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वेलंटाईन डे संग बसंत पंचमी-हिन्दी लेख


             आज बसंत पंचमी और वेलंटाईन डे एक ही दिन हमारे सामने उपस्थित हैं।  देखा जाये तो दोनों का भाव एक जैसा दिखता है पर यह एक भ्रम है। वेलंटाईन डे यहां दो देहों के आपसी सहृदयता का प्रतीक है वहीं बसंत पंचमी के साथ सामाजिक और अध्यात्मिक भाव भी जुड़े हैं।  देखा जाये तो हमारे देश में कोई पर्व, दिन या दूसरा विषय अध्यात्म से जुड़ा नहीं है तो वह रसहीन है। अध्यात्म का मतलब होता है हमारी देह धारण करने वाला आत्मा।  अब यह कहना कठिन है कि यह हमारी भारतीय भूमि का अन्न, जल और वातावरण की देन है या लोगों के अंदर बरसों से रक्त में प्रवाहित संस्कार का प्रभाव कि यहां अभी भी बिना अध्यात्मिक रस के कोई भी विषय न शोभायमान होता है न स्वादिष्ट।  वेलेंटाईन डे के मनाने वालों को उसका कारण भी नहीं होता। उसकी वह जरूरत भी अनुभव नहीं करते क्योकि शुद्ध रूप से उपभोग पर जब इंद्रियां केंद्रित होती हैं तो आदमी की बुद्धि अध्यात्म से परे हो जाती है।  हमारे बाज़ार तथा प्रचार समूह के प्रबंधकों का मुख्य लक्ष्य युवा पीढ़ी होती है।  फिर जब हमारे देश में  नयी शिक्षा पद्धति में भारत के प्राचीन अध्यात्म ज्ञान शामिल न होने से आधुनिक लोग वैसे भी अपने पुराने इतिहास से दूर हो गये हैं तब उनसे यह आशा करना कि वह बसंत पंचमी के अवसर पर उपभोग के लिये प्रेरित होंगे बेकार है।

फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग पर वेलेंटाईन डे की धूम है।  कुछ लोग हैं जो उसे नकारते हैं तो कुछ उसे नारियों की रक्षा जैसे विषय से जोड़ते हुए झूमते हैं।  कुछ लोग वेलेंटाईन डे के विरोध में प्रदर्शन करते हुए यह जताते हैं कि वह प्राचीन भारतीय संस्कृति के उपासक हैं।  इससे भी वेलेंटाईन डे को प्रचार में जगह मिलती है।  हमने देखा है कि अगर यह विरोध  न हो तो यह दिन प्रचार माध्यमों में फ्लाप हो जाये।  कभी कभी तो लगता है कि इस दिन के समर्थक और विरोधी सामाजिक कार्यकर्ता आमजन का ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिये सड़कों पर आते हैं। खास बात यह है कि वेलेंटाईन डे को बाज़ार और प्रचार समूहों से प्रेरणा की आवश्यकता होती है जबकि बसंत पंचमी का दिन स्वयं ही जनमानस में स्फूर्ति पैदा होती है।  शरद ऋतु के प्रस्थान और ग्रीष्म ऋतु के आगमन के बीच का यह समय बिना प्रयास किये ही देह को आनंद देता है।  सामान्य लोगों के लिये यह दिन जहां खुशी का होता वहीं योग, ध्यान, और ज्ञान साधकों के लिये अपने अभ्यास में सहजता प्रदान करने वाला होता है।  जहां सामान्य व्यक्ति परंपरागत भौतिक साधनों से बसंत पंचमी मनाता है वहीं अध्यात्मिक साधक  अपनी विद्या से मन से मन में ही रमकर आनंद उठाता है।  सच बात तो यह है कि जब इसका अभ्यास हो जाता है तो आनंद हर दिन मिलता है पर किसी खास अवसर पर वह दूना हो जाता है।  हमारी तरफ से बसंत पंचमी की पाठकों और ब्लॉग लेखकों और मित्रों को बधाई।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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बाज़ार बोले सो सब बोलें-हिंदी लेख


