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स्वयंवर का खतरा-हास्य कविता (svayanvar ka khatra-hasya kavita)


आशिक ने माशुका से कहा
‘एक टीवी चैनल वाले ने अपने कार्यक्रम में
मेरे को स्वयंवर का प्रस्ताव दिया है,
मैंने भी उससे तुम्हें ही चुनने का
पक्का वादा लिया है,
चलो इस बहाने देश में लोकप्रिय हो जायेंगे
अपना ‘फिक्स स्वयंवर’ रचायेंगे।’
माशुका बोली
‘क्या पगला गये हो,
यह टीवी और फिल्म वाले
भले ही हिन्दी का खाते हैं
शब्द सुनते जरूर पर अर्थ नहीं समझ पाते हैं,
बन गये हैं सभी उनके दीवाने,
इसलिये भाषा से हो गये वीराने,
स्वयंवर में वधु चुनती है वर,
और स्वयंवधु की कोई प्रथा नहीं है मगर,
फिर कहीं मिल गया कोई क्रिकेटर
या भा गया कोई एक्टर
तब तुम्हें भूल जायेंगे,
बिना पैसे मिले प्रचार की वजह से
हम यूं ही बदनाम हो जायेंगे,
वैसे भी लगता है तुम झांसा दे रहे हो,
मेरा इम्तहान ले रहे हो,
क्योंकि तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं,
विवाह तुमसे करूंगी यह आस नहीं है,
इसलिये शायद मुझे फंसा रहे हो,
दिखाने के लिये हंसा रहे हो
यह बाज़ार और प्रचार है जुड़वां भाई,
मेल इनका ऐसा ही है जैसे फरसा और कसाई
हम जैसे लाखों हैं आशिक माशुकाऐं,
मिले टीवी पर मौका तो
बदल दें सभी अपनी आज की आस्थाऐं,
झूठा है तो ठीक
पर अगर सच्चा है तुम्हारा दावा,
होगा दोनों को पछतावा,
प्रसिद्ध हो जाने पर हम कभी
साथ नहीं चल पायेंगे।
तुम्हारे पीछे दौड़ेंगी दूसरी माशुकाऐं
मेरे पीछे भी ढेर सारे आशिक चले आयेंगे।’
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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