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जिसने ढूंढें हैं सहारे


आकाश में चमकते सितारे भी
नहीं दूर कर पाते दिल का अंधियारा
जब होता है वह किसी गम का मारा
चन्द्रमा भी शीतल नहीं कर पाता
जब अपनों में भी वह गैरों जैसे
अहसास की आग में जल जाता
सूर्य की गर्मी भी उसमें ताकत
नहीं पैदा कर पाती
जब आदमी अपने जज्बात से हार जाता
कोई नहीं देता यहाँ मांगने पर सहारा

इसलिए डटे रहो अपनी नीयत पर
चलते रहो अपनी ईमान की राह पर
इन रास्तों की शकल तो कदम कदम पर
बदलती रहेगी
कहीं होगी सपाट तो कहीं पथरीली होगी
अपने पाँव पर चलते जाओ
जीतता वही है जो उधार की बैसाखियाँ नहीं माँगता
जिसने ढूढे हैं सहारे
वह हमेशा ही इस जंग में हारा
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जैसे कोई डाक्टर पीछे आया- हिंदी हास्य कविता (hasya kavita)


एक आदमी ने सुबह-सुबह
दौड़ लगाने का कार्यक्रम बनाया
और अगले दिन ही घर से बाहर आया
उसने अपने घर से ही
दौड़ लगाना शुरू की
आसपास के लड़के बडे हैरान हुए
वह भी उनके पीछे भागे
और भागने का कारण पूछा
तो वह बोला
‘मैने कल टीवी पर सुना
मोटापा बहुत खतरनाक है
कई बिमारियों का बाप है
आजकल अस्पताल और डाक्टरों के हाल
देखकर डर लगता है
जाओ इलाज कराने और
लाश बनकर लौटो
इसलिये मैने दौड़ने का मन बनाया’

लड़कों ने हैरान होकर पूछा
‘पर आप इस उम्र में दौडैंगे कैसे
आपकी हालत देखकर हमें डर समाया’
उसने जवाब दिया
‘जब मेरी उम्र पर आओगे तो सब समझ जाओगे
लोग भगवान् का ध्यान करते हुए
योग साधना करते हैं
मैं यही ध्यान कर दौड़ता हूँ कि
जैसे कोई मुझे डाक्टर पकड़ने आया
अपनी स्पीड बढाता हूँ ताकि
उसकी न पडे मुझे पर छाया

फ्लाप से जोड़ दो फ्लाप


क्रिकेट फ्लॉप
फिल्म फ्लॉप
सपनों के सौदागर कर रहे विलाप
क्रिकेट में खेलना ही पर्याप्त नहीं
गेंद और बल्ले की जंग में
अब मनोरंजन व्याप्त नहीं
खिलाडियों को फिल्म के अभिनेताओं की तरह
रेम्प पर नचवाओ
खिलाडियों को नाचना भी आता  है
लोगों को बताओ
उन्हें लगातार बह्काओ
नहीं आयेगा पीछा खर्च करने अपने आप

खिलाडियों का मैदान में खेलना
अब पर्याप्त नहीं है
जब तक दर्शकों में हीरो की
छबि व्याप्त नहीं है
इसलिए मैदान में लगाओ
किसी हीरो की छाप
फ्लाप होने की तरह बढ़ रहे हीरो
क्रिकेट भी देखते हैं
खिलाडियों को भी रंगीन चश्में से देखते हैं
उनकी फिल्में भी देखते रहो
क्रिकेट को अभी भी सहते रहो
हिट बनाने का यह नया फार्मूला है
फ्लाप से जोड़  दो फ्लाप

यहाँ बदलते हैं रिश्ते


जब काम था वह रोज
हमारे गरीबखाने पर आये
अब उन्हें हमें याद करने की
फुरसत भी नहीं मिलती
गुजरे पलों की उन्हें कौन याद दिलाये
हम डरते हैं कि
कहीं याद दिलाने पर
उन्हें अपने कमजोर पल न सताने लगें
वह यह सोचकर मिलने से
बहुत घबडाते हैं कि
हम उन्हें अपनी पुरानी असलियत का
कहीं आइना न दिखाने लगें
दूरियां है कि बढती जाएँ
टूटे-बिखरे रिश्तों को फिर जोड़ना
इतना आसान नहीं जितना लगता है
बात पहले यहीं अटकती हैं कि
आगे पहले कब और क्यों आये
अच्छा है मतलब से बने
रिश्तों को भूल ही जाएँ
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इस रंग बदलती दुनिया मैं
बदल जाते हैं रिश्ते भी
अपनों से चलते हैं
संबंध बरसों तक
पराये से लगते हैं वह भी कभी
प्रेम से जो साथ चले
वह अपना है
जहाँ कम होते लगें
छोड़ तो उन्हें तभी

यारी को बेगार बना दिया


बंद तिजोरियों को सोने और रुपयों की
चमक तो मिलती जा रही है
पर धरती की हरियाली
मिटती जा रही है
अंधेरी तिजोरी को चमकाते हुए
इंसान को अंधा बना दिया
प्यार को व्यापार
और यारी को बेगार बना दिया
हर रिश्ते की कीमत
पैसे में आंकी जा रही है
अंधे होकर पकडा है पत्थर
उसे हाथी बताते
गरीब को बदनसीब और
और छोटे को अजीब बताते
दौलत से ऐसी दोस्ती कर ली है कि
इस बात की परवाह नहीं
इंसान के बीच दुश्मनी बढ़ती जा रही है
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यहाँ बोलने के लिए सब हैं आतुर
अपने बारे में सच सुनने से भयातुर
चारों और बोले जा रहे शब्द
बस बोलने के लिए
सुनता कोई नजर नहीं आता
अपनी भक्ति के गीत हर कोई गाता
जिन्दगी जीने का तरीका कोई नहीं बताता
गुरू सिखाता दूसरे को गुर
खुद सूरज उगने के बाद उठते
और बोलना शुरू करें ऐसे जैसे दादुर (मेंढक)
सुबह से शाम तक ढूढ़ते श्रोता
सच सुनने से रहते भयातुर