रेरित करते रहें। छद्म और बेनाम लोगों की सक्रियता देखकर यह संशय किसी के मन में भी उठ सकता है। इतना ही नहीं कहीं कुछ ब्लाग लेखकों के सम्मेलन और शिविर लगाकर उनकी चर्चा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कर आम नागरिकों में इस ब्लाग का प्रचार कर यह लोग अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे है। कुछ संस्थाओं के पदाधिकारी समाचार पत्रों में अपने बयान देकर यह प्रकट कर रहे हैं कि हिंदी ब्लाग जगत को वह बहुत निकट से देख रहे हैं। मेरे विचार से यह सब हो रहा है पर इसमें आपत्ति योग्य कुछ नहीं है।

आज एक अंग्रेजी अखबार में मैंने एक ऐसी ही संस्था और उसके पदाधिकारी की बात पढ़ी। उनका यह संदेश था कि ब्लाग लेखकों को आम दर्शक या पाठक के लिए लिखना चाहिए जैसे संपादकीय वगैरह। इस बारे में मैं एक दो ब्लाग में पढ़ चुका हूं। यह बात शुरू भी मैंने ही अपने ब्लाग पर शुरू की और आम पाठक को प्रभावित करने के लिए जितना मै कर सकता हूं कर रहा हूं। इसका आशय यह है कि हिंदी को अंतर्जाल पर स्थापित करने वालों ने इसी लाइन पर आगे बढ़ने का निर्णय किया है। मगर यह आलेख मैं उन लोगों की प्रशंसा में नहीं लिख रहा। बल्कि उनके प्रयासों में जो कमी है उसको सबके सामने रख रहा हूं। पहले इन संस्थाओं के स्वरूप का आधार समझें। वह कौन हो सकतीं हैं? वह दावा करतीं हैं कि उनका इससे कोई आर्थिक लाभ नहीं है। उनकी सक्रियता देखकर लगता है कि-
1.कोई संस्था, व्यापारिक प्रतिष्ठान या कोई कंपनी उनको प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से फीस, पारिश्रमिक या कमीशन दे रही है। एक इंटरनेट उपभोक्ता के रूप में मैं प्रतिमाह साढ़े छह सौ रुपये का भुगतान कर रहा हूं और अगर कुछ लोगों की बातों पर यकीन किया जाये तो इस देश में छह से सात सौ करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता है-इनसे कितना पैसा लिया जाता होगा यह आंकड़ों में मेरे पास उपलब्ध नहीं है पर जितना है उससे वह कंपनियां कुछ ऐसी संस्थाअें पर खर्च कर सकतीं हैं जो हिंदी और भारतीय भाषाओं में ब्लग लिखने के लिये प्रेरणा देने का काम करती हैं। इन्हीं में हिंदी पाठक ढूंंढे जा रहे हैं ताकि यह व्यवसाय बना रहे। संभव है कि गूगल जैसी संस्था भी इसके लिये भुगतान करती हो।
2.कुछ लोग जिन्होंने वेबसाइट बनायीं हों और वह इसके लिए बाजार ढूंढते हुए इस काम में जुटे हों ताकि और अधिक ब्लाग बनाकर वेबसाइट के स्पेस देकर उनसे पैसा कमाया जा सके।
3.इसके अलावा कोई विज्ञापन एजेंसी भी हो सकती है इसके लिए भुगतान करती हो।
4. कुछ ऐसी अंतर्जाल की पत्रिकाओं के संपादकों और ब्लाग लेखकों को भी इसके लिये भुगतान किया जाता होगा।
मैं किसी व्यक्ति द्वारा धन कमाये जाने का विरोधी नहीं हू पर इतना कहना चाहता हूं कि वह अपने दायित्वों का निर्वहन-भले ही वह निष्काम भाव से भी करते हों- नहीं कर रहे हैं। मेरे इस आलेख को पढ़कर कई ब्लाग लेखक और पाठक हैरान होंगे पर यह सच है कि जितने प्रयोग मेरे साथ हो रहे हैं उतने मैं भी करता हूं जो कभी कभी मूर्खतापूर्ण लगने वाली पोस्टों में दिखाई देता है। मैंने क्या देखा है।
1. मेरे वर्डपेस के ब्लाग पर स्पैम में अनेक कमेंट आये और उससे लगता है िक कोई मीडिया जैसे शब्द धारण करने वाली वेबसाईटें वहां अपने कमेंट डाल जातीं हैं और उनसे मेेरे व्यूज भी बनते हैं। कभी कभी तो संदेह होता है कि कोई अज्ञात शक्ति है जो मुझे सतत लिखने को प्रेरित कर रही है।
2.ब्लाग स्पाट से पता नहीं कहां से इतने सारे व्यूज आ जाते हैं जिनके आने का मार्ग ही पता नहीं चलता। यह व्यूज हिंदी के ब्लाग दिखाने वाले फोरमों से कई गुना अधिक होते है।
3.मैंने कई ऐसे लोगों को ईमेल किये जो ब्लाग लेखक नहीं हैं पर उनका कभी उत्तर नहीं आया। मैं उनको हिंदी में लिखने के लिए टूल भेजता हूं। कुछ लोगों से थोड़े दिन संपर्क रहा। उन्होंने ब्लाग भी बनाये फिर पता नहीं कहां गायब हो गये। वह छद्म नाम के लोग थे? कई बार ब्लाग के बारे में लिखे गये विषयों पर उन लोगों ने महत्वपूर्ण जानकारियां दीं जैसे बहुत अनुभवी हों। फिर गायब हो गये। मैं उनसे हार्दिक प्रेम करता हूं। आखिर कोई न कोई मुझे प्रेरित करने के लिए लगा ही रहता है। वह मनुष्य हैं चाहे जो भी नाम हों पर उनसे मुझे कोई शिकायत नहीं है। मुझे प्यार देने वाले लोगों के शब्द इस तरह होते हैं जैसे एक या दो लोग हैं जो नाम बदल बदलकर प्रकट होते है।
मुझे सिर्फ एक बार अखरी। यह संस्थाएं या लोग मीडिया से जुडे+ हैं पर एक भी स्थान पर मेरा नाम नहीं दिया। अभी तक यह पुराने ब्लाग लेखक वह भी जो बड़े शहरों में रहते हैं उनका नाम दिया। वह प्रेस कांफ्रेंस करते हैं और अपने नाम देते हैं पर क्या कभी इस हिंदी ब्लाग जगत में वास्तविक नाम से सक्रिय छोटे शहरों के ब्लाग लेखकों को प्रसिद्ध करने में कोई योगदान दिया। अगर वह ऐसा करते तो हो सकता है कि हमें पाठक अधिक मिल जाते और उनका काम शायद और आसान हो जाता। यहां टिप्पणियां लिखकर ही अपना दायित्व समाप्त मान लिया और हमें छोड़ दिया अकेले पाठक जुटाने के लिए। 2000 हजार से अधिक पोस्ट लिखकर भी मैंने क्या पाया है? यह मेरे नहीं उनके सोचने का विषय है।

