Tag Archives: china

न्यायालयीन फैसलों पर सार्वजनिक चर्चा का औचित्य-हिन्दी लेख (adalat ke faisle ki sarvjanik charcha-hindi lekh)


हिन्दी साहित्य,समाज,विनायक सेन,नक्सलवाद,राम मंदिर,सज़ा,फैसला,vinayak sen,court vurdict,ram madnir

छत्तीसगढ़ में निचली अदालत ने नक्सलियों में मददगार तीन लोगों को सजा सुनाई है। इनमें एक कोई डाक्टर हैं जिनको आजीवन कारावास की सजा देने पर भारतीय अदालतों के विरुद्ध एक प्रचार अभियान प्रारंभ हो गया है। दरअसल अदालत के निर्णय पर कभी इस तरह की सार्वजनिक बहस नहीं चली जैसी राममंदिर तथा नक्सलियों मे मददगार भद्र पुरुषों पर सजा पर हो रही है। यह बहस प्रगतिशील और जनवादी बुद्धिजीवियों ने प्रारंभ की है जिनके चिंतन और अध्ययन की शुरुआत कार्ल मार्क्स की पूंजी किताब से शुरु होकर मज़दरों एक हो के नारे पर खत्म हो जाती है। अलबत्ता भारत में निम्नजातियों के उद्धार, भारतीय धार्मिक विचारों से अलग विचार मानने वाले लोगों की रक्षा तथा गरीबों के इलाज के नारे भी लगाये जाते हैं। इतिहास बताया जायेगा पश्चिम का और आधार ढूंढे जायेंगे भारतीय संदर्भों में, यही इन विचाराधाराओं के बुद्धिजीवियों के प्रयास हैं जो कि शुद्ध रूप से व्यवसायिक हैं क्योंकि इनसे इनको नाम तथा नामा दोनों ही मिलता है। जहां तक पूंजीवादी लेखकों का प्रश्न है तो उन्हें भी इनके विरुद्ध लिखने पर शाबाशी मिल जाती है। अलबत्ता विचाराधाराओं के लेखक प्रायोजित होने के कारण अपने संकीर्ण उद्देश्यों की पूर्ति के लिये लिखते हैं। ऐसे में स्वतंत्र और मौलिक लेखकों को अपनी बात कहने का अवसर कभी नहीं मिलता है। यह तो भला हो इंटरनेट कंपनियों का जो उन्होंने ब्लाग जैसी साईटों को बनाकर यह अवसर दिया है। मज़े की बात यह है कि प्रगतिशील और जनवादी विचारक पूंजीपतियों की इसी सेवा का लाभ उठाते हुए भी धारा वही पुरानी चलते हैं केवल नारे लगाने वाली।
प्रगतिशील और जनवादियों की यह खूबी है कि वह कल्पित मिथक नहीं रचते बल्कि जीवित इंसान को या फिर जिसके जीवन के प्रमाण हो उसे ही मिथक बनाते हैं ताकि उसे कल्पित कहकर कोई चुनौती न दे। यह अलग बात है कि ऐसा करते हुए वह ऐसी हरकतें भी करते हैं जिससे लगता है कि राई जैसे आदमी को पर्वत बना रहे हैं। उनकी दूसरी खूबी यह है कि बात खेत की हो तो वह खलिहान की सुनेंगे। अगर खलिहान की बात हो तो खेत की कहेंगे। पूर्व में खड़े होकर पश्चिम की तो उत्तर में खड़े होकर दक्षिण की बात करेंगे-इसका उल्टा भी हो सकता है या दिशाऐं भी उधर की जा सकती हैं। मतलब यह कि आप जिस दिशा में रहते हैं तो दूसरी दिशा की स्थिति को आप नहीं जानते इसलिये इनकी बातों पर यकीन न करें तो चुनौती भी नहीं दे सकते। फिर जीवधारी मिथकों पर कुछ कहना कठिन होता है।
इन्हीं लेखकों ने राममंदिर पर अदालत के निर्णय को चुनौती दी। मंदिर बनेगा या नहीं अब इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा क्योंकि आमजन अब इस विवाद से दूर हो चुका है। मगर पत्थरों के बने एक ढांचे के गिरने पर जनवादी तथा प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने जो प्रायोजित विलाप किया वह देखने लायक था। इतना तो उस धर्म के लोग भी नहीं रोये होंगे जितना इन दोनों समूहों के बुद्धिजीवियों ने रोया। पत्थर में जान नहीं होती पर इन्होंने डाली भले ही यह बात मिथक लगे। आम इंसान समय के साथ आगे जाता है पर यह लोग इतिहास की अर्थी कंधे पर लेकर जिस तरह चलते हैं वह प्रशंसा के योग्य है।
अब इनके हाथ लग गये हैं गरीब बच्चों का इलाज करने वाले एक डाक्टर साहब जिन पर राजद्रोह का आरोप लगा और अब सजा मिली। जहां तहां उनको रिहा करने की अपील की जा रही है। ऐसा नाटक किया जा रहा है जैसे कि इनके लिखने तथा प्रदर्शन करने के अभियान से वह रिहा ही हो जायेंगे। भारतीय न्याय प्रणाली की जरा समझ रखने वाले को भी यह पता है कि अब मामला हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में जायेगा। इसका अंतिम परिणाम न्यायालयों की निर्णयों पर ही निर्भर है और उन पर प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालना संभव नहीं है। ऐसे में यह बुद्धिजीवी वर्ग संदेह के दायरे में स्वयं ही आता है। ऐसा लगता है कि वह भारतीय समाज को यह संदेश दे रहा है कि अगर न्यायालय के निर्णय उसके अनुकूल न रहे तो वह भारतीय न्याय प्रणाली पर भी उंगली उठायेगा। ऐसी शक्ति केवल पैसा लेकर बुद्धि विलास करने वालों के लिये संभव है स्वतंत्र और मौलिक लेखकों के लिये नहीं।
डाक्टर साहब को मिली सजा पर जिस तरह उसके विरुद्ध प्रचार अभियान प्रारंभ हुआ है उससे लगता है कि दुनियां के कुछ नकारात्मक संगठन जिनको पूंजीपतियों से ही पैसा मिलता है इस विषय पर अब बावेला मचाने वाले हैं। वैसे ही जैसे राम मंदिर पर मचा रहे हैं। अभी तक यह वर्ग भारत के राजनीति, सामाजिक, भारतीय धार्मिक, तथा आर्थिक प्रतिष्ठानों पर शाब्दिक हमला करता था पर अब न्यायिक व्यवस्था पर उंगली उठाने लगा है।
