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दूसरी किताब-हास्य व्यंग्य (doosri kitab- hindi hasya vyangya)


बुद्धिजीवियों का सम्मेलन हो रहा था। अनेक प्रकार के बुद्धिजीवियों को उसमें आमंत्रण दिया गया। यह सम्मेलन एक ऐसे बुद्धिजीवी की देखरेख में हो रहा था जिन्होंने तमाम तरह की किताबें लिखी और जिनको अकादमिक संगठनों के पुस्तकालय खरीदकर अपने यहां सजाते रहे। आम लोग उनका नाम समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी के माध्यम से जानते थे कि कोई ऐसे लेखक हैं जो लिखते हैं। इस सम्मेलन के आयोजन के लिये एक प्रकाशन संस्थान ने उनके प्रेरित किया जो अब ऐसे लेखक ढूंढ रहा था जिनको अपने बुद्धिजीवी होने का भ्रम हो और वह किताब छपवायें।
प्रकाशक ने उस बुद्धिजीवी से कहा-‘कोई नये बकरे लाओ तो हम आपका कविता संग्रह बिना पैसे लिये छाप देते हैं।’
उस बुद्धिजीवी ने कहा-‘अब तो मैं बूढ़ा हो गया हूं। अब ऐसे बकरे नहीं मिलते जो छपास के लिये किताबें छपवायें।’
प्रकाशक ने कहा-‘ठीक है! कोई दूसरा आदमी ढूंढता हूं। हमें प्रकाशन के लिये ऐसे बकरे चाहिये जो आप जैसे बुद्धिजीवियों की महफिलों में भेड़ की तरह हांक कर लाये जाते हैं।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘ठीक है! तुम कहते हो तो कोशिश करता हूं।’
उसने अपने चेले चपाटों को बुलाया। एक चेले ने कहा-‘महाराज, हमारे झांसे में अब ऐसे भेड़नुमा लेखक कहां आयेंगे जिनको बकरा बनाकर उस प्रकाशक के पास ले जायें।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘लानत! सारी शिक्षा बेकार गयी। इतने वर्ष से क्या मेरे यहां झक मार रहे थे। अरे, कोई सम्मेलन करो। इतने सारे लोग छद्म श्री, और अहम भूषण सम्मानों के लिये फिर रहे हैं। उनको अपने वाक्जाल में फंसाकर लाओ।’

चेले अपने अभियान पर निकल पड़े। एक महाबुद्धिजीवी सम्मेलन का आयोजन किया। कुल जमा पहुंचे आठ लोग-जिनमें अधिकतर नये नये बुद्धिजीवी बने थे जिनको अपने बहुत बड़े लेखक होने का गुमान था। सम्मेलन संपन्न हो गया। फोटो वगैरह भी खींच लिये गये। बुद्धिजीवी के साथ उसके पच्चीस चेले पांच पांच के समूह में बारी बारी से ही मंच पर विराजमान होते रहे। एक एक कर बाहर ने आये नये बुद्धिजीवियों को परिचय देने के लिये मंच पर बुलाया गया था। बाद में उनको नीचे धकिया दिया जाता था। एक नये बुद्धिजीवी लेखक ने कहा-‘भई, हमें भी कुछ बोलने दो।’
मंच पर उन महान बुद्धिजीवी ने अपने चेले को देखा तो वह उस पर बरस पड़ा-‘अबे, तेरी किताबें छपी हैं जो इतने बड़े मंच पर बोलने का अवसर चाहता है।’
तब बुद्धिजीवी ने अपने चेले को डांटा-‘अरे, ऐसा बोला जाता है। यह नये लेखक हैं इनको प्रोत्साहन देना है।’
फिर वह उस नये लेखक से बोले-‘भई, अब तो समय निकल गया है। अगली बार सम्मेलन में तुम्हारा लंबा भाषण रखेंगे। तब तक ऐसे दो चार सम्मेलनों में बोलने का अभ्यास कर लो। हां, एक किताब जरूर छपवा लेना।’
तब एक दूसरा बुद्धिजीवी बोला-‘पर महाशय, मैं तो तीस साल से लिख रहा हूं। कोई किताब नहीं छपी, पर अखबारों में कभी कभी जगह मिल जाती है।’
बुद्धिजीवी महाशय ने कहा-‘अरे भई, अच्छा लिखोगे तो छपोगे।’
इससे पहले कि वह मेहमान बुद्धिजीवी प्रतिवाद करता तब मंच पर बैठे उन महान बुद्धिजीवी के चेलों ने तालियां बजा दी जैसे कि कोई रहस्यमय बात उन्होंने कही हो।’

