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जिंदगी में बदलते पलों का बयान-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं


पूरी जिंदगी का बखान क्या करें

यहां तो पल ही में माहौल बदल जाता है,

इंसान सुबह जाता है शवयात्रा में

शाम का बारात में जाने का आनंद पाता है।

कहें दीपक बापू किस पर खफा हों किसे करें सलाम,

रिश्ते मुंह फेर जाते अनजान लोग कर जाते काम

एक मंजिल के लिये जोड़ा कई लोगों ने वास्ता,

नये चेहरे आ जाते उधर पुराने बदल जाते हैं रास्ता,

कई लोगों ने फिर मिलने का वादा किया

क्या पहुंचते उनके पास जिनका पता बदल जाता है।

———–

शरीक के जख्म तो जाते हैं कभी न कभी,

दिल का दर्द ऐसा लगता जैसे चोट हुई हो अभी अभी।

कहें दीपक बापू लोग अपने जज़्बात नहीं समझते

दूसरों के क्या  समझेंगे

एक दूसरे को नीचे गिराने में लगे हैं सभी

————

स्वयं सुनाते हैं वह लोगों को अपनी जिंदगी की कथायें,

अपनी तारीफ खुद करें दर्द के लियेे गैरों पार आरोप लगायें।

कहें दीपक बापू यह विज्ञापन का दौर है

 लोगों की हमदर्दी हासिल करने के लिये

अपनी हालातों का बुरा बयान करना पड़ता है,

अपनी तरक्की पर हर कोई सीना फुलाता

पिछड़ने का दोष दूसरे पर मढ़ता है,

बड़े भाषण से कोई असर नहीं होता

लोगों की भीड़ अपने पास लाने के लिये

चलने फिरने की बजाय केवल नारे लगायें।

——–

जादू से किसी का पेट नहीं भरता

न ही बीमारी की दवा बनती है,

फिर भी सिद्ध बन गये हैं हमदर्दी के व्यापारी

 जिनकी मलाई छनती है।

कहें दीपक बापू अक्ल का कमरा बंद कर चुके लोग

वादों में बहक जाते

सच कहो तो उनसे लड़ाई ठनती है।

————–

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान तथा श्रीकृष्ण के प्रति आस्था देश के लिये संजीवनी-हिन्दी लेख shri madbhagwat gita ka gyan aur bhagwan shri krishana ke prati aastha ka sawal-hindi lekh)


