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आस्था का बोझ-हिन्दी कविता (aastha ka bojh-hindi poem)


हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई में क्यों तुम बंट जाते हो,
पुराने नुस्खे हैं राजाओं के, तुम प्रजा होकर क्यों फंस जाते हो।
नस्ल पूछे बिना रेत पांव जला देती, जल कर देता है शीतल
बोझ उठाये कंधे आस्थाओं का , तुम क्यों सवाल किये जाते हो।
धर्म, जाति और भाषा के गुटों की इस सदियों   पुरानी जंग में,
अपनी अकेली जिंदगी को क्यों उलझाये जाते हो

इंसान और इंसानियत का नारा भी एक धोखा है,
आदतें है सभी की अलग अलग क्यों भूल जाते हो।
इंसानों में भी होते हैं आम और खास शख्सियत के मालिक,
ओ आम इंसानो! तुम क्यों बड़ों के जाल में फंस जाते हो।
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संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com
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पति पत्नी के बीच में दखल और कानून-हिन्दी लेख


श्रीमद्भागवत गीता ‘भेदात्मक बुद्धि’ रखने वालों को आसुरी प्रवृत्ति का मानती है। इसलिये किसी भी ज्ञानी ध्यानी को मनुष्यों के कर्म पर बोलते या लिखते समय उसकी जाति, भाषा या कथित धर्म-इनको भ्रम भी कहा जा सकता है-का उल्लेख नहीं करते। मुश्किल तब शुरु होती है जब कोई आदमी अपनी जाति, भाषा, धर्म या क्षेत्र के नाम से ही परिचय देकर इस बात की जिद्द करता है कि उसे अपने समूह से जोड़कर देखा जाये। ऐसी बाध्यता अगर सामने है तो फिर अपनी बात कहने में रुकना भी नहीं चाहिये।
यह लेखक पहली बार मुसलमान समाज पर इसलिये लिख रहा है क्योंकि इसके ब्लाग पर अनेक बार इसी समाज से जुड़े लोग टिप्पणी करते हैं। दूसरी बात यह कि उनमें भारतीय अध्यात्म के प्रति झुकाव भी देखा गया है। टिप्पणियाों की संख्या पाठकों की संख्या से बहुत कम होती है। ऐसे में यह मानना पड़ता है कि इस लेखक के पाठों पर मुस्लिम समाज के पाठकों की संख्या देश की आबादी के अनुरूप ही होगी। इसी विश्वास के कारण यह लिखा जा रहा है। इसमें आलोचना हो सकती है पर यह परंपरागत रूप से वैसी नहीं होगी जैसी अक्सर चिढ़ाने वाली होती है। कोई नाखुश बंदा इस लेख का गलत अर्थ न लगाये इसलिये यह सफाई लिखनी पड़ रही है।
हम पति पत्नी और मियां बीवी के-यह लेखक लकीर का फकीर है इसलिये जैसा कि धर्म के ठेकेदार भाषा से उसको जोड़ते हैं इसलिये यह बताना जरूरी है कि हिन्दू में पति पत्नी और मुसलमानों में मियां बीवी-रिश्तों में अक्सर धर्म के कथित तत्वों को देखना चाहते हैं। यह इच्छा दो ही कारण से पैदा होती है। एक तो अपने आंख, कान तथा दिमाग को दूसरे के घर में आग देखकर प्रसन्नता के कारण होती है। दूसरा स्वयं को ज्ञानी साबित करने के लिये पंच होकर जाने का अवसर मिलता है। हिन्दू धर्म कभी एक संगठन के रूप में नहीं रहा इसलिये उसमें किसी भी संस्था द्वारा नियम बनाने का प्रावधान नहीं है और न ही पति पत्नी के संबंधों में राज्य, समाज या किसी समूह द्वारा हस्तक्षेप का प्रावधान है। पति पत्नी के संबंध टूटें या जुड़ें इसके लिये वह जिम्मेदार होते हैं। सदियों तक तो यह कायदा रहा है कि घर से विवाह कर जाती हुई बेटी को बाप कहता है कि ‘बेटी, जिस घर तेरी डोली जा रही है, वहीं से तेरी अर्थी उठेगी।’
