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राजनीति में संधाय आसन की प्रासंगिकता-हिंदी लेख


                बाबा रामदेव ने फिर अपना आंदोलन प्रारंभ किया है।  उन्होंने तारीख चुनी है नौ अगस्त जिस दिन स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारत अंग्रेजों का नारा बुलंद किया गया था।  मूलतः बाबा रामदेव एक योग शिक्षक हैं यह अलग बात है कि उन्होंने अपने व्यवसायिक प्रयासों ने भारतीय योग विद्या को जिस तरह प्रचार माध्यमों में प्रतिष्ठित किया उससे उनके भक्त उनमें देवत्व के दर्शन करते हैं।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनके योग प्रचार की क्षमताओं को कोई चुनौती नहीं देता।  देना चाहिए भी नहीं क्योंकि उन्होंने जो किया है वह आसानी से नहीं किया जा सकता।

योगासन और प्राणायाम से मनुष्य के अंदर जिस मनुष्यत्व की स्थापना स्वतः होती है उसका अनुभव तो केवल गुरु और उनके साधक ही कर सकते हैं। इसमें संदेह नहीं है मगर इसका आशय यह कतई नहीं है कि योग साधक या गुरु मनुष्यत्व में ज्ञान तत्व की स्थापना कर सकें।  हमारे देश में एक बात देखी जाती है कि लोग हर विषय में ज्ञानी होने का दावा करते हैं। स्थिति यह है कि कोई भी किसी भी व्यवसाय में कूद जाता है।  अगर कोई सार्वजनिक महत्व का काम हो तो सभी अपना महत्व सिद्ध करने  लगते हैं।  खासतौर से जब ज्ञान की बात हो तो प्राचीन ग्रंथों से पढ़ी बात को कोई भी सुना सकता है।

बाबा रामदेव आष्टांग योग में आसन और प्राणायाम में सिद्ध हस्त हैं पर जिस तरह वह जिस सामाजिक अभियान को चला रहे हैं उसके लिये राजनीति शास्त्र का ज्ञान होना आवश्यक है।  वही क्या हमारा मानना है कि राजनीति में आने वाले हर व्यक्ति को राजनीति शास्त्र का ज्ञान होना चाहिए।  हमारे यहां पद प्राप्ति को ही राजनीतिक लक्ष्य और उपलब्धि माना जाता है। इतना ही नहीं जो बरसों से पदासीन रहे उसे चाणक्य तक कहा जाता है।  राज्य में पद प्राप्त करने वाले की प्रजा के प्रति जो जिम्मेदारी होती है और उसका निर्वाह करने के लिये जो तरीके हैं उसका ज्ञान कितनों को होता है यह अलग से विचार का विषय है।

बाबा रामदेव के बारे में हमारी धारणा है कि उनके अंदर किसी सामान्य मनुष्य की अपेक्षा अधिक दैहिक तथा मानसिक शक्ति है जो योग साधना का परिणाम है।  इस शक्ति का उपयोग करने के लिये जिस ज्ञान की आवश्यकता होती है उसमें अवश्य संदेह होता है।  इसके लिये आवश्यक होता है संबंधित विषय का ज्ञान होना और बाबा रामदेव राजनीति शास्त्र के अध्ययन के बिना राष्ट्रहित का आंदोलन चलाने निकल पड़े हैं।

इस बार के आंदोलन में उनका ध्येय अस्पष्ट है।  तेवर ढीले हैं।  अन्ना हजारे के साथ उन्होंने कुछ ही दिन पहले संयुक्त रूप से पत्रकार वार्ता की थी उसमें दोनों ने साथ साथ रहने की कसम खाई थी।  अन्ना हजारे अपना आंदोलन बीच में खत्म कर अपने गांव वापस चले गये।  उन्होंने जिस तरह अपना आंदोलन खत्म किया वह अत्यंत निराशाजनक था।  हमारे जैसे निष्पक्ष आम लेखकों का मानना है कि अन्ना हजारे हों या स्वामी रामदेव इन दोनों के राष्ट्र सुधार के लिये किये गये आंदोलन केवल प्रचार माध्यमों के सहारे ही लंबे चले।  तब दोनों आंदोलनों के समाचारों और बहसों के बीच हर मिनट में विज्ञापन के दर्शन होते थे।  चूंकि आंदोलन गंभीर मुद्दों पर सतही योजना पर आधारित रहे हैं इसलिये लोगों की इनमें दिलचस्पी अधिक नहीं रही।  यही कारण है कि अब प्रचार माध्यम इनसे दूरी बना रहे हैं क्योंकि उनके प्रबंधकों को नहीं लगता कि दिन भर इनके सहारे विज्ञापनों का समय पास किया जा सकता है।

