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जीते जी अमर होने का सुख-हिन्दी हास्य कविता (jivan mein amar hone ka sukh-hindi hasya kavita)


समाजसेवक जी पहुंचे
अपने गुरु के पास और बोले
‘‘गुरुजी,
बरसों से समाज सेवा का स्वांग रचाया,
खूब कमाई की
मेरा घर महल जैसा हो गया
तो आपका आश्रम भी
फाइव स्टार जैसा सजाया,
मगर यह कमबख्त
जीते जी अमर होने की इच्छा
कभी पूरी न कर पाया,
उसके लिये गरीबों का भला
करते हुए मरना जरूरी है,
पर आप जानते हैं कि
मेरी जिंदगी परिश्रम से कितनी दूरी है,
फिर मैं अमरत्व का सुख
जीते जी देखना चाहता हूं
इसका कोई उपाय मुझे नजर नहीं आया।’सुनकर मुस्करायें गुरुजी
और बोले
‘‘भईया,
अगर अमरत्व पाना है
तो जरूरी यहां से मरकर जाना है,
फिर भी अमरत्व का सुख भोगना है
तो अपने सभी कार्यालयों में
अपनी मूर्तियां स्थापित करवाओ,
चंदे में आया पैसा उस पर खर्च करो
बैंक खाते भरने की इच्छा से मुक्ति पाओ,
अपने जन्म दिन पर
हर साल केक काटा करो,
बाकी सारे काम को टाटा करो,
अमरत्व का सुख अपने जीते जी भोगने का
यही उपाय हमारी समझ में आया,
बाकी यह बात तय है कि
मरने के बाद कोई तुमको याद करे
ऐसा कोई काम तुम्हारे हाथ से होकर
हमारे सामने नहीं आया।’’

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior
writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior

तन्हा लगा पूरा ज़माना- हिन्दी कविता


अपनी तन्हाई दूर करने के लिये
कई दरवाजे हमने खटखटाये,
बांटने चले थे अपने ग़म हम जिनके साथ
उनके दर्द अपने साथ और ले आये।
दिल को बहलाने के सामानों में
लोग हो गये मशगूल
शिकायत करो तो
खिलौने खरीदने पर
अपनी चुकाई कीमतों के पैमाने बताते हैं,
मुलाकाती ढूंढते हैं रुतवा दिखने के लिये
भले ही अकेलेपन के अहसास उनको भी सताते हैं,
जहां भी जज़्बातों का समंदर ढूंढा हमने
तन्हा लगा पूरा ज़माना
हमदर्दी के लिये सभी प्यासे नज़र आये।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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महंगाई में भलाई-हास्य कविताएँ (mehangai men bhalai-hasya kavieaen


महंगाई को सस्ता समझ लिया,
विकास का उसे बस्ता समझ लिया,
अक्ल लेकर उधार की
चला रहे है भलाई करने की दुकान,
अपने घर आ रही दौलत का
बस, केवल एक रस्ता समझ लिया।
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जिनके पेट भरे हैं पकवानों से,
सजी हैं घर की महफिलें धनवानों से,
वह महंगाई से टूट रहे
लोगों का क्या दर्द समझेंगे।
बाज़ार से खरीदकर हथियार
करते हैं अल्मारी में बंद
वह पहरेदार
हिफाजत के लिये क्या लड़ेंगे।
जुबां से निकल रहे गरजते हुए बयान,
दिल में है बस,
अपनी दौलत, शौहरत और ताकत का ध्यान,
अपनी वातानुकूलित कारों का आराम छोड़कर
आम इंसान की तकलीफ का सच समझने के लिए
उबड़ खाबड़ सड़कों पर क्या पांव धरेंगे।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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