इसके बावजूद हिन्दुओं के लिये विवाह विच्छेद का कानून बना पर इसका किसी ने विरोध नहीं किया क्योंकि कोई व्यक्ति या संगठन ऐसा करने का न तो आधार रखता है और न उसके पास जनसमर्थन होता है। इसलिये ही हिन्दुओं के विवाह और तलाक के विषय आज के आधुनिक बाजार आधारित प्रचार माध्यमों के लिये कोई विषय नहीं बनते। मगर हाल ही में पाकिस्तान के एक दूल्हे को लेकर भारत की दो लड़कियों के बीच जो जंग हुई उसमें तलाक और शादी दोनों ही इसलिये ही प्रचार का विषय बने क्योंकि तीनों ही मुसलमान थे। इस पर नियम से काम करने वाला उनका संगठन है जिसमें शायद काजी और मौलवी होते हैं। मुसलमानों में तलाक जितनी आसानी से मुंहजबानी होता है वैसा हिन्दुओं में नहीं है। यह अच्छी बात है पर जिस तरह तलाक का नाटक उक्त प्रकरण में देखने को मिला उससे जरूर मुस्लिम ज्ञानी भी नाराज हुए होंगे। मगर उनको यह समझ लेना चाहिये कि उनके नियमों ने ही आधुनिक बाजार आधारित प्रचार माध्यमों को यह अवसर प्रदान किया। इस लेखक का मानना है कि जहां विवाह न निभता हो वहां तलाक आसानी से होने देना चाहिये पर जिस तरह पाकिस्तानी क्रिकेटर की पहली बीवी अपने मियां से तलाक लेकर दूसरी शादी करने के लिये दबाव बना रही थी और दूसरी होनी वाली बीवी पहली वाली का मजाक बना रही थी वह चर्चा का विषय बना। सच तो यह है कि जिस तरह इसमें क्रिकेट और मध्य एशिया देशों के नाम आये उससे लगा कि कहीं न कहीं इसमें प्रायोजन है-पाकिस्तानी क्रिकेटर पर दूसरी लड़की को प्रभावित करने के लिये 16 करोड़ का खर्च तथा तलाक के लिये पहली बीवी को पंद्रह करोड़ देने जैसी बातें यह समाचार माध्यम करेंगे तो यह शक होना स्वाभाविक है।
अब आते हैं असली बात पर! जब यह प्रकरण चल रहा था तब पाकिस्तानी क्रिकेटर की पहली बीवी ने तलाक न देने के कारण अपने ही देश की दूसरी लड़की से निकाह करने अपने ही शहर में आये उस शौहर पर ‘घरेलू हिंसा’ का मामला दायर कर दिया। मामला पुलिसा तक ही रहा। इस मामले के अदालत में जाने की संभावना नगण्य ही थी क्योंकि तब यह पेचीदा हो जाता। चूंकि तलाक होना था और निकाह भी इसलिये पर्दे के पीछे खेल चलता रहा।
इधर बहस भी हो रही थी। जिसमें कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवी, पत्रकार, तथा मुल्ला मौलवी भी शामिल थे। वह अपनी किताबों के अनुसार बहस कर रहे थे पर वह नहीं जानते थे कि वह ऐसा कर कानूनी संकट को न्यौता भी दे रहे थे। चलो यह प्रकरण तो चूंकि बाज़ार और प्रचार का संयुक्त प्रायोजन था-यह भी संभव है कि इन दोनों की सयुक्त समर्थक कोई लॉबी इससे जुड़ी हुई हो-इसलिये यह सब चल गया। भविष्य में वह याद रखें कि भारत में अब दहेज विरोधी कानून तथा घरेलू हिंसा ऐसे कानून हैं जो पति पत्नी तथा मियां बीवी पर समान रूप से लागू होते हैं। दहेज एक्ट तो केवल परिवार तथा रिश्तेदारों तक ही सीमित रहता है पर यह घरेलू हिंसा कानून तो किसी को भी लपेटे में ले सकता है।
उक्त बहस में पहली बीवी की शादी की वैधानिकता पर सवाल उठाने वाले बहुत जोखिम ले रहे थे। एक पुराने अभिनेता की शायद मुराद थी कि क्रिकेटर की शादी दूसरी वाली लड़की से हो जाये इसलिये उसने पहली वाली पर सवाल उठाया कि ‘निकाह नामे में गवाहों की वल्दियत है पर दूल्हा दुल्हन का नाम नहीं है। इसलिये यह शादी नहीं मानी जा सकती।’
