Tag Archives: anna hajare

प्रचारित और प्रस्तावित प्रारूप में अंतर का रहस्य समझ में नहीं आया- अन्ना हज़ारे के आंदोलन पर विशेष लेख (diffrench in draft is suspicios-anna hazare ke andolan par vishesh lekh)


          अन्ना हजारे का अनशन बहुत चर्चित हुआ था। उनका जनलोकपाल बनाने के लिये कानून बनाने की मांग पर जोरदार चर्चा हुई थी। वैसे सरकारी तौर से लोकपाल विधेयक बनाने की तैयारी चल रही थी तो साथ ही दो नंबर के धनपतियों के विरुद्ध जांच एजेंसियों की कार्यवाही के समाचार भी जमकर आ रहे थे। भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक स्वयंसेवी संस्था का आंदोलन बाबा रामदेव का नाम लेकर जोरदार प्रचार पा रहा था। स्थिति यह हो गयी थी कि प्रचार माध्यम भ्रष्टाचार और दो नंबर के धन पर शोर मचा रहे थे।
          ऐसे में अवसर पाकर बीसीसीआई की टीम की कथित विश्व विजय से प्रेरित होकर महाराष्ट्र के समाजसेवी  अन्नाहजारे दिल्ली अनशन के लिये पधारे। उनका नाम भले ही भारत के बौद्धिक क्षेत्र में जाना जाता रहा है पर महाराष्ट्र के बाहर का आम आदमी उनको अधिक नहीं जानता था। इस अनशन से पूरे भारत में उनका प्रचार हुआ। वह दूसरे गांधी कहलाने लगे। उनकी मांग मानी गयी तो पूरे देश में जश्न मनाया गया।
लोकपाल बनाने के लिये पांच सदस्य जनता की तरफ से लिये गये जिनको अन्ना साहब ने मनोनीत किया। स्वयं अन्ना हजारे भी इसके सदस्य बने। अन्ना जी के पास कोई स्वयं का संगठन नहीं है इसलिये दिल्ली में सक्रिय ही स्वयंसेवी संगठन के चार लोग उन्होंने अपने साथ जनप्रतिनिधि के रूप में लिये। तय बात है कि इन चार सदस्यों की प्रतिबद्धताऐं अन्ना हजारे की तरह प्रमाणिक नहीं थी। कथित जनलोकपाल का प्रारूप भी इन लोगों ने ही बनाया था और शायद प्रचार की ताकत पाने के लिये उन्होंने अन्ना हजारे का उपयोग किया या वह ही एक बनी बनायी रणनीति का लाभ उठाने के लिये स्वयं ही प्रेरित हुए कहना कठिन हैं। इस तरह पांच सरकारी तथा पांच अन्ना साहेब के सदस्यों को मिलाकर कानून बनाने के लिये बनी दस सदस्यीय की पहली बैठक संपन्न हो गयी है।
           हमने शुरु में ही लिखा था कि अन्ना हजारे जी के आंदोलन को बहुत लंबी दूरी तय करनी है। अगर हम पहली बैठक का प्रचार देखें तो कहना पड़ता है कि पहली बैठक में खोदा पहाड़ निकली चुहिया। प्रचार माध्यामों ने अन्ना हजारे की तरफ से प्रचारित जनलोकपाल के लिये जो प्रारूप बताया था उसमें से ‘कुछ’ हटाया गया है। वही ‘कुछ’ हटाया गया है जिस पर यथास्थितिवादियों को आपत्ति थी।
         महत्वपूर्ण बात यह है कि हम देख रहे हैं सरकार भी भ्रष्टाचार के विरुद्ध जूझती दिख रही है। इधर न्यायालय भी भ्रष्टाचार पर भारी टिप्पणियां कर रहे हैं। सरकार लोकपाल कानून बनाने वाली थी तो अन्न हजारे जन लोकपाल बनाने की मांग लेकर सामने आ गये। ऐसा लगता है कि कथित स्वयंसेवी आंदोलनकारी संस्था अपनी भ्रष्टाचार विरोधी छवि बचाये रखने के लिये अन्ना जी को ले आयी। लोकपाल का नामकरण ‘जनलोकपाल’ कर ही वह अपनी इज्जत बचा रही है। अभी तक यह नहीं पता चला कि सरकार के लोकपाल कानून तथा अन्ना हजारे के कल्पित जनलोकपाल के बीच अंतर क्या रहने वाला है?
         हम यहां सरकार के प्रस्तावित लोकपाल कानून से अधिक अन्ना हजारे के जनलोकपाल पर जानना चाहते हैं। बैठक के बाद अन्ना साहेब ने कहा-‘सब ठीक चल रहा है।’
उनके ही एक प्रवक्ता कानून विद का कहना है कि ‘हमारे प्रस्तावित मसौदे वह ‘कुछ’ शामिल नहीं था जो हटाने की बात हो रही है।’
अगर यह सच है तो जब अन्ना हजारे के आंदोलन का प्रचार हो रहा था तब यह बात उन्होंने क्यों नहीं कही? हमने पहले भी लिखा था कि अन्ना साहेब के साथ जो चार लोग हैं उन पर नज़र रखी जायेगी। सरकारी प्रतिनिधियों का रवैया इतना चर्चा का विषय नहीं बनेगा जितना कथित रूप से जनप्रतिनिधियों के विचार जाने जायेंगे।
        ऐसा लगता है कि अन्ना साहेब अपनी राष्ट्रीय छवि बनाने दिल्ली आये थे। उनको यह अनुमान नहीं था कि वह अनचाहे ही विशाल भारत की जनता को आंदोलित कर रहे हैं। सरकार निरंतर भ्रष्टाचार के विरुद्ध कुछ न कुछ करती रही है। वह लोकपाल कानून भी बनाने जा रही थी। ऐसे में कथित आंदोलन से निकल देश के महान कानून विद जनप्रतिनिधि बनकर पहुंच गये। हालांकि उस समय किसी ने यह उल्लेख नहीं किया कि सरकार के प्रतिनिधि भी जनप्रतिनिधि पहले हैं बाद में उनका राजकीय पद आता है। तब अन्ना हजारे क्यों आये? आये तो फिर उनके आंदोलन का क्या प्रभाव हुआ?
             जब अन्नाजी ने विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता जीतने की बधाई देते हुए भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन में जीत के लिये वैसा ही संघर्ष करने का आव्हान किया तभी लगने लगा था वह स्वयं या उनके अनुयायी कोई खेल खेलने आ गये हैं। अन्ना के कथित जनप्रतिनिधियों में दो ऐसे लोग हैं जो अनुभवी हैं और वर्तमान व्यवस्था से संबद्ध रहे हैं इसलिये बड़े बदलाव के लिये उनके तैयार होने पर पहले भी संदेह था और अब तो पुष्टि हो गयी है।
अन्ना ने इन लोगों को चुनने पर कहा था कि ‘उन्होंने जनलोकपाल कानून का प्रारूप बनाया है, इसलिये वह अधिक जानकारी है। अतः उनको रखा जा रहा है।’
            जनलोकपाल के लिये संघर्षरत आंदोलनकारियों के प्रचारित और प्रस्तावित प्रारूप में अंतर आना इस बात को दर्शाता है कि यहां नारों और घोषणाओं पर चलने की आदत का अनुकरण जारी है। समस्या अब अन्ना हजारे जी के सामने आने वाली है। अगर प्रचार माध्यमों में सक्रिय सभी बड़े आंदोलनकारियों की सूची देखी जाये तो उनमें कई ऐसे हैं जो अब सीधे अन्ना हजारे पर सवाल उठायेंगे। उससे भी ज्यादा बुरी बात यह होगी कि उनके प्रचार के बाद देश के आमआदमी भी अन्ना हजारे की तरफ देखेगा। आम आंदोलनकारी के सामने अब दोबारा मुखातिब होना अन्ना हजारे के लिये मुश्किल है क्योंकि वह उनके प्रस्तावित और प्रचारित प्रारूप पर सवाल उठायेगा। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अन्ना हजारे का आंदोलन भी उसी बाज़ार से प्रायोजित था जो किसी बहाने भी जनता को व्यस्त रखना चाहता है। सुनने में आया है कि अन्ना हजारे जी के आंदोलन से भ्रष्टाचार शब्द लोकप्रिय हो गया है अब उसपर इंटरनेट पर गेम बन गये हैं जिसमें भ्रष्टाचार के लिये बदनाम लोगों को सजा देने के खेल का निर्माण किया गया है। अब देश के अप्प टप्पू अपनी उंगलियों से भ्रष्टाचारियों को सजा देंगे। उनका अच्छा समय पास होगा और बाज़ार पैसा भी कमायेगा।
           आखिरी बात अन्ना हजारे देश के राजनीतिक नेताओं पर फब्तियां कस रहे थे पर ऐसा लगता है कि उनकी स्थिति को देखते हुए सभी चुप थे वरना तो अनेक नेताओं की भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने की इच्छा दिखती है और अंततः उनको ही उसे रोकने के लिये कानून बनाने हैं। जन इच्छा को पूरा करने के लिये उनसे आशा की भी जानी चाहिए। हम उनकी मंशा पर शक नहीं कर सकते खासतौर से जब कथित आंदोलनकारियों के प्रस्तावित और प्रचारित प्रारूप में अंतर हो। वैसे हमने जो लिखा है वह प्रचार माध्यमों में देख सुनकर ही लिख रहे हैं। आंदोलनकारियों के कानूनविद प्रवक्ता की स्वीरोक्ति देखने के बाद ही हमने यह लेख लिखा है जिसमें उन्होंने कहा कि ‘वह कुछ तो पहले ही हमारे प्रारूप में नहीं था।’
जबकि हमने देखा कि वह कुछ था जो हटाया गया। बहरहाल आगे देखें क्या होता है। बहरहाल जिन पर कानून बनाने का जिम्मा है वह तो बनायेंगे ही यह अलग बात है कि कुछ लोग उसका श्रेय स्वयं लेने का प्रयास करेंगे। संभव है कि सरकार अपने ही प्रस्तावित कानून में चर्चा कर कुछ कठोर नियम भी बनाती पर लगता है कि इसमें श्रेय लेने के लिये आंदोलन को जनाभिमुख बनाने का प्रयास कुछ पुराने बुद्धिजीवियों ने किया। जबकि यह न कर सरकार से मांग कर भी वह देश का काम चला सकते थे। यह अलग बात है कि उनको तब कोई नहीं पूछता। हमने जो लिखा है वह टीवी चैनलों में दिख रहे समाचारों के आधार पर बने विचारों से लिखा है। अगर कोई अन्ना हजारे के विरुद्ध दुष्प्रचार का यह हिस्सा हो तो हमें नहीं मालुम। अलबत्ता प्रचारित और प्रस्तावित प्रारूप में अंतर उनकी छवि खराब कर सकता है। 
इस संबंध में पूर्व में लिखा आलेख यहां पढें।
—————–
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
5हिन्दी पत्रिका

६.ईपत्रिका
७.दीपक बापू कहिन
८.शब्द पत्रिका
९.जागरण पत्रिका
१०.हिन्दी सरिता पत्रिका  

योग साधना मजाक का विषय नहीं होती-अन्ना हज़ारे के आंदोलन पर विशेष लेख-2 (yoga sadhna mazak ka vishya nahin-special article on anna hazare anti corruption moovment part 2)


