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वनडे मातरम् तो क्रिकेटर पितृम-हिन्दी व्यंग्य (oneday matrama and cricket is fatharam-hindi vyangya)


बड़ा अजीब लगता है जब एक टीवी चैनल में वनडे मातरम् शब्द देखकर हैरानी होती है। देश के स्वाधीनता संग्राम सेनानियों ने अपने अभियान में जमकर गया होगा ‘वंदे मातरम्’! भारत का राष्ट्रगान भी वंदेमातरम् शब्द से शोभायमान है। सच तो यह है कि वंदेमातरम् शब्द का उच्चारण ही मन ही मन में राष्ट्र के प्रति जान न्यौछावर करने वाले शहीदों की याद दिलाता है। देश के शहीदों को हार्दिक श्रद्धांजलि देते हुंए मन भर जाता है और मन गुनगुनाता है ‘वंदे मातरम्’!
आम मनुष्य और उसकी भावनाओं के दोहन करने के लिये उत्पाद करना बाज़ार और उनको खरीदने के लिये प्रेरित करना उसके प्रचार का काम है। अभी तक हम सुनते थे कि अमुक समाज के इष्ट का नाम बाज़ार ने अपने उत्पाद के लिये प्रयोग मेें किया तो विरोध हो गया या किसी पत्रिका ने किसी के धार्मिक संकेतक का व्यवसायिक उपयोग किया तो उस प्रतिबंध लग गया। अनेक प्रकार के जूते, जींस, तथा पत्रिकायें इस तरह के विरोध का सामना कर चुके हैं। धर्म, जाति, तथा भाषा के नाम पर समूह बनते हैं इसके लिये उसके प्रतीकों या इष्ट के नाम या नारे का उपयेाग बाज़ार के लिये अपने उत्पाद तथा प्रचार के लिये उपभोक्ता को क्रय करने के लिये प्रयुक्त करना कठिन होता है। मगर हमारे राष्ट्र का कोई अलग से समूह नहीं है बल्कि उपशीर्षकों में बंटे समाज उसकी पहचान हैं जिसे कुछ लोग गर्व से विभिन्न फूलों का गुलदस्ता कहते हुए गर्व से सीना फुला देते हैं।
यही कारण है कि वंदे मातरम अब बाज़ार के प्रचारकों के लिये वनडे मातरम् हो गया है। अगला विश्व क्रिकेट भारत में होना है। उसके लिये प्रचारकों ने-टीवी, रेडियो, तथा अखबार-ने अपना काम शुरु कर दिया है। कोई टीवी चैनल बल्ले बल्ले कर रहा है तो कोई वनडे मातरम् गा रहा है। इस श्रृंखला में वह लोग बीसीसीआई की टीम के विश्व कप के लिये चुनी गयी टीम के सदस्यों को महानायक बनाने पर तुले हैं। मैच में अधिक से अधिक लोग मैदान पर आयें यही काफी नहीं है बल्कि टीवी के सामने बैठकर आंखें फोड़ते हुए बाज़ार के उत्पादों का विज्ञापन प्रचार देखें इसके लिये जरूरी है कि लगातार उनका ध्यान विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता की तरफ बनाये रखा जायें, इस उद्देश्य से बाज़ार तथा प्रचार प्रबंधक सक्रिय हैं।
प्रचारकों को पैसा चाहिये तो बाज़ार उत्पादकों को अपने उत्पाद के लिये उपभोक्ता। दोनों मिलकर भारतीय समाज में एक नया समाज बनाना चाहते हैं जिसमें क्रिकेट और फिल्म का शोर हो। लोग एक नंबर में देखें और दो नंबर में सट्टा खेलें। मज़़े की बात यह है कि प्रचार माध्यमों में युवाओं को प्रोत्साहन देने की बात की जाती है ताकि वह भ्रमित रहे होकर उनके बताये मार्ग का अनुकरण करते हुए केवल मनोरंजन में उलझे रहें या महानायक बनने का सपना देखते हुए अपना जीवन नष्ट कर लें।
वनडे मातरम् यानि एक दिवसीय क्रिकेट मैच उनके लिये माता समान तो क्रिकेट खिलाड़ी पिता समान हो गये हैं क्योंकि वह उनके लिये धनार्जन का एक मात्र साधन हैं। इनसे फुरसत हो तो फिल्म अभिनेता तो गॉडफादर यानि धर्मपिता की भूमिका निभाते हैं। इसका उदाहरण एक टीवी चैनल पर देखने को मिला।
