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भर्तृहरि नीति शतक-पैसा खत्म होने पर आदमी में जोश नहीं रहता (heat in money-hindi massege)


भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि 
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तानींद्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव।
अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः क्षपोन सोऽष्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।।

हिंदी में भावार्थ-मनुष्य की इंद्रिया नाम,बुद्धि तथा अन्य सभी गुण वही होते हैं पर धन की उष्मा से रहित हो जाने पर पुरुष क्षणमात्र में क्या रह जाता है? धन की महिमा विचित्र है।
वर्तमान सन्दर्भ  में संपादकीय व्याख्या- इस सृष्टि को परमात्मा ने बनाया है पर माया की भी अपनी लीला है जिस पर शायद किसी का भी बस नहीं है। माया या धन के पीछे सामान्य मनुष्य हमेशा पड़ा रहता है। चाहे कितना भी किसी के पास आध्यत्मिक ज्ञान या कोई दूसरा कौशल हो पर पंच तत्वों से बनी इस देह को पालने के लिये रोटी कपड़ा और मकान की आवश्यकता होती है। अब तो वैसे ही वस्तु विनिमय का समय नहीं रहा। सारा लेनदेन धन के रूप में ही होता है इसलिये साधु हो या गृहस्थ दोनों को ही धन तो चाहिये वरना किसी का काम नहीं चल सकता। हालांकि आदमी का गुणों की वजह से सम्मान होता है पर तब तक ही जब तक वह किसी से उसकी कीमत नहीं मांगता। वह सम्मान भी उसको तब तक ही मिलता है जब तक उसके पास अपनी रोजी रोटी होती है वरना अगर वह किसी से अपना पेट भरने के लिये धन भिक्षा या उधार के रूप में मांगे तो फिर वह समाप्त हो जाता है।
वैसे भी सामान्य लोग धनी आदमी का ही सम्मान करते है। कुछ धनी लोगों को यह भ्रम हो जाता है कि वह अपने गुणों की वजह से पुज रहे हैं। इसी चक्कर में कुछ लोग दान और धर्म का दिखावा भी करते हैं। अगर धनी आदमी हो तो उसकी कला,लेखन तथा आध्यात्मिक ज्ञान-भले ही वह केवल सुनाने के लिये हो-की प्रशंसा सभी करते हैं। मगर जैसे ही उनके पास से धन चला जाये उनका सम्मान खत्म होते होते क्षीण हो जाता है।

इसके बावजूद यह नहीं समझना चाहिये कि धन ही सभी कुछ है। अगर अपने पास धन अल्प मात्रा में है तो अपने अंदर कुंठा नहीं पालना चाहिये। बस मन में शांति होना चाहिये। दूसरे लोगों का समाज में सम्मान देखकर अपने अंदर कोई कुंठा नहीं पालना चाहिये। यह स्वीकार करना चाहिये कि यह धन की महिमा है कि दूसरे को सम्मान मिल रहा है उसके गुणों के कारण नहीं। इसलिये अपने गुणों का संरक्षण करना चाहिये। वैसे यह सच है कि धन का कोई महत्व नहीं है पर वह इंसान में आत्मविश्वास बनाये रखने वाला एक बहुत बड़ा स्त्रोत है। सच
 तो यह है कि खेलती माया है हम सोचते हैं कि हम खेल रहे हैं।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

ब्लोग लेखक और लेखक ब्लोगर


ब्लोगरों के वर्गीकरण को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं. इसका वैसे कोई आधिकारिक वर्गीकरण नहीं हुआ है, पर निरंतर चिट्ठों का अध्ययन करते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पहुचा हूँ कि इसके दो वर्गीकरण हैं. -१. ब्लोग लेखक २.लेखक ब्लोग (writer cum blogar)

