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कुछ क्रिकेट कुछ फिल्म-हिंदी व्यंग्य


      कुछ लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि ‘आप कंप्यूटर पर इतना कैसे लिख लेते हैं? हमें कोई इसका जवाब नहीं सूझता।  सच बात तो यह है कि हमारे जैसे लोगों में इधर उधर की फालतु निंदा परनिंदा वाली बातों में समय बरबाद  करने की बजाय स्वस्थ मनोरंजन की चाहत होती है जिसके पूरा न होने पर वह स्वयं ही मनोरंजन का सृजन करने लगते हैं।  जब क्रिकेट की बातें हमारे दिमाग में भरी हुईं होती थीं उस दौर में हमारा लेखन कम हो गया था।  बाद में जब इसमें फिक्सिंग की बातें सामने आयी तो मन उचट गया।  उसी समय इंटरनेट कनेक्शन लिया था और पता नहीं यह ब्लॉगर और वर्डप्रेस के   ब्लॉग हमारे हाथ आ गये।  हमें पता नहीं था कि यह ब्लॉग हमें कहां ले जाने वाले हैं।  यकीनन वह क्रिकेट की जगह ले रहे थे।  यही कारण की इन पर हमारी शुरुआती रचनायें क्रिकेट का मखौल उड़ाने वाली थी।

      सच बात तो  है कि अब तो हम यह मानने लगे हैं कि क्रिकेट कोई खेल नहीं है वरन् यह एक व्यवसाय है।  हमने यह देखा कि जब क्रिकेट का आकर्षण चरम पर था तब अनेक जगह इसका मनोरंजन की तरह वैसे ही आयोजन किया जाता जैसे फिल्मी गानों का आयोजन होता है।  गानों के कार्यक्रम में समस्या यह होती है कि जिसे गाना आता है वही माइक पर गा सकता है और बाकी लोगों को श्रोता बनना पड़ता है।  एसे में दर्शकों को गाना न आने का मलाल तो रहता ही है। क्रिकेट ने यह सुविधा दे दी कि इसे चाहे जो इसे खेल सकता है।  यही कारण है कि कहीं स्त्री- पुरुष, कहीं अधिकारी-कर्मचारी तो कहीं मालिक-नौकर के वर्ग बनाकर अवकाश के दिन मैच होते रहे।  जैसे ही फिक्सिंग के बाद क्रिकेट का आकर्षण कम हुआ यह सब बंद हो गया।

      हमारा मानना है कि क्रिकेट का आकर्षण अब न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है।  अगर अब यह चल रहा है तो केवल टीवी चैनलों की वजह से ही इसका अस्तित्व है।  बाज़ार और प्रचार प्रबंधक मिलकर क्रिकेट को पुनः लोकप्रिय बनाने का प्रयास कर रहे हैं।  इधर एक टीवी चैनल हिन्दी में भी कमेंट्री प्रसारित कर रहा है जो शुद्ध रूप से एक व्यवसायिक प्रयास है।  वरना तो क्रिकेट वाले भला कब हिन्दी बोलते हैं।  क्रिकेट के फिल्म जैसे ही मनोरंजक व्यवसाय होने का प्रमाण यह है कि पर्दे के अभिनेता अभिनेत्रियों जहां कहीं मैदान में इनाम लेते हैं तो  अंग्रेजी में ही बोलते है।  उनकी तरह  मैदान के खिलाड़ी भी  पर्दे पर आकर अंग्रेेजी में बोलते है। जो क्रिकेट में हिट हुआ उसका किसी किसी तरह से फिल्म के साथ नाता जुड़ ही जाता है।  सुपर क्रिकेट स्टार और सुपर फिल्म एक्ट्रेस के बीच इश्क का प्रायोजन कर उसे भी भुनाने के अनेक प्रयास हम देख चुके हैं।

