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इन्टरनेट के प्रयोग से होने वाले दोषों से बचाती है योग साधना-हिंदी आलेख


कुछ समाचारों के अनुसार इंटरनेट पर अधिक काम करना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। इंटरनेट का संबंध कंप्यूटर से ही है जिसके उपयोग से वैसे भी अनेक बीमारियां पैदा होती हैं। एक खबर के अनुसार कंप्यूटर पर काम करने वालों में विटामिन डी की कमी हो जाती है इसलिये लोगों को धूप का सेवन अवश्य करना चाहिये। अगर इन खबरों का विश्लेषण करें तो उनसे यही निष्कर्ष निकलता है कि कंप्यूटर और इंटरनेट के अधिक प्रयोग से ही शारीरिक और मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं। इसके अलावा इनके उपयोग के समय अपने आपको अनावश्यक रूप से थकाने के साथ ही अपनी शारीरिक तथामानसिक स्थिति पर पर्याप्त ध्यान न देना बहुत तकलीफदेह यह होता है। सच बात तो यह है कि इंटरनेट तथा कंप्यूटर पर काम करने वालों के पास उससे होने वाली शारीरिक और मानसिक व्याधियों से बचने का एकमात्र उपाय योग साधना के अलावा अन्य कोई उपाय नज़र नहीं आता।
दरअसल कंप्यूटर के साथ अन्य प्रकार की शारीरिक तथा मानसिक सावधानियां रखने के नुस्खे पहले बहुत पढ़ने को मिलते थे पर आजकल कहीं दिखाई नहीं देते । कुछ हमारी स्मृति में हैें, जो इस प्रकार हैं-
कंप्यूटर पर बीस मिनट काम करने के बाद विश्राम लें। पानी अवश्य पीते रहें। खाने में नियमित रूप से आहार लेते रहें। पानी पीते हुए मुंह में भरकर आंखों पर पानी के छींटे अवश्य मारें। अगर कंप्यूटर कक्ष से बाहर नहीं आ सकें तो हर बीस मिनट बार अपनी कुर्सी पर ही दो मिनट आंख बंद कर बैठ जायें-इसे आप ध्यान भी कह सकते हैं। काम खत्म करने पर बाहर आकर आकाश की तरफ जरूर अपनी आंखें केंद्रित करें ताकि संकीर्ण दायरे में काम कर रही आंखें व्यापक दृश्य देख सकें।
दरअसल हम भारतीयों में अधिकतर नयी आधुनिक वस्तुओं के उपयोग की भावना इतनी प्रबल रहती है कि हम अपने शरीर की सावधनी रखना फालतु का विषय समझते हैं। जहां तक बीमारियों का सवाल है तो वह शराब, सिगरेट और मांस के सेवन से भी पैदा होती हैं इसलिये इंटरनेटर और कंप्यूटर की बीमारियों से इतना भय खाने की आवश्यकता नहीं है मगर पर्याप्त सावधानी जरूर रखना चाहिए।
इंटरनेट और कंप्यूटर पर काम करने वाले हमारे देश में दो तरह लोग हैं। एक तो वह है जो शौकिया इससे जुड़े हैं और दूसरे जिनको इससे व्यवसायिक बाध्यता ने पकड़ा है। जो शौकिया है उनके लिये तो यह संभव है कि वह सावधानी रखते हुए काम करें-हालांकि उनके मनोरंजन की प्यास इतनी गहरी होती है कि वह इसे समझेंगे नहीं-पर जिनको नौकरी या व्यवसाय के कारण कंप्यूटर या इंटरनेट चलाना है उनके स्थिति बहुत दयनीय होती है। दरअसल इंटरनेट और कंप्यूटर पर काम करते हुए आदमी की आंखें और दिमाग बुरी तरह थक जाती हैं। यह तकनीकी काम है पर इसमें काम करने वालों के साथ एक आम कर्मचारी की तरह व्यवहार किया जाता है। जहां कंप्यूटर या इंटरनेट पर काम करते एक लक्ष्य दिया जाता है वहां काम करने वालों के लिये यह भारी तनाव का कारण बनता है। दरअसल हमारे देश में जिनको कलम से अपने कर्मचारियेां को नियंत्रित करने की ताकत मिली है वह स्वयं कंप्यूटर पर काम करना अपने लिये वैसे ही हेय समझते हैं जैसे लिपिकीय कार्य को। वह जमीन गड़ढा खोदने वाले मजदूरो की तरह अपने आपरेटरों से व्यवहार करते हैं। शारीरिक श्रम करने वाले की बुद्धि सदैव सक्रिय रहती है इसलिये वह अपने साथ होने वाले अनाचार या बेईमानी का मुकाबला कर सकता है। हालांकि यह एक संभावना ही है कि उसमें साहस आ सकता है पर कंप्यूटर पर काम करने वाले के लिये दिमागी थकावट इतनी गहरी होती है कि उसकी प्रतिरोधक क्षमता काम के तत्काल बाद समाप्त ही हो जाती है। इसलिये जो लोग शौकिया कंप्यूटर और इंटरनेट से जुड़े हैं वह अपने घर या व्यवसाय में परेशानी होने पर इससे एकदम दूर हो जायें। जिनका यह व्यवसाय है वह भी अपने साइबर कैफे बंद कर घर बैठे या किसी निजी संस्थान में कार्यरत हैं तो पहले अवकाश लें और फिर तभी लौटें जब स्थिति सामान्य हो या उसका आश्वासन मिले। जब आपको लगता हो कि अब आपको दिमागी रूप से संघर्ष करना है तो तुरंत कीबोर्ड से हट जायें। घर, व्यवसाय या संस्थान में अपने विरोधी तत्वों के साथ जब तक अमन का यकीन न हो तब कंप्यूटर से दूर ही रहें ताकि आपके अंदर स्वाभाविक मस्तिष्कीय ऊर्जा बनी रहे।
कंप्यूटर पर लगातार माउस से काम करना भी अधिक थकाने वाला है। जिन लोगों को लेखन कार्य करना है अगर वह पहले कहीं कागज पर अपनी रचना लिखे और फिर इसे टाईप करें। इससे कंप्यूटर से भी दूरी बनी रहेगी दूसरे टाईप करते हुए आंखें कंप्यूटर पर अधिक देर नहंी रहेंगी। जो लेाग सीधे टाईप करते हैं वह आंखें बंद कर अपने दिमाग में विचार करते हुए टंकित करें।
वैसे गूगल के फायरफाक्स में बिना माउस के कंप्यूटर चलाया जा चलाया जा सकता है। जहां तक हो सके माउस का उपयोग कम से कम करें। वैसे भी बेहतर कंप्यूटर आपरेटर वही माना जाता है जो माउस का उपयोग कम से कम करता है।
कुछ लोगों का कहना है कि कंप्यूटर पर काम करने से आदमी का पेट बाहर निकल आता है क्योंकि उसमें से कुछ ऐसी किरणें निकलती हैं जिससे आपरेटर की चर्बी बढती है। इस पर थोड़ा कम यकीन आता है। दरअसल आदमी जब कंप्यूटर पर काम करता है तो वह घूमना फिरना कम कर देता है जिसकी वजह से उसकी चर्बी बढ़ने लगती है। अगर सुबह कोई नियमित रूप से घूमें तो उसकी चर्बी नही बढ़ेगी। यह अनुभव किया गया है कि कुछ लोगों को पेट कंप्यूटर पर काम करते हुए बढ़ गया पर अनेक लोग ऐसे हैं जो निरंतर काम करते हुए पतले बने हुए हैं।
आखिरी बात यह है कि कंप्यूटर पर काम करने वाले योगसाधना जरूर करें। प्राणायाम करते हुए उन्हेंइस बात की अनुभूति अवश्य होगी कि हमारे दिमाग की तरफ एक ठंडी हवा का प्रवाह हो रहा हैं। सुबह प्राणायाम करने से पूर्व तो कदापि कंप्यूटर पर न आयें। रात को कंप्यूटर पर अधिक देर काम करना अपनी देह के साथ खिलवाड़ करना ही है। सुबह जल्दी उठकर पहले जरूर पानी जमकर पियें और उसके बाद अनुलोम विलोम प्राणायाम निरंतर करंें। इससे पांव से लेकर सिर तक वायु और जल प्रवाहित होगा उससे अनेक प्रकार के विकार बाहर निकल आयेंगे। जब आप करेंगे तो आपको यह लगने लगेगा कि आपने एक दिन पूर्व जो हानि उठाई थी उसकी भरपाई हो गयी। यह नवीनता का अनुभव प्रतिदिन करेंगे। वैसे कंप्यूटर पर काम करते समय बीच बीच में आंखें बंद कर ध्यान अपनी भृकुटि पर केद्रित करें तो अनुभव होगा कि शरीर में राहत मिल रही है। अपने साथ काम करने वालों को यह बता दें कि यह आप अपने स्वास्थ्य के लिये कर रहे हैं वरना लोग हंसेंगे या सोचेंगे कि आप सो रहे हैं।
किसी की परवाह न करें क्योंकि सबसे बड़ी बात तो यह है कि जान है तो जहान हैं। भले ही इस लेख की बातें कुछ लोगों को हास्यप्रद लगें पर जब योगासन, ध्यान, प्राणायाम तथा मंत्रोच्चार-गायत्री मंत्र तथा शांति पाठ के सा ओम का जाप- करेंगे और प्रतिदिन नवीनता के बोध के साथ इंटरनेट या कंप्यूटर से खेलें्रगे तक इसकी गंभीरता का अनुभव होगा।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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आस्तिक, नास्तिक और स्वास्तिक- (हास्य व्यंग्य)