बहरहाल बाबा रामदेव दिल्ली के रामलीला मैदान में जो आंदोलन कर रहे हैं उसमें वह संधाय आसन करते हुए दिख रहे हें

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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अरेश्व विजिगीषोश्व विग्रहे हीयामानयोः।

सन्धाय यदवस्थानं सन्धायान्मुच्यते।।

हिन्दी में भावार्थ- जब दोनों शत्रु युद्ध में हीन हो उस समय मिल बैठ रहने को संधाय आसन कहते हैं।

पहले जब वह अनशन पर बैठे थे तब विदेशों में जमा भारत के  काले धन को देश में लाने के मुद्दे पर जमकर गरजे थे।  उनके शत्रु कौन है यह तो पता नहीं पर काले धन को लेकर वह जब आक्रामक रवैया अपनाये हुए थे तब लग रहा था कि  पर्दे के पीछे कोई न कोई शत्रु है जिससे वह ललकार रहे हैं।  विदेशों में काला धन रखने वालों को उन्होंने राष्ट्र का शत्रु तक घोषित कर दिया था। इतना ही नहीं उन्होंने उनके नाम तक अपने पास होने का दावा करते हुए कहा था कि समय आने पर बता दूंगा।  इस बार वह केवल हवा में अपनी बातें उछाल रहे हैं।  हम किसी के विरोधी नहीं है।  हमारा कोई शत्रु नहीं है।  आदि आदि मीठी बातें करते हुए वह ऐसे लगते हैं जैसे कि सामने बैठी भीड़ की बजाय कहीं दूर बैठे अज्ञात लोगों को प्रसन्न कर रहे हैं।

बाबा रामदेव के  विरुद्ध कोई बड़ी कार्यवाही की संभावना भी नहीं लगती। ऐसा लगता है कि पर्दे के पीछे विराजमान उनके शत्रु भी अब शांत हो गये हैं।  कम से कम अभी तक बाबा रामदेव ऐसे लग रहे हैं कि जैसे कि खानापूरी करने आये हों और उनके अभियान से किसी को डरने की आवश्यकता नहीं है।  बाबा रामदेव को शायद पता नहीं होगा  आसनों के प्रकार पतंजलि योग में कहीं नहीं बताये गये पर के कौटिल्य महाराज ने अपने शास्त्र में अनेक आसनों का जिक्र किया है।  उनसे यह भी पता चलता है कि बैठने या उठने के ही आसन नहीं होते बल्कि मनुष्य की मानसिक तथा शारीरिक क्रियाओं के साथ ही व्यवहार के भी आसन होते हैं।  रामलीला मैदान में आंदोलन समाप्त होने के बाद वह आपस में द्वंद्वरत लोगों को हिंसा की बजाय संधाय आसन करने की प्रेरणा दे सकते हैं ताकि देश में मैत्रीवत भावना का विकास हो।

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर विशेष हिन्दी लेख-भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के बिना अधूरापन


          देश में एक बार फिर 15 अगस्त 2011 सोमवार को स्वतंत्रता दिवस या आजादी के दिन के अवसर पर अनेक कार्यक्रमों का आयोजन होगा। देश में बढ़ते भ्रष्टाचार, अराजकता, बेरोजगारी, भूखमरी, बेरोजगारी, अस्वास्थ्य की स्थित और गरीबी की वजह से अनेक लोगों के लिये 15 अगस्त की आजादी एक भूली बिसरी घटना हो गयी है। आजादी को अब 65 वर्ष हो गये हैं और इसका मतलब यह है कि कम से हर परिवार की पांच से सात पीढ़ियों ने इस दौरान इस देश में सांस ली होगी। हम देखते हैं कि पीढ़ी दर पीढ़ी एतिहासिक घटनाओं की स्मृतियां फीकी पड़ती जाती हैं। एक समय तो उनको एक तरह विस्मृत कर दिया जाता है। अगर 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस और और 26 जनवरी गणतंत्र दिवस हर वर्ष औपचारिक रूप से पूरे देश में न मनाया जाये तो शायद हम इन तारीखों को भूल चुके होते। वैसे निंरतर औपचारिक रूप से मनाये जाने के बाद भी कुछ वर्षों बाद एक दिन यह स्थिति आयेगी कि इसे याद रखने वालों की संख्या कम होगी या फिर इसे लोग औपचारिक मानकर इसमें अरुचि दिखायेंगे।
            ऐतिहासिक स्मृतियों की आयु कम होने का कारण यह है कि इस संसार में मनुष्य की विषयों में लिप्तता इस कदर रहती है कि उसमें सक्रियता का संचार नित नयी एतिहासिक घटनाओं का सृजन करता है। मनुष्य जाति की इसी सक्रियता के कारण ही जहां इतिहास दर इतिहास बनता है वही उनको विस्मृत भी कर दिया जाता है। हर पीढ़ी उन्हीं घटनाओं से प्रभावित होती है जो उसके सामने होती हैं। वह पुरानी घटनाओं को अपनी पुरानी पीढ़ी से कम ही याद रखती है। इसके विपरीत जिन घटनाओं का अध्यात्मिक महत्व होता है उनको सदियों तक गाया जाता है। हम अपने अध्यात्मिक स्वरूपों में भगवत् स्वरूप की अनुभूति करते हैं इसलिये ही भगवान श्री विष्णु, श्री ब्रह्मा, श्री शिव, श्री राम, श्री कृष्ण तथा अन्य स्वरूपों की गाथायें इतनी दृढ़ता से हमारे जनमानस में बसी हैं कि अनेक एतिहासिक घटनायें उनका विस्मरित नहीं करा पातीं। हिन्दी के स्वर्णिम काल में संत कबीर, मानस हंस तुलसी, कविवर रहीम, और भक्तमणि मीरा ने हमारे जनमानस को आंदोलित किया तो उनकी जगह भी ऐसी बनी है कि वह हमारे इतिहास में भक्त स्वरूप हो गये और उनकी श्रेणी भगवान से कम नहीं बनी। हम इन महामनीषियों के संबंध में श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित इस संदेश का उल्लेख कर सकते हैं जिसमें भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘जैसे भक्त मुझकों भजते हैं वैसे ही मैं उनको भजता हूं’। अनेक विद्वान तो यह भी भी कहते हैं कि भक्त अपनी तपस्या और सृजन से भगवान की अपेक्षा बढ़े हो जाते हैं।
स्वतंत्रता संग्राम के समय अनेक महापुरुष हुए। उनके योगदान का अपना इतिहास है जिसे हम पढ़ते आ रहे हैं पर हैरानी की बात है कि इनमें से अनेक भारतीय अध्यात्म से सराबोर होने के बावजूद भारतीय जनमानस में उनकी छवि भक्त या ज्ञानी के रूप में नहीं बन पायी। स्पष्टतः स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सक्रिय छवि ने उनके अध्यात्मिक पक्ष को ढंक दिया। स्थित यह है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी अनेक लोग राजनीतिक संत कहते हैं जबकि उन्होंने मानव जीवन को सहजता से जीने की कला सिखाई।
        ऐसा नहीं है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन राष्ट्र या मातृभूमि को महत्व नहीं देता। भगवान श्रीकृष्ण ने तो अपने मित्र श्री अर्जुन को राष्ट्रहित के लिये उसे क्षात्र धर्म अनुसार निर्वाह करने का उपदेश दिया। दरअसल क्षत्रिय कर्म का निर्वाह मनुष्य के हितों की रक्षा के लिये ही किया जाता है। यह जरूर है कि चाहे कोई भी धर्म हो या कर्म अध्यात्मिक ज्ञान होने पर ही पूर्णरूपेण उसका निर्वाह किया जा सकता है। देखा जाये तो भारत और यूनान पुराने राष्ट्र माने जाते हैं। भारतीय इतिहास के अनुसार एक समय यहां के राजाओं के राज्य का विस्तार ईरान और तिब्बत तक इतना व्यापक था कि आज का भारत उनके सामने बहुत छोटा दिखाई देता है। ऐसे राजा चक्रवर्ती राजा कहलाये। यह इतिहास ही राष्ट्र के प्रति गौरव रखने का भाव अनेक लोगों