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त्यागी और भोगी गुरु की पहचान आवश्यक-गुरु पूर्णिमा पर विशेष हिन्दी लेख


            आज पूरे देश में गुरु पूर्णिमा का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस अवसर पर अनेक जगह अध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन में गुरु के महत्व को अत्यंत महत्वपूर्ण ढंग से प्रतिपादित करते हुए उसे परमात्मा के बाद दूसरा दर्जा दिया गया है।  यह अलग बात है कि पेशेवर धार्मिक संतों ने इसका उपयोग अपने हित में अधिक किया है।  आज जब पूरे विश्व में भौतिकता का बोलबाला है तब लोग हृदय की शांति के लिये अध्यात्मिक दर्शन की शरण लेते हैं। उनके इस भाव का वह चालाक लोग उपयोग करते हैं जो कथित रूप से ज्ञानी होने की छवि बनाकर अपने लिये भौतिक सुख साधन जुटा लेते हैं।

            ऐसे ढोंगियों के कारण लोगों में हर साधु संत के प्रति संदेह का भाव पैदा होता है। अनेक लोग गुरु की तलाश करते हैं।  किसी को बनाते हैं तो जल्द ही उनको पता लगता है कि वह एक पाखंडी की शरण लिये हुए हैं।  दरअसल लोगों में यह निराशा अज्ञान के कारण पैदा होती है। लोग भौतिक चकाचौंध से घिरे गुरुओं की शरण लेते हैं जो कि प्रत्यक्ष भोग वृत्ति में लिप्त होते हैं जबकि सच्चा गुरु त्यागी होता है। एक बात निश्चित है कि भोगी कभी महान नहीं बन सकता और त्यागी कभी लघुता नहीं दिखाता।  जिसके पास माया का भंडार है उससे अध्यात्मिक ज्ञान की आशा नहीं की जानी चाहिये।  गुरु कभी स्वतः आमंत्रण देकर शिष्य नहीं बनाता। जिनको ज्ञान चाहिये उन्हें त्यागी गुरु ढूंढना चाहिये।

            हमारे देश में धर्म प्रचार और अध्यात्मिक ज्ञान के लिये अनेक कथित गुरु बन गये हैं।  अनेक गुरु बहुत प्रसिद्ध हैं यह तो तब पता चलता है जब उनको किसी भी अच्छे या बुरे कारण से प्रचार माध्यमों में सुर्खियां मिलती है। हजारों करोड़ों की संपत्ति करोड़ों शिष्य के होने की बात तब सामने आती है जब किसी गुरु की चर्चा विशेष कारण से होती है। आज तक एक बात समझ में नहीं आयी कि एक गुरु एक से अधिक आश्रम क्यों बनाता है? आश्रम से आशय किसी गुरु के उस रहने के स्थान से है जिसका उपयोग वह  निवास करने के साथ ही अपने शिष्यों को शिक्षा देने के लिये करता है।  आमतौर से प्राचीन समय में गुरु एक ही स्थान पर रहते थे। कुछ गुरु मौसम की वजह से दो या तीन आश्रम बनाते थे पर उनका आशय केवल समाज से निरंतर संपर्क बनाये रखना होता था।  हमारे यहां अनेक गुरुओं ने तीन सौ से चार सौ आश्रम तक बना डाले हैं। जहां भी एक बार प्रवचन करने गये वहां आश्रम बना डाला।  अनेक गुरुओं के पास तो अपने महंगे विमान और चौपड़ हैं।  ऐसे गुरु वस्त्र धार्मिक प्रतीकों वाले रंगों के पहनते हैं और प्राचीन ग्रंथों के तत्वज्ञान का प्रवचन भी करते हैं पर उनकी प्रतिष्ठा आत्म विज्ञापन के लिये खर्च किये धन के कारण होती है। लोग भी इन्हीं विज्ञापन से प्रभावित होकर नको अपना गुरु बनाते हैं।

संत कबीरदास कहते हैं कि

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गुरु भया नहिं शिष भया, हिरदे कपट न जाव।

आलो पालो दुःख सहै, चढ़ि पत्थर की नाव।।

      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जब तक हृदय में कपट है तब तक गुरु कभी सद्गुरु और शिष्य कभी श्रेष्ठ मनुष्य नहीं बन सकता। कपट के रहते इस भव सांगर को पार करने की सोचना ऐसे ही जैसे पत्थर की नाव से नदी पार करना।