       बाज़ार के उत्पाद बेचने के लिये फिल्म के अभिनेता और अभिनेत्रियों के साथ क्रिकेट के खिलाड़ी भी पर्दे पर उतरते हैं।  प्रचार प्रबंधक भी इनके साथ ऐसे ही जुड़े रहते हैं जैसे कि यह उनके अपने नायक हों।  क्रिकेट के मैदान पर कंपनियों के विज्ञापन बोर्ड पूरी कहानी बयान करते हैं। इसे समझने वाला कोई पाठक अर्थशास्त्री होना चाहिये।  जब बीसीसीआई की क्रिकेट टीम कभी कभी लगातार हारने लगती है तब कुछ आम क्रिकेट प्रेमी चिल्लाते हैं कि ‘उस खिलाड़ी को हटा दो’, ’उसे कप्तानी से हटा दो’ या ‘‘इस बॉलर को टीम में क्यों नहीं लिया, उस बल्लेबाज को क्यों रख लिया’, तब हमें हसंी आती है।  अब इन आलोचकों को यह कौन समझाये कि अगर क्रिकेट के खिलाड़ियों का चयन आम लोगों की दृष्टि से होगा तो कंपनियों के उत्पाद कौन खरीदेगा और कौन बेचेगा? कोई खिलाड़ी अगर किसी विज्ञापन में बना हुआ है और टीम से हटा दिया जाये तो जो उत्पाद का नुक्सान होगा उसे कौन भरेगा? पता नहीं भारत के आम क्रिकेट प्रेमियों को यह कैसा भ्रम है कि क्रिकेट खेल उनकी वजह से चल रहा है? भले ही कुछ क्रिकेट खिलाड़ी जो अब विशेषज्ञ बन गये हैं यह दावा करते हैं कि आम आदमी के लिये क्रिकेट खेला जा रहा है पर यह सच नहीं है। हां, कुछ क्रिकेट खिलाड़ी जरूर तारीफ करने लायक हैं जो कि मानते है कि  क्रिकेट खिलाड़ियों को अच्छा खेलना चाहिए ताकि दर्शकों का मनोरंजन हो।  स्पष्टतः वह इस तर्क को ही हवा देते हैं कि यह खेल नहीं वरन् मनोरंजन है। यह अलग बात है कि अगर उनसे कहा जाये कि यह मनोरंजन है खेल नहीं तो वह उखड़ भी सकते हैं।

       भारत और पाकिस्तान के रिश्ते बिगड़ते हैं तो क्रिकेट में सबसे पहले बिगड़ते हैं।  जब बनाने की बात आती है तो भी क्रिकेट मैच दोबारा खेलने से ही शुरुआत होती है।  भारत में कुछ लोग दावा करते हैं कि क्रिकेट में रिश्ते बढ़ाने से भारत पाकिस्तान की दोस्ती बढ़ेगी।  हैरानी होती है!  यह नुस्खा बीस सालों में पांच दस बार आजमाया जा चुका है पर कभी परिणाम पर खरा नहीं उतरा।  कभी कभी संगीत और फिल्म में भी इस तरह के संपर्क जोड़कर संबंध मधुर करने की  बात कही जाती है।  यह दोनों ऐसे व्यवसाय है जिनमें पैसा खूब है।  जब पाकिस्तान से भारत का रिश्ता खराब होता है तो चोट इन्हीं दो क्षेत्रों में होती है।  पाकिस्तान क्रिकेट टीम के साथ मैच न खेलने के साथ उसके गायकों और हास्य कलाकारों को मुंबई से भगा दिया जाता है।

       हमें इन चीजों से कोई लेना देना नहीं है पर  जब पाकिस्तान इन कदमों से हताश होता नज़र आता है उससे यही लगता है कि कहीं न कहीं उसके यहां के गायकों, नायकों और खिलाड़ियों के अलावा अन्य व्यवसायी भी  इससे लाभान्वित होते हैं।  इससे यह प्रमाण मिलता है कि क्रिकेट और फिल्म एक जैसे ही व्यवसाय है।  ऐसे में अगर बीसीसीआई की टीम कभी पाकिस्तान से हारती है तो वैसे ही अफसोस नहीं होता जैसे किसी फिल्म के पिट जाने पर कोई चिंता नहीं होती।  जीत जाती है तो भी हमें खुशी नहीं होती क्योंकि किसी की फिल्म हिट हो तो हमें क्या मिलता है।  क्रिकेट से हमारा ही नहीं अनेक मित्रों का मोह इतना भंग हुआ है कि अब तो वह क्रिकेट का नाम नहीं लेते पर हम जैसे लेखक के लिये यह भूलना कठिन होता है कि इस खेल ने हमारे पूरे पंद्रह वर्ष बरबाद किये। अगर हम क्रिकेट नहीं देखते तो यकीनन बहुत बड़े लेखक होते।