कार्यक्रम समाप्त हो गया। अब सवाल यह था कि उनका प्रचार कैसे हो? बुद्धिजीवी ने समझाया-‘फोटो केवल मंच के ही देना। मेरा भाषण देते हुए जरूर देना। अपने भी फोटो ऐसे देना जैसे कि सभी का आ जाये। इसलिये ही मैंने तुम्हें पांच पांच में बांटकर बारी बारी से बैठने के लिये कहा था ताकि अधिक फोटो छप सकें।’
एक चेले ने पूछा-‘महाराज, पर दर्शकों और श्रोताओं के फोटो भी तो छापने पड़ेंगे।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘खाली कुर्सियों के फोटो छपवाओगे, मूर्ख कहीं के! फिर यह भेड़ की तरह लोग आये थे इनके फोटो अगर अखबार में छप गये तो यह शेर हो जायेंगे। फिर नहीं आने वाले अपने जाल में। यहां आदमी को तब ऊंचा न उठाओ जब तक उससे कोई फायदा न हो।’
चेले ने कहा-‘ठीक है।’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘और सुनो। नाश्ते, भोजन, और चाय के भी फोटो छाप देना। अपने पिछले सम्मेलन की वह फोटो जो नहीं भेज पाये, उपयोग में लेना। खाने की प्लेटों में बचे सामान, पन्नी में पड़े पानी के खाली ग्लास, और टेबलों पर बैठे तुम लोगों के जो फोटो बनवाये थे उनका उपयोग इस बार भी जरूर करना। लिखना कि शानदार भोजन हुआ।’
चेले ने पूछा-‘अगर किसी ने जांच करने का प्रयास किया तो?’
बुद्धिजीवी ने कहा-‘यह लोग तो बाहर के आये थे चले जायेंगे। तुम लोगों से कोई पूछे तो बता देना। हां, तुम लोगों ने चाय के ढाबे पर बैठकर जो फोटो खिंचवायी थी वह भी भेज देना।’
एक चेले ने कहा-‘पिछली बार वह छपवा चुके हैं। दो साल पहले।
बुद्धिजीवी ने कहा-‘अब कौन उसे याद रखता है? हां, एक बात याद रखना। मेरे कुछ बुद्धिजीवियों के बयान भी छाप देना। भले ही वह न आये। इससे यह महासम्मेलन लगेगा। कुछ छद्म नाम के विद्वान लोगों का आगमन भी दर्शा देना। इन आठों में लगे रहो। कम से कम दो जरूर बकरे बन जायेंगें।’
नये बुद्धिजीवी रेल्वे स्टेशन पर अपने ठिकाने लौटने के लिये आये तो उसमें दो गायब थे। एक ने दूसरे से पूछा-‘यह दो क्यों नहीं आये? यहां इसी स्टेशन पर मिलने का सभी ने वादा किया था।
दूसरे ने कहा-‘वह अपनी किताब छपवाने के बाद ही यहां से जायेंगे। बुद्धिजीवी के एक चेले ने उनको पटा लिया है। एक ने मुझे मोबाइल पर यह बात बतायी।’
इधर पता लगा कि उनकी ट्रेन आज नहीं जा रही है। दूसरे ट्रेन का इंतजार करने की बजाय उन्होंने वह शहर घूमने का निर्णय किया और पास में ही एक होटल में रुक गये।
अगले दिन सुबह उन्होंने होटल के बाहर एक चाय के ढाबे पर ही अखबार देखा। उसमें उस महासम्मेलन की खबर छपी थी। अपना नाम और फोटो न देखकर उनको गुस्सा आया। तब वह आपस में बात करने लगे। एक ने कहा-‘यार, हम काहे इतनी दूर आये थे। न खाना खाया न नाश्ता किया। यह खबर देखो। क्या बकवाद लगती है।’
उनकी बातें पास ही बैठा चाय पीता हुआ एक आदमी सुन रहा था। उसने उनसे पूछा-‘तो तुम भी सम्मेलन में आये हो? जरा सोच समझकर जाना। कहीं जेब कट गयी तो कहीं के नहीं रहोगे।’
उन्होंने उस आदमी की तरफ देखा। वह एकदम मैला कुचला पायजामा पहने हुए था। उसकी दाढ़ी और बाल इतने बढ़े हुए थे कि उसकी तरफ देखना भी बुरा लगता था।
एक बुद्धिजीवी ने उससे जवाब दिया-‘हां, एक बुद्धिजीवी सम्मेलन में आये हैं।’
उसने कहा-‘मैं भी ऐसे ही फंस गया। अपने आपको बड़ा बुद्धिजीवी समझता था। रहने वाला तो यहीं का हूं। अलबत्ता किताब छपवाने के चक्कर में इतना पैसा खर्च किया फिर उसका विमोचन कराया। मुझसे कहा गया कि तुम बहुत बड़ बुद्धिजीवी बन जाओगे। छद्म श्री और अहम भूषण पुरस्कार भी मिल सकता है। मगर उसके बाद कहीं का न रहा। फिर मुझसे कहा गया कि दूसरी किताब छपवाओ। उसके लिये बचे खुचे पैसे लेकर निकला तो जेब कट गयी। अरे, ऐसे सम्मेलनों के चक्कर में मत पड़ो। यहां भेड़ बनाकर लाते हैं और बकरे बनाकर भेज देते हैं।’
उसकी इस कहानी का उन नवबुद्धिजीवियो पर ऐसा असर हुआ कि वह चाय आधी छोड़ कर भाग निकले।
स्टेशन पर एक ने दूसरे से कहा-‘यार, गनीमत है कि भेड़ की तरह आये पर बकरे नहीं बने।’