एक तेजगेंदबाज को घायल होने के बावजूद टीम में शामिल किया गया पर जब उसके अनफिट होने का चिकित्सीय प्रमाण पत्र मिला तो एक अन्य तेज गेंदबाज-जिसे केरल एक्सप्रेस कहा जाता है-को शामिल किया गया। केरल एक्सप्रेस को जब पहले टीम में शामिल से बाहर रखा गया तो उसके लिये सहानुभूति गीत गाये थे। अब जब उसे शामिल किया गया तो उसकी खबर और फोटो के साथ एक फिल्म अभिनेता के फोटो के साथ ही उसकी एक फिल्म का वाक्य‘जब अब हम किसी को बहुत चाहते हो तो कायनात उसके साथ हमें मिला ही देती है’, चलाया गया। दोनों में कोई तारतम्य नहीं है। ऐसे बहुत सारी फिल्मों में डायलाग मिल जायेंगे। ढेर सारे अभिनेताओं ने बोले होंगे मगर वह अभिनेता तो प्रचार माध्यमों का धर्म पिता है और जैसा कि स्पष्ट है कि विश्व कप तक क्रिकेट खिलाड़ी पिता हो गये हैं। दोनों को मिला कर बन गया बढ़िया कार्यक्रम।
इसलिये जब वनडे मातरम् नारा सुनते हैं तो कहना ही पड़ता है क्रिकेटर पितृम। मजा आता है जब नारों के जवाब में ऐसे नारे अपने दिमाग़ में आते हैं यह अलग बात है कि उनको नारे लगाने के पैसे मिलते हैं पर हमें फोकटिया लिखना होता है और मेहनत भी पड़ती है। न लिखें तो लगता है कि अपना मनोरंजन नहीं किया।
लेखक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
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ऑक्टोपस की फुटबाल-हिन्दी हास्य व्यंग्य


यह पश्चिम वाले भी उतने ही अजूबा हैं जितने हमारे देश के लोग। उतने ही अंधविश्वास और अज्ञानी जितने हमारे यहां बसते हैं। पहले अक्सर यह सुनने और पढ़ने को मिलता था कि पश्चिम में भारतीय लोगों के प्रति अच्छी धारणा व्याप्त नहीं है। भारत को वहां के लोग सन्यासियों, सांपों और संकीर्ण मानसिकता वाला मानते हैं। बात अपने समझ में तब भी नहीं आयी और अब भी नहीं आती क्योंकि अमेरिका और ब्रिटेन के बारे की कई इमारतों में भूत होने की बातें भी पढ़ने को मिलती हैं। इसके अलावा उनके उतने ही अंधविश्वासी होने के प्रमाण मिलते रहे हैं जितने हमारे यहां के लोग हैं। कई बड़े नामी गिरामी लोगों को भूत दिखने के दावे किये जाते हैं। अपने यहां तोते की भविष्यवाणियों पर हंसने वाले यह पश्चिमी देश अब एक समुद्रीजीव ऑक्टोपस पकड़ लाये हैं जिसके बारे में दावा यह कि 2010 के विश्व कप फुटबाल के मैचों के बारे में सही भविष्यवाणी कर रहा है। आठ पांव वाले इस जीव को पकड़ना ही पर्यावरणवादियों को ललकारने जैसा है पर पश्चिम में सब चलता है।
जहां तक फुटबाल खेल का सवाल है वह भी हमने खूब देखा पर यह टीवी और अखबार वाले उसमें भी फिक्सिंग जैसी बातें होने की बात कहते हैं इस कारण उसमें अरुचि हो गयी। जब तक क्रिकेट में फिक्सिंग की बात नहीं थी तब तक उसे खूब देखा पर एक बार जब दिमाग में मैच फिक्स होने की बात आयी तो उसे छोड़ दिया। फुटबाल भी खूब देखा पर उसमें भी यही बात आयी तो यह शायद पहला विश्व कप है जिसके मैच नहीं देखे। अर्र्जेटीना, फृ्रांस, ब्राजील और ब्रिटेन की टीमें देखते देखते बाहर हो गयी। इनको हमेशा ललकारने वाली जर्मनी की टीम का हारना भी कम चौंकाने वाला नहीं था। स्पेन और हालैंड की टीमें फायनल खेलेंगी। फुटबाल कोई क्रिकेट की तरह अवसर का खेल नहीं है पर हैरानी की बात है कि उसे भी अब इसी दृष्टि से देखा जायेगा। क्रिकेट में अनफिट खिलाड़ी चल सकता है पर फुटबाल में यह संभव नहीं है पर लगता है कि सटोरियों और पूंजीपतियों के दबाव के चलते अब वह भी विज्ञापनों के बोझ तले दब गया है। शायद यही कारण है कि दुनियां की जानी मानी टीमें अपने साथ हारने के लिये अनफिट खिलाड़ी जायी थी ताकि समय पड़ने पर मनोमुताबिक परिणाम निकाले जा सकें-कहते हैं न कि दूध का जला छांछ को भी फूंक फूंक कर पीता है इसलिये क्रिकेट को देखकर यह बात अनुमान से ही लिखी जा रही है। जर्मनी जिस तरह प्रतियोगिता में आगे बढ़ रहा था उसे देखते हुए उसका एकदम बाहर हो जाना शक पैदा करेगा ही-जो टीम एक मैच में चार गोल करती है दूसरे मैच में एक गोल को तरस जाती है तो सोचना स्वभाविक क्योंकि आखिर यह क्रिकेट नहीं है।
