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हिंदी दिवस पर हास्य व्यंग्य लेख-हास्य कवि का हाल


        दीपक बापू ने जब सुबह देखा कि आज 14 सितंबर हिन्दी दिवस है तब एक नये सफेद कपड़े-धोती, कुर्ता और टोपी-पहनकर घर से बाहर निकले। जेब में एक लघु साहित्यक पत्रिका  में अपनी रचनायें प्रकाशित करने के लिये अपनी दो कवितायें जेब में डालीं और चौड़ी सड़क पर फुटपाथ अपने पांव बढ़ाने लगे।  मन ही मन सोच रहे थे कि चलो बड़ी पत्रिकाओं में छप नहीं सकते क्यों न एक लघु साहित्यक पत्रिका को अपनी कविताओं का दान कर हिन्दी दिवस मनायें।  वहां का संपादक छापे या नहीं उसकी मर्जी, अपना तो कर्तव्य करना ही चाहिये।

        वह मस्ती से फुटपाथ पर चले जा रहे थे। रास्ते में एक काईयों का सभागार पड़ता था। उन्होंने तय किया था कि उसकी तरफ देखेंगे भी नहीं। जब उस काईयां सभागार का दरवाजा आया तो उन्होंने अपना मुंह फेर लिया-अपनी नाकामी का सबसे यही श्रेष्ठ तरीका भी है कि जो पंसद न हो उसकी उपेक्षा कर दो।  अचानक अंदर से आवाज आई-‘‘ओए, फ्लाप कवि! तू यहां कैसे आ गया?

                        दीपक बापू को काटो तो खून नहीं। उन्होंने अपना मुंह गेट की तरफ किया तो देखा आलोचक महाराज खड़े थे।  एक दम सफेद चिकना चूड़ीदार पायजामा और कुर्ता पहने थे। गले में सोने की चेन और मुंह में पान था।  दीपक बापू हैरान रह गये। एक तो काईयों के  सभागार से चिढ़ तिस पर पुराने बैरी का मिलना उनके लिये हिन्दी दिवस के अवसर भारी अपशकुन जैसा था।

                        उन्होंने आलोचक महाराज से कहा-‘‘महाराज, हम यहां आ नहीं रहे। गुजर कर जा रहे हैं। आप यहां कैसे?

                        आलोचक महाराज ने पास जाकर एक जगह पान की पीक को थूका और फिर वापस आकर बोले-दिख नहीं रहा। यह इतना बड़ा बैनर टंगा है हिन्दी दिवस पर महासम्मेलन  अब यह बताओ इस शहर में हमारे बिना कोई हिन्दी का कार्यक्रम हो सकता है। कोई वरिष्ठ लेखक या कवि ऐसा नहंी है जो हमारे बिना यहां किसी बड़े अखबार में अपना कविता छोड़िये क्षणिका  तक छपवा सके। फिर यह कैसे संभव है कि हिन्दी दिवस पर कोई हमारे बिना कार्यक्रम हो जाये।’’

                        दीपक बापू बोले-‘‘आपका कहना सही है। आपकी कृपा नहीं हुई तो हम यहां फ्लाप कवि माने जाते हैं।  बहुत प्रयास किया कि आप हमारी कवितायें को बड़े पत्र पत्रिकाओं में  प्रकाशित करने के लिये सिफारिश करें।  कितनी बार चाय पिलाई, पान खिलाया और कितनी बार तो ठंडा पेय भी आपकी सेवा में प्रस्तुत किया। छोटे मोटे पत्र और पत्रिकाओं में छपवाने के अलावा कोई अन्य सहायता नहीं दी।  बड़े प्रकाशन तो हमसे मुंहफेरे ही रहे।

                        आलोचक महाराज बोले-सस्ती सेवा की वैसा ही मेवा मिला।  अगर दारु, मांस तथा खाने का इंतजाम किया होता तो तुम्हें कवि बना देते। अभी तुमने कहा कि तुम फ्लॉप कवि हो। किसी दूसरे से न कहना। हमारी रचनत्मक दृष्टि से तुम तो कवि ही नहीं हो।’’

