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डॉलर से इश्क-हिन्दी व्यंग्य कविता (love and dollar-hindi comic poem)


सच्चा प्यार जो दिल से मिले
अब कहां मिलता है,
अब तो वह डालरों में बिकता है।
आशिक हो मालामाल
माशुका हो खूबसूरत तो
दिल से दिल जरूर मिलता है।
———-
आज के शायर गा रहे हैं
इश्क पर लिखे पुराने शायरों के कलाम,
लिखने के जिनके बाद
गुज़र गयी सदियां
पता नहीं कितनी बीती सुबह और शाम।
बताते हैं वह कि
इश्क नहीं देखता देस और परदेस
बना देता है आदमी को दीवाना,
देना नहीं उसे कोई ताना,
तरस आता है उनके बयानों पर,
ढूंढते हैं अमन जाकर मयखानों पर,
जिस इश्क की गालिब सुना गये
वह दिल से नहीं होता,
डालरों से करे आशिक जो
माशुका को सराबोर
उसी से प्यार होता,
क्यों पाक रिश्ते ढूंढ रह हो
आजकल के इश्क में
होता है जो रोज यहां नीलाम।
———-

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
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फसाद और सुलह.हिन्दी व्यंग्य कविता


अपने यकीन को ताकतवर कहने वाले
तलवारों को चौराहे पर नचाते हैं।
अमनपसंद होने का दावा करते वह लोग
जो इशारों से खून बहाते हैं।
सच यह है कि देते हैं जमाने को नसीहत
अपने को फरिश्ते दिखने की खातिर
पहले कराते हैं फसाद
फिर सुलह कराने जाते हैं।
———————
पर्दे के बाहर आता औरत का चेहरा
उनको बहुत डराता है,
बयान न करे आदमी की हकीकत
यह ख्याल उनको डराता है।
इसलिये किताबों में छपे पुराने बयान को
रोज करते है सुनाकर ताजा,
कभी इस धरती पर पैदा न हुए अपने फरिश्ते को
जताते दुनिया का राजा,
उसकी नसीहतों का हमेशा बजाते बाजा,
असलियत न आ जाये परदे से कभी बाहर
इस सोच से ही उनका दिल घबड़ाता है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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इश्क होता है जो रोज यहां नीलाम–हिन्दी हास्य व्यंग्य कविता


सच्चा प्यार जो दिल से मिले
अब कहां मिलता है,
अब तो वह डालरों में बिकता है।
आशिक हो मालामाल
माशुका हो खूबसूरत तो
दिल से दिल जरूर मिलता है।
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आज के शायर गा रहे हैं
इश्क पर लिखे पुराने शायरों के कलाम,
लिखने के जिनके बाद
गुज़र गयी सदियां
पता नहीं कितनी बीती सुबह और शाम।
बताते हैं वह कि
इश्क नहीं देखता देस और परदेस
बना देता है आदमी को दीवाना,
देना नहीं उसे कोई ताना,
तरस आता है उनके बयानों पर,
ढूंढते हैं अमन जाकर मयखानों पर,
जिस इश्क की गालिब सुना गये
वह दिल से नहीं होता,
डालरों से करे आशिक जो
माशुका को सराबोर
उसी से प्यार होता,
क्यों पाक रिश्ते ढूंढ रह हो
आजकल के इश्क में
होता है जो रोज यहां नीलाम।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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बाजार में सजे हैं ख्वाब-हिन्दी शायरी


बाजार में सजे हैं ढेर सारे ख्वाब
पैसे से ही खरीदे जायेंगे।
एक के साथ एक मुफ्त के दावे
हर शय के दाम में ही छिपे पायेंगे।
एक बार जेब से पैसा निकला
तब ख्वाब हकीकत बनेंगे
शयों के कबाड़ हो जाने पर
दर्द दुगुना बढ़ायेंगे।
———-
इतना तेज मत दौड़ो कि
खुद ही हांफने लगें।
हवस और ख्वाबों की भूख कभी नहीं मिटती,
दौलतमंदों की चालें कभी नहीं पिटती,
अपनी औकात पहचानकर
खुली आंखों से उतने ही देखो सपने
जो पूरे होते लगें।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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खिलाड़ी आशिक, माशुका अभिनेत्री-हास्य कविता (khiladi ashiq, mashuka abhinetri-hasya kavita im hindi)


आशिक जूझ रहा था
क्रिकेट खिलाड़ी बनने के लिये
तो माशुका भी खड़ी थी
फिल्म अभिनेत्री बनने की पंक्ति में
कई उसने साक्षात्कार भी दिये।
बढ़ते जा रहे थे दोनों के कदम
इश्क के साथ
अपने लक्ष्य की तरफ भी सफलता के लिये।
पर आशिक की चिंतायें बढ़ रही थी
रौशन करना चाहता था वह अब
अपने घर में ही इश्क के दिए।
वह बोला माशुका से
‘अब तो मैं नामी खिलाड़ी बनने जा रहा हूं,
अपने रनों और विकेटों की बरसात में नहा रहा हूं,
पर डरता हूं
तुम्हारे और मेरे इश्क का क्या होगा
कहीं बिछड़ न जाये,
आओ अपना घर बसायें,
अपने अमर प्रेम के लिये।’
सुनकर बोली माशुका
‘क्यों घबड़ाते हो,
मैं भी सैट पर नृत्य करती हूं
जब तुम मैदान में रन बनाते होे,
हमारा बिछड़ना अब संभव नहीं,
फिल्म और क्रिकेट का
घालमेल हो गया है हर कहीं,
जब तुम नामी खिलाड़ी हो जाओगे,
मुझे भी बड़ी अभिनेत्री की तरह पाओगे,
कभी न कभी तुम्हारी भी लगेगी नीलाम बोली,
कोई टीम मैं भी खरीदूंगी
जिसमें समायेगी तुम्हारी भी टोली,
वैसे क्या रखा है दूल्हे की तरह बिकने में,
मजा है बिकाऊ क्रिकेट खिलाड़ी दिखने में,
दहेज का शब्द हो गया है बदनाम,
नीलामी में दूंगी तुम्हें ढेर सारे इनाम,
माल तो अपने ही घर आयेगा,
हर कोई देखकर जल जायेगा,
इश्क बाजी में कीर्तिमान बनाकर रख देंगे
आने वाली पीढ़ी के लिये।
लोग गायेंगे इश्क के साथ हमारी
दौलत के भी गीत,
नहीं देखी होगी किसी ने ऐसी प्रीत,
अभी घर संसार बनाकर
गुमनामी के अंधेरे में खोकर जिये
तो फिर क्या खाक जिये।’

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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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