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श्रीमद्भागवत गीता जीवन रहस्य की पहचान कराती है-विशेष हिन्दी लेख (special articoe on shri madbhagavat gita)


अगर श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन नित्य करें तो इस बात का आभास सहजता से होता है कि उसमें सिखाया कुछ नहीं गया है बल्कि समझाया गया कि इस संसार का स्वरूप क्या है? उसमें यह कहीं नहीं कहा गया कि आप इस तरह चलें या उस चलें बल्कि यह बताया गया है कि किस तरह की चाल से आप किस तरह की छबि बनायेंगे? उसे पढ़कर आदमी कोई नया भाव नहीं सीखता बल्कि संपूर्ण जीवन सहजता से व्यतीत करें इसका मार्ग बताया गया है।
श्रीमदभागवत गीता पर जब कहीं चर्चा पढ़ने को मिलती है तब इस लेखक के मन में कुछ कुछ नया विचार आता है। यह स्थिति वैसी है जैसे कि श्रीमद्भागवत गीता को रोज पढ़ने पर नित्य कोई नया रहस्य प्रकट होता है। अक्सर अखबार, टीवी तथा अंतर्जाल पर होने वाली चर्चाओं में एक नारा अक्सर सुनाई देता है कि ‘सब पवित्र ग्रंथ एक समान’ उसमें अनेक ग्रंथों का नाम देते हुए श्रीमद्भागवत गीता का नाम भी दे दिया जाता है। कुछ लोग तो यह भी नारा देते हैं कि ‘सभी पवित्र ग्रंथ प्रेम, अहिंसा तथा दया का मार्ग सिखाते हैं’।
ऐसा लगता है कि बड़ी बड़ी बातें करने वाले छोटे नारों को गढ़कर अपना लक्ष्य साधते हैं। उनका उद्देश्य समाज के हर वर्ग के लोगों को प्रभावित करना होता है-अब यह अलग बात है कि कोई दौलत के लिये तो कोई शौहरत के लिए ऐसा करता है। कभी कभी तो लगता है कि श्रीगीता को मानने वाले तो असंख्य है पर उसे समझने वाले बहुत कम है शायद इसलिये श्रीगीता का नाम लेकर ही अधिकतर कथित प्रतिभाशाली लोग लोकप्रियता पाना चाहते हैं।
दुनियां के अनेक ग्रंथ लिखे गये हैं और उनमें मनुष्य को देवताओं की तरह बनने के नुस्खे बताये गये हैं पर किसी ने देवताओं की पहचान नहीं बतायी। राक्षस या शैतान का उल्लेख सभी करते हैं पर उसे निपटने या वैसे न होने के लिये ज्ञान कहीं नहीं मिलता। दूसरी खुशफहमी यह पैदा की जाती है कि सभी मनुष्यों को देवता बनना चाहिए जो कि एक असंभव काम है। श्रीगीता बताती है कि इस संसार में विभिन्न प्रकार के लोग रहेंगे पर और उनकी पहचान समझना जरूरी है। वह एक आईना देती है जिसमें अपनी छबि देखी जा सकती है। वह ऐसा आईना देती है जो पारदर्शी है जिसमें आप दूसरे आदमी की पहचान कर उसे व्यवहार करने या न करने का निर्णय ले सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसमें एक वैज्ञानिक सूत्र है कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं।’ इसका मतलब यह है कि जैसे संकल्पों, विचारों तथा कर्मों से आदमी बंधा है वैसा ही वह व्यवहार करेगा। उस पर खाने पीने और रहने के कारण अच्छे तथा बुरे प्रभाव होंगे। सीधी बात यह है कि अगर आप अगर यह चाहते हैं कि अपने ज्ञान के आईने में आप स्वयं को अच्छे लगें तो अपने संकल्प, विचारों तथा कर्मों में स्चच्छता के साथ अपनी खान पान की आदतों तथा रहन सहन के स्थान का चयन करें। दूसरी बात यह है कि अगर आप आने अंदर दोष देखते हैं तो विचलित होने की बजाय यह जानने का प्रयास करें कि आखिर वह किसी बुरे पदार्थ के ग्रहण करने या किसी व्यक्ति की संगत के परिणाम आया-एक बात यह भी कि जैसे श्रीगीता का अध्ययन करेंगे आपको अपने अंदर भी ढेर सारे दोष दिखाई देंगे और उन्हें दूर करने का मार्ग भी पता लगेगा।
दूसरे व्यक्ति में दोष देखें तो उस पर हंसने या घृणा करने की बजाय इस बात का अनुसंधान करें कि वह आखिर किस कारण से उसमें आया। अगर कोई दुष्ट व्यक्ति आपसे बदतमीजी करेगा तो आप दुःखी नहीं होंगे क्योंकि आप जानते हैं कि इसके पीछे अनेक तत्व है जिनका दुष्प्रभाव उस पर पड़ा है।