१.ब्लोग लेखक-इससे आशय यह है कि जिन लोगों ने कंप्यूटर के साथ इंटरनेट कनेक्शन लिया है और कुछ रचना कर्म के साथ संबध बढाने और उसे निभाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. उन्होने ब्लोग बना लिया है इसलिए लिख रहे हैं और लिखने की विधा में पारंगत भी हो रहे हैं.
२. लेखक (ब्लोग)- यह ऐसे लोग हैं जो कहीं भी लिखने के लिए प्रतिबद्ध हैं. उन्हें अपने लिखने से मतलब है और ऐसे लोग को मित्र मिल जाये तो उनके लिए बोनस की तरह होता है. लिखना उनके लिए नशा है. वह पत्र-पत्रिकाओं में लिखते हैं और ब्लोग इसलिए बनाया है क्योंकि उस पर लिखना है. मैंने ब्लोग इसलिए बनाया क्योंकि मैं लिखना चाहता था, पर इसमें इतने सारे मित्र मिलेंगे यह सोचा नहीं था. मैं अनेक पत्र-पत्रिकाओं में छप चुका हूँ पर इस ब्लोग विधा ने मुझे ब्लोगर बना दिया.

वैसे दिलचस्प बात यह है कि ब्लोग बनाने वालों ने इन्हें संदेशों के आदान-प्रदान करने के लिए बनाया था, पर जैसा कि हमारे भारत के लोग हैं कि विदेश से अविष्कृत चीज को अपने हिसाब से इस्तेमाल करते हैं. वैसा ही कुछ लेखक इसे अपने लिखने के लिए इस्तेमाल करते हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि इधर कुछ गजब के लोग ब्लोग लिख रहे हैं. वैसे ब्लोग मैं पिछले डेढ़ वर्षों से देख रहा हूँ और मेरा मानना है कि इसमें बहुत अच्छे लेखक आ गए हैं. मैं जब अभिव्यक्ति पत्रिका पढता था तब यह उस पर लिंकित नारद चौपाल के ब्लोग भी देखता था और उस समय मुझे इनकी विषय सामग्री इतनी प्रभावित नहीं करती थी-क्योंकि इसमें साहित्य जैसी विषय वस्तु अधिक नहीं दिखती थी-इसलिए कोई ऐसा विचार नहीं आता था. वह तो एक दिन एक ऐसे ब्लोग पर नजर पड़ गयी और उसमें एक संवेदनशील विषय पर लिखी पोस्ट ने मुझे प्रभावित किया और तब मुझे लगा कि यह तो अपनी पत्रिका की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक रोचक विषय है. इसमें कई मित्र मिलना मेरे जैसे लेखक के लिए बोनस है. जो इस पर कमेन्ट देते हैं और या मैं जिन्हें देता हूँ उनके लिए मेरे मन में मैत्री भाव रहता है. इसका मतलब यह नहीं है कि सभी लोग हर पोस्ट कमेन्ट दें या मैं उन्हें दूं- क्योंकि इन फोरम पर कोई हमेशा बना नही रहता. लिखना एक तरह से आपस में मैत्री भाव बढाने का तरीका है. अधिकतर कमेन्ट विभिन्न फोरमों से आती है क्योंकि ब्लोगर कमेन्ट लगाना जानते हैं. आप ताज्जुब करेंगे कि मेरे निजी मित्र जो मेरे ब्लोग पढ़ते हैं उन्हें अभी तक यह समझ में नहीं आया कि कमेन्ट कैसे देते हैं? मैं उनको कमेन्ट देने के लिए अधिक प्रेरित भी नहीं करता. मेरी पोस्ट पर कमेन्ट देने वाले अनेक ब्लोगरों को उनको नाम याद हैं. अभी मैंने एक अपने मित्र को गूगल का इंडिक ट्रांसलेट टूल इस्तेमाल करना बताया तो वह हैरान हो गया. अभी इस विधा के बारे अधिक लोगों को पता नहीं है और जैसे-जैसे इसका प्रचार बढेगा अधिक से अधिक लेखक इसमें आयेंगे.

