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किसान और ग्राहक तो घास हैं, उनसे कौन यारी करेगा-हिन्दी लेख


        किराना के खेरिज व्यापार में विदेशी निवेश पर चल रही बहस में कई बातें दिलचस्प हैं। यकीनन अगर हम उनको सुने तो अपनी बात प्रभावी ढंग से न रख सकते हैं न सोच सकते हैं। जहां तक हमारी इस विषय पर अपनी सोच यह है कि अभी तक इससे देश के लाभ या हानियों पर किये गये अनुमान उस रूप में प्रकट नहीं होंगे जिस तरह व्यक्त किये जा रहे हैं।
            हम लाभ हानियों से अलग हटकर एक बात जरूर मानते हैं कि इस देश की समस्याओं का हल अर्थशास्त्र के मूल सिद्धांतों के अनुरूप करने की बात तो यह कभी दिखाई नहीं दी। हम एक अर्थशास्त्री होने के नाते-अर्थशास्त्र हमारे अध्ययन के दौरान एक विषय रहा है इसलिये यह पदवी हमने स्वयंभू रूप से स्वयं धारण की है-मानते हैं कि अगर इस देश में राज्य प्रबंध अगर प्रत्येक गांव में स्वच्छ पानी, पक्की सड़क तथा बिजली की व्यवस्था कर ले तो इस देश में आर्थिक समस्यायें नगण्य रह जायेंगी। यह अलग बात है कि आज़ादी   के बाद इस पर भारी पैसा खर्च हुआ पर भ्रष्टाचार के कारण परिणाम शून्य ही रहा। गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, अशिक्षा तथा भुखमरी जैसी समस्यायें पूरी तरह से खत्म भले न हों पर वह गंभीर चिंता का विषय नहीं रहेगी। मूल बात कहें तो सरकार कल्याण के नाम पर दूसरे काम न भी करे तो चल जायेगा।
          यह कोई  अनिवार्य  शर्त नहीं हो सकती है कि गांव के विषय पर लिखने के लिये वहां पैदा होना जरूरी है। हम शहर में जन्मे हैं पर अनेक बार गांवों में जाने का अवसर मिला। उससे यह लगता है कि वहां मूलभूत सुविधाओं का पूर्णतः अभाव है। बरसात के दिनों में जब गांवों में सब्जी, गेंहु, चावल तथा दूध अधिक मात्रा में होता है तब वहां से उसे निकालकर शहर पहुंचाने के लिये कितनी मुश्किल होती है यह हमने स्वयं देखा है। उस समय अशुद्ध जल की वजह से बीमारी अपना रौद्र रूप दिखाती है तब यह गांव के मार्ग इस कदर नाले में बदल जाते हैं कि रात को किसी मरीज को गांव से बाहर पास के बड़े गांव या शहर ले जाना लगभग असंभव होता है। इसी कारण छोटी बीमारी में लोग वहां मर जाते हैं। गांव में अगर अस्पताल भी हो तो वहां चिकित्सक पहुंच नहीं सकता। वैसे सामान्य हालत में भी स्वास्थ्य कमी वहां पहुचंने से कतराते हैं। अगर आजादी के बाद हम देश के पूरे गांवों में शुद्ध जल, बिजली और पक्की सड़क जैसी सुविधायें नहीं पहुंच पाये तो यह संकट हमारी प्रबंध व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। शहरों के पास जो गांव हैं उनमें शायद ऐसा आधारभूत ढांचा मिल जाये पर जो दूर हैं उनकी समस्याओं पर कितना सोचा गया यह अलग से विचार का विषय है।
     विदेशी कंपनिंयां अगर भारत आ रही हैं तो वह कोई आधारभूत ढांचा नहीं बनायेंगी बल्कि उनका अपनी सुविधानुसार दोहन ही करेंगी। जहां आधारभूत ढांचा नहंी है वहां उनको उन्हीं बिचौलियों पर निर्भर रहना होगा जिनको हटाने की बात हो रही है। इधर हम सुन रहे हैं कि अमेरिका और यूरोप गंभीर रूप से आर्थिक संकट में हैं और अब वहां विकासशील देशों के निचले स्तर पर जाकर कमाने की बात हो रही है। हमने अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा को यह कहते हुए पढ़ा था कि हमें विदेशों में जाकर छोटे स्तर पर काम करना होगा। अमेरिका की विदेशमंत्राणी हेनरी क्लिंटन ने भी कहा था कि काम के बारे में भारतीयों से सीखना चाहिए।
          बहरहाल इस बहस में एक महत्वपूर्ण समाचार पर चर्चा किसी ने नहीं की कि अमेरिका ने पाकिस्तान के 28 सैनिकों को मार दिया जिससे दोनों देशों के बीच गंभीर तनाव है। पाकिस्तान ने अपना एक हवाई अड्डा अमेरिकी सेना से खाली करने को कहा है। इतना ही नही उसने संयुक्त राष्ट्र में भी यह मामला उठाया है। भारतीय प्रचार माध्यम इस पर खबर देकर चुप हो गये हैं। उनको शायद इसका अंदाजा नहीं है कि अंततः यह तनाव युद्ध में बदल सकता है। अगर पाकिस्तान अमेरिका के हाथ से निकल गया तो उसका राजनीतिक प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप से करीब करीब खत्म होने जैसा ही है। हमारा मानना है कि अमेरिका से अधिक मित्रता से अब कोई लाभ नहीं है। वह सामरिक रूप से शक्तिशाली है पर उसका आर्थिक ढांचा करीब करीब गड़बड़ाने लगा है। ऐसे में पाकिस्तान की राजनीतिक बगावत उसके सम्राज्य में आखिरी कील की तरह लग सकती है। देखा जाये तो पाकिस्तान अपने सहधर्मी देशों का एक तरह से प्रवेश द्वार है। भले ही वह एक सार्वभौमिक राष्ट्र की तरह दिखता है पर संक्रमण काल में उसकी सरकार की बैठक सऊदी अरब में होती है तो क्रमवार होने वाले क्रिकेट मैच दुबई या आबुधाबी में होते हैं। जिन दूसरे देशों की क्रिकेट टीमों का क्रम में पाकिस्तान का दौरा होता है वह दुबई या आबुधाबी में उसके साथ मैच खेलती हैं। ऐसे में पाकिस्तान के साथ अमेेरिका का तनाव मध्यएशियाई देशों तक विस्तृत हो सकता है। यह देश एक तरह से अमेरिका की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं।