सच बात तो यह है कि दुनियां विश्वास के आधार पर तीन भागों में बंटी हुई हैं-आस्तिक,नास्तिक और स्वास्तिक। आस्तिक और नास्तिकों में बीच बरसों से संघर्ष चलता रहा है। एक कहता है कि इस दुनियां का संचालन करने वाला कोई सर्वशक्तिमान है-उसका नाम हर धर्म,भाषा,जाति और क्षेत्र में अलग है। दूसरा कहता है कि ऐसा कोई सर्वशक्तिमान नहीं है बल्कि यह दुनियां तो अपने आप चल रही है। इनसे परे होते हैं ‘स्वास्तिक’। हम भारत के अधिकतर लोग इसी श्रेणी में हैं और सर्वशक्तिमान के होने या न होने की बहस में समय जाया करना बेकार समझते हैं। इस मान्यता में वह लोग हैं जो मानते हैं कि वह तो अपने अंदर ही है और हम उस सर्वशक्तिमान को धारण करना हैं-बाहर उसका अस्तित्व ढूंढना समय जाया करना है। इसी श्रेणी में दो वर्ग हैं एक तो वह जो ज्ञानी हैं जो हमेशा इस बात को याद करते हैं और दूसरे सामान्य लोग हैं जो यह बात मानते तो हैं पर फिर भूले रहते हैं। ऐसे ही लोगों की संख्या अधिक हैं और आस्तिक और नास्तिक अपनी बहसों से उन्हेें बरगलाते रहते है।

अधिक संख्या होने के कारण एक स्वास्तिक दूसरे स्वास्तिक की इज्जत नहीं करता-यहां यह भी कह सकते हैं कि जिस वस्तु की मात्रा बाजार में अधिक होती है उसकी कीमत कम होती है। फिर अब तो विश्व में बाजार का बोलबाला है इसलिये समाज में चमकते हैं तो बस आस्तिक और नास्तिक। स्वास्तिक का किसी से कोई द्वंद्व नहीं होता इसलिये बाजार में नहीं बिकता। बाजार में केवल केवल विवाद बिकता है और आस्तिक और नास्तिक ही उसका निर्माण करते हैं।

आस्तिक चिल्ला चिल्ला कर कहते हैं कि ‘सर्वशक्तिमान है’ तो नास्तिक भी खड़ा होता है कि ‘सर्वशक्तिमान नहीं है’। भीड़ उनकी तरफ देखने लगती है। आस्तिक अपने हाथ में धार्मिक प्रतीक चिन्ह रख लेेते हैं। कपड़ों के रंग अपने धर्म के अनुसार
तय कर पहनते हैं। नास्तिक भी कम नहीं है और वह सर्वशक्तिमान का अस्तित्व नकार कर समाज-जिसका अस्तित्व केवल संज्ञा के रूप में ही है-को अपना कल्याण करने के लिये नारे लगाते हैं।