इन ब्लोग के साथ अभी समस्या यह है कि लंबी चौडी पोस्ट लिखने का समय नहीं आया, पर आगे चलकर यह समय भी आयेगा पर वह तभी संभव हो सकता है कि लेखक को यकीन हो जाये कि उसे पढ़ने वाले बहुत हैं. मुझे ब्लोग बनाये हुए एक वर्ष हो गया पर फोरम पर आये आठ महीने हुए हैं. यह आश्चर्य की बात है कि जिन पोस्टों को फोरम पर दस लोग भी नहीं पड़ते वह महीनों तक अन्य पाठकों द्वारा पढी जातीं हैं. चाणक्य, कौटिल्य, रहीम और कबीर से संबंधित विषय सामग्री पर निरंतर पाठक आते हैं. लोगों की दिलचस्पी को देखते मुझे इन पर लिखने में मजा आता है क्योंकि इससे मुझे ‘स्वाध्याय”का अवसर मिलता है-जो कि किसी लेखक के लिए एक अनिवार्य बौद्धिक व्यायाम है.

लेखक स्वांत सुखाय भाव के होते हैं पर इसका मतलब यह नहीं होता की उनका समाज से सरोकार नहीं होता. देखा जाये तो असली लेखक वही है जो सामाजिक सरोकारों से संबंधित विषयों पर लिखे. ब्लोग की विधा को ऐसे लोग बहुत लंबे समय तक जिंदा रख सकते हैं, पर अभी यह तय नहीं है इसका आगे क्या स्वरूप होगा-यह आने वाले समय पता लग जायेगा. इतना तय है कि प्रतिदिन तीन सौ से अधिक पाठक मेरे ब्लोग पर आते हैं उससे यह लगता है इसमें लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है.

इस ब्लोग की पाठक संख्या १० हजार हुई


दीपकबापू कहिन के बाद मेरा यह दूसरा ब्लोग है जिसने पाठक/व्युज की संख्या दस हजार पर कर ली. अंतर्जाल पर जब मैंने लिखना शुरू किया था तब मुझे इतना समर्थन मिलने की आशा नहीं थी पर यह हिन्दी प्रेमी ब्लोग लेखकों और पाठकों ने जो सहयोग दिया उसके लिए मैं उनका आभारी हूँ.

जहाँ दीपक बापू कहिन को आरंभ करते समय ब्लोग के बारे में कुछ नहीं जानता वहीं इसको इस आशा से शुरू किया कि इस पर मैं केवल व्यंग्य रचनाओं को प्रस्तुत करूंगा. हालांकि बाद में हर विधा के लिए इसका प्रयोग किया. इस ब्लोग को मैंने इसलिए बनाया कि मुझे दीपक बापू कहिन के बाद इस पर रचनाएं पोस्ट करनी थी. उस समय न यह पता था कि आगे मुझे कुछ फोरम पर जाना है और न यह पता था कि और लोग मेरे ब्लोग को अपने यहाँ दिखाएँगे. बीच में मैंने ब्लागस्पाट के ब्लोग नारद पर पंजीकृत कराने किए लिए वर्ड प्रेस के इस ब्लोग को हटा लिया था पर इसे कुछ प्रशंसक अलग ही थे, जो इसे अपने यहाँ लिंक किये रहे. मजे की बात यह रही कि ब्लोग्वानी, चिट्ठाजगत और हिन्दी ब्लोग काम मेरे कराये बिना ही इसका पंजीकरण हो गया था और यह बात मुझे बाद में पता चली.