यह निकाहनामा दूल्हे ने पाकिस्तान में बनवाया था। मुस्लिम कानून के हिसाब से यह शादी अवैध भी होती तो भी वह घरेलू हिंसा के आरोप से बच नहीं सकता था उल्टे यही उसके खिलाफ सबूत भी बन सकता था कि उसने चालाकी की। बात यहीं नहीं रुकती। पीड़ित लड़की अगर उस समाचार की सीडी वगैरह लेकर अदालत में सीधे ‘घरेलू हिंसा’ का मामला दूल्हे पर दायर करती और साथ में अभिनेता का भी नाम यह कहते हुए देती कि यह भी हैं हमारे पाकिस्तानी क्रिकेटर मियां के भारतीय अभिनेता समर्थक।’ तब उनके लिये मुश्किल हो सकती थी। बाद में फैसला चाहे जो भी होता पर फिलहाल उनको अदालत में तो जाना ही पड़ सकता था।
कुछ मुल्ला मौलवी भी पहली बीवी के निकाह पर शक कर रहे थे पर यह उनके लिये परेशानी का कारण बन सकता था। कारण दहेज निरोध तथा घरेलू हिंसा कानून ऐसे हैं जिनमें किसी धर्म की पुस्तक का अध्ययन शामिल नहीं है। यही सही है कि इन कानूनों का दुरुपयोग इसलिये न्यायाधीश तथा पुलिस वाले बहुत सतर्कता पूर्वक विवेचना कर निर्णय तथा कार्यवाही करते हैं पर अगर उनको यकीन हो जाये कि महिला वाकई पीड़ित है तो उसके बाद जो होता है वह अभियुक्त के लिये तकलीफदेह हो सकता है।
इस प्रसंग में एक दिलचस्प बात पता चली कि पाकिस्तान में भी एक कानून है कि पहली पत्नी के रहते दूसरा विवाह करने पर वहां एक साल की सजा है। अनेक गैर मुस्लिम यहां ऐसा कानून न होने पर आपत्तियां कर रहे हैं। उनको शायद अंदाजा नहीं है कि घरेलू हिंसा तथा दहेज निरोध कानून ऐसे हैं जिनके चलते ऐसा कानून न होना कोई मायने नहीं रखता। अभी तक मुस्लिम समाज को लेकर अनेक ऐसे प्रायोजित समाचार और बहसें सुनने में आती हैं जिनका निष्कर्ष कुछ नहीं निकलता। मुल्ला मौलवी भी वहां आकर अपने धार्मिक कानून की वकालत करते हैं। अब उनके पास ऐसे अवसर आये तो वह पहले इस बात की तहकीकात कर लें कि जिस बहस में वह जा रहे हैं वह तथा जिस समाचार के लिये हो रही है वह प्रायोजित है। यह भी पक्का कर लें कि वह न्यायालय में नहीं जायेगा। कहने का आशय यह है कि नकली मुठभेड़ हो। अगर कहीं असली वाक्या हुआ और वह इसी तरह ही बयानबाजी करते रहे, उधर कोई महिला अत्यंत दुःखी है और इस तरह का अपमान होने पर वह क्रुद्ध हो उठी तो यह दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा ऐसे कानून हैं कि उनको भी दायरे में वह पति उसके परिवार तथा सहयोगियों को भी ले सकती है। वैसे मुस्लिम महिलाओं की स्थिति देखते हुए ऐसी संभावना कम ही लगती है क्योंकि अभी भी मुस्लिम महिलायें सामाजिक शिकंजे में फंसी है जो मुक्त है वह ऐसे प्रायोजित प्रचारकों के दायरे बाहर रहती हैं।
यह सही है कि मुसलमानों के लिये अलग से व्यक्तिगत कानून हैं पर दहेज एक्ट तथा घरेलू हिंसा कानून आने से महिलाओं पर दबाव बनाये रखने की मुस्लिम शिखर पुरुषों की शक्ति अब वैसी नहीं रही। वैसे इन दोनों कानूनों में अधिकतर मामले हिन्दू समाज के ही दर्ज होने का अनुमान लगता है-सच का पता किसी को नहीं है-पर उस पाकिस्तानी दूल्हे की एक लड़की से बेवफाई तथा दूसरी से प्यार के नाटक में ‘घरेलू हिंसा’ कानून का उल्लेख होने के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। सो न केवल बहसों से बचें बल्कि मियां बीवी के निजी मसलों पर लिखित रूप से भी न कहें क्योंकि उसका इस्तेमाल सबूत के रूप में किसी महिला को पीड़ित करने में सहयोग करने के आरोप को सिद्ध करने में हो सकता है। यह लेखक न