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व्यक्ति में चेतना लाने से ही समाज जागृत होगा-चिंतन


अक्सर यह सुनने को मिलता है कि ‘महाभारत घर में नहीं रखना चाहिए क्योंकि इससे क्लेश होता है’। हो सकता है या सच हो या भ्र्म! एक बात जरूर है कि जैसा साहित्य आप पढ़ते हैं वैसे ही आपकी बुद्धि भी हो जाती है। शायद यही कारण है कि घर में महाभारत रखने के लिये रोका जाता है कि घर में अगर होगी तो पढ़ी जाएगी और फिर लोगों में क्लेश की भावना पैदा हो सकती है। शायद इसीलिये हमारे देश के अध्यात्मिक चिंतकों ने महाभारत से श्रीगीता को अलग कर दिया। इसक मतलब सीधा है कि उसमें कुछ ऐसे प्रसंग है जिनका दुहराव हमारे समाज में पसंद नहीं किया जायेगा। महाभारत प्रायः घरों में नहीं रखा जाता है पर शायद ही ऐसा घर हो जहां श्रीमदभागवत गीता नहीं रखी जाती हो। सच बात तो यह है कि श्रीगीता न केवल चारों वेदों का सार संग्रह है बल्कि वह हमारे अध्यात्मिक ज्ञान का खजाना होने के साथ ही सभ्य संस्कृति और पवित्र संस्कारों के निर्माण का स्तोत्र भी है।
मजे की बात यह है कि श्रीगीता को जाने बिना ही संस्कार और संस्कृति बचाने के लिये कुछ लोग अनवरत अभियान छेड़े रहते हैं पर अगर उनसे उसका स्वरूप पूछा जाये तो उनकी हवा निकल आयेगी। पाश्चात्य सभ्यता से खतरा बतारने वाले लेाग बताते हैं कि-
1.पश्चिम में माता पिता और गुरु को सम्मान नहीं दिया जाता पर हमारे यहां उसकी परंपरा है। बच्चे अगर अपने संस्कारों ओर संस्कृति से परिचित नहीं होंगे तो बिगड़ जायेंगे और हमारे समाज का ढांचा बिगड़ जायेगा।
2.स्त्रियों को वह वस्त्र पहनने चाहिये जो पूरा शरीर ढंकते हों। अर्द्धनग्न होकर घूमने वाली स्त्रियों इस देश के लिये बहुत बड़ा खतरा है।
3.देश में केवल पुराने त्यौहार ही मनाने चाहिये ताकि संस्कृति बची रहे। पश्चिम के त्यौहार मनाने की प्रवृत्ति नहीं होना चाहिये।
शायद और भी बहुत सारी बातें बतायेंगे। पुत्र के रूप में श्रवण कुमार और भगवान श्रीराम जी और बहु के रूप में श्रीसीता जी का उदाहरण देंगे। यह सब ठीक है। हमारे देश के अनेक धार्मिक गुरु भी खूब उनका बखान करते हैं। देखो कैसे श्रवण कुमार ने माता पिता की सेवा की और भगवान श्रीराम ने पिता की आज्ञा का पालन किया। पत्नी के रूप में स्त्री से पतिव्रता की आशा की जाती है। गौर करें तो पायेंगे कि केवल सारी शिक्षा शासित होने वाले संबंधों पर है और वैसा न होने पर सजा का भी प्रावधान किया गया है ‘रौरव नरक का’। मगर शासक संबंधों का कोई वर्णन नहीं करना चाहता क्योंकि बूढ़े लोग ही धर्म के अधिक सहायक होते हैं और युवाओं से ऐसी अपेक्षा नहीं की जाती। एक अच्छी माता और पिता बनने की शिक्षा युवाओं को शायद ही कोई देता हो और शायद ही कोई ऐसा आदमी मिले जो अच्छे माता पिता न बनने पर उसकी सजा भुगतने की चेतावनी देने का साहस करता हो।
हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि ‘जैसा आदमी कर्म करता है वैसा ही फल उसके सामने आता है’। संस्कृति और संस्कारों के रक्षक यहां आकर खामोश हो जाते हैं। अगर कोई व्यक्ति अच्छा पिता नहीं बना तो उससे कुपुत्र के दुष्कर्मों या अपने प्रति उपेक्षा का भाव उसे झेलना ही है। इसमें पश्चिम संस्कृति के प्रभाव जैसी कोई बात नहीं है। जब वह अपने अकर्मण्यता या दुष्कर्म का दुष्परिणाम भोग रहा है तब उसके साथ सहानुभूति जताते हुए यह कहने का कोई मतलब नहीं है कि‘आजकल जमाना खराब आ गया।’
ऐसा नहीं है कि पश्चिमी सभ्यता आने के पहले कोई इस देश में सभी पुत्र श्रवण कुमार, भगवान श्रीराम तथा अन्य महापुरुषों जैसे थे। अगर होते तो फिर इनके अलावा उनका नाम भी कहीं आता।
सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे समाज में अपनी संतानों को हथियार की तरह उपयोग करने की प्रवृत्ति है वह बहुत खतरनाक है और इस कारण लेाग अपने बच्चों को अपने जीवन मेें केवल एक ही बात सिखाते हैं कि किसी भी तरह कमाओ। उसके बाद जब बच्चे आत्मनिर्भर होते हैं तो उनसे अपेक्षा करने लगते हैं कि वह संस्कार और संस्कृति से परिचित हों। जब बच्चे में संस्कार भरने का समय था तब तो भरा नहीं और जब समय आया तो फिर ऐसे फल की कामना करने लगे जो उन्होंने बोया ही नहीं।