इस ब्लोग पर श्री शास्त्री जे.सी.फिलिप की सबसे अधिक कृपा दृष्टि रही है और साथ ही परमजीत बाली, ममता श्रीवास्तव, रविन्द्र प्रभात, उन्मुक्त जी, रवि रतलामी जी तथा संजय बेंगानी के साथ-साथ अन्य अनेक ब्लोग लेखकों और पाठकों का इस पर सहयोग और समर्थन मिला. मैं इसकी सूचना आत्मप्रवंचना के लिए नहीं दे रहा बल्कि सभी को यह बताने के लिए दे रहा हूँ कि ब्लोग लेखन इस देश में आन्दोलन बनेगा. इस समय देश के बुद्धिजीवी वर्ग में हताशा का माहौल है. अभी तक वह विभिन्न विचारधाराओं में नहाकर मन को शांत कर लेते थे. अब छद्म विचार पर्वतों से कृत्रिम सिद्धांतों की वैतरिणी में बहती इन विचारधाराओं कि असलियत खुल गयी है और अब सब प्रकार के बुद्धिजीवी हताश हैं. उन्हें लगता था कि उनको विचारधारा पर चलने के लिए प्रेरित करने वाले लोग जब अपना काम निकाल लेते हैं उन फिर उन्हें पूछते नहीं है. इतना ही नहीं उनका काम उस विचारधारा के विपरीत होता है जिसको वह अपनी पूजा मानते हैं.

अपनी बात कहने और लिखने के लिए ब्लोग एक सबसे अच्छा जरिया है और आगे वही बुद्धिजीवी होने का गौरव पाएंगे जिनके पास अपना एक ब्लोग होगा. इसमें समय लगा सकता था क्योंकि लोग अभी इस बारे में अधिक नहीं जानते और जब जानेंगे तो फिर इस पर लिखे बिना उनका मन नहीं भरेगा. मेरी इच्छा है कि लोग अधिक से अधिक इस विधा से जुड़ें. मैं पुन: आभारी हूँ उन लोगों का जिन्होंने इस ब्लोग को अपना सतत समर्थन दिया.

दीपक बापू कहिन की पाठक संख्या दस हजार तक पहुचने पर लिखे गए लेख की पुन: प्रस्तुति

आज दीपकबापू कहिन ने १० हजार पाठकों का आंकडा पार कर लिया है. मेरे द्वारा बनाया जब यह ब्लोग बनाया गया था तब मुझे यह मालुम भी नहीं था की मैं बना क्या रहा हूँ?कमेन्ट क्या होती हैं. इसका पता इतना लंबा है तो केवल इसीलिए के जब उसे लिख रहा तो इस बात का ज्ञान भी नहीं था कि इसे हमेशा लिखना होगा. इसे कोई अन्य कैसे पढेगा इसका ज्ञान भी नहीं था. यू.टी.ऍफ़-८ ई फाइल में देव-१० फॉण्ट में लिखता था. हिन्दी श्रेणी भी नही रखा पाया था इसलिए डैशबोर्ड पर भी नहीं दिखता था.

उस समय हमारे मित्र उन्मुक्त जी ने इसे देखा और बताया कि वह इसे पढ़ नहीं पा रहे थे. मुझे हंसी आयी. सोचा कोई होगा जो मुझे परेशान कर रहा है याह खुद कुछ जानता नहीं है और मुझे सीखा रहा है. उसी समय ब्लागस्पाट का एक ब्लोग भी बनाया था जिसे आज दीपक भारतदीप का चिंतन नाम से जाना जाता है. उसमें इस तरह अपनी घुसपैठ कर ली थी कि वह तो सादा हिन्दी फॉण्ट में भी काम करने लगा था.

उन्मुक्त जी ने दोनों की कापी मेरे पास भेज दी तो मैं दंग रह गया. उनकी दशा देखकर मुझे हैरानी हो रही थी. शहर के अन्य कंप्यूटरों पर देखा तो मुझे सही दिखाए दे रहे थे. ब्लोग बनने से जितना खुश था उतना ही अब परेशान हो रहा था. इसी परेशानी में गूगल का हिन्दी फॉण्ट मेरे हाथ आया. कैसे? यह मुझे याद नहीं. उसीसे लिखना शुरू किया और लिखता चला गया. हर नये प्रयोग के लिए नया ब्लोग खोलता था. एक नहीं आठ ब्लोग खोल लिए. इसी बीच नारद पर पंजीकरण का प्रयास किया, पर पंजीकरण करना आये तब तो हो. मेरे प्रयासों के उनको गुस्सा आया और बिन करने की धमकी दे डाली. आज जब काम करता हूँ और जो ब्लोग लिखने कि पूरी प्रकिया है उसे देखकर तो उनका गुस्सा सही लगता है. इसके बाद मैं चुप हो गया और लिखने लगा. तब एक दिन सर्व श्री सागर चंद नाहर, उन्मुक्त जी संजय बैगानी और पंकज बैगानी जी की कमेन्ट आयी कि आप तो बहुत लिख चुके हैं पर नारद पर आपका ब्लोग नहीं दिख रहा है आप पंजीकृत कराईये.