         बहरहाल अब बड़े विषयों पर बड़े विद्वानों की चर्चा सुनकर ऐसा लगता है कि निरपेक्ष या स्वतंत्र प्रेक्षकों की बातें दमदार होती हैं पर महत्व केवल संगठित विद्वानों को ही दिया जा रहा है। अनेक स्वतंत्र विद्वानों ने किराना के खेरिज व्यापार में विदेशी निवेश पर अपनी राय बेबाकी रूप से रखी। वह इससे चिंतित नहीं है पर खुश भी नहीं है। जहां तक किसानों और उपभोक्ताओं के हित का प्रश्न है तो सवाल यह है कि इन दोनों रूपों में हर मनुष्य शोषित होता है और अगर उसे प्रसन्न रखने का प्रयास किया जाये तो पूरी दुनियां का व्यापार ही ठप्प हो जाये। वाल मार्ट आये या नहीं यह समस्या शोषितों के आपसी द्वंद्व का विषय है। यह अलग बात है कि समय के अनुसार बाज़ार और प्रचार के अनुसार समाज का स्वरूप बदलता रहता है और उसे रोकना कठिन है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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महंगाई का साम्राज्यवाद-हिन्दी लेख (mehangai ka samrajya-hindi lekh


         अमेरिका के प्रतिवेदनों पर भारतीय प्रचार माध्यम इतना हल्ला क्यों मचाता है? ऐसा लगता है अमेरिका दुनियां भर के शिखर पुरुषों का बॉस है जो उनका गोपनीय प्रतिवेदन लिखता है। मजे की बात यह है कि जिन लोगों का गोपनीय प्रतिवेदन प्रतिकूल होता है वह कभी उसका विरोध नहीं करते और जिनका प्रशंसनीय है वह उछलने लगते हैैं। कभी कभी तो यह देखकर हैरानी होती है कि शिखर पुरुषों के दिल का हाल उनके देश के लोग तक नहीं जान पाते पर अमेरिका राजनयिक को पता लग जाता है वह भी उनके ही श्रीमुख से! खंडन होना चाहिए पर होता नहीं। कई बार तो निंदा योग्य बयानों की भी निंदा नहीं होती।
          अभी तक वामपंथी बुद्धिजीवियों से अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतिरोध करने का नारा सुनते थे मगर तब यह समझ में नहीं आता था कि आखिर यह है किस प्रकार का! दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवियों ने पूंजीवाद और अमेरिका का विरोध एक साथ किया है इसलिये हमेशा ही उनके बारे में भ्रमपूर्ण स्थिति रही है। चूंकि वामपंथी पूंजी पर राज्य के नियंत्रण की बात करते हैं तो भारतीय समाज उसे स्वीकार नहीं करता। इसका कारण यह है कि राज्य के नियंत्रण से भी देश का कोई भला नहीं हुआ! फिर आज की कंपनी प्रणाली जरूर ब्रिटेन और अमेरिका की देन हो पर समाज में पूंजी और श्रम की अपनी स्वायत्ता तो भारतीय अर्थशास्त्र की ही देन है। राज्य को अनियंत्रित पूंजी के मद से उपजे अपराध तथा श्रम का शोषण रोकने का अधिकार तो भारतीय अर्थशास्त्र मानता है पर वह उनका निंयत्रणकर्ता होना उसमें स्वीकार नहीं है। यहीं आकर भारतीय समाज वामपंथियों से छिटक जाता है क्योंकि उसको लगता है कि उसकी आर्थिक और श्रमशील गतिविधियों पर राज्य का नियत्रंण नहीं होना चाहिए। यही कारण है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतिरोधक होने का दावा करने वाले वामपंथी कभी भारतीय समाज में स्थान नहीं बना पाये।
           दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवी अमेरिकी साम्राज्य के भौतिक स्वरूप का ही बखान करते हैं। उसने जापान पर बम फैंका, उसने जर्मनी को रौंदा तथा वियतनाम पर हमला किया, तथा उसने अफगानिस्तान पर हमला किया तथा इराक पर हमला किया आदि बातें कहकर वामपंथी बुद्धिजीवियों ने भारतीय समाज को आंदोलित करने का प्रयास किया मगर अभौतिक या अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका ने जो कारगुजारियां की इसकी चर्चा नहीं की।
             वामपंथी अब भी कहते हैं कि अमेरिका साम्राज्यवाद फैला रहा है! इसका मतलब वह केवल इतिहास में जीते हैं। सच बात तो यह है कि अमेरिका सभी जगह राज्य कर रहा है। वामपंथी बुद्धिजीवियों ने हमेशा ही इतिहास सुनाया है-यह हो गया, वह हो गया, इसलिये अब यह होगा और वह होगा। प्रतिरोध करने के नाम पर चंद नारे लगा लिये और कभी कभार प्रदर्शन कर लिया। यह देखा ही नहीं कि अमेरिका धीरे धीरे अब दुनियां भर के शिखर पुरुषों का बॉस बनता जा रहा है।
         अपने प्रचार माध्यमों ने हद ही कर दी है। अमेरिका किसी भी देश के शिखर पुरुष का गोपनीय प्रतिवेदन जारी करता है तो अपने यहां के प्रचार माध्यम उसे ऐसे उठाये घूमते हैं जैसे कि इस नये वैश्विक ब्रह्मा ने कोई नयी बात कर दी हो। दरअसल हमारे देश के प्रचार माध्यमों का आधार पूंजी है और जिसका उद्गमा स्थल ऐसा लगता है अमेरिका है। सभी विकासशील देशों के आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुष अमेरिका पैसा भेजते हैं पर वह विनिवेश होकर यहां आता है। आर्थिक और सामाजिक शिखर पुरुषों की बात तो छोड़िये हमारे देश के धार्मिक पुरुष भी अमेरिका के अनुयायी लगते हैं। इनमें से कई अपने शिष्यों को दर्शन देने अमेरिका जाते हैं।
        वामपंथी बुद्धिजीवी भारत में बढ़ती महंगाई का राज नहीं जान पाये। क्या उनको नहीं है कि इस देश में पांच सौ और हजार के नोट के लिये आसानी से प्रचलन में रहें इसके लिये महंगाई योजना पूर्वक बढ़ाई जा रही है। देश की कंपनियां आम जनमानस को अपनी जेब में पांच सौ और हजार के नोट जेब में घूमते देखना चाहती हैं। ऐसा लगता है कि भारत ही नहीं वरन् पूरे विश्व के विकासशील देशों में पेट्रोल की आड़ में महंगाई खेल हो रहा है। कम से कम भारत में तो स्थिति अजीब है। इधर सुनने में आ रहा था कि पेट्रोल के दाम गिरेंगे पर भारत कंपनियों ने फिर उसे बढ़ा दिया।
          भारत से रुपया बाहर जाता है तो डालर बन जाता है। अगर मान लीजिये किसी ने आज एक हजार रुपये अमेरिका या अन्य देश की बैंक में जमा किया तो उसके खाते में बीस डॉलर जमा होंगे। काला धन जमा करने वालों ब्याज तो मिलना दूर उनको रखने के पैसे भी देने पड़ते हैं-ऐसा हमने प्रचार माध्यमों में पढ़ा और सुना है। अगर भारतीय रुपया स्थिर रहा तो यह बीस डॉलर देश में आयेंगे एक हजार के रूप में। अगर रुपया गिरा तो विदेश में काला धन जमा करने वाला को ही लाभ होता है। समझ लीजिये साठ रुपये के मुकाबले एक डालर का मूल्य निर्धारित हुआ तो यह बीस डॉलर बारह सौ रुपये हो जायेंगे। इसी तरह भारतीय जमाकर्ता फायदे में रहेगा।
         फिर विदेश रुपया भेजने के लिये मोटी रकम होती होगी। अक्सर कहा जाता है कि हजार पांच सौ रुपये के नोट से मुद्रा का आवागमन सुविधाजनक होता है-यह अलग बात है कि हमारे यहां अभी भी अनेक लोग इसे देख भी नहीं पाते होंगे। अगर भेजी जाने वाली रकम सौ या पचास रुपये की होगी तो ढेर सारे ड्रम भर जायेंगे। इसलिये हजार रुपये का नोट ज्यादा उपयोगी है। मुश्किल दूसरी है कि हजार और पांच सौ के नोट छोटी वस्तुओं के खरीदने में अभी पूरी तरह सहायक नहीं है। इसलिये यह लगता है कि इस देश को हजार और पांच सौ नोट के लायक बनाया जा रहा है।
इतना ही नहीं हम देख रहे हैं कि हर क्षेत्र के शिखर पुरुष का ध्यान भारत पर कम अमेरिका पर अधिक रहता हैं। वहां का राष्ट्रपति क्या कह रहा है? वहां का अखबार क्या लिख रहा है? अमेरिका की भारत के शिखर पुरुषों बारे में क्या सोच है? इस पर भारतीय प्रचार माध्यम उछलते हैं। तय बात है कि प्रचार माध्यमों के मालिकों का कहीं न कहीं झुकाव अमेरिका के प्रति है तभी तो उनके कार्यकर्ता उसका प्रचार करते हैं।
        भारत के विकास का दावा संदेहास्पद भी इसी कारण से हो रहा है क्योंकि यहां सौ रुपये से ऊपर की मुद्रा का प्रचलन बढ़ रहा है। याद रखिये हमारी जानकारी के अनुसार किसी भी विकसित देश की मुद्रा सौ से अधिक की नहीं है।
दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवी इतिहास का रोना रोते हुए अमेरिका को कोसते हैं पर नारों से आगे नही जाते। अपने वाद का झंडा उठाये हुए अमेरिका के रणनीतिकारों की चालाकियों को भांप नहीं पाते। वह भारतीय संदर्भों की बजाय विदेशी संदर्भों पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। अमेरिका और कंपनी दैत्य किस तरह विश्व के आम जनमानस को त्रस्त कर रहा है इसका आभास नहीं है। अफगानिस्तान और इराक में उसकी सैन्य उपस्थिति पर हल्ला मचाने वाले भारतीय वामपंथी बुद्धिजीवी देश के अंदर ही स्थित अमेरिका के कंपनी दैत्य पर नज़र नहीं रख पाते। देश के आम आदमी को पांच सौ और हजार के नोट के उपयोग लायक बनाने की जो योजना चलती दिख रही है उसका आभास हमें इसलिये भी होता है कि दिन ब दिन महंगाई इस कदर बढ़ रही है कि आने वाले समय में समाज का निम्न मध्यम वर्ग भरभर्राकर ढहते हुए गरीबी की रेखा के नीचे जाता दिख रहा है। मध्यम वर्ग गरीब होता जा रहा है तो उच्च मध्यम वर्ग तरक्की कर अमीर बन गया है। यह विषम आर्थिक स्तर देश के समाज को किस तरह नष्ट करेगा इसका अनुमान किसी वामपंथी बुद्धिजीवी ने शायद ही किया हो।

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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होली पर प्रचार माध्यमों का शुतुरमुर्गीय दृष्टिकोण का मजाक-हिन्दी व्यंग्य लेख (ostrichma on libiya episod-hindi satire article)


