वेलंटाईन डे संग बसंत पंचमी-हिन्दी लेख


             आज बसंत पंचमी और वेलंटाईन डे एक ही दिन हमारे सामने उपस्थित हैं।  देखा जाये तो दोनों का भाव एक जैसा दिखता है पर यह एक भ्रम है। वेलंटाईन डे यहां दो देहों के आपसी सहृदयता का प्रतीक है वहीं बसंत पंचमी के साथ सामाजिक और अध्यात्मिक भाव भी जुड़े हैं।  देखा जाये तो हमारे देश में कोई पर्व, दिन या दूसरा विषय अध्यात्म से जुड़ा नहीं है तो वह रसहीन है। अध्यात्म का मतलब होता है हमारी देह धारण करने वाला आत्मा।  अब यह कहना कठिन है कि यह हमारी भारतीय भूमि का अन्न, जल और वातावरण की देन है या लोगों के अंदर बरसों से रक्त में प्रवाहित संस्कार का प्रभाव कि यहां अभी भी बिना अध्यात्मिक रस के कोई भी विषय न शोभायमान होता है न स्वादिष्ट।  वेलेंटाईन डे के मनाने वालों को उसका कारण भी नहीं होता। उसकी वह जरूरत भी अनुभव नहीं करते क्योकि शुद्ध रूप से उपभोग पर जब इंद्रियां केंद्रित होती हैं तो आदमी की बुद्धि अध्यात्म से परे हो जाती है।  हमारे बाज़ार तथा प्रचार समूह के प्रबंधकों का मुख्य लक्ष्य युवा पीढ़ी होती है।  फिर जब हमारे देश में  नयी शिक्षा पद्धति में भारत के प्राचीन अध्यात्म ज्ञान शामिल न होने से आधुनिक लोग वैसे भी अपने पुराने इतिहास से दूर हो गये हैं तब उनसे यह आशा करना कि वह बसंत पंचमी के अवसर पर उपभोग के लिये प्रेरित होंगे बेकार है।

फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग पर वेलेंटाईन डे की धूम है।  कुछ लोग हैं जो उसे नकारते हैं तो कुछ उसे नारियों की रक्षा जैसे विषय से जोड़ते हुए झूमते हैं।  कुछ लोग वेलेंटाईन डे के विरोध में प्रदर्शन करते हुए यह जताते हैं कि वह प्राचीन भारतीय संस्कृति के उपासक हैं।  इससे भी वेलेंटाईन डे को प्रचार में जगह मिलती है।  हमने देखा है कि अगर यह विरोध  न हो तो यह दिन प्रचार माध्यमों में फ्लाप हो जाये।  कभी कभी तो लगता है कि इस दिन के समर्थक और विरोधी सामाजिक कार्यकर्ता आमजन का ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिये सड़कों पर आते हैं। खास बात यह है कि वेलेंटाईन डे को बाज़ार और प्रचार समूहों से प्रेरणा की आवश्यकता होती है जबकि बसंत पंचमी का दिन स्वयं ही जनमानस में स्फूर्ति पैदा होती है।  शरद ऋतु के प्रस्थान और ग्रीष्म ऋतु के आगमन के बीच का यह समय बिना प्रयास किये ही देह को आनंद देता है।  सामान्य लोगों के लिये यह दिन जहां खुशी का होता वहीं योग, ध्यान, और ज्ञान साधकों के लिये अपने अभ्यास में सहजता प्रदान करने वाला होता है।  जहां सामान्य व्यक्ति परंपरागत भौतिक साधनों से बसंत पंचमी मनाता है वहीं अध्यात्मिक साधक  अपनी विद्या से मन से मन में ही रमकर आनंद उठाता है।  सच बात तो यह है कि जब इसका अभ्यास हो जाता है तो आनंद हर दिन मिलता है पर किसी खास अवसर पर वह दूना हो जाता है।  हमारी तरफ से बसंत पंचमी की पाठकों और ब्लॉग लेखकों और मित्रों को बधाई।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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