        श्रीमद्भागवत पर रूस के एक शहर में प्रतिबंध लगाने का विवाद हमारे देश में फिलहाल तो एक दो दिन चलकर समाप्त हो गया है। ऐसा लगता है कि इस पर सनसनी फैलाकर अधिक समय तक घसीटना शायद समाचार प्रायोजक रणनीतिकारों को अधिक लाभप्रद नहीं लगा होगा। संभव है समाचार माध्यमों में इस विवाद के प्रसारण से विज्ञापन समय अधिक बिताने के दूरगामी दुष्परिणामों को भय भी रहा होगा। आखिर सोवियत संघ कथित रूप से भारत का राजनीतिक मित्र कहा जाता है और भारत में प्रचलित समस्त विचाराधाराओं के शिखर पुरुष कहीं न कहीं मानसिक रूप से उसके प्रभाव में रहते हैं। प्रगतिशील हों या जनवादी या फिर दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी कहीं न कहीं आज भी यह अपेक्षा रखते हैं कि संकट में सोवियत संघ हमारे काम आ सकता है जैसे कि 1973 में पाक युद्ध के दौरान अमेरिकी दखल की संभावना के समय आया था। ऐसे में वहां श्रीमद्भागवत गीता पर प्रतिबंध लगाने जैसा विषय इतना संवेदनशील है कि भारतीय जनमानस में सोवियत संघ की मैत्री वाली छवि खराब हो सकती है इस भय ने विवाद के प्रचार को रोक लिया। वैसे भी बाज़ार तथा प्रचार के शिखर पुरुषों की उस मूल विचाराधारा के विपरीत है जिसके अनुरूप व्यवसायिक पेशेवर बुद्धिजीवियों को चलना होता है।
           हमारा तात्पर्य यही है कि प्रचार माध्यमों में जब कोई बहस होती है तो वह स्पष्टतः प्रायोजित होती है और पक्ष के साथ विपक्ष के तर्क सुनाने के लिये विभिन्न विचारधाराओं के विद्वान जनमानस के समक्ष प्रायोजित रूप से ही प्रस्तुत होते हैं। इसके अलावा आर्थिक, धार्मिक तथा सामाजिक संगठनों के प्रवक्ता इस बात का ध्यान रखते हैं कि जब किसी देश पर टिप्पणी करते समय उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि अवश्य देखी जाये।
इस विवाद का संबंध धर्म की दृष्टि से प्रचारित हुआ। देखा जाये तो इसका अध्यात्मिक दर्शन से कोई संबंध नहीं है। हम जैसे चिंतक लोग अध्यात्म और धर्म का स्पष्ट रूप से विभाजन करते हैं। धर्म की बात करते समय केवल बाह्य पक्ष देखा जाता है जबकि अध्यात्म चर्चा करते हुए आंतरिक तत्व को भुलाना एक तरह से अज्ञानता है। जब हम कहते हैं कि ‘हम श्रीगीता का अपमान नहीं सहेंगे’, ‘भगवान श्रीकृष्ण का अपमान नहीं सहेंगे’, या ‘हिन्दू धर्म का अपमान नहीं होने देंगे’, तब स्पष्टतः हम बहिर्मुखी होते हैं। अंतर्मन की दृष्टि एकदम बंद हो जाती है।
            ऐसे में ज्ञानी खामोश रहते हैं। उनको पता है कि जिस गीता या श्रीकृष्ण को हम अपमानित अनुभव कर रहे हैं वह दरअसल एक भ्रम है। उसी श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि वह भक्त ज्ञानी है जो मान अपमान से परे है। हम एक बात तो यह पूछेंगे कि क्या तत्वज्ञान को अपमानित किया जा सकता है? दूसरी बात यह है कि हमने यह सोच कैसे लिया है कि हमारे श्रद्धेय श्रीकृष्ण तथा आदर्श श्रीमद्भागवत गीता का अपमान करने की किसी की औकात भी है? हम अपने ज्ञान की शक्ति को क्या नहीं जानते कि एक शहर या एक देश में प्रतिबंध लगने से आर्तनाद करने लगते हैं। इतना आर्तनाद कि हम प्रदर्शन कर भगवान श्रीकृष्ण और श्रीमद्भागवत गीता के लिये एक देश से याचना करने लगे। यह प्रदर्शन अपने देश में कर हम भले ही अपने आपको शक्तिशाली अनुभव करें पर सच यह है कि कहीं न कहीं हम सम्मान के याचक बन गये थे और ज्ञान कभी किसी को इस स्थिति में नहीं पहुंचाता। 
सम्मान और अपमान को बोझ उठाते योगी 
             इस विवाद में एक बहुत मज़ेदार घटना सामने आयी। भारत के एक बहुत बड़े धार्मिक गुरु हैं जिनको योग और ध्यान की शिक्षा के लिये बहुत ख्याति मिली है उन्होंने जनसमर्थन पाने के लिये यहां तक कह डाला कि ‘अगर रूस में श्रमद्भागवत गीता पर प्रतिबंध लगा तो मैं वहां से मिले दो सम्मान वापस कर दूंगा।’
ज्ञान के अहंकार की यह चरम परकाष्ठा है। योग और ध्यान करने वाले ज्ञानी ऐसे सम्मानों और अपमानो का बोझ नहीं ढोते। उनके बयान का सीधा मतलब यही था कि वह रूस में मिले सम्मानों का बोझ अभी तक ढो रहे हैं और अगर श्रीमद्भागवत गीता पर प्रतिबंध लगता है तो अपमान का बदला अपमान से लेंगे। इस तरह वह व्यवसायिक गुरु अपने शिष्यों के साथ ही आम जनमानस में एक धर्मभीरु होने के साथ स्वयं चेतनावान होने का जो संकेत भेज रहे थे वह श्रीमद्भागवत गीता के साधकों के लिये हास्यास्पद था। सच कहें तो प्रातः योगसाधना करने वालों के लिये हास्यासन करने के लिये यह एक रोचक विषय हो सकता है।
