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संत ही हो गये व्यापारी-हिन्दी व्यंग्य कविता


जोगिया रंग ओढ़कर जोगी नहीं हो जाते,
नीयत का साफ होना जरूरी है,
सच्चे संत कभी भोगी नहीं हो पाते।
हाथ में किताब है धर्म की,
नहीं जानते जीवन रहस्य के मर्म की,
धरती की गर्म हवा से विचलित हो जाते,
दौलत की ख्वाहिश वाले कभी निरोगी नहीं हो पाते।
भीड़ जुटा ली अपने चाहने वालों
धर्म का कर रहे सरे राह सौदा,
सर्वशक्तिमान की भक्ति का बनाते रोज नया मसौदा,
एक कंकड़ भी उछल कर सामने आ जाये
तो आकाश से गिरे परिंदे की तरह घबड़ाते।
हमदर्दी बटोरने के लिये रचते नित नये नाटक
ज़माने से खोया विश्वास पाने के लिये
कभी कभी भक्ति के शिकारी
खुद शिकार बनने दिखते
फिर हमदर्दी के लिये हाथ फैलाते।
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साहुकार हो गये लापता
अब संत ही हो गये व्यापारी,
माया की जंग में होती ही है मारामारी।
कहीं कंकर पत्थर उछलते
कहीं चलते अस्त्र शस्त्र
आस्था पर संकट क्या आयेगा
वह तो है बिचारी।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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