वकील है न इसे कोई धार्मिक प्रचारक, केवल इधर उधर देखे गये मामलों पर यह लिखा गया है। इसका पाठ का एक उद्देश्य अपने मुस्लिम समुदाय के पाठकों को यह समझाना भी है कि वह देशकाल की स्थिति को देखकर ही आगे चलें। जहां तक हो सके अपने घर की महिलाओं के प्रति सद्भाव रखें तथा दूसरे के पारिवारिक झगड़ों में पंचायत करने से बचें क्योंकि यह उनके लिये परेशानी का कारण बन सकता है। अब पुराना समय नहीं रहा और न चाहते हुए भी उनको अपनी सोच बदलनी होगी।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
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हिंदी अध्यात्म सन्देश-बुरे काम से दूर होकर ही अच्छाई समझना संभव (hindu adhyatm sandesh)


अर्थसिद्धि परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत्।
न हि धर्मदपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम्।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में अर्थ प्राप्त करने की इच्छा है उसे धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करना चाहिए। जिस तरह स्वर्ग से अमृत दूर नहीं होता उसी प्रकार धर्म से अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता।

यस्यात्मा विरतः पापाद कल्याणे च निवेशितः।
तेन स्र्वमिदं बुद्धम् प्रकृतिर्विकृतिश्चय वा।।
हिंदी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिसकी बुद्धि पाप से परे होकर कल्याण के मार्ग पर आ जाये वह इस संसार में हर वस्तु कि प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह से जान लेता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह कहना गलत है धर्म के मार्ग पर अर्थ की प्राप्ति नहीं हो सकती। धर्म-ईमानदारी, सहजता, परमार्थ, और अपने कर्तव्य से प्रतिबद्धता-का परिणाम ही अर्थ की प्राप्ति ही है। यह अलग बात है कि जल्दी अमीर बनने या आवश्यकता से अधिक धनार्जन के के लिये लोग अपने जीवन में आक्रामक और बेईमानी की प्रवृत्ति अपना लेते हैं। इस संसार में ऐसे लोग भी है जो बेईमानी से धन कमाकर कथित रूप से प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व का आकर्षण समाज के युवाओं को आकर्षित करता है पर उनको यह समझ लेना चाहिये कि बेईमान और भ्रष्ट लोगों को धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल की शक्ति की वजह से सामने कोई कुछ नहीं कहता पर पीठ पीछे सभी लोग उनके प्रति घृणा का भाव दिखाने से नहीं चूकते। फिर भ्रष्ट और बेईमान लोग का धन जिस तरह बर्बाद होता है उसे भी देखना चाहिये।

नीति विशारद विदुर जी के अनुसार जिस व्यक्ति ने ज्ञान प्राप्त कर लिया वह इस संसार में व्यक्तियों, वस्तुओं और स्थितियों की प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह समझ जाते हैं। इस ज्ञान से वह विकृतियेां से परे रहने में सफल रहते हैं और प्रकृतियां उनका स्वतः ही मार्ग प्रशस्त करती हैं।
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विदुर दर्शन-सात्विक कार्य सिद्ध न हो भी चिंता नहीं


मिथ्यापेतानि कर्माण सिध्येवुर्यानि भारत।
अनुपायवुक्तानि मा स्म तेष मनः कृथाः।।
हिंदी में भावार्थ-
मिथ्या उपाय से कपट पूर्ण कार्य सिद्ध हो जाते हैं पर उनमें मन लगाना ठीक नहीं है।
तथैव योगविहितं यत्तु कर्म नि सिध्यति।
उपाययुक्तं मेधावी न तव्र गलपयेन्मनः।।
