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निर्मल बाबा के समागमों के प्रचार का डर किसको था-हिन्दी लेख (hindi lekh and article on nirmal baba sawagam)


            निर्मल बाबा का प्रचार कम हो गया है। उनके समागमों का तूफानी गति से चलने वाला विज्ञापन अब अनेक चैनलों में दिखाई नहीं देता है। उनके बारे में कहा गया कि वह समाज में अंधविश्वास फैला रहे हैं। लोगों को उनकी समस्याओं के निराकरण के लिये आईस्क्रीम, रसगुल्ले और समौसा खाने के इलाज बता कर पैसा वसूल कर रहे हैं। सच बात तो यह है कि निर्मल बाबा का प्रचार केवल उनके विज्ञापनों के कारण हो रहा था जिसके लिये वह सभी हिन्दी समाचार चैनलों को भारी भुगतान कर रहे थे। मतलब यह कि उनका प्रचार स्वप्रायोजित होने के साथ अतिरेक से परिपूर्ण था। अचानक ही हिन्दी समाचार चैनलों को लगा कि निर्मल बाबा तो अंधविश्वास फैला रहे हैं तो उन्होंने उनके विरुद्ध प्रचार शुरु किया। लंबे समय तक यह चैनल विरोधाभास में सांस लेते रहे। एक तरफ निर्मल बाबा का विज्ञापन चल रहा था तो दूसरी तरफ चैनल वाले अपना समय खर्च कर उस पर बहस कर रहे थे-यह अलग बात है कि उस समय भी निर्मल बाबा के खलनायक साबित करते हुए वह दूसरे विज्ञापन चला कर पैसा वसूल कर रहे थे। निर्मल बाबा को अंधविश्वास का प्रवर्तक बताकर इन चैनलों ने अपने ही प्रायोजित बुद्धिजीवियों से बहस कराकर व्यवसायिक सिद्धांतों के प्रतिकूल जाने का साहस करते हुए उनमें भी अतिरेक से पूर्ण सामग्री प्रस्तुत की।

              बहरहाल निर्मल बाबा का जलवा कम हो गया है और यह सब उन हिन्दी समाचार चैनलों की वजह से ही हुआ है जिन्होंने विज्ञापन लेते समय केवल अपना लाभ देखा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन टीवी चैनलों ने वास्तव में क्या कोई समाज के प्रति भक्ति दिखाते हुए निर्मल बाबा के विरुद्ध दुष्प्रचार कर कोई साहस का काम किया है या फिर निर्मल बाबा के प्रचार से मिलने वाले धन से अधिक कहीं उनकी हानि हो रही थी जिससे वह घबड़ा गये थे। इसी वजह से समाज को जाग्रत करने के लिये कथित रूप से अभियान छेड़ दिया था। 

           निर्मल बाबा पिछले कई महीनों से छाये हुए थे। हमने देखा कि उनकी चर्चा सार्वजनिक स्थानों पर होने लगी थी। स्थिति यह थी कि देश के ज्वलंत राजनीतिक विषयों से अधिक लोग निर्मल बाबा की चर्चा करने लगे थे। महंगाई और मिलावट से परेशान समाज के लिये निर्मल बाबा का समागम एक मन बहलाने वाला साधन बन गया था। देखने वालों की संख्या बहुत थी पर इसका मतलब यह कतई नहीं लिया जाना चाहिए कि सभी उनके शिष्य बन गये थे। फिर हम यह भी देख रहे थे महंगाई, बेरोजगारी, दहेजप्रथा तथा पारिवारिक वातावरण की प्रतिकूलता से परेशान लोगों की संख्या समाज में गुणात्मक रूप से बढ़ी है जिससे लोग राहत पाने के लिये इधर उधर ताक रहे थे। ऐसे में हर चैनल पर छाये हुए निर्मल बाबा की तरफ अगर एक बहुत दर्शक वर्ग आकर्षित हुआ तो उसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं थी। इससे हमारे देश के बुद्धिजीवियों को कोई परेशानी भी नहीं थी मगर समस्या यह थी कि टीवी का एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग केवल निर्मलबाबा के समसमों की तरफ खिंच गया था। उस दौरान आईपीएल जैसी क्रिकेट प्रतियोगिता तथा टीवी के यस बॉस कार्यक्रम की चर्चा सार्वजनिक स्थानों से गायब हो गयी थी। निर्मल बाबा ने चैनलों से अपने समागमों के विज्ञापन का समय भी इस तरह लिया था कि वह एक न एक चैनल पर आते ही थे। स्थिति यह लग रही थी कि लोग चैनलों पर उन समागमों के प्रसारण का समय इस तरह याद रखते थे जैसे कि सारे चैनल ही निर्मलबाबा के खरीदे हुए हों। हमारा अनुमान तो यह है कि निर्मल बाबा से मिलने वाले आर्थिक लाभ से कहीं उनको अपने अन्य प्रसारणों पर हानि होने का डर था। उनके अन्य कार्यक्रम की लोकप्रियता इस कदर गिरी होगी कि उनके विज्ञापनादाताओं को लगा होगा कि वह बेकार का खर्च रहे हैं। प्रचार प्रबंधकों से स्पष्ट कहा होगा कि वह या तो निर्मल बाबा का विज्ञापन प्रसारित करें या हमारे लिये दर्शक बचायें। 