                        दीपक बापू बोले-‘‘महाराज आप हिन्दी के बहुत बड़े ठेकेदार हैं। चलिये मान लेते हैं! वैसे आपका एक चेला आपको बदनाम कर रहा है कि आपने उसकी अनेक कवितायें चुराकर अपने नाम से छपवाईं।  उस दिन मिला था। हमने  उसे समझाया कि पानी में रहकर मगर से बैर नहीं किया जाता।

                        आलोचक महाराज आंखें फाड़कर गुस्से में बोले-‘‘अच्छा! तू हमें ठेकदार और मगर बोलकर एक ही पंक्ति में दो झटके दे रहा है।  समझ ले आज से हमने तुझे बैन कर दिया। अब तो तू छोटे पत्र पत्रिकाओं में  भीअपनी कवितायें नहीं छपवा सकता। वैसे तू जा कहां रहा है?

                        दीपक बापू बोले-‘‘में अमुक त्रैमासिक के लिये दो कवितायें लेकर  जा रहा हूं।

                      आलोचक महाराज बोले-‘‘यहा कौनसी पत्रिका है। जरा पता देना! देखता हूं कैसे छापता है?’’

                        दीपक बापू ने जेब से दो कविताओं के साथ बीस का नोट निकाला और बोले-‘‘महाराज, आप नहीं रोक पायेंगे। देखों यह चाय के लिये बीस का नोट भी साथ ले जा रहा हूं।’’

                        आलोचक महाराज-‘‘अमुक पत्रिका का संपादक इतना सस्ता है? मैं उसकी खबर लेता हूं। इतने सस्ते में कवितायें छापेगा तो क्या खाक इज्जत कमायेंगा,’’

                        दीपक बापू बोले-‘‘नहीं महाराज! उस पत्रिका के बाहर एक होटल वाला है। उसके यहां दो चाय पीऊंगा। वह खुश होकर दोनो कवितायें छपवा देगा। एक चाय पी तो एक छपवायेगा।  इसलिये उसकी दुकान  दो तीन घंटे बैठना पड़ेगा। अच्छा, हम चलते हैं।’’

                        आलोचक महाराज बोले-‘‘सुनो! तुम बीस रुपये का खर्च क्यों करते हो? यहां कार्यक्रम में बैठकर हमारी संख्या बढ़ाओ। में तुम्हें आधा कप चाय भी पिलाऊगा और एक उबाऊ नाम की एक नयी पत्रिका है उसमें एक या दो नहीं बल्कि तीन कवितायें छपवा दूंगा।’’

                        दीपक बापू बोले-‘‘महाराज, हम अंदर आने को तैयार हैं मगर  आप हमसे मंच पर एक कविता सुनाने का मौका दें।’’

                        आलोचक महाराज बोले-‘‘यह संभव नहीं है! तुम निकल लो यहां से।  पता लगा कि तुम्हारी कविता कहीं लोगों को पंसद आ गयी और धोखे से कहीं तुम्हें महाकवि मान  बैठे तो मेरी साहित्यक दुकान ही बदं हो जायेगी। मेरे बहुत से मशहूर कवि चेले मुझसे नाराज हो जायेंगे। तुमने ही कहा था कि हम हिन्दी के ठेकेदार हैं। बरसों से यह काम कर रहे हैं। हम किसी ऐसे कवि या लेखक को पनपने का मौका नहीं दे सकते जो हमारे नियंत्रण से बाहर हो। तुम इसी तरह के आदमी हो।’’

                        दीपक बापू हंसकर बोले-‘‘ठीक है। चलता हूं।’’

                  आलोचक महाराज बोले-‘‘ऐसा करो। तुम दस श्रोंता ढूंढकर लाओ। मै तुम्हें एक क्षणिका सुनाने का अवसर दूंगा।’’

                        दीपक बापू बोले-‘‘महाराज, आपके पास श्रोताओं की क्या कमी है? हमं देख रहे हैं, उधर आठ दस लोग खड़े हैं।  अंदर दूसरे लोग  भी कार्यक्रम प्रांरभ होने की प्रतीक्षा कर रहे होंगे।’’

