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ब्लॉग पर लिखा गया भी साहित्य है-हिन्दी आलेख (Literature written on the blog – the Hindi article)


हिंदी की विकास यात्रा नहीं रुकेगी। लिखने वालों का लिखा बना रहेगा भले ही वह मिट जायें। पिछले दिनों कुछ दिलचस्प चर्चायें सामने आयीं। हिंदी के एक लेखक महोदय प्रकाशकों से बहुत नाखुश थे पर फिर भी उन्हें ब्लाग में हिंदी का भविष्य नहीं दिखाई दिया। अंतर्जाल लेखकों को अभी भी शायद इस देश के सामान्य लेखकों और प्रकाशकों की मानसिकता का अहसास नहीं है यही कारण है कि वह अपनी स्वयं का लेखकीय स्वाभिमान भूलकर उन लेखकों के वक्तव्यों का विरोध करते हुए भी उनके जाल में फंस जाते हैं।
एक प्रश्न अक्सर उठता है कि क्या ब्लाग पर लिखा गया साहित्य है? जवाब तो कोई नहीं देता बल्कि उलझ कर सभी ऐसे मानसिक अंतद्वंद्व में फंस जाते हैं जहां केवल कुंठा पैदा होती है। हमारे सामने इस प्रश्न का उत्तर एक प्रति प्रश्न ही है कि ‘ब्लाग पर लिखा गया आखिर साहित्य क्यों नहीं है?’

जिनको लगता है कि ब्लाग पर लिखा गया साहित्य नहीं है उनको इस प्रश्न का उत्तर ही ढूंढना चाहिए। पहले गैरअंतर्जाल लेखकों की चर्चा कर लें। वह आज भी प्रकाशकों का मूंह जोहते हैं। उसी को लेकर शिकायत करते हैं। उनकी शिकायतें अनंतकाल तक चलने वाली है और अगर आज के समय में आप अपने लेखकीय कर्म की स्वतंत्र और मौलिक अभिव्यक्ति चाहते हैं तो अंतर्जाल पर लिखने के अलावा कोई चारा नहीं है। वरना लिफाफे लिख लिखकर भेजते रहिये। एकाध कभी छप गयी तो फिर उसे दिखा दिखाकर अपना प्रचार करिये वरना तो झेलते रहिये दर्द अपने लेखक होने का।
उस लेखक ने कहा-‘ब्लाग से कोई आशा नहीं है। वहां पढ़ते ही कितने लोग हैं?
वह स्वयं एक व्यवसायिक संस्थान में काम करते हैं। उन्होंने इतनी कवितायें लिखी हैं कि उनको साक्षात्कार के समय सुनाने के लिये एक भी याद नहीं आयी-इस पाठ का लेखक भी इसी तरह का ही है। अगर वह लेखक सामने होते तो उनसे पूछते कि ‘आप पढ़े तो गये पर याद आपको कितने लोग करते हैं?’
अगर ब्लाग की बात करें तो पहले इस बात को समझ लें कि हम कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं उसका नामकरण केल्कूलेटर, रजिस्टर, टेबल, पेन अल्मारी और मशीन के शब्दों को जोड़कर किया गया है। मतलब यह है कि इसमें वह सब चीजें शामिल हैं जिनका हम लिखते समय उपयोग करते हैं। अंतर इतना हो सकता है कि अधिकतर लेखक हाथ से स्वयं लिखते हैं पर टंकित अन्य व्यक्ति करता है और वह उनके लिये एक टंकक भर होता है। कुछ लेखक ऐसे भी हैं जो स्वयं टाईप करते हैं और उनके लिये यह अंतर्जाल एक बहुत बड़ा अवसर लाया है। स्थापित लेखकों में संभवतः अनेक टाईप करना जानते हैं पर उनके लिये स्वयं यह काम करना छोटेपन का प्रतीक है। यही कारण है अंतर्जाल लेखक उनके लिये एक तुच्छ जीव हैं।
इस पाठ का लेखक कोई प्रसिद्ध लेखक नहीं है पर इसका उसे अफसोस नहीं है। दरअसल इसके अनेक कारण है। अधिकतर बड़े पत्र पत्रिकाओं के कार्यालय बड़े शहरों में है और उनके लिये छोटे शहरों में पाठक होते हैं लेखक नहीं। फिर डाक से भेजी गयी सामग्री का पता ही नहीं लगता कि पहुंची कि नहीं। दूसरी बात यह है अंतर्जाल पर काम करना अभी स्थापित लोगों के लिये तुच्छ काम है और बड़े अखबारों को सामगं्री ईमेल से भी भेजी जाये तो उनको संपादकगण स्वयं देखते हों इसकी संभावना कम ही लगती है। ऐसे में उनको वह सामग्री मिलती भी है कि नहीं या फिर वह समझते हैं कि अंतर्जाल पर भेजकर लेखक अपना बड़प्पन दिखा रहा इसलिये उसको भाव मत दो। एक मजेदार चीज है कि अधिकतर बड़े अखबारों के ईमेल के पते भी नहीं छापते जहां उनको सामग्री भेजी जा सके। यह शिकायत नहीं है। हरेक की अपनी सीमाऐं होती हैं पर छोटे लेखकों के लिये प्रकाशन की सीमायें तो अधिक संकुचित हैं और ऐसे में उसके लिये अंतर्जाल पर ही एक संभावना बनती है।