            हमने निर्मल बाबा के कार्यक्रंम देखे थे। हमारे अंदर केवल मनोरंजन का भाव रहता था। अगर अंधविश्वास की बात की जाये तो हिन्दी चैनल वाले स्वयं ही अनेक तरह के ऐसे प्रसारण कर रहे हैं जो विश्वास और आस्था की परिधि में नहीं आते। निर्मल बाबा को कोई सुझाव हमारे दिमाग में नहीं आता था। देखा और भूल गये। दरअसल इस विषय पर बहुत पहले लिखना था पर समय और हालातों ने रोक लिया। एक योगसाधक और गीता पाठक होने के नाते हमें पता है कि कोई भी मनुष्य अपने अध्यात्मिक ज्ञान के बिना इस संसार में सहजता से संास नहीं ले सकता। संसार के विषयों में लिप्त आदमी सोचता है कि मैं कर्ता हूं यही से उसक भ्रम प्रारंभ होता है जो अंततः उसे अंधविश्वासों की तरफ ले जाता है। संसार के काम समय के अनुसार स्वतः होते हैं और उनके लिये अधिक सोचना अपनी सेहत और दिमाग खराब करना है।

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

 

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आईपीएल समाप्त, ब्लाग पर पाठक संख्या बढ़ना शुरु-हिन्दी आलेख (IPL end,increas hindi blog vews)


आईपीएल क्रिकेट प्रतियोगिता खत्म होने के अगले दिन ही अगर ब्लाग पर पाठक संख्या बढ़ने लगे तो विचारणीय विषय तो बनता ही है। यह लेखक पहले क्रिकेट का बहुत शौकीन था पर जब इसमें फिक्सिंग की बात आयी तो फिर मन विरक्त हो गया। 2006 में भारत विश्व कप प्रतियोगिता से बाहर हो गया तो उसके बाद लगभग क्रिकेट से मन हट ही गया। अंतर्जाल पर आने से पता लगा कि ऐसा अनेक लोगों के साथ हुआ है। हालत यह हो गयी थी कि 10 महीने तक अपने देश के लोगों के लिये क्रिकेट यहां एक ‘‘गंदा खेल’’ बन गया मगर फिर 2007 में भारत की क्रिकेट टीम को बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता में जीत मिली तो फिर यह खेल लोकप्रिय हुआ। अब जिस तरह क्रिकेट मैचों में फिक्सिंग के आरोप लग रहे हैं उससे तो लगता है कि इसमें भारत को जबरन जितवाया गया था ताकि यहां के लोगों द्वारा इस पर खर्च लगातार किया गया जाये-याद रहे इस क्रिकेट केवल भारत के धन पर ही चल रहा है।
एक बार ऐसा लगा कि यह खेल इतना लोकप्रिय नहंी बन पायेगा पर अब आसपास माहौल देखकर ऐसा लगता है कि पुरानी पीढ़ी के जो लोग निराश हो गये थे वह भी फिर इस खेल को देखने लगे। वैसे तो यह कहा जा रहा था कि इसे केवल सट्टे या दाव खेलने वाले ही अब इसमें रुचि ले रहे हैं पर अब ऐसा लगने लगा है कि इसमें फिर लोग ‘‘ईमानदार मनोंरजन’’-यह बात आजकल एक खूबसूरत सपना ही है- तलाश रहे थे। थे इसलिये लिखा क्योंकि अब फिर इस पर उंगलियां उठने लगी है।
हिन्दी ब्लाग लिखने के साथ ही पाठक भी अच्छी संख्या में मिलने लगे थे। पिछली बार आईपीएल अफ्रीका में हुआ तब भी इतना अधिक पाठक संख्या में अंतर नहंी आया था। मार्च के आखिरी सप्ताह से जब भारत के परीक्षाकाल चलता है तब पाठक संख्या गिरती है। यह हुआ भी! मगर इधर आईपीएल प्रारंभ होते ही तो स्थिति बदल गयी। इसी दौरान एक ऐसी घटना भी हुई जिसने हिन्दी ब्लाग जगत में पाठक संख्या का भारी संकट दिखाई दिया। वह यह थी कि पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ी-उस भी फिक्सिंग का आरोप हैं और अभी तक अपने देश की टीम से बाहर है-भारत की एक महिला टेनिस खिलाड़ी से प्रेम प्रसंग सामने आया। उसमें भी पैंच था। वह यह कि उसने भारत की उसी शहर एक लड़की से उसने निकाह किया था जहां महिला टेनिस खिलाड़ी रहती थी। जब वह भारत में अपनी भावी वधु के शहर पहुंचा तो पूर्व वधु ने उस पर मुकदमा दायर कर दिया। इस खबर की प्रचार माध्यमों में जमकर चर्चा हुई। उस समय हिन्दी ब्लाग संख्या एकदम गिर गयी। तब तो ऐसा लगने लगा कि क्रिकेट, टेनिस और फिल्म वाले मिलकर कोई ऐसा संयुक्त उद्यम चला रहे हैं जिससे संगठित प्रचार माध्यमों को निरंतर सनसनी और मनोरंजन के लिये सामग्री मिलती रहे। अब यह तो पता नहीं कि अंतर्जाल पर सक्रिय अन्य वेबसाईटों या ब्लाग की क्या स्थिति रही पर इस ब्लाग लेखक का अनुमान है कि कम से कम भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की आवाजाही कम ही रही होगी।
जैसे ही किकेट और महिला टेनिस खिलाड़ी का मामला थमा, इस ब्लाग लेखक के ब्लाग पर पाठक संख्या बढ़ी। अब आईपीएल के मैच थमे तो अब गुणात्मक वृद्धि देखने में आयी है। अब है तीसरी क्षति की भरपाई। वह है परीक्षाकाल की! अब परीक्षायें तो समाप्त हो गयी हैं पर शिक्षक तथा छात्रों के साथ उनके पालकों को भी इस समय घर से बाहर अवकाश् को कारण प्रस्थान होता है और इस दौरान उनकी अतंर्जाल पर सक्रियता नहीं रह पाती। इस ब्लाग लेखक ने परीक्षाकाल तथा क्रिकेट मैच के दौरान पाठकों की कमी का अनुमान करते हुए एक पाठ लिखा था पर प्रेम प्रसंग एकदम अप्रत्याशित रूप से सामने आया।
कुछ दिनों पहले आस्ट्रेलिया का एक किस्सा सुनने में आया था जिसमें एक टीवी चैनल में रिपोर्टर ने अपने सनसनीखेज समाचारों के लिये पांच कत्ल करवाये थे। जहां कत्ल होता वह पुलिस से पहले पहुंच जाता और वहां से सीधे अपने चैनल को खबर देता था। इसलिये शक के दायरे में आ गया। जब हम भारत के संगठित -रेडियो, टीवी चैनलों, तथा समाचार पत्रों-की बात करते हैं तो यह बात तय है कि उनके आदर्श तो ऐसे ही गोरे देश हैं। मगर आस्ट्रेलिया की जनसंख्या कम है जबकि भारत में यह समस्या नहंी है। इसलिये यहां के प्रचार माध्यमों को बिना कत्ल कराये ऐसे ही समाचार मिल जाते हैं जो नाटकीय होते हैं। अधिकतर भारतीय टीवी चैनल फिल्म और क्रिकेट के सहारे हैं तो यही स्थिति क्रिकेट और फिल्म अभिनेताओं की भी है कि वह बिना प्रचार के चल नहीं सकते। इसलिये कभी कभी तो लगता है कि फिल्म और क्रिकेट के सक्रिय लोग योजनाबद्ध ढंग से ऐसे समाचार बनाते हैं जिससे दोनों का लाभ हो। आईपीएल को घोषित तौर से फिल्म जैसा मनोरंजन माना गया है।
वैसे जो स्थित सामने आयी है उससे तो लगता है कि आईपीएल विवाद के कारण क्रिकेट अपनी आभा फिर खो सकता है। जब यह विवाद चल रहा था तब उसे देखने वाले शायद समाचार सुन और पढ़ नहंी रहे थे इसलिये निरंतर चिपके रहे पर अब जब वह देखेंगे कि वह तो ठगे गये तब फिर उन्हें अपने मनोरंजन के लिये नये साधन तलाशने होंगे। हालांकि मई में बीस ओवरीप विश्व कप प्रतियोगिता हो रही है और उसमें बीसीसीआर्इ्र की टीम के-इसे भारत की प्रतिनिधि टीम होने का भ्रम पालना पड़ता है क्योंकि यह वहां अकेली जो होती है-प्रदर्शन को लेकर अनेक लोगों को संदेह है। वैसे तो पहले भी बुरी तरह हारी थी पर इस बार अगर इतना बुरा खेलती है तो गये काम से! इस दौरान पाठकों की संख्या पर अंतर पड़ने की संभावना नहीं है क्योंकि यह भारतीय समयानुसार देर रात को खेले जायेंगे। बहरहाल यह बात भी दिल्चस्प है कि इस लेखक ने क्रिकेट देखना छोड़ा दिया है पर यह विषय है कि किसी न किसी रूप में चला ही आता है।

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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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बौद्धिक पिंजरे में कैद बुद्धिजीवी-संपादकीय


वह जो सभी तरफ दिखाया जा रहा है उसका मुख्य उद्देश्य तुम्हें भीड़ बनाना है। वह भीड़ जो समय पड़े तो उसे जाति, भाषा,धर्म और क्षेत्र के आधार पर बांटा जा सके। इसे बांटकर उन लोगों के सामने प्रस्तुत किया जा सके जिनका काम ही भीड़ पर चला करता है। बदले में भीड़ जुटाने वाले सौंपते हैं उनको तमगे, कप, उपाधियां और सम्मान। भीड़ कभी एक न हो इसका पुख्ता इंतजाम कर लिया जाता है। भीड़ के एक हिस्से को इसलिये खुश किया जाता है कि दूसरा हिस्सा चिढ़े और इसकी अभिव्यक्ति के लिये साधन ढूंढे जो कि पैसे से बिकते हैं।
यह पूर्वनिर्धारित है पर लगता है कि स्वतः चल रहा है। दिखता तो यह स्वतः चलता है है पर इसका बौद्धिक ढांचा बरसों पहले से बनाया जा चुका है और इस पर नियंत्रण केवल खास लोग और उनके चाटुकारो का है। यकीन करो जो तुम कहीं भी कुछ देख और पढ़ रहे हो उसमें कोई सच्चाई नहीं है। अगर है तो वह ऐसी है जैसे किसी फिल्म की होती है-एक काल्पनिक कहानी पर जिस तरह कुछ लोग अभिनय करते हैं। लोग फिल्मों को सच मानने लगे हैं। उनमें अभिनय करने वाले अभिनेता और अभिनेत्रियों को महानायक और महानायिका बना देते हैं। हालत यह है कि पर्दे का खलनायक भी बाहर नायक की तरह सम्मान पाता है और उसके बारे में कहते हैं कि ‘वह तो एक आम इंसान है।’ मगर नायक का पात्र तो महानता की उपाधि पाता है।

तयशुदा पात्र हैं। कोई हंसता दिख रहा है कोई रोता। फिल्म की तरह समाचार हैं और समाचार ही फिल्म बना रहे हैं। आजकल नई सभ्यता है। पहले तो राहजन हथियारों की दम पर लूट लेते थे पर इस नई सभ्यता में हिंसा वर्जित है क्योंकि आदमी की बुद्धि को तमाम तरह की लालच देकर और काल्पनिक सुख दिखाकर भ्रमित किया जा सकता है और मन के स्वामी होने की वजह से मनुष्य कहलाने वाला जीव बिना किसी रस्सी और जंजीर के पशु बनकर जिस आदमी के पास काल्पनिक रस्सी है उसके पीछे चला जाता है।