उन डाक्टर साहब का नाम पहले कोई नहीं जानता था। कहते हैं कि बच्चों का इलाज करते थे। हमें उन डाक्टर साहब से कोई गिला शिकवा नहीं है। एक मौलिक स्वतंत्र लेखक अगर गिला करे तो भी किस दम पर उसकी जानकारी के स्त्रोत भी तो प्रचार माध्यम ही है। इन्हीं प्रचार माध्यमों में यह कहीं न पता चला कि उन्होंने कितने बच्चों का कब कहां इलाज किया। मुफ्त किया कि कम पैसे लिये। भगवान ही जानता है कि करते थे भी कि नहीं या पहले करते थे अब केवल सामाजिक गतिविधियों तक ही सीमित हो गये थे। उनकी पत्नी के अनुसार ही वह घर का खर्चा अपने दम पर चलाती हैं तो डाक्टर साहब क्या मुफ्त इलाज करते थे? तब दवा का पैसा कहां से आता होगा? फिर दूसरी बात यह कि डाक्टर साहब की चर्चा जिन गतिविधियों के कारण हो रही हैं वह उनके व्यवसाय से इतर हैं। सीधी बात कहें तो राजनीतिक हैं। एक योजना के बारे में तो यह कहा जा रहा है उसकी कल्पना उन्होंने की और राज्य सरकार ने उनको अपनाया। सवाल यह है कि फिर राजद्रोह जैसा आरोप लगा क्यों?
डाक्टर साहब जिस विचारधारा के आदमी हैं उसमें हिंसा एक स्वीकार्य सिद्धांत है। ऐसे में हिंसक तत्वों से उनका संपर्क होना कोई ज्यादा बड़ी बात नहीं है। हिंसक तत्वों को हमेशा ही बौद्धिक संपन्न लोगों से सहायता की अपेक्षा रहती है क्योंकि वह हथियार चलाना जानते हैं पर कहां चलाना है इसके लिये उनकी अक्ल काम नहीं करती। हम यह नहीं कहते कि डाक्टर साहब ने ऐसी सहायता की होगी पर जब आप हिंसक तत्वों से संपर्क रखते हैं तो शक के दायर में तो आते ही हैं। खासतौर से तब जब हम जैसे मौलिक और स्वतंत्र लेखक ऐसी हिंसा को पूंजीवाद के पिछले दरवाजे से प्रायोजित किया मानते हैं। आजतक अनेक बार यह पूछा गया कि गरीब, भूखे तथा मज़बूर लोगों के पास रोटी का निवाला नहीं होता पर उनके पास डेढ़ लाख की बंदूक आ जाती है, कहां से? उनके कथित नुमाइंदों के पास अच्छे कपड़े, गाड़ियां तथा अन्य वस्तुऐं कहां से आती हैं? अमेरिका तथा पश्चिमी सम्राज्यवादी पूंजीवाद के खिलाफ खड़े लोग अंततः गोलियां चलाकर राज्य को ही हथियार खरीदने को मज़बूर करते हैं, क्या पूंजीवाद की मदद नहीं है।
सजा तीन को हुई पर डाक्टर साहब को हीरो बनाया जा रहा है? शक तो उठना स्वाभाविक ही है। हमारी दिलचस्पी बाकी दो में भी है मगर ऐसा लगता है कि वह पूंजीवाद के विरोधियों के लिये नगण्य हैं या फिर उनको नायक बनाने से कोई मसाला नहीं मिलने वाला। यह भी संभव है कि नोबल पुरस्कार तो किसी एक को ही मिल सकता है इसलिये बाकी दो को क्यों डाक्टर साहब का प्रतिद्वंद्वी बनाया जाये। कहीं यह अगले शांति नोबल पुरस्कार को भारत लाने के लिये कवायद करने के लिये प्रचार अभियान तो नहीं चलाया जा रहा?
इस लेखक वर्ग ने चीन के उस नोबल पुरस्कार प्राप्त विजेता को शायद अपना आदर्श बनाया है जो जेल में है। संभव है डाक्टर साहब को भी नोबल मिल जाये क्योंकि कहीं न कहीं उनके मन में पश्चिम के लोगों में भी सहानुभूति दिख रही है। मुश्किल यह है कि भारतीय न्यायिक व्यवस्था में राज्य से प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की आशा नहीं की जाती पर चीन में यह संभव है इसलिये उस पर दबाव बनाया गया मगर भारत में यह संभव नहीं है। जब इस मामले की सुनवाई अदालत में चल रही थी तब डाक्टर साहब को जमानत मिली उस समय उनके समर्थकों ने जश्न मनाया था पर न्याय प्रणाली पर उनका यह दबाव बनाये रखने का प्रयास नहीं चला। अब प्रतिकूल निर्णय पर उनका गुस्सा इसलिये भी गलत लगता है क्योंकि इसी अदालत ने उनको जमानत भी दी थी। मतलब अदालत का निर्णय अनुकूल हो तो जश्न मनाओ और प्रतिकूल हो गुस्सा दिखाओ। यह नीति चिंतनहीन बुद्धिजीवियों को ही शोभा देता है। ऐसें ही बुद्धिजीवी बाबा रामदेव के आभामंडल पर शाब्दिक आक्रमण करते हैं जो ऐसे प्रमाण अपने साथ रखते हैं जिनसे पता लगता है कि उन्होंने कितने बीमारों को ठीक किया। अच्छा होता सजायाफ्ता डाक्टर साहब की चिकित्सा से लाभान्वित लोगों की जानकारी यह लोग भी देते। खाली नारे लगाने से बात नहीं बनती।
विश्व में पश्चिमी देशों में उत्पन्न सभ्यता का बोलबाला है जिनकी राजनीति का अधिकतर हिस्सा प्रचार के आधार पर सत्ता कायम करना है और जो लोकतंत्र की पक्रिया का भी एक हिस्सा बन गया है। पश्चिमी विश्व पूर्वी देशों में अपना राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक प्रभाव बनाये रखने के लिये प्रचार का सहारा लेते हैं और इसके लिये उन्होंने अनेक तरह के सम्मान तथा संस्थाओं का सृजन कर रखा है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उनके हितों के लिये ही काम करते हैं। इन्हीं सम्मानों को पाने तथा अपनी कथित मानवाधिकार, समाज सेवा तथा गरीबों का इलाज करने के उद्देश्य के लिये पश्चिमी पूंजीपतियों तथा सरकारों से धन पाने के लिये पूर्वी देशों के अनेक बुद्धिजीवी, विचारक तथा समाज सेवक उतावले रहते हैं। ऐसे में पूंजीवादी, समाजवादी या साम्यवादी विचाराधाराओं को मुखौटा लगाये अनेक लोग बकायदा योजनाबद्ध ढंग से व्यवसायिक प्रचार कार्य कर इन्हीं पश्चिमी देशों की सेवा करते हैं ताकि उनका सम्राज्य बना रहे। स्थिति यह है कि समाजवादी और साम्यवादी विचारक पश्चिम के पूंजीवाद को कोसते रहते हैं पर उनके चेले चपाटे तथा रिश्तेदार इन्हीं पश्चिमी देशों मेें अपना निवास बनाकर आराम से रहते हैं।
डाक्टर साहब बड़ी अदालत में राहत पा जायें यह कामना हम भी करेंगे क्योंकि उनके समर्थक यही दावा कर रहे हैं कि वह निर्दोष हैं। एक आम लेखक के रूप में जब टीवी पर डाक्टर साहब का चेहरा देखा तब लगा कि बहुत मासूम हैं पर अदालतें तो सबूत देखती हैं। मन में एक शंका भी हुई कि कहीं वह वास्तव में अपनी मासूमियत की वजह सें अपने ही समूह या साथियों की चालाकी का शिकार तो नहीं बने क्योंकि उसके बाद जो प्रचार अभियान प्रारंभ हुआ है उसमें अनेक प्रायोजित बुद्धिजीवी अपना समय पास करने वाले हैं। एक लंबे समय तक चलने वाला प्रचार अभियान देखने को मिलने वाला है।
——————-

लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
5हिन्दी पत्रिका

६.ईपत्रिका
७.दीपक बापू कहिन
८.शब्द पत्रिका
९.जागरण पत्रिका
१०.हिन्दी सरिता पत्रिका  

Advertisements

हिन्दी वाले अंग्रेज-हिन्दी चिंतन लेख (hindi wale angrej-hindi article)


कभी कभी तो लगता है कि अपना ही दिमाग चल गया है। संभव है कंप्यूटर पर काम करते हुए यह हुआ हो या लगातार लिखने की वजह से अपने अंदर कुछ अधिक आत्मविश्वास आ गया है जो हर किसी की बात गलत नज़र आती है। यही कारण है कि अंग्रेजी भाषा और रोमन लिपि को लेकर अपने दिमाग में देश के विद्वानों के मुकाबले सोच उल्टी ही विचरण कर रही है। विद्वान लोगों को बहुत पहले से ही अं्रग्रेजी में देश का भविष्य नज़र आता रहा है पर हमें नहंी दिखाई दिया। अपनी जिंदगी का पूरा सफर बिना अंग्रेजी के तय कर आये। इधर अंतर्जाल पर आये तो रोमनलिपि में हिन्दी लिखने की बात सामने आती है तब हंसी आती है।
सोचते हैं कि लिखें कि नहीं। इसका एक कारण है। हमारे एक मित्र पागलखाने में अपने एक अन्य मित्र के साथ उसके रिश्तेदार के साथ देखने गये थे। वहां उन्होंने अपना मानसिक संतुलन जांचने के वाले दस प्रश्न देखे जो वहां बोर्ड पर टंगे थे। उसमें लिखा था कि अगर इन प्रश्नों का जवाब आपके मन में ‘हां’ आता है तो समझ लीजिये कि आपको मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता है। उनमें एक यह भी था कि आपको लगता है कि आप हमेशा सही होते हैं बाकी सभी गलत दिखते हैं।’
यानि अगर हम यह कहें कि हम सही हैं तो यह मानना पड़ेगा कि हमें मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता है। अगर हम यह कहें कि देश के सभी लोगों का भविष्य अंग्रेजी से नहीं सुधर सकता या रोमन लिपि में हिन्दी लिखने वाली बात बेकार है तो यह विद्वानों के कथनों के विपरीत नज़र आती है। तब क्या करें?
श्रीमद्भागवत गीता में भी एक बात कही है कि‘बहुत कम ज्ञानी भक्त होते है।’ हजारों में कोई एक फिर उनमें भी कोई एक! मतलब अकेले होने का मतलब मनोरोगी या पूर्ण ज्ञानी होना है। अपने पूर्ण ज्ञानी होने को लेकर कोई मुगालता नहीं है इसलिये किसी आम राय के विरुद्ध अपनी बात लिखने से बचते हैं। मगर कीड़ा कुलबुलाता है तो क्या करें? तब सोचते हैं कि लेखक हैं और ज्ञानी न होने के विश्वास और मनोरोगी होने के संदेह से परे होकर लिखना ही पड़ेगा।
इस देश का विकास अंग्रेजी पढ़ने से होगा या जो अंग्रेजी पढ़ेंगे वही आगे कामयाब होंगे-यह नारा बचपन से सुनते रहे। पहले अखबार पढ़कर और अब टीवी चैनलों की बात सुनकर अक्सर सोचते हैं कि क्या वाकई हमारे देश के कथित बुद्धिजीवियों को देश की आम जनता की मानसिकता का ज्ञान है। तब अनुभव होता है कि अभी तक जिन्हें श्रेष्ठ बुद्धिजीवी समझते हैं वह बाजार द्वारा प्रयोजित थे-जो या तो कल्पित पात्रों के कष्टों का वर्णन कर रुलाते हैं या बड़े लोगों के महल दिखाकर ख्वाब बेचते रहे हैं।
बचपन में विवेकानंद की जीवनी पढ़ी थी। जिसमे यह लिखा था कि शिकागो में जैसे ही उन्होंने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा ‘ब्रदर्स एंड सिस्टर’
वैसे ही सारा हाल तालियों से गूंज उठा। उसके बाद तो उनकी जीवनी में जो लिखा था वह सभी जानते हैं। उन महान आत्मा पर हम जैसा तुच्छ प्राणी क्या लिख सकता है? मगर इधर अंतर्जाल पर उनके प्रतिकूल टिप्पणी पढ़ने का अवसर मिला तो दुःख हुआ। भाई लोग कोई भी टिप्पणी किसी भी सज्जन के बारे में लिख जाते हैं-अब यह पता नहीं उनकी बात कितनी सच कितली झूठ।
बहरहाल इस स्वामी विवेकानंद की जीवन के प्रारंभ में ही इस तरह का वर्णन अब समझ में आता है।
ऐसा लगता है कि उन महान आत्मा का जीवन परिचय प्रस्तुत करते हुए बाजार द्वारा लोगों को यह प्रायोजित संदेश दिया गया कि ‘भई, अंग्रेजी पढ़ लिखकर ही आप अमेरिका या ब्रिटेन को फतह कर सकते हो।’
बात यहीं नहीं रुकी। कोई अमेरिका में नासा में काम कर रहा है तो उससे भारत का क्या लाभ? ब्रिटेन के हाउस और कामंस में कोई भारतीय जाता है तो उससे आम भारतीय का क्या वास्ता? इस बारे में रोज कोई न कोई समाचार छपता है? मतलब यह कि यहां आपके होने या होने का केाई मतलब नहीं है।
दरअसल अंग्रेजी के विद्वान-अब तो हिन्दी वाले भी उनके साथ हो गये हैं-कहीं न कहीं अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये अमेरिका और ब्रिटेन के सपने यहां बेचते हैं। कुछ लोगों ने तो यह टिप्पणी भी की है कि अंग्रेजी में विज्ञान है और उससे जानने के लिये उसका ज्ञान होना जरूरी है। अब तो हमारे दिमाग में यह भी सवाल उठने लगा है कि आखिर अंग्रेजी में कौनसा विज्ञान है? चिकित्सा विज्ञान! आधुनिक चिकित्सकों के पास जाने में हमें खौफ लगता है इसलिये ही रोज योग साधना करते हैं। एक नहीं दसियों मरीजों के उदाहरण अपनी आंखों से देखे हैं जिन्होंने डाक्टरों ने अधिक बीमार कर दिया। यह रिपोर्ट, वह रिपोर्ट! पहले एड्स बेचा फिर स्वाइन फ्लू बेचा। मलेरिया या पीलिया की बात कौन करता है जो यहां आम बीमारी है। परमाणु तकनीक पर लिखेंगे तो बात बढ़ जायेगी। भवन निर्माण तकनीकी की बात करें तो यह इस देश में अनेक ऐसे पुल हैं जो अंग्रेजों से पहले बने थे। लालकिला या ताजमहल बनने के समय कौन इंजीनियरिंग पढ़ा था?