            यह हैरानी की बात है कि दिल्ली में एक युवती के साथ सामुहिक दुष्कर्म के बाद उसकी हत्या की घटना के बाद जहां सारे देश में आक्रोश फैला वहीं अनेक लोगों को अपना नाम चमकाने के लिये बहसें करने के साथ ही बयान देने का अवसर मिला।  बाज़ार के सौदागरों के उत्पाद बिकवाने वाले प्रचार माध्यमों ने इस अवसर पर खूब नाटकबाजी की।  कहने को तो प्रचार माध्यमों में प्रस्तोता और बहसकर्ता शोकाकुल थे पर कहीं न कहीं जहां विज्ञापनों के माध्यम से कमाई हो रही थी तो विवादस्पद बयानों के माध्यम से अनेक लोगों को चमकाया जा रहा था।

           इस मामले में एक ऐसे गायक कलाकार  का नाम सामने आया जिसका नाम आम लोगों में तब तक प्रचलित नहीं था। उस गायक कलाकार के गीत में महिलाओं को लेकर कोई अभद्र टिप्पणी थी।  संभव है देश के कुछ युवा लोग उसका नाम जानते हों पर पर सामान्य रूप से वह इतना प्रसिद्ध नहीं था।  प्रचार माध्यम उसके पीछे हाय हाय करके पड़ गये। बाद में उस गायक कलाकार ने दावा किया कि वह गीता उसका गाया हुआ ही नहीं है।  यह मामला थम गया पर उस गायक कलाकार का नाम तब तक सारा देश जान गया।  क्या इसमें कोई व्यवसायिक चालाकी थी, यह कहना कठिन है।

      प्रचार माध्यमों ने पीड़िता का नाम गुप्त रखने की कानूनी बाध्यता जमकर बखानी।  यह सही है कि दैहिक जबरदस्ती की शिकार का नाम नहीं दिया जाना चाहिये पर यह शर्त इसलिये डाली गयी है ताकि उसे भविष्य में सामाजिक अपमान का सामना न करना पड़े।  जिसका देहावसान हो गया हो उसके लिये फिर मान अपमान का प्रश्न ही कहां रह जाता है?  हां, उसके माता पिता के लिये थोड़ा परेशानी का कारण होता है पर दिल्ली में दरिंदों की शिकार उस बच्ची का नाम उसके पिता ने ही उजागर कर दिया है। इंटरनेट पर ट्विटर पर आई एक मेल में एक अखबार की चर्चा है जिसमें उसके पिता का बयान भी है।  हम नाम नहीं लिखते क्योंकि हमारा उद्देश्य किसी घटना में समाज के उन पहलुओं पर विचार करना होता है जिन्हें लोग अनदेखा कर देते हैं-नाम अगर सार्वजनिक हुआ हो तो भी नहीं लिखते।

      इधर हम देख रहे हैं कि सामूहिक दुष्कर्म पर अनेक लोग बयानबाजी कर रहे हैं।  हमें अफसोस होता है यह देखकर कि वह बच्ची तो अपने दुर्भाग्य का शिकार हो गयी पर उसे विषय बनाकर लोग जाने क्या क्या कर रहे हैं।  हमने पहले भी यह कहा था कि यह घटना आम घटनाओं से अलग है। कहीं न कहीं इसमें राज्य प्रबंध का दोष है। अब तो यह भी मानने है कि समाज का भी इसमें कम दोष नहीं। लड़की के साथ जो लड़का था वह बच गया और उसके जो बयान आये हैं वह दूसरा पक्ष भी रख रहे हैं।  वह उसे दुर्भाग्यशाली बच्ची ने दरिंदों की क्रुरता तो झेली ही सज्जनों की उपेक्षा को भी झेला।  लड़की साथ वाले लड़के के अनुसार वह घायलवास्था में  सड़क पर पड़े आते जाते लोगों से मदद की याचना करता रहा पर लोग देखकर जाते रहे।  दुर्जनों की सक्रियता और सज्जनों की निष्क्रियता दोनों को उन दोनों ने जो रूप देखा वह हैरान करने वाला है।  उनकी उपेक्षा करने वाले मनुष्य थे कोई गाय या भैंस नहीं।

          इस  पर एक वाक्य याद आ रहा है। हमें पता नहीं किसी फिल्म में था या कहीं पढ़ा है।  इसमें एक धर्म विशेष को लेकर कहा गया कि ‘………धर्म हमें या तो आतंकवादी बनाता है या फिर बेबस’!