गुरु कीजै जानि के, पानी पीजै छानि।

बिना बिचारे गुरु करे, परै चौरासी खानि।।

      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-पानी छानकर पीना चाहिए तो किसी को गुरु जानकार मानना चाहिए। बिना विचार किये गुरु बनाने से विपरीत परिणाम प्राप्त होता है।

      देखा जाये तो हमारे देश में आजकल कथित रूप से धर्म के ढेर सारे प्रचारक और गुरु दिखाई देते हैं।  जैसे जैसे रुपये की कीमत गिर रही है गुरुओं की संख्या उतनी ही तेजी से बढ़ी है। हम कहते हैं कि देश में भ्रष्टाचार पहले से कहीं अधिक बढ़ा है तो यह भी दिखाई देता है कि धार्मिक गुरुओं के कार्यक्रम भी पहले से कहीं अधिक होते है। ऐसे में यह समझ में नहीं आता कि जब धर्म का प्रचार बढ़ रहा है तो फिर देश के सामान्य चरित्र में गिरावट क्यों आ रही है?  तय बात है कि सत्य से निकटता का दावा करने वाले यह कथित गुरु माया के पुजारी हैं।  सच बात तो यह है कि हम आज किसी ऐसे गुरु को नहीं देख सकते जो प्रसिद्ध तो हो पर लक्ष्मी की उस पर भारी कृपा नहीं दिखाई देती हो।  अनेक गुरु तो ऐसे हैं जो अपने मंचों पर महिलाओं को इसलिये विराजमान करते हैं ताकि कुछ भक्त ज्ञान श्रवण की वजह से नहीं तो सौंदर्य की वजह से भीड़ में बैठे रहें।  हालांकि हम यह नहीं कह सकते कि वहां विराजमान सभी लोग उनके भक्त हों क्योंकि अनेक लोग तो समय पास करने के लिये इन धार्मिक कार्यक्रमों में जाते हैं। यह अलग बात है कि उनकी वजह से बढ़ी भीड़ का गुरु अपना प्रभाव बढ़ाने के लिये प्रचार करते हैं।

      कहने का अभिप्राय यह है कि आज हम जो देश के साथ ही पूर विश्व में नैतिक संकट देख रहे हैं उसके निवारण के लिये किसी भी धर्म के गुरु सक्षम नहीं है। जहां तक पाखंड का सवाल है तो दुनियां का कोई धर्म नहीं है जिसमें पाखंडियों ने ठेकेदारी न संभाली हो पर हैरानी इस बात की है कि सामान्य जन जाने अनजाने उनकी भीड़ बढ़ाकर उन्हें शक्तिशाली बनाते हैं। सच बात तो यह है कि अगर विश्व समाज में सुधार करना है तो लोगों अपने विवेक के आधार पर ही अपना जीवन बिताना चाहिये। ऐसा नहीं है कि सभी गुरु बुरे हैं पर जितने इतिहास में  प्रसिद्ध हुए  हैं उन पर कभी कभी कोई दाग लगते देखा गया होगा।

    इस गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठक को को हार्दिक बधाई। 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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विरला ही मिलता फरिश्ता-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


नारे कोई दियासलाई नहीं होते

जिनसे निकली चिंगारी

समाज में कोई बदलाव कर दे।

जिंदा रहने के लिये सभी संघर्षरत

संभव नहीं है

मतलबपरस्त इंसानों में

कोई ज़माने के लिये

वफा का भाव भर दे।

कहें दीपक बापू प्रेम का संदेश

सुनाते हुए प्रचार बहुत मिल जाता है,

दर्दनाक हादसों पर लगती भीड़

हमदर्दी दिखाते हर कोई हिल जाता है,

मिलता कभी  कोई ही विरले फरिश्ता

जो बिना दाम लिये

किसी का घाव भर दे।

————–

शिक्षा बन गयी व्यापार

विद्यालय सुविधाओं के

विज्ञापन और प्रचार पर चलते हैं।

पुस्तकें हो गयी सौदे की शय

छात्र अब पुत्र की तरह नहीं

ग्राहक की तरह पलते हैं।

अध्यापक सिखा और पढ़ा रहे

अंग्रेजी चाल का तरीका,

थोड़ा बहुत मनोरंजन का सलीका,

भविष्य में आनंद का सपना

छात्र गुलामी के सांचे में ढलते हैं।

कहें दीपक धर्म से परे शिक्षा

कभी समाज नहीं बना सकती

निकल आये हम भ्रम के मार्ग

अब अपनी करनी पर हाथ मलते हैं।

———————–

रैगिंग की प्रथा हिन्दू धर्म के सिद्धांतों प्रतिकूल-चाणक्य नीति और मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख


      भारत में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति अपनाये जाने के बाद समाज के कथित सभ्रांत ने समूह  रहन सहन और खान पान में ऐसी परंपराओं को जन्म दिया है जो उसे सामान्य लोगों से अलग करती है। एक तरह से कहा जाये तो धनिक वर्ग ने सामान्य समाज में सभ्रांत दिखने के लिये पाश्चात्य परंपराओं को इसलिये नहीं अपनाया कि वह वास्तव में सभ्य है वरन् स्वयं को श्रेष्ठ दिखने क्रे लिये उन्होंने वह अतार्किक व्यवहार अपनाया है जिसके औचित्य वर सामान्य लोग कुछ कह नहीं पाते।  इन्हीं परंपराओं में एक प्रथा है रैगिंग परंपरा जिसका निर्वाह विद्यालयों, महाविद्यालयों और छात्रावासों में वरिष्ठ छात्र कनिष्ठों को परेशान करने के लिये करते हैं।  यह परंपरा पहले भी थी पर उसका रूप इतना निकृष्ट नहीं था जितना अब दिखाई देता है।

      रैगिंग के दौरान वरिष्ठ छात्र कनिष्ठ छात्रों के साथ मजाक की परंपरा निभाने के लिये अत्यंत घृणित व्यवहार करते हैं-यह शिकायतें अब आम हो गयी है। इस तरह की घटनायें तब प्रकाश में आती हैं जब कोई छात्र अपनी जाने खो बैठता है।  दरअसल हमारी शिक्षा प्रणाली में आकर्षण लाने के लिये जिस व्यवसायिक भाव को अपनाया गया है उसमें अधिक से अधिक छात्र एकत्रित करने का प्रयास उस व्यापारी की तरह किया जाता है जो अपने सामान के लिये अधिक से अधिक ग्राहक चाहता है।  जब शिक्षा के क्षेत्र में राज्य का प्रभाव था तब तक कोई समस्या नहीं थी पर अब निजीकरण ने इस क्षेत्र को बेलगाम बना दिया है।  दूसरी बात यह कि निजी क्षेत्र में शिक्षा का स्वामित्व ऐसे लोगों के पास चला गया है जो धन, पद और बाहुबल के दम पर अपना काम चलाते हैं उनके यहां शिक्षक एक लिपिक से अधिक माननीय नहीं होता।  निजी क्षेत्र के शैक्षणिक संस्थान केवल शिक्षा का वादा नहीं करते वरन् वह खेल, मनोरंजन और नौकरी दिलाने तक की उन सुविधाओं का वादा करते हैं जिन्हें इतर प्रयास ही माना जा सकता है। उनके प्रचार विज्ञापनों में छात्रों को पाठ्यक्रम से अधिक सुख सुविधाओं की चर्चा होती है।

चाणक्य ने कहा है कि

————-

सुखार्थी वा त्यजेद्विधां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम्।

सुखार्थिन कुतो विद्या विद्यार्थिनः कुतोः सुखम्।।

     हिन्दी में भावार्थ-सुख की कामना वाले को विद्या औरं विद्या की कामना वाले को  सुख का त्याग कर देना चाहिये। सुख चाहने वाले को विद्या और विद्या चाहने वाले को सुख नहीं मिल सकता।