अब सवाल करें कि इस देश के कितने लोग बाहर अंग्रेजी के सहारे रोजगार अर्जित कर रहे हैं-हमारे पास ऐसी कई कहानियां हैं जिसमें ठेठ गांव का आदमी अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रंास पहंुच गया और अंग्रेजी न आने के बावजूद वह वहां जम गया। विभाजन के बाद सिंध और पंजाब से आये अनेक लोगों ने यहां आकर हिन्दी सीखी और व्यापार किया। वह हिन्दी या उर्दू सीखने तक वहां नहीं रुके रहे। अब भी देश के तीन या चार करोड़ लोग बाहर होंगे। 115 करोड़ वाले इस देश के कितने लोगों का भविष्य अंग्रेजी से बन सकता है? कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका और आस्ट्रेलिया में कितने भारतीय जा पायेंगे? इसका मतलब यह है कि आज की तारीख में 115 पंद्रह करोड़ लोग तो भारतीय ऐसे हैं जिन्होंने अपनी पहली सांस यहां ली तो अंतिम भी यही लेंगे। अरे, कार बनाने की इंजीनियरिंग सीख ली, रोड बनाने की भी तो सीखी है! मगर क्या हुआ। एक से एक नयी कार बाजार में आ गयी है पर सड़कों के क्या हाल है?
मतलब यह है कि आप एक या दो करोड़ लोगों के भविष्य को पूरे देश का भविष्य नहीं कह सकते। अंग्रेजी सीखने से दिमाग भी अंग्रेजी हो जाता है। ऐसा लगता है कि दिमाग का एक हिस्सा काम ही नहंी करता। भ्रष्टाचार और अपराध पर बोलते सभी हैं पर अपने कर्म किसी को नहीं दिखाई देते। अंग्रेजी दो ही लोगों की भाषा है-एक साहब की दूसरी गुलाम की! तीसरी स्थिति नहीं है। अंग्रेजी यहां क्यों सिखा रहे हो कि अमेरिका में नास में जाकर नौकरी करो या हाउस कामंस में बैठो। यहां तो सभी जगह वंशों का आरक्षण किया जाना है। पहले व्यापार में ही वंश परंपरा थी पर अब तो खेल, फिल्म, समाजसेवा, कला तथा पत्रकारिता में भी वंश परंपरा ला रहे हैं। जिसके पास पूंजी है वही अक्लमंद! बाकी सभी ढेर! अंग्रेजी पढ़ोगे तो ही बनोगे शेर। मतलब अधिक योग्य हो तो अंग्रेजी पढ़ो और बाहर जाकर गुलामी करो! यहां तो वंशों का आरक्षण हो गया है।
अमेरिका और ब्रिटेन आत्मनिर्भर देश नहीं है। दोनों के पास विकासशील देशों का पैसा पहुंचता है। विकासशील देशों की जनता गरीब हैं पर इसलिये उनके यहां के शिखर पुरुष अपना पैसा छिपाने के लिये इन पश्चिमी देशों की बैंकों को भरते हैं। फिर तेल क्षेत्रों पर इनका कब्जा है। ईरान पर ब्रिटेन का अप्रत्यक्ष नियंत्रण है पर अन्य तेल उत्पादक देशों पर अमेरिका का सीधा नियंत्रण है। अमेरिका का अपना व्यापार कुछ नहंी है सिवाय हथियारों के! अमेरिका इसी तेल क्षेत्र पर वर्चस्व बनाये रखने के लिये तमाम तरह की जीतोड़ कोशिश कर रहा है। इस कोशिश में उसे फ्रंास की मदद की जरूरत अनेक बार पड़ती है। कभी अकेला लड़ने नहीं निकलता अमेरिका। वैसे अमेरिका इस समय संघर्षरत है और अगर उसका एक शक्ति के रूप में पतन हुआ तो वहां जाकर ठौर ढूंढने से भी लाभ नहीं रहेगा। सबसे बड़ी बात है कुदरत का कायदा। कल को कुदरत ने नज़र फेरी और ब्रिटेन और अमेरिका का आर्थिक, राजनीतिक तथा सामरिक रूप से पतन हुआ तो अंग्रेजी की क्या औकात रह जायेगी? फिर इधर चीन बड़ा बाजार बन रहा है। जिस तरह उसकी ताकत बढ़ रही है उससे तो लगता है कि चीनी एक न एक दिन अंग्रेजी को बेदखल कर देगी। तब अपने देश का क्या होगा? कुछ नहीं होगा। इस देश में गरीबी बहुत है और यही गरीब धर्म, भाषा तथा नैतिक आचरण का संवाहक होता है उच्च वर्ग तो सौदागर और मध्यम वर्ग उसके दलाल की तरह होता है। गरीब आदमी अपनी तंगहाली में भी हिन्दी और देवानगारी लिपि को जिंदा रख लेगा। मगर उन लोगों की क्या हालत होगी जो स्वयं न तो अंग्रेज रहे हैं और हिन्दी वाले। उनकी पीढ़ियां क्या करेंगी? कहीं अपने ही देश में अजनबी होने का ही उनके सामने खतरा न पैदा हो जाये। सो अपना कहना है कि क्यों अंग्रेजी को लेकर इतना भ्रम फैलाते हो। कहते हैं कि इस देश को दूसरे देशों के समकक्ष खड़ा होना है तो अंग्रेजी भाषा सीखों और हिन्दी के लिये रोमन लिपि अपनाओ। पहली बात तो वह जगह बताओ जहां 113 करोड़ लोगों को खड़ा किया जा सके-अरे, यह अमेरिका में नासा में काम करने या इंग्लैंड के हाउस आफ कामंस में बैठने से भला क्या इस देश की सड़कें बन जायेगी? फिर क्या सभी वहां पहुंच सकते हैं क्या? कल इस पर लेख लिखा था, पर दिल नहीं भरा तो बैठे ठाले यह लिख लिया!