कहते हैं कि मनुष्य अपने मन, बुद्धि और अहंकार के वशीभूत होकर चलता है। चलने की यही मजबूरी नास्तिकों को किसी न किसी नास्तिक विचाराधारा से जुड़ने को विवश करती है।
आस्तिक धार्मिक कर्मकंाड करते हुए पूरे विश्व में कल्याण करने के लिये निकल पड़ते है। कोई पुस्तक और उसमें लिखे शब्दों को सीधे सर्वशक्तिमान के मुखारबिंद से निकला हुआ बताते हुए उसके अनुसार धार्मिक क्रियाओं के लिये सामान्य जन-स्वास्तिक श्रेणी के लोग- को प्रेरित करते हैं। जो ज्ञानी स्वास्तिक हैं वह तो बचे रहते हैं पर भुल्लकड़ उनके जाल में फंस जाते हैं। नास्तिक लोग उन्हीं पुस्तकों का मखौल उड़ाते हुए महिलाओं,बालकों,श्रमिकों,शोषितों और बूढ़े लोगों के वर्ग करते हुए उनके कल्याण के नारे लगाते हैं। कहीं कोई घटना हो उसका ठीकरा किसी विचाराधारा की पुस्तक पर फोड़ते है-खासतौर से जिनका उद्गम स्थल भारत ही है। वह क्ल्याण के लिये चिल्लाते हैं पर जब इसके लिये कोई काम करने की बात आती है तो कहते हैं कि यह हमारा काम नहीं बल्कि समाज और सरकार को करना चाहिए।
आस्तिक अपने धार्मिक कर्मकांड करते हुए नास्तिकों को कोसना नहीं भूलते। बरसों से चल रहा यह द्वंद्व कभी खत्म नहीं हो सकता। इसका कारण यह है कि स्वास्तिक लोग अगर सामान्य हैं तो उनको इस बहस में पड़ने में डर लगता है कि कहींे दोनों ही उससे नाराज न हो जायें। जहां तक ज्ञानियों का सवाल है तो उनकी यह दोनों ही क्या सुनेंगे अपने ही वर्ग के सामान्य लोग ही सुनते। हां, आस्तिकों और नास्तिकों के द्वंद्व से मनोरंजन मिलने के कारण वह उनकी तरफ देखते हैं और यहीं से शुरु होता हो बाजार का खेल।

नास्तिकों का पंसदीदा नारा है-नारी कल्याण। दरअसल हमारे देश में लोकतंत्र हैं और प्रचार माध्यमों-टीवी चैनल और अखबार-में स्थान पाने के लिये यह जरूरी है कि नारी कल्याण की बात जोर से की जाये। जब से प्रचार माध्मों का आधुनिकीकरण हुआ यह नारा और बढ़ गया है। वजह अधिकतर पुरुष काम के सिलसिले में घर से बाहर रहते हैं और स्त्रियों घर में अखबार पढ़ती हैं या टीवी देखती हैं। कभी कभी बाल कल्याण की बात भी जोड़ दी जाती है कि इससे नारियों पर दोहरा प्रभाव तो पड़ेगा ही बच्चे भी प्रभावित होकर भाषण, वार्ता और प्रवचन करने वाले का गुणगान करेंगे।

आस्तिकों और नास्तिकों की सोच का कोई ओरछोर नहीं होता। आस्तिक कहते हैं कि सर्वशक्तिमान इस दुनियां में हैं और एक ही है। मगर हैं कहां? यह वह नहीं बताते? सर्वशक्तिमान आकाश में रहता है या पाताल में? कह देंगे सभी जगह है। कोई मूर्तिै बना लेगा तो कोई मूर्ति विरोधी आस्तिक भी होगा। मगर वह भी कोई ठीया ऐसा जरूर बनायेगा जो भले ही पत्थर का बना होग पर उसमें मूर्ति नहीं होगी। मजे की बात यह है कि दोनों ही एक दूसरे पर नास्तिक होने का आरोप लगाते हैं।

