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जिंदगी में बदलते पलों का बयान-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं


पूरी जिंदगी का बखान क्या करें

यहां तो पल ही में माहौल बदल जाता है,

इंसान सुबह जाता है शवयात्रा में

शाम का बारात में जाने का आनंद पाता है।

कहें दीपक बापू किस पर खफा हों किसे करें सलाम,

रिश्ते मुंह फेर जाते अनजान लोग कर जाते काम

एक मंजिल के लिये जोड़ा कई लोगों ने वास्ता,

नये चेहरे आ जाते उधर पुराने बदल जाते हैं रास्ता,

कई लोगों ने फिर मिलने का वादा किया

क्या पहुंचते उनके पास जिनका पता बदल जाता है।

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शरीक के जख्म तो जाते हैं कभी न कभी,

दिल का दर्द ऐसा लगता जैसे चोट हुई हो अभी अभी।

कहें दीपक बापू लोग अपने जज़्बात नहीं समझते

दूसरों के क्या  समझेंगे

एक दूसरे को नीचे गिराने में लगे हैं सभी

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स्वयं सुनाते हैं वह लोगों को अपनी जिंदगी की कथायें,

अपनी तारीफ खुद करें दर्द के लियेे गैरों पार आरोप लगायें।

कहें दीपक बापू यह विज्ञापन का दौर है

 लोगों की हमदर्दी हासिल करने के लिये

अपनी हालातों का बुरा बयान करना पड़ता है,

अपनी तरक्की पर हर कोई सीना फुलाता

पिछड़ने का दोष दूसरे पर मढ़ता है,

बड़े भाषण से कोई असर नहीं होता

लोगों की भीड़ अपने पास लाने के लिये

चलने फिरने की बजाय केवल नारे लगायें।

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जादू से किसी का पेट नहीं भरता

न ही बीमारी की दवा बनती है,

फिर भी सिद्ध बन गये हैं हमदर्दी के व्यापारी

 जिनकी मलाई छनती है।

कहें दीपक बापू अक्ल का कमरा बंद कर चुके लोग

वादों में बहक जाते

सच कहो तो उनसे लड़ाई ठनती है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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