                        आलोचक महाराज बोले-‘‘इनमें कोई श्रोता या दर्शक नहीं है।  इनमें कुछ कवि, लेखक और संपादक हैं तो एक विशिष्ट माननीय अतिथि हैं। श्रोता और दर्शकों का इंतजार हो रहा है। तुम ऐसा करो किसी भीड़ एकत्रित करने वाले आदमी को जानते हो तो  उससे सौ पचास श्रोता और दर्शक किराये पर ले आओ। हम सभी के लिये एक एक बिस्किट और आधी कप चाय का भी इंतजाम करेंगे।  तुम अगर यह काम कर सको तो तुम्हारे लिये एक नहीं दो क्षणिकायें सुनाने के अवसर का इंतजाम कर दूंगा। पूरी कविता का समय किसी हालत में नहीं दे सकता।’’

                        दीपक बापू ने कुछ सोचा और बोले-‘‘अच्छा अभी आता हूं।’’

                       दीपक बापू सोच रहे थे कि उन्होंने जो निश्चय किया है वह शायद आलोचक महाराज नहीं जानते। यह उनकी गलतफहमी थी।  दोनों जानते थे कि उस दिन अब उनकी मुलाकात नहीं होने वाली  थी।

                        दीपक बापू थोड़ा आगे बढ़े तो फंदेबाज मिल गया।  दीपक बापू उसे देखते ही बोले-‘‘पता नहीं, आज हिन्दी दिवस पर किसका मुंह देखकर हम घर से निकले थे। पहले आलोचक महाराज मिले।  उनसे पीछा छुड़कार अभी सांस भी नहीं ली कि  अब तुम मिल गये। यह दोनों अपशकुन हुए हैं और अब मुझे दूसरे मार्ग से घर वापस जाना चाहिये।’’

                        फंदेबाज बोला-‘‘आपने मेरी तुलना आलोचक महाराज जैसे आदमी से की हिन्दी दिवस के दिन आपकी इस टिप्पणी पर मुझे बहुत दुःख है।  उसने आपकी रचनाओं को कई जगह छपने नहीं दिया और मैं आपकी हाथ से रची गयी अनेक हास्य कविताओं का जन्मदाता हूं।  क्या मुझे पता नहीं है आप सड़ी गली पत्रिकाओं में मेरा नाम लेकर हास्य कवितायें लिखते हो। मैं तो इज्जत से आपको फ्लाप कवि कहता हूं जबकि दूसरे लोग फूहड़ कवि कहते हैं।  अच्छा आप जा कहां रहें हैं़?’’

                        दीपक बापू बोले-‘‘अमुक पत्रिका के दफ्तर जा रहा हूं। वहां दो कवितायें देनी हैं।’’

                        फंदेबाज बोला-चलो मैं भी साथ चलता हूं। मैं अभी’’

                        दीपक बापू बोले-‘‘चलो! एक से भले दो। वैसे भी वहां होटल में मुझे दो चाय अकेले पीनी पड़ती। अब तुम  मेरे साथ एक चाय पी लेना तो दूसरी पीने की झंझट से मैं बच जाऊंगा। उस होटल वाले ने चाय पीने की संख्या के हिसाब से कवितायें छपवाने का वादा किया है।’’

                        फंदेबाज बोला-ःवह होटल वाला तो बंद है।  मैं भी उसकी दुकान पर चाय पीने गया था पर पता लगा कि आज उसके पास दूध नहीं आया तो बंद करके चला गया।’’

                        दीपक बापू बोले-‘‘यही होना था! मैंने पहले आलोचक महाराज और फिर तुम्हें देखा तो मुझे शक हो गया  था कि आज कुछ अच्छा नहीं होने वाला।  चलो दूसरे मार्ग से घर चलते हैं।  अब वहां चलकर तुम्हें चाय पिलाते हैं। तुमसे बातचीत में हो सकता है कि कोई ऐसी हास्य कविता हाथ लग जाये जो हमें राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध कर सके। उम्मीद पर आसमान टिका है और उसके नीचे खड़े हैं।  वह हम पर नहीं गिरेगा यह तय है।

