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किसान और ग्राहक तो घास हैं, उनसे कौन यारी करेगा-हिन्दी लेख


        किराना के खेरिज व्यापार में विदेशी निवेश पर चल रही बहस में कई बातें दिलचस्प हैं। यकीनन अगर हम उनको सुने तो अपनी बात प्रभावी ढंग से न रख सकते हैं न सोच सकते हैं। जहां तक हमारी इस विषय पर अपनी सोच यह है कि अभी तक इससे देश के लाभ या हानियों पर किये गये अनुमान उस रूप में प्रकट नहीं होंगे जिस तरह व्यक्त किये जा रहे हैं।
            हम लाभ हानियों से अलग हटकर एक बात जरूर मानते हैं कि इस देश की समस्याओं का हल अर्थशास्त्र के मूल सिद्धांतों के अनुरूप करने की बात तो यह कभी दिखाई नहीं दी। हम एक अर्थशास्त्री होने के नाते-अर्थशास्त्र हमारे अध्ययन के दौरान एक विषय रहा है इसलिये यह पदवी हमने स्वयंभू रूप से स्वयं धारण की है-मानते हैं कि अगर इस देश में राज्य प्रबंध अगर प्रत्येक गांव में स्वच्छ पानी, पक्की सड़क तथा बिजली की व्यवस्था कर ले तो इस देश में आर्थिक समस्यायें नगण्य रह जायेंगी। यह अलग बात है कि आज़ादी   के बाद इस पर भारी पैसा खर्च हुआ पर भ्रष्टाचार के कारण परिणाम शून्य ही रहा। गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, अशिक्षा तथा भुखमरी जैसी समस्यायें पूरी तरह से खत्म भले न हों पर वह गंभीर चिंता का विषय नहीं रहेगी। मूल बात कहें तो सरकार कल्याण के नाम पर दूसरे काम न भी करे तो चल जायेगा।
          यह कोई  अनिवार्य  शर्त नहीं हो सकती है कि गांव के विषय पर लिखने के लिये वहां पैदा होना जरूरी है। हम शहर में जन्मे हैं पर अनेक बार गांवों में जाने का अवसर मिला। उससे यह लगता है कि वहां मूलभूत सुविधाओं का पूर्णतः अभाव है। बरसात के दिनों में जब गांवों में सब्जी, गेंहु, चावल तथा दूध अधिक मात्रा में होता है तब वहां से उसे निकालकर शहर पहुंचाने के लिये कितनी मुश्किल होती है यह हमने स्वयं देखा है। उस समय अशुद्ध जल की वजह से बीमारी अपना रौद्र रूप दिखाती है तब यह गांव के मार्ग इस कदर नाले में बदल जाते हैं कि रात को किसी मरीज को गांव से बाहर पास के बड़े गांव या शहर ले जाना लगभग असंभव होता है। इसी कारण छोटी बीमारी में लोग वहां मर जाते हैं। गांव में अगर अस्पताल भी हो तो वहां चिकित्सक पहुंच नहीं सकता। वैसे सामान्य हालत में भी स्वास्थ्य कमी वहां पहुचंने से कतराते हैं। अगर आजादी के बाद हम देश के पूरे गांवों में शुद्ध जल, बिजली और पक्की सड़क जैसी सुविधायें नहीं पहुंच पाये तो यह संकट हमारी प्रबंध व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। शहरों के पास जो गांव हैं उनमें शायद ऐसा आधारभूत ढांचा मिल जाये पर जो दूर हैं उनकी समस्याओं पर कितना सोचा गया यह अलग से विचार का विषय है।
     विदेशी कंपनिंयां अगर भारत आ रही हैं तो वह कोई आधारभूत ढांचा नहीं बनायेंगी बल्कि उनका अपनी सुविधानुसार दोहन ही करेंगी। जहां आधारभूत ढांचा नहंी है वहां उनको उन्हीं बिचौलियों पर निर्भर रहना होगा जिनको हटाने की बात हो रही है। इधर हम सुन रहे हैं कि अमेरिका और यूरोप गंभीर रूप से आर्थिक संकट में हैं और अब वहां विकासशील देशों के निचले स्तर पर जाकर कमाने की बात हो रही है। हमने अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा को यह कहते हुए पढ़ा था कि हमें विदेशों में जाकर छोटे स्तर पर काम करना होगा। अमेरिका की विदेशमंत्राणी हेनरी क्लिंटन ने भी कहा था कि काम के बारे में भारतीयों से सीखना चाहिए।