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
—————–
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

नेपाल की उठापठक और हिंदुत्व-हिंदी लेख


नेपाल कभी हिन्दू राष्ट्र था जिसे अब धर्मनिरपेक्ष घोषित किया गया है। वहां की निवासिनी और भारतीय हिन्दी फिल्मों की अभिनेत्री मनीक्षा कोइराला ने अब जाकर इसकी आलोचना की है। उनका मानना है कि नेपाल को एक हिन्दू राष्ट्र ही होना चाहिए था। दरअसल नेपाल की यह स्थिति इसलिये बनी क्योंकि वह राजशाही का पतन हो गया। वहां के राजा को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता था या हम कहें कि उनको ऐसी प्रतिष्ठा दी जाती थी। दूसरी बात यह है कि नेपाल के हिन्दू राष्ट्र के पतन को एक व्यापक रूप में देखा जाना चाहिए न कि इसके केवल सैद्धान्तिक स्वरूप पर नारे लगाकर भ्रम फैलाना चाहिये। इसलिये यह जरूरी है कि हम हिन्दुत्व की मूल अवधारणाओं को समझें।
वैसे हिन्दुत्व कोई विचाराधारा नहीं है और न ही यह कोई नारा है। अगर हम थोड़ा विस्तार से देखें तो हिन्दुत्व दूसरे रूप में प्राकृतिक रूप से मनुष्य को जीने की शिक्षा देने वाला एक समग्र दर्शन है। अंग्रेजों और मुगलों ने इसी हिन्दुत्व को कुचलते हुए भारतवर्ष में राज्य किया किया। अनेक डकैत और खलासी यहां आकर राजा या बादशाह बन गये। अंग्रेजों ने तो अपनी ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जिससे कि यहां का आदमी उनके जाने के बाद भी उनकी गुलामी कर रहा है। देश के शिक्षित युवक युवतियां इस बात के लिये बेताब रहते हैं कि कब उनको अवसर मिले और अमेरिका या ब्रिटेन में जाकर वहां के निवासियों की गुलामी का अवसर मिले।
मुगलों और अंग्रेजों ने यहां के उच्च वर्ग में शासक बनने की ऐसी प्रवृत्ति जगा दी है कि वह गुलामी को ही शासन समझने लगे हैं। अक्सर समाचार पत्र पत्रिकाओं में ऐसी खबरे आती हैं कि अमुक भारतवंशी को नोबल मिला या अमुक को अमेरिका का यह पुरस्कार मिला। अमुक व्यक्ति अमेरिका की वैज्ञानिक संस्था में यह काम कर रहा है-ऐसी उपलब्धियों को यहां प्रचार कर यह साबित किया जाता है कि यहां एक तरह से नकारा और अज्ञानी लोग रहते हैं। सीधी भाषा में बात कहें तो कि अगर आप बाहर अपनी सिद्धि दिखायें तभी यहां आपको सिद्ध माना जायेगा। उससे भी बड़ी बात यह है कि आप अंग्रेजी में लिख या बोलकर विदेशियों को प्रभावित करें तभी आपकी योग्यता की प्रमाणिकता यहां स्वीकार की जायेगी। नतीजा यह है कि यहां का हर प्रतिभाशाली आदमी यह सोचकर विदेश का मुंह ताकता है कि वहां के प्रमाणपत्र के बिना अपने देश में नाम और नामा तो मिल ही नहीं सकता।
मुगलों ने यहां के लोगों की सोच को कुंद किया तो अंग्रेज अक्ल ही उठाकर ले गये। परिणाम यह हुआ कि समाज का मार्ग दर्शन करने का जिम्मा ढोने वाला बौद्धिक वर्ग विदेशी विचाराधाराओं के आधार पर यहां पहले अपना आधार बनाकर फिर समाज को समझाना चाहता है। कहने को विदेशी विचारधाराओं की भी ढेर सारी किताबें हैं पर मनुष्य को एकदम बेवकूफ मानकर लिखी गयी हैं। उनके रचयिताओं की नज़र में मनुष्य को सभ्य जीवन बिताने के लिये ऐसे ही सिखाने की जरूरत है जैसे पालतु कुत्ते या बिल्ली को मालिक सिखाता है। मनुष्य में मनुष्य होने के कारण कुछ गुण स्वाभाविक रूप से होते हैं और उसे अनेक बातें सिखाने की जरूरत नहीं है। जैसे कि अहिंसा, परोपकार, प्रेम तथा चिंतन करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियां हैं। कोई भी मनुष्य मुट्ठी भींचकर अधिक देर तक नहीं बैठ सकता। उसे वह खोलनी ही पड़ती हैं।
चार साल का बच्चा घर के बाहर खड़ा है। कोई पथिक उससे पीने के लिये पानी मांगता है। वह बिना किसी सोच के उसे अपने घर के अंदर से पानी लाकर देता है। उस बच्चे ने न तो को पवित्र पुस्तक पढ़ी है और न ही उसे किसी ने सिखाया है कि ‘प्यासे को पानी पिलाना चाहिये’ फिर भी वह करता है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य अपनी सहज प्रवृत्तियों की वजह से सज्जन तो रहता ही है पर समाज का एक वर्ग उसकी जेब से पैसा निकालने या उससे सस्ता श्रम कराने के लिये उसे असहज बनाने का हर समय प्रयास करता है। विदेशी विचारधाराओं तथा बाजार से मनुष्य को काल्पनिक स्वप्न तथा सुख दिखकार उसे असहज बनाने का हमारे देश के लोगों ने ही किया है। इन्ही विचाराधाराओं में एक है साम्यवाद।