जिनके पास धन, पद और बाहुबल है उनको कुछ नहीं करना बस इंसानी मन को पकड़ लेने वाले पिंजरे-फिल्म,टीवी चैनल, अखबार और अंतर्जाल-पर कब्जा करना है। वहां से उसे समयानुसार भड़काने, बहलाने, और हड़काने वाले संदेश, समाचार, कहानियां और कविताओं का प्रसारण करना है। सारे दृश्य काल्पनिक और पूर्व रचित हैं। सर्वशक्तिमान ने यह सृष्टि रची है पर बाकी सब तो उसने इस धरती पर विचरने वाले जीवों पर छोड़ दिया है पर फिर भी ऐसे लोग हैं जो ‘भाग्य का खेल है’ या ‘जैसा
उसने रचा है’हमें देखना है जैसे जुमले कहते हैं पर उनके मन में यही है कि हम ही सब कर रहे हैं। दूसरे को दृष्टा बनने का उपदेश देने वाले लोग स्वतः ही अपनी अंर्तज्योति बुझी होने के कारण भीड़ की तरह हांके जा रहे हैं पर इसे नहीं जानते।

बिल्कुल उत्तेजित मत हो! यकीन करो यह योजना है एक व्यापार की। तुम जिन दृश्यों से चिढ़ते हो उनसे मूंह फेर लो। जिन शब्दों से तुम आहत होते हो उनको पढ़ना या सुनना भूल जाओ। जिन लोगों से तुम्हें दुःख मिलता है उनको याद भी मत करो। तुम उन समाचारों पर ध्यान न देते हुए उनकी चर्चा से दूर हो जाओ जिनसे कष्ट पहुंचता है। यह दृष्टा बनना ही है और फिर देखो उन लोगों का खेल! वह जो तुम्हें हड़काते हैं वह स्वयं ही हडकते नजर आयेंगे। वह जो तुम्हें झूठे खेल से बहला रहे हैं पर खुद दहलने लगेंगे। तुम जिन दृश्यों और समाचारों को सत्य समझ कर विचलित होते हुए उन पर बहसें करते हो उनके पीछे के सच पर जब विचार करने लगोगे तो तुम्हें हंसी आयेगी। जो बाजार में बिक रहा है या दिख रहा है-वह आदमी
हो याशय-उसका मूंह तुम्हारी जेब की तरफ है। जैसे पहले बहुरूपिये दिल बहलाकर पैसे ले जाते थे पर अब उनको आने की जरूरत नहीं है। उन्होंने तुम्हारे घर में पर्दे सजा दिये हैं। तुम्हें पता ही नहीं चलता कि तुम्हारा पैसा कैसे उनके पास जा रहा है।

वह तुम्हारा ध्यान किसी चेहरे की तरफ खींचे-चाहे वह हीरोईन का चेहरा हो या सर्वशक्मिान के किसी रूप का-तुम उसे मत देखो और आंखें बंद कर भृकुटि पर नजर रखो। वह तुम्हें संगीत सुनायें तुम ओम शब्द का जाप करने लग जाओ। वह फिल्म चर्चा करें तुम गायत्री मंत्र का जाप करने लगो। अपनी अभिव्यक्ति का केंद्र अपने अंदर रखो। बाहर कोई सुने यह जरूरी नहीं। बस तुम अपने को सुनना शुरु कर दो। अपने को पढ़ो। अपने सत्य कर्म को देखो दूसरे के अभिनय में रुचि रखने से तुम्हारे मन को शांति नहीं मिल सकती। उन्होंने शोर मचा रखा है तुम शंाति अपने अंदर ढूंढो। कहीं दूसरे से सुख और मनोरंजन की आस तुम्हें कमजोर बना रही है। अपने मन में अपने लिये ख्वाब और सपने देखो उसने दूसरे पिंजरे में मत फंसने दो।
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अपनी आभा खोते हुए समाचार चैनल


हम भारत के लोग मूलत: सीधे होते हैं इसमें कोई शक नहीं है, क्योंकि इसी कारण विदेशियों ने हम पर कई वर्ष तक शासन किया. उनके शासकमें चालाकी और कुटिलता कूट-कूट कर भरी हुई थी जबकि हमारे देश के लोग एकदम सीधे-साधे थे. पर अब अंग्रेजी भाषा के साथ उसकी मानसिकता को भी अपनाने वाले लोग भी अपने ही देश के लोगों को नासमझ समझने लगे हैं . अब देश के समाचार चैनलों को ही लें. विकसित देश की तर्ज पर इस देश में उन्होने यहाँ कार्यक्रम शुरू किये और उनको लोकप्रियता भी बहुत मिली और यह तय था कि उनको विज्ञापन भी मिले. अब सफलता के गुरूर ने इतना आत्ममुग्ध बना दिया है कि उनको यह भ्रम हो गया है कि हम चाहे जैसे कार्यक्रम दें लोग उसे देखने के लिए बाध्य हैं. उन्होने इस बात को भुला दिया है कि मनोरंजन और समाचार दो अलग अलग चीजे हैं.