    यह वाकया देखकर हमें लग रहा है कि नाम से पहचाने जाने वाले सारे धर्मो की स्थिति यही है।  जहां तक भारतीय अध्यात्म का प्रश्न है वह पवित्र आचरण तथा अच्छे व्यवहार को ही धर्म मानता है।  श्रीमद्भागवत गीता में धर्म का कोई नाम नहीं बल्कि आचरण से उसे जोड़ा गया है।  कष्टकारक बात यह है कि श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ने  का दावा करने वाले लोग यह मानते है कि वह महाज्ञानी हो गये और फिर वह उसकी व्याख्या मनमाने तरीके से करते हैं। उससे भी ज्यादा हैरान यह बात करती है कि जिन लोगों का यह दावा कि वह भारतीय धर्मो की समझ रखते हैं वही ऐसी बातें करते हैं जिनका सिर पैर नहीं होता।

    सामूहिक दुष्कर्म की घटना में वास्तविक रूप से क्या हुआ, यह तो वह लड़का भी एकदम पूरी तरह से नहीं बता सकता जो उस समय लड़की के साथ था।  अपने ऊपर वार होने की वजह से वह घायल होकर अपनी सुधबुध खो बैठा था  हालांकि पूरे हादसे के समय वह उस पीड़ा झेल रहा था। ऐसे में यह कहना कि उस लड़की को यह करना चाहिये था यह वह करना चाहिए था यह हास्यास्पद है।  इस घटना के परिप्रेक्ष्य में संपूर्ण समाज की स्थिति में देखना भी ठीक नहीं है।  जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा के आधार पर अपराध और पीड़ित को देखने वाले केवल दुर्भाग्यशाली पीड़िता के नाम के साथ अन्याय कर रहे हैं।  यह सच है कि मनुष्य एक शक्तिशाली जीव है पर भाग्य का अपना रूप है।  एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर जो लोग टिप्पणी कर रहे हैं उनका मुख्य उद्देश्य पर्दे पर अपना चेहरा और कागजों पर नाम चमकते देखने के अलावा कुछ नहीं है।  उनको ऐसा लगता है कि अगर हमने इस पर कुछ नहीं बोला तो प्रचार युद्ध में हम अपने प्रतिद्वंद्वियों से  पिछड़ जायेंगे।  फिर हम प्रचार माध्यमों की तरफ देखते हैं कि अगर उनके पास सनसनी पूर्ण समाचार और विवादास्पद बहसें नहीं होंगी तो उनके विज्ञापन का समय कैसे पास होगा।  बाज़ार के पास प्रचार है तो बोलने वाले बुत भी हैं। यह बुत अपना मुख प्रचार के भोंपुओं की तरफ हमेशा किये खड़े रहते हैं, मानो कह रहे हों कि ‘बोल बाज़ार।’

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप

ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

 

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क्या अन्ना हजारे जैसी छवि अरविन्द केजरीवाल बना पाएंगे-हिंदी लेख


         अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान जो अपनी छवि बनायी वह अब फीकी हो गयी लगती है । नहीं हुई तो हो जायेगी।  अब उनकी जगह स्वाभाविक रूप से अरविंद केजरीवाल उन लोगों के नायक होंगे जिन्होंने कथित रूप से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन प्रारंभ किया था। अन्ना हजारे कह जरूर रहे हैं कि उनका आंदोलन दो भागों में बंट गया है पर सच बात तो यह कि वह उस बड़े आंदोलन से स्वयं बाहर हो गये हैं जो अरविंद केजरीवाल ने प्रारंभ किया था। यह आंदोलन छोटे रूप में प्रारंभ हुआ पर पहले बाबा रामदेव और फिर बाद के अन्ना हजारे की वजह से बृहद आकार ले गया।
एक बात तय रही अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों के बिना अन्ना हजारे राष्ट्रीय छवि नहीं बना सकते थे क्योंकि उनके पहले के सारे आंदोलन महाराष्ट्र में शुरु होकर वहीं खत्म हो गये थे।  उनकी छवि एक प्रादेशिक गांधीवादी छवि की थी।
         जब भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लक्ष्य नहीं मिला तो एक राजनीतिक दल बनाने का फैसला हुआ। अन्ना हमेंशा ही  ‘‘मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा’’, ‘‘ रातनीतिक दल नहीं बनाऊंगा’’ और  किसी का चुनाव प्रचार नहीं करूंगा’’ तथा अन्या वाक्यांश दोहराते रहे। इसी दौरान उन्होंने चुनाव में ईमानदार प्रत्याशियों का समर्थन करने की बात कही थी।  ऐसे में अरविंद केजरीवाल और अन्य साथियों के राजनीतिक दल बनाने के फैसले से किनारा करना भले ही वह सिद्धांतों से जोड़े पर हम जैसे आम लेखक जानते हैं कि इस देश में बिना किसी चालाकी के सार्वजनिक प्रचार नहीं मिलता।   इस देश में पेशेवर आंदोलनकारियों का एक समूह सक्रिय रहा है जो कथित रूप से जनहित के लिये कार्यरत रहने का दावा करता है पर कहीं न कहीं वह ऐसे लोगों से धन लेकर यह काम करता है जो चाहते हैं कि समाज के असंतोष को कोई उग्र रूप न मिले इसलिये अहिंसक आंदोलन चलते रहें।  कहने का अभिप्राय यह है कि यह पेशेवर आंदोलनकारी आमजन और शिखर पुरुषों के बीच शोषण और अंसतोष के बीच युद्धविराम रखने के लिये टाईमपास की तरह मौजूद रहते हैं।  हवा में लाठियां भांजते हैं।  देश की समस्याओं की दुहाई देकर बताते हैं कि भ्रष्टाचार नाम का एक राक्षस है जिसका कोई न नाम है न रूप है पर अपना दुष्प्रभाव हम पर डाल रहा है।  परेशानहाल लोग उनकी शरण लेते हैं। अखबारों के खूब खबर छपती है। नतीजा ढाक के तीन पात।
       हमें यह तो मालुम था कि एक दिन अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल की टीम अलग अलग हो जायेंगे पर किस तरह होंगे यह ज्ञान नहीं था।  अन्ना हजारे ने  पूरे दो साल का टाईम पास किया। अखबारों को पृष्ठ रंगने का अवसर मिला तो टीवी चैनल वालों ने भी विज्ञापन का समय खूब पास किया।  ऐसे में अन्ना हजारे ने पैकअप कर लिया।  अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल की जोड़ी लंबे समय की साथी नहीं थी।  इसको लेकर हमारे विचारों के कई दृष्टिकोण हैं।  विस्तार से लिखना तो मुश्किल है पर क्षेत्रीय, भाषाई तथा व्यवहार शैली की भिन्नता है।  फिर अन्ना केजरीवाल ने अपनी लड़ाई एक आम आदमी के रूप में प्रारंभ की थी और अन्ना हजारे  भारत के अन्य शिखर पुरुषों की तरह  अपनी इस आदत को नहीं छोड़ सकते थे कि किसी आम आदमी को बिना किसी आधार के उच्च शिखर पर पहुंचने दिया जाये।  एक आम आदमी का महत्वांकाक्षी होना ऐसे शिखर पुरुषो की दृष्टि में महापाप है।