इसी साम्यवादी की प्रतिलिपि है समाजवाद। इनकी छत्रछाया में ही बुद्धिजीवियों के भी दो वर्ग बने हैं-जनवादी तथा प्रगतिशील। नेपाल को साम्यवादियों ने अपने लपेटे में लिया और उसका हिन्दुत्व का स्वरूप नष्ट कर दिया। सारी दुनियां को सुखी बनाने का ख्वाब दिखाने वाली साम्यवादी और समाजवादी विचारधाराओं में मूल में क्या है, इस पर अधिक लिखना बेकार है पर इनकी राह पर चले समाज सेवकों और बुद्धिजीवियों ने अपने अलावा किसी को खुश रखने का प्रयास नहीं किया। सारी दुनियां में एक जैसे लोग हो कैसे सकते हैं जब प्रकृत्ति ने उनको एक जैसा नहीं बनाया जबकि कथित विकासवादी बुद्धिजीवी ऐसे ही सपने बेचते हैं।
अब बात करें हम हिन्दुत्व की। हिन्दुत्व वादी समाज सेवक और बुद्धिजीवी भी बातें खूब करते हैं पर उनकी कार्य और विचार शैली जनवादियों और प्रगतिशीलों से उधार ली गयी लगती है। हिन्दुत्व को विचाराधारा बताते हुए वह भी उनकी तरह नारे गढ़ने लगते हैं। नेपाल में हिन्दुत्व के पतन के लिये साम्यवाद या जनवाद पर दोषारोपण करने के पहले इस बात भी विचार करना चाहिये कि वहां के हिन्दू समाज की बहुलता होते हुए भी ऐसा क्यों हुआ?
हिन्दुत्व एक प्राकृतिक विचाराधारा है। हिन्दू दर्शन समाज के हर वर्ग को अपनी जिम्मेदारी बताता है। सबसे अधिक जिम्मेदारी श्रेष्ठ वर्ग पर आती है। यह जिम्मेदारी उसे उठाना भी चाहिए क्योंकि समाज की सुरक्षा से ही उसकी सुरक्षा अधिक होती है। इसके लिये यह जरूरी है कि वह योग्य बुद्धिजीवियों को संरक्षण देने के साथ ही गरीब और मजदूर वर्ग का पालन करे। यही कारण है कि हमारे यहां दान को महत्व दिया गया है। श्रीमद्भागवत गीता में अकुशल श्रम को हेय समझना तामस बुद्धि का प्रमाण माना गया है।
मगर हुआ क्या? हिन्दू समाज के शिखर पुरुषों ने विदेशियों की संगत करते हुए मान लिया कि समाज कल्याण तो केवल राज्य का विषय है। यहीं से शुरु होती है हिन्दुत्व के पतन की कहानी जिसका नेपाल एक प्रतीक बना। आर्थिक शिखर पुरुषों ने अपना पूरा ध्यान धन संचय पर केंद्रित किया फिर अपनी सुरक्षा के लिये अपराधियों का भी महिमा मंडन किया। भारत के अनेक अपराधी नेपाल के रास्ते अपना काम चलाते रहे। वहां गैर हिन्दुओं ने मध्य एशिया के देशों के सहारे अपना शक्ति बढ़ा ली। फिर चीन उनका संरक्षक बना। यहां एक बात याद रखने लायक है कि अनेक अमेरिकी मानते हैं कि चीन के विकास में अपराध से कमाये पैसे का बड़ा योगदान है।
भारत के शिखर पुरुष अगर नेपाल पर ध्यान देते तो शायद ऐसा नहीं होता पर जिस तरह अपने देश में भी अपराधियों का महिमामंडन देखा जाता है उससे देखते हुए यह आशा करना ही बेकार है। सबसे बड़ी बात यह है कि नेपाल की आम जनता ने ही आखिर ऐसी बेरुखी क्यों दिखाई? तय बात है कि हिन्दुत्व की विचारधारा मानने वालों से उसको कोई आसरा नही मिला होगा। नेपाल और भारत के हिन्दुत्ववादी आर्थिक शिखर पुरुष दोनों ही देशों के समाजों को विचारधारा के अनुसार चलाते तो शायद ऐसा नहीं होता। हिन्दुत्व एक विचाराधारा नहीं है बल्कि एक दर्शन है। उसके अनुसार धनी, बुद्धिमान और शक्तिशाली वर्ग के लोगों को प्रत्यक्ष रूप से निम्न वर्ग का संरक्षण करना चाहिये। कुशल और अकुशल श्रम को समान दृष्टि से देखना चाहिये पर पाश्चात्य सभ्यता को ओढ़ चुका समाज यह नहीं समझता। यहां तो सभी अंग्रेजों जैसे साहब बनना चाहते हैं। जो गरीब या मजदूर तबका है उसे तो कीड़े मकौड़ों की तरह समझा जाता है। इस बात को भुला दिया गया है कि धर्म की रक्षा यही गरीब और मजदूर वर्ग अपने खून और पसीने से लड़कर समाज रक्षा करता है।
हमारे देश में कई ऐसे संगठन हैं जो हिन्दुत्व की विचारधारा अपनाते हुए अब गरीबों और मजदूरों के संरक्षण कर रहे हैं। उनको चाहिये कि वह अपने कार्य का विस्तार करें और भारत से बाहर भी अपनी भूमिका निभायें पर वह केवल नारे लगाने तक नहीं रहना चाहिये। इन हिन्दू संगठनों को परिणामों में शीघ्रता की आशा न करते हुए दूरदृष्टि से अपने कार्यक्रम बनाना चाहिये।
नेपाल का हिन्दू राष्ट्र न रहना इतनी बड़ी समस्या नहीं है जितनी परेशानी इस बात पर होने वाली है कि वह एक अप्राकृतिक विचाराधारा की तरफ बढ़ गया है जो वहां की संस्कृति और धर्म के वैसे ही नष्ट कर डालेगी जैसे कि चीन में किया है। भारत और नेपाल के आपस में जैसे घनिष्ट संबंध हैं उसे देखते हुए यहां के आर्थिक, सामाजिक तथा बौद्धिक शिखर पुरुषों को उस पर ध्यान देना चाहिये।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