                        दोनों वहां से चल पड़े।  दीपक बापू के हिन्दी दिवस की चिंदी चिंदी हो चुकी थी।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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बाज़ार में भूख का बिकना-हिंदी व्यंग्य कविता


भूखे को खाना वह बाटेंगे,

समाज सेवा के बहाने

कमीशन से अपनी मलाई काटेंगे।

कहें दीपक बापू

कुदरत का यही करिश्मा है

इंसानो का पेट कभी भर नहीं सकता

कोई तीन पहर खाता

किसी को एक पहर भी नसीब नहीं

मगर हुकुमतों के दावे होते हमेशा

इतनी रोटी लोगों को खिलायेंगे

भूख का नामोनिशान नहीं होगा

नहीं मिलेगा कोई भूखा

चाहे हम कितना भी छाटेंगे।

वह समय कभी न आया न आयेगा

कौन बहस करे

कर लेते हैं यकीन

आसमान की तरफ उछालकर 

अपनी थूक क्यों चाटेंगे।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप

ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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प्रचार का युद्ध होता है रविवार का दिन-हिन्दी लेख


       आधुनिक व्यापार और प्रचार जगत में रविवार एक तरह से व्यवसायिक वार बन गया है।  भले ही सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के साथ ही अधिकतर संगठित व्यवसायिक तथा औद्योगिक  क्षेत्रों में रविवार को अवकाश रहता है पर उपभोक्ता वस्तुओं के विक्रय केंद्रों में इस दिन लोगों की भारी  भीड़ रहती है।  इसके साथ ही प्रचार माध्यमों पर भी दर्शकों का तांता लगा रहता है। घर में रखे टीवी हों या बाज़ार के फिल्म दर्शन केंद्र दर्शकों का समूह उनके पर्दों को निहारता है।  यही कारण है कि शनिवार शाम से लेकर रविवार रात्रि तक अपने व्यवसायिक  हित साधनो वाले व्यवसायी अपने उत्पादों तथा गतिविधियों को आम लोगों की आंखों में चमकाने के लिये प्रचार माध्यमों में अपने विज्ञापन प्रस्तुत करने के लिये आतुर रहते हैं। आम लोगोें की आंखों तथा कान के माध्यम से वह उनके दिमाग में प्रवेश कर उसकी जेब ढीली करने का प्रयास करते हैं।

     हमने यह भी देखा है कि यह काम केवल प्रत्यक्ष व्यवसायी ही नहीं करते बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से आमलोगों की नज़रों में बने रखने के लिये ऐसे लोग भी करते हैं जिनका काम समाज सेवा करना है।  यह तो पता नहीं विदेशों में किस तरह इस रविवार का उपयोग प्रचार दिवस के रूप में होता है या नहीं पर भारत में इसका प्रयास अभी हाल ही में शुरु हुआ है।  राजनीतिक, आर्थिक, कला, पत्रकारिता तथा फिल्म के क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने रविवार को आत्म प्रचार के लिये जिस तरह रविवार का दिन चुनना शुरु किया है वह अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान उनके प्रबंधकर्ताओं के कौशल से प्रेरित हुआ लगता है।  अन्ना हजारे ने लंबे समय तक अनशन किया पर शुक्रवार शाम से रविवार शाम तक उनके प्रबंधक इस तरह विषयों का संचालन करते थे कि उनका आंदोलन पूरे दो दिन तक टीवी के पर्दे पर छाया रहता था।  अन्ना हजारे साहब के आंदोलन का परिणाम क्या हुआ, यह अलग से विचार का विषय है पर प्रचार में बने रहने के लिये उनसे जुड़े प्रबंधकों ने जो कार्यशैली अपनाई उसका अनुकरण अब राजनीतिक, आर्थिक, तथा कला से जुड़े लोग कर रहे हैं।  आज का रविवार तो अत्यंत दिलचस्प निकला। एक साथ तीन तीन बड़े राजनीतिक दलों ने क्रम से पर्दे पर अपने अपने शिखर पुरुषों को इस तरह बनाये रखा कि उनके प्रसारण में आपसी टकराव न हो भले ही दलीय रूप से उनमें प्रतिद्वंद्वता हो। इस दौरान एक टीवी उद्घोषक ने इस बार पर हैरानी जताई कि आज रविवार के दिन ही क्या योजनापूर्वक यह सब किया जा रहा है?

  हमें उसके इस मासूम प्रश्न पर हंसी आ गयी। अभी यह प्रयास अधिक दिख रहे हों पर ऐसा पहले हो चुका है।  हालांकि लोकप्रियता के आधार पर अपना काम करने वाले सभी क्षेत्रों के लोगों के ऐसे  प्रयास भी पश्चिम से प्रेरित है।  हमने यह देखा है कि पश्चिमी देशों ने अनेक ऐसी घटनाओं को शनिवार और रविवार के दिन इस तरह प्रस्तुत किया जिससे उनका प्रचार अधिक हो।   भारत में संभवतः अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद ही                                               

यह बड़ी शिद्दत के साथ शुरु हुआ। दरअसल जब अन्ना हजारे का आंदोलन थमता था तो प्रचार माध्यमों के प्रबंधकों के साथ समस्या आती थी कि इस तरह का कोई दूसरा घटनाक्रम कब आये जब उनके विज्ञापन का समय सहजता से लंबे समय तक बीत सके।  इधर यह भी देखने में आया कि कुछ संगठन अपने आंदोलनों का दिन भी शनिवार और रविवार को ही चुनते हैं। तय बात है कि जिन लोगों का स्वाभाविक कर्म ही प्रचार के सहारे हैं उन्हें भी यह प्रेरणा मिली होगी कि वह अपने घटनाक्रमों को शनिवार तथा रविवार के दिन योजनापूर्वक बनायें।  यह बुरा प्रयास नहीं है क्योंकि जागरुक लोगों को सामान्य दिनों में घर आकर टीवी खोलने से पहले आराम के दौर से निकलना पड़ता है।  अवकाश के दौरान वह निंरतर जुड़े रहते हैं जिससे उन्हें प्रभावित किया जा सकता है। 

      रविवार के दिन शिखर पुरुषों की तीन अलग अलग पत्रकार वार्ताओं के समय इस तरह चुने गये कि एक दूसरे के साथ टकरायें नहीं। देश में अभी लोकसभा चुनावों में एक वर्ष का समय है पर राजनीतिक वातावरण में गर्मी अभी से आ गयी है।  स्वाभाविक रूप से जिन लोगों को अगले चुनावों में सक्रिय भागीदारी करना है वह प्रचार में निरंतर बने रहने के लिये प्रयास करेंगे।  चुनाव लड़ना कोई सरल काम नहीं है।  अकेले पैसा खर्च कर भी चुनाव जीतना संभव नहीं है। इससे पहले आम लोगों में अपनी सक्रियता  दिखानी पड़ती है।  अपने आप को सभ्य तथा सतर्क व्यक्ति साबित करना होता है। यह काम प्रचार से ही संभव है। वह भी एक या दो दिन  बल्कि वर्ष दो वर्ष कभी तीन वर्ष भी इसमें लग सकते हैं।