श्रीगीता किसी को प्रेम करना अहिंसा में लिप्त होना नहीं सिखाती बल्कि अंदर प्रेम और अहिंसा का भाव अंदर कैसे पैदा हो यह समझाती है। तय बात है कि ऐसे में आपको ऐसे तत्वों से संबद्ध होना होगा जो यह भाव पैदा करें। मतलब सिखाने से प्रेम या अहिंसा का भाव नहीं पैदा होगा बल्कि वैसे तत्वों से संपर्क रखकर ही ऐसा करना संभव है।
श्रीगीता को पढ़ने और उन पर ंिचंतन करने वाले इस बात को जानते हैं कि कोई दूसरे को प्रेम नहीं सिखा सकता क्योंकि जिस व्यक्ति का घृणा पैदा करने वाले तत्वों से संबंध है उसमें प्रेम कहां से पैदा होगा? अलबत्ता स्वयं किसी अन्य व्यक्ति से सद्व्यहार करें क्योंकि अंततः वह उसे लौटायेगा।
श्रीमद्भागत गीता में चार प्रकार के भगवान के भक्त बताये गये है। भगवान की भक्ति होती है तो जीव से प्रेम होता है। अतः भक्ति की तरह प्रेम करने वाले भी चार प्रकार के होते हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा ज्ञानी। पहले बाकी तीन का प्रेम क्षणिक होता है जबकि ज्ञान का प्रेम हमेशा ही बना रहता है। अगर आपके पास तत्व ज्ञान है तो आप अपने पास प्रेम व्यक्त करने वालों की पहचान कर सकते हैं नहंी तो कोई भी आपको हांक कर ले जायेगा और धोखा देगा।
श्रीमद्भागवत गीता में यह बात साफ तौर से कही गयी है कि प्राणायाम ध्यान, ओम शब्द का स्मरण करने से संपन्न ज्ञान यज्ञ के अमृत की अनुभूति करने वाले भक्त मुझे प्रिय हैं-सीधा आशय यही है कि जीवन के कल्याण का यही उपाय है। यह अमृत पानी पीने वाला नहीं बल्कि मन में अनुभव किया जाने वाला है जिसकी अनुभूति देह और आत्मा दोनों में ही की जा सकती है। व्यक्ति की पहचान भी बताई गयी है जो दो प्रकार के होते हैं-दैवीय प्रकृति और आसुरी प्रकृति वाले। व्यक्ति की तरह भोजन के रूप का ज्ञान भी दिया गया जो तीन तरह का होता है-सात्विक, राजस और तामसी। जैसा भोजन वैसा मनुष्य! इसका ज्ञान होने पर मनुष्य आसानी से अपने आसपास के वातावरण और व्यक्ति की पहचान कर अपना कर्म करता है।
जब श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान कोई इंसान धारण कर लेता है तो वह निष्काम कर्म और निष्प्रयोजन दया में इस तरह लिप्त होता है कि उसे सांसरिक पीड़ायें छू तक नहंी पाती क्योंकि वह जानता है कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं।’ दूसरी बात यह है कि पीड़ायें उसके पास आती भी नहीं क्योंकि वह उस श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान को आईना बनाकर सामने रख लेता है और पदार्थों को ग्रहण करने और अन्य व्यक्ति से व्यवहार करने में पहचान बड़ी सहजता से कर आगे बढ़ता है। अनुकूल लोगों से संपर्क करता है और प्रतिकूल लोगों से परे रहता है। प्रेम और अहिंसा का भाव उसमें इस तरह बना रहता है कि उसका आभास उसे स्वयं ही होता है। वह जानता है कि जीवन जीने का यही एक सहज रास्ता है।
इसलिये यह कहना ही गलत है कि श्रीमद्भागवत गीता भी अन्य ग्रंथों की तरह प्रेम करना या अहिंसा में लिप्त रहना सिखाती है संकीर्णता का परिचायक है। दरअसल प्रेम या अहिंसा सिखाने वाली बात नहीं बल्कि अपने अंदर कैसे पैदा हो इसका उपाय बताना जरूरी है। फिर इसके लिये अनेक तत्व हैं जिनका ज्ञान हुए बिना किसी में ऐसे भाव नहीं पैदा हो सकते जब तक श्रीगीता का अध्ययन न किया जाये। याद रखिये श्रीमदभागवत गीता दुनियां का अकेला ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान तथा विज्ञान दोनो ही हैं।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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संत कबीर के दोहे-किस मुहूर्त में चांद और सूरज की स्थापना हुई


धरती अम्बर न हता, को पंडित था पास।

कौन मुहूरत थापिया, चांद सूरज आकाश।।

संत कबीरदास जी कहते हैं कि जब यह धरती और आकाश नहीं था तब यहां कोई पंडित नहीं था। बताओ इनको स्थापित करने का मुहूर्त किसने निकाला होगा?