          बहरहाल इस बहस में एक महत्वपूर्ण समाचार पर चर्चा किसी ने नहीं की कि अमेरिका ने पाकिस्तान के 28 सैनिकों को मार दिया जिससे दोनों देशों के बीच गंभीर तनाव है। पाकिस्तान ने अपना एक हवाई अड्डा अमेरिकी सेना से खाली करने को कहा है। इतना ही नही उसने संयुक्त राष्ट्र में भी यह मामला उठाया है। भारतीय प्रचार माध्यम इस पर खबर देकर चुप हो गये हैं। उनको शायद इसका अंदाजा नहीं है कि अंततः यह तनाव युद्ध में बदल सकता है। अगर पाकिस्तान अमेरिका के हाथ से निकल गया तो उसका राजनीतिक प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप से करीब करीब खत्म होने जैसा ही है। हमारा मानना है कि अमेरिका से अधिक मित्रता से अब कोई लाभ नहीं है। वह सामरिक रूप से शक्तिशाली है पर उसका आर्थिक ढांचा करीब करीब गड़बड़ाने लगा है। ऐसे में पाकिस्तान की राजनीतिक बगावत उसके सम्राज्य में आखिरी कील की तरह लग सकती है। देखा जाये तो पाकिस्तान अपने सहधर्मी देशों का एक तरह से प्रवेश द्वार है। भले ही वह एक सार्वभौमिक राष्ट्र की तरह दिखता है पर संक्रमण काल में उसकी सरकार की बैठक सऊदी अरब में होती है तो क्रमवार होने वाले क्रिकेट मैच दुबई या आबुधाबी में होते हैं। जिन दूसरे देशों की क्रिकेट टीमों का क्रम में पाकिस्तान का दौरा होता है वह दुबई या आबुधाबी में उसके साथ मैच खेलती हैं। ऐसे में पाकिस्तान के साथ अमेेरिका का तनाव मध्यएशियाई देशों तक विस्तृत हो सकता है। यह देश एक तरह से अमेरिका की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं।
         बहरहाल अब बड़े विषयों पर बड़े विद्वानों की चर्चा सुनकर ऐसा लगता है कि निरपेक्ष या स्वतंत्र प्रेक्षकों की बातें दमदार होती हैं पर महत्व केवल संगठित विद्वानों को ही दिया जा रहा है। अनेक स्वतंत्र विद्वानों ने किराना के खेरिज व्यापार में विदेशी निवेश पर अपनी राय बेबाकी रूप से रखी। वह इससे चिंतित नहीं है पर खुश भी नहीं है। जहां तक किसानों और उपभोक्ताओं के हित का प्रश्न है तो सवाल यह है कि इन दोनों रूपों में हर मनुष्य शोषित होता है और अगर उसे प्रसन्न रखने का प्रयास किया जाये तो पूरी दुनियां का व्यापार ही ठप्प हो जाये। वाल मार्ट आये या नहीं यह समस्या शोषितों के आपसी द्वंद्व का विषय है। यह अलग बात है कि समय के अनुसार बाज़ार और प्रचार के अनुसार समाज का स्वरूप बदलता रहता है और उसे रोकना कठिन है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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स्त्रियों के प्रति अपराध करने वालों के लिये क्रूर सजायें जरूरी-हिन्दी लेख (crural punishment must for crime against woman-hindi article)


                  ईरान में अपनी प्रेमिका के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करने वाले एक शख्स की आंखें फोड़ दी गयी हैं। ऐसा वहां की न्यायपालिका की सजा के आधार पर किया गया है। आमतौर से ईरान को एक सभ्य राष्ट्र माना जाता है और वहां ऐसी बर्बर सजा देना आम नहीं है। अलबत्ता कभी कभी धर्म आधार पर वहां ऐसे समाचार आते रहते हैं जिसमें सजायें दिल दहलाने वाली होती हैं। उनकी खूब आलोचना भी होती है। वहां की धर्म आधार व्यवस्था के अनुसार चोरी की सजा हाथ काटकर दी जाती है। इससे कुछ लोग सहमत नहीं होते। खासतौर से जब कोई बच्चा रोटी चुराते पकड़ा जाये और उसको ऐसी सजा देने की बात सामने आये तब यह कहना पड़ता है कि यह सजा बर्बर है। अपना पेट भरना हर किसी का धर्म है इसलिये धन चुराने और रोटी चुराने के अपराध में फर्क किया जाना चाहिए। मानवीय आधार पर कहें तो मजबूरीवश रोटी चुराना अपराध नहीं माना जा सकता।
अपनी प्रेमिका की आंखें फोड़ने वाले आशिक की आंखें फोड़ने की सजा को शायद कुछ लोग बर्बर मानेंगे पर सच बात यह है कि इसके अलावा अब कोई रास्ता दुनियां में नज़र नहीं आता। बात चाहे ईरान की हो या भारत की हम स्त्रियों के प्रति बढ़ते क्रूर अपराधों की अनदेखी नहीं कर सकते। अब यहां पर कुछ मानवाधिकारी विद्वान दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं। वह कहते हैं कि क्रूर सजा अपराध नहीं रोक सकती। अलबत्ता ऐसा दावा करने वाले फंासी जैसी सरल सजा पर ही सोचते हैं। फांसी से आदमी मर जाता है उसके बाद उसका कोई दर्द शेष नहीं रह जाता। हाथ काटना या आंख फोड़ना मनुष्य के लिये मौत से बदतर सजा है इस बात को पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित विद्वान नहीं जानते। कम से कम स्त्रियों के प्रति क्रूर अपराध रोकने के लिये ऐसी सजायें तो अपनानी होंगी।