में अन्य देशों के नागरिकों की राष्ट्र भक्ति दिखाने की प्रवृत्ति की अपेक्षा कम कर देता है। इसी कारण अनेक बुद्धिमान इस देश के लोगों में राष्ट्रप्रेम होने की बात कहते हैं। यह सही है कि बाद में विदेशी शासकों ने यहा आक्रमण किया और फिर उनका राज्य भी आया। मगर भारत और उसकी संस्कृति अक्षुण्ण रही। इसका अर्थ यह है कि 15 अगस्त को भारत ने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की और कालांतर वैसे ही महत्व भी माना गया। स्वतंत्रता के बाद भारतीय अध्यात्मिक को तिरस्कृत कर पश्चिम से आये विचारों को न केवल अपनाया गया बल्कि उनको शैक्षणिक पाठ्यक्रमों से जोड़ा भी गया। हिन्दी में अनुवाद कर विदेशी विद्वानों को महान कालजयी विचारक बताया गया। इससे धीमे धीमे सांस्कृतिक विभ्रम की स्थिति बनी और अब तो यह स्थिति यह है कि अनेक नये नये विद्वान भारतीय अध्यात्मक के प्रति निरपेक्ष भाव रखना आधुनिकता समझते हैं। इसके बावजूद 64 साल के इस में इतिहास की छवि भारत के अध्यात्मिक पक्ष को विलोपित नहीं कर सकी तो इसका श्रेय उन महानुभावों को दिया जाना चाहिए जिन्होंने निष्काम से जनमानस में अपने देश के पुराने ज्ञान की धारा को प्रवाहित रखने का प्रयास किया। यही कारण है कि 15 अगस्त और 26 जनवरी को मनाने तथा भीड़ को अपने साथ बनाये रखने के लिये उनके तरह के प्रयास करने पड़ते हैं जबकि राम नवमी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और महाशिवरात्रि पर स्वप्रेरणा से लोग उपस्थित हो जाते हैं। एक तरह से इतिहास और अध्यात्मिक धारायें प्रथक प्रथक हो गयी हैं जो कि होना नहीं चाहिए था।
        एक जो सबसे बड़ी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस स्वतंत्रता ने भारत का औपचारिक रूप से बंटवारा किया जिसने इस देश के जनमानस को निराश किया। अनेक लोगों को अपने घरबार छोड़कर शरणार्थी की तरह जीवन पाया। शुरुआती दौर में विस्थापितों को लगा कि यह विभाजन क्षणिक है पर कालांतर में जब उसके स्थाई होने की बात सामने आयी तो स्वतंत्रता का बुखार भी उतर गया। जो विस्थापित नहीं हुए उनको देश के इस बंटवारे का दुःख होता है। विभाजन के समय हुई हिंसा का इतिहास आज भी याद किया जाता है। यह सब भी विस्मृत हो जाता अगर देश ने वैसा स्वरूप पाया होता जिसकी कल्पना आजादी के समय दिखाई गयी। ऐसा न होने से निराशा होती है पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन इसे उबार लेता है। फिर जब हमारे अंदर यह भाव आता है कि भारत तो प्राचीन काल से है राजा बदलते रहे हैं तब 15 अगस्त की स्वतंत्रता की घटना के साथ जुड़ी हिंसक घटनाओं का तनाव कम हो जाता है।सीधी बात कहें तो हमारे देश के जनमानस वही तिथि या घटना अपनी अक्षुण्ण बनाये रख पाती है जिसमें अध्यात्मिकता का पुट हो। एतिहासिकता के साथ अध्यात्मिकता का भाव हो वरना भारतीय जनमानस औपचारिकताओं में शनै शनै अपनी रुचि कम कर देता है। इसी भाव के कारण दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से राष्ट्रीय पर्वों पर आम जनमानस का उत्साह धार्मिक पर्वों के अवसर पर कम दिखाई देता है। हालांकि अध्यात्मिकता के बिना एतिहासिक घटनाओं के प्रति आम जनमानस अधूरापन दिखाना जागरुक लोगों को बुरा लगता है।
अथर्ववेद से स्वतंत्रता दिवस पर विशेष लेख-राष्ट्र और मातृभूमि की रक्षा गुणी नागरिकों के बल पर ही संभव (atharvved se swatantrata diwas  or inddepandent day  15 august par vishesh hindi lekh-good citizen can security self nation or matrabhumi) 
  हमारे यहां स्वतंत्रता संग्राम में दौरान आज़ादी तथा देश भक्ति का नारा इस तरह लगा कि हमारे यहां पेशेवर अभियान संचालक लोगों की भीड़ को एकत्रित करने के लिये आज भी लगाते हैं। लोगों   के राष्ट्रप्रेम की धारा इस तरह बह रही है कि आज भी स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस तथा गांधी जयंती पर भाव विभोर करने वाले गीत लोगों को लुभाते हैं। जब कोई आंदोलन या प्रदर्शन होता है तो उस समय मातृभूमि का नारा देकर लोगों को अपनी तरफ आकृष्ट करने के प्रयास होते हैं जिनसे प्रभावित होकर लोगों की भीड़ जुटती भी है।