कहने का तात्पर्य यह है कि हम जिस प्रकार की संस्कृति की बात करते हैं वह एक सामान्य आचार और व्यवहार का भाग मात्र है जो हमारे ही कर्म के आधार पर निर्धारित होता है। हम जैसा व्यवहार दूसरों से करते हैं वैसा ही हमें मिलता है। हम अपने से शासित लोगों से अपेक्षायें तो करते हैं पर सिखाते कुछ नहीं। फिर हम मानवीय रिश्तों के निर्वहन और पहनावे में जिस प्रकार संस्कृति और संस्कारों के मूल तत्व ढूंढते हैं वह तो पश्चिम में भी हैं। ऐसा नहीं है कि पश्चिम में पुत्री और पुत्र माता पिता को प्रेम और आदर नहीं देते। अपनी सफलताओं पर वह भी अपने माता पिता का ही नाम लेते हैं। तात्पर्य यह है कि केवल पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों की कथित पवित्रता को ही संस्कृति या संस्कार से को जोड़ना ठीक नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अपने इन रिश्तों के निर्वाह से प्रथक किस तरह का आचार और व्यवहार करते हैं वह भी संस्कारों और संस्कृति से जुड़ा है-मसलन परिवार का भरण भोषण के लिये प्राप्त धन के स्तोत्र पवित्र होना, दूसरे की संपत्ति पर बुरी नजर न डालना तथा निष्काम भाव से दूसरों की सहायता करना।
पश्चिमी पहनावे या उत्सवों को अपनाने से अगर हमारी संस्कृति ढहने वाली होती तो शायद हम आज अपने सारे पवित्र ग्रथों का अध्ययन नहीं करते-जबकि उनका अध्ययन सामान्य शिक्षा में प्रचलित नहीं है। पश्चिमी परिधान पहनने वाले युवक युवतियां मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थानों पर दर्शनार्थ जाते हुए देखे जा सकते हैं। उनकी चारित्रिक दृढ़ता वैसे ही जैसे पहले की पीढ़ी में होती है। वह लोग वैलंटाईन डे मनाते हैं पर इसका मतलब यह नहीं है कि उनको दीपावली याद नहीं हैं। हां, यह सही है कि बाजार के प्रभाव में पश्चात्य उत्सवों को भी कुछ युवक युवतियां मनाते हैं-देश की जनसंख्या की दृष्टि से उनकी संख्या नगण्य है-पर इससे उनके स्वयं के संस्कार तो नष्ट नहीं हो जाते। फिर जो बाजार उनका प्रेरक है वह उन लोगों के दान और चंदे का स्तोत्र भी है जो संस्कृति और संस्कारों की रक्षा और धर्म के प्रचार के लिये कार्यरत हैं। इसलिये धर्म और संस्कृति रक्षकों को अपने अभियान में एक हद के अंदर तो रहना ही पड़ता है क्योंकि वह उस बाजार से अधिक देर तक लड़ नहीं सकते जो उनका भी मददगार है।
हमारे अध्यात्मिक ज्ञान में विराट शक्ति है क्योंकि वह सृष्टि और जीवन के उस सत्य के निकट है जिसके पास अभी पश्चिम का विज्ञान पहुंच रहा है। यही कारण है कि पश्चिम में भारतीय धर्मग्रथों का अध्ययन अब नये सिरे से किया जा रहा है। यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि अगर हम इस समय देश का आचरण देखें तो शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो यह सके कि वह संतुष्ट है। हमें आत्मंथन करना चाहिये कि क्या हम जिस प्रकार का आचरण कर रहे हैं क्या वाकई पूरी तरह से पवित्र और शुद्ध है। केवल धर्म, संस्कृति और संस्कारों की रक्षा का नारा लगाने से काम नहीं चलने वाला। हमारा अध्यात्मिक दर्शन खाने या पहनने के मामले में कोई प्रतिबंध नहीं लगाता सिवाय इसके कि वह देह के स्वास्थ्य और मानसिक शांति के लिये उचित हो। सबसे बड़ा सवाल आचरण और व्यवहार के लिये है और उसके लिये किसी अभियान की बजाय ऐसे सम्मेलनों की जरूरत है जहां मिलकर लोग अपने आचार विचार पर आत्म मंथन कर उसमें सुधार सकें। मुख्य बात समाज को नहीं बल्कि व्यक्ति को सुधारने की की है। उसमें भी दूसरे पर नहीं बल्कि स्वयं पर दृष्टि डालने की है। समूहों में अभियान चलाने से शुद्धता नहीं आ सकती बल्कि उसके लिये स्वयं के स्तर पर प्रयास करना चाहिये।
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संत कबीर वाणी:जीभ का रस सर्वोत्तम (sant kabir vani-jibh ka ras sarvottam)