    पहले इस क्रिकेट ने दुःखी किया तो हमने मैच देखने बंद या कम किये पर अब तो समाचार हो या मनोरंजन चैनल वह कहीं न कहीं क्रिकेट का विज्ञापन कर रहा है।  पहले हम इच्छा से देखते थे पर अब यह जबरन हम पर थोपा जा रहा है।  पाकिस्तान से दोस्ती का तो नाम भर है, टीवी चैनलों के  विज्ञापन देखें तो पता चलेगा कि दुश्मनी को भुनाया जा रहा है।  ऐसे में चिढ आती है तब ऐसे व्यंग्य लिखने का मन करता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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सपने वह शय हैं-हिंदी कविता


सपने वह शय हैं

दिखाना जानो तो

लोग भूखे पेट भी सो जाते हैं,

फटेहाल हों जो लोग

सुंदर फोटो की तस्वीर दिखाओ

वह भी खुश हो जाते हैं।

कहें दीपक बापू

जिन्होंने लिया ज़माने को सुधारने का जिम्मा

उनके कारनामों पर

उंगली उठाना बेकार है

क्यों करें  वह अपने वादों को पूरा

लोग रोज नये लगाने वाले नारों पर

उनके पीछे दौड़ जाते है।

————– 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप

ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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रिश्ते बाज़ार में सजा दिए-हिंदी व्यंग्य कविता


चंद रुपयों के लिये उन्होंने

अपने रिश्ते बाज़ार में सजा दिये

फिर भी मन नहीं भरा

दोस्तों के राज सभी को बता दिये,

उनको चिंता इस बात की नहीं थी

अब वह अकेले हो जायेंगे,

खुशी थी कि लेकर कीमत

वह दौलत की बुलन्दियों पर छा जायेंगे,

इसलिये ऊंचे भाव लगा दिये।

कहें दीपकबापू समय समय की बात है

जिन संस्कारों पर उछलता था समाज

आजादी के नाम पर

मस्ती के लिये  सभी बहा दिये।
————–

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

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असली आनंद तो हृदय के अन्दर अनुभव किया जा सकता है-हिंदी चिंत्तन


                           हम जीवन में अधिक से अधिक आनंद प्राप्त करना चाहते है। हम चाहते हैं कि हमारा मन हमेशा ही आनंद के रस में सराबोर रहे।  हम जीवन में हर रस का पूरा स्वाद चखना चाहते हैं पर हमेशा यह मलाल रहता है कि वह नहीं मिल पा रहा है।  इसका मुख्य कारण यह है कि हम यह जानते नहीं है कि आनंद क्या है? हम आनंद को बाह्य रूप से प्रकट देखना चाहते हैं जबकि वह इंद्रियों से अनुभव की जाने वाली किया है।  आनंद हाथ में पकड़े जाने वाली चीज नहीं है पर किसी चीज को हाथ में पकड़ने से आनंद की अनुभूति की जा सकती है।  आनंद बाहर दिखने वाला कोई दृश्यरूप नहीं है पर किसी दृश्य को देखकर अनुभव किया जा सकता है।  यह अनुभूति अपने मन में लिप्तता का   भाव त्यागकर की जा सकती है।  जब हम किसी वस्तु, विषय या व्यक्ति में मन का भाव लिप्त करते हैं तो वह पीड़ादायक होता है।  इसलिये निर्लिप्त भाव रखना चाहिए।
               कहने का अभिप्राय यह है कि आंनद अनुभव की जाने वाली क्रिया है। जब तक हम यह नहीं समझेंगे तब तक जीवन भर इस संसार के विषयों के  पीछे भागते रहेंगे पर हृदय आनंद  कभी नहीं मिलेगा।  संसार के पदार्थ भोगने के लिये हैं पर उनमें हृदय लगाना अंततः आंनदरहित तो कभी भारी कष्टकारक  होता है। हमें ठंडा पानी पीने के लिये,फ्रिज, हवा के लिये कूलर या वातानुकूलन यंत्र, कहीं अन्यत्र जाने के लिये वाहन और मनोरंजन के लिये दूसरे मनुष्य के द्वंद्व दृश्यों की आवश्यकता पड़ती है। यह उपभोग है।  उपभोग कभी आनंद नहीं दे सकता।  क्षणिक सुविधा आनंद की पर्याय नहीं बन सकती।  उल्टे भौतिक सुख साधनों के खराब या नष्ट होने पर तकलीफ पहुंचती है।  इतना ही नहीं जब तक वह ठीक हैं तब तक उनके खराब होने का भय भी होता है।  जहां भय है वहां आनंद कहां मिल सकता है।
जहां जहां दिल लगाया