नास्तिक कहते हैं कि इस संसार में कोई सर्वशक्तिमान नहीं है। फिर आखिर यह दुनियां चल कैसे रही है? वह बतायेंगे इंसानों की वजह से! मतलब पशु,पक्षी तथा अन्य जीव जंतुओं की सक्रियता का कोई मतलब नहीं है इसलिये उनकी रक्षा की बात भी वह नहीं करते। बस इंसानों का भला होना चाहिये। उनके अनुसार नारी को आजादी, बालकों के बालपन की रक्षा, बूढ़ापे में संतान का सहारा, और शोषित के अधिकार और सम्मान की रक्षा होना चाहिये और वह डंडे के जोर से। सभी जानते हैं कि अभी तक विश्व में कर्मशील पुरुषों का वर्चस्व इसलिये है क्योंकि वह इन इन सभी कर्तव्यों की पूर्ति के लिये श्रम करते हैं और उनके लिये यह नारे सुनने का समय नहीं होता। वह टीवी और अखबारों के साथ उतना समय नहीं बिता पाते इसलिये उनको प्रभावित करने का लाभ नहीं होता। नास्तिक लोग इसलिये केवल उन्हीं वर्गों को लक्ष्य कर अपनी बात रखते हैं जिनको प्रभावित कर अपनी वैचारिक दुकान चलायी जा सकती है।।

आजकल नारी स्वातंत्रय को लेकर अपने देश में बहुत जोरदार बहस चल रही है। इस बहस में आस्तिक अपने संस्कारों और आस्थाओं का झंडा बुलंद कर यह बताते हैं कि हमारे देश में नारियां तो देवी की तरह पूजी जाती हैं। नास्तिक को तो हर कर्मशील पुरुष राक्षस नजर आता है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि नास्तिक भले ही सर्वशक्तिमान का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते पर अपने प्रचार के लिये उनको कोई काल्पनिक बुत तो चाहिये इसलिये उन्होंने अन्याय,अत्याचार,शोषण,गरीबी, और बेरोजगारी को खड़ा कर लिया। यह कहना गलत है कि वह किसी में यकीन नहीं करते बस अंतर यह है कि वह उन बुत बने राक्षसों को दिखाकर उनसे मुक्ति के लिये स्वयं सर्वशक्तिमान बनना चाहते हैं।

नास्तिक सर्वशक्तिमान का अस्तित्व को तो खारिज करते हैं पर अपनी देह को तो वह नकार नहीं सकते। पंच तत्वों से बनी इस देह में अहंकार,बुद्धि और मन तीन ऐसी प्रकृतियां हैं जिनसे हर जीव संचालित होता है। फिर यहां अमीर गरीब, शोषक शोषित, और उच्च निम्न वर्ग कैसे बन गये? नास्तिक कहेंगे कि वही मिटाने के लिये तो हम जूझ रहे हैं। मगर अमीर ने गरीब को गरीब, शोषक ने शोषित का शोषण और उच्च वर्ग के व्यक्ति ने निम्म वर्ग के लोगों का अपमान कब और कैसे शुरु किया? इस पर नास्तिक तमाम तरह की इतिहास की पुस्तकें उठा लायेंगे-जिनके बारे में स्वास्तिक ज्ञानी कहते हैं कि उनके सिवाय झूठ के कुछ और नहीं होता। अलबत्ता आस्तिक प्रचार पाने के लिये उन्हीं पुस्तकों में अपने लिये तर्क ढूंढने लगते हैं।

वैसे यह आस्तिक और नास्तिक का संघर्ष भारत के बाहर खूब हुआ है। भारत में लोग स्वास्तिक वर्ग के हैं और यह मानते हैं कि सर्वशक्तिमान का अस्तित्व आदमी के अंदर ही है बशर्ते उसे समझा जाये। मगर विदेशी शिक्षा, रहन सहन और विचारों के साथ यह संघर्ष भी इस देश में आ गया है। यह कारण है कि आस्तिक महिला पुरुष बुद्धिजीवी देश का कल्याण कर्मकांडों में तो नास्तिक केवल नास्तिकता में ढूंढते हैं। हम ठहरे स्वास्तिक तो यही कहते हैं कि स्वास्तिक हो जाओ कल्याण स्वतः‘ होगा। कैसै हो जायें? बहुत संक्षिप्त उत्तर है। जब भी अवसर मिले भृकुटि पर दृष्टि रखकर ध्यान लगाओ। इससे देह के विकार तो निकलते ही हैं उसमें ऐसे तत्व भी निर्मित होते हैं जिसके प्रभाव से शत्रु मित्र बन जाते हैं और विकास के पथ पर अपने कदम स्वतः चल पडते हैं उसके लिये किसी कर्मकांड में पड़ने या कल्याण के नारे में बहने की आवश्कता नहीं है।
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