दुनियां के पांच बड़े देशों में से तीन ने-अमेरिका, फ्रांस, और ब्रिटेन-अपने मित्र देशों के साथ मिलकर लीबिया पर हमला कर दिया है। अगर भारत में होली का पर्व नहीं होता तो आज शायद यही विषय चर्चा के केंद्र में रहता-कम से कम हम जैसे फोकटिया दर्शकों और चिंतकों का तो यही मानना है। जिन दो बड़े देशों ने इस हमले से पहले लीबिया से मुंह फेरा है वह एक चीन दूसरा रूस। संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में लीबिया पर हमले के लिये हरी झंडी दिलाने वाले प्रस्ताव पर यह दोनों देश अपने मित्रों के साथ अनुपस्थित रहे जबकि कुछ दिनों पहले तक दोनों ही गद्दाफी और लीबिया को राजनीतिक तौर से खुला समर्थन दे रहे थे।
भारतीय समाचार पत्रों, चैनलों तथा बुद्धिमान लोगों की पूरी खुफियगिरी धरी की धरी रह गयी। इस हमले से पहले किसी ने ऐसे हमले का अनुमान नहीं बताया गया। इधर सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पास हुआ और उधर मित्र देश हमले के लिये चल पड़े और बमबारी शुरु कर दी। लीबिया की आम जनता के कथित यह पक्षधर वहां सामान्य नागरिक को नहीं मारेंगी इसकी कोई गारंटी नहीं है। भारतीय समाचार पत्र पत्रिकाऐं तथा टीवी चैनल होली और क्रिकेट से फुरसत नहीं पा सके। क्या करें, दिन को चौबीस घंटे से बढ़़ाकर अड़तालीस का नहीं कर सकते। ऐसा भी नहीं है कि चंद्रमा से कहें कि इतना पास आ गये हो तो जरा रात को बड़ा कर दो यानि कि दिन हो ही नहीं ताकि हम रात्रिकालीन समय का भी दिन का तरह उपयोग कर सके। न ही यह कह सकते हैं कि इधर धरती की ओट में इस तरह छिप जाओ कि दिन का दिन ही रहे ताकि रात्रि न होने से लोग निद्रा की बीमारी से मुक्त होकर उनके विज्ञापन देखते रहें।
इस समय होली तथा क्रिकेट में विज्ञापनों से भारतीय समाचार माध्यमों को जोरदार कमाई हो रही है। इधर कामेडी के भी एक नहीं चार चार सर्कस शुरु हो गये हैं। फिल्मी अभिनेता अब छोटे पर्दे पर कामेडी करने के लियेे उतर आये हैं। समाचार चैनल अपना आधा घंटा कामेडी के नाम कर मनोरंजन चैनलों को विस्तापिरत रूप बन गये हैं। मतलब यह कि वह हर मिनट कमाई कर रहे हैं इसलिये उनके पास फुरसत कहां कि लीबिया पर हमले के विषय का इस्तेमाल करें।
रविवार का दिन और वह भी होली का। क्रिकेट का मैच हो तो फिर कहना ही क्या? पूरा दिन विज्ञापन के लिये है। कमबख्त, यह लीबिया का विषय कहां फिट करें। जापान की सुनामी में कमाया अभी ठिकाने लगा नहंी है। पहले रेडियम फैलने की बात चली। जापान में गर्म हो रहे परमाणु संयंत्र को इंसानी प्रयास ठंडा नहीं कर पा रहे थे पर प्रकृति को दया आ गयी। भूकंप तथा सुनामी परेशान लोगों के लिये प्रकृति ने वहां बर्फबारी कर दी। इतनी ठंड कर दी कि परमाणु संयंत्र अब ठंडे हो गये। पंच तत्वों ने जहां पहले संकट खड़ा किया वही उसको निपटान करने भी आये। भारत में प्रचार माध्यमों पर सुनामी जारी रही क्योकि होली, क्रिकेट और कामेडी को दौर चल रहा है।
भारतीय टीवी चैनलों का कहना था कि ‘जापान की सुनामी की आड़ में गद्दाफी ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली क्योंकि उसने दुनियां का ध्यान हटते ही अपने लोगों पर बमबारी कर दी।’
यहां तक कहा कि गद्दाफी का सुनामी ने बचाया। यह सब बकवास था। भारतीय समाचार टीवी चैनल सोचते हैं कि उनकी आंख अगर बंद है तो सारा संसार सो रहा है। यह शुतुरमुर्गीय दृष्टिकोण होली का सबसे बड़ा मजाक है। जिस समय भारतीय चैनल क्रिकेट और होली में व्यस्त थे तभी सुरक्षापरिषद में लीबिया पर उड़ान पर प्रतिबंध का प्रस्ताव पास हुआ और हमला भी हो गया। इस समय भारतीय प्रचार माध्यमों के पास विज्ञापनों की सुनामी का प्रकोप है इसलिये वह लीबिया पर हमले के विषय पर बासी बहस शायद तब करेंगे जब वर्तमान विषयों से मुक्ति पा लेंगे।
सचिन के सैंकड़े का सैंकड़ा लगेगा या नहीं! बीसीसीआई की क्रिकेट टीम जीतकर अपने प्रशंसकों को होली का तोहफा देगी या नहीं! धोनी अपने नये स्पिनर को खिलायेंगे या नहीं! होली और क्रिकेट पर बहस में उलझे टीवी चैनलों के पास इतना समय कहां से आ सकता है कि वह लीबिया पर अमेरिकी हमले का अध्ययन करें जिसके परिणाम भारत को आगे अवश्य प्रभावित करेंगे। लीबिया के शिखर पुरुष गद्दाफी ने भारत से समर्थन पाने के लिये जबरदस्त कोशिश की थी। क्यों? भारत को सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्यता मिलने पर ढेर सारी प्रसन्नता दिखाने वाले बुद्धिजीवियों अपने चिंतन से इस बात को समझ नहीं पाये कि अपने विरुद्ध सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पर भारत का समर्थन पाने के लिये ही गद्दाफी ने यह सब किया। प्रसंगवश चीन और सोवियत संघ के साथ भारत भी अनुपस्थित रहा। तय बात है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में इसका व्यापक प्रभाव होगा। वैसे लीबिया भारत के लिये तेल की दृष्टि से व्यवसायिक हितों वाला भले ही रहा हो पर राजनीतिक दृष्टि से कभी अधिक निकट नहीं रहा। इसके बावजूद भारत का उसके प्रति जो रवैया है उसके प्रति विश्व का दृष्टिकोण कैसा रहेगा, यह आगे देखने वाली बात होगी।