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कवि,लेखक और संपादक, दीपक भारतदीप,ग्वालियर
http://dpkraj.blogspot.com
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कभी अच्छा,कभी बुरा-हिंदी शायरी (sum good sum bed-hindi poem)


एक दिन घूमते हुए उसने
चाय पिलाई तब वह अच्छा लगा
कुछ दिन बाद वह मिला तो
उसने पैसे उधार मांगे तब वह बुरा लगा
फिर एक दिन उसने
बस में साथ सवारी करते हुए
दोनों के लिये टिकिट खरीदा तब अच्छा लगा
कुछ दिन बाद मिलने पर
फिर उधार मांगा
पहली बार उसको दिया उधार पर
फिर भी बहुत बुरा लगा
एक दिन वह घर आया और
सारा पैसा वापस कर गया तब अच्छा लगा
वह एक दिन घर पर
आकर स्कूटर मांग कर ले गया तब बुरा लगा
वापस करने आया तो अच्छा लगा

क्या यह सोचने वाली बात नहीं कि
आदमी कभी बुरा या अच्छा नहीं होता
इसलिये नहीं तय की जा सकती
किसी आदमी के बारे में एक राय
हालातों से चलता है मन
उससे ही उठता बैठता आदमी
कब अच्छा होगा कि बुरा
कहना कठिन है
चलाता है मन उसे जो बहुत चंचल है
जो रात को नींद में भी नहीं सोता
कभी यहां तो कभी वहां लगा

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सच का सामना करने से नहीं होगा तय रिश्ता-हिन्दी हास्य कविता (sach ka samana aur shadi ka rishta-hindi hasya kavita


लड़के की मां ने
रिश्ते कराने वाले मध्यस्थ से कहा
‘‘लड़की और परिवार के साथ
दहेज का मामला भी समझ में आयेगा।
बस एक बात रह गयी है कहना कि
अब तो चल गया है सच के सामना करने का फैशन
इसलिये लड़की को उस मशीन पर भी बिठायेंगे
चाहें उसके मां बाप तो
अपने लड़के को भी उस पर दिखायेंगे
इस तरह रिश्ता तय हो जायेगा।’