                 हम एशियाई देशों में स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराधों को देखें तो ऐसी क्रूर सजाओं को अलावा कोई रास्ता नज़र नहीं आता। एशियाई देशों के अ्रग्रेजी संस्कृति समर्थक विद्वान अक्सर पश्चिमी और पूर्वीै समाज में अंतर नहीं करते। वह सोचते है कि जिस तरह वह पश्चिमी संस्कृति में ढले है वैसे ही पूरा एशियाई समाज भी हो गया है। हम शहरी भारतीय समाज को देखें तो यहां स्पष्टतः दो भागों में बंटा समाज है। एक तो वह जो पाश्चात्य ढंग का पहनावा अपनाने के साथ ही विचारधारा भी वैसी रखते हैं। दूसरा वह जो दिखता तो पश्चिमी सभ्यता से रंगा है पर उसकी मानसिकता ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली है। ऐसे नवपश्चात्यवादी उसी तरह ही खतरनाक हो रहे हैं जैसे कि नवधनाढ्य! हम ग्रामीण परिवेश में रहने वाले समाजों के लोगों की बात करें तो उनमें भी कुछ लोग नारियों के प्रति क्रूरता का व्यवहार करते हैं पर वह मारपीट तक ही सीमित होते हैं या हथियार से मारकर एक बार ही दर्द देने वाले होते हैं। जबकि नवपाश्चात्यवादी तेजाब फैंककर या बलात्कार ऐसी सजा स्त्री को देते हैं जो उसकी जिंदगी को मौत से बदतर बना देती हैं। पश्चिमी विचारधारा के विद्वान इस बात को नहीं देखते।
                    दूसरी यह भी बात है कि पाश्चात्य देशों की समशीतोष्ण जलवायु की बनिस्बत एशियाई देशों की ग्रीष्मोष्ण जलवायु के कारण हमारे यहां के लोगों के दिमाग भी अधिक गर्म रहते हैं। ऐसा नहंी है कि पाश्चात्य देशों में स्त्रियों के प्रति अपराध नहीं होते पर वहां तेजाब डालकर असुंदर या अंधा बनाने जैसी घटनाओं की जानकारी नहीं मिलती जबकि हमारे भारत में निरंतर ऐसी घटनायें हो रही हैं। हम स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराधों के कारणों पर नज़र डालें तो ऐसा लगता है कि अब कठोर सजाओं की नहीं बल्कि क्रूर सजाओं की आवश्यकता है।
             हमारे देश में कुछ ऐसे कारण हैं जो देश में महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ा रहे हैं।
           1.कन्या भ्रुण हत्याओं की वजह से लिंग संतुलन बिगड़ा है, जिससे विवाहों के लिये सही वर वधु का चुनाव कठिन होता जा रहा है। जिससे युवाओं को बड़ी उम्र तक अविवाहित रहना पड़ता है। लड़कियों की शादी में दहेज भी एक समस्या है।
           2.ग्रीष्मोष्ण जलवायु के कारण पश्चिम के समशीतोष्ण जलवायु में रहने वालो लोगों की बनिस्बत कामोतेजना यहां के लोगों में ज्यादा है।
           3.कानून का भय किसी को नहीं है। आजीवन कारावास से अपराधियों को कोई परेशानी नहंी है और फांसी मिल जाये तो एक बार में सारा दर्द खत्म हो जाता है। फांसी मिल भी जाये तो पहले तो बरसो लग जाते हैं और मिलने वाली हो तो मानवाधिकार कार्यकर्ता नायक बना देते हैं।
           4.हमारे मनोरंजन के साधन कामोतेजना के साथ ही पुरुष के अंदर पुरुषत्व का अहंकार बढ़ाने तथा नारी को उपभोग्या की मान्यता स्थापित करने वाले प्रकाशन और प्रसारण कर रहे हैं।
                कहने का अभिप्राय यह है कि जिस तरह कुछ नवपाश्चात्यवादी अपने आधुनिक होने के अहंकार तथा घर के बाहर की नारी को उपभोग की वस्तु मानकर चल रहे हैं उनके अंदर भय पैदा करने के लिये ऐसी क्रूर सजाऐं जरूरी हैं। यहां स्पष्ट कर दें कि पश्चिमी विद्वान यह दावा करते हैं कि कठोर सजाओं से अपराध नियंत्रित नहीं होते पर क्रूर सजाओं के बारे में उनकी राय साफ नहीं है हालांकि तब वह मानवाधिकारों की बात कर उसे विषय से भटका देते हैं।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

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क्रिकेट और मीडिया में व्यवसायिक पहुंच का अभाव-हिन्दी लेख (lack of profeshnal aproch-hindi lekh)