संभव है कि सारे प्रायोजित राजनीतिक विशेषज्ञ होली खेलने के बाद क्रिकेट में व्यस्त हों या फिर टीवी चैनल वाले सोचते हों कि अभी तो मुफ्त में काम चल रहा है तो क्यों गैर मनोरंजक विशेषज्ञों पर पैसा खर्च किया जाये? वैसे यह विशेषज्ञ उनसे पैसा लेते होंगे इसमें भी शक है क्योंकि प्रचार माध्यमों की वजह से उनको मूल्यवान कार्य और कार्यक्रम मिलते हैं। फिर लीबिया जैसा जटिल विषय एकदम प्रतिक्रिया देने लायक बन भी नहीं सकता क्योंकि उससे पहले बुद्धिजीवियों को अपने शिखर पुरुषो के इशारे का इंतजार होगा जिनके पास होली की वजह से फुरसत अभी नहीं होगी। हमारे देश में गद्दाफी का विरोध तो प्रगतिशील और जनवादी बुद्धिजीवी वैसे भी कर रहे थे पर चूंकि मामला अमेरिकी हमले का है तो उनको अपने दृष्टिकोण पर फिर से विचार करना पड़ेगा। दक्षिणपंथियों के लिये वैसे भी गद्दाफी कोई प्रिय व्यक्ति नहीं रहा है। ऐसे में हमें इंतजार है कि लीबिया पर विचाराधाराओं से जुड़े बुद्धिजीवियों की क्या प्रतिक्रिया होती है? आशा है होली और क्रिकेट से फुरसत पाने के बाद इन प्रचार माध्यमों को अपनी विज्ञापन की नदी के सतत प्रवाह के लिये यह शुतुरमुर्गीय दृष्टिकोण बदलना ही पड़ेगा।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

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न्यायालयीन फैसलों पर सार्वजनिक चर्चा का औचित्य-हिन्दी लेख (adalat ke faisle ki sarvjanik charcha-hindi lekh)


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छत्तीसगढ़ में निचली अदालत ने नक्सलियों में मददगार तीन लोगों को सजा सुनाई है। इनमें एक कोई डाक्टर हैं जिनको आजीवन कारावास की सजा देने पर भारतीय अदालतों के विरुद्ध एक प्रचार अभियान प्रारंभ हो गया है। दरअसल अदालत के निर्णय पर कभी इस तरह की सार्वजनिक बहस नहीं चली जैसी राममंदिर तथा नक्सलियों मे मददगार भद्र पुरुषों पर सजा पर हो रही है। यह बहस प्रगतिशील और जनवादी बुद्धिजीवियों ने प्रारंभ की है जिनके चिंतन और अध्ययन की शुरुआत कार्ल मार्क्स की पूंजी किताब से शुरु होकर मज़दरों एक हो के नारे पर खत्म हो जाती है। अलबत्ता भारत में निम्नजातियों के उद्धार, भारतीय धार्मिक विचारों से अलग विचार मानने वाले लोगों की रक्षा तथा गरीबों के इलाज के नारे भी लगाये जाते हैं। इतिहास बताया जायेगा पश्चिम का और आधार ढूंढे जायेंगे भारतीय संदर्भों में, यही इन विचाराधाराओं के बुद्धिजीवियों के प्रयास हैं जो कि शुद्ध रूप से व्यवसायिक हैं क्योंकि इनसे इनको नाम तथा नामा दोनों ही मिलता है। जहां तक पूंजीवादी लेखकों का प्रश्न है तो उन्हें भी इनके विरुद्ध लिखने पर शाबाशी मिल जाती है। अलबत्ता विचाराधाराओं के लेखक प्रायोजित होने के कारण अपने संकीर्ण उद्देश्यों की पूर्ति के लिये लिखते हैं। ऐसे में स्वतंत्र और मौलिक लेखकों को अपनी बात कहने का अवसर कभी नहीं मिलता है। यह तो भला हो इंटरनेट कंपनियों का जो उन्होंने ब्लाग जैसी साईटों को बनाकर यह अवसर दिया है। मज़े की बात यह है कि प्रगतिशील और जनवादी विचारक पूंजीपतियों की इसी सेवा का लाभ उठाते हुए भी धारा वही पुरानी चलते हैं केवल नारे लगाने वाली।
प्रगतिशील और जनवादियों की यह खूबी है कि वह कल्पित मिथक नहीं रचते बल्कि जीवित इंसान को या फिर जिसके जीवन के प्रमाण हो उसे ही मिथक बनाते हैं ताकि उसे कल्पित कहकर कोई चुनौती न दे। यह अलग बात है कि ऐसा करते हुए वह ऐसी हरकतें भी करते हैं जिससे लगता है कि राई जैसे आदमी को पर्वत बना रहे हैं। उनकी दूसरी खूबी यह है कि बात खेत की हो तो वह खलिहान की सुनेंगे। अगर खलिहान की बात हो तो खेत की कहेंगे। पूर्व में खड़े होकर पश्चिम की तो उत्तर में खड़े होकर दक्षिण की बात करेंगे-इसका उल्टा भी हो सकता है या दिशाऐं भी उधर की जा सकती हैं। मतलब यह कि आप जिस दिशा में रहते हैं तो दूसरी दिशा की स्थिति को आप नहीं जानते इसलिये इनकी बातों पर यकीन न करें तो चुनौती भी नहीं दे सकते। फिर जीवधारी मिथकों पर कुछ कहना कठिन होता है।
इन्हीं लेखकों ने राममंदिर पर अदालत के निर्णय को चुनौती दी। मंदिर बनेगा या नहीं अब इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा क्योंकि आमजन अब इस विवाद से दूर हो चुका है। मगर पत्थरों के बने एक ढांचे के गिरने पर जनवादी तथा प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने जो प्रायोजित विलाप किया वह देखने लायक था। इतना तो उस धर्म के लोग भी नहीं रोये होंगे जितना इन दोनों समूहों के बुद्धिजीवियों ने रोया। पत्थर में जान नहीं होती पर इन्होंने डाली भले ही यह बात मिथक लगे। आम इंसान समय के साथ आगे जाता है पर यह लोग इतिहास की अर्थी कंधे पर लेकर जिस तरह चलते हैं वह प्रशंसा के योग्य है।
अब इनके हाथ लग गये हैं गरीब बच्चों का इलाज करने वाले एक डाक्टर साहब जिन पर राजद्रोह का आरोप लगा और अब सजा मिली। जहां तहां उनको रिहा करने की अपील की जा रही है। ऐसा नाटक किया जा रहा है जैसे कि इनके लिखने तथा प्रदर्शन करने के अभियान से वह रिहा ही हो जायेंगे। भारतीय न्याय प्रणाली की जरा समझ रखने वाले को भी यह पता है कि अब मामला हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में जायेगा। इसका अंतिम परिणाम न्यायालयों की निर्णयों पर ही निर्भर है और उन पर प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालना संभव नहीं है। ऐसे में यह बुद्धिजीवी वर्ग संदेह के दायरे में स्वयं ही आता है। ऐसा लगता है कि वह भारतीय समाज को यह संदेश दे रहा है कि अगर न्यायालय के निर्णय उसके अनुकूल न रहे तो वह भारतीय न्याय प्रणाली पर भी उंगली उठायेगा। ऐसी शक्ति केवल पैसा लेकर बुद्धि विलास करने वालों के लिये संभव है स्वतंत्र और मौलिक लेखकों के लिये नहीं।
डाक्टर साहब को मिली सजा पर जिस तरह उसके विरुद्ध प्रचार अभियान प्रारंभ हुआ है उससे लगता है कि दुनियां के कुछ नकारात्मक संगठन जिनको पूंजीपतियों से ही पैसा मिलता है इस विषय पर अब बावेला मचाने वाले हैं। वैसे ही जैसे राम मंदिर पर मचा रहे हैं। अभी तक यह वर्ग भारत के राजनीति, सामाजिक, भारतीय धार्मिक, तथा आर्थिक प्रतिष्ठानों पर शाब्दिक हमला करता था पर अब न्यायिक व्यवस्था पर उंगली उठाने लगा है।
उन डाक्टर साहब का नाम पहले कोई नहीं जानता था। कहते हैं कि बच्चों का इलाज करते थे। हमें उन डाक्टर साहब से कोई गिला शिकवा नहीं है। एक मौलिक स्वतंत्र लेखक अगर गिला करे तो भी किस दम पर उसकी जानकारी के स्त्रोत भी तो प्रचार माध्यम ही है। इन्हीं प्रचार माध्यमों में यह कहीं न पता चला कि उन्होंने कितने बच्चों का कब कहां इलाज किया। मुफ्त किया कि कम पैसे लिये। भगवान ही जानता है कि करते थे भी कि नहीं या पहले करते थे अब केवल सामाजिक गतिविधियों तक ही सीमित हो गये थे। उनकी पत्नी के अनुसार ही वह घर का खर्चा अपने दम पर चलाती हैं तो डाक्टर साहब क्या मुफ्त इलाज करते थे? तब दवा का पैसा कहां से आता होगा? फिर दूसरी बात यह कि डाक्टर साहब की चर्चा जिन गतिविधियों के कारण हो रही हैं वह उनके व्यवसाय से इतर हैं। सीधी बात कहें तो राजनीतिक हैं। एक योजना के बारे में तो यह कहा जा रहा है उसकी कल्पना उन्होंने की और राज्य सरकार ने उनको अपनाया। सवाल यह है कि फिर राजद्रोह जैसा आरोप लगा क्यों?
डाक्टर साहब जिस विचारधारा के आदमी हैं उसमें हिंसा एक स्वीकार्य सिद्धांत है। ऐसे में हिंसक तत्वों से उनका संपर्क होना कोई ज्यादा बड़ी बात नहीं है। हिंसक तत्वों को हमेशा ही बौद्धिक संपन्न लोगों से सहायता की अपेक्षा रहती है क्योंकि वह हथियार चलाना जानते हैं पर कहां चलाना है इसके लिये उनकी अक्ल काम नहीं करती। हम यह नहीं कहते कि डाक्टर साहब ने ऐसी सहायता की होगी पर जब आप हिंसक तत्वों से संपर्क रखते हैं तो शक के दायर में तो आते ही हैं। खासतौर से तब जब हम जैसे मौलिक और स्वतंत्र लेखक ऐसी हिंसा को पूंजीवाद के पिछले दरवाजे से प्रायोजित किया मानते हैं। आजतक अनेक बार यह पूछा गया कि गरीब, भूखे तथा मज़बूर लोगों के पास रोटी का निवाला नहीं होता पर उनके पास डेढ़ लाख की बंदूक आ जाती है, कहां से? उनके कथित नुमाइंदों के पास अच्छे कपड़े, गाड़ियां तथा अन्य वस्तुऐं कहां से आती हैं? अमेरिका तथा पश्चिमी सम्राज्यवादी पूंजीवाद के खिलाफ खड़े लोग अंततः गोलियां चलाकर राज्य को ही हथियार खरीदने को मज़बूर करते हैं, क्या पूंजीवाद की मदद नहीं है।
सजा तीन को हुई पर डाक्टर साहब को हीरो बनाया जा रहा है? शक तो उठना स्वाभाविक ही है। हमारी दिलचस्पी बाकी दो में भी है मगर ऐसा लगता है कि वह पूंजीवाद के विरोधियों के लिये नगण्य हैं या फिर उनको नायक बनाने से कोई मसाला नहीं मिलने वाला। यह भी संभव है कि नोबल पुरस्कार तो किसी एक को ही मिल सकता है इसलिये बाकी दो को क्यों डाक्टर साहब का प्रतिद्वंद्वी बनाया जाये। कहीं यह अगले शांति नोबल पुरस्कार को भारत लाने के लिये कवायद करने के लिये प्रचार अभियान तो नहीं चलाया जा रहा?
इस लेखक वर्ग ने चीन के उस नोबल पुरस्कार प्राप्त विजेता को शायद अपना आदर्श बनाया है जो जेल में है। संभव है डाक्टर साहब को भी नोबल मिल जाये क्योंकि कहीं न कहीं उनके मन में पश्चिम के लोगों में भी सहानुभूति दिख रही है। मुश्किल यह है कि भारतीय न्यायिक व्यवस्था में राज्य से प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की आशा नहीं की जाती पर चीन में यह संभव है इसलिये उस पर दबाव बनाया गया मगर भारत में यह संभव नहीं है। जब इस मामले की सुनवाई अदालत में चल रही थी तब डाक्टर साहब को जमानत मिली उस समय उनके समर्थकों ने जश्न मनाया था पर न्याय प्रणाली पर उनका यह दबाव बनाये रखने का प्रयास नहीं चला। अब प्रतिकूल निर्णय पर उनका गुस्सा इसलिये भी गलत लगता है क्योंकि इसी अदालत ने उनको जमानत भी दी थी। मतलब अदालत का निर्णय अनुकूल हो तो जश्न मनाओ और प्रतिकूल हो गुस्सा दिखाओ। यह नीति चिंतनहीन बुद्धिजीवियों को ही शोभा देता है। ऐसें ही बुद्धिजीवी बाबा रामदेव के आभामंडल पर शाब्दिक आक्रमण करते हैं जो ऐसे प्रमाण अपने साथ रखते हैं जिनसे पता लगता है कि उन्होंने कितने बीमारों को ठीक किया। अच्छा होता सजायाफ्ता डाक्टर साहब की चिकित्सा से लाभान्वित लोगों की जानकारी यह लोग भी देते। खाली नारे लगाने से बात नहीं बनती।
विश्व में पश्चिमी देशों में उत्पन्न सभ्यता का बोलबाला है जिनकी राजनीति का अधिकतर हिस्सा प्रचार के आधार पर सत्ता कायम करना है और जो लोकतंत्र की पक्रिया का भी एक हिस्सा बन गया है। पश्चिमी विश्व पूर्वी देशों में अपना राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक प्रभाव बनाये रखने के लिये प्रचार का सहारा लेते हैं और इसके लिये उन्होंने अनेक तरह के सम्मान तथा संस्थाओं का सृजन कर रखा है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उनके हितों के लिये ही काम करते हैं। इन्हीं सम्मानों को पाने तथा अपनी कथित मानवाधिकार, समाज सेवा तथा गरीबों का इलाज करने के उद्देश्य के लिये पश्चिमी पूंजीपतियों तथा सरकारों से धन पाने के लिये पूर्वी देशों के अनेक बुद्धिजीवी, विचारक तथा समाज सेवक उतावले रहते हैं। ऐसे में पूंजीवादी, समाजवादी या साम्यवादी विचाराधाराओं को मुखौटा लगाये अनेक लोग बकायदा योजनाबद्ध ढंग से व्यवसायिक प्रचार कार्य कर इन्हीं पश्चिमी देशों की सेवा करते हैं ताकि उनका सम्राज्य बना रहे। स्थिति यह है कि समाजवादी और साम्यवादी विचारक पश्चिम के पूंजीवाद को कोसते रहते हैं पर उनके चेले चपाटे तथा रिश्तेदार इन्हीं पश्चिमी देशों मेें अपना निवास बनाकर आराम से रहते हैं।
डाक्टर साहब बड़ी अदालत में राहत पा जायें यह कामना हम भी करेंगे क्योंकि उनके समर्थक यही दावा कर रहे हैं कि वह निर्दोष हैं। एक आम लेखक के रूप में जब टीवी पर डाक्टर साहब का चेहरा देखा तब लगा कि बहुत मासूम हैं पर अदालतें तो सबूत देखती हैं। मन में एक शंका भी हुई कि कहीं वह वास्तव में अपनी मासूमियत की वजह सें अपने ही समूह या साथियों की चालाकी का शिकार तो नहीं बने क्योंकि उसके बाद जो प्रचार अभियान प्रारंभ हुआ है उसमें अनेक प्रायोजित बुद्धिजीवी अपना समय पास करने वाले हैं। एक लंबे समय तक चलने वाला प्रचार अभियान देखने को मिलने वाला है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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हमारे देश में ऐसी बहुत बड़ी आबादी है जिसकी दिलचस्पी अमेरिका में इतनी नहीं है जितनी प्रचार माध्यम या विशिष्ट वर्ग के लोग लेते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि जनसामान्य जागरुक नहीं है या समाचार पढ़ने या सुनने के उसके पास समय नहीं है। दरअसल देश के प्रचार माध्यम से जुड़े लोग यह मानकर चलते हैं कि गरीब, ठेले वाले, खोमचे वाले या तंागे वाले उनके प्रयोक्ता नहीं है और इसलिये वह पढ़े लिखे नौकरी या व्यवसाय करने वालों को ही लक्ष्य कर अपनी सामग्री प्रस्तुत करते हैं। यह उनका अज्ञान तथा अव्यवसायिक प्रवृत्ति का परिणाम है। शायद कुछ बुद्धिमान लोग बुरा मान जायें पर सच यह है कि समाचार पढ़ना तथा राजनीतिक ज्ञान रखना गरीबीया अमीरी से नहीं जुड़ा-यह तो ऐसा शौक है जिसको लग जाये तो वह छूटता नहीं है। चिंतन क्षमता केवल शिक्षित या शहरी लोगों के पास होने का उनका विचार खोखला है। कई बार तो ऐसा लगता है कि ग्रामीण और शिक्षित वर्ग का ज्ञान कहीं  अधिक है। सीधी बात कहें तो अमेरिका ने 1971 में भारत पाक युद्ध के समय अपना सातवां बेड़ा भारत के खिलाफ उतारने की घोषणा की थी और यह बात आज भी आम भारतीय के जेहन में है और वह उस पर यकीन नहीं करता। विकिलीक्स से बड़े शहरों के बुद्धिजीवी चौंक गये हैं पर उनमें कुछ ऐसा नहीं है कि आम भारतीय जनमानस प्रभावित या चिंतित हो।
