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सच और झूठ का द्वंद


एक झूठ सौ बार बोला जाये
तो वह सच हो जाता है
और एक सच सौ बार
दुहराया जाये तो
मजाक हो जाता है
सच होता है अति सूक्ष्म
विस्तार लेते वृक्ष की तरह
कई झूठ भी समेटे हुए
वटवृक्ष बन जाता है
कौनसा पता झूठ का है
और कौनसा सच का
पता ही नही लग पाता है
लोग पते पकडे हाथ में ऐसे
मानो सच पकडा हो
भले ही झूठ ने उनकी बुद्धि को जकडा हो
जिनके पास सच है
उनको भी भरोसा नहीं उस पर
जिन्होंने झूठ को पकडा है
वह भी अपने पथ को सच
मानकर चलते हैं उस पर
सदियों से चल रहा है द्वंद
सच और झूठ का
इसका अंत कहीं नहीं आता है।
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जंग में पिसता है आम आदमी


एक कहे  आजादी की  जंग
दूसरा दे उसे आतंक का रंग
आम आदमी ही होता है तंग
नहीं होता वह पूर्व और पश्चिम के संग
जानता है  अपने की हो या पराये की
उसके सीने की और ही होता है
संगीन का  निशाना
आजादी और आतंक तो बस होता है  बहाना
अपनी  राजनीतिक आजादी की चाह तो
गांधी जी की राह क्यों नहीं चलते
जानते नहीं क्या हथियारों के उपयोग से
उनके विरोधी के ही पेट पलते
अब तो सूचना का जाल चारों और
बिछ गया
पल-पल की खबर मिलते है  
आम आदमी को इसलिए ही
बेतुकी लगती है 
चाहे वह आजादी की या
आतंक के ख़िलाफ़ हो जंग
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दिल के सोच जैसी होगी दुनिया


मन का खोखलापन
तन को रुग्ण कर देता हैं
विचारों की कलुषिता से
अपना दिल ही बैचेन कर देता है
हम अपने ही दायरों में कैद हो जाते हैं

जैसा ख़्याल दिल में होगा
वैसा ही दृश्य हमारे सामने
हर हाल में प्रकट होगा
ख्वाब देखना ठीक है
पर अगर पूरे न हौं तो
देखने वाले तकलीफ उठाएँ जाते हैं

जैसी सोच होती है
वैसी ही दुनिया सामने नजर आती है
कुछ अच्छा और बुरा नहीं
नजरिया जैसा होता है
वैसे ही अहसास हो जाते हैं

इसलिये जैसी दुनिया
देखना चाहते हो
वैसी ही सोच के साथ चलो
ख़्वाबों और ख्यालों में
कुछ खूबसूरत नजरिये
जोड़ते हुए उनके साथ ढलो
जिन्दगी का सफर तो सभी काटते हैं
कुछ रोते कराहते गुजारते हैं
जो हँसते, गुनगुनाते और अपनी
हकीकतों से करते हैं दोस्ती
वही सुख के पल जीं पाते हैं

आस्तिक-नास्तिक विवाद पर बेकार की बहस


माया की कृपा जिन पर होती है उन्हें भगवान् का वरदहस्त मान लिया जाता है. जितनी भगवान् की महिमा अनंत है उतनी ही माया की गाथा अनंत है. इस विश्व में कई ऐसे लोग हैं जो पद, प्रतिष्ठा और पैसे की उपलब्धियों के शिखर पर हैं पर भगवान को नहीं मानते हैं न पूजते हैं. उन लोगों को पूजना भी नहीं चाहिए और उनके नास्तिक विचार पर किसी को आपत्ति भी नहीं करना चाहिए. आखिर हर आदमी भगवान् की पूजा क्यों करता है? माया की कृपा हो इसलिए ही न! कहीं नमन कर तो कहीं ऊपर हाथ उठाकर आखिर आदमी और क्या चाहता है! इस दुनिया में दैहिक और भौतिक सुख ही न!

अब किसी के ऊपर माया मेहरबान हो तो लोग यहीं कहते हैं की भगवान् के मेहरबानी है. पर अगर कोई अपनी उपलब्धियों को अपनी मानता है तो उसे आखिर लोग क्यों जबरदस्ती कहलाना चाहते हैं कि भगवान की कृपा है.मेरे विचार से भक्ति के नितांत एक निजी मामला है. अपने देश में तो और भी अधिक मामला पेचीदा है. एक ही परिवार के पांच सदस्य अलग-अलग भगवानों की पूजा करते हैं और उनके आध्यात्म गुरु भी अलग होते हैं और बडे आराम से एक छत के नीचे रहते हैं. कभी एक दूसरे से नहीं कहते कि ‘तुम हमारे भगवान् को पूजो या हमारे गुरु को मानो’. सब जानते हैं कि यह निरंकार की उपासना का मार्ग हैं. जब लोग अपने घरों में ऐसे मामलों पर बहस नहीं करते तो बाहर विवाद खडा क्यों करना चाहते हैं.