इससे भी हटकर एक बात दूसरी है कि अंतर्जाल पर वैसी रचनायें नहीं चल सकती जैसे कि प्रकाशन में होती हैं। यहां संक्षिप्तीकरण होना चाहिये। मुख्य बात यह है कि हम अपनी लिखें। जहां तक हिट या फ्लाप होने का सवाल है तो यहां एक छोटी कहानी और कविता भी आपको अमरत्व दिला सकती है। हर कविता या कहानी तो किसी भी लेखक की भी हिट नहीं होती। बड़े बड़े लेखक भी हमेशा ऐसा नहीं कर पाते।
एक लेखिका ने एक लेखक से कहा-‘आपको कोई संपादक जानता हो तो कृपया उससे मेरी रचनायें प्रकाशित करने का आग्रह करें।’
उस लेखक ने कहा-‘पहले एक संपादक को जानता था पर पता नहीं वह कहां चला गया है। आप तो रचनायें भेज दीजिये।’
उस लेखिका ने कहा कि -‘ऐसे तो बहुत सारी रचनायें भेजती हूं। एक छपी पर उसके बाद कोई स्थान हीं नहीं मिला।‘
उस लेखक ने कहा-‘तो अंतर्जाल पर लिखिये।’
लेखिका ने कहा-‘वहां कौन पढ़ता है? वहां मजा नहीं आयेगा।
लेखक ने पूछा-‘आपको टाईप करना आता है।’
लेखिका ने नकारात्मक जवाब दिया तो लेखक ने कहा-‘जब आपको टाईप ही नहीं करना आता तो फिर अंतर्जाल पर लिखने की बात आप सोच भी कैसे सकती हैं?’
लेखिका ने कहा-‘वह तो किसी से टाईप करवा लूंगी पर वहां मजा नहीं आयेगा। वहां कितने लोग मुझे जान पायेंगे।’
लेखन के सहारे अपनी पहचान शीघ्र नहीं ढूंढी जा सकती। आप अगर शहर के अखबार में निरंतर छप भी रहे हैं तो इस बात का दावा नहीं कर सकते कि सभी लोग आपको जानते हैं। ऐसे में अंतर्जाल पर जैसा स्वतंत्र और मौलिक लेखन बेहतर ढंग से किया जा सकता है और उसका सही मतलब वही लेखक जानते हैं जो सामान्य प्रकाशन में भी लिखते रहे हैं।
सच बात तो यह है कि ब्लाग लिखने के लिये तकनीकी ज्ञान का होना आवश्यक है और स्थापित लेखक इससे बचने के लिये ऐसे ही बयान देते हैं। वैसे जिस तरह अंतर्जाल पर लेखक आ रहे हैं उससे पुराने लेखकों की नींद हराम भी है। वजह यह है कि अभी तक प्रकाशन की बाध्यताओं के आगे घुटने टेक चुके लेखकों के लिये अब यह संभव नहीं है कि वह लीक से हटकर लिखें।
इधर अंतर्जाल पर कुछ लेखकों ने इस बात का आभास तो दे ही दिया है कि वह आगे गजब का लिखने वाले हैं। सम सामयिक विषयों पर अनेक लेखकों ने ऐसे विचार व्यक्त किये जो सामान्य प्रकाशनों में स्थान पा ही नहीं सकते। भले ही अनेक प्रतिष्ठत ब्लाग लेखक यहां हो रही बहसें निरर्थक समझते हों पर यह लेखक नहीं मानता। मुख्य बात यह है कि ब्लाग लेखक आपस में बहस कर सकते हैं और आम लेखक इससे बिदकता है। जिसे लोग झगड़ा कह रहे हैं वह संवाद की आक्रामक अभिव्यक्ति है जिससे हिंदी लेखक अभी तक नहीं समझ पाये। हां, जब व्यक्तिगत रूप से आक्षेप करते हुए नाम लेकर पाठ लिखे जाते हैं तब निराशा हो जाती है। यही एक कमी है जिससे अंतर्जाल लेखकों को बचना चाहिये। वह इस बात पर यकीन करें कि उनका लिखा साहित्य ही है। क्लिष्ट शब्दों का उपयोग, सामान्य बात को लच्छेदार वाक्य बनाकर कहना या बड़े लोगों पर ही व्यंग्य लिखना साहित्य नहीं होता। सहजता पूर्वक बिना लाग लपेटे के अपनी बात कहना भी उतना ही साहित्य होता है। शेष फिर कभी।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

