Tag Archives: hindi literture

खबरों में हमदर्द-व्यंग्य कविता (khabron men hamdard)


ज़माने में नफरत पैदा करने का सौदा
उन लोगों ने किया
जिनके जिम्मे अमन लाने का काम था।
अगर ऐसा नहीं करते
तो खाली हाथ बैठे रहने के इल्जाम में फंसते
इसलिये कातिलों को बुला लिया
मरने वालों के घर के बाहर मजमा लगा लिया
खबरों में हमदर्द के रूप में इसलिये उनका ही नाम था।
————

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

—————————–
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Advertisements

अपने लिखे का पीछा न करें-हिन्दी लेख


एक लेखक के रूप में अंतर्जाल पर एक विचित्र प्रकार की अनुभूति होती है। दरअसल लेखन एकदम नितांत एकांत का विषय है। अगर कोई लेखक अपने भावों को विभिन्न विद्याओं में लिखते रहने के अभ्यस्त हैं तो फिर उसे इस बात की परवाह नहीं रह जाती कि कोई उसके लिखे को सराह रहा है या धिक्कार रहा है क्योंकि वह एक रचना के बाद दूसरी लिखने लग जाता है। सामान्य तौर पर पत्र पत्रिकाओं में लिखी रचना की पाठकों से प्रत्यक्ष रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं आती इसलिये लेखक को यह पता नहीं लगता कि उसकी रचनाऐं किस तरह की हैं पर अंतर्जाल पर पाठकों के लिये टिप्पणियां लिखने की व्यवस्था है जिससे लेखक को अनेक बार उनसे रूबरू होना पड़ता है। यह बुरा नहीं है क्योंकि इससे आपको अपने स्तर और विचारों की प्रमाणिकता के बारे में अनुभूतियां होती हैं। दूसरी बात यह है कि अन्य लेखक टिप्पणियां देते हैं जिनकी आप चाहें तो कोई भी पाठ लेखक उपेक्षा कर सकता है पर यह उचित नहीं है। इसकी वजह यह है कि लेखक तो स्वयं ही जिज्ञासु होता है और जब उसे यह पता लगता है कि अमुक टिप्पणीकार भी लेखक हैं तो स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति के चलते वह उससे संपर्क करना चाहता है-उसके पाठ पर टिप्पणी लिखकर या फिर उत्तर देकर। कहीं कहीं टिप्पणियां लिखने का दौर गोष्ठियों के स्वरूप ले लेता हैं। यह सब अच्छा लगता है।
इसके बावजूद मुश्किल तब शुरु होती है जब अपनी अन्य व्यवसायिक या घरेलू व्यस्ततओं के चलते किसी ब्लाग लेखक के पास लिखने के अलावा दूसरी बातों के लिये समय निकालना मुश्किल हो जाता है। तब किसी भी ब्लाग लेखक दूसरे लेखक अहंकारी या स्वांत सुखाय कहकर आलोचना कर सकते हैं।
दूसरी बात यह भी है कि हम इन टिप्पणियों को गोष्ठी के रूप में समझें तो भी यह एक सच है कि अनेक ऐसे लेखक हैं जो लिखने से इतर गतिविधियों से दूर रहने के कारण इनसे दूर रहते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि वह लिखते खूब हैं पर उसे छपने या सुनाने का अवसर उनको कम ही मिल पाता है। जो लिखते कम हैं और छपते ज्यादा हैं और उनको लेखक या कवित के रूप में कार्यक्रम खूब मिलते हैं उनकी रचनायें सामयिक अधिक होती हैं जो एक समय के बाद अपना महत्व खो बैठती हैं। प्रचार की वजह से उनको नाम खूब मिलता है पर इसी कारण ही अनेक वर्षों से हिन्दी में प्रभावकारी लेखन न होने की शिकायत पैदा हुई है।
इधर अंतर्जाल पर एक ऐसा जरिया मिला है जिसमें किसी लेखक को किसी प्रकाशक, कथित समाजसेवी या साहित्यक पितृपुरुष की दासता की आवश्यकता नहीं है तब लेखन को व्यसन की तरह अपनाने वाले लेखकों के लिये ब्लाग लेखन मौज और मस्ती के साथ अपनी अभिव्यक्ति करने का एक रोचक साधन है। जैसा कि पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है कि गोष्ठियों या साहित्यक मंचों से दूर रहने वाले यहां भी इसी राह पर चलेंगे तो उनको यहां भी एकांत भोगना पड़ेगा। अगर कोई सोचता है कि उसके लिखे पर हजारों लोग प्रतिक्रियायें देंगे तो यह उसका वहम है। संभव है शुरुआत में अधिक टिप्पणियां आयें पर एक समय ऐसा भी आ सकता है कि वहां शून्य दर्ज हो।
ऐसे में व्यसनी लेखकों को इस बात की टिप्पणियों की परवाह वैसे ही छोड़नी होगी जैसे गोष्ठियों या साहित्यक मंचों में वाह वाह का मोह छोड़ना पड़ता है। अपना लिखें, चाहें जितना लिखें, दूसरों का पढ़ें चाहें जितना पढ़ें और टिप्पणियां लिखें या नहीं पर अपना मुख्य उद्देश्य लिखना होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अपने लिखे के के निर्णायक स्वयं न बने। अगर टिप्पणी वाह वाह कहने वाली हो तो फूलें नहीं और घटिया कहने वाली हो तो घबड़ायें नहीं। सच बात तो यह है कि यहां जिनको लिखने का सलीका नहीं है उनको पढ़ने का भी सलीका नहीं है।
एक दिलचस्प बात यह है कि इस अंतर्जाल पर कुछ गज़ब के लेखक हैं। उनका भाषा ज्ञान गज़ब का है। इतना कि अच्छा खासा लेखक अपने भाषा ज्ञान पर शरमा जाये। उनकी प्रस्तुतियां भाषा और शैली के लिहाज से इतनी आकर्षक होती हैं कि लगता है कि हम भी उनकी तरह लिखें मगर मुश्किल यह है कि जब आप अपने विषय में डूबे होते हैं तब ऐसा नहीं कर पाते क्योंकि तब भावों के अनुसार शब्द स्वयं बाहर आते जाते हैं। मगर उन लेखकों के साथ समस्या यह होती है कि वह भौतिक संसार के सच के इतने निकट पहुंच जाते हैं कि वह उनमें कल्पनाशीलता का एकदम अभाव हो जाता है। समसामयिक विषय पर अच्छा लिखने के बावजूद वह लेखक की तरह कल्पनाशील नहीं हो पाते। एक तरह से साहित्यकनुमा पत्रकार लगते हैं। ऐसे लोगों से भी सीखना चाहिये क्योंकि उनके लेखक का स्तर कम से कम आज के अनेक प्रख्यात लेखकों से कहीं बेहतर है।
उनको देखकर कुंठायें पालने से अच्छा है कि स्वयं अपनी अभिव्यक्ति को बाहर आने दें। दूसरी बात यह कि अपने लिखे का पीछा न करें। लोगों को अच्छा लगा या नहीं इस बात से अधिक आप यह देखें कि आपने प्रयास कैसे किया? अंतर्जाल पर एकदम सफलता नहीं मिल सकती पर आप आपने कदम जैसे जैसे बढ़ाते जायेंगे आपके पाठों का वजन बढ़ता जायेगा। आज नहीं तो कल उसे निंरतर पढ़ा ही जाता रहेगा। किताबों में छपकर किसी अल्मारी में बंद नहीं रहेगा।
———–

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका