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महंगाई का साम्राज्यवाद-हिन्दी लेख (mehangai ka samrajya-hindi lekh


         अमेरिका के प्रतिवेदनों पर भारतीय प्रचार माध्यम इतना हल्ला क्यों मचाता है? ऐसा लगता है अमेरिका दुनियां भर के शिखर पुरुषों का बॉस है जो उनका गोपनीय प्रतिवेदन लिखता है। मजे की बात यह है कि जिन लोगों का गोपनीय प्रतिवेदन प्रतिकूल होता है वह कभी उसका विरोध नहीं करते और जिनका प्रशंसनीय है वह उछलने लगते हैैं। कभी कभी तो यह देखकर हैरानी होती है कि शिखर पुरुषों के दिल का हाल उनके देश के लोग तक नहीं जान पाते पर अमेरिका राजनयिक को पता लग जाता है वह भी उनके ही श्रीमुख से! खंडन होना चाहिए पर होता नहीं। कई बार तो निंदा योग्य बयानों की भी निंदा नहीं होती।
          अभी तक वामपंथी बुद्धिजीवियों से अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतिरोध करने का नारा सुनते थे मगर तब यह समझ में नहीं आता था कि आखिर यह है किस प्रकार का! दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवियों ने पूंजीवाद और अमेरिका का विरोध एक साथ किया है इसलिये हमेशा ही उनके बारे में भ्रमपूर्ण स्थिति रही है। चूंकि वामपंथी पूंजी पर राज्य के नियंत्रण की बात करते हैं तो भारतीय समाज उसे स्वीकार नहीं करता। इसका कारण यह है कि राज्य के नियंत्रण से भी देश का कोई भला नहीं हुआ! फिर आज की कंपनी प्रणाली जरूर ब्रिटेन और अमेरिका की देन हो पर समाज में पूंजी और श्रम की अपनी स्वायत्ता तो भारतीय अर्थशास्त्र की ही देन है। राज्य को अनियंत्रित पूंजी के मद से उपजे अपराध तथा श्रम का शोषण रोकने का अधिकार तो भारतीय अर्थशास्त्र मानता है पर वह उनका निंयत्रणकर्ता होना उसमें स्वीकार नहीं है। यहीं आकर भारतीय समाज वामपंथियों से छिटक जाता है क्योंकि उसको लगता है कि उसकी आर्थिक और श्रमशील गतिविधियों पर राज्य का नियत्रंण नहीं होना चाहिए। यही कारण है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतिरोधक होने का दावा करने वाले वामपंथी कभी भारतीय समाज में स्थान नहीं बना पाये।
           दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवी अमेरिकी साम्राज्य के भौतिक स्वरूप का ही बखान करते हैं। उसने जापान पर बम फैंका, उसने जर्मनी को रौंदा तथा वियतनाम पर हमला किया, तथा उसने अफगानिस्तान पर हमला किया तथा इराक पर हमला किया आदि बातें कहकर वामपंथी बुद्धिजीवियों ने भारतीय समाज को आंदोलित करने का प्रयास किया मगर अभौतिक या अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका ने जो कारगुजारियां की इसकी चर्चा नहीं की।
             वामपंथी अब भी कहते हैं कि अमेरिका साम्राज्यवाद फैला रहा है! इसका मतलब वह केवल इतिहास में जीते हैं। सच बात तो यह है कि अमेरिका सभी जगह राज्य कर रहा है। वामपंथी बुद्धिजीवियों ने हमेशा ही इतिहास सुनाया है-यह हो गया, वह हो गया, इसलिये अब यह होगा और वह होगा। प्रतिरोध करने के नाम पर चंद नारे लगा लिये और कभी कभार प्रदर्शन कर लिया। यह देखा ही नहीं कि अमेरिका धीरे धीरे अब दुनियां भर के शिखर पुरुषों का बॉस बनता जा रहा है।
         अपने प्रचार माध्यमों ने हद ही कर दी है। अमेरिका किसी भी देश के शिखर पुरुष का गोपनीय प्रतिवेदन जारी करता है तो अपने यहां के प्रचार माध्यम उसे ऐसे उठाये घूमते हैं जैसे कि इस नये वैश्विक ब्रह्मा ने कोई नयी बात कर दी हो। दरअसल हमारे देश के प्रचार माध्यमों का आधार पूंजी है और जिसका उद्गमा स्थल ऐसा लगता है अमेरिका है। सभी विकासशील देशों के आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुष अमेरिका पैसा भेजते हैं पर वह विनिवेश होकर यहां आता है। आर्थिक और सामाजिक शिखर पुरुषों की बात तो छोड़िये हमारे देश के धार्मिक पुरुष भी अमेरिका के अनुयायी लगते हैं। इनमें से कई अपने शिष्यों को दर्शन देने अमेरिका जाते हैं।