अनाम बनकर न सताओ-आलेख


देश में सात करोड़ इंटरनेट कनेक्शन हैं पर सभी लोग नहीं लिख सकते क्योंकि यूनिकोड पर जानने वालों की बहुत कमी है। हिंदी ब्लाग जगत पर जो लिख रहे हैं उनमे कुछ लोग बहुत अपने ज्ञान पर इतराते हैं तो यही कहना पड़ता है कि उन्होंने बहुत आसानी से ब्लाग लिखना सीख लिया होगा। शायद अब ब्लाग की अच्छी जानकारी आ जाने पर कुछ लोगों के मन में उसके दुरुपयोग की बात आने लगी है जो अब बेनाम टिप्पणियों में रूप में प्रकट हो रही है।
इस लेखक को पाठकों के लिये पढ़ने योग्य ब्लाग लिखने में तीन महीने लग गये थे। हालत यह थी कि ब्लाग स्पाट के ब्लाग से शीर्षक कापी कर वर्डप्रेस के ब्लाग पर रख रहा था क्योंकि वहां हिंदी आना संभव नहीं थी। हिंदी लिखने का तरीका भी विचित्र था। कंप्यूटर पर एक आउटलुक सोफ्टवेयर दिया गया था। उसमें कृतिदेव फोंट सैट कर यूनिकोड टेक्स्ट के द्वारा लिखने पर हिंदी में लिखा वर्डप्रेस के एचटीएमएल में प्रकाशित तो हो जाता था पर उसे लेखक स्वयं ही पढ़ सकता था। बाकी ब्लाग लेखक चिल्ला रहे थे कि भई यह कौनसी भाषा में लिखा है।
उसके बाद ब्लाग स्पाट के यूनिकोड से छोटी कवितायें ही लिख रहा था। सच तो यह है कि ब्लाग लिखने के मामले में हताश हो चुका था। फिर हिम्मत कर रोमन लिपि में टाईप कर काम चलाता रहा। उस समय एक लेख लिखना पहाड़ जैसा लगता था। बाद में कृतिदेव का यूनिकोड मिला तब जाकर आसानी लगने लगी।
बड़े शहरों का पता नहीं पर छोटे शहरों में जहां तक इस लेखक को जानकारी है बहुत कम लोग लिखने की सोचते हैं और उससे भी कम ब्लाग तकनीकी के बारे में जानते हैं। चाहे कोई ब्लाग लेखक कितना भी दावा करे कि वह तो शुरु से ही सब कुछ जानता है पर सच तो यह है कि अनेक वरिष्ठ ब्लाग लेखकों को भी बहुत सारी जानकारी अभी हुई है। आज हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले नारद फोरम पर आप सूचना न भी दें तो वह आपका हिंदी ब्लाग लिंक कर लेता है पर इसी नारद से यह धमकी मिली थी कि ‘आपका ईमेल पर प्रतिबंध लगा देंगे क्योंकि आप ब्लाग का पता गलत दे रहे हैं। वह मिल नहीं रहा।’
पहले तो ब्लाग का शीर्षक उनको भेजा फिर बिना http:// लगाकर पता दिया। फिर www लगाकर भेजा। इस लेखक ने तय किया नारद पर पंजीकरण नहीं करायेंगे। इधर दो तीन ब्लाग पर गद्य लिखना प्रारंभ कर दिया तो आज के अनेक धुरंधर अपनी टिप्पणी में कहने लगे कि आप नारद पर पंजीकरण क्यों नहीं कराते। अब तो सभी हमारे मित्र हैं अब उनसे क्या पूछें कि आप खुद ही उस समय स्वयं ही क्यों नहीं पंजीकरण कर रहे थे? संभव है उस समय वह ब्लाग का पता कट पेस्ट करना भी नहीं जानते होंगे।
तय बात है कि उनको भी तब यह समझ में नहीं आ रहा होगा कि वर्डप्रेस पर सभी के सामने चमक रहा ब्लाग उनके यहां कैसे लिंक होगा जब तक दूसरा भेजेगा नहीं। वर्ड प्रेस पर किसी वेबसाईट की इमेज कैसे सैट करें यह अभी एक माह पहले हमें पता लगा।
हमारे एक मित्र ब्लाग लेखक मित्र श्री शास्त्री जी के ब्लाग पर कुछ ब्लाग लेखक हमारे मित्र के आई डी से ही टिप्पणी देकर बता रहे थे कि किस तरह उनके नाम का भी दुरुपयोग हो सकता है? हम तो हैरान हो गये यह देखकर! यह सोचकर डरे भी कि कोई हमारे ईमेल की चोरी न भी कर सका तो वह आई डी की चोरी तो आसानी से कर सकता है। हमारे एक मित्र श्री सुरेश चिपलूनकर इस तरह का झटका झेल चुके हैं।
इतना तय है कि इस तरह की हरकतें करने वाला ब्लाग लेखक कोई पुराना ही हो सकता है। हमारे शहर में जान पहचान के लोग ब्लाग लिखने का प्रयास कर रहे हैं और हमसे आग्रह करते हैं कि आप किसी दिन आकर हमारी मदद कर जाओ। कुछ लोगों को जब हिंदी का इंडिक टूल भेजते हैं तो वह गद्गद् हो जाते हैं-उनके लिये यह जादू की तरह है। हम सोचते हैं कि उन ब्लाग लेखकों को हमारे जितना ज्ञान पाने में ही एक वर्ष तो कम से कम लग ही जायेगा। ऐसे में इतना तय है कि कोई नया ब्लाग लेखक ऐसा नहीं कर सकता कि वह दूसरे के आई. डी. का इतनी आसानी से उपयोग करे।
ऐसे में हमारा तो समस्त अंतर्जाल लेखकों से यही आग्रह है कि भई, क्यों लोगों को आतंकित कर रहे हो। हमारे यहां के आम लोग और लेखक किसी झमेले में फंसने से बचते हैं। ऐसे में जहां पैसा एक भी नहीं मिलता हो और इस तरह फंसने की आशंका होगी तो फिर अच्छे खासे आदमी का हौंसला टूट जायेगा। हमारे सभी मित्र हैं, शायद इसलिये आशंकित हैं कि कहीं कुछ लोग इतिहास में अपना नाम जयचंद की तरह तो दर्ज नहीं कराने जा रहे।
वैसे हम तो सारे प्रसिद्ध ब्लाग लेखकों को पढ़ चुके हैं। इतना भी जान गये हैं कि तकनीकी रूप से कितना सक्षम है्-यह भी अनुमान कर लेते हैं कि कौन ऐसा कर सकता है? बिना प्रमाण किये कुछ कहना ठीक नहीं है फिर समस्या यह है कि सभी हमारे मित्र हैं और किसी पर संदेह करना अपराध जैसा है। ब्लाग से संबंधित कुछ समस्याओं का सामना करते हुए इस लेखक को लगता है कि कुछ लोग अब दूसरे को परेशान करने में सक्षम हो गये हैं।
बहरहाल इस तरह की अनाम या छद्मनाम टिप्पणियां करने का प्रचलन बढ़ रहा है पर दूसरे के नाम का दुरुपयोग कर ऐसे ब्लाग लेखक कोई हित नहीं कर रहे हैं। उनकी इस हरकत से होगा यह कि नये लेखकों को प्रोत्साहन देने कठिन हो जायेगा। अंततः इसके नतीजे उनको भी भोगने पड़ेंगे-क्योंकि जब हिंदी ब्लाग जगत इस तरह बदनाम होगा तो फिर नये लेखक नहीं जुड़ेंगे बल्कि पाठक भी कटने लगेंगे। जो अनाम या छद्म नाम से लिख रहे हैं वह भी कोई न कोई असली नाम से ब्लाग तो इस आशा में लिख ही रहे हैं कि कभी न कभी तो वह प्रसिद्ध होंगे पर अगर देश में नकारात्मक संदेश चला गया तो फिर उनकी यह आशा धरी की धरी रह जायेगी। अंत में यहां दोहरा देना ठीक है कि कि हमारे साथ तो सभी मित्रता निभाते आये हैं इसलिये उनसे करबद्ध प्रार्थना है कि वह इस बात को समझें। उनके इस कृत्य पर इस लेखक का मानना है कि यह अपराध नहीं बल्कि उनका बचपना है आशा है कि वह इसे समझकर इससे निहायत फूहड़ हरकत से परे रहेंगे। एक बात तय है कि हम सब आपस में ही हैं और संख्या में कम हैं इसलिये इधर उधर शिकायत करने की बजाय एक दूसरे को समझाकर या डांट कर साध लेते हैं पर यह संख्या बढ़ी और किसी के लिये यह असहनीय हुआ तो सभी जानते हैं कि फोन नंबर के माध्यम से कोई भी पकड़ा जा सकता है। इससे भी ज्यादा तो हिंदी ब्लाग जगत के बदनाम होने की आशंका है जिससे उन लोगों की भी मेहनत पानी में जायेगी जो अनाम टिप्पणियों से ब्लाग लेखकों के लिये तनाव पैदा कर रहे हैं-नये लेखकों को यहां लाने में मुश्किल होगी क्योंकि वैसे भी लोग अन्य प्रकार के आतंकों से डरे हुए हैं। ऐसे में सीधे इस तरह का आतंक झेलने का वह सोच भी नहीं सकते। इस लेखक का दावा है कि अपनी हरकत के बाद वह स्वयं भी बैचेनी अनुभव करते होंगे। हमारी तो स्पष्ट मान्यता है कि आप मजाक या गुस्से में भले ही टिप्पणी दो पर अनाम न रहो। बाकी किसी की मर्जी है जैसा करे।
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यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