                      जब देश में केवल दूरदर्शन इकलौता ही दृष्य श्रवण का साधन था उस पर अनेक तरह के पक्षपात के आरोप लगते थे। उसके बाद जब निजी टीवी चैनलों का आगमन हुआ तो लोगों को लगा कि निष्पक्षता, रोचकता तथा समाचारों की विविधता से उनको अपनी चेतन इंद्रियों को अधिक सुविधाजनक स्थिति अनुभव होगी। उस समय बहुत कम लोगों ने इस बात का अनुमान किया था कि निजी टीवी चैनलों की व्यवसायिक मजबूरी उनको विज्ञापनों का ऐसा बंधक बना देंगी कि उनके प्रसारण दूरदर्शन से अधिक बोरियत का कारण बनेंगे।
                वर्ष 2011 की भारत में संपन्न विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता अब समाप्त हो गयी है पर देश के समाचार चैनल अभी उसमें देश की टीम की जीत की खुमारी को भुना रहे हैं जबकि दूरदर्शन उससे आगे बढ़कर नये समाचार तथा कार्यक्रम प्रसारण चला रहा है। क्रिकेट के अब दो भाग हैं एक तो खेल का दूसरा व्यापार का! निजी टीवी समाचार चैनल क्रिकेट के व्यापारिक पक्ष को इस कदर भुनाने में लगे हैं जैसे कि उनका समाचारों से मतलब न होकर केवल धनपतियों के उत्पादों के प्रचारक भर की है। यह सभी जानते हैं कि दुनियां की सभी टीमों के खिलाड़ी कहीं न कहीं धनपतियों से ही प्रायोजित होते हैं। कुछ पर तो सट्टे में लिप्त होने के आरोप लगे और प्रमाणित हुए। सीधी बात कहें तो यह कहना यकीनन गलत होगा कि सभी खिलाड़ी फिक्सर हैं पर यह मानना भी कठिन है कौन सट्टेबाजों से मिला है और कौन नहीं इसका पता लगाना कठिन है। वैसे भी अपने देश के अब तो कहा जाता है जब तक आदमी पकड़ा नहीं गया है तभी तक ही साहुकार है वरना तो यहां चोरों की जमात सभी जगह बैठी है।
                     खिलाड़ी जीते तो उनको इनाम मिलेंगे। उनकी एक बार जानकारी दे दी ठीक है पर निजी टीवी चैनल निरंतर लोगों को ब्रेकिंग न्यूज बनाकर दिखाये जा रहे हैं।
ब्रेकिंग न्यूज का मतलब ही शायद टीवी चैनलों के प्रसारक नहंी जानते। अब टीवी चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज 24 घंटे पुरानी खबर भी बनने लगी है। रात दस बजे खत्म हुए मैच की दोपहर तक ब्रेकिंग न्यूज चल रही है।
           ‘गंभीर ने सचिन को विश्व कप जीत समर्पित की।’
           ‘भारत ने श्रीलंका को हराकर विश्व कप जीता।’
            ‘मेन ऑफ दि मैच धोनी।’
           ‘देश भर में विजय का जश्न।’
          यह अव्यवसायिक रवैया है। लोगों ने मैच देखा और भूल गये। यह अलग बात है कि इसकी चर्चा लोग आपस में मित्रों और रिश्तेदारों के बीच में करेंगे पर यह व्यवसायिक चैनलों का काम नहीं है कि वह अपना बाकी काम छोड़कर केवल एक खबर पर मर मिटें। क्या इस समय देश में कोई अन्य गतिविधि नहीं है। कहीं चोरी और डकैती की घटनायें नहीं हो रही हैं। ऐसा लगता है कि धनपति तथा उनके प्रचारक भौंपू की तरह समाज की समस्त इंद्रियों का हरण कर अपने यहां बंधक बनाकर रखना चाहते हैं। इनके प्रचारक बता रहे हैं कि 121 करोड़ लोगों की आशा पूरी हुई है जबकि अगर आप बाज़ार में निकलें तो ऐसे बहुत से लोग मिल जायेंगे जिनका इस खबर में एक फीसदी भी रुचि नहीं है।
                 बहरहाल हमने कल वह मैच पूरा देखा। विराट कोहली, गौतम गंभीर तथा महेंद्रसिंह धोनी ने दिल खुश कर दिया। महेंद्रसिंह धोनी की 91 रन की पारी जानदार रही। ऐसी एतिहासिक पारियां कभी कभी देखने सुनने को मिलती हैं। सचिन की कोई ऐसी पारी नहीं है जो उसके समकक्ष रखी जा सके। प्रचार माध्यमों की तरह क्रिकेट में भी व्यवसायिकता का बोलबाला है। स्थिति भी वैसी है। जिस तरह प्रचार माध्यमों में कमाने वाले सभी व्यवसायिक पहुंच नहीं रखते वैसे ही क्रिकेट में भी ढेर सारा धनार्जन करने वाले खिलाड़ी अव्यवसायिक प्रवृत्ति के हैं। व्यवसायिक प्रवृत्ति के लोग अपने काम में सहजता से लग जाते हैं और उसमें आने वाले उतार चढ़ाव में स्थित रहते हैं। क्रिकेट में जब टीम संकट में होती है तब उसे वही खिलाड़ी उबारता है जो व्यवसायिक प्रवृत्ति को हो क्योंकि वह मानसिक उतार चढ़ाव से प्रभावित से यह सोचकर प्रभावित नहीं होता कि उसे