      अपने एक ब्लॉग पर इस लेखक ने लिखा था कि अन्ना टीम को अपने राजनीतिक दल के नाम में अन्ना हजारे का नाम जरूर रखना चाहिए।  उनकी फोटो भी साथ रखें।  लगता है कि किसी ने यह लेख पढ़ा होगा और अन्ना हजारे साहब को बताया होगा कि इस तरह अरविंद केजरीवाल और उनका पूरा भारत के प्रचार शिखर पर पहुंच जायेगा।  अन्ना साहब ने कोई सार्वजनिक पद न लेने की कसम खाई है ऐसे में राजनीतिक दल का शिखर पद अरविंद केजरीवाल को ही मिलना था।  यही उन्हें स्वीकार नहीं रहा होगा।  अन्ना अब आंदोलन को जारी रखेंगे।  अब उनके उस आंदोलन में नयी पीढ़ी के  लोग कितनी  रुचि लेंगे यह कह सकना कठिन है।  अब तो नयी पीढ़ी के आंदोलनाकरियों के लिये संभवतः अरविंद केजरीवाल ही एक सहारा बचते दिख रहे हैं।  एक बात साफ बता दें कि यह देश समाज हितैषी योद्धाओं का सम्मान करता है न कि पेशेवर आंदोलनकारियों का।  योद्धा अपने अभियान को समय के अनुसार बदलकर चलते जाते हैं और पेशेवर आंदोलनकारी अपने आंदोलन को एक जगह टांग कर जमीन पर बैठे रहते हैं।   टीवी और अखबार में प्रचार प्राप्त करना ही उनका लक्ष्य रहता है। जहां तक जनहित का सवाल है तो ऐसा कोई भी आंदोलन इस देश के इतिहास में दर्ज नहीं मिलता जिसने समाज की धारा बदली हो।
       हम जैसे आम लोगों के लिये अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे एक ही समान हैं।  अन्ना हजारे अगर अपने आंदोलन की दुकान बंद कर चले गये तो अभी अरविंद केजरीवाल और उनके साथी तो बचे हैं।  यदि यह वाकई सामाजिक योद्धा हैं तो अपने अभियान को राजनीतिक दल में परिवर्तित कर आगे बढ़ेंगे और पेशवर आंदोलनकारी हैं तो उनके लिये भी तर्क तैयार है कि हम क्या करें अन्ना ही साथ छोड़ गये।
          अब राजनीतिक दल बनाने के समर्थक लोगों के पास बस एक ही रास्ता है कि वह अरविंद केजरीवाल की छवि को उभारें।  इस कदर कि अन्ना हजारे की छवि ढंक जाये।  अन्ना हजारे की स्थिति तो यह है कि उनके विरोधी भी अब उनका नाम नहीं लेते और लोकतंत्र में यही बुरी बात है। लोकतंत्र में विरोधी होना ही सशक्त होने का प्रमाण है।  अन्ना के विरोधियों ने उन पर आत्मप्रचार के लिये आंदोलन चलाने का आरोप लगाया था और पीछे हटते अन्ना उसे पुष्ट कर गये।  एक जनलोकपाल बनने से देश में भ्रष्टाचार मिट जायेगा अन्ना साहब ने यह  सपना  दिखाया था।  इस जनलोकपाल का जो स्वरूप अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने बनाया वह बनना अब दूर है। आखिरी सलाह अरविंद केजरीवाल को कि वह अब अन्ना हजारे की छवि से दूर होते जायें।  उनकी छवि जो जनता में बनी थी वह अब नहंी रही।  जो नयी पीढ़ी के लोग अन्ना हजारे के पीछे थे वह अब उनके पीछे आयेंगे बशर्ते वह अपने अभियान में निरंतरता बनाये रखें।  इतना ही नहीं अब अन्ना हजारे का नाम लेना या फोटो छापना उनके सहयोगियों के प्रयासों पर विपरीत असर भी डाल सकता है। एक बात याद रखें कि आगे बढ़ते योद्धा को यहां समाज आंखों के बिठा लेता है और पीछे हटने पर वह उससे चिढ़ भी जाता है।   अन्ना हजारे दृढ़ व्यक्तित्तव के स्वामी हैं इस पर यकीन नहीं किया जा सकता क्योंकि वह अपनी कई बातों से जिस तरह पीछे हटे हैं उससे लगता है कि उनका कोई सलाहकार समूह है जो उनको जैसा कहता है वैसा करते हैं। अन्ना हजारे सरल हैं यह बात निसंदेह सत्य है इसलिये उन्होंने अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों को अपने कथित आंदोलन के मंचों पर आने से मना किया है। इससे लगता है कि वह नहीं चाहते कि अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों की छवि कहीं आहत हो।  आजकल लोकतंत्र में प्रचार का महत्व है और केजरीवाल एंड कंपनी के लिये अन्ना हजारे का नाम लेना या उनसे जुड़ना उनकी छवि खराब होने की संभावनाऐं बढ़ा भी सकती है। बाकी भविष्य के गर्भ में क्या है देखेंगे हम लोग। अन्ना हजारे अब प्रचार परिदृश्य से गायब हो जायेंगे तो उनकी जगह लेने की संभावना अरविंद केजरीवाल की हो सकती है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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राजनीति में संधाय आसन की प्रासंगिकता-हिंदी लेख