इस ब्लाग/पत्रिका के पाठ पठन संख्या का आंकड़ा ५० हजार तक पहुँचा-आलेख


ब्लाग पत्रिका लेखक अपने उस पाठक का इंतजार कर रहा था जो वर्डप्रेस के शब्द-पत्रिका ब्लाग की पाठ पठन/पाठक संख्या पचास हजार की संख्या पार कराने वाला था। चाहे तो लेखक यह काम स्वयं भी कर सकता था। कौन देखने वाला था पर अपने साथ बेईमानी करना किसी भी मौलिक लेखक के लिये कठिन होता है। इसलिये पहले ही यह संपादकीय लिखना प्रारंभ कर दिया । इस लेखक का यह दूसरा ब्लाग है जो अभी अभी पचास हजार पाठ पठन/पाठक संख्या पार कर गया-प्रसंगवश यह वर्डप्रेस का ही ब्लाग है। पचास हजार की संख्या पार कराने वाला पाठक कोई जबलपुर से था।
वैसे अंतर्जाल पर कोई बात दावे से कहना कठिन है क्योंकि कई बार ब्लाग की पाठ पठन और पाठक संख्या अनेक स्थानों पर देखने से भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है। हो सकता है यह तकनीकी गड़बड़ी के कारण होता हो। आज सुबह इस ब्लाग पर 49982 पाठ पठन/पाठक संख्या का आंकड़ा दर्ज था। उसके हिसाब से अट्ठारह जुड़ने पर पचास हजार हो जाना चाहिऐ था। मगर स्टेटकाउंटर पर इतनी संख्या से एक अधिक होने पर भी इस ब्लाग का डेशबोर्ड 49999 दिखा रहा था। स्टेटकांउटर पर कई बार ऐसा होता है कि ब्लाग पर प्रकाशित त्वरित पाठ पर फोरमों से आई संख्या चार होती है पर हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले फोरमों पर वह संख्या आठ या दस दिखाई देती है। तब सवाल आता है कि इस तरह के काउंटर सही गणना नहीं करते या वह उनके हिसाब से कोई गणना आवास्तविक है जिसे दिखाने का प्रावधान उसमें नहीं है।
पचास हजार की संख्या पार कराने वाले जबलपुर के उस पाठक का धन्यवाद क्योंकि उसे शायद नहीं मालुम होगा कि वह एक ब्लाग की पाठ पठन/पाठक संख्या का पचास हजार के पार पहुंचा रहा है। ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर वर्डप्रेस की अपेक्षा नगण्य पाठ पठन/पाठक संख्या है पर उन पर लिखने का एक अलग ही मजा है।

इस लेखक के 22 ब्लाग में यह ब्लाग चौथे नंबर पर बना था पर हिंदी पत्रिका के बाद सफलता के क्रम में इसका नंबर दूसरा है और इससे पहले बने तीनों ब्लाग अभी बहुत पीछे है जिनमें दो ब्लाग अनंत शब्दयोग और चिंतन हैं और एक वर्डप्रेस का दीपकबापू कहिन है। इसको चुनौती देता एक अन्य ब्लाग ईपत्रिका इसके पीछे चला आ रहा है और हो सकता है कि वह आने वाले दिनों में सफलता के क्रम में पहला स्थान प्राप्त कर ले।
यहां गूगल पेज रैंक की निर्णय क्षमता पर भी सवाल उठाना पड़ रहा है। इस ब्लाग को वहां 3 का अंक प्राप्त है और इसको पीछे छोड़ने वाले ब्लाग शब्दलेख सारथी, हिंदी पत्रिका और शब्दलेख पत्रिका 4 अंकों के साथ इस पर बढ़त बनाये हुए हैं। हिंदी पत्रिका के मुकाबले गूगल पेज रैंक में इसका पिछड़ना पाठों और पाठ पठन/पाठक संख्या को देखते हुए समझा जा सकता है पर शब्दलेख सारथी और शब्दलेख पत्रिका के मुकाबले विचारणीय विषय है। उन दोनों ब्लाग पर न तो पाठ इतने हैं और न ही पाठक संख्या। कहने का तात्पर्य यह है कि यह सब बातें अजीब हैं-आप अंतर्जाल पर कितने भी जानकार हो जायें पर यह नहीं कह सकते कि पूरी तरह से समझ गये हैं।
संभव है कि गूगल पेज रैंक के साफ्टवेयर में कोई कमी नहीं हो पर इस ब्लाग को 3 की रैंक होने पर कुछ ऐसे आंकड़े हैं जो ऐसे प्रश्न उठाते हैं और शायद यही प्रश्न इस अंतर्जाल के लिये दिलचस्पी बढ़ाने का कारण भी हैं।
इस लेखक ने बुधवार को ही यह अनुमान लगाया था कि यह ब्लाग शनिवार दोपहर तक पचास हजार की पाठ पठन/पाठक संख्या पार करेगा क्योंकि शनिवार और रविवार को इस ब्लाग पर आवागमन अधिक होता है और बाकी दिन उसके मुकाबले आधा या उससे थोड़ा अधिक देखने को मिलता है। इसके कुछ ज्ञात कारण है जिनके बारे में दावे से लिखना कठिन है तो कुछ अज्ञात भी हो सकते हैं।

आत्ममुग्ध होकर अपने लिखे की तारीफ करना ठीक नहीं है पर इस ब्लाग की पाठ पठन/पाठक संख्या 50 हजार पार करने के आंकड़े में उन लोगों की जरूर दिलचस्पी होगी जो हिंदी ब्लाग जगत में एक लक्ष्य के साथ सक्रिय हैं। शायद उनके लिये इसमें कोई जानकारी हो। इस पर स्टेटकाउंटर अभी पंद्रह दिन पहले ही लगाया गया है क्योंकि उसे वर्डप्रेस पर लगाना नहीं आ रहा था। ब्लागस्पाट के ब्लाग जहां आसानी से से तकनीकी जानकारी उपलब्ध है वहां तो सभी सैटिंग आसानी से सीखी जा सकती है। फिर अनेक ब्लाग लेखक ब्लाग स्पाट की तकनीकी जानकारी लिखते रहते हैं मगर वर्डप्रेस को समझना इसलिये भी कठिन है क्योकि उसके बारे में लिखने और बताने वाले बहुत कम लिखते हैं। इस पर प्रतिदिन आने वाले पाठकों की संख्या साठ से पचहत्तर नियमित रूप से है पर पाठ पठन की संख्या कभी अधिक और कम होती रहती है। अभी हाल ही में एक ही दिन में 238 की पाठ पठन संख्या आठ अप्रैल 2009 को पार की। 351 पाठों से सजे इस ब्लाग के निरंतर आगे बढ़ने की संभावना है।

अभी एक सर्वे आया था जिससे पता चला कि करीब 95 प्रतिशत ब्लाग लेखक ब्लाग स्पाट और 15 प्रतिशत वर्डप्रेस पर लिखना पसंद करते हैं। इसका मतलब साफ है कि अगर आपका वर्डप्रेस का ब्लाग, हिंदी ब्लाग एक जगह दिखाने वाले फोरमों पर नहंी दिखता और अगर उस पर लिखते हैं तो अपने मित्रों से दूर हो जाते हैं। यही कारण है कि इस लेखक ने ब्लाग स्पाट और वर्डप्रेस के ब्लागों पर अलग अलग दृष्टिकोण अपनाया है। पहले पाठ लिखकर ब्लागस्पाट के ब्लाग पर प्रकाशित किया जाता है फिर उसे वर्डप्रेस के ब्लाग पर रखा जाता है। इस लेखक के ब्लाग स्पाट के सारे ब्लाग उन फोरमों पर रहते हैं और ब्लाग लेखक मित्रों से संपर्क का वही जरिया भी है। एसा नहीं है कि ब्लागस्पाट के ब्लाग बेकार है-कम से कम गूगल पेज रैंक में उनकी स्थिति देखकर तो यही लगता है कि उनकी अपनी उपयोगिता है। इस लेखक का शब्दलेख सारथी ब्लाग स्पाट पर ही है जिसे 4 का अंक प्राप्त है। इस लेखक के कम से दस ब्लाग ऐसे हैं जिनको गूगल पेज रैंक में तीन की वरीयता प्राप्त हैं इसका मतलब यह है कि वह इस ब्लाग की अपेक्षा कम पाठ और पाठ पठन/पाठक संख्या होने के बावजूद इसे गूगल पेज रैंक में तीन का अंक प्राप्त कर उसे बराबरी की चुनौती दे रहे हैं। बाकी अंतर्जाल पर जो पाठ पठन/पाठक संख्या में कितना भ्रम है और कितना सच यह तो कोई विशेषज्ञ ही बता सकता है। इस पर मित्र ब्लाग लेखकों और पाठकों द्वारा इस लेखक को निरंतर प्रोत्साहन देने के लिये हार्दिक आभार प्रदर्शन इस विश्वास के साथ कि वह आगे भी अपना समर्थन जारी रखेंगे।
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लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