तो अपना काम करना है। कल विश्व कप जीतने वाली बीसीसीआई की टीम में ऐसा माद्दा विराट कोहली, गौतम गंभीर, महेंद्रसिंह धोनी तथा सुरेश रैना, अश्विन तथा आशीष नेहरा में ही दिखाई देता है जबकि सचिन तेंदुलकर, वीरेंद्र सहबाग, जहीर खान तथा मुनाफ पटेल चाहे कितना भी कमायें पर उनमें व्यवसायिक पहुंच का अभाव साफ दिखाई देता है। सचिन और सहबाग ने जिस तरह पारी शुरु की उससे साफ लगा कि वह तनाव में खेल रहे हैं। उसी तरह जहीर के अंतिम दो ओवर जिस तरह पिटे उससे भी साफ लगा कि अंतिम ओवर में रन बचाने से अधिक उनको विकेट लेने की पड़ी थी जिससे उनकी गेंद पिट गयी। वैसे भी सचिन कभी तनाव में अपनी टीम को नहीं बचाते। यह अलग बात है कि धनपतियों की नगरी में रहने की वजह से उनको नाम और नामा खूब मिलता है जबकि धोनी जैसे जांबाज लोगों का महानतम श्रेणी में आने के लिये कल जैसी जानदार पारियां खेलनी पड़ती हैं। यह अलग बात है कि उसके बाद भी उनके एतिहासिक योगदान को कम आंकने की कोशिश की जाती हैं। हमने यह लेख अपनी बोरियत दूर करने के लिये लिखा है सो इसमें निरंतरता का अभाव साफ दिखाई देता है।
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लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior

देशप्रेम की आड़ में साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का मनोरंजन-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन


प्रचार माध्यम लगातर बता रहे हैं कि मोहाली में भारत पाकिस्तान के बीच क्रिकेट का महामुकाबला हो रहा है। कुछ लोग तो उसे फायनल तक कह रहे हैं। बाज़ार के सौदागर और उनके अनुचर प्रचार माध्यम इस मुकाबले के नकदीकरण के लिये जीजान से जुट गये हैं। दरअसल यह क्रिकेट पीसीबी  (pakistan cricket board) और बीसीसीआई (bhartiya cricket control  board) नामक दो क्लबों की टीमों का मैच है। पीसीबी पाकिस्तान तथा बीसीसीआई भारत की स्वयंभू क्रिकेट नियंत्रक संस्थाऐं जिनको अंतर्राष्ट्रीय क्र्रिकेट परिषद नामक एक अन्य संस्था लंदन से नियंत्रित करती है। यह सभी संस्थायें किसी सरकार ने बनाई जिनको देश का प्रतिनिधित्व करने वाला माना जाता है। यह सरकारें इन संस्थाओं पर अपना कोई विचार लाद नहीं सकती क्योंकि यह अंतर्राष्ट्रीय खेल नियमों पर चलती हैं।
कहते हैं कि ‘झूठ के पांव नहीं होते हैं’। साथ ही यह भी कहा जाता है कि एक ही झूठ सौ बार बोला जाये तो वह सच लगने लगता है। पुराने कथनों कें ऐसे विरोधाभास ही उनके सतत चर्चा का कारण बनते हैं। जहां जैसा देखो पुराना कथन दोहरा दो। अब हम कहते हैं कि एक झूठ हजार बार बोलो तो वह महान सत्य और लाख बार बोलो तो शाश्वत सत्य हो जाता है। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों का समाज पर ऐसा जबरदस्त प्रभाव है कि उनकी बात की काट करना लगभग असंभव है और उनके फैलाये जा रहे भ्रम देखकर तो यही लगता है कि पुरानी ढेर सारी कहानियां भी शायद ऐसे ही कल्पना के आधार पर लिखी गयीं और उनके सतत प्रचार ने उनको ऐसा बना दिया कि लोग उसमें वर्णित नायकों तथा नायिकाओं को काल्पनिक कहने पर ही आपत्ति करने लगते हैं।
अब तो हद हो गयी है कि प्रचार माध्यमों ने एक खिलाड़ी को क्रिकेट का भगवान बना दिया जिसका प्रतीक बल्ला है। हमें इस पर भी आपत्ति नहीं है। वैसे कुछ मित्र समूहों में जब इस पर आपत्ति की तो मित्रगण नाराज हो गये तब तय किया कि यह आपत्ति बंद करना चाहिए। दूसरे की आस्था पर चोट पहुंचाने की क्रिया को हमारा अध्यात्मिक ज्ञान तामस बुद्धि का प्रमाण मानता हैै। हमने बंद किया पर क्रिकेट के भगवान के भक्तों ने हद ही पार कर दी। उसके चलते हुए बल्ले की तुलना भगवान श्रीराम के टंकारते हुए धनुष तथा भगवान श्रीकृष्ण के घूमते हुए चक्र से कर डाली। हमें इस पर गुस्सा नहीं आया पर आपत्ति तो हुई। हमारा कहना है कि जब तुम्हारे क्रिकेट भगवान क पास बल्ला है तो उसके साथ धनुष तथा चक्र क्यों जोड़ रहे हो? भगवान श्रीराम तथा श्रीकृष्ण का नाम क्यों जोड़ रहे हो?
