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मानवता का पाठ और मन के व्यापारी-हिन्दी कविता


सामने से आती

बेईमान हवाओं की

उनको पहचान नहीं है।

बहने को आतुर

सामना करते हुए टिकते नहीं

उनकी रीढ़ की हड्डी में

इतनी जान नहीं है।

रंग बिरंगा आकाश

खरीदने की चाहत है

अपने लिये ही

खुद के दिल में शान नहीं है।

कहें दीपक बापू आदर्श की बात

परीक्षा के लिये रट लीं

पद और पैसे की दौड़ में जुटे

अक्ल के अंधों को

बाकी कुछ ध्यान नहीं है।

———————–

कहीं किसी के हृदय की

संवेदनायें उभारकर

मानवता का पाठ

पढ़ाते हैं।

कहीं किसी के दिमाग पर

भय का बोझ डालकर

रक्षा के लिये

अपना वादा जताते हैं।

देह के चिकित्सकों की तरह

मन के व्यापारी भी बहुत हैं

दवा नहीं किसी के पास

मगर इलाज के लिये

प्रसिद्ध हो जाते हैं।

कहें दीपक बापू हवा में

उड़ते इंसान की चिंतायें बहुत

भीड़ लगी समस्या का

हल पूछने वालों की

तंत्र का हो या अध्यात्मक के

चिंतकों के वारे न्यारे हो जाते हैं।

—————————–

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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विश्व योग दिवस मनाने का सुझाव सराहनीय-हिन्दी चिंत्तन लेख


            प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने संबोधन में सारे विश्व में योग दिवस मनाने का प्रस्ताव दिया है। इस तरह की बात विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक मंच पर अधिकारिक रूप से पहली बार कही गयी है इसलिये इसका महत्व निश्चित रूप से बहुत है।  इसकी भारत में स्वाभाविक रूप से प्रतिकूल प्रतिक्रिया हुई।  हम जैसे अध्यात्मिक और ज्ञान साधकों के लिये इस तरह के घटनाक्रम न केवल रुचिकर होते हैं बल्कि शोध का अवसर भी प्रदान करते हैं।

            देश में अनेक प्रतिक्रियायें आयीं। उनमें एक योग शिक्षक ने एक  महत्वपूर्ण बात कही कि योग के विषय पर जब कोई साधना करने वाला बोलता है तब उसका महत्व बहुत होता है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं योग साधना करते हैं इसलिये उनके पास इस विषय पर बोलने का अधिकार है।  उन्होंने एक तरह से अपना अनुभव बांटा है।  इसकी हमारे जैसे लोगों पर सुखद प्रतिक्रिया होती है पर जब हम अन्य लोगों को योग विषय बोलते और लिखते हुए देखते हैं तो यह यकीन करना कठिन होता है कि उनके पास योग का कोई ज्ञान भी है। मोदी जी को योग साहित्य का ज्ञान भी है यह देखकर प्रसन्नता होती है पर उनके संबोधन पर प्रसन्न होने वालों में ऐसे लोग भी हैं जो केवल भारतीय विचाराधारा के प्रचार पर ही उछलते हैं पर उसके मूल सिद्धांतों को नहीं समझते।

            जिस योग साधना की बात होती है वह अनेक लोगों के लिये इसलिये कठिन नहीं है क्योंकि   उसमें समय और श्रम का व्यय होता है जिससे आज के भौतिक प्रभाव में फंसे समाज के अनेक लोग बचना चाहते हैं।  योग साधना मनुष्य को शक्तिशाली, आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी सहज वाणी का प्रवाहक बनाती है। इसके प्रभाव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे योग साधना में निरंतर सक्रिय रहने वाले  लोग ही अनुभव कर सकते हैं।

            योग के आठ भाग हैं।  आमतौर से लोग प्राणायाम और आसनों को ही योग साधना समझते हैं।  एक तरह से समाज इसे  व्यायाम समझता है जबकि मोदी ने अपने संबोधन में यह स्पष्ट रूप से बताया कि यह एक व्यापक सिद्धि प्रदान करने वाली साधना है। हम यहां बता दें कि इस सिद्धि का यह आशय कतई नहीं समझना चाहिये कि इससे कोई आकाश से तारे जमीन पर उतार कर ला सकता है। योग साधना मनुष्य के व्यवहार, विचार तथा व्यक्तित्व में ऐसे तत्व स्थापित कर देती है कि वह इस जीवन सागर में बिना थपेड़ों के तैरता है-हमारा अभिप्राय यही है।

            मुख्य बात संकल्प की है।  श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार परमात्मा के संकल्प के आधार पर संसार के सारे भूत स्थित हैं पर वह किसी में स्थित नहीं है।  उससे यह समझना चाहिये कि जिस तरह का हमारा संकल्प होगा उसी तरह का संसार हमारे सामने होगा पर हम उसमें नहीं समा सकते।  हमारी समस्या यह है कि  परमात्मा के इस संसार का भाग अपने ही अपने ही संकल्प के कारण सामने आता है हम उसमें समाना चाहते हैं या सोचते हैं कि वह हमारे अंदर समा जाये।  मकान मिला तो उसमें हम समाना चाहते हैं या चाहते हैं कि वह हमारे अंदर समाज जाये। इसी तरह का दृष्टिकोण संतान, धन, वाहन तथा अन्य भौतिक उपलब्धियों के बारे में रहता है। ऐसा हो नहीं सकता पर हमारा पूरा जीवन इसी प्रयास में नष्ट हो जाता है। देखा जाये तो हर इंसान योग करता ही है।  अज्ञानी लोग  भौतिकता से जुड़ने का प्रयास करते हैं। इसे हम असहज योग भी कह सकते हैं क्योंकि अंतत इससे तनाव ही पैदा होता है। उनका मन उन्हें अपना बंधुआ बना लेता है। सहज योगी स्वयं से जुड़कर संसार के विषयों से अपनी आवश्यकतानुसार संबंध रखते हैं।  वह कभी मन से कभी किसी भी विषय से संयोग करने के लिये बाध्य नहीं किये जाते।

            विश्व में योग दिवस मनाये जाने के प्रस्ताव पर भी अनेक लोग विश्व का अध्यात्मिक गुरु बनने का सपना देखकर प्रसन्न हो रहे हैं। हमारा मानना है कि भारत की यह पहले से बनी बनायी छवि है जिसके लिये प्रथक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। पतंजलि योग साहित्य के अलावा हमारी श्रीमद्भावगत गीता भी एक ऐसा स्वर्णिम ज्ञान ग्रंथ है जिससे पूरा विश्व परिचित है।

            हम तो यह चाहते हैं कि विश्व समुदाय से पहले हमारे ही देश का अपना रुग्ण मानसिकता से बाहर आये। योग की बातें बहुत होती हैं पर साधना करने वालों की संख्या अभी भी नगण्य है। विश्व में क्रांति आने की हमारी कल्पना तभी सफल होगी जब हम पहले अपने देश में योग साधना को दिन चर्या का एक अभिन्न भाग बनायेंगे।  हम जैसे अप्रचारित योग साधकों के पास ऐसे साधन नहीं होते कि अपने इस प्राचीन विज्ञान पर जनसामान्य में अपनी बात कह सकें, इसलिये प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी जैसे प्रतिष्ठित लोग जब योग विषय का प्रचार करते हैं तो मन प्रसन्न कर लेते हैं। इसके लिये हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आभारी भी है कि उन्होंने योग प्रचार के लिये वह भूमिका निभाई जिसकी हम प्रतिष्ठित लोगों से अपेक्षा करते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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मंगलयान की सफलता से नवरात्रि पर्व की अच्छी शुरुआत-हिन्दी चिंत्तन लेख


            भारत में आज नवरात्रि का पर्व प्रारंभ हो गया है।  इससे एक दिन पहले ही भारत का एक अंतरिक्ष यान मंगल ग्रह पर पहुंच गया।  भारत इस तरह मंगल पर यान भेजने वाला वह  देश बना जिसका अंतरिक्ष यान पहले ही प्रयास में सफल पूर्वक लक्ष्य तक पहुंचा।  दूसरी बात यह कि इसमें खर्च बहुत कम आया है।  भारत की वैज्ञानिक संस्था इसरो के विद्वानों ने यह साबित कर दिया है कि न केवल विश्व में हमारी स्थिति अध्यात्मिक गुरु की है वरन् विज्ञान में भी हमारा कोई सानी नहीं होगा।  ज्ञान साधक तथा चिंतन के अभ्यास से हम वैसे ही इस निष्कर्ष को मानते हैं कि जो अध्यात्मिक अभ्यास  में दक्ष है वह सांसरिक विषयों में भी सफल रहता है।  भारत में प्रबंध कौशल को अभी भी व्यवसायिक मान्यता नहीं मिल पायी है वरना हमारा देश विश्व में अन्य देशों से अधिक विकसित होता।

            यह सामाजिक तथा आर्थिक नियंत्रक संस्थाओं में काम करने वाले पदाधिकारी ऊंचे स्थान पर सार्वजनिक प्रबंध कौशल की बजाय अपनी निजी छवि के कारण पहुंचते हैं।  अनेक लोग उच्च शिक्षा तो अनेक किसी शिखर पुरुष की चाटुकारिता करते हुए शिक्षा, समाज सेवा, कला, साहित्य तथा अर्थोपयोगी  संस्थाओं पर काबिज हो जाते हैं।  काबिज होने के बाद वह सम्मान, उद्घाटन अथवा बैठकों की प्रथा निभाते हुए वह प्रतिष्ठा का सुख भोगते हैं और संस्थाओं का प्रबंध वह अपने अधीनस्थों को सौंप देते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि जिस प्रबंध कौशल से सांसरिक विषयों में उपलब्धि प्राप्त होती है उसे हमने कभी सम्मानीय माना ही नहीं जिस कारण हम सांसरिक विषयों में अन्य देशों से पिछड़े रहे।

            भारत की मंगल पर उपलब्धि अत्यंत प्रसन्नतादायी है। मंगल पर भारत की पहुंच के बाद यह नवरात्रि का यह पर्व उत्साहपूर्ण वातावरण प्रारंभ हो गया है। इस तरह ज्ञान और विज्ञान का संयोग भारत की प्रतिष्ठा को बढ़ाने वाला है।

            हम जब भारतीय धर्म और संस्कृति की बात करते हैं तो हमारे अध्यात्मिक दर्शन के कारण वह स्वर्णिम लगती है। ऐसे में मन में प्रसन्न होता है पर विश्व में जिस तरह का हिंसक वातावरण चल रहा है वह अत्यंत निराशाजनक है।  मध्य एशिया में तीन पश्चिमी नागरिकों के सिर कलम कर दिये गये। यह तीनों पहले अपहृत किये गये थे। इनका किसी भी प्रकार से वहां चले रहे हिंसक संघर्ष से संबंध नहीं था। न ही वह हथियार चलाने वाले थे मगर मध्य एशिया में पल रहे बर्बर तत्वों ने उनको न केवल मारा बल्कि अपने ही दुष्कर्म की वीडियो भी बनाकर प्रसारित की।  यह बर्बर तत्व अपनी विचारधारा के आधार पर पूरे विश्व समाज को चलते देखना चाहते हैं।  भारतीय अध्यात्म की दृष्टि से यह असुर प्रवृत्ति है। श्रीमद्भागवत गीता के संदेश के अनुसार व्यक्ति अपना उद्धार करने का प्रयास करे न कि दूसरे पर अपने विचार लादने में समय नष्ट करे।  एक तरफ विश्व के वैज्ञानिक विश्व को अपने प्रयासों से आगे ले जा रहे हैं वह बर्बर तत्व जीवन के पहिये को पीछे ले जाना चाहते हैं।  इसमें वह सफल नहीं होंगे यह तय है पर वह मानव समाज पर तनाव बनाये रखने की उनकी प्रकृति भी खत्म नहीं होगी। इन लोगों के पास न ज्ञान है विज्ञान ऐसे में वह विध्वंस से धन और प्रतिष्ठा अर्जित करना ही वह अच्छा मार्ग मानते हैं। ऐसे में हमारी भारतीय विचारधारा एक मात्र मार्ग लगती है जो विश्व समुदाय का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