मैं उस समय सब करने को तैयार था सिवाय नारद पर पंजीकरण कराने के. क्योंकि अब कोई गलती वहाँ से मेरे को बिन करा सकती थी. मैं सिर पकड़ कर बैठ गया कि अब इस नारद से कैसे सुलझें. बहरहाल उसे दिन भाग्य था और पंजीकरण कैसे हो गया यह अब मुझे भी याद नहीं है. उसके बाद मेरा ब्लोग मैदान में आ गया. धीरे-धीर समझ में आने लगा कि वह सब लोग मेरे को अपने साथ जोड़ने के लिए इतनी मेहनत कर रहे थे. उन्मुक्त जी के प्रयास तो बहुत प्रशंसनीय हैं. मैं इन सब लोगों का आभारी हूँ.

अंतर्जाल लिख्नते समय मेरे पास कोई योजना नहीं थी. मेरे एक लेखक मित्र ने मुझे अभिव्यक्ति (अंतर्जाल की पत्रिका) का पता दिया था. वहाँ मुझे नारद दिखता था पर मैं उसे नहीं देखता था और जब देखा तो भी मुझे उसमें रूचि नही जागी-इसका कारण यह भी था कि उसमें मुझे उस समय साहित्य जैसे विषय पर कुछ लिखा गया नहीं लगा. एक बार मेरी नजर ब्लागस्पाट पर एक हिन्दी ब्लोग पर पढ़ गई. मैंने उसे पढा तो आश्चर्य हुआ. उस विषय में मेरी दिलचस्पी बहुत थी और उस लेखक ने जो लिखा उससे मैं बहुत प्रभावित हुआ. उसने मुझे भी उसी तरह लिखने की प्रेरणा दी. अभिव्यक्ति को तो मैं अपनी रचनाएं भेज रहा था पर उस ब्लोग को मैं आज तक नहीं भूल पाया. उसकी विषय सामग्री मेरे दिमाग में आज तक है. मुझे उस लेखक का नाम याद नहीं है. मुझे उस समय अनुभव नहीं था उसके नीचे कमेंट देखता तो शायद कुछ याद रहता-उस समय कमेंट लगाने की बात तो मैं सोच भी नहीं सकता. हाँ, ऐसा लगता है कि उस ब्लोग अपनी इन चारों फोरम पर होना चाहिए. फुरसत में मैं इन फोरम पर उसका ब्लोग तलाशता हूँ. उसके बारे में कोई संकेत इसलिए नहीं दे सकता क्योंकि वह उस समय एक विवादास्पद विषय पर लिखा गया था पर उसकी स्पष्टवादिता ने मेरे मन को खुश कर दिया था. तब मुझे लगा कि इस ब्लोग विधा को मैं अपने सृजन को लोगों तक पहुचा सकता हूँ. उस ब्लोग लेखक ने जो व्यंग्य लिखा था वह कोई समाचार पत्र या पत्रिका शायद ही छापने का साहस कर सके और मुझे लगा कि यह विधा आगे आम आदमी को आपनी बात कहने के लिए बहुत योगदान देने वाली है. मैं उस अज्ञात ब्लोग लेखक को कभी नहीं भूल सकता.