                बाबा रामदेव ने फिर अपना आंदोलन प्रारंभ किया है।  उन्होंने तारीख चुनी है नौ अगस्त जिस दिन स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारत अंग्रेजों का नारा बुलंद किया गया था।  मूलतः बाबा रामदेव एक योग शिक्षक हैं यह अलग बात है कि उन्होंने अपने व्यवसायिक प्रयासों ने भारतीय योग विद्या को जिस तरह प्रचार माध्यमों में प्रतिष्ठित किया उससे उनके भक्त उनमें देवत्व के दर्शन करते हैं।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनके योग प्रचार की क्षमताओं को कोई चुनौती नहीं देता।  देना चाहिए भी नहीं क्योंकि उन्होंने जो किया है वह आसानी से नहीं किया जा सकता।

योगासन और प्राणायाम से मनुष्य के अंदर जिस मनुष्यत्व की स्थापना स्वतः होती है उसका अनुभव तो केवल गुरु और उनके साधक ही कर सकते हैं। इसमें संदेह नहीं है मगर इसका आशय यह कतई नहीं है कि योग साधक या गुरु मनुष्यत्व में ज्ञान तत्व की स्थापना कर सकें।  हमारे देश में एक बात देखी जाती है कि लोग हर विषय में ज्ञानी होने का दावा करते हैं। स्थिति यह है कि कोई भी किसी भी व्यवसाय में कूद जाता है।  अगर कोई सार्वजनिक महत्व का काम हो तो सभी अपना महत्व सिद्ध करने  लगते हैं।  खासतौर से जब ज्ञान की बात हो तो प्राचीन ग्रंथों से पढ़ी बात को कोई भी सुना सकता है।

बाबा रामदेव आष्टांग योग में आसन और प्राणायाम में सिद्ध हस्त हैं पर जिस तरह वह जिस सामाजिक अभियान को चला रहे हैं उसके लिये राजनीति शास्त्र का ज्ञान होना आवश्यक है।  वही क्या हमारा मानना है कि राजनीति में आने वाले हर व्यक्ति को राजनीति शास्त्र का ज्ञान होना चाहिए।  हमारे यहां पद प्राप्ति को ही राजनीतिक लक्ष्य और उपलब्धि माना जाता है। इतना ही नहीं जो बरसों से पदासीन रहे उसे चाणक्य तक कहा जाता है।  राज्य में पद प्राप्त करने वाले की प्रजा के प्रति जो जिम्मेदारी होती है और उसका निर्वाह करने के लिये जो तरीके हैं उसका ज्ञान कितनों को होता है यह अलग से विचार का विषय है।

बाबा रामदेव के बारे में हमारी धारणा है कि उनके अंदर किसी सामान्य मनुष्य की अपेक्षा अधिक दैहिक तथा मानसिक शक्ति है जो योग साधना का परिणाम है।  इस शक्ति का उपयोग करने के लिये जिस ज्ञान की आवश्यकता होती है उसमें अवश्य संदेह होता है।  इसके लिये आवश्यक होता है संबंधित विषय का ज्ञान होना और बाबा रामदेव राजनीति शास्त्र के अध्ययन के बिना राष्ट्रहित का आंदोलन चलाने निकल पड़े हैं।

इस बार के आंदोलन में उनका ध्येय अस्पष्ट है।  तेवर ढीले हैं।  अन्ना हजारे के साथ उन्होंने कुछ ही दिन पहले संयुक्त रूप से पत्रकार वार्ता की थी उसमें दोनों ने साथ साथ रहने की कसम खाई थी।  अन्ना हजारे अपना आंदोलन बीच में खत्म कर अपने गांव वापस चले गये।  उन्होंने जिस तरह अपना आंदोलन खत्म किया वह अत्यंत निराशाजनक था।  हमारे जैसे निष्पक्ष आम लेखकों का मानना है कि अन्ना हजारे हों या स्वामी रामदेव इन दोनों के राष्ट्र सुधार के लिये किये गये आंदोलन केवल प्रचार माध्यमों के सहारे ही लंबे चले।  तब दोनों आंदोलनों के समाचारों और बहसों के बीच हर मिनट में विज्ञापन के दर्शन होते थे।  चूंकि आंदोलन गंभीर मुद्दों पर सतही योजना पर आधारित रहे हैं इसलिये लोगों की इनमें दिलचस्पी अधिक नहीं रही।  यही कारण है कि अब प्रचार माध्यम इनसे दूरी बना रहे हैं क्योंकि उनके प्रबंधकों को नहीं लगता कि दिन भर इनके सहारे विज्ञापनों का समय पास किया जा सकता है।

बहरहाल बाबा रामदेव दिल्ली के रामलीला मैदान में जो आंदोलन कर रहे हैं उसमें वह संधाय आसन करते हुए दिख रहे हें

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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अरेश्व विजिगीषोश्व विग्रहे हीयामानयोः।

सन्धाय यदवस्थानं सन्धायान्मुच्यते।।

हिन्दी में भावार्थ- जब दोनों शत्रु युद्ध में हीन हो उस समय मिल बैठ रहने को संधाय आसन कहते हैं।

पहले जब वह अनशन पर बैठे थे तब विदेशों में जमा भारत के  काले धन को देश में लाने के मुद्दे पर जमकर गरजे थे।  उनके शत्रु कौन है यह तो पता नहीं पर काले धन को लेकर वह जब आक्रामक रवैया अपनाये हुए थे तब लग रहा था कि  पर्दे के पीछे कोई न कोई शत्रु है जिससे वह ललकार रहे हैं।  विदेशों में काला धन रखने वालों को उन्होंने राष्ट्र का शत्रु तक घोषित कर दिया था। इतना ही नहीं उन्होंने उनके नाम तक अपने पास होने का दावा करते हुए कहा था कि समय आने पर बता दूंगा।  इस बार वह केवल हवा में अपनी बातें उछाल रहे हैं।  हम किसी के विरोधी नहीं है।  हमारा कोई शत्रु नहीं है।  आदि आदि मीठी बातें करते हुए वह ऐसे लगते हैं जैसे कि सामने बैठी भीड़ की बजाय कहीं दूर बैठे अज्ञात लोगों को प्रसन्न कर रहे हैं।

बाबा रामदेव के  विरुद्ध कोई बड़ी कार्यवाही की संभावना भी नहीं लगती। ऐसा लगता है कि पर्दे के पीछे विराजमान उनके शत्रु भी अब शांत हो गये हैं।  कम से कम अभी तक बाबा रामदेव ऐसे लग रहे हैं कि जैसे कि खानापूरी करने आये हों और उनके अभियान से किसी को डरने की आवश्यकता नहीं है।  बाबा रामदेव को शायद पता नहीं होगा  आसनों के प्रकार पतंजलि योग में कहीं नहीं बताये गये पर के कौटिल्य महाराज ने अपने शास्त्र में अनेक आसनों का जिक्र किया है।  उनसे यह भी पता चलता है कि बैठने या उठने के ही आसन नहीं होते बल्कि मनुष्य की मानसिक तथा शारीरिक क्रियाओं के साथ ही व्यवहार के भी आसन होते हैं।  रामलीला मैदान में आंदोलन समाप्त होने के बाद वह आपस में द्वंद्वरत लोगों को हिंसा की बजाय संधाय आसन करने की प्रेरणा दे सकते हैं ताकि देश में मैत्रीवत भावना का विकास हो।

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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निर्मल बाबा के समागमों के प्रचार का डर किसको था-हिन्दी लेख (hindi lekh and article on nirmal baba sawagam)


            निर्मल बाबा का प्रचार कम हो गया है। उनके समागमों का तूफानी गति से चलने वाला विज्ञापन अब अनेक चैनलों में दिखाई नहीं देता है। उनके बारे में कहा गया कि वह समाज में अंधविश्वास फैला रहे हैं। लोगों को उनकी समस्याओं के निराकरण के लिये आईस्क्रीम, रसगुल्ले और समौसा खाने के इलाज बता कर पैसा वसूल कर रहे हैं। सच बात तो यह है कि निर्मल बाबा का प्रचार केवल उनके विज्ञापनों के कारण हो रहा था जिसके लिये वह सभी हिन्दी समाचार चैनलों को भारी भुगतान कर रहे थे। मतलब यह कि उनका प्रचार स्वप्रायोजित होने के साथ अतिरेक से परिपूर्ण था। अचानक ही हिन्दी समाचार चैनलों को लगा कि निर्मल बाबा तो अंधविश्वास फैला रहे हैं तो उन्होंने उनके विरुद्ध प्रचार शुरु किया। लंबे समय तक यह चैनल विरोधाभास में सांस लेते रहे। एक तरफ निर्मल बाबा का विज्ञापन चल रहा था तो दूसरी तरफ चैनल वाले अपना समय खर्च कर उस पर बहस कर रहे थे-यह अलग बात है कि उस समय भी निर्मल बाबा के खलनायक साबित करते हुए वह दूसरे विज्ञापन चला कर पैसा वसूल कर रहे थे। निर्मल बाबा को अंधविश्वास का प्रवर्तक बताकर इन चैनलों ने अपने ही प्रायोजित बुद्धिजीवियों से बहस कराकर व्यवसायिक सिद्धांतों के प्रतिकूल जाने का साहस करते हुए उनमें भी अतिरेक से पूर्ण सामग्री प्रस्तुत की।

              बहरहाल निर्मल बाबा का जलवा कम हो गया है और यह सब उन हिन्दी समाचार चैनलों की वजह से ही हुआ है जिन्होंने विज्ञापन लेते समय केवल अपना लाभ देखा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन टीवी चैनलों ने वास्तव में क्या कोई समाज के प्रति भक्ति दिखाते हुए निर्मल बाबा के विरुद्ध दुष्प्रचार कर कोई साहस का काम किया है या फिर निर्मल बाबा के प्रचार से मिलने वाले धन से अधिक कहीं उनकी हानि हो रही थी जिससे वह घबड़ा गये थे। इसी वजह से समाज को जाग्रत करने के लिये कथित रूप से अभियान छेड़ दिया था। 

           निर्मल बाबा पिछले कई महीनों से छाये हुए थे। हमने देखा कि उनकी चर्चा सार्वजनिक स्थानों पर होने लगी थी। स्थिति यह थी कि देश के ज्वलंत राजनीतिक विषयों से अधिक लोग निर्मल बाबा की चर्चा करने लगे थे। महंगाई और मिलावट से परेशान समाज के लिये निर्मल बाबा का समागम एक मन बहलाने वाला साधन बन गया था। देखने वालों की संख्या बहुत थी पर इसका मतलब यह कतई नहीं लिया जाना चाहिए कि सभी उनके शिष्य बन गये थे। फिर हम यह भी देख रहे थे महंगाई, बेरोजगारी, दहेजप्रथा तथा पारिवारिक वातावरण की प्रतिकूलता से परेशान लोगों की संख्या समाज में गुणात्मक रूप से बढ़ी है जिससे लोग राहत पाने के लिये इधर उधर ताक रहे थे। ऐसे में हर चैनल पर छाये हुए निर्मल बाबा की तरफ अगर एक बहुत दर्शक वर्ग आकर्षित हुआ तो उसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं थी। इससे हमारे देश के बुद्धिजीवियों को कोई परेशानी भी नहीं थी मगर समस्या यह थी कि टीवी का एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग केवल निर्मलबाबा के समसमों की तरफ खिंच गया था। उस दौरान आईपीएल जैसी क्रिकेट प्रतियोगिता तथा टीवी के यस बॉस कार्यक्रम की चर्चा सार्वजनिक स्थानों से गायब हो गयी थी। निर्मल बाबा ने चैनलों से अपने समागमों के विज्ञापन का समय भी इस तरह लिया था कि वह एक न एक चैनल पर आते ही थे। स्थिति यह लग रही थी कि लोग चैनलों पर उन समागमों के प्रसारण का समय इस तरह याद रखते थे जैसे कि सारे चैनल ही निर्मलबाबा के खरीदे हुए हों। हमारा अनुमान तो यह है कि निर्मल बाबा से मिलने वाले आर्थिक लाभ से कहीं उनको अपने अन्य प्रसारणों पर हानि होने का डर था। उनके अन्य कार्यक्रम की लोकप्रियता इस कदर गिरी होगी कि उनके विज्ञापनादाताओं को लगा होगा कि वह बेकार का खर्च रहे हैं। प्रचार प्रबंधकों से स्पष्ट कहा होगा कि वह या तो निर्मल बाबा का विज्ञापन प्रसारित करें या हमारे लिये दर्शक बचायें। 

            हमने निर्मल बाबा के कार्यक्रंम देखे थे। हमारे अंदर केवल मनोरंजन का भाव रहता था। अगर अंधविश्वास की बात की जाये तो हिन्दी चैनल वाले स्वयं ही अनेक तरह के ऐसे प्रसारण कर रहे हैं जो विश्वास और आस्था की परिधि में नहीं आते। निर्मल बाबा को कोई सुझाव हमारे दिमाग में नहीं आता था। देखा और भूल गये। दरअसल इस विषय पर बहुत पहले लिखना था पर समय और हालातों ने रोक लिया। एक योगसाधक और गीता पाठक होने के नाते हमें पता है कि कोई भी मनुष्य अपने अध्यात्मिक ज्ञान के बिना इस संसार में सहजता से संास नहीं ले सकता। संसार के विषयों में लिप्त आदमी सोचता है कि मैं कर्ता हूं यही से उसक भ्रम प्रारंभ होता है जो अंततः उसे अंधविश्वासों की तरफ ले जाता है। संसार के काम समय के अनुसार स्वतः होते हैं और उनके लिये अधिक सोचना अपनी सेहत और दिमाग खराब करना है।

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

 

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