आक्टोपस को पॉल बाबा भी कहा जा रहा है-पता नहीं इस शब्द का उपयोग विदेशी प्रचार माध्यम कर रहे हैं कि नहीं पर भारत में तो यही नाम दिया गया है। पॉल बाबा ने फुटबाल में फायनल मैच में जर्मनी के हारने की भविष्यवाणी की थी। जर्मनी हार गया तो अब यह कहना कठिन है कि उन्होंने अपने देश के ऑक्टोपस ज्योतिषी की भविष्यवाणी का सम्मान किया या फिर उन दांव लगाने वालों को निपटाया जो उसकी भविष्यवाणी पर भरोसा नहंी कर रहे थे। अब इस पॉल बाबा ने स्पेन के जीतने की भविष्यवाणी की है। चूंकि हमने मैच नहीं देखे पर पिछली टीमों की स्थिति देखते हुए हमारा दावा है कि यह फाइनल मैच हालैंड वाले जीतेंगे। वजह! हालैंड के खिलाड़ी दुनियां में सबसे जीवट वाले माने जाते हैं। फायनल मैच अगर हमारे अनुकूल समय के अनुसार हुआ तो जरूर देखेंगे और नहीं हुआ तो अखबार में तो रोज इस बारे में पढ़ते ही हैं।
इधर पूर्व में भी एक तोता ज्योतिषी आ गया है जिसका दावा है कि यह मैच हालैंड जीतेगा। अब यह सट्टे वालों पर निर्भर है कि वह कितना इस खेल को प्रभावित कर पाते हैं। क्रिकेट में तो उनको बहुत मौका होता है पर फुटबाल में यह संभव नहीं होता कि बीच में जाकर प्रयास किये जायें या फिर अंपायर से दो चार गलत निर्णय करा लें।
वैसे सट्टे वाले भी आजकल भविष्यवाणी करते दिखते हैं तो भविष्यवाणी करने वाले भी अपना प्रभाव जमाने के लिये यह एक तरह से सट्टा खेलते हैं। सट्टे का का संबंध भविष्य के अनुमानों से है तो ज्योतिष का भी यही आधार हैै। अनेक लोग ज्योतिष नहीं जानते पर भविष्यवाणी करते हैं। सही निकली तो पौबाहर नहीं तो भाग्य का सहारा लेकर कह दिया कि ‘अमुक कारण से यह विपरीत परिणाम आया।’
अलबत्ता जैसे प्रचार माध्यमों की सक्रियता से विश्व निकट आ रहा है उससे अब पता लग रहा है कि सारे विश्व में सभी लोगों की मानसिकता एक जैसी है। ऐसे में श्रीमद्भागवत गीता की याद आ ही जाती है। वैसे एक अध्यात्मिक और सामयिक लेखक होने के नाते दोनों विषयों को मिलाना नहीं चाहिए पर आदमी की प्रवृत्तियों का क्या करें? जो हर खेल में प्रकट होती हैं और उनकी पहचान श्रीगीता में वर्णित प्रकृत्तियों से मेल खाती है। आदमी में दैवीय और आसुरी प्रवृत्तियां होती हैं। दैवीय प्रकृत्ति जहां सत्कर्म में लगाती है वहीं आसुरी प्रकृत्ति प्रमाद, मोह, लोभ तथा काम की तरफ ही प्रेरित करती है। ऐसे में हमें अपना अध्यात्मिक ज्ञान स्वर्ण संदेशों से सराबोर दिखाई देता है और उनका उल्लेख करने को लोभ व्यंग्य लिखते हुए भी छोड़ना मुश्किल हो जाता है।
मान लीजिये ऑक्टोपस ज्योतिषी यान पॉल बाबा की भविष्य सही साबित भी हुई और स्पेन जीत गया तो भी हम उसे दैवीय नहीं आसुरी चमत्कार मानेंगे। साफ कहें तो कहीं न कहीं फिक्सिंग    का संदेह होगा। कभी कभी तो लगता है कि अध्यात्मिक लेखक होने के नाते हास्य व्यंग्य जैसी रचनायें न लिखें पर ज्योतिष तो वैसे भी अध्यात्मिक ज्ञान से जुड़ा विषय माना जाता है और जब उसको लेकर हास्यास्पद स्थिति बनायी जाये तो फिर उस पर लिखा भी वैसा ही जा सकता है। अब खेलों में भविष्यवाणी हो रही है तो कहना ही पड़ता है कि भविष्यवाणी एक खेल हो गया है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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