मुझे वह लोग लिखते हैं कि तुम्हारे लेख का उपयोग करना चाहते हैं और जब सम्मति देता हूं तो लिखते हैं कि छः माह बाद करेंगे-ऐसा लगता है कि मुझे अपने बड़े ब्लाग लेखक होने का भ्रम हो जाये जो आज तक नहीं हुआ। मुझे पता नहीं अदृश्य प्रायोजक कौन है पर यह सच है कि हिंदी ब्लाग जगत पर लिखवाने का उत्तरदायित्व लेने वालों ने सही नीति नहीं अपनाई। कभी कभी तो मन करता है कि मैंने दूसरों के उद्देश्यों की पूर्ति की पर मेरी सफलता मुझसे दूर है। न नाम मिला न नामा इसलिये अपने सारे ब्लाग ही नष्ट कर डालूं पर फिर सोचता हूं देखें आगे-आगे होता है क्या? वैसे गुस्सा आने पर यह मैं कर सकता हूं। एक दिन मैंने अपनी सारी प्रकाशित रचनाएं फाड़ दी थीं।
अंतर्जाल पर हिंदी लिखने का काम मंथर गति से चल रहा है और उसके लिये वही लोग जिम्मेदार हैं जिन्होंने पैसा लेकर या अपनी इच्छा से यह काम अपने हाथ में लिया। इसका कारण वही है कि हिंदी के लेखक को सम्मान और धन से वंचित कर अपने लिऐ रोटी जुगाड़ करने की जो प्रवृत्ति पुराने प्रकाशकों में थी अब वही अंतर्जाल पर हो रहा है। यह मेरी शिकायत नहीं बल्कि उनके कामों का प्रतिवेदन है जिससे पता लगता है कि वह अपने काम में नाकाम रहे।