         देश को स्वतंत्रता हुए 64 वर्ष हो गये हैं और इस समय देश की स्थिति इतनी विचित्र है कि धनपतियों की संख्या बढ़ने के साथ गरीबी के नीचे रहने वालों की संख्या उनसे कई गुना बढ़ी है। आर्थिक उदारीकरण होने के बाद तो यह स्थिति हो गयी है कि उच्च मध्यम वर्ग अमीरों में आ गया तो गरीब लोग अब गरीबी की रेखा के नीचे पहुंच गये हैं। आंकड़े बताते हैं कि देश में करोड़पतियों की संख्या में बढ़ोतरी हो गयी है तो समाज के हालत बता रहे हैं कि रोडपति उससे कई गुना बढ़े हैं। इसी कारण विकास दर के साथ अपराध दर भी तेजी बढ़ी है। आधुनिक तकनीकी जहां विकास में योगदान दे रही है तो उसके सहारे अपराध के नये नये तरीके भी इजाद हो गये हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा देश आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विरोधाभासों के बीच सांसे ले रहा है। स्थिति यह है कि अनेक लोग तो 64 वर्ष पूर्व मिली आजादी पर ही सवाल उठा रहे हैं। अनेक लोग तो अब दूसरे स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ करने की आवश्यकता बता रहे हैं। मातृभूमि की रक्षा के नारे की गूंज इतनी तेज हो उठती है कि सारा देश खड़ा होता है। तब ऐसा लगता है कि देश में बदलाव की बयार बहने वाली है पर बाद में ऐसा होता कुछ नहीं है। वजह साफ है कि राष्ट्र या मातृभूमि की रक्षा नारों से नहीं होती न ही तलवारें लहराने या हवा में गोलियां चलाने से शत्रु परास्त होते हैं।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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सत्यं बृहदृत्तामृग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति।
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्पुरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु्।।
                ‘‘सत्य पथ पर चलने की प्रवृत्ति, हृदय का विशाल भाव, सहज व्यवहार, साहस, कार्यदक्षता तथा प्रत्येक मौसम को सहने की शक्ति, ज्ञान के साथ विज्ञान में समृद्धि तथा विद्वानों का सम्मान करने के गुणों से ही राष्ट्र और मातृभूमि की रक्षा की जा सकती है।’’
           राष्ट्र और मातृभूमि की रक्षा के लिये सतत और गंभीर प्रयास करने होते हैं। अपने नागरिकों को ज्ञान और विज्ञान से परिपूर्ण करना होता है। उनका नेतृत्त करने वालों को न केवल शारीरिक रूप से सक्षम होना चाहिए बल्कि उनमें साहस भी होना चाहिए। समाज के नागरिक वर्ग के लोग आर्थिक रूप से उत्पादक, भेदभाव से रहित तथा सत्यमार्गी होना चाहिए। हम देख रहे हैं कि अभी तक विकसित कहलाने वाले पश्चिमी राष्ट्र अब लड़खड़ाने लगे हैं क्योंकि उनके यहां अनुत्पादक नागरिकों का वर्ग बढ़ रहा है। इसके विपरीत हमारे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है पर जिस तरह हमने पश्चिमी के विचारों को स्थान दिया है उसके चलते हमारे यहां भी अनुत्पादक नागरिक वर्ग बढ़ने की संभावना हो सकती है। कहने का अभिप्राय यह है कि राष्ट्र या मातृभूमि की रक्षा का नारा लगाना अलग बात है पर उसके लिये सतत और गंभीर प्रयास करते रहना अलग बात है और इस बात को समझना चाहिए।
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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सज्जन और दुर्जन-हिन्दी कविता (sajjan aur durjjan-hindi kavita)