वहां से ही तकलीफों का पैगाम आया,

जिनसे मिलने पर रोज खुश हुए

उन दोस्तों के बिछड़ने का दर्द भी आया।

कहें दीपक बापू

अपने दिल को हम

रंगते हैं अब अपने ही रंग से

इस रंग बदलती दुनियां में

जिस रंग को चाहा

अगले पल ही उसे बदलता पाया।

जब से नज़रे जमाई हैं

अपनी ही अदाओं पर

कोई दूसरा हमारे दिल को बहला नहीं पाया।

            हमें कोई  बाहरी वस्तु आनंद नहीं दे सकती।  परमात्मा ने हमें यह देह इस संसार में चमत्कार देखने के लिये नहीं वरन् पैदा करने के लिये दी है। कहा जाता है ‘‘अपनी घोल तो नशा होय’।  हमें अपने हाथों से काम करने पर ही आनंद मिल सकता है। वह भी तब जब परमार्थ करने के लिये तत्पर हों। अपने हाथ से अपने मुंह में रोटी डालने में कोई आनंद नहीं मिलता है। जब हम अपने हाथ से दूसरे को खाना खिलायें और उसके चेहरे पर जो संतोष के भाव आयें तब जो अनुभूति हो वही  आनंद है! आदमी छोटा हो या बड़ा परेशानी आने पर कहता है कि यह संसार दुःखमय है।  यह इस संसार में प्रतिदिन स्वार्थ पूर्ति के लिये होने वाले युद्धों में परास्त योद्धाओं का कथन भर होता है। जब आदमी का मन संसार के पदार्थों से हटकर कहीं दूसरी जगह जाना चाहता है तब उसे एक खालीपन की अनुभूति होती है।  जिनके पास संसार के सारे पदार्थ नहीं है वह संघर्ष करते हुए फिर भी थोड़ा बहुत आनंद उठा लेते हैं पर जिनके पास सब है वह थके लगते हैं।  किसी वस्तु का न होना दुख लगता है पर होने पर सुख कहां मिलता है? एक वस्तु मिल गयी तो फिर दूसरी वस्तु को पाने का मन में  मोह पैदा होता है।
              एकांत में आनंद नहीं मिलता तो भीड़ का शोर भी बोर कर देता हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आंनद मिले कैसे?
               इसके लिये यह  हमें अध्यात्म का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।  एकांत में ध्यान करते हुए अपने शरीर के अंगों  और मन पर दृष्टिपात करना चाहिए।  धीरे धीरे शून्य में जाकर मस्तिष्क को स्थिर करने पर पता चलता है कि हम वाकई आनंद में है।  इसी शून्य की स्थिति आंनद का चरम प्रदान करती है। आनंद भोग में नहीं त्याग में है। जब हम अपना मन और मस्तिष्क शून्य में ले जाते हैं तो सांसरिक विषयों में प्रति भाव का त्याग हो जाता हैं यही त्याग आनंद दे सकता है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