           देश के अनेक शहरों में प्रदर्शन हुए! दूरदर्शन पर अनेक गेरुऐ वस्त्र पहले साधु संत पेशेवर चर्चाकारों से जूझने के लिये आये। श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान दोहराया गया। समझ में नहीं आ रहा था कि संकट अगर कहां है-सोवियत संघ में कि भारत में। ऐसा लगता है कि हमारे देश के प्रचारकों के पास सनसनी फैलाने के लिये विषयों की कमी है या फिर वह केवल लोगों को आवेश में लाकर ही सफलता प्राप्त करने का मंत्र जानते हैं। ऐसे में धर्म अधिक अच्छे ढंग से काम कर सकता है। हमारे देश के लोग भी ऐसे हैं कि भले ही धर्म की पुस्तकों को न पढ़ते हों पर उसके सम्मान की बात करते हुए अत्यंत प्रसन्न होते हैं। अगर कोई विदेशी जोड़ा भारतीय पद्धति से विवाह करता है कि उसके खूब प्रचार मिलता है। ऐसे में समाचार माध्यम तो जानकारी देने से अधिक मनोरंजन करने में लगे हैं। जहां तक भगवान श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा और श्रीमद्भागवत गीता के तत्वज्ञान के महत्व का प्रश्न है ज्ञानी लोग जानते हैं कि वह अक्षुण्ण रहना है।
                  इस विषय पर दीपक भारतदीप का चिंत्तन ब्लाग पर लिखा गया लेख अवश्य पढ़ें।
समाचार तो यह है कि श्रीमद्भागवत गीता पर प्रतिबंध लगाने के लिये रूस के एक शहर में की अदालत में याचिका दायर की गयी है। यहां इस समाचार को लेकर गीता के विषय में संशय उठ रहे हैं। जिस तरह भगवान श्रीराम के विभिन्न रूप हैं उसी तरह श्रीगीता ने भी अपने भक्तों के अनुरूप धारण कर लिये हैं। भगवान श्रीराम के स्वरूप का प्रश्न है तो अनेक प्रचलित हैं-बाल्मीकी के राम, दशरथ पुत्र राम, कौशल्या के राम, तुलसी के राम-उनमें सबसे श्रेष्ठ रूप माना गया है घट घट में बसे राम! महाभारत युद्ध के समय श्रीकृष्ण ने अपने सखा अर्जुन को जो तत्वज्ञान दिया था वह श्रीमद्भागतगीता के रूप में स्मरण किया जाता है। मूलतः यह वेदव्यास रचित महाभारत ग्रंथ का एक महत्वपूर्ण भाग है। अगर कहें अगर श्रीमद्भागत गीता वाला अंश नहीं होता तो शायद ही कोई महाभारत काल को याद करता। यह भी संभव है कि अगर यह अंश न होता तो भगवान श्रीकृष्ण ने भी वह प्रतिष्ठा अर्जित नहीं की होती जो आज तक अक्षुण्ण बनी हुई है। हम इससे भी आगे जाकर यह कहें कि आज हमारे देश की विश्व में अध्यात्म गुरु की जो छवि है वह श्रीमद्भागवत गीता के कारण ही है तो गलत न होगा। गीता के तत्वज्ञान के रूप में कोई बदलाव नहीं आया पर जिन भगवत्भक्तों ने इसकी साधना से कृपा पायी उन्होंने अपना जीवन इसके प्रचार में इस सीमा तक समर्पित कर दिया कि उनके शब्दों के संचय समूह भी गीतातुल्य सम्मानीय बन गये। उनके साथ उन महापुरुषों के नाम भी जुड़े। ऐसे में अनेक महापुरुषों के नाम से गीता का नाम जुड़ा है। उन महापुरुषों के शब्द संचय समूहों में श्रीमद्भागवत गीता शीर्षक सर्वोपरि है पर उपशीर्षक में कहीं न कहीं उनके स्वयं या आश्रम के नाम जुड़े हुए हैं। नहीं भी जुड़े हैं तो प्रतीक चिन्ह उनकी प्रथक गीता होने की पहचान देते हैं।
               दस बरस पूर्व जब हमें योगसाधक के रूप में ज्ञान पाने की जिज्ञासा जागी तो हमने गोरखपुर प्रेस की अपने घर में रखी श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन प्रारंभ किया। उसमें हर पाठ के साथ उसके अध्ययन की महत्ता तथा पुण्य का प्रभाव भी प्रकाशित था। हम तो श्रद्धा के साथ पढ़ते थे। एक दिन हमें एक ब्राह्मण मित्र मिला। वह हमारी तरह ही साहित्यक रुचि वाला है। अध्यात्म में उसकी रुचि शायद इतनी नहंी है पर पारिवारिक पृष्ठभूमि के नाते उसका ज्ञान की कमी भीनहीं थी। उसे हमने अपनी गीता साधना की चर्चा की तो उसने हमसे कहा‘भाई साहब, आप श्रीमद्भागवत गीता का वही प्रकाशन पढ़ें जिसमें केवल श्लोकों के अनुवाद हों कि साथ में महात्म्य हो। उसमें उसके अध्ययन का महत्व आदि नहीं बताया गया हो। तभी आप समझ पायेंगे वरना आप दूसरी तरह की कहानियों में अपनी ऊर्जा नष्ट करेंगें।’’
            हम हैरान रह गये। बात यह थी कि हम महत्त्ता बताने वाली जिन कहानियों को साथ में पढ़ रहे थे उसमें कोई एक भी पाठ नहीं था जिसमें ब्राह्मण पात्र न हो। ऐसे में उस मित्र की बात थोड़ी चौंकाने वाली लगी मगर जब हमने नयी श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करना प्रारंभ किया तो लगा कि वास्तव में मित्र के हृदय से यह बात भगवत्कृपा की उपज थी। उस दिन हमने अपने मित्र से जब इस बात की चर्चा करते हुए श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की वर्तमान संदर्भ में व्याख्यान प्रस्तुत किया तो उसने जो कहा वह लिखना अपने मुंह मियां मिट्ठु बनना होगा।
              नियमित योग क्रिया से निवृत होने के बाद गीता की साधना करना हमारे दिन का सबसे स्वर्णिम समय होता है। अब यहां हम श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की चर्चा करने नहीं जा रहे पर जो लिख रहे हैं वह कहीं न कहीं उनसे प्रभावित है।