सुना है रईस भी
कन्या के भ्रूण की हत्या कराते हैं,
दूसरे के आगे सिर झुकाने से
वह भी शर्माते हैं,
फिर गरीबों की क्या कहें,
जो हर पल कुचले जाने का दर्द सहें,
जिनका कत्ल हो गया
उनकी लाश होती गवाह
ज़माने में उसके कातिल दिखते है,
मगर गर्भ के भ्रूण की शिकायत भला कहां लिखते हैं,
पूरा समाज पहने बैठा है नकाब
कौन दुर्जन
कौन सज्जन
सभी चेहरे खूबसरत हैं
पूरे ज़माने को पहचान के संकट में पाते हैं।’’
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कुछ समझें कुछ समझायें-हिन्दी व्यंग्य लेख (samjha ka fer-hindi vyangya lekh)


               इस संसार में मनुष्य समुदाय में यह भ्रम सदैव रहता है कि वह एक दूसरे को समझा सकते हैं। कोई व्यक्ति निरंतर गलतियां करता है, दुर्व्यवहार करता है या फिर व्यसनों में अपना जीवन नष्ट करता है। लोग उसे समझाते हैं कि ‘यह मत करो’ वह ‘मत करो’।
            कोई अपनी बात को लेकर जिद पर अड़ा है कि वह जो काम कर रहा है तो करता रहेगा। लोग समझाते हैं कि ‘मत करो, ‘मत करो’ पर वह मानता नहीं।
            जिसे दूध में मिलावट करना है उसे चाहे लोग उपदेश दो वह बाज नहीं आयेगा। जिससे बेईमानी और चोरी करने की आदत है वह कभी सुधरेगा यह संभव नहीं है। मगर लोग एक दूसरे को समझाते हैं पर कोई किसी की नहंी समझता। यह समझाने की प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है पर परिणाम शून्य बटा शून्य!
यह समझाने की प्रक्रिया एकतरफा है क्योंकि दूसरी तरफ समझने का काम नहीं होता दिखता। यहां हर जगह समझाने वाले मिल जायेंगे पर समझने वाला कहीं नहीं मिलेगा।
         पिता ने पुत्री से कहा-‘‘देखो जिस लड़के के साथ तुम दोस्ती बढ़ा रही हो वह ठीक नहीं है। तुम मेरी बात समझो वरना बाद में पछताओगी।’’
         पुत्री बोली-‘‘पापा, आपको गलतफहमी है। वह अच्छा लड़का है। कोई आपको भड़का रहा है। आप मेरी बात समझिये। वह हाथ आ गया तो बिना दहेज के मेरी शादी हो जायेगी। वैसे भी आपकी दहेज देने की हैसियत नहीं है।’’
          पिता चुप हो गये। बाद में बेटी की मां ने अपने पति से कहा-‘आप इतने प्यार से उसे मत समझाईये। थोड़ा गुस्सा दिखाईये। तभी उसे समझ में आयेगा।’
          पति ने कहा-‘भला, तुम कभी गुस्से से से मेरी बात समझी हो जो तुम्हारी लाडली समझेगी।’
          पत्नी भी तुनक कर बोली-‘तुम भी भला कहां समझते हो? तुम रोज सिगरेट पीते हो, और मौका मिल जाये तो शराब पीते हो। समझदानी की नाम तो तुम्हारे खानदान में किसी के पास नहीं है। मेरी लाड़ली है तो क्या? खून तो तुम्हारे खानदान का ही है।’
          समझदारी पर बहस सभी जगह जारी है। समझाने में सब होशियार पर समझने में सब पैदल!
         मां अपने बेटे को समझा रही है कि ‘बेटे, तुम जिस लड़की से नैन मटका कर रहे हो उसका चरित्र ठीक नहीं है। ऐसा तुम्हारे दोस्तों ने ही मुझे बताया। तुम मेरी बात समझो और उससे किनारा कर लो।’’