        वामपंथी बुद्धिजीवी भारत में बढ़ती महंगाई का राज नहीं जान पाये। क्या उनको नहीं है कि इस देश में पांच सौ और हजार के नोट के लिये आसानी से प्रचलन में रहें इसके लिये महंगाई योजना पूर्वक बढ़ाई जा रही है। देश की कंपनियां आम जनमानस को अपनी जेब में पांच सौ और हजार के नोट जेब में घूमते देखना चाहती हैं। ऐसा लगता है कि भारत ही नहीं वरन् पूरे विश्व के विकासशील देशों में पेट्रोल की आड़ में महंगाई खेल हो रहा है। कम से कम भारत में तो स्थिति अजीब है। इधर सुनने में आ रहा था कि पेट्रोल के दाम गिरेंगे पर भारत कंपनियों ने फिर उसे बढ़ा दिया।
          भारत से रुपया बाहर जाता है तो डालर बन जाता है। अगर मान लीजिये किसी ने आज एक हजार रुपये अमेरिका या अन्य देश की बैंक में जमा किया तो उसके खाते में बीस डॉलर जमा होंगे। काला धन जमा करने वालों ब्याज तो मिलना दूर उनको रखने के पैसे भी देने पड़ते हैं-ऐसा हमने प्रचार माध्यमों में पढ़ा और सुना है। अगर भारतीय रुपया स्थिर रहा तो यह बीस डॉलर देश में आयेंगे एक हजार के रूप में। अगर रुपया गिरा तो विदेश में काला धन जमा करने वाला को ही लाभ होता है। समझ लीजिये साठ रुपये के मुकाबले एक डालर का मूल्य निर्धारित हुआ तो यह बीस डॉलर बारह सौ रुपये हो जायेंगे। इसी तरह भारतीय जमाकर्ता फायदे में रहेगा।
         फिर विदेश रुपया भेजने के लिये मोटी रकम होती होगी। अक्सर कहा जाता है कि हजार पांच सौ रुपये के नोट से मुद्रा का आवागमन सुविधाजनक होता है-यह अलग बात है कि हमारे यहां अभी भी अनेक लोग इसे देख भी नहीं पाते होंगे। अगर भेजी जाने वाली रकम सौ या पचास रुपये की होगी तो ढेर सारे ड्रम भर जायेंगे। इसलिये हजार रुपये का नोट ज्यादा उपयोगी है। मुश्किल दूसरी है कि हजार और पांच सौ के नोट छोटी वस्तुओं के खरीदने में अभी पूरी तरह सहायक नहीं है। इसलिये यह लगता है कि इस देश को हजार और पांच सौ नोट के लायक बनाया जा रहा है।
इतना ही नहीं हम देख रहे हैं कि हर क्षेत्र के शिखर पुरुष का ध्यान भारत पर कम अमेरिका पर अधिक रहता हैं। वहां का राष्ट्रपति क्या कह रहा है? वहां का अखबार क्या लिख रहा है? अमेरिका की भारत के शिखर पुरुषों बारे में क्या सोच है? इस पर भारतीय प्रचार माध्यम उछलते हैं। तय बात है कि प्रचार माध्यमों के मालिकों का कहीं न कहीं झुकाव अमेरिका के प्रति है तभी तो उनके कार्यकर्ता उसका प्रचार करते हैं।
        भारत के विकास का दावा संदेहास्पद भी इसी कारण से हो रहा है क्योंकि यहां सौ रुपये से ऊपर की मुद्रा का प्रचलन बढ़ रहा है। याद रखिये हमारी जानकारी के अनुसार किसी भी विकसित देश की मुद्रा सौ से अधिक की नहीं है।
दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवी इतिहास का रोना रोते हुए अमेरिका को कोसते हैं पर नारों से आगे नही जाते। अपने वाद का झंडा उठाये हुए अमेरिका के रणनीतिकारों की चालाकियों को भांप नहीं पाते। वह भारतीय संदर्भों की बजाय विदेशी संदर्भों पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। अमेरिका और कंपनी दैत्य किस तरह विश्व के आम जनमानस को त्रस्त कर रहा है इसका आभास नहीं है। अफगानिस्तान और इराक में उसकी सैन्य उपस्थिति पर हल्ला मचाने वाले भारतीय वामपंथी बुद्धिजीवी देश के अंदर ही स्थित अमेरिका के कंपनी दैत्य पर नज़र नहीं रख पाते। देश के आम आदमी को पांच सौ और हजार के नोट के उपयोग लायक बनाने की जो योजना चलती दिख रही है उसका आभास हमें इसलिये भी होता है कि दिन ब दिन महंगाई इस कदर बढ़ रही है कि आने वाले समय में समाज का निम्न मध्यम वर्ग भरभर्राकर ढहते हुए गरीबी की रेखा के नीचे जाता दिख रहा है। मध्यम वर्ग गरीब होता जा रहा है तो उच्च मध्यम वर्ग तरक्की कर अमीर बन गया है। यह विषम आर्थिक स्तर देश के समाज को किस तरह नष्ट करेगा इसका अनुमान किसी वामपंथी बुद्धिजीवी ने शायद ही किया हो।

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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