           इस्कॉन नाम की एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जो भगवान श्रीकृष्ण के संदेशों का प्रचार करती है। उसके आश्रमों में हमारा जाना हुआ है। हम उनमें कोई दोष नहीं देखते। देखने वाले देखते भी हैं। हम देखते हैं सुनते हैं पर लिप्त नहीं होते। सुना देख और भूल गये। उनके संस्थान से प्रकाशित श्रीमद्भागवत का एक संस्करण हमारे पास भी है। इसका अनुवाद विश्व के अनेक भाषाओं के इसलिये हुआ है क्योंकि इस्कॉन ने अनेक देशों में अपना स्थान बनाया है। वैसे भगवान श्रीकृष्ण, भगवान श्रीराम तथा भगवान शिवजी के अनेक भक्तों ने विश्व में उनका प्रचार किया है पर संगठित रूप से यह काम इस्कॉन ने किया है उतना शायद ही कोई कर सका हो। अनेक भारतीय संतों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है पर इससे भारतीय अध्यात्म का प्रचार कम उनकी छवि अधिक बनी है। इस्कॉन की जो कार्यशैली हमने देखी है उसमें दोष हम नहीं देखते पर इतना तय है कि श्रीमद्भागवत गीता के प्रचार में उनकी भूमिका हो सकती है वह उसमें वर्णित तत्वज्ञान के दर्शन उसमें नहीं होते। इस्कॉन के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद की कृपा से श्रीमद्भागवत यथारूप प्रस्तुत की गयी है पर उसमें व्याख्या ज्यादा है। हमने नहीं पढ़ी पर उसमें कुछ आपत्तिजनक हो सकता है इस पर यकीन नहीं है। अनुवाद करने या पढ़ने वालों की समझ का फेर हो सकता है। इस फेर में कोई नाराज हो गया तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। जब आत्मा जीवन धारण करता है तो वह सत्य लगता है पर होता तो झूठ है। देहधारी जीव विवादास्पद हो जाते हैं पर आत्मा निर्विवाद है।  यही स्थिति तत्वज्ञान की है। वह सूक्ष्म है जब उसे व्याख्या देकर व्यापक बनाया जाता है तो वह देहधारी जीव की तरह विवादस्पद हो जाता है। यह समझ का फेर अपने देश में ही बहुत सारे गीता सिद्धों को भी है कि श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान अत्यंत गूढ़ है जबकि एक बार अगर श्रीमद्भागवत हृदय में आत्मसात होना प्रारंभ हो तो एक जीवन के प्रति स्वयमेव दृष्टिकोण अन्य लोगों से प्रथक हो जाता है। यह अलग बात है कि कथित गीता सिद्ध इसे रहस्यमय कहकर स्वयं को ज्ञानी साबित करते हैं जैसे उनको समझ में सब कुछ आ गया है। कुछ लोग इस बात से नाराज हो सकते हैं कि मगर गीता सिद्ध अपना ज्ञान दिखाने उन लोगों के पास नहीं जाते जिनकी उसमें रुचि नहीं है। न ही सार्वजनिक रूप से श्रीमद्भागवत गीता पर प्रवचन करते हैं। गीता सिद्ध संगठन बनाकर नहीं चलते क्योंकि वह हंस होते हैं। संगठन तो कौए बनाकर चलते हैं।
               अब तो प्रश्न हैं एक तो क्या इस्कॉन की श्रीमद्भागवत पर प्रतिबंध लगाने की बात है या मूल रूप से गोरखपुर प्रेस जैसे प्रकाशन से जुड़ी श्रीमद्भागवत गीता को भी उसमें शामिल किया गया है। उससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि क्या श्रीमद्भागवत गीता के शब्द उच्चारण पर ही प्रतिबंध लगाने का विचार हो रहा है या उसके श्लोकों के स्थानीय भाषा में अनुवाद पर भी रोक लगेगी। एक रूसी नेता ने भारत में इस विषय पर हो रहे प्रदर्शन पर कहा कि श्रीमद्भागवत गीता का प्रवेश हमारे देश में दो सौ वर्ष पहले ही हो गया था। इससे तो लगता है कि रूस में इसके इतने अनुवाद हो चुके होंगे कि उनको रोकना संभव नहीं होगा।
         जिस तरह का इसमें तत्वज्ञान है और आधुनिक विज्ञान उसके सामने फीका है उसे देखकर तो यह लगता है कि इसका प्रचार वहां स्वयमेव बढ़ेगा। इस विवाद की भारत में चर्चा करने का मतलब इसलिये भी नहीं है क्योंकि यह तत्वज्ञान है इसे कोई नहीं बदल सकता। जहां तक हम जैसे आम गीता साधकों की भावनाओं के आहत होने का प्रश्न है तो यह एक भुलावा है। यह प्रचार माध्यमों के लिये समय पास करने के लिये अच्छा विषय बन गया है।
           हमारा मानना है कि श्रीमद्भावगत गीता में मनोरंजन नहीं है। जिसकी रुचि नहीं है उसे अहंकारवश गीता का ज्ञान देना भी तामस बुद्धि का परिचायक है। जिसकी भगवान श्रीकृष्ण में भक्ति नहीं है उसके सामने तो इसका नाम लेना भी निरर्थक है। अगर कोई यह सोचकर कि श्रीमद्भागवत गीता से ज्ञान मिल जाये ताकि लोगों के सामने अपने ज्ञानवान होने का प्रदर्शन करूं और वह इसे पढ़ने लगे तो जल्दी बोर हो जायेगा। संभव है कि वह अर्थ रटकर उसे सुनाने लगे पर इसका आशय यह कतई नहीं कि वह ज्ञानी है। सच्चे गीता साधक श्रीमद्भागवत गीता शब्द सुनकर न तो भावविभोर होते हैं न उसकी निंदा सुनकर विचलित होते हैं। उनके लिये यह विवाद एक हल्की मुस्कराहट लाने से अधिक प्रभाव नहीं रखता। मान अपमान से परे होने के गुण का महत्व आखिरी श्रीगीता में ही बताया गया है। ऐसी श्रीमद्भागवत गीता और उसके सृजनकर्ता भगवान श्रीकृष्ण का कोई अपमान भी कर सकता है या किसी में इतनी औकात है यह गीता सिद्ध नहीं मानते। ऐसा करने वालों का जो हश्र होगा उसकी कल्पना वही कर सकते हैं जो तत्वज्ञानी हैं।
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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राजनीतिक शास्त्र के मूल तत्वों के ज्ञान के बिना जनहित संभव नहीं-हिन्दी लेख (janhit aur rajniti-hindi lekh)


           जिस तरह भारत के धार्मिक आंदोलनों, अभियानों तथा संगठनों की स्थिति रही है कि उनके शिखर पुरुष श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान अल्प होने के बावजूद समाज का नेतृत्त करने लगते हैं। वही स्थिति सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों की भी है। वही अगर आप पिछले पचास साठ वर्षों से देश की स्थिति का अवलोकन करें तो पता चलेगा कि हमारे देश के अनेक संत माया मोह से परे रहने का उपदेश देते हुए अपने आश्रमों को महलनुमा तो अपने संगठन को लगभग कंपनी में बदल दिया है। दोनों हाथों  से माया बटोरी है। उन्होंने भारतीय अध्यात्म के ग्रंथों से अनेक पाठ रट लिये हैं उनको संस्कृत के श्लोक याद हैं। बड़े बड़े ग्रंथों का अध्ययन उन्होंने किया है। स्पष्टतः वह धर्म के वह व्यवसायी हैं जिनका अध्यात्मिक ज्ञान से कोई लेना देना नहीं है। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में अनेक महानायकों की कहानियां हैं उनका वह सरसपूर्ण ढंग से सुनाकर वाहवाही लूटते हैं पर तत्वज्ञान तथा ध्यान के प्रेरणा न देने का प्रयास करते हैं न ही ऐसा चाहते हैं क्योकि इससे उनके अनुयायी उनसे बड़े सिद्ध बन सकते है।। वह विफल रहते हैं। उनके ढेर सारे शिष्य अपने गुरुओं का बखान करते करते थकते नहीं है पर उनसे क्या सीख और कितना उस पर अमल कर रहे हैं यह कोई नहीं बता पाता। इनमें अनेक तो सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर भी बोलने का लोभ नहीं छोड़ पाते क्योंकि इससे प्रचार माध्यमों मे बने रहने का अवसर भी मिलता है।
        ऐसा लगता है कि भारतीय समाज पूर्वकाल में श्रमशील रहा होगा। अपने मानसिक तनाव की मुक्ति के लिये वह सांसरिक विषयों से इतर गतिविधियों में संलग्न रहने के लिये बौद्धिक विशेषज्ञों की शरण लेता होगा। ऐसे में मनोरंजन से उकताने के बाद उसे अध्यात्मिक विषय अत्यंत रुचिकर लगे होंगे क्योंकि न वह केवल मनोंरजन बल्कि ज्ञानबर्द्धक होने के साथ ही लंबे समय तक आत्मिक शांति के लिये उनका ज्ञान अत्यंत उपयेागी है। इसी कारण ही हमारे देश का अध्यात्मिक ज्ञान सर्वाधिक संपन्न बन गया क्योकि तपस्वियों, ऋषियों तथा ज्ञानियों ने जहां अनेक खोजें की तो समाज ने उनको स्वीकार भी किया। समाज अध्यात्मिक का मुरीद बना तो अल्पज्ञानियों के लिये यह व्यवसाय चुनने का एक महत्वपूर्ण साधन भी बना। प्राचीन तपस्पियों, ऋषियों और मुनियों ने जहां अपने सत्य ज्ञान से प्रसिद्धि प्राप्त करने के साथ ही अपना शिष्य समाज बनाकर अध्यात्मिक ग्रंथेां में देवत्व का दर्जा हासिल किया तो वहां समाज भी उनका गुणगायक बन गया।
           सर्वशक्तिमान का बनाया यह संसार अत्यंत अद्भुत है। इसमें सारी भौतिकता उसके संकल्प के आधार पर ही स्थित है पर वह सर्वशक्तिमान किसी को दिखता नहीं है। यह संसार अपने रूप बदलता है। बनता है और नष्ट होता है। विकास और विनाश के इस चक्र को कोई समझ नहंी पाया। संसार नश्वर है पर चमकदार है इसलिये कुछ लोग यहां अपनी देह, नाम तथा व्यवसाय की चमक बनाये रखने के लिये समाज से परे होकर उसका शीर्ष बनना चाहते हैं। ऐसे में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के ग्रंथों की विषय सामग्री सरस तथा मनोरंजक होने के साथ ही ज्ञानवर्द्धक होन के पेशेवर धार्मिक लोगों के लिये बहुत सहायक होती है। जिसे ज्ञान चुनना है वह ज्ञान चुने जिसे मनोरंजन करना है वह मनोरंजन करे।
        इनमें कुछ लोग लोग तो समाज पर आर्थिक, राजनीतिक तथा बौद्धिक शासन करना चाहते हैं और तब पैसे, पद और प्रतिष्ठा का उनका मोह अनंत हो जाता है। इसकी भूख शांत नहीं होती। जिस तरह सामान्य आदमी की भूख रोटी से मिट जाती है विशिष्टता की छवि रखने वाले आदमी की भूख उससे नहीं मिटती बल्कि पैसा, प्रतिष्ठा और पद का मोह उसे हमेशा पागल बनाये रहता है। इसमें भी कुछ आदमी ऐसे होते हैं जो समाज को पागल बनाये रखते हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य समाज से परे बने अपने शिखर की रक्षा करना होता है। इसलिये वह दूसरे के सृजन को अपने नाम करना चाहते हैं। यहीं से शुरु होता है उनका अभियान जो अंततः निष्काम बौद्धिक लोगों लिये के अनुसंधान का विषय बन जाता है।
धार्मिक आंदोलनों की तरह सामाजिक और राजनीतिक विषयों के अनेक आंदोलन ऐसे हैं जिनको उनके शीर्ष पुरुष कथित रूप से जनप्रिय बताकर भ्रमित करते हैं। आज के बाज़ार और प्रचार से प्रायोजित अनेक ऐसे आंदोलन हैं जो प्रचारित हैं पर उनसे जनहित कितना हुआ या होगा यह अभी भी विचार का विषय है। हम यहां राजनीतिज्ञों के आंदोलनों की बात न कर उन लोगों के राजनीिितक आंदोलनों की बात करेंगे जिनको गैर राजनीतिक लोग प्रारंभ करते है। वह एक तरफ कहते हैं कि उनका आंदोलन गैर राजनीतिक है पर उसकी कोई दूसरी संज्ञा नहीं बताते-जैसे कि सामाजिक आंदोलन, नैतिक आंदोलन या शैक्षणिक आंदोलन। मजे की बात यह है कि उनकी मांगे सरकार से होती हैं जिनका नेतृत्व राजनीतिक लोग करते हैं। ऐसे में आंदोलनों के शीर्ष पुरुषों के बौद्धिक चिंत्तन पर ध्यान जाना जरूरी है। वह कहें या न कहें उनके आंदोलनों में कहीं न कहीं राजनीतिक तत्व रहता है-चाहे उनकी मांगों में हो या उनके पूरे होने में। दूसरी बात यह कि समाज में सर्वजन हित के लिये केाई भी कार्य राजनीतिक परिधि में आता है। मनुष्य नाम की ईकाई का समाज के रूप में परिवर्तन इसलिये ही होता है कि कम से कम वह अन्य जीवों की तरह हिंसक या अनुशासनहीनता का बर्ताव न करे। अगर कोई व्यक्ति अध्यात्मिक विषयों  में महारती है तो वह समाज के भले के लिये न काम कर मनुष्य के हित के लिये काम करता है। वह स्वयं पर अनुसंधान करता है फिर उसकी जानकारी दूसरे को देकर अपने मनुष्य के दायित्व का निर्वाह करता हे। वह मनुष्य को समाज मानकर नहीं बल्कि इकाई दर इकाई संपर्क बनाता है। जहां समाज मानकर मनुष्य को ईकाई दर इकाई मानकर काम किया जाता है वहां राजनीतिक क्षमतायें होना आवश्यक है।
हम कौटिल्य का अर्थशास्त्र या मनु स्मृति को देखें तो वहां मनुष्य को इकाई मानकर संबोधित किया गया है न कि समाज मानकर। उसमें मनुष्य निर्माण के लिये संदेश दिये गये हैं। यह मानकर कि अगर मनुष्य के व्यक्त्तिव का निर्माण होगा तो समाज स्वयं ही अपनी राह चलेगा। कहीं न कहीं यह स्वीकार किया गया है कि समूचा मनुष्य समुदाय एक जैसा नहीं हो सकता। इसलिये उसमें जितने बेहतर लोग होंगे  उतना ही वह चमकदार भी होगा । इसके विपरीत भारतीय आंदोलक पुरुष समाज को संबोधित करते हुए अपनी बात करते हैं। वह यह नहीं बताते कि मनुष्य क्या करे? वह कहते हैं कि समाज यह करे तो सरकार वह करे। यह हवा में तीर चलाने जैसा है। वह समाज में व्यक्ति निर्माण के लिये अपनी भूमिका निभाने से कतराते हैं। भले ही वह सामाजिक नेता होने का दावा करें पर अपनी भूमिका को राजपुरुष की तरह देखना चाहते हैं। यह उनके राजनीतिक अल्पज्ञान का प्रमाण है। अध्यात्मिक पुरुष की छवि सौम्य और शांत होती है। उसकी सक्रियता में आकर्षण नहीं होता जबकि राजपुरुष की छवि में आक्रामकता, सुंदरता तथा प्रभावी छवि है और इसलिये हर कोई उसी तरह दिखना चाहता है।
        हम यहां कुछ आंदोलनों की चर्चा करना चाहेंगे जो जनमानस के लिये महत्वपूर्ण रहे हैं। सबसे पहले सामाजिक कार्यकर्ता श्री अन्ना हजारे और विश्व प्रसिद्ध  योग  शिक्षक बाबा रामदेव के आंदोलन की बात करना अच्छा रहेगा। मूलतः दोनों  ही राजनीतिक क्षेत्र के नहीं है। दोनों ही अपनी छवि महात्मा गांधी की तरह बनाना चाहते हैं। दोनों ही यह कहते हैं कि वह कोई सरकारी पद ग्रहण नहीं करेंगे और न ही चुनाव लड़ेंगे। गैर राजनीतिक दिखने वाले उनके आंदोलनों के विषय बिना राजनीतिक दावपैंचों के सिद्ध नहीं हो सकते यह उनको कोई न समझा पा रहा है। वजह दोनेां ही राजनीति के पश्चिमी सिद्धांतों का अनुकरण कर रहे हैं जिसमें आंदोलन एक विषय और सरकार चलाना दूसरा विषय माना जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि राजधर्म का मतलब वह क्या समझते हैं जो दूसरों को बता रहे हैं। चलिये वह जानते भी होंगे फिर कोई बड़ा पद लेने की बात से इंकार क्यों करते हैं? क्या सरकारी पद केवल उपभोग के लिये होता है। विश्व भर की लोकतंत्रिक सरकारों में बैठे उच्च पदासीन लोग क्या राजसुख भोगने आते हैंे। क्या पद लेना केवल प्रतिष्ठा का प्रतीक है और दायित्व निभाकर दूसरों के सामने प्रस्तुत करने का कोई सिद्धांत वहां नहीं है।
       हैरानी की बात है कि भारतीय जनमानस उनके पद ग्रहण न करने की प्रतिज्ञा की वैसे ही प्रशंसा करता है जैसे भीष्म पितामह की। यह सभी लोग क्या भीष्मपितामह बनना चाहते है पर याद रखना चाहिए कि उन्होंने इस प्रंतिज्ञा को निभाया तो उसकी वजह से अंततः महाभारत युद्ध हुआ। अगर वह स्वयं राजा के पद पर बैठते तो न पांडु राजा बनते और न ही धृतराष्ट के पुत्र पांडवों के साथ युद्ध करते। भीष्म पितामह अपने राज्य की रक्षा करने के वचन से बंधे रहे पर अंततः उनको युद्ध में प्राण गंवाने पड़े। इस एक घटना को भारतीय इतिहास मंें हमेशा मिसाल नहीं माना जाता क्योंकि राजकाज का जिम्मा निभाने में तो हमारे आदर्श भगवान श्रीराम माने जाते हैं। राज्य का त्याग उन्होंने किया पर वापस लौटकर फिर वापस सिंहासन पर विराजे और प्रजा हित के लिये काम किया।
        श्री अन्ना हजारे ने कहा था कि वह दूसरा स्वतंत्रता संग्राम लड़ रहे हैं तब यह विचार सभी लोगों के मन में आया होगा कि महात्मा गांधी के स्वतंत्रता संग्राम भारत को पूर्णता नहीं दिला सका शायद तभी वह ऐसी बात कही हैं। बात निकली है तो श्री महात्मा गांधी जैसे पुण्यात्मा के विचार पर प्रतिविचार आयेगा और हम उसे व्यक्त करने से पीछे नहीं हटेंगे। महात्मा गांधी ने अंग्र्रेजों से आजादी दिलाने का बीड़ा उठाया यह स्वीकार्य है पर उसके बाद राज्य कौन संभालेगा इसकी जिम्मेदारी कौन तय करने वाला था? महात्मा गांधी ने क्या ऐसी गांरटी ली थी कि अंग्रेजों के बाद राज्य चलाने वाले अपने काम में दक्ष होंगे! भारत एक विशाल देश था और उसे दो टुकड़ों में बांटा गया। इसके बावजूद आज का भारत बहुत विशाल था? उसका राजकाज कैसे चलेगा और कौन चलायेगा इसकी भूमिका क्या महात्मा गांधी ने तय की थी? उन्होंने अपने आंदोलन के दौरान सुखद भारत की कल्पना व्यक्त की पर उसमें अपनी सक्रिय भूमिका निभाना क्या सत्ता का सुख भोगना समझा? यह पलायन माना जाये कि त्याग?
         वह परिवार, समाज, और राष्ट चलाने के सिद्धांतों पर खूब बोले होंगे पर आजादी के बाद के भारत में उन्होंने सक्रिय भागीदारी न देकर क्या जनता के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह किया था? सरकार और राजकाज कोई स्वचालित मशीन नहीं है जिसके साथ खिलवाड़ किया जाये। उसके लिये कुशल लोग होना चाहिऐं। मूल बात यह है कि महात्मा गाीधी अंग्रेजों के हाथ से राजकाज लेकर जिन स्वदेशी लोगों को दे रहे थे उनके ज्ञान पर उनको केवल विश्वास था या उन्होंने उसे प्रमाणिक रूप देखाय भी था? आज अन्ना कहते हैं कि हम काले अंग्रेजों के राज्य को झेल रहे हैं तो सीधे महात्मा गांधी के आंदोलन का विचार आता है। जब उनको कोई राज्य का पद लेना नहंी था तो फिर वह स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के नेता क्यों बने? क्या वह मानते थे कि अं्रग्रेजों ने जिस व्यवस्था को बनाया है उसमें सरकार तो स्वतः चलेगी और उच्च पद तो केवल भोगने के लिये हैं उनमें कोई जिम्मेदारी नहीं होगी?
          हम तो यह मानते हैं सरकार या राजकाज चलाना अंततः राजनीति ज्ञान के बिना संभव नहीं है। आप अगर उसमें कोई पद लेना नहीं चाहते तो इसका मतलब यह है कि आप में कुशलता की कमी है। उसके बाद आप राज्य में परिवर्तन के लिये कोई आंदोलन  चलाना चाहते हैं और पद भी लेना नहीं चाहते तो इसके तीन मतलब यह हैं। एक तो यह कि अप्रत्यक्ष रूप से राजकाज आपका ही रहेगा पर उसमें कमीपेशी होने पर अपनी जिम्मेदारी से भाग सकते हैं। दूसरा यह कि आपका मानना है कि राज्य तो भगवान भरोसे चलता है हम जिसे बिठायेंगे वह सुख भोगने के साथ हमें भी पूजता रहेगा। तीसरी स्थिति यह है कि आपमें आत्मविश्वास नहीं है कि आप सरकार या राज चला पायेंगे।
          ऐसे में कुछ निष्कर्ष भी निकल सकते हैं जो त्यागी आंदोलक पुरुषों और उनके समर्थकों को शायद अच्छे न लगें। एक तो यह कि गैरराजनतिक लोगों दो कारणों से ही राज्य पद त्यागते हैं। एक तो वह बहुत चालाक हैं क्योंकि इससे बिना जिम्मेदारी के वह राजसुख या सम्मान पाते हैंे या उनके पास राजनीतिक शास्त्र के ज्ञान का अभाव है। पहली स्थिति में तो उनको आंदोलक पुरुष होने का हक है क्योंकि राजनीतिक सिद्धांत इस कुटिलता की अनुमति देते हैं कि अगर कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदारी न लेकर अप्रत्यक्ष रूप से राजहित करता है तो कोई बात नहीं है पर दूसरी स्थिति में उनको इसका अधिकार नहीं है कि वह कथित रूप से एक अकुशल प्रशासक को हटाकर दूसरा स्थापित करें। अगर उनके पास कोई बेहतर विकल्प नहीं है और न ढूंढने की क्षमता से भी परे हैं तो उनके कथित गैरराजनीतिक आंदोलन संशय के घेरे में आयेंगै। इससे अच्छा है तो वह आंदोलन ही न चलायें और अगर चलायें तो समय आने पर राज्य चलाने के लिये व्यवस्था से जुड़कर उनको आदर्श स्थापित करें।
           अर्थशास्त्र में हमने भारतीय अर्थव्यवस्था के समस्याओं के बारे में पढ़ा है कि अकुशल प्रबंध का यहंा अभाव है। मतलब यह कि हमें कुशल प्रबंधक चाहिये जो व्यवस्था चला सकें। जो आदर्श की बात करें तो उसे व्यवस्था में आकर काम करते हुए साबित करे। अगर हम भ्रष्टाचार की बात करें तो वह अकुशल प्रबंध का एक हिस्सा होने के साथ ही परिणाम है। हम परिणाम बदलना चाहते हैं यानि भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं पर कुशल प्रबंध के बिना यह संभव नहीं है। बीमारी हटाने के लिये दवा चाहिये न कि हम नारे लगाते रहें कि बीमारी भाग जाओ नहीं तो हम आते हैं। मैं पद नहीं लूंगा मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा मेरा किसी राजनीतिक दल से संबंध नहीं रहेगा जैसी बातें कहते हुए राजनीतिक आंदोलक पुरुष वैसे ही हैं जैसे कोई डाक्टर तमाम तरह के शारीरिक परीक्षण कराकर मरीज को बीमारी का नाम बताकर पर दवा देने की बात आने पर कहीं दूसरे डाक्टर के पास भेज देता है। हम ऐसे आंदोलक पुरुषों की ईमानदारी पर कोई सवाल नहीं उठाते क्योंकि वह प्रमाणिक है पर राजनीति शास्त्र के ज्ञान का अभाव उनमें साफ दिखाई देता है। इसलिये वह राजनीतिक खेल में ऐसे दर्शक की भूमिका निभाना चाहते हैं जो खिलाड़ी को सलाह देता रहे और जीतने पर अपनी वाह वाही स्वयं करे और हार हो तो दोष खिलाड़ी को दे। ऐसा आम तौर से हम गांवों में चौपालों और शहरों में बाजा़ारों में शतरंज और ताश खेलने वाली महफिलों में देखते हैं।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

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