          बेटा बोला-‘मां तुम तो पुराने जमाने की हो नये समय की बात नहीं समझोगी।’
          ढोल साहब ने पोल साहब से कहा-‘यार, सारा दिन कार में बैठकर मत घूमा करो। इससे मोटापा और उससे होने वाले हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, और मधुमेह तथा वायु विकार जैसे रोग बढ़ जायेंगे।’
          पोल साहब ने कहा-‘तुम भी इतना पैदल मत घूमा करो। सड़क पर धूल बहुत उड़ती है। तुम्हें दमा, खांसी, आंखों में जलन तथा दूसरी बीमारियां हो जायेंगी जो पैदल चलने से होती हैं।
             समझाना आत्म मुग्धता की स्थिति है और समझने की प्रक्रिया के लिये गुजरने के लिये आत्म मंथन की कक्षा में जाना पड़ता है जिसमें छात्र की तरह कोई प्रवेश नहीं करना चाहता। इस संसार में सभी लोग मानते हैं कि वह विद्वान हैं और उनको मूर्खों को समझाने का अधिकार है। समझदार की स्वअर्जित यह पदवी सभी ने धारण कर ली है।
             यह मानवीय स्वभाव है, मगर सभी ऐसे नहीं होते। दरअसल जो दूसरों को नहीं समझाते वही समझदार हैं। ऐसे समझदार यह सोचते हैं कि ‘जब हम ही किसी की बात नहीं समझते तो भला दूसरा हमारी बात क्या समझेगा।’
          दूसरे को अपनी गलतियों के प्रति उसका ध्यान आकृष्ट करना अच्छी बात है पर इसके लिये जरूरी है कि वह पूछे भी उसे हल बताया जाये। बिना पूछे सलाह देने वाले बहुत हैं क्योंकि उसमें कोई पैसा खर्च नहीं होता। अलबत्ता आपने काम के समय अज्ञानतवाश उसे न कर पाने वाले लोग भी दूसरी से सलाह लेने से बचते हैं। डर लगता है कि कोई उनके अज्ञान को परख न ले।
          दूसरी बात यह भी है कि लोग आंख और मुंह तो खुला रखते हैं पर कान खुला कोई नहीं रखता। सभी डरते हैं कि कहीं अगर वह खुला तो मुंह बंद हो जायेगा। अपनी भड़ास मन में रह जायेगी दूसरी की कान छेदकर हमारे अंदर आयेगी। लोगों की कोशिश यही रहती है कि अपनी बात बाहर जाये पर किसी की बात हमारे कान में न आये। लोग चीखते हैं, चिल्लाते हैं, कोई उनकी बात समझे इसके लिये हर कोई यत्नशील है पर समझना कोई नहीं चाहता।
         न हमारी कोई समझेगा न हम किसी की समझेंगे तो किया क्या जाये। एक ही तरीका है कि ‘मौन’ का मार्ग अपनायें। न बोलेंगे तो इसका अफसोस नहीं होगा कि किसी ने हमारी बात नहीं मानी। मौन का मतलब केवल मुंह बंद रखना ही नहीं है बल्कि समूची इंद्रियों  को निचेष्ठ करने से है। हां कान भी बंद कर लें ताकि कोई अपनी बात न समझाये। यही कारण है कि समझदार व्यक्ति मौन रहते हैं जो मौन रहते हैं उनको समझदार माना जाता है।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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जापान में सुनामी का कहर, भारत में विज्ञापन की सुनामी का पहर-हिन्दी लेख (japan mein sunami ka kahar aur bharat mein vigyapan ka pahar-hindi lekh