गंगा और यमुना नदियों की तरह होता है हिन्दी भाषा का दोहन-आलेख


अंतर्जाल पर हिंदी में सक्रिय कई ऐसे ब्लाग लेखक हैं जिन्हें लिखते हुए छह साल हो गये हैं। उन लोगों की प्रशंसा करना चाहिये कि उन्होंने अपने प्रयासों से हिंदी ब्लाग जगत को एक दिशा देने के लिये बहुत बड़ा काम किया है। इन ब्लाग लेखकों में कई हिंदी भाषा के विशारद हैं और उनकी विद्वता किसी को भी चिढ़ा सकती है। इसके बावजूद यह भी एक तथ्य है कि उनमें अनेक प्रकार के मतभेद हैं और इसी कारण होता यह है कि आज एक बात कह रहे हैं कल दूसरी बात कहने लगते हैं तब उनसे सीखने वाले ब्लाग लेखकों में मतिभ्रम हो जाता है।

दरअसल समस्या यह नहीं है कि हिंदी में लिखने वाले नहीं है या इच्छुक लोगों की कमी है। कुछ पुराने भावुक ब्लाग लेखक पहले विकिपीडिया और अब नाॅल पर लिखने के लिये अपीलें कर रहे हैं। उनकी अपीलों के कारण कारण कुछ ब्लाग लेखक कभी जिज्ञासावश तो कभी उत्सुकतावश वहां अपनी रचनायें और पाठ डाल देते हैं। इस लेखक ने भी कुछ पाठ इन पर रखे हैं। मगर कई ब्लाग लेखक विकिपीडिया और नाॅल पर लिखने के लिये की गयी अपीलों पर प्रतिकूल प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। ऐसे में बहस की दिशा समझ में नहीं आती। ऐसी ही एक बहस एक सुझाव आया है कि हिंदी के लिये सर्वर बनाया जाये। एक तरफ ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो अपने हिंदी प्रेम की वजह से विकिपीडिया में योगदान देते दूसरों से ऐसा करने का आग्रह करते हैं पर कुछ लेखक यह कहकर विरोध करते हैं कि विकिपीडिया और नाल विदेशी सर्वरों पर आधारित हैं और वह नियम बदलकर कभी हिंदी लेखकों का लिखा जब्त कर सकते हैं। समर्थक ब्लाग लेखक भी यह तर्क देते हैं कि अंतर्जाल पर लिखी गयी सामग्री की तो कोई भी नकल कर सकता है तो फिर विकिपीडिया के लिये लिखने में क्या बुराई है?
इस बहस से अलग विषय है हिंदी और देशी भाषाओं के सर्वर की। सच बात तो यह है कि हमारा देश न केवल अपने यहां बल्कि विदेशों के प्रचार माध्यमों मेंं भी अपना पैसा लगा रहा है। हिंदी के लिखने पढ़ने मेंं गूगल के योगदान पर अधिक क्या लिखना? उसके टूलों के कारण ही यहां हिंदी लिखी जा रही है। कुछ मुददे ऐसे हैं जिन पर बहस की गुंजायश नहीं है। जिस तरह भारत के पैसे ेसे विश्व में क्रिकेट चल रहा है वैसे ही अन्य प्रचार माध्यमों को भी इससे बहुत सारी सहायता मिल रही है। भारतीय केवल अपने देश में नहीं है बल्कि बाहर है। यही स्थिति पैसे की भी है। भारतीयों का पैसा कितना बाहर लगता है कोई नहीं जानता? अनेक भारतीय कंपनियां विदेशों में सक्रिय हैं और उनमें आम भारतीय निवेश करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत एक बहुत बड़ी आर्थिक ताकत है पर उसका उपयोग करने के लिये कुशल प्रबंधन का अभाव है और अंतर्जाल पर हिंदी लिखने के मामले में पिछड़ना इसी बुराई का एक हिस्सा भर है। केवल धन में ही नहीं तकनीकी दृष्टि से भी भारत कितना सक्षम है इस पर विस्तार से लिखना सूरज को दिया दिखाने के बराबर है। फिर भी आखिर ऐसा क्या है कि हमारे पास हिंदी और देशी भाषाओं का सर्वर नहीं है।

प्रसंगवश याद आया। जब इंटरनेट शुरु हुआ था तब याहू के बारे में यह कहा गया कि उसकी स्थापना एक पुराने भारतीय अभिनेता ने की है। अनेक पाठकों को यह पता ही नहीं होगा कि यह भी एक विदेश में स्थित कंपनी ही है जिसका किसी भारतीय अभिनेता से संपर्क नहीं है-अंतर्जाल पर ढाई वर्ष से सक्रिय रहने पर इस ब्लाग लेखक को भी यही आभास बहुत समय तक रहा। याहू नाम का प्रचार कुछ इस तरह का है कि लोग आज भी इसे देशी समझते हैं और आम प्रयोक्ता अपना इमेल उसी पर ही बनाता है। इस लेखक ने भी गूगल पर तब ईमेल बनाया जब ब्लागस्पाट के ब्लाग के लिये उसकी आवश्यकता हुई। अंतर्जाल पर हिंदी के लिये समर्पित ब्लाग लेखक विकिपीडिया और नाॅल के लिये लिखने की अपील करते हैं इस पर आपत्ति करना तो ठीक नहीं है पर इसके प्रत्युत्तर में कुछ लोग बारबार यह सवाल उठाते हैं कि आखिर इतने सारी धनी और तकनीशियन होते हुए भी हिंदी या देशी भाषाओं का लेखन विदेशियों के सहारे क्यों हैं? तय बात है कि यहां के धनपतियों में आत्ममुग्धता की स्थिति है। यहां का धनपति विनिवेश करते ही पैसा कमाना चाहता है जबकि विदेशी विनिवेश योजना के साथ करते हैं और उनमें अपने देश और भाषा के लगाव भी अनुकरणीय होता है। यहां के धनपति क्रिकेट,फिल्म और टीवी चैनलों में पैसा लगा रहे हैं ताकि तत्काल पैसा कमाया जा सके। टीवी चैनलों की हालत यह है कि किस अभिनेता ने रात को किसी अभिनेत्री के कान में क्या कहा? इसे प्रमुख खबर बनाते हैं। देश में पैसा कमाने वाले बहुत हैं पर अच्छे प्रबंधक हैं यह कहना गलत होगा। ऐसे धनपति चाहे अपने फोटो और बयान कितनी बार ही अखबारों या टीवी चैनलों पर दिखा लें पर वह सेठ नहीं है। सेठ वह होता है जो अपने धन से समाज,भाषा और सामूहिक विकास के लिये धन देता है या प्रायोजन करता है। इस देश के धनपतियों और धार्मिक ठेकेदारों का उद्देश्य केवल मौजूद साधनों का दोहन करना होता है निर्माण नहीं ।