ब्राह्ण गुरु है जगत का, संतन के गुरु नाहिं

अरुझि परुझि के मरि गये, चारौ बेदों मांहिं।।

ब्राह्म्ण जगत का गुरु हो सकता है पर किसी संत का नहीं।  ज्ञानी ब्राह्म्ण लोग वेदों पर वाद विवाद करते हुए आपस में उलझ कर बिना भक्ति किये ही संसार से विदा हो गय
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भक्तिकालीन हिन्दी साहित्य को शायद इसलिये भी स्वर्णकाल कहा जाता है क्योंकि इसमें अध्यात्मिक ज्ञान तथा हार्दिक भक्ति का महत्व बताते हुए कर्मकांडो से दूर रहने की बात कही गयी।  कबीर, रहीम, मीरा, सूर तथा तुलसीदास जैसे महापुरुषों ने भक्ति भाव को प्रधानता दी पर अंधविश्वासों के नाम पर अपनाये कर्मकांडों का समर्थन कभी नहीं किया-संत कबीर तथा कविवर रहीम ने तो इसका जमकर विरोध किया और मखौल तक उड़ाया।  

आश्चर्य इस बात है कि हमारा समाज के सामान्य लोग अध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति तथा हृदय से भक्ति करने को महत्व कम देते हुए कर्मकांडों को ही धर्म समझते हैं।  अनेक लोग अपने पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक तथा मानसिक संकटों के निवारण के लिये तांत्रिकों की मदद लेते हैं जो कि उनमें अज्ञान तथा आत्मविश्वास के अभाव का प्रमाण होता है।
सच बात तो यह है कि वैदिक मंत्रों का प्रभाव तो होता है पर उसे लिये यह जरूरी है कि मनुष्य स्वयं निर्मल भाव से स्वयं उनका जाप करे।  वह भी न करे तो हृदय में केवल भगवान के नाम का स्मरण करे तो भी संकट दूर हो जाते हैं।  शादी तथा दुकान मकान के मुहूर्त के लिये पंडितों के पास जाकर तारीख निकाली जाती है पर क्या कभी किसी ने सोचा है कि जब यह प्रथ्वी, चंद्रमा या सूरज स्थापित हुआ होगा तक किसने मुहूर्त निकाला होगा।
कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा अध्यात्मिक ज्ञान तथा भक्ति भाव ही हमारे जीवन की नैया पार लगा सकता है। इस देह के जन्म या मृत्यु को लेकर नाटकबाजी करना बेकार है।  कोई आदमी पैदा होता है तो लोग जश्न मनाते हैं और मरता है तो रोते हैं।  मरने के बाद भी देह का यशोगान करना हमारी परंपरा नहीं है-यानि जन्म तिथि और पुण्यतिथि मनाना भी देहाभिमान का प्रमाण है।  अनेक महापुरुषों ने तेरहवीं और श्राद्धों का भी विरोध किया है।  श्रीमद्भागवत गीता के पहले अध्याय को विषाद योग कहा जाता है जिसमें वीर अर्जुन अपनी चिंताओं से श्रीकृष्ण जी को अवगत कराते हैं-उसमें पितरों के श्राद्ध पर संकट की बात भी कहते हैं।  सीधी बात यह है कि मृत्यु पर शोक करना या तेरहवीं और श्राद्ध करना विषाद को ही जन्म देता है।  अनेक लोग केवल इसलिये ही शोक, श्राद्ध तथा तेरहवीं करते हैं कि न करने पर समाज क्या कहेगा? वह यह सब करते हुए तनाव भी अनुभव करते हैं पर कह नहीं पाते। भगवान श्रीकृष्ण ने बाद के पंद्रह अध्यायों में इसी प्रकार की सकाम भक्ति को अनावश्यक बताया है।  इस तरह के कर्मकांड न केवल धन बल्कि समय भी नष्ट करते हैं और अंततः निजी तनाव का कारण भी इन्हीं से उत्पन्न होता है।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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धर्म की आड़ में अपराध-विशेष हिन्दी लेख (Dharm aur Insan-special hindi article)