इतिहास गवाह है की पूरे विश्व में आस्तिक और नास्तिक विचारधारा के लोग एक दूसरे की गर्दन तक उड़ा चुके हैं. ऐसी घटनाएं भारत में तो कम बाहर और भी ज्यादा हो चुकी हैं. पर यह उस समय की बात है जब मनोरंजन और आवागमन के साधन काम थे और लोग अपने सीमित दायरों में ही रहते और सोचते थे. उस समय भगवान् को मानने की चर्चा इसलिए अधिक थी क्योंकि काम कम था और समय अधिक. अब समय बदल गया है और ऐसे में आदमी जिन्दगी की धमा-चौकडी में इस कदर फंसा है की उसे यह पूछना अन्याय लगता है कि बता भगवान् है कि नहीं. घर और रोजगार के स्थानों के बीच की दूरी तय करते हुए आदमी का आधा दिन गुजर जाता है. रिश्तेदारी पहले की तरह अब घर के पिछवाडे में नहीं होती. कहीं से सन्देश आ जाये तो वहाँ पहुँचने के साधन की चिंता अलग से कंरनी पड़ती है. इस समय रेल मिलेगी कि बस. समय पर पहुँचेगे कि नहीं. तमाम तरह के घरेलू और सामाजिक तनाव अब ऐसे हैं कि भगवान् के अस्तित्व पर बहस करने का किसी को समय ही नही है.

जिसके मन में हैं वह समय निकाल कर मंदिर चला जाता है और जिसके पास नहीं है घर के अन्दर भी कर लेता है. कोई नहीं भी कर पाता इसका मतलब यह कतई नहीं है वह भगवान् को नहीं मानता-और जो मानता है वह कहने के लिए मानता है औरहृदय में धारण करता है कि नहीं यह पता नहीं लग पाता. ऐसे में जो नहीं मानता तो उससे भी इस बात के लिए बाध्य करना ठीक नहीं है बता-कैसे कहता है कि भगवान् नहीं है”.

अब तो आधुनिक योग में हमारे पास तमाम तरह की वैज्ञानिक जानकारी है और इस धरती के लोग अन्तरिक्ष में विचरण कर रहे हैं तब आस्तिक और नास्तिक पर बहस बेकार लगती है जो कर रहे हैं उनका एकमात्र उद्देश्य लोगों का ध्यान अपनी और आकर्षित करना है.

अगड़म-बगडम लिखते तो हिट हो जाते


पहले ब्लॉगर ने उसी मित्र से दूसरे ब्लॉगर का पता निकाला। उससे पता लगा कि वह उसके पास में स्थित गाँव में ही रहता है। दरअसल पहले ब्लॉगर का घर भी शहर के बाहर कालोनी में था, और वह गाँव उससे बहुत ज्यादा दूर नहीं था। पहला ब्लॉगर कई बार उस गाँव में जा चुका था।

उसने साइकिल उठाई और वहां चल दिया। पक्की सड़क से होते हुए वह उस कच्ची सड़क की ओर मुड़ा जो उस गाँव की तरफ जाती थी । उसने मोड़ पर स्थित पहले मकान के बाहर मैदान पर घास खोद रहे व्यक्ति को देखा और साइकिल से उतरकर आवाज दीं । वह व्यक्ति उसके पास आया। बनियान और तहमद पहने उस व्यक्ति से उसने दूसरे ब्लॉगर का नाम बताते हुए उसके घर पूछा-‘क्या तुम उस जानते हो कहाँ रहता है।’

उस व्यक्ति ने कहा-‘इस नाम का कोई आदमी यहाँ नहीं रहता।आप गलत गाँव में आ गये हैं’

पहला ब्लोगर सोच में पड़ गया। उसे लगा कि उसके मित्र ने उसे धोखा दिया है-पर फिर लगा कि हो सकता है यह आदमी ही उसे नहीं जानता हो क्योंकि वह दूसरा ब्लॉगर उस गाँव का नहीं था शहर से उधारी वालों से परेशान होकर ही वह गाँव के बाहर ही कहीं रह रहा था-ऐसा ही उसके मित्र ने बताया था। फिर उसने उस आदमी को घूर कर देखा और कहा-‘अच्छा तो तुम हमें ही चलाने लगे। क्या बात है आज तुम मुझे ही नहीं पहचान रहे।”

वह दूसरा ब्लॉगर था। उसने भी उसे नहीं पहचाना था फिर उसके समझ में आया और बोला-‘अच्छा तो तुम हो यार, मैं डर गया था की कोई गलत आदमी मेरा पता पूछ रहा है क्योंकि मुझे यहाँ कोई इस नाम से नहीं जानता। यहाँ मेरा दूसरा नाम है।”
पहले ब्लोगर ने कहा-‘दूसरा कि तीसरा?’
दूसरा बोला-‘चौथा। मैं अपने नाम बदलकर काम करता हूँ।इतनी संख्या है कि मुझे खुद याद नहीं रहता और तुम्हारा भी भेजा फ्राई हो जाएगा।’
पहला ब्लॉगर बोला-‘अच्छा किया जो नाम बदल लिया हैं नहीं तो उधार माँगने वाले परेशान करते।’
दूसरा ब्लॉगर-‘तुमसे किसने कहा?’’