            अध्यात्मिक ज्ञान का अर्थ यह कदापि नहीं है कि मनुष्य अपने सांसरिक कर्म त्याग कर बैठ जाये।  नित्य नित्य नई खोज करना भी एक यज्ञ है।  अध्यात्मिक ज्ञानी को विज्ञान में दक्षता होना चाहिये। भारतीय वैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया है कि वह देर से ही सही उस मार्ग पर आ गये हैं जहां भारत अध्यात्मिक दर्शन तथा सांसरिक विषयों में संयुक्त रूप से श्रेष्ठता प्राप्त कर विश्व में एक उच्च स्थान प्राप्त कर लेगा।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 

ग्वालियर मध्य प्रदेश

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कवि से महाकवि-हिंदी व्यंग्य कविता (kavi se mahakavai-hindi satire poem


सामने से आती
बेईमान हवाओं की
उनको पहचान नहीं
है।
बहने को आतुर
सामना करते हुए
टिकते नहीं
उनकी रीढ़ की
हड्डी में
इतनी जान नहीं
है।
रंग बिरंगा आकाश
खरीदने की चाहत
है
अपने लिये ही
खुद के दिल में
शान नहीं है।
कहें दीपक बापू
आदर्श की बात
परीक्षा के लिये
रट लीं
पद और पैसे की
दौड़ में जुटे
अक्ल के अंधों
को
बाकी कुछ ध्यान
नहीं है।
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राजमार्ग पर जो निकल गये
वह कवि से
महाकवि हो गये।उपाधियों का बोझ
जिनके सिर पर आया
उनके शब्द आमजन की सपंत्ति थे
विशिष्ट सभा में खो गये।

कहें दीपक बापू बिकती है कलम
बाज़ार में सस्ते भाव,
अपनी पंसद के शब्द
अपनी प्रशंसा के गीत पर
लगाते दौलतमंद दाव,
बिके जो रचनाकार प्रसिद्धि पाई
रहे स्वंतत्र उन्होंने सिद्धि पाई
यह अलग बात है
अपनी जिंदगी का बोझ
खाली हाथ ढो गये।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
ग्वालियर मध्य प्रदेश
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जिंदगी में बदलते पलों का बयान-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं


पूरी जिंदगी का बखान क्या करें

यहां तो पल ही में माहौल बदल जाता है,

इंसान सुबह जाता है शवयात्रा में

शाम का बारात में जाने का आनंद पाता है।

कहें दीपक बापू किस पर खफा हों किसे करें सलाम,

रिश्ते मुंह फेर जाते अनजान लोग कर जाते काम

एक मंजिल के लिये जोड़ा कई लोगों ने वास्ता,

नये चेहरे आ जाते उधर पुराने बदल जाते हैं रास्ता,

कई लोगों ने फिर मिलने का वादा किया

क्या पहुंचते उनके पास जिनका पता बदल जाता है।

———–

शरीक के जख्म तो जाते हैं कभी न कभी,

दिल का दर्द ऐसा लगता जैसे चोट हुई हो अभी अभी।

कहें दीपक बापू लोग अपने जज़्बात नहीं समझते

दूसरों के क्या  समझेंगे

एक दूसरे को नीचे गिराने में लगे हैं सभी

————

स्वयं सुनाते हैं वह लोगों को अपनी जिंदगी की कथायें,

अपनी तारीफ खुद करें दर्द के लियेे गैरों पार आरोप लगायें।

कहें दीपक बापू यह विज्ञापन का दौर है

 लोगों की हमदर्दी हासिल करने के लिये

अपनी हालातों का बुरा बयान करना पड़ता है,

अपनी तरक्की पर हर कोई सीना फुलाता

पिछड़ने का दोष दूसरे पर मढ़ता है,

बड़े भाषण से कोई असर नहीं होता

लोगों की भीड़ अपने पास लाने के लिये

चलने फिरने की बजाय केवल नारे लगायें।

——–

जादू से किसी का पेट नहीं भरता

न ही बीमारी की दवा बनती है,

फिर भी सिद्ध बन गये हैं हमदर्दी के व्यापारी

 जिनकी मलाई छनती है।

कहें दीपक बापू अक्ल का कमरा बंद कर चुके लोग

वादों में बहक जाते

सच कहो तो उनसे लड़ाई ठनती है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

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लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

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