इसका सबसे अच्छा उदाहरण है गंगा और यमुना का प्रदूषण। आप देखिये इन दोनों पवित्र नदियों के किनारे अनेक धार्मिक नगर हैं और वहां अनेक प्रकार के होटल और आश्रम हैं। अनेक धनपति समय समय पर वहां अपनी श्रद्धा दिखाने पहुंचते हैं तो अनेक साधु संतों ने वहां आश्रम बना लिये। मगर गंगा और यमुना दोनों ही प्रदूषित होती गयीं। क्या आपने सुना है कि किसी धनपति या प्रसिद्ध साधु ने इसके लिये कोई आंदोलन किया हो। कहने को बातें सभी करते हैं पर ठोस प्रयास किसी ने नहीं किया। समाज के शीर्षस्थ नेतृत्व का यह नकारापन जग जाहिर है। गंगा यमुना की संस्कृति के नारे लगते रहे पर वह दोनों मैली होती रहीं।

समाज और भाषा के शीर्षस्थ लोगों के नकारापन के कारण ही अनेक ब्लाग लेखक अपने हिंदी समर्पण की भावना के वशीभूत होकर ही विकिपीडिया और नाल में हिंदी भाषा के विकास के लिये लिखने की अपील करते हैं। यह अपील वह ब्लाग लेखकों से इसलिये करते हैं क्योंंकि वह उनको पढ़ते हैं पर हिंंदी सर्वर की बात करें तो धनपतियों और भाषा के ठेकेदारों को कहां इतना समय है कि वह इसके लिये सोचें। क्रिकेट,फिल्म और टीवी चैनलों पर उनके लिये इतना पैसा फैला है कि वह उनके दोनों हाथों से समेटा ही नहीं जाता। एक आम हिंदी भाषी ब्लाग लेखक को अंतर्जाल पर हिंदी लिखना अपना युद्ध लगता है जिसे सभी लड़ रहे हैं। फिर विकिपीडिया और नाल की बात ही क्या? ब्लाग स्पाठ और वर्डप्रेस के ब्लाग भी विदेशियों की ही देन है। कई बार ऐसा लगता है कि कितना ही अच्छा होता कि देश के धनपतियों और तकनीशियनों के समन्वय से ऐसे ही साफ्टवेयरों का निर्माण हुआ होता। विकिपीडिया और नाॅल की तरह कोई अपने देश के लोगों का बनाया मंच होता। वैसे नाल का प्रचार इतना है नहीं और विकिपीडिया पर अब हिंदी के लोगों की निर्भरता कम ही होती जा रही है। भारतीय विषयों पर अनेक समर्पित ब्लाग और वेबसाईट लेखकों ने भारतीय विषयों को अंतर्जाल पर चढ़ा दिया है। वैसे भी इस देश में लोग सर्च इंजिनों में शब्द डालकर ही अपने विषय ढूंढते हैं और कई जगह विकिपीडिया से पहले उनके ब्लाग या वेबसाईटें आ जाती हैं। फिर वर्डप्रेस,नारद,ब्लागवाणी, चिट्ठाजगत, हिंदी ब्लाग जगत और वेबदुनियां की भी भूमिका सर्च इंजिनों में बढ़ती दिख रही है। मुश्किल यही है कि पाठकों की कमी और धनार्जन न होना लेखक को प्रोेत्साहित नहीं कर पाता। ऐसे में शौकिया लेखक ही लिखते हैं। जब पाठकों के साथ लेखकों की संख्या भी बढ़ेगी तो नाल और विकिपीडिया पर लिखने वालों की संख्या भी बढ़ेगी।
निष्कर्ष यह है कि अंतर्जाल पर हिंदी स्थापित करने के लिये एक समग्र आंदोलन की आवश्यकता है जिसमें देश के धनपति,तकनीशियनों और लेखकों के साथ अन्य प्रचार माध्यमों के समन्वित प्रयास होने चाहिये। उससे पाठक संख्या निश्चित रूप से बढ़ेगी। हालांकि यह केवल कल्पना ही है। हां, जब हिंदी के पाठक बढ़ने लगे और धनपतियों को लगा कि उससे तत्काल-दीर्घकाल में नहीं-लाभ उठाया जा सकता है तो एक क्या दस हिंदी के सर्वर बन जायेंगे। शायद यह दुनियां की इकलौती भाषा है जो सभी को कमाकर देती है पर स्वयं गरीब बनी रहती है। ऐसा नहीं है कि हिंदी से कोई कमा नहीं रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो गूगल हिंदी में लिखने वाले इतने बेहतर टूल नहीं लाता। यह क्रिकेट,फिल्म और टीवी चैनल हिंदी वालों से खूब कमा रहे हैं पर अपनी बढ़ती दौलत उन्हें अंध बना देती है और मातृभाषा उनको गरीब दिखाई देती है। कई तो कह भी देते हैं कि ‘आजकल हिंदी से काम नहीं चलता।’
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

हिन्दी ब्लॉग दे सकते हैं प्रचार माध्यमों को चुनौती-आलेख


उस दिन चिट्ठकार चर्चा का नियमित ईमेल पढ़ा-यह ईमेल इसके सदस्यों को नियमित भेजा जाता है-जिसमें तमिल बच्चों द्वारा हिंदी सीखने की बात कही गयी थी। यह कोई नई खबर नहीं है क्योंकि अब कई ऐसे तमिल भाषी है जो हिंदी में लिखते और पढ़ते हैं-शायद इस ईमेल का आशय यह हो सकता है कि अब अधिक दिलचस्पी से तमिल भाषी बच्चे इसे पढ़ने लगें हों। इस प्रसंग का उल्लेख इसलिये करना ठीक लगा क्योंकि ईमेल पढ़ते हुए ही एक घटना इस लेखक के जेहन में आयी थी और वह कोई अधिक पुरानी नहीं थी। उस पर लिखने का दिल था पर इस ईमेल को देखकर यह प्रबल विचार उठा कि उस पर लिखा जाये।

एक मित्र सज्जन ने कुछ इस तरह एक घटना सुनाई। एक महिला के दो लड़के हैं एक अमेरिका में दूसरा मध्यप्रदेश में रहता है। मध्यप्रदेश में रहने वाला लड़का अपनी मां को अमेरिका में छोटे बेटे की तरफ रवाना करने के लिये चेन्नई गया। उसने विमानतल से अपनी मां को वायुयान में बिठाकर रवाना किया पर उसे अपनी मां को लेकर एक चिंता थी जो शायद नई थी। इससे पहले भी वह कई बार अमेरिका अकेले जा चुकी है पर इस बार कोई अन्य साथ जाने वाला यात्री नहीं था दूसरा उस महिला को हीथ्रो हवाई अड्डे पर टर्मिनल बदलना था जिसमें भाषा आड़े आने वाली थी। तमिल भाषी महिला को अंग्रेजी कम ही आती है पर हिंदी का ठीकठाक ज्ञान है।
उस महिला के बड़े पुत्र को इस टर्मिनल बदलने के दौरान ही मां के लिये चिंतायें थीं। इन टर्मिनलों पर यात्रियों की सहायता के लिये बहुभाषी होते हैं पर समस्या उनसे संपर्क की थी।

बहरहाल वह भद्र महिला हीथ्रो हवाई अड्डे पर उतरी कोई दुभाषिया ढूंढने लगी क्योंकि उसको दूसरे टर्मिलन पर जाने के लिये बस का पता पूछना था। एक दुभाषिया उससे मिला तो उसने उससे कहा कि‘आधे घंटे में आता हूंं।’
महिला बेबस खड़ी रह गयी। फिर उसने वहां खड़ी एक कर्मचारी से टूटी फूटी अंग्रेजी में उस बस का पता पूछा तो उस लड़की ने बता दिया। वह उस बस में चढ़कर दूसरे टर्मिनल पर पहुंची। वहां फिर वह कोई दुभाषिया ढूंढने लगी। वहां तमाम कर्मचारी थे जो चेहरे से ही विभिन्न देशों के लग रहे थे। वहां एक दुभाषिया उस महिला के पास आया और अंग्रेजी में पूछा कि ‘क्या आप भारत से आईं हैं।’
महिला ने कहा-‘हां!’
वह दुभाषिया उस समय औपचारिक रूप से पेश आ रहा था। फिर उसने महिला से हिंदी में पूछा-क्या आपको हिंदी आती है।’
उस भद्र की महिला की बाछें खिल उठीं और बोली-हां, आती है।’
वह दुभाषिया औपचारिकता की बजाय आत्मीयता से बोला-आपने अपने कागजों में व्हील चेयर की मांग की है। मैं अभी मंगवाता हूं। अच्छा आपने शाकाहारी भोजन की मांग की है यह बात मैं वायुयान के कर्मचारियों को बता दूंगा। अभी आप आराम से उधर बैठ जाईये। आप बेफिक्र होकर अपनी यात्रा जारी रखिये।’
महिला जब तक वहां से रवाना नहीं हुई तब तक उसकी वहां अनेक कर्मचारियों से हिंदी में बातचीत हुई। वह बहुत खुश थी। निर्धारित समय पर वायुयान से वह अमेरिका से रवाना हो गयी। वहां पहुंचकर उसने अपने बड़े बेटे को अपनी पूरी यात्रा का वृतांत फोन पर सुनाया और कहा-‘जब उस लड़के ने हिंदी मेेंं बात की तो मुझे बहुत अच्छा लगा। उससे पहले तो बहुत अकेलापन लग रहा था। उसके मूंह से निकल हिंदी शब्द अमृत की तरह लगे थे।’
हिंदी के विकास को लेकर निराशाजनक बातें करने वालों का निहितार्थ क्या होता है यह समझ में नहीं आता। जहां तक हिंदी के संपर्क भाषा का प्रश्न है तो वह निरंतर बढ़ रही है-यहां अपवादों की चर्चा करना व्यर्थ होगा। सच बात तो यह है कि हिंदी अब भारत में उन क्षेत्रों में पहुंच रही है जहां उसे पहले जाना तक नहीं जाता था। हम जब हिंदी के सम्मान की बात करते हैं तो सवाल यह उठता है कि हम उसे किस रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं? क्या यह चाहते हैं कि सारा विश्व ही हिंदी बोलने लगे। यह अतिश्योक्ति होगी। फिर हिंदी का आधुनिक स्वरूप बरकरार रहना चाहिये, अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रयोग इसमें नियमित रूप से नहीं होना चाहिये, और अंग्रेजी की क्रियायें स्वीकार्य नहीं है जैसी बातों पर सहमति होने के बावजूद रूढि़वादिता को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
आजकल अंतर्जाल की हिंदी के वेबसाईटों और ब्लाग को भविष्य में एक समानांतर प्रचार माध्यम के रूप में स्थापित होने की बात कहीं जा रही है पर इधर यह भी दिखाई दे रहा है कि हमारे कुछ ब्लाग लेखक मित्र-जिनका चिंतन और हिंदी ज्ञान वाकई गजब का है-ऐसी रूढि़वादी बातें करते हैं कि लगता है कि उनको समझाना कठिन है। पिछले दो वर्षों से मेरे संपर्क में रहे कुछ मित्र हिंदी लिखने वाले टूलों से जुड़े हैं और सच बात तो यह है कि इस लेखक को आत्मविश्वास से हिंदी में लिखने का आत्मविश्वास भी उन्हीं से मिला है पर उनकी कुछ बातें हैरान कर देती हैं।