अन्ना हजारे के आंदोलन के चलते जनलोकपाल कानून का प्रारूप बनाने वाली समिति मे न्यायविद् पिता पुत्र के शामिल होने पर आपत्ति कर बाबा रामदेव ने गलती की या नहीं कहना कठिन है। इतना तय है कि वह श्रीमद्भागवत गीता का ‘गुण ही गुणों में बरतते हैं’ और ‘इद्रियां ही इंद्रियों में बरतती हैं’ के सिद्धांतों को नहीं समझते। वह दैहिक रूप से बीमार समाज के विकारों को जानते हैं पर मानसिक विकृतियों को नहंी जानते। दरअसल उनका योग लोगों को स्वस्थ रखने तक ही सीमित हो जाता है। उनका मानना है कि स्वस्थ शरीर में ही ही स्वस्थ मन रहता है इसलिये देश के लोग स्वस्थ रहेगा। यह ठीक है पर मन की महिमा भी होती है। भौतिकता में उसे लिप्त रहना भाता है जिससे अंततः विकार पैदा होते हैं। इस मन पर निंयत्रण करने की विधा भी योग में है पर उसके लिये जरूरी है कि योग साधक योग के आठ अंगो को समझे। उसके बाद श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करे। बाबा रामदेव अनेक बाद श्रीगीता के संदेश सुनाते हैं वह अभी ‘गीता सिद्ध’ नहीं बन पाये। यही कारण है कि वह अनेक घटनाओं पर तत्कालिक रूप से अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। कहीं न कहीं प्रचार की भूख में उनके मन के लिप्त होने का प्रमाण है। है। उनको यह मालुम नहीं कि यह देश नारों पर चलता है घोषणाओं पर खुश हो जाता है लोग सतही विषयों बहसों में मनोरंजन करने की आदत को जागरुकता का प्रमाण मान लेते हैं। सच तो यह है कि बाबा रामदेव की सोच भी समाज से आगे नहीं बढ़ पायी है। अन्ना हजारे के आंदोलन से अस्तित्व में आई लोकजनपाल समिति में जनप्रतिनिधियों के नाम पर ‘वंशवाद’ की बात कर बाबा रामदेव ने अपने वैचारिक क्षमताओं के कम होने कप प्रमाण दिया है। इस समिति का पद कोई सुविधा वाला नहीं है न ही इस पर बैठने वाले को कोई नायकत्व की प्राप्ति होने वाली है। फिर सवाल यह है कि इसमें शामिल होने का मतलब क्या कोई सम्मान मिलना है या उसमें जिम्मेदारी निभाने वाली भी कोई बात है। बाबा रामदेव ने पूर्व महिला पुलिस अधिकारी के शामिल न होने पर निराशा जताई पर वह जरा यह भी बता देते कि क्या वह यह मानते हैं कि वह अपनी जिम्मेदार जनता की इच्छा के अनुरूप निभाती क्योंकि उनमें ऐसा सामर्थ्य भी है।

ऐसा लगता है कि बाबा रामदेव प्रचार माध्यमों में रचित ‘रामदेव विरुद्ध हज़ारे’ मैच के खेल में फंस गये। प्रचार माध्यम तो यह चाहते होंगे कि यह मैच लंबा चले। दरअसल बाबा रामदेव और श्री अन्ना हज़ारे एक ही स्वयंसेवी बौद्धिक समूह के संचालित आंदोलन के नायक बन गये जो बहुत समय से देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के लिये जूझ रहा है। पहले वह स्वामी रामदेव को अपने मंच पर ले आया तो अब स्वप्रेरणा से दिल्ली में आये अन्ना हज़ारे के आमरण अनशन शिविर में अपना मंच लेकर ही पहुंच गया। बाबा रामदेव का अभियान एकदम आक्रामक नहीं हो पाया पर अन्ना जी का आमरण अनशन तीव्र सक्रियता वाला साबित हुआ जिससे स्वयंसेवी बौद्धिक समूह को स्वाभाविक रूप से जननेतृत्व करने का अवसर मिला। उसमें कानूनविद भी है और जब कोई बात कानून की होनी है तो उनको बढ़त मिली है इसमें बुरा नहीं है। फिर अगर कानून बनाने वाली समिति में पिता पुत्र हों तो भी उसमें बिना जाने बूझे वंशवाद का दोष देखना अनुचित है। खासतौर से तब जब काम अभी शुरु ही नहीं हुआ है।
अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के व्यक्तित्व में कोई समानता नहीं है। ंअन्ना जी सच्चे समाज सेवक का प्रतीक हैं जिनका अभी तक कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र तक सीमित था। इसके विपरीत बाबा रामदेव का व्यक्त्तिव और कृतित्व विश्व व्यापी है। दोनों एक ही लक्ष्य के लिये एक साथ आये जरूर हैं पर दोनों की भूमिका इतिहास अलग अलग रूप से दर्ज करेगा वह भी तब जब आंदोलन अपनी एतिहासिक भूमिका साबित कर सका।
जब श्री अन्ना हजारे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आमरण अनशन पर थे तब वह प्रचार माध्यमों में छा गये जिससे उनकी जनता में नायक की छवि बनी। जबकि ऐसी छवि अभी तक अकेले स्वामी रामदेव की थी। ऐसे में उनको लगा कि वह पिछडे रहे हैं। वह अन्ना हजारे के शिविर में भी अंतिम दिन आये। उन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया कि वह इस आंदोलन में अन्ना हजारे के साथ हैं। सच तो यह है कि उनका बयान इस तरह था कि जैसे अन्ना हजारे उनके ही अभियान को आगे बढ़ाने आये हैं। यह इसी कारण लगा कि वहां वही बौद्धिक समूह उपस्थित था जो कि पहले बाबा रामदेव के साथ रहा है।
वैसे अन्ना हजारे बाबा रामदेव से योग न सीखें पर राजनीतिक दृढ़ता के बारे में उनको हजारे जी का अनुकरण करना चाहिए। एक भी बयान चालाकी से नहीं दिया और अपनी निच्छलता से ही योग होने का प्रमाण प्रस्तुत किया। अब तो ऐसा लगने लगा है कि बाबा रामदेव योग से इतर अलग अपनी गतिविधियों में अपनी श्रेष्ठता के प्रचार में फंसने लगे हैं।
बाबा रामदेव को यह बात समझ लेना चाहिए कि अभी भारतीय समाज नारों और घोषणाओं में ही सिमटने का आदी है। ऐसे में एक वाक्य और शब्द का भी कोई दुरुपयोग कर सकता है। अतः जहां तक हो सके अधिक बयानबाजी से बचना चाहिए। आप कहीं पचास वाक्य बोलें पर यहां आदमी एक पंक्ति या शब्द ढूंढेगा जिसको लेकर वह आप भड़क सके।
मान लीजिये आपने यह कहा कि ‘अपने घर में बेकार पड़े पत्थर मै। किसी दिन बाहर सड़क पर फैंक दूंगा।’

ऐसे में आपको बदनाम करने के लिये कोई भी आदमी बाहर कहता फिरेगा कि वह कह रहे हैं कि‘ मैं पत्थर किसी सड़क पर फैंक दूंगा। अब आप बताओ किसी को लग गया तो, कोई घायल हो गया तो, चलो उसके घर पर प्रदर्शन करते हैं।’
यहां अनेक बुद्धिजीवियों और प्रचारकों ने इस झूठे प्रचार में महारत हासिल कर रखा है। दरअसल भ्रष्टाचार देश के समाज में घुस गया है। यही कारण है कि यथास्थिति सुविधाभोगी जीव इस आंदोलन से आतंकित है। ऐसे में वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनकारियों के नेतृत्व के शब्दों और वाक्यों का अपनी सुविधा से इस्तेमाल कर सकते हैं। श्री अन्ना हजारे के समर्थकों को अभी यह अंदाजा नहीं है कि उनका अभी कैसे कैसे वीरों से सामना होना है जो यथास्थितिवादियों के समर्थक या किराये पर लाये जायेंगे। एक बात तय रही है कि यह घटना सामान्य लगती है पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोर्चा लेने वाले अग्रिम पंक्ति के सभी बड़े लोगों को यह बात समझना चाहिए कि यह उन लोगों की तरफ से भी प्रतिरोध होगा जो यथास्थितिवादी हैं।