      आजकल मोबाइल, कंप्यूटर और वाहनों का प्रभाव समाज में इस तरह बढ़ा है कि हर वर्ग का सदस्य उसका प्रयोक्ता है। स्थिति यह है कि बच्चों को आज खिलौने  से अधिक उनके पालक मोबाइल, कंप्यूटर और वाहन दिलाने की चिंता करते हैं। अब तो यह मान्यता बन गयी है कि अच्छी सुविधा होगी तो बच्चा अधिक अच्छे ढंग से पढ़ सकता है। जबकि हमने आधुनिक इतिहास में ऐसे अनेक महापुरुषों के बारे में पढ़ा है जिन्होंने भारी कष्टों के साथ जीवन बिताते हुए शिक्षा प्राप्त करने के अपने प्रयासों से प्रतिष्ठा का शिखर पाया।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

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द्यूतं च जनवादं च परिवादं तथाऽनृतम!।

स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भावुपघातं परस्य च।।

     हिन्दी में भावार्थ-विद्यार्थी को चाहिये कि वह जुआ, झगड़े, विवाद झूठ तथा हंसीमजाक करने के साथ ही दूसरों को हानि पहुंचाने से दूर रहे।

शैक्षणिक गतिविधियों से इतर सुविधाओं ने छात्रों को इतना बहिर्मुखी बना दिया है कि जिस काल में एकांत चिंत्तन की आवश्यकता होती है उस समय वह  मनोरंजन में अपना समय बर्बाद करते हैं।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन तो यह मानता है कि शिक्षा के दौरान अन्य प्रकार की गतिविधियां न केवल अनुचित हैं वरन् धर्मविरोधी भी हैं।  चाणक्य तथा मनुस्मृति में यह स्पष्ट कहा गया है कि शिक्षा की अवधि में छात्रों को सुख सुविधाओं से दूर रहना चाहिये।  इतना ही नहीं गुरुकुल या छात्रावासों में रहना जरूरी हो तो सभी का सम्मान किया जाये। जुआ, मनोरंजन, निंदा, झगड़े तथा विवादों से विद्यार्थियों को बचना चाहिये।  यह हमारी धार्मिक पुस्तकें स्पष्ट रूप कहती हैं पर हैरानी की बात है कि कथित धर्म प्रवचनकर्ता कभी रैगिंग के विरुद्ध टिप्पणी नहीं करते। वैसे उनका दोष नहीं है क्योंकि अगर उन्होंने रैगिंग को धर्म विरोधी कहा तो उनके विरुद्ध प्रचार यह कहते हुए शुरु हो जायेगा कि वह सांप्रदायिक हैं।  यही प्रचार माध्यम जो रैगिंग के वीभत्स समाचार देकर विलाप कर रहे हैं उसे धर्म विरोधी घोषित करने पर समर्थन देने लगेंगे और दावा यह करेंगे कि एक दो छोटी घटना पर रैगिंग को निंदित नहीं कहा जा सकता।

हम जैसे सामान्य लेखकों के पाठक कम ही होते हैं इसलिये इस बात की चिंता नहीं रहती कि कोई बड़ी बहस प्रारंभ हो जायेगी। दूसरी बात यह कि हम भारतीय अध्यात्मिक संदेशों के नये संदर्भों में चर्चा के लिये प्रस्तुत करते हैं तो अक्सर यह विचार आता है कि क्यों न ऐसा लिखा जाये जिससे लोग आकर्षित हों इसलिये यह सब लिखा दिया।  यह विचार इसलिये भी आया कि रैगिंग की घटनाओं से जब कुछ युवा जान गंवाते हैं तो तकलीफ होती है।  इसलिये हम चाहते हैं कि युवा वर्ग अपने प्राचीन अध्यात्मिक दर्शन का अध्ययन कर इस तरह की घटनाओं से बचे।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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अन्ना भक्तों के राजनीतिक क्षमताओं की परीक्षा अभी बाकी-हिंदी चिन्तन लेख


            अभी हाल ही में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न हुए।  इन चुनावों के परिणाम आने के साथ ही नयी सरकारों के गठन की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है।  एक स्वतंत्र फोकटिया लेखक होने के कारण हमने इन चुनावों पर एक आम आदमी की तरह दिलचस्पी ली।  मध्यप्रदेश, राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ राज्यों के चुनाव तथा उसके परिणामों में इस लेखक की  स्वाभाविक दिलचस्पी थी। मध्यप्रदेश तो स्वयं का राज्य है और छत्तीसगढ़ कभी चूंकि इसी प्रदेश का भाग था तो उससे अभी भी आत्मीयता बरकरार है। राजस्थान एक तो पड़ौसी राज्य है दूसरा वहां इस लेखक की ससुराल है इस कारण उसमें भी रुचि होना स्वभाविक है।  अब कौनसा दल हारा और कौनसा जीता, यह तो बड़े विद्वानों के लिये विश्लेषण का विषय है मगर  अपनी दिलचस्पी तो बस इतनी है कि शासन सहजता से चले ताकि अपना जीवन शांति से चलता रहे।  चुनाव तो दिल्ली में भी हुए पर उसे हम अधिक महत्व नहीं दे रहे थे।  इसका कारण यह था कि वहां के विधानसभा के एक चुनाव क्षेत्र की शायद जितनी सीमा होगी वह मध्यप्रदेश में कुछ नगरनिगमों के एक वार्ड से भी कम होगी।   बहुत कम लोगों को पता होगा कि संसद की सीटों का राज्यों के गठन के समय निर्धारण जनसंख्या के आधार पर हुआ था जो कि आज तक चल रहा है। उस कारण क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य होने के बावजूद मध्यप्रदेश के लिये कम संसदीय क्षेत्र बने जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों को अधिक स्थान मिले।  दिल्ली की सात लोकसभा क्षेत्रों का जितना क्षेत्र है वह मध्यप्रदेश दो नहीं तो तीन लोकसभा क्षेत्रों से भी कम होगा। सही क्षेत्रफल का आंकड़ा नहीं वरना हम कह सकते थे कि मध्यप्रदेश का कोई लोकसभा क्षेत्र दिल्ली के सात लोकसभा क्षेत्रों के बराबर भी हो सकता है।

            आमतौर से भारतीय प्रचार माध्यम बृहद शहरों को ही भारत का प्रतीक मानते हैं पर हम उनसे सहमत नहीं हो पाते। वजह जब हम उन पर प्रसारित समाचारों तथा बहस की विषयों को देखते हैं तो लगता है कि वह भारी गलतफहमी में रहते हैं। उनके अनेक विषयों में हमारे शहर के बहुत कम लोग रुचि लेते दिखते हैं।  अभी दिल्ली में हुए चुनावों के परिणाम बहुत दिलचस्प थे पर इतने नहीं कि उसमें देश के लिये कोई विशेष संदेश ढूंढा जा सके।  ऐसा नहीं है कि हमारी दिलचस्पी दिल्ली के चुनावों के कतई नहीं थी पर चूंकि उससे अपना कुछ बनता बिगड़ता नहीं है इसलिये मन में उत्साह नहीं था।  अन्ना भक्तों ने इस चुनाव में सफलता इतनी प्राप्त की है कि वह वहां एक राष्ट्रीय दल को तीसरे स्थान पर पहुंचा सके तो दूसरा बहुमत से वंचित हो गया।  यह अलग बात है कि यह दल अन्ना भक्तों से आगे रहा है।  हमने अन्ना भक्त इसलिये कहा क्योंकि हम उनकी पहचान इसी तरह करते हैं, यह अलग बात है कि अन्ना हजारे ने किसी राजनीतिक दल से संपर्क न रखने के निर्णय के चलते उनसे नाता तोड़ लिया है।  एक बात तय है कि अन्ना हजारे का आंदोलन देश में व्यापक भावनात्मक प्रभाव डालने में सफल रहा है तो यह भी सत्य है कि अन्ना के भक्त से राजनीतिक चोला पहनने वाले इन लोगों ने उनसे अपने पुराने संबंधों को पूरी तरह से चुनावों में अधूरी सफलता प्राप्त कर भुना ही लिया।  अब अन्ना हजारे साहब  ने इनके बिना अपना अनशन जनलोकपाल के लिये पुनः प्रारंभ कर लिया है और यकीनन अन्ना भक्तों को अब उनके साथ किये गये प्रयासों को लाभ नहीं मिलने वाला।  सीधी बात कहें तो अन्ना हजारे जी के साथ आंदोलन करने के लिये जो उन्होंने श्रमदान किया उसका पूरा पुण्य कमा चुके हैं और जब वह अपने राजनीतिक अभियान को दिल्ली से चलाकर पूरे देश में चलाने की बात कह रहे हैं तो उन्हें अब उन्हें श्रमदान के नये प्रयास करने होंगे।

            भारत के आंदोलनों से बने नेता लोकप्रिय बनते हैं। चुनावों में उनकी सफलता कदम भी चूमती है पर एक प्रशासक के रूप में सभी की छवि धवल बनी रहे, यह कभी नहीं देखा गया।  कुछ की छवि जहां जनहित करने वाली बनी तो कुछ की छवि मलिन होती भी देखी गयी है।  अन्ना भक्तों ने दो राष्ट्रीय दलों का सामना अपने इष्ट के साथ खड़ी तस्वीरों के साथ ही किया यह भूलना नहीं चाहिये।  अन्ना भक्तों की छवि इसलिये अभी तक धवल है क्योंकि उन्होंने अभी राजकाज के क्षेत्र में कदम ही नहीं रखा। दिल्ली में उनको इतनी सीटें मिली है कि एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के बिना शर्त समर्थन से वह सरकार बना सकते हैं पर वह इसके लिये तैयार नहीं है।  उनका मानना है कि दोबारा चुनाव हों ताकि किसी एक दल के पक्ष में फैसला हो सके।  उनको अपनी धवल छवि का इतना भरोसा है दोबारा चुनाव पर उनको पूर्ण बहुमत मिल जायेगा पर राजनीतिक समझ रखने वाले लोगों को लगता है कि यह अतिआत्मविश्वास है।  एक डेढ़ वर्ष से सक्रिय प्रयासों से उन्होंने यह सफलता प्राप्त की। अब दोबारा चुनाव तक वह उसे जारी रख पायेंगे इसमें संदेह न भी हो पर मतदाता की लगातार उनमें दिलचस्पी रहे यह शंकास्पद है।  अन्ना भक्त देश में बदलाव लाने की प्रक्रिया में निंरतर लग गये हैं पर आम आदमी अपना मनोबल बनाये रखेगा इसमें संदेह है।  मुख्य बात यह है कि दिल्ली की जिस सफलता पर वह पूरे देश में छाने की बात कह रहे हैं वह वैसी नहीं है जैसा वह तथा उनके समर्थक प्रचार माध्यम कह रहे है।  दिल्ली में अगर सरकार नहीं बनती तो  अन्ना भक्तों की विजेता की छवि नहीं बनती दिखती  जो आगे के अभियान में  सहायक होने वाली थी।  जनता संघर्ष करने वाले को देखते प्रसन्न होती है पर वह उसे विजेता भी देखना चाहती है।  अगर उनसे अधिक स्थान प्राप्त राष्ट्रीय दल भी सरकार नहीं बनाता तो यह अनिर्णय की स्थिति जनता में चिढ़ पैदा करेगी।  सीधी बात कहें तो अन्ना भक्त या तो विजेता के रूप में जायें या पराजित योद्धा की छवि के साथ आगे जायें।  इसमें भी पैचं है। अगर सबसे अधिक स्थान प्राप्त राष्ट्रीय दल ने सरकार बना ली तो अन्ना भक्त हारे दिखेंगे तब भारतीय जनमानस की उनसे सहानुभूति होगी या नहीं कहना कठिन है। जिस दिल्ली के चुनाव में दूसरे स्थान पर रहकर अन्ना भक्त प्रसन्न हैं हमारे हिसाब से वही उनके लिये उलझा विषय बनने वाला है।  दूसरों की क्या कहें अपने अनेक वर्ग के अनेक लोगों से अन्ना भक्तों की छवि पर मन टटोला। सभी उनकी सफलता पर चमत्कृत तो हैं पर यह प्रश्न भी उठा रहे हैं कि क्या वह सरकार बनायेंगे?