जापान में भूकंप के बाद समंदर अपनी मर्यादा छोड़कर सुनामी की लहरें ले आया जिससे वहां भारी तबाही हुई है। निश्चित रूप से यह खबर लोगों के लिये डरावनी है। इधर भारत में यह लग रहा है कि जापान की सुनामी पर समाचार और बहस प्रसारण में भारतीय चैनलों के लिये विज्ञापनों की सुनामी आ गयी। ऐसे खास अवसरों ं टीवी चैनल के दर्शक कुछ विस्तार से सुनना और जानना चाहते हैं और यह बात देश के प्रचार प्रबंधकों को पता है और वह पर्दे के सामने चिपके रहेंगे इसलिये उनके सामने विज्ञापन दिखाकर अपने प्रायोजकों को खुश करते हैं। मुश्किल यह है कि उनके पास प्रबंध कौशल केवल अपने विज्ञापनदाताओं करे खुश करने तक ही सीमित है कार्यक्रम के निर्माण और प्रस्तुति में नज़र नहीं आती। उनको समाचार और बहसों के बीच केवल अपने विज्ञापनों की फिक्र रहती है।
कभी कभी तो ऐसा लगता है कि विज्ञापनों की वजह से इतने सारे समाचार चैनल चल रहे हैं और उनका लक्ष्य विज्ञापन प्रसारित करना है और समाचार और बहस तो उनके लिये फालतु का विषय है। जो नये चैनल आ रहे हैं वह भी इसी उद्देश्य की पूर्ति में लग जाते हैं इसलिये वह पुराने चैनलों को परास्त नहीं कर पा रहे। सच बात तो यह है कि इन प्रबंधकों के पास पैसा कमाने के ढेर सारे तरीके होंगे पर प्रबंध कौशल नाम का नहीं है। प्रबंध कौशल से आशय है कि अपने व्यवसाय से संबंधित हर व्यक्ति को खुश करना और कम से कम भारतीय समाचार टीवी चैनलों के दर्शक उनसे खुश नहीं है। समाचारों और बहसों के बीच जिस तरह विज्ञापन जिस तरह दिखाये जा रहे हैं उससे तो यह बात साफ लगती है कि दर्शकों की परवाह उनको नहीं है। एक मिनट का समाचार पांच मिनट का विज्ञापन। यह भी चल जाये पर बहस बीच में भी यही हाल। चार विद्वान जुटा लिये और आधे घंटे की उनकी बहस में पांच मिनट का भी वार्तालाप नहीं होता।
कई बार तो यह हालत हो जाती है किसी विषय पर विद्वान अपनी एक मिनट की बात पांच मिनट के विज्ञापन के साथ दो बार पूरी करा करता है। ऐसा लगता है कि उधर जब सुनामी आ गयी तो भारत के टीवी चैनलों के प्रबंधक विज्ञापनों का प्रबंधन कर रहे होंगे क्योंकि उनको मालुम था कि उनके कर्मचारी विदेशी टीवी चैनलों की कतरनों से समाचार प्रसारित करने के साथ ही चार चार पांच लाईने बोलने वाले विद्वान भी जुटाकर कार्यक्रम ठीकठाक बना लेंगे। कौन हिन्दी दर्शक अंग्रेजी टीवी चैनल देखता है जो इस घटिया स्तर को समझ पायेगा।
ऐसा लगता है कि विश्व पटल पर भारत जो कर्थित आर्थिक विकास कर रहा है वहां यहां के आम लोगों के लिये महत्वहीन होता जा रहा है। भारत के आर्थिक ताकत होने पर यहां कौन यकीन कर सकता है जब यहां के आम आदमी की किसी को परवाह न हो। विकास कंपनियों के नाम पर शक्तिशाली लोगों के समूहों को रहा है। कलाकार, विद्वान, पूंजीपति, समाजसेवी और बाहुबली सभी जगह अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और यही प्रसिद्ध चेहरे कहीं न कहीं  कंपनियों के पीछे रहनुमा क तरह खड़े हैं। इतनी सारी कपंनियां और उनके विज्ञापन बार बार देखकर मन उकता जाता है। वही क्रिकेट, फिल्म और टीवी धारावाहिकों में सक्रिय चेहरे सतत सामने आते हैं तो लगता है कि टीवी बंद रखना ही श्रेयस्कर है। देश की कथित अमीरी अब बोरियत का कारण बन रही है।
जापान की सुनामी की चर्चा में कहीं  कुछ ऐसा सुनने को मिला जिसे याद रखने योग्य माना जाये। वहां भारी तबाही है। प्रकृति के प्रकोप से आई सुनामी के निशान मिट जायेंगे पर वहां जो परमाणु संयत्र पर विस्फोट हुआ है वह काफी चिंताजनक हैं। मर्यादा लांघकर आया समंदर लौट जायेगा पर मानवजनित उस परमाणु ऊर्जा से उपजा प्रकोप से निपटना आसान काम नहीं होगा। लोग बता रहे हैं कि जापान में आई सुनामी का भारत पर प्रभाव नहीं होगा पर अगर परमाणु संयंत्र से गैस का रिसाव हुआ तो वह समंदर के साथ ही विश्व की पूरी धरती पर विष घोल सकता है। समंदर में रेडिएशन घुल गया तो वह बरसात के माध्यम से कहां बरसेगा पता नहीं। विशेषज्ञ कहते हैं कि इस रिसाव से कोई खतरा नहीं पर हमारे हिसाब से उनको अभी अधिक अनुसंधान की आवश्यकता है। हमारा मानना तो यह है कि इस तरह के प्रकोप इसलिये हो रहे हैं कि अमेरिका और चीन सहित अनेक देशों ने ज़मीन और समंदर में ढेर सारे विस्फोट किये हैं।
ऐसे में एशिया के सबसे संपन्न जापान पर आया संकट यही संदेश दे रहा है कि प्रकृति से अधिक मानव स्वयं के लिये अधिक खतरनाक है। समंदर तो आज नहीं तो कल वापस अपनी जगह जायेगा पर परमाणु संयत्र से आया संकट आसानी से पीछा नहीं छोड़ेगा। जापान के लोगों ने 1942 में अपने दो शहरों हिरोशिमा और नागासकी पर अमेरिका के परमाणु बम गिरते देखें हैं और वह इसे जानते हैं। बहरहाल उनके यहां आयी सुनामी भारत के टीवी चैनलों के लिये भी सुनामी लायी है।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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