उनको छः करोड़ उपभोक्ता दिख रहे हैं और उनमें ही यह चार पांच सौ ब्लाग लेखक भी। इनमें उन्होंने 10 से पंद्रह लोगों को अपना साथी बना रखा है और सोचते हैं कि बाकी तो उपभोक्ता हैं जैसे अन्य छः करोड हैं। फिल्मी अभिनेताओं और कुछ माडलनुमा कवि-शायरों से भी ब्लाग बनवा लिया और लगे है उसका प्रचार करने। यह नहीं कि जमीन से उठे ब्लाग लेखकों को प्रचार दें जो वाकई लिखकर मेहनत कर रहे हैं। अंतर्जाल पर निकलने वाली पत्रिकाओं के सपंादकों और ब्लाग लेखकों के जो सम्मान के समाचार आते हैं और तब यह समझते मुझे देर नहीं लगती कि कोई समूह है जो इस तरह की गतिविधियों में लगे हैं। समूह के एक व्यक्ति की नाराजी से पूरे समूह के नाराज होने का प्रमाण मेरे पास है पर उसका कोई फायदा नहीं क्योंकि वह तो किसी से जुड़े हैं और उनकी नहीं बजायेंगे तो तो क्या मुझे समर्थन देंगे।
मैं अपनी बात तो कहता ही रहता हूं पर आज यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि सामान्य ब्लाग लेखकों को उनके लिखने के आधार पर अगर सम्मान और धन नहीं मिलेगा तो यह अभियान कभी सफल नहीं होगा। बड़े नामों के सहारे यह हिंदी ब्लाग जगत आगे नहीं बढ़ सकेगा। छहः करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं में सभी नहीं लिखेंगे बल्कि पढ़ना चाहेंगे और यह छह सौ ब्लाग लेखक अगर उनसे अलग कर देखें जायें तो इनमें ही इतना सामथर््य है कि वह पाठकों को जुटा लेेंगे। समस्या यह है कि उनको नाम और नामा (अगर दिया जा सकता है तो) देना नहीं चाहते। मैं देख रहा हूं कि किस तरह के लोग नाम जुटा रहे हैं। यह लेख भी अब मुझे थका रहा है और शायद अब मैं इतनी अधिक पोस्ट नहीं लिखूं जितनी लिखता हूं। मेरे यह सच छिपा नहीं है कि लोग स्वयं आर्थिक लाभ ले रहे हैं। होटलों और रेस्टराओं में कौन आखिर पैसे खर्च कर रहा है? इतने बड़े-बड़े सम्मेलन हो रहे हैं और अंतर्जाल की पत्रिकाओं के संपादक और ब्लाग लेखक वहां पहूंचकर सम्मानित हो रहे है क्या उसमें पैसे खर्च नहीं होते? यह सब हो इसमें कोई आपत्ति नहीं है पर छोटे शहर के मध्यम वर्ग के ब्लाग लेखकों को प्रोत्साहित किये बिना अंतर्जाल पर पाठक जुटाने लायक लिखना संभव नहीं है। ब्लाग लेखकों का उपभोक्ता मानकर चलना एक मूर्खतापूर्ण विचार है।