          इधर हमने क्रिकेट मैचों में भी यह देखा है कि जब किसी प्रतियोगिता में बीसीसीआई की टीम तथा पाकिस्तान आमने सामने होते हैं तब दिन ऐसा ही चुना जाता है कि भारत में अवकाश हो।  यह माना जाता है बीसीसीआई की टीम तथा पाकिस्तान का मैच सबसे महंगा होता है।  अभी चैंपियन ट्राफी में दोनों का मैच शनिवार को हुआ।  इस मैच का महत्व एकदम खत्म हो चुका था। पाकिस्तान की टीम पहले ही अगले दौर से बाहर हो चुकी थी और बीसीसीआई की टीम सभी मैच जीतकर सेमीफायनल के लिये योग्यता प्राप्त कर चुकी थी।  टीवी चैनलों ने इसे महामुकाबला बताने का प्रयास भी नहीं किया।  इस पर बरसात के कारण टुकड़ो टुकड़ों में यह मैचा खेला गया।  मैच छोटा था बड़ा होता तो भी बीसीसीआई का दल ही  जीतता।  दरअसल पाकिस्तान की टीम जितने बुरे दौर में उतना ही आकर्षक रूप बीसीसीआई की टीम का है। बहरहाल मुकाबला आकर्षक नहीं था। खेल भी कोई आकर्षक नहीं हुआ।  जीत भी आकर्षक नहीं रही।  सच बात तो यह है कि पाकिस्तान की टीम का प्रदर्शन इस प्रतियोगिता में इतना निम्न स्तरीय रहा है कि बीसीसीआई की टीम अगर पाकिस्तान से हारती तो शक शुबहे में आ जाती।  वैसे इस प्रतियोगिता में जाने से पहले बीसीसीआई की टीम अत्यंत संदेहों के साथ लेकर गयी है जो निंरतर जीतों से दूर हो गया लगता है पर अगर पाकिस्तान से हारती तो फिर वहीं फिक्सिंग का भूत उसके सामने आ जाता। बहरहाल रविवार को व्यवसायिक वार बना दिया गया है तो उसे बुरा भी नहीं कहा जा सकता।

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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क्रिकेट मैच में फिक्सिंग-खेल अब देखने का मजा ही नहीं रहा


          क्रिकेट मैचों में फिक्सिंग का मामला का कोई नया नहीं है। अनेक बार बहुत सारे प्रकरण सामने आये पर हुआ कुछ नहीं।  यथावत सब चलता रहा।  कहने को बीसीसीआई और आईसीसीआई की भ्रष्टाचार विरोधी इकाईयां सक्रिय रहती हैं पर फिक्सिंग रुकने का नाम नहीं ले रही।  इस बार मामला थोड़ा अलग है।  अभी तक फिक्सिंग का मामले मैदान से मैदान में रह जाते थे।  मैदान से अगर उठे तो ड्रांइग रूमों तक ही गये।  कभी कोई संवैधानिक जांच एजेंसी सक्रिय रूप से मैच फिक्सिंग रोकने के लिये अवसर नहीं तलाश पायी। यही कारण है कि फिक्सिंग करने वालों को लगा कि वह तो वह श्वेत पर्दे के पीछे ही रहेंगे।  अगर कोई दाग उछला भी तो श्वेत पर्दे पर ही आयेगा।  कभी कोई खाकी वर्दी वाला उनके दरवाजे तक आयेगा इसका डर किसी को नहीं था।  यही कारण है कि काली नीयत और श्वेतवस्त्र धारी बेखौफ मैच फिक्सिंग में लग रहे।  यह  कहना तो कठिन है कि दिल्ली पुलिस की कार्यवाही से आगे मैच फिक्सिंग रुक जायेगी पर इतना तय है कि अब यह कार्य केवल शातिर लोगों के बस का रह जायेगा।  जिस तरह दूसरे अपराधों में हम देखते हैं कि सामान्य मनुष्य अपराधी नहीं करता क्योंकि उसे पुलिस का डर रहता है जबकि शातिर आदमी बैखौफ कर जाता है।

       यह उन तीन युवा खिलाड़ियों को अपना दुर्भाग्य ही मानना चाहिये कि बैखौफ चल रहे मैच फिक्सिंग जैसे अपराध में किसी संवैधानिक जांच एजेंसी के हस्तक्षेप का पहला शिकार बने।  इन तीनों ने पहले किसी खिलाड़ी को इस अपराध में जेल जाते नहीं देखा। किसी खाकी वाले को किसी क्रिकेट खिलाड़ी के घर की चौखट पर डंडा बजाते हुए नहीं सुना। इनकी मासूमियत में कभी खाकी का खौफ नहीं था वरन् श्वेतवस्त्रधारियों का संरक्षण उन्हें देवता के आशीर्वाद की तरह लगता रहा था।  मासूम हमने इसलिये कहा क्योंकि इन तीनों खिलाड़ियों के खाकी वस्त्रधारी सुरक्षाप्रहरियों के सामने बिना किसी प्रयास के सारे राज खोल दिये।  शातिर अपराधियों से पुलिस इतनी आसानी से अपराध नहीं उगलवा पाती।

    इन तीनों खिलाड़ियों की वजह से तनाव झेल रही उनकी टीम के खिलाड़ियों को इनकी गिरफ्तारी के बाद खेले गये मैच में हार का सामना करना पड़ा। अनुभवी लोग उसके खिलाड़ियों के खेल पर इनकी गिरफ्तारी का तनाव साफ देख सकते थे।  बहरहाल इतना तय है कि मैच फिक्सिंग अब इतना आसान नहीं रहने वाला। दूसरी बात यह कि संविधान की सरंक्षक संस्था पुलिस का इसमें हस्तक्षेप हो गया है वह रुकने वाला नहीं है।  इससे मासूम दिल वाले नये  क्रिकेट खिलाड़ी जरूर डरेंगे।

      पुराने क्रिकेट खिलाड़ियों ने पुलिस को स्टेडियम में अपनी रक्षा करते हुए देखा है। उनके लिये वह न तो दर्शक होते हैं न प्रशंसक बल्कि केवल सरकार के वेतन भोगी उनकी सेवा में रत रक्षक होते हैं।  यही भावना नये खिलाड़ियों में घर कर गयी है। जब से देश में आंतकवाद बढ़ा है तब से क्रिकेट मैचों की रक्षा के लिये स्थानीय पुलिस प्राणप्रण से जुट जाती है।  यह अलग बात है कि इन मैचों से पैसा कमाने वाले कुछ लोगों पर आतंकवादियों को भी पैसा देने का संदेह होता है।  विदेशों में बैठे कुछ कथित अपराधियों पर मैच फिक्सिंग यानि सट्टे से पैसा कमाने के साथ ही आतंकवादियों की मदद का भी आरोप की चर्चा अनेक  प्रचार माध्यमोें पर होता रहा है। सच क्या है? यह तो कभी सामने नहीं आया पर इतना तय है कि फिक्सिंग का खेल कोई कमजोर लोगों का काम नहीं रहने वाला है। 

    पहले भी अनेक प्रकरण आये पर कभी उन पर संवैधानिक जांच एजेंसी की वक्र दृष्टि नहीं गयी।  इस बार दिल्ली पुलिस दलबल के साथ मैच फिक्सिंग पकड़ने के लिये जुट गयी। स्थिति यह कि दिल्ली की पुलिस मुंबई से कथित आरोपियों को उठा लायी।  पहले कहा जाता था कि पुलिस की बजाय किसी दूसरी एजेंसी से जांच करायी जाये क्योंकि कोई पुलिस दूसरे राज्य जाकर जांच नहीं कर सकती।  कभी कभी क्रिकेट को नियंत्रित संस्थाओं से ही कहा जाता था कि तुम कुछ करो।  फिर कहा जाता था कि मैच फिक्सिंग रोकने का कोई कानून नहंी है।  इन्हीं बातों से नये लोगों मेें मैच फिक्सिंग करने की प्रवृत्ति बढ़ी हो तो आश्चर्य नहीं समझना चाहिये। दिल्ली पुलिस ने अपने पराक्रम से यह तो बता ही दिया कि यह सब बातें गलत थी।  सट्टेबाजी रोकने के लिये पुलिस के पास कानून है। ठगी रोकने का कानून है।  हालांकि अनेक राज्यों में स्थानीय पुलिस ने मैचों पर सट्टा लगवाने वाले पकड़े हैं पर खिलाड़ियों को पहली बार पकड़ा गया है।  दूसरी बात यह भी थी अभी तक पुलिस अन्य परंपरागत अपराधों से जुझती रही है।  उसे यह मानने में बहुत समय लगा है कि इस तरह मैच फिक्सिंग भी सट्टे जैसा अपराध है जिसमें वह बिना किसी उपरी आदेश के अपना पराक्रम दिखा सकती है।

     अब एक बार अगर इस मामले में दिल्ली पुलिस ने हस्तक्षेप किया है तो उसका प्रभाव  अन्य राज्यों और शहरों की पुलिस की मानसिकता पर भी पड़ेगा।  इसलिये वह अपने रक्षित क्रिकेट खिलाड़ियों पर वह कभी भी वक्र दृष्टि डाल सकती हैं।  अभी तक मामले की जांच चल रही है।  अनेक लोग कह रहे हैं कि इससे मैच फिक्सिंग रुकने वाली नहीं है।  जिस तरह चोर और डकैत पकड़े जाते है और छूटने पर  फिर  उनका काम जारी रहता है पर हमारा सोचना है कि क्रिकेट में ऐसा नहीं होगा।  क्रिकेट भद्रजनों का खेल है। अभी तक मैच फिक्सिंग भी एक भद्र अपराध बना हुआ था मगर पुलिस के हस्तक्षेप ने इसकी परिभाषा बदल दी है।  संभव है कि सटोरिये न माने और नये खिलाड़िायों को अपने मोहरे बनाने का क्रम बनाये रखें। एक दिक्कत उनको आयेगी वह यह कि उन्हें इसके लिये शाातिर और अपराधी दिमाग के खिलाड़ियों को चुनना पड़ेगा।  हर सामान्य क्रिकेट खिलाड़ी इसके लिये तैयार नही होगा।  दूसरी समस्या उन खिलाड़ियों के साथ भी आयेगी जो मैच फिक्सिंग करते हैंे पर पकड़े नहीं जाते।  उनके पास पैसा तो खूब होगा पर चैन की नींद नहीं सो पायेंगे। पुलिस का डर अच्छे खासे की नींद हराम कर देता है।  मैच फिक्सिंग भी नहीं छोड़ पायेंगे क्योंकि उनके आका सटोरिये ऐसा करने नहीं देंगे।

  कुछ विद्वान कह रहे हैं कि कुंऐ में भांग नहीं है बल्कि कुंआ ही भांग वाला है। बहरहाल अब क्रिकेट खिलाड़ियों की मैदान पर हर गतिविधि पर नज़र रखी जायेगी। पुलिस के अनुसार खिलाड़ियों ने सट्टेबाजों के अनुरूप गेंदबाजी करने से पूर्व तौलिया पैंट पर लटकाने, शर्ट को ऊपर नीचे करने तथा हाथ पर हाथ फेरने के संकेत देने की बातें कही थीं।  इससे होगा यह कि कोई किकेट खिलाड़ी अगर कहीं छींक देगा, कभी नाक रगड़ेगा या अपने ही बालों पर हाथ फेरेगा  तो लोग समझेंगे कि अपने आका सटोरिये को संदेश दे रहा है।  पहले फिक्सिंग के आरोपों के कारण हमने क्रिकेट देखना बंद कर दिया था पर अब यह देखने के लिये कभी देखेंगे कि खिलाड़ी कैसे कैसे संकेत बनाता है।  पहले  यह जानकार दुःख हुआ कि हमने फिक्स मैचों को सच समझा पर अब फिक्स मैंचों को देखकर व्यंग्य का आनंद लेंगे।  वैसे भी क्रिकेट मैचों को अब फिल्म की तरह दिखाया जाने लगा है।  ऐसा लगता है कि मैचों के परिणाम की पटकथा लिखी जाती है।  किसी की लिखी पटकथा आनंद उठाने में हर्ज ही क्या है?

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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दौलत के ढेर पर ज़माना-हिन्दी व्यंग्य कविता


सपने बेचने का व्यापार
बहुत सरल है
हल्दी लगे न फिटकरी
रंग चोखा आये।
जिदंगी के कड़वे सच से
उकताये ज़माने में
हर रोज  दिल बहलाने का
ख्याल पैदा कर
जेब बस यूं ही भरती जाये।
कहें दीपक बापू
दौलत के पहाड़ पर  चढ़े लोग
ज़माने के लिये बहुत फिक्रमंद दिखते हैं,
कलमकार कागज पर
उनकी मासूम अदाओं पर गीत लिखते हैं,
उगलती ज़मीन जो सोना
अब बंजर हो गयी
कदम कदम पर छाया दर्द और कड़वाहट
ऐसे में बहार लाने का सपनां
देखते देखते बाज़ार में
महंगे दाम में बिक जाये।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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