        देखा जाये तो संसार में ज्ञानी लोगों  की संख्या अत्यंत कम है। उसके बाद ऐसे लोगों की संख्या है जो ज्ञान की तलाश के लिये प्रयासरत रहते हैं यह अलग बात है कि योग्य गुरु के अभाव में उनको सफलता नहीं मिलती। मगर ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो न तो जिनके पास ज्ञान है न उनको पाने की जिज्ञासा है। देहाभिमान से युक्त ऐसे लोग हर समय अपने आपको श्रेष्ठ प्रमाणित करने के लिये बकवाद करते हैं। दूसरों का मजाक बनाते हैं। ऐसे मूर्ख लोग अपने आपको बुद्धिमान साबित करने के लिये किसी भी हद तक चले जाते हैं। न तो वह समय देखते हैं न व्यक्ति। अपने शब्दों का अर्थ वह स्वयं नहीं समझते। उनको तो बस बोलने के लिये बोलना है। ऐसे लोग न बल्कि दूसरों को दुःख देते हैं बल्कि कालांतर में अपने लिये संकट का निर्माण भी करते हैं।
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि
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सहज तराजू आनि के, सब रस देखा तोल
सब रस माहीं जीभ रस, जू कोय जाने बोल
“संसार में विभिन्न प्रकार के रस हैं और हमने सब रसों को सहज स्वभाव की ज्ञान -तुला पर तौलकर देख-परख लिया है। सब रसों में जीभ का रस सर्वोत्तम एव अधिक वजन वाला है। उसे वही जान सकता है जो अपने शब्द और वाणी का सही उपयोग करना जानता है।”
मुख आवै सोई कहै, बोलै नहीं विचार
हटे पराई आतमा, जीभ बाँधि तलवार
“कुछ नासमझ लोग ऐसे हैं जो कभी भी सोच समझकर नहीं बोलते और मुहँ में जो आता है बक देते हैं। ऐसे लोगों की वाणी और शब्द तलवार की तरह दूसरों को कष्ट पहुँचाते हैं।”
         इसके विपरीत ज्ञानी लोग हर शब्द के रस का अध्ययन करते हैं। उनके प्रभाव पर दृष्टिपात करते हैं। उनका अभ्यास इतना अधिक हो जाता है कि उनके मुख से निकला एक एक शब्द न केवल दूसरों का सुख देता है बल्कि वह स्वयं भी उसका आनंद उठाते हैं। एक बात निश्चित है कि किसी भी मनुष्य के मुख से निकले शब्द उसके अंतर्मन का प्रमाण होते हैं। दुष्ट लोग जहां हमेशा अभिमान और कठोरता से भरे भरे शब्द उपयोग करते है जबकि सज्जन कठोर बात भी मीठे शब्दों में कहते हैं। इसलिये जब कहीं वार्तालाप करते हैं तो इस बात का विचार करें कि हमारे शब्द का बाहर प्रभाव क्या होगा? इससे न केवल हम दूसरे को सुख दे सकते हैं बल्कि अपने लिये आने वाले संकटों से भी बच सकते हैं। कहा भी जाता है कि यही वाणी आपको धूप में बैठने का दुःख और छांव में बैठने के सुख का कारण बनती है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

संत कबीर वाणी: संतों के निंदकों की मुक्ति नहीं


जो कोय निन्दै साधू को, संकट आवै सोय

नरक जाय जन्मै मरै, मुक्ति कबहु नहिं होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो भी साधू और संतजनों की निंदा करता है, उसके अनुसार अवश्य ही संकट आता है। वह निम्न कोटि का व्यक्ति नरक-योनि के अनेक दु:खों को भोगता हुआ जन्मता और मरता रहता है। उसके मुक्ति कभी भी नहीं हो सकती और वह हमेशा आवागमन के चक्कर में फंसा रहेगा।