यह प्रयास ऐसा ही है जैसे कि एक झूठ को लाख बार बोलकर शाश्वत सत्य बनाया जाये। यह झूठ को पांव लगाने का यह एक व्यर्थ प्रयास है। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का नाम एक कृत्रिम भगवान को पांव लगाने की कोशिश से अधिक कुछ नहीं है। भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण ने न तो अपने कर्म की फीस ली और न ही विज्ञापनों में अभिनय किया। सांसरिक रूप से दोनों त्यागी रहे। उनके भगवान तो फीस लेकर खेलते हैं, विज्ञापन में बताते है कि अमुक वस्तु या सेवा उपयोगी है उस पर पैसा खर्च करें। क्रिकेट के भगवान की छवि भोग, अहंकार तथा मोह को बढ़ाने वाली है और जिन भगवान श्रीराम तथा कृष्ण का वह नाम लेकर उसे चमका रहे हैं वह त्याग का प्रतीक हैं।
हैरानी की बात है कि किसी ने इस आपत्ति नहीं की। किसी वस्तु पर भगवान की तस्वीर देखकर लोग अपनी आस्था का रोना लेकर बैठ जाते हैं। किसी भारतीय भगवान का चेहरा लगाकर कोई नृत्य करता है तो उस पर भी आवाजें उठने लगती हैं। तब ऐसा लगता है कि हम भारतीय धर्म को लेकर कितना सजग हैं। जब किसी की क्रिकेट खिलाड़ी या फिल्म अभिनेता के साथ भगवान का नाम जोड़ा या कामेडी शो मे अध्यात्मिक के भगवान का नाम आता है तब सभी की जुबान तालु से क्यों चिपक जाती है? सीधा जवाब है कि धार्मिक उन्माद बढ़ाने वाला भी यह बाज़ार है जो ऐसे अवसरों पर पैसा खर्च करता है तो उनका उपयोग करने वाला भी यही बाज़ार है। बाज़ार और उसके प्रचारतंत्र के जाल में आम आदमी अपनी बुद्धि सहित कैद है भले ही अपने अंदर चेतना होने का वह कितना दावा करे। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में आंदोलन, अभियान तथा आंतक का आधार ही अर्थ है। यह अलग बात है कि अज्ञानी लोग उसमें धर्म, जाति, भाषा तथा क्षेत्रीय आधार पर उनका विश्लेषण करते हैं। वैचारिक समंदर में लोग उथले जल में ही तार्किक उछलकूद करते नज़र आते हैं।
पाकिस्तान के नाम से खेलने वाली पीसीबी तथा भारत के नाम से खेलने वाली बीसीसीआई की टीमों के मैच में देशभक्ति का दांव लगता है। अपने अध्यात्मिक दर्शन से दूर लोग इस मैच के प्रति ऐसे मोहित हो रहे हैं जैसे कि इससे कोई बहुत बड़ा चमत्कार सामने आने वाला है। मैच को जंग बताकर दोनों तरफ से बोले जा रहे वाक्यों को तीर या तलवार की तरह चलता दिखाया जा रहा है। भविष्यवक्ता अपने अपने हिसाब से भविष्यवाणी बता रहे हैं। मतलब प्रयास यही है कि क्रिकेट के नाम पर अधिक से अधिक पैसा लोगों की जेब से निकलवाया जाये। हैरानी की बात है कि एक तरफ कुछ खिलाड़ियों पर क्रिकेट मैचों में सट्टेबाजों से मिलकर खेल तथा परिणाम प्रभावित करने के आरोप लगते हैं। एक चैनल ने तो यह भी कहा है कि मोहाली का भारत पाकिस्तान मैच भी फिक्स हो सकता है। इसके बावजूद लोग मनोरंजन के लिये यह मैच देखना चाहते हैं। भारतीय दर्शक पीसीबी की टीम को अपनी टीम से हारते देखना चाहते हैं। यह मनोरंजन है यह मन में मौजूद अहंकार के भाव से उपजी साम्राज्यवादी प्रवत्ति है। हां, अपने कुल, शहर, प्रदेश तथा देश को विजेता देखने की इच्छा साम्राज्यवादी की प्रवृत्ति नहीं तो और क्या कही जा सकती है। कुछ लोग इसे देशभक्ति कहते हैं पर तब यह सवाल उठता है कि जिन भारतीयों को फिक्सिंग का दोषी पाया गया उनका क्या किया? देश के नाम से खेले जा रहे मैच में हार की फिक्सिंग करना आखिर क्या कहा जाना चाहिए? हम यहां देशद्रोह जैसा शब्द उपयोग नहीं कर सकते क्योंकि हमारा मानना है कि यह एक मनोरंजन का व्यापार है और उसमें देश, जाति, भाषा या धार्मिक समूहों के सिद्धांत लागू नहीं होते।
हमने इसे मनोरंजन का व्यापार भी इसलिये कहा क्योंकि जब मैचों के इनाम बंटते हैं तब उद्घोषक बताते हैं कि इसमें अमुक खिलाड़ी ने दर्शकों का ढेर सारा मनोरंजन किया। तब मनोरंजन में देशप्रेम जैसा शब्द ठीक नहीं लगता। एक चैनल तो बता रहा था कि ‘26/11 के बाद पहली बार पाकिस्तानी टीम भारत पहुंची है।’
हम अक्सर देखते हैं कि कोई आदमी कोई उपलब्धि पाकर घर लौटता है तो शहर के लोग उसका स्वागत करने पहुंचते हैं और कहते हैं कि ‘वह कामयाबी के बाद पहली बार घर आ रहा है।’