बाबा रामदेव ने गलती की तो न्यायविद् पिता पुत्र भी पीछे नहीं रहे। कानून का प्रारूप बनाना योग सिखाने से अधिक कठिन है। विशुरु रूप से मजाकिया वाक्य है भले ही गंभीरता से कहा गया है। बात वहीं आकर पहुंचती है कि योग पर वही लोग अधिक बोलते हैं जिनको इसका ज्ञान नहीं है। कानून बनाना कठिन काम हो सकता है पर अपने देश में इतने सारे कानून बनते रहे हैं। कुछ हटते भी रहे हैं। मतलब कानून बनाने वाले बहुत हैं पर योग सिखाने वाले बहुत कम हैं। बाबा रामदेव जैसे तो विरले ही हैं। भ्रंष्टाचार विरोधी आंदोलन का योग से कोई वास्ता नहीं है। अगर आप बाबा रामदेव पर योग का नाम लेकर प्रहार करेंगे तो तय मानिए इस देश में योग साधकों का एक बहुत बड़ा वर्ग आप पर हंसेगा और बनी बनाई छवि मिट्टी में मिलते देर नहीं लगेगी। अभी भारतीय योग साधना का प्रचार अधिक हो रहा है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि टीवी पर योगासन और प्राणायाम देख सुनकर उसके बारे में पारंगत होने का दावा कर लें। अगर कोई सच्चा योगी है तो उसके लिये कानून बनाना किसी न्यायविद् से भी ज्यादा आसान है क्योंकि आष्टांग योग के साधक वैचारिक योग में भी बहुत माहिर हो जाते हैं। न्यायविद् तात्कालिक हालत देखकर कानून बनाता है और योगी भविष्य का भी विचार कर लेता है। इसका प्रमाण यह है कि योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने आज से हजारों वर्ष पूर्व श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान दिया था वह आज भी प्रासंगिक लगता है।

बहरहाल बाबा रामदेव ने श्री अन्ना हजारे का सम्मान करते हुए अनेक बातें कही हैं तो श्री अन्ना हजारे ने भी निच्छलता से स्वामी रामदेव के बारे के प्रति अपना विश्वास दोहराया है। यह अच्छी बात है। हम जैसा आम आदमी और फोकटिया लेखक दोनों महानुभावों के कृत्यों पर अपनी दृष्टि जिज्ञासावश रखता है तब यह जानने की उत्सुकता बढ़ती जाती है कि आखिर समाज में बदलाव की चल रही मुहिम कैसे आगे बढ़ रही है।
चलते चलते
————————-
चलते चलते एक बात! पता नहीं यह बात इस विषय से संबंधित है कि नहीं! एक योगसाधक के रूप में हम यह दावा कर सकते हैं कि योग साधना मजाक  का विषय नहीं है। टीवी पर चल रहे एक कामेडी कार्यक्रम में इस पर फब्तियां कसी गयीं। यह देखकर यह विचार आया। हमें भी हंसी आई पर कामेडियनों पर नहीं बल्कि उन पटकथा लेखकों पर जो बिचारे अपनी व्यवसायिक बाध्यताओं की वजह से ऐसा लिखते हैं। हमारे लिए  वह अपने अज्ञान की वजह से दया के पात्र हैं क्रोध का नहीं।

——————

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका