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सबकी नज़र है हमारे कमाने पर -व्यंग्य कविता


रात की रौशनी में चमकने वाले चेहरे
सुबह सूरज की पहली किरण में ही
फक नजर आते हैं।
सौंदर्य के सच की धूप के पसीने में ही
होती है पहचान
अंधेरे में चिराग भले ही सहारा हों
इंसान के लिये
पर उसके तले अंधेरे भी छिप जाते हैं।

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भरोसा कब तक करें
जमाने पर।
टूट जाता है हर बार
आजमाने पर।
कोई चरित्र  से पहचान नहीं करता
हर कोई दौलत पर ही मरता
गलतफहमी है कि कोई हमें देख रहा है
सबकी नजर है हमारे कमाने पर।
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नैतिकता की स्थापना के लिए जंग -व्यंग्य कविता
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अनैतिकता से हैं सभी तंग
लड़ रहे इसलिये नैतिकता की स्थापना के लिये जंग
कोई लिख रहा है कविता
कोई लिख रहा व्यंग
कभी कभी लगता है
वैलंटाईन डे भी कुछ ऐसा मना
जैसे होली पर खेला जा रहा हो रंग

कहैं दीपक बापू
हैरान है यह देखकर कि
नैतिकता और अनैतिकता का
नहीं बता पा रहा कोई भेद
तर्कों में दिखते हैं ढेर सारे छेद
स्त्री घुटने के ऊपर पहने या
घुटने तक दिखें उसके कपड़े
इसी पर हो रहे हैं लफड़े
दारुखाने में जाकर पिये नारी
बिगड़ जाती है इस पर भी दुनियां सारी
पीने की सलाह देने वाले भी
नहीं बताते कितना हो उसका पैमाना
वह तो देखते हैं बस
जाम के दरिया में ही नया जमाना
नहीं होती हास्य कविता लिखने की
पर जब आ जाता है सामने विषय
तो जी मचल उठता है
किस पर टिप्पणी करो
कौन हो प्रसन्न
कौन हो जाये नाराज
दिलचस्प हैं लोगों के बहस के ढंग
संस्कारों की रक्षा के लिये कोई जूझ रहा है
कोई नारी की आजादी की पहेली बूझ रहा है
मय से शुरु हुई बहस
आ गयी वहां,जहां था अंडरवियर का गुलाबी रंग
हम तो होली पर हमारा गंभीर चिंतन हो जाता व्यंग
नये जमाने के विद्वान भी
कुछ ऐसे ही निकले
वैलंटाईन डे पर भी बरसाते हैं
अपनी गंभीरता से हास्य का रंग

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