क्या अन्ना हजारे जैसी छवि अरविन्द केजरीवाल बना पाएंगे-हिंदी लेख


         अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान जो अपनी छवि बनायी वह अब फीकी हो गयी लगती है । नहीं हुई तो हो जायेगी।  अब उनकी जगह स्वाभाविक रूप से अरविंद केजरीवाल उन लोगों के नायक होंगे जिन्होंने कथित रूप से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन प्रारंभ किया था। अन्ना हजारे कह जरूर रहे हैं कि उनका आंदोलन दो भागों में बंट गया है पर सच बात तो यह कि वह उस बड़े आंदोलन से स्वयं बाहर हो गये हैं जो अरविंद केजरीवाल ने प्रारंभ किया था। यह आंदोलन छोटे रूप में प्रारंभ हुआ पर पहले बाबा रामदेव और फिर बाद के अन्ना हजारे की वजह से बृहद आकार ले गया।
एक बात तय रही अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों के बिना अन्ना हजारे राष्ट्रीय छवि नहीं बना सकते थे क्योंकि उनके पहले के सारे आंदोलन महाराष्ट्र में शुरु होकर वहीं खत्म हो गये थे।  उनकी छवि एक प्रादेशिक गांधीवादी छवि की थी।
         जब भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लक्ष्य नहीं मिला तो एक राजनीतिक दल बनाने का फैसला हुआ। अन्ना हमेंशा ही  ‘‘मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा’’, ‘‘ रातनीतिक दल नहीं बनाऊंगा’’ और  किसी का चुनाव प्रचार नहीं करूंगा’’ तथा अन्या वाक्यांश दोहराते रहे। इसी दौरान उन्होंने चुनाव में ईमानदार प्रत्याशियों का समर्थन करने की बात कही थी।  ऐसे में अरविंद केजरीवाल और अन्य साथियों के राजनीतिक दल बनाने के फैसले से किनारा करना भले ही वह सिद्धांतों से जोड़े पर हम जैसे आम लेखक जानते हैं कि इस देश में बिना किसी चालाकी के सार्वजनिक प्रचार नहीं मिलता।   इस देश में पेशेवर आंदोलनकारियों का एक समूह सक्रिय रहा है जो कथित रूप से जनहित के लिये कार्यरत रहने का दावा करता है पर कहीं न कहीं वह ऐसे लोगों से धन लेकर यह काम करता है जो चाहते हैं कि समाज के असंतोष को कोई उग्र रूप न मिले इसलिये अहिंसक आंदोलन चलते रहें।  कहने का अभिप्राय यह है कि यह पेशेवर आंदोलनकारी आमजन और शिखर पुरुषों के बीच शोषण और अंसतोष के बीच युद्धविराम रखने के लिये टाईमपास की तरह मौजूद रहते हैं।  हवा में लाठियां भांजते हैं।  देश की समस्याओं की दुहाई देकर बताते हैं कि भ्रष्टाचार नाम का एक राक्षस है जिसका कोई न नाम है न रूप है पर अपना दुष्प्रभाव हम पर डाल रहा है।  परेशानहाल लोग उनकी शरण लेते हैं। अखबारों के खूब खबर छपती है। नतीजा ढाक के तीन पात।
       हमें यह तो मालुम था कि एक दिन अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल की टीम अलग अलग हो जायेंगे पर किस तरह होंगे यह ज्ञान नहीं था।  अन्ना हजारे ने  पूरे दो साल का टाईम पास किया। अखबारों को पृष्ठ रंगने का अवसर मिला तो टीवी चैनल वालों ने भी विज्ञापन का समय खूब पास किया।  ऐसे में अन्ना हजारे ने पैकअप कर लिया।  अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल की जोड़ी लंबे समय की साथी नहीं थी।  इसको लेकर हमारे विचारों के कई दृष्टिकोण हैं।  विस्तार से लिखना तो मुश्किल है पर क्षेत्रीय, भाषाई तथा व्यवहार शैली की भिन्नता है।  फिर अन्ना केजरीवाल ने अपनी लड़ाई एक आम आदमी के रूप में प्रारंभ की थी और अन्ना हजारे  भारत के अन्य शिखर पुरुषों की तरह  अपनी इस आदत को नहीं छोड़ सकते थे कि किसी आम आदमी को बिना किसी आधार के उच्च शिखर पर पहुंचने दिया जाये।  एक आम आदमी का महत्वांकाक्षी होना ऐसे शिखर पुरुषो की दृष्टि में महापाप है।