श्रीश शर्मा -(ईसवामी) का नाम यहाँ लेना जरूरी है इसलिए लिख रहा हूँ. वह मेरे मित्र हैं और उनकी कोई सलाह मेरे काम नहीं आती या मैं उनके अनुसार चल नहीं पाता यह अलग बात है पर उस अज्ञात ब्लोग लेखक के बाद उनका नंबर भी याद रखने लायक है. जब मैंने अभिव्यक्ति पर नारद खोला तो उनका ब्लोग देखा(यह भी हो सकता है कोई उनका लेख हो) जिसमें उनका कंप्यूटर पर काम करते हुए फोटो था. मैं उस फोटो को देखने से पहले ब्लोग लिखने का फैसला कर चुका था और वहाँ इसलिए गया था कि आगे कैसे बढूँ. उनका लिखा मेरे समझ में नहीं आया पर तय कर चुका था कि इस राह पर चलना ही है और मैं यह नहीं जानता था कि उनसे मेरी मित्रता होने वाली है-उन्होने अभी मुझे गूगल ट्रांसलेटर टूल का पता भेजा और मैं कह सकता हूँ कि उनकी यह पहली सलाह है जो काम आ रही है इससे पहले उनका बताया काम तो नहीं आता पर इस इस रास्ते पर अनुभव बढ़ता जाता था.एक बात जो मुझे प्रभावित करती थी कि उन्होने कोई बात पूछने पर उसका उत्तर अवश्य सहज भाव से देते थे , मैंने बाद में श्री देवाशीष और श्री रविन्द्र श्रीवास्तव के लेख भी पढे और आगे बढ़ने का विचार दृढ़ होता गया. आज मैं जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो हँसता हूँ. शायद यह सब हँसेंगे कि यह क्या लिख रहा है पर मैं बता दूं कि उनका काम अभी ख़त्म नहीं हुआ है मुझ जैसे अभी कई होंगे जिनकी उन्हें मदद करनी होगी. इन सबका धन्यवाद ज्ञापित करते हुए आशा करूंगा कि यह लोग अपना सहयोग जारी रखेंगे.
आखिर में समीर लाल जी का धन्यवाद ज्ञापित करूंगा कि उन्होने मेरा होंसला बढाने में कोई कसर नहीं छोडी. चिट्ठा चर्चा में उन्होने दीपक बापू कहिन के लिए लिखा था कि यह ब्लोग नया अलख जगायेगा. उनको यह बताने के लिए ही मैं लिख रहा हूँ १० हजार पाठकों का आंकडा पर कर चुके इस ब्लोग की एक दिन में पाठक संख्या का सर्वोत्तम आंकडा १९१ है जो पिछले सप्ताह ही बना था. उसके बाद हैं १७७, १६६, १५२, और १४८ है. कल इसकी संख्या ९७ थी.

यह केवल जानकारी भर है और मैं अपने मित्रो और पाठकों को इस बात के लिए प्रशंसा करता हूँ कि उनकी जो पढ़ने में रुचियाँ हैं उनसे अंतर्जाल पर अच्छा लिखने वालों की संख्या बढेगी. लोग अच्छा पढ़ना चाहते हैं अगर लिखा जाये तो. मैं आगे भी लिखता रहूंग इस विश्वास के साथ कि आप भी मेरे को प्रेरित करते रहेंगे. मैं चारों फोरम-नारद, ब्लोग्वानी, चिट्ठाजगत और हिन्दी ब्लोग- के कर्णधारों का आभारी हूँ जो अपना सहयोग दे रहे हैं.

संत कबीर वाणी: बगुला हंस नहीं हो सकता


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चाल बकुल की चलत हैं, बहुरि कहावैं हंस

ते मुक्ता कैसे चुंगे, पडे काल के फंस

संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि जो लोग चाल तो बगुले की चलते हैं और अपने आपको हंस कहलाते हैं, भला ज्ञान के मोती कैसे चुन सकते हैं? वह तो काल के फंदे में ही फंसे रह जायेंगे। जो छल-कपट में लगे रहते हैं और जिनका खान-पान और रहन-सहन सात्विक नहीं है वह भला साधू रूपी हंस कैसे हो सकते हैं।