पहला ब्लोगार-‘’किसी ने नहीं। मैने अनुमान किया।’

दूसरा ब्लॉगर-‘’कहो कैसे आना हुआ।”
पहले ने कहा-”सोचा तुमसे मिल लूँ ।”
दूसरा-”क्या घर पर कोई काम नहीं था।”
पहला- ‘मैं अपने काम सुबह जल्दी निपटा देता हूँ। जो काम तुम कर रहे हो घास काटने का वह मैं अपने गार्डन में सुबह ही कर चुका हूँ। इस समय तुमसे उस रिपोर्ट के बारे में पूछने आया हूँ जो मैने लिखी थी तुमने देखी कि नहीं?”

दूसरा ब्लॉगर-”मैने देखी थी , बहुत अच्छी थी । अब तुम यहाँ से चले जाओ। बडे दिनों बाद घर में एन्ट्री मिली है अगर तुम यहाँ रहे और मेरे घर के लोगों ने देख लिया तो हालत खराब हो जायेगी।”

इतने में गृह स्वामिनी बाहर आई और उसने पहले ब्लॉगर को नमस्ते की और अपने पति से बोली-‘भाई साहब को बिठाओ मैं इनके लिये चाय बनाकर आती हू।”

वह अन्दर चली गयी , पहला ब्लॉगर खुश हो गया और बोला-‘’ अगर चाय पिलाना है तो ठीक हैं, अन्दर चलते हैं। यहाँ कुछ गर्मी है।”

दूसरा ब्लॉगर-‘नहीं, बाहर ही बैठो। मैं अन्दर से कुर्सी ले आता हूँ। वैसे तुम्हें साइकिल पर देखकर वह समझी कि तुम कोई लेनदार हो। इसलिये चाय की पूछ लिया और मैं भी यूं सोच कर चुप रह गया कि तुम्हारा नमक खाया है।”

वह अन्दर गया और दो कुर्सिया ले आया।

पहले ब्लॉगर ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा-‘तुमने उस रिपोर्ट पर कमेंट नहीं दी ।’
दूसरा-‘मैने उसे पढा ही नहीं।”

पहला-‘पर तुमने अभी कहा था कि रिपोर्ट देखी थी।”
दूसरा-‘हाँ पर मैने यह कब कहा की मैने उस पढा है।?”

पहला-“तुमने कब देखी थी?

दूसरा –‘’तुमसे मिलने के अगली रात दस बजे को।

पहला-“पर मैने तो उसे रात को एक बजे प्रकाशित किया था।’
दूसरा-”अरे यार, तुम भी ऐसे ही हो। तभी मैं कहूं मुझे दिखाई क्यों नहीं दी। वैसे तुमने रात को एक बजे रिपोर्ट क्यों डाली, यह कोई टाइम है?”

पहला-”इसलिये कि घर में सब सो रहे थे।’

दूसरा-‘तुम यार इतना डरते हो?’
पहला-‘यह तुम कह रहे हो। मैं नहीं चाहता की मुझे तुम्हारी तरह कहीं ओर ठिकाने ढूंढने पडे।’

दूसरा-अच्छा छोड़ो, यह बताओ कि तुम्हारी रिपोर्ट हिट हुई या फ्लाप?
पहला-‘एकदम फ्लाप?”
दूसरा-‘तुमने रिपोर्ट् के बारे में अकडम्-बकडम लिखा कि नहीं? मैं अपनी भाषा में कहूं तो…………तुम्हारी भाषा में ही कहता हूं कि अभद्र शब्द…………लिखे कि नही”

पहला-‘यह क्या होता है? यह कौनसी विधा है।”
दूसरा-‘जब यह नहीं जानते तो लिखा क्या होगा? खाक! इसलिये तो रिपोर्ट फ्लॉप हो गयी ।अकडम-बकडम लिखते तो हिट हो जाते. ‘

पहला–‘यह करना जरूरी है।’

दूसरा-‘यह फ़ैशन है।”
पहला-‘यह में नहीं कर सकता।’

दूसरा-इसलिये तो तुम्हारा लिखा मेरी समझ में नहीं आता और कमेंट नहीं देता और तुम फ्लॉप हो। मेरी भाषा में लिखो तो मैं खूब कमेंट दूं।”

पहला ब्लोगर-‘तुम्हारी भाषा सीखने की मुझे जरूरत नहीं है, मैं तो तुम्हें यह बताने आया था कि भईया रिपोर्ट पढ लेना।’
दूसरा-‘अब क्या खाक पढ लेना। हो गयी पुरानी। वैसे किसी ने कमेंट दी।’
पहला-‘हां! जो मेरे दोस्त हैं उन्होने दी।’

दूसरा-‘ब्लोगरों से दोस्ती। वहां भला कोयी है दोस्ती लायक!’
पहला-‘हां, तुम ठीक कह्ते हो। सब भले लोग हैं, तुमसे दोस्ती करने लायक तो नहीं हैं।’
दूसरा-‘क्या मैं बुरा हूं। देखो मेरे मोहल्ले में आकर यह बद्तमीजी नहीं चलेगी। यह ठेका तो हमने ले रखा है। ऐसी कमेंट लिख जाऊंगा कि छोडो यार…..’

पहला-‘ऐसा सोचना भी नहीं। तुम्हें गलतफ़हमी है कि पहले की तुम्हारी तो गल्तिया माफ़ कर चुका हू, अभी तक तुमसे हिसाब बकाया है।’

दूसरा ब्लोगर गुस्से में उसे घूर रहा था फ़िर बोला-‘वह तो तुम्हारे छ्द्म नाम का ब्लोग था।

“पहला-“वह सब ठीक है, पर तुम अपने कहे पर लिखी रिपोर्ट पर कमेंट तो देते।”
दूसरा-“जब पढे ही नहीं तो क्या खाक देता?”
पहला-“तो अब पढ कर देना।’
दूसरा-पढ़ने के बाद तो मैं किसी को कमेंट नहीं देता।
‘पहला-‘तो बिना पढे ही दे देना।”
दूसरा-‘ यार तुम मेरे मुहल्ले में आकार मुझे तंग मत करो ,वरना ऐसे कमेंट दूंगा कि ……..छोडो यार।’
पहला- ”तुम्हारा मोहल्ला। गुरु तुम किस गलतफहमी में हो। हम दोनों का एक ही मोहल्ला है। इस गाँव में मैं कई बार आता हूँ और ज्यादा दूर नहीं है।’
इतने में एक बच्चा अंदर से चाय के दो कप ले आया और रख कर चला गया।पहले ब्लोगर ने तत्काल एक् कप उठा लिया तो दूसरा बोला कि-‘क्या यार घर से चाय पीकर नही चले थे क्या कि मेरे कहने से पहले ही कप उठा लिया।
‘पहला-“तुम उठाने के लिये कहते?’
दूसरा-“नही!”

पहला-“मुझे मालुम था। वैसे चाय अच्छी बनी है।”

दूसरा-हमारी पत्नी ने तुम्हें शहर से आया लेनदार समझ लिया इसलिये ऐसी स्पेशल चाय पिलाई है-और मैं भी तुम्हारे घर पर नाश्ता कर आया हूं इसलिये झेल रहा हूं।”

चाय पीने के बाद पहला ब्लोगर जाने के लिये तैयार हुआ तब दूसरा ब्लोगर बोला-‘यहां किसी को मत बताना कि मैं ब्लोग लिखता हूं। हम दोनों दोस्त हैं और एक ही मुह्ल्ले के हैं, यह भूलना नहीं।”
पहला ब्लोगर हंसते हुए बोला-‘पर तुम तो कह रहे थे कि ब्लोगर भला दोस्ती लायक होते हैं? साथ में मुह्ल्ला भी याद आने लगा। चलो कोयी बात नही, मैं उम्मीद करता हूं कि तुम जल्दी समझ जाओगे कि दोस्ती किसे कहते हैं?’

दूसरा-‘इस मीटिंग पर कब रिपोर्ट कब लिख रहे हो?’
पहला-कौंनसी मीटिंग………अच्छा यह। कल सुबह छः बजे।
दूसरा-‘इतनी सुबह क्यों?”
पहला-‘उस समय सब घर पर सोते हैं।”
पहला ब्लोगर वहां से साइकिल पर उठाकर चल दिया। आधे रास्ते पर उसे याद आया कि यह तो उसने बताया ही नहीं कि हास्य कविता लिखनी है या नहीं। फ़िर उसने अपने सिर को झटका दिया कि चलो इस बार भी हास्य कविता नहीं लिखते। अगली मीटिंग में पूछ्कर लिख लेंगे।
नोट-यह हास्य व्यंग्य है और इसके पात्र कल्पित हैं अगर किसी की खुराफात से मेल हो जाये तो लेखक जिम्मेदार नहीं है। इन पंक्तियों का लेखक कभी किसी दुसरे ब्लोगर से नहीं मिला है।