हिंदी में भावार्थ-
अच्छे और सात्विक प्रयास करने पर कोई सत्कर्म सिद्ध नहीं भी होता है तो भी बुद्धिमान पुरुष को अपने अंदर ग्लानि नहीं अनुभव करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर आपने सुना होगा कि प्यार और जंग में सब जायज है-यह पश्चिम से आयातित विचार है। जीवन की तो यह वास्तविकता है कि जैसा कर्म करोगे वैसा परिणाम सामने आयेगा। जैसा मन में संकल्प होगा वैसे ही यह संसार हमारे साथ व्यवहार करेगा। अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में मनुष्य इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे अपने कर्म की शुद्धता और अशुद्धता का बोध नहीं रहता। इसी कारण वह ऐसे उपायों का भी सहारा लेता है जो अपवित्र और अनैतिक हैं। फिर उसको अपनी बात के प्रमाण रखने के लिये अनेक प्रकार के झूठ भी बोलने पड़ते हैं। इस तरह वह हमेशा पाप की दुनियां में घूमता है। मगर मन तो मन है वह उसकी तृप्ति के लिये भक्ति और साधना का ढोंग भी करता है। इससे प्रकार वह एक ऐसे मायाजाल में फंसा रहता है जिससे जीवन भर उसकी मुक्ति नहीं होती।
इसलिये अपने जीवन में अच्छे संकल्प धारण करने के साथ ही अपने कार्य की सिद्ध के लिये पवित्र और नैतिक उपायों की ही सहायता लेना चाहिए।

बाकी लोग किस रास्ते पर जा रहे हैं यह विचार करने की बजाय यह देखना चाहिए कि हमारे लिये उचित मार्ग कौनसा है। इसके अलावा यह भी एक अन्य बात यह भी है कि अगर हमारा कोई पवित्र और सात्विक कर्म अपने उचित उपाय से सिद्ध नहीं होता तो भी परवाह नहीं करना चाहिए। याद रखें कार्य सिद्ध होने का भी अपना एक समय होता है और जब आता है तो हमें यह भी पता नहीं लगता कि वह काम कैसे पूरा हुआ।
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श्रीगीता संदेश -दूसरे धर्म का परिणाम सदैव भयावह रहता है


श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।
हिंदी में भावार्थ-
श्रीगीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि अपने धर्म से पराया धर्म श्रेष्ठ लगता है तब उसको कभी श्रेय न प्रदान करें। अपना धर्म संपन्न नहीं दिखता पर दूसरे का धर्म तो हमेशा भयावह परिणाम देने वाला होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर लोग धर्म को लेकर बहस करते हैं पर उसका मतलब नहीं समझते। हर टीवी चैनल, अखबार और पत्रिका को उठाकर देख लें धर्म को लेकर तमाम सतही बातें लिखी मिल जायेंगी जिनका सार तो विषय सामग्री प्रस्तुत करने वाले स्वयं नहीं जानते न ही पाठक या दर्शक समझने का प्रयास करते हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि धर्म बिकने, खरीदने, और लाभ हानि वाली व्यापारिक वस्तु हो गयी है। अनेक प्रचार माध्यम बकायदा धर्मपरिवर्तित कर जिंदगी में भौतिक उपलब्धि प्राप्त करने वाले लोगों का प्रचार करते हैं। इतना ही नहीं धर्म परिवर्तित कर विवाह करने पर लड़कियों को वीरांगना करार दिया जाता है। यह केवल प्रचार है जिससे बुद्धिमान भारतीय तत्व ज्ञान से दिखने वाले कटु सत्यों से भागते हुए करते हैं क्योंकि भारतीय अध्यात्म ज्ञान जीवन के ऐसे रहस्यों को उद्घाटित करने के सत्यों से भरा पड़ा है जिसको जानने वाला धर्म न पकड़ता है न छोड़ता है।