अभी हाल में भारत में कुछ कथित हिन्दू धर्माचार्यों पर आर्थिक, सामाजिक तथा यौन अपराध करने की रहस्योद्घाटन करने वाले समाचार देखने को मिले थे तब कुछ लोगों ने उस धर्म से जोड़ने की नाकामा कोशिश की थी। इन समाचारों को लेकर ऐसा प्रचार किया गया कि जैसे कि यह केवल हिन्दू धर्म में ही संभव है। अब पश्चिमी देशों में कुछ पादरियों द्वारा ऐसी ही घटनाओं की जानकारी आयी है और उन पर बालकों के साथ यौन शोषण जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। इसके बावजूद हमारा यह मानना है कि इसे ईसाई धर्म से जोड़ना गलत होगा। यह कहना भी गलत होगा कि ईसाई समाज के अधिकतर पादरी इसमें लिप्त हैं। दरअसल आज के आधुनिक संचार माध्यमों का उपयोग करते हुए अपने चिंतन और विवेक को पुराने दायरों से बाहर निकलकर सोचना चाहिये। अगर हम ऐसा नहीं करते तो निश्चित रूप से समाज और उससे जुड़े धर्मों के प्रति कोई नया नज़रिया नहीं बन पायेगा और पुराने ढर्रे पर आपस संघर्ष और विवाद चलते रहेंगे।
सच बात तो यह है कि कहीं भी धर्म की स्थापना के लिये जन चेतना आंदोलन की आवश्यकता तो हो सकती है पर वहां संगठन बनाने और उसे चलाने की आवश्कता ही नहीं है। जहां संगठन बनते हैं वहां पर पदाधिकारियों की नियुक्ति होती है और तब वहां आम और खास का अंतर भी निर्मित होता है। यही अंतर धर्म की आड़ में अधर्म करने का आधार बनता है क्योंकि वहां आम आदमी को धाार्मिक स्थानों और आयोजनों में एक ग्राहक और खास को उत्पादक या व्यवसायी बना देता है। जहां व्यवसाय वाली बात आई वहां भ्रष्टाचार स्वाभाविक रूप से पनपता है चाहे भले ही वह धर्म प्रचार से क्यो न जुंड़ा हो ऐसे में विश्व में चल रहे किसी भी धर्म के आचार्य पर जब कोई आर्थिक, यौन अथवा राजनीतिक अपराध करने का कोई आरोप लगता है तो उसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है।
हमें यह पता नहीं है कि पश्चिमी में पैदा धर्मों में आध्यात्मिक ज्ञान का कितना तत्व है पर इतना तय है भारतीय धर्मों उससे सराबोर हैं। अध्यात्मिक ज्ञान के बिना कोई भी ज्ञानी यह दावा नहीं कर सकता कि वह धार्मिक प्रवृत्तियों को धारण करने वाला है। इस अध्यात्म ज्ञान को गुरु से ग्रहण किया जाता है पर मुश्किल यह है कि इसको सुनाने वाले तो बहुत हैं पर धारण करने वाले ज्ञानी नगण्य हैं। आखिर आदमी को अध्यात्मिक शांति के लिये कहंी न कहीं जाना है-चाहे वह धनी हो या गरीब, स्त्री हो या पुरुष, वृद्ध हो या युवा-और इसके लिये वह गुरु को ढूंढता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के संपूर्ण होने का प्रमाण यह भी है कि यहां के धर्म में गुरु को जितना महत्व दिया गया उतना अन्य कहीं देखने को नहीं मिलता। इस बात पर गौरव करना चाहिये पर हमारे देश के अनेक कथित गुरुओं ने अपने लाभ के लिये जिस तरह लोगों की भावनाओं का दोहन किया है उसे देखकर ऐसा करने में संकोच भी होता है। दूसरी बात यह भी है कि जितने भी गुरु हैं उनमें से शायद ही कोई तत्व ज्ञान को समझता हो-रट भले ही लिया हो पर समझ में उनके कुछ नहीं आता।