            लोकतंत्र में आंदोलनों का महत्व तो है पर सरकार और विपक्ष का भी महत्व है। चुनाव के बाद किसी भी राजनीतिक दल के पास यही भूमिकायें होती हैं।  जिस दल का पहला चुनाव हो उसे सरकार या विपक्ष में रहकर अपनी प्रतिभा दिखानी होती है और दिल्ली में अन्ना भक्तों को वही कर दिखाने का अवसर है। उनमें जीत का उत्साह है और प्रचार माध्यम भी उनके साथ हैं पर क्या यह सब  भारतीय जनमानस वैसे ही ले रहा है जैसा वह चाहते हैं यह भी देखना होगा।  अगर विधानसभा त्रिशंकु रही तो लोग पूछेंगे कि कौनसी सफलता हासिल करके आ रहे हो और अगर सरकार बनायी तो दिल्ली में उलझे रहेंगे। विपक्ष में बैठे तो लोग पहले उनकी वहां की भूमिका जांचेंगे।  दूसरी बात यह कि पहला पत्थर रखने पर मूहूर्त होता है तब फावड़ा चलाया जाता है।  चुनावों के बाद सरकार या विपक्ष की भूमिका में बैठना इसी तरह का है।  कोई मकान बनाया जाता है तो भी उसका मूहूर्त किया जता है। अन्ना भक्त अभी भी आंदोलन की भूमिका है।  एक पत्थर लगाया और दूसरा लगाने चल पड़े। एक मकान बनाया और ताला लगाकर दूसरा बनाने चल पड़े।  लोग तो पहले के काम का हिसाब पूछेंगे कि वहां क्या कर आये हो?’

            पुराने प्रतिष्ठित दलों राजनीतिक दलों पर यह अन्ना भक्त अभी तक बरसते थे तब चूंकि चुनावी राजनीति से दूर थे इसलिये लोग उनकी बात ध्यान से सुनते थे पर जब वह इस क्षेत्र में आ ही गये हैं तो उन्हें अपनी सफलतायें पहले चुनाव से ही बतानी पड़ेंगी।  दूसरी बात यह भी कि इन स्थापित राजनीतिक दलों को अब उन पर व्यंग्य बाण छोड़ने की सुविधा भी होगी जिनका सामना करने के लिये उन्हें अब अतिरिक्त ऊर्जा चाहिये। अन्ना हजारे की जनलोकपाल की मांग से अब काम चलने वाला नहीं है। बहरहाल हमारे समझ में यह नहीं आया कि वह लिख क्या गये? फिर सोचते हैं कि हमने लिखा भी तो ऐसे लोगों के बारे में जिनको यही पता नहीं कि वह कर क्या रहे हैं।

            बहरहाल अन्ना हजारे और उनके राजनीतिक भक्तों में हमारी दिलचस्पी है सो उनकी गतिविधियां हमेंशा कुछ न कुछ लिखने को बाध्य करती हैं।  बहरहाल पांच चुनावों में जिन लोगों ने मतदाता के रूप में भाग लिया उनको ढेर सारी बधाई।  उन्होंने चाहे जिस दल को मत दिया हमें इससे हमारा कोई संबंध नहीं है पर उन्होंने एक निष्काम कर्म हृदय से किया यह पुण्य का काम है। मानव समाज में एक राजा का होना अनिवार्य है।  हम यह कहते हैं कि नेता कुछ काम नहीं कर रहे पर कम से कम राज्य व्यवस्था तो बनाये हुए हैं क्योंकि अगर यह नहीं हो तो उसका परिणाम क्या होगा, यह हम सभी जानते हैं। जब हम मत डालते हैं तो कम से कम एक राज्य व्यवस्था को बनाये रखने का समर्थन करते हैं तो मानव समाज में अनुशासन बनाये रखने के लिये आवश्यक है।

 

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप

ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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विकास पर दो हिंदी क्षणिकाएँ


आओ विकास के मसले पर बहस करे,

गड्ढों में सड़क है

अस्पतालों में दवायें नहीं तो क्या

चिकित्सक तो हैं,

बदबूदार है तो क्या

पानी मिलता तो है,

सच्चाई हमेशा कड़वी रहेगी

आओ कुछ देर के लिये

अपनी जुबान से

अपने दिमाग में कुछ सपने भरें।

—————

अंधे हाथी को पकड़कर कर

गलतबयानी करते

तो समझ में आता है,

मगर अब तो आंखें वाले भी

अपने अपने नजरिये से देखने लगे हैं,

दिमाग से नहीं रहा जुबां का रिश्ता

आंखों में तारों की जगह पत्थर लगे है।

————–

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

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