इस देश में करोड़ों लोग हैं जो केवल समाचार पढने और सुनने में रूचि लेते हैं और मनोरंजन उनके लिए दूसरी प्राथमिकता होती है. समाचार का मतलब केवल देश के ही नहीं बल्कि विदेशों की भी छोटी और बडे खबरों में उनकी रूचि होती है. सामयिक चर्चाओं को वह बहुत रूचि के साथ पढते और सुनते हैं. एसे लोगों की वजह से ही इन समाचार चैनलों को लोकप्रियता मिली. फिर भी समाचार चैनलों वालों को भरोसा नहीं है और वहा मनोरंजन कार्यक्रमों को ठूंसे जा रहे हैं. मनोरंमन चैनलों पर होने वाली गीत-संगीत प्रतियोगिताओं पर अपना आधे से अधिक समय खर्च कर रहे हैं जैसे कोई देश की बड़ी खबर है. सामयिक चर्चाएं जो कि समाचारों का एक बहुत महत्वपूर्ण भाग माना जाता है उसके मामले में तो सभी चैनल कोरे हैं. उन्हें लगता है कि यह तो केवल एक फालतू चीज है. जिस तरह किसी समाचार पत्र और पत्रिका को उसका संपादकीय ताकत देता है और वैसे ही समाचार चैनलों की ताकत उसकी सामयिक चर्चा होती है. जिन्होंने सी एन एन और बीबीसी का प्रसारण देखा है उन्हें यह चैनल वैसे ही नहीं भाते पर अपनी भाषा के कारण सबको अच्छे लगते हैं पर इन चैनलों ने आपने असली प्रशंसकों पर भरोसा करने की बजाए उसे नई पीढ़ी पर ज्यादा भरोसा दिखाया जिसे अभी समाचारों से अधिक महत्व नहीं है.

कई लोग हैं जो शाम को घर बैठकर देश-विदेश की खबरे और उनके बारे में सामयिक चर्चाएं सुनना चाहते हैं पर उन्हें सुनने पढते हैं बस गाने और डांस. अगर कोई कह रहा है कि लोग यही देखना चाहते हैं तो झूठ बोल रहा है. क्योंकि शुरू में तो इन चैनलों पर ऐसे कार्यक्रम नहीं आते थे तब उन्हें कैसे लोकप्रियता मिली. दर असल घर में बैठी महिलाएं और बच्चे इन्हें देखने लगे थे और इसी का फायदा उठाने के लिए विज्ञापन देने वालों ने इन्हें अपने बस में कर लिया. पैसा कमाने में कोई बुराई नहीं है पर इस तरह अपने मूल स्वरूप से जी तरह छेड़छाड़ कर उन्होने यह साबित किया है कि वह विदेशी चैनलों की तरह व्यवसायिक नहीं हैं. मैं आज भी जब भी बीबीसी पर इस देश के बारे में सामयिक चर्चा सुनता हूँ तो एसा लगता है कि उनके प्रसारणों की इसे देश में कोई बराबरी नहीं कर सकता और न सीख सकता है. कई बार शाम को जब मैं समाचार सुनना चाहता हूँ तो निराशा हाथ लगती है.

इन लोगों को पता ही नहीं है कि समाचार केवल देश के ही नहीं विदेश के भी होते है और लोग उन्हें सुनते हैं. फिर यह कहते हैं कि विदेशी चैनलों की तरह यहां नहीं चल सकता- पर यह नहीं बताते कि पहले कैसे चल रहा था. इस मामले में इस देश का दूरदर्शन चैनल आज भी इनसे आगे है जिस पर यह सरकारी का ठप्पा लगाकर उसकी उपेक्षा करते हैं. कम से कम उस पर सामयिक चर्चाएँ तो सुनाने को तो मिल जाती हैं.

इन समाचार चैनलों को अपना सही स्वरूप बनाए रखें के लिए अपने चैनलों पर सामयिक विषयों पर चर्चा के लिए समय भी रखना चाहिए ताकि उनके साथ बौद्धिक वर्ग के दर्शक भी जुडे रहे. .