लोगों की लिखने-पढ़ने की रुचि में बदलाव भी संभव-आलेख


कल मैंने हिंदी अंग्रेजी अनुवाद टूल पर एक पोस्ट डाली थी तो उस पर शमशाद जी ने अपनी टिप्पणी (देखें बाक्स में) रखी और यह मानी इस टूल पर हिंदी का ब्लाग रखकर पढ़ा जाये तो नब्बे प्रतिशत परिणाम सही आता है। मैंने भी इतना ही अनुमान किया था। उन्होंने कहा हालांकि कुछ और बातें भी लिखीं है पर मुझे लगता है कि वह उनको इस्तेमाल करने में परेशानी हो रही है। उनका कहना है कि हिंदी अंगेजी दोनों कापी हो जाता है। हां, यह सही है पर उसके बाद अगर कर्सर पुनः अंग्रेजी वाले भाग पर क्लिक किया जाये तो वही हिस्सा कापी होता है।

उनकी टिप्पणी से इस बात की पुष्टि तो हो ही जाती है कि अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद में जितनी निराशाजनक स्थिति है उतनी  हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद नहीं हैं।  गूगल का एक लक्ष्य हिंदी ब्लाग लेखन को प्रोत्साहन देने का इससे तो पूरा हो ही रहा है। मैं एक बात कह सकता हूं कि अगर हम इस पर अपने अनुवाद के लिये कुछ अभ्यास करें तो शेष 10 प्रतिशत से विश्व में हिंदी ब्लाग लेखक अपना एक उल्लेखनीय  स्थान बना सकते हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दूं कि यह अगर हिंदी से अंग्रेजी से अनुवाद कर रहा है तो इसका मतलब यह है कि कुछ अन्य भाषायें भी ऐसी होंगी जिनका यह अंग्रेजी में अनुवाद अच्छा करता होगा। इस बात का हमें विचार अवश्य करना चाहिए। अभी नहीं तो आगे अन्य भाषाओं के ब्लाग लेखक अवश्य ही इसका लाभ उठाते हुए अवश्य प्रसिद्धि प्राप्त करेंगे चाहे भले ही उनको अंग्रेजी कम आती हो। अभी तक हम यह शिकायत करते हैं कि हिंदी में कम लिखा गया है पर आगे यह समस्या भी आयेगी कि हिंदी में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनुसार नहीं लिखा जा रहा हैं। इसलिये हमें यह विचार करते हुए ही लिखने के मार्ग पर आगे बढ़ना है। 

दीपक जी
अंग्रेजी से हिन्दी में ट्रांसलेशन तो गूगल टूल पर बिलकुल बेकार है हां हिन्दी से अंग्रेजी ट्रांसलेशन काफी हद तक ठीक है। परंतु यहां भी एक समस्या है हिन्दी टाइप करने के बाद ट्रांसलेशन के लिये हम बॉक्स में डालते हैं तो अनुवाद बहुत बेकार होता है परंतु किसी हिन्दी ब्लॉग का यूआरएल लिखकर ट्रांसलेशन करते हैं तो 90 प्रतिशत सही हो रहा है। मैंने हिन्दी में एक पोस्ट लिखकर अंग्रेजी में अनुवाद किया ठीक हुआ परंतु सिर्फ पढने के लिये ठीक था उसे कॉपी करके दूसरी जगह पेस्ट करने पर परिणाम बहुत बुरा निकला। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों साथ ही कॉपी हो रहे थे।

अभी तक हिंदी ब्लाग लेखक केवल हिंदी के पाठकों के वृद्धि की प्रतीक्षा कर रहे हैं और अब उन्हें यह भी सोचना होगा कि ऐसे टूलों से उनके ब्लाग किसी भी भाषा के लोग पढ़ सकते है। यह केवल हिंदी ही नहीं हर भाषा के ब्लाग को नये आयाम देने के साथ विश्व में लोगों के पढ़ने और लिखने की रूचियों परिवर्तन में करेगा। मैने आज भी अखबारों में समाचार के आधार पर इस टूल के निराशाजनक होने की बात सुनीं। मैंने एक सज्जन को बताया कि-‘‘इससे हिंदी से अंग्रेजी में अच्छा अनुवाद हो जाता है?’

उन्होंने अपनी नाक-भौं सिकोड़ी-‘इससे क्या फायदा?’

लोगों के कई भ्रम हैं जो इतनी आसानी से नहीं टूटेंगे। दरअसल पिछले कई वर्षों से हिंदी में लोगों को प्रभावित करने वाली सामग्रियां कम होती जा रही है। हां, इस देश में कई लेखक हुए हैं और उनको तमाम पुरस्कार मिले ं पर जनता में उनकी छबि वैसी नहीं बन पायी जैसी अपेक्षा की जाती है। इसका कारण यह भी रहा कि अधिकतर लेखकों ने पहले स्वांत सुखाय लिखा फिर वह पुरस्कारों की दृष्टि से लिखने लगे। देश की गरीबी और भुखमरी को उजागर कर उसके लिये दर्द बटोरने के लिये लिखने वाले अनेक लेखकों ने लिखा और पुरस्कार और सम्मान पाये भी पर जहां लोग इस तरह का दर्द भोग रहे हैं उनको न तो इसका लाभ मिला और न ही कभी उनको अपने दर्द से अलग कुछ मजेदार पढ़ने के लिये मिला। हिंदी में पाठक नहीं मिल रहे हैं तो इसका कारण यह है कि लोगों को यह यकीन नहीं है कि हिंदी में कोई ऐसा लिखा हुआ मिल पायेगा जिससे मन को थोड़ा मनोरंजन और शांति मिल जाये। हालांकि यह अकेला कारण इसके लिये जिम्मेदार नहीं है क्योंकि अधिकतर लोग हिंदी के विकास के बहाने अपने हित साधने के लिये आगे आते हैं और वही तय करते हैं कि किस लेखक को आगे बढ़ायें और किस की उपेक्षा कर दें। शक्ति के सारे केंद्र पर वही लोग हैं और कुप्रबंध का शिकार रहे हिंदी के अनेक लेखक गुमनामी के अंधेरे में खो गये।

ऐसे में जो लेखक अंतर्जाल पर लिखने के लिये आये हैं उन्हें यह बात समझ लेनी होगी कि उनको अपनी भूमिका अंतर्राट्रीय स्तर पर निभानी होगी।  यह मजाक नहीं है और न ही कोई कल्पना। आखिर इस टूल के हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद न होने की कोई शिकायत नहीं मिली। शमशाद जी की टिप्पणी से भी इस बात की पुष्टि होती है। वैसे भी हमारी दिलचस्पी इसके हिंदी से अंग्रेजी अनुवाद में रहनी चाहिए न कि उसके अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद के बारे में सोचकर चिंतित होना चाहिए।

 
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अंधेरे मे तीर चलाना ही उनका काम है-चार क्षणिकाएं


हादसों की खबर से अब
शहर सिहरता नहीं
अपने दर्द इतने भर लिये इंसानं ने
कि किसी अन्य की लाश  से हमदर्दी
जताने के लिये निकलता नहीं
कुछ लोग गिरा देते हैं लाशें
शायद कोई उनको देखकर चैंक जाये
जानते नहीं कि
कोई दूसरे को देखेगा तो तब
अब अपने से आगे देखने की
रौशनी और चाहत होगी
किसी की आंखों  में
अपने सामने कत्ल होते देखकर भी
आदमी अब सिहरता  नहीं
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शांति की बात सियारों से नहीं होती
पीठ पीछे वार करने वालों से
कभी वफादारी की उम्मीद नहीं होती
जो यकीन करते हैं उन पर
मुसीबत में किसी की भी
उनसे हमदर्दी नहीं होती
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जख्म बांटना ही उनका काम है
इसलिये ही तो उनका नाम है
खंजर लेकर घूमने वालों से दोस्ती की
ख्वाहिश करते हैं कायर
क्योंकि घुटने टेकना ही रोज उनका काम है
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आग लगाना उनका काम है
मिलते उनको दाम है
कौन देता है कीमत
कौन खरीदता है लाशें
रौशनी जितनी तेज है इस शहर में
अंधेरे का राज है उतना ही गहरा
सच तो सब जानते हैं
पर अंधेरे मे तीर चलाना ही उनका काम है
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