तब क्या यह माने कि 26/11 को मुंबई में हुई हिंसा ऐसा वाक्या है जिसका श्रेय पाकिस्तानी यानि पीसीबी की टीम को जाता है और मोहली पहुंचने पर उनका अभिनंदन किया गया। देश में क्रिकेट जुनून नहीं जुआ और सट्टा की गंदी आदत है जिससे क्रिकेट खेल के माध्यम से भुनाया जा रहा है मगर इसका मतलब यह नहीं कि जोश में आकर कुछ भी कहा दिया जाये। इसमें कोई संशय नहीं है कि 26/11 का हादसा भयानक था और पीसीबी की क्रिकेट टीम को उससे नहीं जोड़ना चाहिए। हम भी नहीं जोड़ते पर यह काम तो उसी बाज़ार के वही प्रचाकर कर रहे हैं जो आजकल के क्रिकेट से जमकर पैसा कमा रहे हैं।
यकीनन साम्राज्यवाद की प्रवृत्ति मनोरंजन करते हुए भी मन में रहती है यह बात अब समझ में आने लगी है। लोग पाकिस्तानी या पीसीबी की क्रिकेट टीम को हारते देखना चाहते हैं कि उसके प्रति दुश्मनी का भाव रखते है, मगर फिल्मों में पाकिस्तानी गायकों को सुनते हैं। टीवी चैनलों पर पाकिस्तानी अभिनेता और अभिनेत्रियां आकर छा जाते हैं तब देशप्रेम कहां चला जाता है। उस यही बाज़ार और प्रचारक मित्रता का गाना गाने लगते हैं। आम आदमी में चिंतन क्षमता की कमी है और वह वही जाता है जहां प्रचारक उसे ले जाते हैं। मनोरंजन में साम्राज्यवाद की प्रवृत्ति उसे इस बाज़ार का गुलाम बनाती है जो कभी दुश्मन तो कभी दोस्त बनने को मज़बूर करती है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

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होली पर प्रचार माध्यमों का शुतुरमुर्गीय दृष्टिकोण का मजाक-हिन्दी व्यंग्य लेख (ostrichma on libiya episod-hindi satire article)


दुनियां के पांच बड़े देशों में से तीन ने-अमेरिका, फ्रांस, और ब्रिटेन-अपने मित्र देशों के साथ मिलकर लीबिया पर हमला कर दिया है। अगर भारत में होली का पर्व नहीं होता तो आज शायद यही विषय चर्चा के केंद्र में रहता-कम से कम हम जैसे फोकटिया दर्शकों और चिंतकों का तो यही मानना है। जिन दो बड़े देशों ने इस हमले से पहले लीबिया से मुंह फेरा है वह एक चीन दूसरा रूस। संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में लीबिया पर हमले के लिये हरी झंडी दिलाने वाले प्रस्ताव पर यह दोनों देश अपने मित्रों के साथ अनुपस्थित रहे जबकि कुछ दिनों पहले तक दोनों ही गद्दाफी और लीबिया को राजनीतिक तौर से खुला समर्थन दे रहे थे।
भारतीय समाचार पत्रों, चैनलों तथा बुद्धिमान लोगों की पूरी खुफियगिरी धरी की धरी रह गयी। इस हमले से पहले किसी ने ऐसे हमले का अनुमान नहीं बताया गया। इधर सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पास हुआ और उधर मित्र देश हमले के लिये चल पड़े और बमबारी शुरु कर दी। लीबिया की आम जनता के कथित यह पक्षधर वहां सामान्य नागरिक को नहीं मारेंगी इसकी कोई गारंटी नहीं है। भारतीय समाचार पत्र पत्रिकाऐं तथा टीवी चैनल होली और क्रिकेट से फुरसत नहीं पा सके। क्या करें, दिन को चौबीस घंटे से बढ़़ाकर अड़तालीस का नहीं कर सकते। ऐसा भी नहीं है कि चंद्रमा से कहें कि इतना पास आ गये हो तो जरा रात को बड़ा कर दो यानि कि दिन हो ही नहीं ताकि हम रात्रिकालीन समय का भी दिन का तरह उपयोग कर सके। न ही यह कह सकते हैं कि इधर धरती की ओट में इस तरह छिप जाओ कि दिन का दिन ही रहे ताकि रात्रि न होने से लोग निद्रा की बीमारी से मुक्त होकर उनके विज्ञापन देखते रहें।
इस समय होली तथा क्रिकेट में विज्ञापनों से भारतीय समाचार माध्यमों को जोरदार कमाई हो रही है। इधर कामेडी के भी एक नहीं चार चार सर्कस शुरु हो गये हैं। फिल्मी अभिनेता अब छोटे पर्दे पर कामेडी करने के लियेे उतर आये हैं। समाचार चैनल अपना आधा घंटा कामेडी के नाम कर मनोरंजन चैनलों को विस्तापिरत रूप बन गये हैं। मतलब यह कि वह हर मिनट कमाई कर रहे हैं इसलिये उनके पास फुरसत कहां कि लीबिया पर हमले के विषय का इस्तेमाल करें।
रविवार का दिन और वह भी होली का। क्रिकेट का मैच हो तो फिर कहना ही क्या? पूरा दिन विज्ञापन के लिये है। कमबख्त, यह लीबिया का विषय कहां फिट करें। जापान की सुनामी में कमाया अभी ठिकाने लगा नहंी है। पहले रेडियम फैलने की बात चली। जापान में गर्म हो रहे परमाणु संयंत्र को इंसानी प्रयास ठंडा नहीं कर पा रहे थे पर प्रकृति को दया आ गयी। भूकंप तथा सुनामी परेशान लोगों के लिये प्रकृति ने वहां बर्फबारी कर दी। इतनी ठंड कर दी कि परमाणु संयंत्र अब ठंडे हो गये। पंच तत्वों ने जहां पहले संकट खड़ा किया वही उसको निपटान करने भी आये। भारत में प्रचार माध्यमों पर सुनामी जारी रही क्योकि होली, क्रिकेट और कामेडी को दौर चल रहा है।
भारतीय टीवी चैनलों का कहना था कि ‘जापान की सुनामी की आड़ में गद्दाफी ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली क्योंकि उसने दुनियां का ध्यान हटते ही अपने लोगों पर बमबारी कर दी।’
यहां तक कहा कि गद्दाफी का सुनामी ने बचाया। यह सब बकवास था। भारतीय समाचार टीवी चैनल सोचते हैं कि उनकी आंख अगर बंद है तो सारा संसार सो रहा है। यह शुतुरमुर्गीय दृष्टिकोण होली का सबसे बड़ा मजाक है। जिस समय भारतीय चैनल क्रिकेट और होली में व्यस्त थे तभी सुरक्षापरिषद में लीबिया पर उड़ान पर प्रतिबंध का प्रस्ताव पास हुआ और हमला भी हो गया। इस समय भारतीय प्रचार माध्यमों के पास विज्ञापनों की सुनामी का प्रकोप है इसलिये वह लीबिया पर हमले के विषय पर बासी बहस शायद तब करेंगे जब वर्तमान विषयों से मुक्ति पा लेंगे।
सचिन के सैंकड़े का सैंकड़ा लगेगा या नहीं! बीसीसीआई की क्रिकेट टीम जीतकर अपने प्रशंसकों को होली का तोहफा देगी या नहीं! धोनी अपने नये स्पिनर को खिलायेंगे या नहीं! होली और क्रिकेट पर बहस में उलझे टीवी चैनलों के पास इतना समय कहां से आ सकता है कि वह लीबिया पर अमेरिकी हमले का अध्ययन करें जिसके परिणाम भारत को आगे अवश्य प्रभावित करेंगे। लीबिया के शिखर पुरुष गद्दाफी ने भारत से समर्थन पाने के लिये जबरदस्त कोशिश की थी। क्यों? भारत को सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्यता मिलने पर ढेर सारी प्रसन्नता दिखाने वाले बुद्धिजीवियों अपने चिंतन से इस बात को समझ नहीं पाये कि अपने विरुद्ध सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पर भारत का समर्थन पाने के लिये ही गद्दाफी ने यह सब किया। प्रसंगवश चीन और सोवियत संघ के साथ भारत भी अनुपस्थित रहा। तय बात है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में इसका व्यापक प्रभाव होगा। वैसे लीबिया भारत के लिये तेल की दृष्टि से व्यवसायिक हितों वाला भले ही रहा हो पर राजनीतिक दृष्टि से कभी अधिक निकट नहीं रहा। इसके बावजूद भारत का उसके प्रति जो रवैया है उसके प्रति विश्व का दृष्टिकोण कैसा रहेगा, यह आगे देखने वाली बात होगी।
संभव है कि सारे प्रायोजित राजनीतिक विशेषज्ञ होली खेलने के बाद क्रिकेट में व्यस्त हों या फिर टीवी चैनल वाले सोचते हों कि अभी तो मुफ्त में काम चल रहा है तो क्यों गैर मनोरंजक विशेषज्ञों पर पैसा खर्च किया जाये? वैसे यह विशेषज्ञ उनसे पैसा लेते होंगे इसमें भी शक है क्योंकि प्रचार माध्यमों की वजह से उनको मूल्यवान कार्य और कार्यक्रम मिलते हैं। फिर लीबिया जैसा जटिल विषय एकदम प्रतिक्रिया देने लायक बन भी नहीं सकता क्योंकि उससे पहले बुद्धिजीवियों को अपने शिखर पुरुषो के इशारे का इंतजार होगा जिनके पास होली की वजह से फुरसत अभी नहीं होगी। हमारे देश में गद्दाफी का विरोध तो प्रगतिशील और जनवादी बुद्धिजीवी वैसे भी कर रहे थे पर चूंकि मामला अमेरिकी हमले का है तो उनको अपने दृष्टिकोण पर फिर से विचार करना पड़ेगा। दक्षिणपंथियों के लिये वैसे भी गद्दाफी कोई प्रिय व्यक्ति नहीं रहा है। ऐसे में हमें इंतजार है कि लीबिया पर विचाराधाराओं से जुड़े बुद्धिजीवियों की क्या प्रतिक्रिया होती है? आशा है होली और क्रिकेट से फुरसत पाने के बाद इन प्रचार माध्यमों को अपनी विज्ञापन की नदी के सतत प्रवाह के लिये यह शुतुरमुर्गीय दृष्टिकोण बदलना ही पड़ेगा।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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