सुनकर लड़का चौंका
और इशारा कर मां को बाहर बुलाया
और बोला-
‘यह क्या कर रही हो माताश्री
उस तरह तो मेरा कभी भी विवाह
संपन्न नहीं हो पायेगा।
तेरा और मेरा रिश्ता तो इसी जन्म का है
जो व्यर्थ जायेगा।
यह टीवी देखकर मत चलो
ऐसा न हो कि फिर इस रिश्ते से हाथ मलो
सच की मशीन है इस तरह कि
जो मेरे बारे में तुम भी नहीं जानती
सभी को पता चल जायेगा।
चुपचाप हामी भर दो
वरना तुम्हारे सास बनने का
और मेरा घर बसने का सपना
सच का सामना करते ही टूट जायेगा।’’

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हास्य कविता का प्रेरक गुस्सा-हास्य व्यंग्य कविता (hasya kavita)


हास्य कवि ढूंढ रहा था
कोई जोरदार कविता
मिल गयी पुरानी प्रेमिका
जिसका नाम भी था कविता।

उसे देखते ही चहकते हुए वह बोली
‘’अरे, कवि
तुम भी अब बुढ़ाने लगे हो
फिर भी बाज नहीं आते
हास्य कविता गुड़गुड़ाने लगे हो
शर्म नहीं आती
पर मुझे बहुत आती
जब पति के सामने
तुम्हारे पुराने प्रेम का किस्सा सुनाती
तब वह बिफर कर कहते हैं
‘क्या बेतुके हास्य कवि से इश्क लड़ाया
मेरा जीवन ही एक मजाक बनाया
कोई श्रृंगार रस वाला कवि नहीं मिला
जो ऐसे हास्य कवि से प्रेम रचाया
जिसका सभी जगह होता गिला
कहीं सड़े टमाटर फिकते हैं
तो कहीं अंड़े पड़ते दिखते हैं’
उनकी बात सुनकर दुःख होता है
सच यह है तुम्हारी वजह से
मैंने अपना पूरा जीवन ही नरक बनाया
फिर भी इस बात की खुशी है
कि मेरे प्यार ने एक आदमी को कवि बनाया’

उसकी बात सुनकर कवि ने कहा
‘मेरे बेतुके हास्य कवि होने पर
मेरी पत्नी को भी शर्म आती है
पर वह थी मेरी पांचवी प्रेमिका
जिसके मिलन ने ही मुझे हास्य कवि बनाया
प्रेम में गंभीर लगता है
पर मिलन मजाक है
यह बाद में समझ आया।
गलतफहमी में मत रहना कि
तुमने कवि बनाया।
तुम्हारे साथ अकेले नहीं
बल्कि पांच के साथ मैंने प्रेम रचाया।
तुम्हारी कद काठी देखकर लगता है कि
अच्छा हुआ तुमसे विरह पाया
कहीं हो जाता मिलन तो
शायद गमों में शायरी लिखता
जिंदगी का बोझ शेरों में ढोता दिखता।
भले ही घर में अपनी गोटी गलत फिट है
पर हास्य कविता कुछ हिट है
दहेज में मिला ढेर सारा सामान
साथ में मिला बहुत बड़ा मकान
जिसके किराये से घर चलता है
उसी पर अपना काव्य पलता है
तुमसे भागकर शादी की होती
तो मेरी जेब ही सारा बोझ ढोती
तब भला कौन सुनता गम की कविता
पांचवीं प्रेमिका और वर्तमान पत्नी भी
कम नहीं है
पर उसके गुस्से ने
मुझे हास्य कवि बनाया

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उग्र हो जाता है चूहा हो या इंसान, जब माया हो मेहरबान-व्यंग्य आलेख