हमारे भारतीय अध्यात्म में स्पष्ट रूप से धर्म को कर्म से जोड़ा गया न कि कर्मकांडों से। कर्मकांडों और रूढ़ियों को लेकर भारतीय धर्मों की आलोचना करने वाले मायावी लोग उस तत्व ज्ञान को जानते नहीं है पर उनको यह पता है कि अगर उसका प्रचार हो गया तो फिर उनकी माया धरी की धरी रह जायेगी।
एक मजे की बात है कि धर्म परिवर्तित दूसरा धर्म अपनाने वाली युवतियां विवाह कर लेती हैं इसमें बुराई नहीं है पर उसके बाद उनको जब दूसरे धर्म के संस्कार अपनाने पड़ते हैं तब उन पर क्या गुजरती है इस पर कोई प्रकाश नहीं डालता। दरअसल फिल्मों की कहानियों को केवल विवाह तक ही सीमित देखने वाले बुद्धिजीवी उससे आगे कभी सोच ही नहीं पाते। यही कारण है कि विवाह के बाद जब पराये धर्म के कर्मकांडों को मन मारकर अपनाना पड़ता है तब उन युवतियों की क्या कहानी होती है इस पर कोई भी आज का महापुरुष नहीं लिखता।
दरअसल धर्म दिखाने या छूने की वस्तु नहीं बल्कि हृदय में की जाने वाली अनुभूति है। बचपन से जिस धर्म के संस्कार पड़ गये उनसे पीछा नहीं छूटता विवाह या अन्य किसी भौतिक प्राप्ति के लिये धर्म परिवर्तन तो लोग कर लेते हैं उसके बाद जो उनपर तनाव आता है उसकी चर्चा भी गाहे बगाहे करते हैं। एक मजे की बात है कि कथित आधुनिक लोग धर्म परिवर्तन करते हैं पर उसके साथ अपना नाम और इष्ट भी परिवर्तित कर लेते हैं। मतलब वह दूसरे धर्म के के बंधन को ओढ़ते है और दावा आजादी का करते हैं। सच बात तो यह है कि धर्म का आशय सही मायने में भारतीय अध्यात्म में ही है जिसका आशय है कि बिना लोभ लालच और कामना के भगवान की भक्ति करते हुए जीवन व्यतीत करना न कि उनके वशीभूत होकर धर्म मानना। दूसरी बात यह है कि धर्म परिवर्तित करने वाले अपनी पहचान गुम होने के भय से अपना पुराना नाम भी साथ लगाते हैं। दूसरे के धर्म के क्या कर्मकांड हैं किसी को पता नहीं होता? इसलिये उस धर्म के लोग मजाक उड़ाते हैं जिसे अपनाया गया है।

संत कबीरदास और चाणक्य भी कहते हैं कि दूसरे धर्म या समुदाय का आसरा लेना हमेशा दुःख का कारण होता है। किसी भी व्यक्ति या समाज को बाहर से देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि उसका धर्म कैसा है या वह उसे कितना मानता है। वह तो जब कोई नया आदमी धर्म परिवर्तन कर उस धर्म में जाता है तब उसे पता लगता है कि सच क्या है? इसके बावजूद यह सच है कि दूसरा धर्म नहीं अपनाना चाहिये क्योंकि उससे तनाव बढ़ता है। हालांकि आजकल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्षा लाभों के लिये अनेक लोग धर्म बदल लेते हैं। वह भले ही दावा करें कि उनको ज्ञान प्राप्त हुआ है पर यह झूठ है। जिसे ज्ञान प्राप्त होता है वह धर्म से परे होकर योग साधना, ध्यान और भक्ति में रहते हुए निष्काम कर्म और निष्प्रयोजन दया करता है न कि धर्म छोड़ने या पकड़ने के चक्कर में पड़ता है।
हां एक बात महत्वपूर्ण है कि भारतीय धर्म व्यापक दृष्टिकोण वाले होते हैं क्योंकि इसमें किसी प्रकार की भाषा या उस पर आधारित नाम या कर्मकांड की बाध्यता नहीं होती। हमारा श्रीगीता ग्रंथ दुनिया का अकेला ऐसा धर्म ग्रंथ है जिसमें ज्ञान के साथ विज्ञान की भी चर्चा है। इसमें निरंकार परमात्मा की निष्काम भक्ति के साथ ही अन्य जीवों पर निष्प्रयोजन दया करने का भी संदेश है। यह मनुष्य को विकास की तरफ जाने के लिये प्रेरित करने के साथ विनाश से भी रोकता है।
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