यहां विकिपीडिया के हिंदी टूल की बात करना जरूरी रहेगा जो मेरे डेस्कटाप पर है पर उसका उपयोग करने मेंे मुझे असहजता लगती है। यह तो गनीमत है कि गूगल का इंडिक टूल और फिर बाद में कृतिदेव का यूनिकोड टूल मिल गया जो अंतर्जाल पर नियमित लिखना संभव हो पाया। हिंदी के विकिपीडिया का करीब पंद्रह दिन तक उपयोग किया पर बाद में जब उसका संशोधित टूल उपयोग किया तो उससे असहजता लगने लगी। एक मित्र ने कुछ गजब की बातें लिखीं जो हिंदी टाईप राइटर को लेकर थीं
उनकार कहना था कि पता नहीं किसने यह टाईपराईटर बनाया जिसमे ‘ ि’ की मात्र पहले लगती है जबकि इसे बाद में टाईप करना चाहिये क्योंकि इसे पढ़ा भी बाद में जाता है। तक यह था कि हिंदी जैसी बोली जाती है वैसे ही लिखी जाती है तो वैसी टाईप भी हो।
इसके बाद विकिपीडिया में यह परिवर्तन दिखाई दिया। इससे हुआ यह कि उस टूल पर टाईप करते हुए अपना लिखा ही पढ़ने मेें नहीं आता। इंडिक टूल से किसी शब्द के साथ आई लगाने से भी दी पी ही हो जाता है पर अगर इस विचार से विकिपीडिया पर टाईप किया जाये तो दि पि हि नि रहेगा। चलिये यह भी मान लें पर जब ‘’ि’ की मात्रा जब ल ि प ि जैसी दिखती हैं तो समझ में नहीं आता। पहले विकिपीडिया के आफलाईन टूल में हिंदी में ज्ञ शब्द आसानी से बन जाता था पर बाद में वह भी संभव नहीं रहा। हालत यह है कि कभी जल्दी में टिप्पणी लिखने लायक भी यह टूल नहीं रहा। यह कोई शिकायत नहीं है बल्कि कहना यही है कि अधिक रूढ़ता से आगे बढ़ेंगे तो शायद हम हिंदी के साथ न्याय नहीं कर पायेंगे।

अंतर्जाल पर दिखता सब कुछ है पर वैसा ही है जैसा दिख रहा है कहना कठिन है। गूगल के अनुवाद टूल से हिंदी के पाठ अन्य भाषाओं में पढ़े जा रहे हैं यह तो दिख रहा है पर वह वाकई उसी भाषा के लोग पढ़ रहे हैं जिसमें पढ़ा गया यह कहना कठिन है।
आखिर हिंदी को लेकर आशावादी क्यों होना चाहिये? दरअसल हिंदी को लेकर जब हम बात करते हैं तो एक दिलचस्प बात सामने आती है कि हमारे देश की पहचान जिन रचनाओं से है वह मूल रूप से आधुनिक हिंदी में नहीं हैंं। अन्य की बात तो छोडि़ये हिंदी भाषी लोग जो अपनी पहचान वाली रचनायें पढ़ते हैं वह मूल रूप से संस्कृत या क्षेत्रीय भाषाओं में है। आधुनिक हिंदी के शुरुआती दौर में मौलिक रूप से अच्छा लिखा गया पर बाद में तात्कालिक रूप से सम्मान और धन पाने के लिये अनेक समसामयिक विषयों पर लिखकर वाहवाही बटोरने में लग गये। इसलिये हमेशा ही प्रासंगिक रहने वाले विषयों पर बहुत कम ही मौलिक रूप से लिखा गया। यही कारण है कि हिंदी भाषा साहित्य समृद्ध होते हुए भी अप्रासंगिक होता चला जाता है। हास्य कवितायें और व्यंग्य लिखने वाले बहुत मिल जायेंगे पर उनका व्यंग्य सन् 2040 में पढ़ कर समझा जाये यह जरूरी नहीं है-यह इसलिये लिखा गया है क्योंकि इस लेखक के एक मित्र ब्लाग ने उसी सन् में जीवन पर्यंत हिंदी सम्मान देने की बात लिखी है। बहरहाल यह हालत हम आज के संदर्भ में लिख रहे हैं और वह भी अंतर्जाल से पूर्व के हिंदी साहित्य की-जो कि आर्थिक, सामाजिक और वैचारिक दबावों से कभी उबर ही नहीं पाया।
अंतर्जाल पर भी इसे दबाव में रखने के प्रयास तो होंगे पर जिन लोगों को उस दबाव से लड़ने की ताकत है और जो मौलिक और स्वतंत्र रूप से लिखने के अभ्यस्त होंगे वह अपना अस्तित्व स्वयं ही बनायेंगे। जब वेबसाइटों या ब्लाग की बात करते हैं तो वह केवल हिंदी में लिखने तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि रिपोर्ताज, समाचारों और घटनाओंं के सीधे प्रसारण की संभावना भी वेबसाईटों पर हो सकती है। जैसे हम आजकल समाचार या साहित्यक पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों का स्वरूप देखते हैं ऐसा यहां होने की संभावना नहीं है। एक अखबार अनेक समाचारों और आलेखों के साथ पाठक के पास पहुंचता है पर ब्लाग या वेबसाईटें अगर लोकप्रिय हुई तो उन्हें जरूरी नहीं है कि वह सभी एकदम प्रस्तुत करें। दिन में पचास से पांच सों तक वह अपने पाठ जारी कर सकती हैं। कई ब्लाग बनाकर वह उसे चलायमान रख सकती हैं। ऐसे ही साहित्यक पत्रिकाओं के साथ भी है। यह जरूरी नहीं कि सप्ताह या दिन में एक ही बार सब प्रस्तुत किया जाये। प्रतिदिन अनेक रचनायें एकएक कर प्रस्तुत की जा सकती हैं। यही वीडियो और आडियो प्रसारणों के साथ भी हो सकता है।

कहने का तात्पर्य यह है कि अंतर्जाल पर हिंदी एक नये स्वरूप के साथ सामने आयेगी। हिंदी का बाजार बहुत बड़ा है तो दूसरा सच यह भी है कि हिंदी के अब सार्थक लेखन की अपेक्षायें बढ़ रही है पर हिंदी को दोहन करने वाला बाजार नये और मौलिक लेखकोंं को संरक्षण देने के लिये उत्सुक नहीं है। वह चाहता है कि उसे लिखने वाले गुलाम मिलें पर हिंदी को अंतर्जाल पर ले जाने का एक ही उपाय है कि मौलिक और स्वतंत्र रूप से लिखा जाये तभी नवीनता आयेगी। अभी अंतर्जाल पर हिंदी में लिखने की विधा शेैशवकाल में हैं पर जैसे जैसे विस्तार रूप लेगी नये परिवर्तन आयेंगे। अभी तो यह भी एक ही समस्या है कि गूगल के इंडिक और कृतिदेव यूनिकोड टूल के अलावा कोई अन्य प्रमाणिक और सरल टूल ही लिखने के लिये उपलब्ध नहीं है। गूगल के इंडिक टूल और कृतिदेव यूनिकोड टूल का भी इतना प्रचार अभी लोगों में नहीं है। जब इस बारे में पांच छह वर्ष पहले से इंटरनेट पर काम करने वाले लोगों को बताया जाता है तो हैरान रह जाते हैं-उनको यह जानकारी नवीनतम लगती है। एक ब्लाग लेखक ने लिखा था कि हिंदी नयी भाषा है इसलिये उसका विस्तार प्राकृतिक कारणों से तय है। यह सच भी लगता है अगर इस बात को मान लिया जाये कि हिंदी में सार्थक और दीर्घाकलीन तक प्रभावी लेखन
भविष्य में अंतर्जाल पर होगा।
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यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की सिंधु केसरी-पत्रिका ’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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