सुनने में आया है कि मंदी की वजह से आतंकवादी भी पस्त हो रहे हैं। एक टीवी चैनल के अनुसार पाकिस्तान अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति वैसे जब मंदी का दौर प्रारंभिक स्थिति में था तब कुछ विश्लेषकों ने यह संभावना व्यक्त की थी कि अनेक आतंकवादी गिरोह भी इसकी लपेट में आयेंगे। यह संदेह गलत नहीं था और न है। कहने को धर्म,जाति,भाषा और क्षेत्र के नाम पर समाज में वैमनस्य फैलाने वाले बहुत सारे संगठन पूरे विश्व में सक्रिय हैं पर उसके सदस्य केवल पैसा कमाने के लिये ही उनसे जुड़ते हैं-कथित सिद्धांतों और आदर्शों से उनका संबंध तो दिखावे का होता है।

प्राचीन भारतीय कथा है कि एक संत एक गृहस्थ के घर गये। वहां उन्होंने भोजन किया और फिर कुछ देर उसके साथ बैठकर बातचीत में लगे रहे। उन्होंने देखा कि गृहस्थ अपने हाथ में एक डंडा पकड़े बैठा है और एक चूहा उसके पास आता है तो उससे उसको भगाता है। संत ने पूछा-क्या बात है कि इस डंडे को पकड़े क्यों बैठे हो? कोई चूहा तुम पर हमला थोड़े ही कर सकता है।’

गृहस्थ ने कहा-महाराज, यह चूहा बहुत दमदार है। मेरे ऊपर जो आला है यह वहां तक एक बार उछल कर ही पहुंच जाता है। ऊपर मिट्टी के बर्तन को नीचे गिरा देता है। कई बर्तन तोड़ चुका है। अब यहीं बैठकर उसे रोकने का काम कर रहा हूं।
संत ने कहा-‘उस बर्तन में क्या है?’
गृहस्थ ने कहा-‘उसमें चांदी के सिक्के हैं जो मैं अपने खर्च से बचा कर रखता हूं ताकि कहीं आपदा में काम आयें।’
संत ने कहा-‘उस बर्तन को नीचे उतारो।’

गृहस्थ ने वैसा ही किया। संत ने उन चांदी के सिक्को को लिया और घर के कोने में स्वयं ही एक गड्ढा खोदा और चांदी के सिक्के कपड़े में बांधकर उसके अंदर रखकर उस पर एक पत्थर रख दिया। गृहस्थ से कहा- इस गड्ढे का उपयोग तुम अपनी बचत रखने के लिये किया करो। यह बात किसी को बताना नहीं। मेरे जाने के बाद अंदर से गड्ढे को पक्का कर देना। यह चूहा यहां कभी नहीं पहुंच पायेगा। अब यह बर्तन फिर तुम उस आले में रख दो और मेरे साथ थोड़ा दूर बैठकर इसका तमाशा देखो।

वह दोनों थोड़ी दूर बैठ गये। खाली मैदान देखकर चूहा आया और उस आले तक उछल कर पहुंचने का प्रयास करने लगा। वहां ऊंचाई तक पहुंचने की बात तो दूर वह जमीने से थोड़ा ऊपर भी नहीं उठ पाता था। थकहारकर मैदान छोड़ गया। गृहस्थ को आश्चर्य हुआ। उसने उस संत से कहा-‘महाराज यह तो चमत्कार हो गया। यह चूहा एक ही झटके में वहां पहुंच जाता था पर आपके प्रभाव से अब जमीन से भी नहीं उठ पा रहा।’

संत ने कहा-‘यह कोई चमत्कार नहीं है। यह मेरे प्रभाव के कारण नहीं हारा। सच बात तो यह है कि यह माया का प्रभाव ही था जो चूहे को इतनी ताकत मिल रही थी जो इतनी ऊंचे एक ही झटके में पहुंच जाता था। अब खाली मिट्टी के बर्तन में इतनी ताकत नहीं है कि वह उसे अपनी तरफ खींच सके।’
यह कथा शायद प्रस्तुतीकरण में एकदम वैसी न हो जैसी सुनायी जाती है। कहीं अलग अलग तरह से प्रसंग होते हैं। संभव है यह कथा कल्पित भी हो पर इस सत्य के इंकार नहीं किया जा सकता है कि खेलती माया ही है यह अलग बात है कि इंसान अपनी ताकत का ढोंग करता है।