भारतीय मीडिया और चीन-हिंदी व्यंग्य (bhartiya prachartantra aur china-hindi vyangya)


मीडिया यानि टीवी चैनल और समाचार पत्र-जिनकों हम संगठित प्रचारतंत्र भी कह सकते हैं-बिना सनसनी के नहीं चल सकते कम से कम उनमें काम करने वाले लोगों की मान्यता तो यही है। राई का पहाड़ और पहाड़ से निकली चुहिया को हाथी बनाने की कला ही प्रचारतंत्र का मूल मंत्र है। अब यह कहना कठिन है कि कितनी सनसनी खबरें प्रायोजित या स्वघटित हैं।
अभी कुछ दिनों पहले एक विदेशी चैनल का एक पत्रकार लोगों की हत्या कराकर उनके समाचारों को सनसनी ढंग से प्रसारित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। वह अपने व्यवसाय के सफलता के लिये ऐसी हरकतें कर रहा था। अभी हमारे देश के प्रचार तंत्र के लोगों की आत्मा मरी नहीं है कि वह ऐसी हरकतें करें पर ऐसी खबरें तो प्रायोजित करने के साथ प्रसारित कर ही सकते हैं जिससे किसी को शारीरिक हानि न पहुंचे न ही अपराध हो।
आखिर यह चल तो विदेशी ढर्रे पर ही रहे हैं। हो सकता है ऐसा न हो पर इधर चीन को लेकर जो सनसनी फैली है उसका तो न ओर मिल रहा है न छोर।

प्रचारतंत्र ने कह दिया कि घुसपैठ हुई। उसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई तो अनेक तरह के कथित प्रमाण लाये गये। आधिकारिक रूप से खंडन होते रहे हैं पर प्रचार तंत्र है कि बस अड़ा ही हुआ है कि घुसपैठ हुई। करीब दो सप्ताह से सनसनी फैली रही तब जाकर चीन की नींद खुली। मुश्किल यह है कि चीनी अपनी भाषा के अलावा दूसरी भाषा सीखते नहीं है इसलिये हिंदी के प्रचारतंत्र का उनको पता नहीं कि क्या चल रहा है?
किसी हिंदी भाषी ने ही उनको चीनी भाषा में लताड़ते हुए इन खबरों के बारे में पूछा होगा तब चीन ने आधिकारिक तौर पर भारतीय प्रचारतंत्र पर दुष्प्रचार का आरोप जड़ा। अभी तक भारत के रणनीतिकारों पर आक्रमण करने वाला चीन इतना बदहवास हो गया कि उसने सीधे ही प्रचारतंत्र को घेरे में ले लिया।
भारत की परवाह न करने वाला चीन पहली बार इतने तनाव में आया इस बात पर भारतीय प्रचारतंत्र को कुछ श्रेय दिया ही जाना चाहिए। इस प्रचारतंत्र को लेकर चीन भारतीय रणनीतिकारों से यह तो कह नहीं सकता कि इन पर नियंत्रण करो क्योंकि यह प्रचारतंत्र सरकारी नहीं है। भारत चीन से कह सकता है कि तुम अपने प्रचारतंत्र पर नियंत्रण करो क्योंकि वहां पर सरकार ही उसकी मालिक है। चीन का प्रचारतंत्र भी तो भारत के विरुद्ध विषवमन करता है और उसका सीधा आशय यही है कि वहां की सरकार यही चाहती है।
मगर इस बार चीन को भारतीय प्रचारतंत्र के रूप में जो असंगठित प्रतिद्वंद्वी मिला है उससे उसका पार पाना संभव नहीं है। सरकारी तौर पर नियंत्रण से परे इस प्रचारतंत्र की खूबी यह है कि कहता ही रहता है सुनता कुछ नहीं देखता है। एक शब्द देख लिया उस पर पूरा कार्यक्रम बना डाला। कहते हैं कि चीनी सुनते अधिक परबोलते कम हैं जबकि हमारा यह स्वतंत्र प्रचारतंत्र बोलता अधिक है सुनता कम। चीनी भी आखिर कुछ बोलेंगे पर उनका एक ही शब्द उनको परेशान कर डाल सकता है अगर भारतीय प्रचारतंत्र ने उसका नकारात्मक अर्थ लिया।
जब भारतीय प्रचारतंत्र उसके खिलाफ आग उगल रहा है तब कोई वहां के प्रचारतंत्र चुप बैठा हों यह संभव नहीं है मगर वह भारतीय प्रचारतंत्र का प्रसारण तो देखेंगे पर भारतीय प्रचारतंत्र उनकी तरफ नहीं देखेगा। यह उपेक्षासन का गुण भारतीय प्रचारतंत्र को विजेता बनाये हुए है। अपने विरुद्ध ऐसा प्रचार देख और सुनकर चीनी आग बबूला होकर कार्यक्रम बनायेंगे पर यहां देखेगा कौन? इससे उनकी आग और बढ़ जाती होगी।