विकिलीक्स ने अमेरिकी सरकार के गोपनीय दस्तावेजों का खुलासा किया है। यह एक बहुदेशीय वेबसाईट है। अनेक पत्रकार इसमें अपने पाठ या पोस्ट रखते हैं और उनकी जांच के बाद उनको प्रकाशित किया जाता है। अपनी भद्द पिटते देखकर अमेरिकी सरकार इसके विरुद्ध कार्यवाही करने में लगी है। वह अन्य देशों से इसे अनदेखा करने का आग्रह कर रही है। दुनिया भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रचार की जिम्मेदारी लेने वाले अमेरिकी रणनीतिकार अब ठीक उलट बर्ताव कर रहे हैं।
अमेरिका की विदेश मंत्री हेनरी क्लिंटन ने सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के भारत के दावे का मखौल उड़ाने के साथ ही हमारे देश के विशिष्ट वर्ग की जासूसी करने को कहा है। बात तो यह है कि अमेरिका अपनी आर्थिक विवशताओं के चलते ही भारत को पुचकार रहा है वरना उसकी आत्मा तो खाड़ी देश और उनके मानस पुत्र पाकिस्तान में ही बसती है। इसलिए अपनी साम्राज्यवादी भूख मिटाने तथा हथियार बिकवाने के लिये पाकिस्तान को भी साथ रख रहा है। अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान में फैले आतंकवाद से निपटने में भारतीय हितों की उसे परवाह नहीं है। उसका दोगलापन कोई ऐसी चीज नहीं है जिस पर चौंका जाये। सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता भी अब कितनी प्रासंगिक है यह भी हमारे लिये विचार का विषय है। ब्राजील, जापान, जर्मनी के साथ भारत को इसमें स्थाई सदस्यता दी भी गयी तो उसमें वीटो पॉवर का अधिकार मिलेगा इसमें संदेह है-कुछ प्रचार माध्यमों में इस आशय का समाचार बहुत पहले पढ़ने को मिला था कि अब नये स्थाई सदस्यों को इस तरह का अधिकार नहीं मिलेगा। बिना वीटो पॉवर की स्थाई सदस्यता को कोई मतलब नहीं है। यह अलग बात है कि अमेरिकी मोह में अंधे हो रहे प्रचार कर्मी उसकी हर बात को ब्रह्म वाक्य की तरह उछालते हैं। तब ऐसा भी लगता है कि वह अपने देश के जनमानस की बजाय पश्चिमी अप्रवासी भारतीयों को लिये अपने प्रसारण कर रहे हैं। अभी हाल ही में भारत के सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्यता पर भी जिस तरह खुश होकर यह प्रचार माध्यम चीख रहे थे वह हास्यप्रद था क्योंकि यह क्रमवार आधार पर नियम से मिलनी ही थी। समाचारों पर बहुत समय से रुचि लेने वाले आम पाठक यह जानते हैं कि अनेक अवसरों पर भारत को यह सदस्यता मिली पर उसकी बात सुनी नहीं गयी।
इस चर्चा में विकीलीक्स के खुलासे चिंतन से अधिक मनोरंजन के लिये है। जिस तरह विदेशी राष्ट्रों के लिये संबोधन चुने गये हैं उससे भारतीय टीवी चैनलों के हास्य कलाकारों की याद आती है। यह अलग बात है कि यह कलाकार पेशेवर होने के कारण अमेरिकी रणनीतिकारों से अधिक शालीन और प्रभावी शब्द इस्तेमाल करते हैं। विकिलीक्स ने अमेरिकी रणनीतिकारों के दोहरेपन को प्रमाण के साथ प्रस्तुत किया है जो कि एक असामान्य घटना है। अमेरिकी जो कहते हैं और सोचते हैं इस पर अधिक माथा पच्ची करने की आवश्यकता नहीं है। सच तो यह है कि विकिलीक्स के खुलासे देखकर कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अमेरिका एक स्वतंत्र राष्ट्र नहीं बल्कि पूंजीवाद का उपनिवेश है जो व्यापार या बाज़ार के वैश्वीकरण के साथ ही अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है। चाहे किसी भी देश के पूंजीपति या विशिष्ट वर्ग के लोग हैं अपने क्षेत्र में उसे कितनी भी गालियां देते हों पर अपनी संतान या संपत्ति वहां स्थापित करने में उनको अपनी तथा भविष्य की पीढ़ी की सुरक्षा नज़र आती है। तय बात है कि वह कभी वहां के रणनीतिकारों के निर्देश पर चलते हैं तो कभी उनको चलाते हैं। अमेरिकी रणनीतिकारों की भी क्या कहने? एक ग्राहक कुछ मांगता है दूसरे से उसकी आपूर्ति करवाते हैं। दूसरा कहे तो तीसरे से करवाते हैं। खुलासों से पता लगता है कि खाड़ी देश दूसरे के परमाणु संयत्र पर अमेरिका को हमले के लिये उकसा रहा है। मतलब यह कि अमेरिका अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहा है या पूंजीतंत्र के शिखर पुरुष अपने क्षेत्र में उसे घसीट रहे हैं, यह अब चर्चा का विषय हो सकता है। ऐसे में अमेरिकी रणनीतिकारों के औपचारिक या अनौपचारिक बयानों, कमरे में या बाहर की गयी टिप्पणियों तथा कहने या करने में अंतर की चर्चा करना भी समय खराब करना लगती है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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