दरअसल लोग इस बात को नहीं समझते और इसलिये वह धर्म के नाम पर विश्व भर में फैले पाखंड का प्रतिकार करने की सोच भी नहीं पाते। पहली बात तो यह कि धर्म कोइ्र प्रत्यक्ष रूप से लाभ दिलाने वाला कोई माध्यम नहीं है, अगर आप ऐसी अपेक्षा करेंगेे तो यकीनन चालाकियों के जाल में फंसते जायेंगे या फिर इतना ज्ञान प्राप्त करेंगे कि दूसरों के लिये जाल बुन सकते हैं। धर्म का आधार अध्यात्म है। अध्यात्म यानि वह आत्मा जो हमारे अंदर विचरण कर रहा है। उसे जानना और समझना ही तत्व ज्ञान है। जब हम उसे जान और समझ लेते हैं तब हमें इस संसार का सार भी समझ आ जाता है और दुःख हमें विचलित नहीं कर सकते और सुख किसी संकट में नहीं डाल सकते।
भक्ति और योग साधना एकांत में लाभप्रद होते हैं। यही सही है कि इनके करने के तौर तरीके सीखने के गुरु के पास जाना पड़ता है और वहां अन्य शिष्य भी उपस्थित रहते हैं। इसलिये वहां तन्मयता से सीखना चाहिये और फिर उस शिक्षा का उपयोग एकांत साधना में करना चाहिये। एक बार गुरु का दर छोड़ें तो पलट कर नहीं देखें-हमारे अनेक महापुरुषों ने गुरु किये और फिर वहां से निकले तो फिर समाज की सेवा की न कि हर बरस गुरुओं के घर चक्कर लगाकर जिंदगाी का कथित आनंद लिया। जहां भीड़ है वहां धर्म की आशा करना बेकार है क्योंकि अगर वहां एक भी दुष्ट है तो वह प्रत्यक्ष रूप से अपने कर्म तथा अप्रत्यक्ष रूप से अपनी सांसों से विषाक्त वातावरण निर्मित करता है।
एक बात यह भी है कि भारत में उत्पन्न धर्म संगठन पर आधारित नहीं है। उनका लक्ष्य व्यक्ति निर्माण है। यही कारण है कि यहां धर्मगुरुओं पर कोई अंकुश नहीं रहता। ऐसे में कुछ धार्मिक लोगों के पापों के लिये पूरे समाज को जिम्मेदारी नहंी ठहरा सकते। भारत के धर्म प्रत्यक्ष रूप से राजनीति के लिये प्रेरित नहीं करते इसलिये यहां के किसी राजा ने उसके विस्तार का प्रयास भी नहीं किया। इसके विपरीत भारत के बाहर उत्पन्न धर्म मनुष्य को इकाई में स्वतंत्र विचरण से रोककर उस संगठन के आधार से जुड़ने के लिये बाध्य करते हैं और उनमें राजनीतिक प्रभाव के सहारे विस्तार पाने की प्रवृत्ति भी देखी जाती है।
पश्चिम में जिन धार्मिक लोगों पर यौन शोषण के आरोप लगे हैं उनके पीछे कहीं न कहंी संगठन है और वह चाहें तो उन पर कार्यवाही कर सकते हैं। दूसरी बात यह कि सबसे बड़े धार्मिक गुरु पर भी अनेक भ्रष्ट धार्मिक कर्मकांडियों को छोड़ने या उनकी अपराध की उपेक्षा करने का आरोप है। ऐसे में वहां का समाज कहीं न कहीं अपने को जिम्मेदार मान रहा है और यही कारण है कि अनेक बुद्धिजीवी आरोपियों के विरुद्ध मुखर हैं क्योंकि उनको लगता है कि नैतिक दबाव के चलते अपराधी धार्मिक कर्मकांडियों को उनके स्थानों से हटवाकर दंडित कराया जा सकता है। भारत में यह स्थित इसलिये नहीं बनती क्योंकि यहां के धार्मिक कर्मकांडी अपनी सत्ता के सहारे स्थापित रहते हैं ऐसे में उन अपराध के लिये कानूनी कार्यवाही तो की जा सकती है पर किसी तरह का सामाजिक दबाव नहीं बन पाता। ऐसे में भक्तों को ऐस भ्रष्ट मठाधीाशों के प्रति उपेक्षासन करने की प्रेरणा ही दी जा सकती है-यह अलग बात है कि ऐसा प्रयास भी नहीं हो पाता।
कहने का अभिप्राय यह है कि पूरे विश्व में धर्म के आधार पर भ्रष्टाचार को रोकने का एक ही उपाय है कि लोगों को अध्यात्म और धर्म में अंतर समझाया जाना चाहिये। हम धार्मिक कर्मकांड स्वर्ग पाने के लिये करते हैं या इस जीवन में शांति पाने की इच्छा होती है-पहले इस बात पर आत्ममंथन करना जरूरी है। धार्मिक कर्मकांडों से स्वर्ग मिलता है यह तो प्रमाणित नहीं है पर एकांत साधना से अध्यात्मिक अभ्यास से मन को शांति मिलती है यह निश्चित है। यह अध्यात्मिक अभ्यास किसी भी प्रचलित धर्म से संबंधित नहीं है। कम से कम भारत में तो किसी धर्म का नाम बहुत समय से प्रचलित नहीं है। यहां धर्म से आशय सत्कर्म, सुविचार और सत्संग से न कि केवल हिन्दू धर्म से। सभी जानते हैं कि हिन्दू धर्म से यहां के संबोधन का प्रचलन अधिक पुराना नहीं है। इसे विदेशियों ने पहचान के रूप में दिया है। इसके विपरीत विदेशी धर्म तो पहनावे, नाम और सर्वशक्तिमान के अपने प्रतीकों के अलावा किसी अन्य को तो मानते ही नहीं है। हम यहां यह नहीं कह रहे कि हमारा धर्म श्रेष्ठ है पर आशय यह है कि चाहे किसी भी धर्म का दलाल हो-जी हां गलत कर्म करने वालों के लिये ही शब्द ठीक लगता है-उसके दुष्कर्मों से पूरे धर्म समाज के लोग स्वयं को आहत न अनुभव करें। पूरी दुनियां के हर धर्म में अधर्म तो रहना ही है। अगर सारा संसार देवताओं से भरा होता तो फिर धर्म की आवश्यकता ही क्या होती? ऐसे में अपना समय कथित धार्मिक पापियों की चर्चा पर नष्ट करने की बजाय अपने चरित्र और विचार निर्माण की तरफ देना चाहिए। धर्म की आड़ में होने वाले धंधों को रोकने के लिये लोगों को जागरुक होकर धर्म और अध्यात्म में अंतर समझना चाहिये।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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यज्ञ की तरह है योग साधना-अध्यात्मिक सन्देश


योगांगनुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
हिन्दी में भावार्थ-
योग साधना के द्वारा अंगों का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का नाश होने पर जो विवेक का प्रकाश फैलता है उससे निश्चित रूप से ख्याति मिलती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पतंजलि योग शास्त्र में न केवल योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान की व्याख्या है बल्कि उसका महत्व भी दिया गया है।  अक्सर लोग योगासनों को सामान्य व्यायाम कहकर प्रचारित करते हैं जबकि इसे पतंजलि वैसा ही अनुष्ठान मानते हैं जैसे कि द्रव्य द्वारा किये जाने वाले यज्ञ और हवन।
श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण भी योग साधना को एक तरह से यज्ञ मानने का संदेश देते हैं। अगर उनका आशय समझा जाये तो एक तरह से वह अपने भक्तों से इसी यज्ञ की अपेक्षा करते हुए कहते हों कि ‘मुझे योग यज्ञ से उत्पन्न ऊर्जा ही समर्पित करें।’
भगवान श्रीकृष्ण का आशय समझा जाये तो वह  यज्ञ से उत्पन्न अग्नि से ही संतुष्ट होते हैं।  यह यज्ञ सामग्री एक तरह से हमारा पसीना है जिससे देह के विकार निकलकर बाहर आकर नष्ट होते हैं और फिर प्राणयाम तथा ध्यान के संयोग से  उत्पन्न अमृत से  संपन्न हृदय के भाव  हम मंत्रोच्चार के द्वारा परमात्मा को प्रसाद की तरह चढ़ाते हैं।  सर्वशक्तिमान की इच्छा यही होती है कि उसका हर बंदा प्रसन्न और शुद्ध भाव से युक्त हो। योगसाधना उसका एक मार्ग है।  जो लोग योग साधना करते हैं उनको किसी अन्य प्रकार के अनुष्ठान की तो आवश्यकता ही नहीं रह जाती क्योंकि अपने मन, विचार, और बुद्धि की शुद्धि करने से स्वयं ही भक्ति का भाव पैदा होता है।  यह प्रक्रिया इतनी स्वाभाविक होती है कि मनुष्य को फिर किसी अन्य प्रकार से भक्ति करना सुहाता ही नहीं है क्योंकि पूरा दिन उसका मन और शरीर प्रफुल्लित भाव से विचरण करता है और रात्रि को विश्रामकाल प्रतिदिन मोक्ष प्राप्त करते हुए व्यतीत हो जाता है।
सबसे बड़ा लाभ यह है कि योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान से हमारी शरीर और मन की अशुद्धि दूर होने के बाद हमारे कर्म व्यवहार में जो आकर्षण उत्पन्न होता है उससे ख्याति फैलती है। इतना ही नहीं चेहरे पर तेजस्वी भाव देखकर दूसरे लोग प्रभावित भी होते हैं।  

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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संत कबीर वाणी:जीभ का रस सर्वोत्तम (sant kabir vani-jibh ka ras sarvottam)


        देखा जाये तो संसार में ज्ञानी लोगों  की संख्या अत्यंत कम है। उसके बाद ऐसे लोगों की संख्या है जो ज्ञान की तलाश के लिये प्रयासरत रहते हैं यह अलग बात है कि योग्य गुरु के अभाव में उनको सफलता नहीं मिलती। मगर ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो न तो जिनके पास ज्ञान है न उनको पाने की जिज्ञासा है। देहाभिमान से युक्त ऐसे लोग हर समय अपने आपको श्रेष्ठ प्रमाणित करने के लिये बकवाद करते हैं। दूसरों का मजाक बनाते हैं। ऐसे मूर्ख लोग अपने आपको बुद्धिमान साबित करने के लिये किसी भी हद तक चले जाते हैं। न तो वह समय देखते हैं न व्यक्ति। अपने शब्दों का अर्थ वह स्वयं नहीं समझते। उनको तो बस बोलने के लिये बोलना है। ऐसे लोग न बल्कि दूसरों को दुःख देते हैं बल्कि कालांतर में अपने लिये संकट का निर्माण भी करते हैं।
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि
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सहज तराजू आनि के, सब रस देखा तोल
सब रस माहीं जीभ रस, जू कोय जाने बोल
“संसार में विभिन्न प्रकार के रस हैं और हमने सब रसों को सहज स्वभाव की ज्ञान -तुला पर तौलकर देख-परख लिया है। सब रसों में जीभ का रस सर्वोत्तम एव अधिक वजन वाला है। उसे वही जान सकता है जो अपने शब्द और वाणी का सही उपयोग करना जानता है।”
मुख आवै सोई कहै, बोलै नहीं विचार
हटे पराई आतमा, जीभ बाँधि तलवार
“कुछ नासमझ लोग ऐसे हैं जो कभी भी सोच समझकर नहीं बोलते और मुहँ में जो आता है बक देते हैं। ऐसे लोगों की वाणी और शब्द तलवार की तरह दूसरों को कष्ट पहुँचाते हैं।”
         इसके विपरीत ज्ञानी लोग हर शब्द के रस का अध्ययन करते हैं। उनके प्रभाव पर दृष्टिपात करते हैं। उनका अभ्यास इतना अधिक हो जाता है कि उनके मुख से निकला एक एक शब्द न केवल दूसरों का सुख देता है बल्कि वह स्वयं भी उसका आनंद उठाते हैं। एक बात निश्चित है कि किसी भी मनुष्य के मुख से निकले शब्द उसके अंतर्मन का प्रमाण होते हैं। दुष्ट लोग जहां हमेशा अभिमान और कठोरता से भरे भरे शब्द उपयोग करते है जबकि सज्जन कठोर बात भी मीठे शब्दों में कहते हैं। इसलिये जब कहीं वार्तालाप करते हैं तो इस बात का विचार करें कि हमारे शब्द का बाहर प्रभाव क्या होगा? इससे न केवल हम दूसरे को सुख दे सकते हैं बल्कि अपने लिये आने वाले संकटों से भी बच सकते हैं। कहा भी जाता है कि यही वाणी आपको धूप में बैठने का दुःख और छांव में बैठने के सुख का कारण बनती है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com