किसी एक संगठन की बात हम यहां नहीं कर रहे। दूनियां भर में अनेक ऐसे संगठन हैं जो धर्म,जाति,भाषा,वर्ण,रंग, और क्षेत्र के आधार पर हिंसक अभियान चलाते हैं। दावा यह करते हैं कि वह अपने समूहों का कल्याण कर रहे हैं। वह पढ़े लिखे हों या नहीं पर उनका समर्थन करने वाले ढेर सारे बुद्धिजीवी भी मिल जाते हैं। कोई उनको भटके हुए लोग कहता है तो कोई योद्धा बताता है। पुराने समय में सभ्यताओं और समूहों का टकराव हुआ है पर उसका कारण जड़,जमीन और नारी के कारण ही होती थी। आज भी कुछ नया नहीं है पर सभ्रांत बुद्धिजीवी वर्तमान मेें सक्रिय आतंकवादियों के समूहों में जाति,भाषा,और धर्म के तत्व ढूंढते हुए नजर आते हैं। अगर एक बात कहें कि आजकल सभ्य समाज है तो यह भी मानना पड़ेगा कि यह भ्रमित समाज है। पुराने विचारों को उठाकर फैंकने की बात करते हैंं पर कौनसी बात सत्य है झूठ इस पर विचार करने की शक्ति लोगों में नहीं है। आजकल भौतिकतावाद का बोलबाला है। सभी लोग धन के पीछे भाग रहे हैं। यहां तक कि अपनी बौद्धिकता की शक्ति पर कमाने वाले बुद्धिजीवी भी भागते हुए विचार करते हैं ऐसे में चिंतन करे कौन? इस लेखक ने ऐसे आलेख लिखे हैं जिसमें हमेशा ही इस बात की चर्चा की है कि आतंकवाद एक तरह से व्यवसाय बन गया है। कुछ लोग ऐसे जरूरी होंगे जिनका आर्थिक फायदा होता है और इसलिये वह इसके प्रायोजन में सहायता करते हैं-वह हफ्ता वसूली भी हो सकती है और सुरक्षाकर भी। अखबारों में ऐसी खबरें कोने में छपी मिलती हैं जिसमें आतंकवादी क्षेत्रों में तस्करी और अन्य अपराधिक गतिविधियों की बढ़ोतरी की चर्चा होती है। यह भी कहा जाता है कि प्रशासन और सरकार का ध्यान बंटाने के लिये ही इस तरह का आतंकवाद चलाया जाता है।

अगर हम मोटे तौर से देखें तो जैसे जैसे विश्व में आर्थिक और तकनीकी विकास हुआ वैसे ही आतंकवाद भी बढ़ा है। बाजार तेज होता गया तो आतंकवाद भी बढ़ता गया। अब मंदी का दौर चला रहा है। ऐसी बातें भी अखबारों में चर्चा में आती रही हैं कि आतंकवादियों ने मुद्राबाजार में अपना विनिवेश किया। बैंको में अपना पैसा जमा किया। अब जब मंदी आयी है तो उनकी हालत भी पतली हो रही है। वैसे अभी यह मानना गलत होगा कि आतंकवाद पूरी तरह से समाप्त हो जायेगा पर जिस तरह आतंकवादियों और अपराधियों के समूहों के मुखिया कटु और उग्र भाषा का प्रयोग करते हैं उससे तो यही लगता है कि केवल उनकी आर्थिकी शक्ति-दूसरे शब्दों में कहें मायावी शक्ति- बुलवा रही है। यह सही है कि आदमी कोई चूहा नहीं है पर एक बात याद रखना इस सृष्टि में सभी की देह पंचतत्वों से बनी है और अहंकार,मन और बुद्धि अपने स्वभाव के अनुसार सभी में हैं चाहे वह आदमी हो या चूहा। अंतर केवल इतना है कि माया के प्रभाव में चूहा उछल कूद करता है और आदमी अपनी वाणी से भी यही काम करता है।
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