      अपने एक ब्लॉग पर इस लेखक ने लिखा था कि अन्ना टीम को अपने राजनीतिक दल के नाम में अन्ना हजारे का नाम जरूर रखना चाहिए।  उनकी फोटो भी साथ रखें।  लगता है कि किसी ने यह लेख पढ़ा होगा और अन्ना हजारे साहब को बताया होगा कि इस तरह अरविंद केजरीवाल और उनका पूरा भारत के प्रचार शिखर पर पहुंच जायेगा।  अन्ना साहब ने कोई सार्वजनिक पद न लेने की कसम खाई है ऐसे में राजनीतिक दल का शिखर पद अरविंद केजरीवाल को ही मिलना था।  यही उन्हें स्वीकार नहीं रहा होगा।  अन्ना अब आंदोलन को जारी रखेंगे।  अब उनके उस आंदोलन में नयी पीढ़ी के  लोग कितनी  रुचि लेंगे यह कह सकना कठिन है।  अब तो नयी पीढ़ी के आंदोलनाकरियों के लिये संभवतः अरविंद केजरीवाल ही एक सहारा बचते दिख रहे हैं।  एक बात साफ बता दें कि यह देश समाज हितैषी योद्धाओं का सम्मान करता है न कि पेशेवर आंदोलनकारियों का।  योद्धा अपने अभियान को समय के अनुसार बदलकर चलते जाते हैं और पेशेवर आंदोलनकारी अपने आंदोलन को एक जगह टांग कर जमीन पर बैठे रहते हैं।   टीवी और अखबार में प्रचार प्राप्त करना ही उनका लक्ष्य रहता है। जहां तक जनहित का सवाल है तो ऐसा कोई भी आंदोलन इस देश के इतिहास में दर्ज नहीं मिलता जिसने समाज की धारा बदली हो।
       हम जैसे आम लोगों के लिये अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे एक ही समान हैं।  अन्ना हजारे अगर अपने आंदोलन की दुकान बंद कर चले गये तो अभी अरविंद केजरीवाल और उनके साथी तो बचे हैं।  यदि यह वाकई सामाजिक योद्धा हैं तो अपने अभियान को राजनीतिक दल में परिवर्तित कर आगे बढ़ेंगे और पेशवर आंदोलनकारी हैं तो उनके लिये भी तर्क तैयार है कि हम क्या करें अन्ना ही साथ छोड़ गये।
          अब राजनीतिक दल बनाने के समर्थक लोगों के पास बस एक ही रास्ता है कि वह अरविंद केजरीवाल की छवि को उभारें।  इस कदर कि अन्ना हजारे की छवि ढंक जाये।  अन्ना हजारे की स्थिति तो यह है कि उनके विरोधी भी अब उनका नाम नहीं लेते और लोकतंत्र में यही बुरी बात है। लोकतंत्र में विरोधी होना ही सशक्त होने का प्रमाण है।  अन्ना के विरोधियों ने उन पर आत्मप्रचार के लिये आंदोलन चलाने का आरोप लगाया था और पीछे हटते अन्ना उसे पुष्ट कर गये।  एक जनलोकपाल बनने से देश में भ्रष्टाचार मिट जायेगा अन्ना साहब ने यह  सपना  दिखाया था।  इस जनलोकपाल का जो स्वरूप अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने बनाया वह बनना अब दूर है। आखिरी सलाह अरविंद केजरीवाल को कि वह अब अन्ना हजारे की छवि से दूर होते जायें।  उनकी छवि जो जनता में बनी थी वह अब नहंी रही।  जो नयी पीढ़ी के लोग अन्ना हजारे के पीछे थे वह अब उनके पीछे आयेंगे बशर्ते वह अपने अभियान में निरंतरता बनाये रखें।  इतना ही नहीं अब अन्ना हजारे का नाम लेना या फोटो छापना उनके सहयोगियों के प्रयासों पर विपरीत असर भी डाल सकता है। एक बात याद रखें कि आगे बढ़ते योद्धा को यहां समाज आंखों के बिठा लेता है और पीछे हटने पर वह उससे चिढ़ भी जाता है।   अन्ना हजारे दृढ़ व्यक्तित्तव के स्वामी हैं इस पर यकीन नहीं किया जा सकता क्योंकि वह अपनी कई बातों से जिस तरह पीछे हटे हैं उससे लगता है कि उनका कोई सलाहकार समूह है जो उनको जैसा कहता है वैसा करते हैं। अन्ना हजारे सरल हैं यह बात निसंदेह सत्य है इसलिये उन्होंने अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों को अपने कथित आंदोलन के मंचों पर आने से मना किया है। इससे लगता है कि वह नहीं चाहते कि अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों की छवि कहीं आहत हो।  आजकल लोकतंत्र में प्रचार का महत्व है और केजरीवाल एंड कंपनी के लिये अन्ना हजारे का नाम लेना या उनसे जुड़ना उनकी छवि खराब होने की संभावनाऐं बढ़ा भी सकती है। बाकी भविष्य के गर्भ में क्या है देखेंगे हम लोग। अन्ना हजारे अब प्रचार परिदृश्य से गायब हो जायेंगे तो उनकी जगह लेने की संभावना अरविंद केजरीवाल की हो सकती है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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