इस प्रचार का ही नतीजा है कि दिल्ली में चीन के राजनयिक इधर उधर भागदौड़ करते रहे। एक तरह से चीन इस प्रचारतंत्र को लेकर भारत पर दबाव डाल रहा है पर यह उसके लिये परेशानी का कारण ही बनने वाला है। हो सकता है कि अभी यह प्रचारतंत्र चुप हो जाये पर अब चीन को आगे यह सब झेलना पड़ सकता है।
अपने प्रचारतंत्र का एक विषय पाकिस्तान तो बना ही हुआ है। उसके यहां अपने देश तथा विदेश के जो खुराफाती तत्व सक्रिय हैं उन पर हमारा प्रचारतंत्र अपनी बहुत सारी रील और शब्द खर्च कर चुका है। लोग उससे उकता गये हैं। लोगों को व्यस्त रखने के लिये एक दुश्मन तो चाहिये न! मुश्किल यह है कि चीन बहुत खौंचड़ी है पर उसने अपने यहां अपराधियों को पनाह नहीं दी है जिसको प्रचारतंत्र हीरो बना दे। वहां की हीरो तो बस सरकार ही है! अमेरिकी आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं कि उसकी विकासदर में अपराध के पैसे का भी योगदान है। ऐसे में वहां के किसी अपराधी का महिमामंडन तो यहां हो नहीं सकता। लेदेकर एक ही विषय बचता है ‘सीधा हमला’। भारतीय सैन्य विशेषज्ञ स्वयं मानते हैं कि सीमा का आधिकारिक अभिलेख न होने के कारण दोनों के सामने ऐसी समस्या आती है। जब भारत को समस्या आयी तो उसे इस तरह सीधा हमला प्रसारित कर प्रचारतंत्र ने जो गजब की फुर्ती दिखाई उसके लिये वह प्रशंसा के काबिल है क्योंकि उसने उस देश को हिला दिया जो किसी से डरता नहीं है। इसका यह भी नतीजा आ सकता है कि आगे चीन ऐसी गल्तियां न करे जिससे तिल का ताड़ बने।
वैसे एक खबर एक चैनल ने दूसरी खबर भी चलाई कि भारतीय बाघ का दुश्मन चीन। दरअसल वहां शेर की खाल से शराब बनती है और आरोप लग रहा है कि नेपाल के तस्करी के जरिये भारत से खाल चीन जाती है। शेरों का शिकार करने कोई चीनी नहीं आते बल्कि अपने ही देश के लोग यह काम करते हैं। इसमें चीन का पूरा दोष नहीं है पर तस्करी के द्वारा इस तरह शेरों की खाल जाने की जिम्मेदारी से वह बच भी नहीं सकता। फिलहाल दोस्ताना रूप से यह बात तो चैनल वाले मान भी रहे हैं पर यह दोस्ताना आगे जारी रहेगा-यह चीनियों को सोचना भी नहीं चाहिए। अपने देश में शेरों की हत्या कर देना कोई सामान्य मामला नहीं है पर जिस तरह चीन को लक्ष्य कर यह कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया उससे तो लग रहा है कि चीन पर प्रचारतंत्र की नजर पड़ गयी है। आने वाले समय में ऐसे बहुत सारे कार्यक्रम आ सकते हैं जिस पर चीन बौखला सकता है। इसकी वजह यह है कि वहां की हर गतिविधि के लिये सरकार सीधे जिम्मेदार मानी जाती है। अभी कुछ दिनों पहले भारत के नाम से नकली दवाईयां नाइजीरिया में भेजने के मामले में चीन फंस चुका है। भारतीय प्रचारतंत्र अभी तक चीन को समझता नहीं था पर अब उसे लगने लगा कि वहां की सरकार भारत को परेशान करने के लिए अपराध की हद तक जा सकती है। अपराध की भनक भी प्रचारतंत्र के कान खड़े कर सकती है क्योंकि सनसनी तो उसी ही फैलती है न! यहीं से चीन भी अब उसके दायरे में आ गया है क्योंकि उसके साफसुथरे और संपन्न होने का तिलिस्म भारतीय प्रचारतंत्र के सामने खत्म हो गया है। अब चीन के सामने एक केवल एक मार्ग है वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष से भारत के विरुद्ध अपराध होने को रोक दे नहीं तो जितना वह करेगा उससे अधिक तो भारतीय प्रचारतंत्र बतायेगा। इसे रोकना किसी के लिये संभव नहीं है।
—————–
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

बुतों का बाजार-हास्य व्यंग्य कविता (buton ka bazar-hindi hasya kavita)


चौराहे पर खड़े पत्थर के बुत पर
कंकड़ लगने पर भी लोग
भड़क जाते हैं।
अगला निशाना खुद होंगे
यह भय सताता है
या पत्थर के बुत से भी
उनको हमदर्दी है
यह जमाने को दिखाते हैं।

कहना मुश्किल है कि
लोग ज्यादा जज्बाती हो गये हैं
या पत्थरों के बुतों के सहारे ही
खड़े हैं उनके घर
जिनके ढहने का रहता है डर
जिसे शोर कर वह छिपाते हैं।
यह मासूमियत है जिसके पीछे चालाकी छिपी
जो लोग कंकड़ लगने से कांप जाते हैं।
……………………….
बुतों के पेट से ही
बुत बनाकर वह बाजार में सजायेंगे।
समाज में विरासत मिलती है
जिस तरह अगली पीढ़ी को
उसी तरह खेल सजायेंगे।
जज्बातों के सौदागर
कभी जमाने में बदलाव नहीं लाते
वह तो बेचने में ही फायदा पायेंगे।
करना व्यापार है
पर लोगों के जज्बातों की
कद्र करते हुए सामान सजायेंगे।

………………………………
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप