Tag Archives: हिन्दी शायरी

विकास और उधार-हिन्दी कविताएँ


सड़क पर पहियों के नीचे
कुचली जाती धूल
आँख और मुंह में घुसकर
अपनी ताकत दिखाती है,
कहें दीपक बापू
ऊंची इमारतों के सामने
कैसे अस्तित्व बचाएं
तेज रोशनी से चमकते बल्बों
को कैसे चिढ़ाएं
यही वह सिखाती है।
————–
विकास सड़क पर
पहियों की सवारी कर रहा है,
जेब खाली है
आदमी उधार के कागज़ भर रहा है।
कहें दीपक बापू
कर्ज़ लेकर पीने के लिए घी
खरीद भी लें
असली होने का भरोसा नहीं
पेट वैसे भी
                                                            ज़हरीली गैसों से मर रहा है।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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चिराग स्वदेश का-हिन्दी शायरी (chirag swadesh ka-hindi shayari)


तरक्की के रास्ते पर
बस कार ही चलती है,
दूध की नदिया बहती थी जहां
पेट्रोल की धारा वहाँ मचलती है।
कहें दीपकबापू
विदेशी पेट्रोल की चाहत में
दूध, दही और खोवा हो गया नकली
अब स्वदेशी चिराग में
देश प्रेम की लौ मंद जलती है।
लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior

कागज के शेर-हिन्दी व्यंग्य कविता kagaj ke sher or loin of paper-hindi satire poem)


लापता हो गये हाड़मांस के असली शेर,
कुछ बीते इतिहास में दर्ज थे
कुछ आज भी कागजों में दिख रहे हैं।
नए जमाने में
पैसे, पद और प्रतिष्ठा के शिखर पर
बैठे इंसान ही कागज पर
अपने नाम में शेर लिख रहे हैं।
—————
सुना है उनका शेर जैसा है जिगर
पर नहीं जिंदा रह सकते
वह कागज़ के नोट खाये बगैर।
——————
कंधे पर बंदूक लटकाए
वह घूम रहे हैं
कहते हुए अपने को शेर,
दुश्मन बनाए हैं जमाने में
काँपते हैं हर पल
कब कौन कर देगा कब ढेर।
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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पहले से सब तय है-हिन्दी साहित्यक कविताएँ


चेतन हैं
पर जड़ जैसे दिखते हैं,
कलम उनके हाथ में
पर दूसरे के शब्द लिखते हैं।
चमकदार नाम वही चारों तरफ
पर उनके चेहरे बाज़ार में
दाम लेकर बिकते हैं।
—————
एक सवाल उठाता है
दूसरा देता है जवाब।
बहसें बिक रही है
विज्ञापन के सहारे
चेहरे पहले से तय हैं,
जुबान से निकले
और कागज़ में लिखे शब्द भी
पहले से तय हैं,
निष्कर्ष कोई नहीं
पर बात हमेशा होती है लाजवाब
—————-
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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खज़ाने की चाब़ी ठगों के हाथ में-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (thago ke hath men khazana-hindi vyangya kavitaen


खज़ाने की चाब़ी ठगों के हाथ में देकर
मालिक अब बेफिक्र हो गये हैं,
हेराफेरी में हाथ काले नहीं होंगे
मिलेगा कमाई से पूरा हिस्सा
यह देखकर
सफेदपोश चैन की नींद सो गये हैं।
————
कत्ल के पेशेवरों ने ले ली
शहर भर की पहरेदारी,
तय किया पुराने हमपेशा सफेदपोशों को
खंजर घौंपने की छूट के साथ
अपनी कमाई में देंगे हिस्सेदारी।
———

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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