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स्त्रियों के प्रति अपराध करने वालों के लिये क्रूर सजायें जरूरी-हिन्दी लेख (crural punishment must for crime against woman-hindi article)


                  ईरान में अपनी प्रेमिका के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करने वाले एक शख्स की आंखें फोड़ दी गयी हैं। ऐसा वहां की न्यायपालिका की सजा के आधार पर किया गया है। आमतौर से ईरान को एक सभ्य राष्ट्र माना जाता है और वहां ऐसी बर्बर सजा देना आम नहीं है। अलबत्ता कभी कभी धर्म आधार पर वहां ऐसे समाचार आते रहते हैं जिसमें सजायें दिल दहलाने वाली होती हैं। उनकी खूब आलोचना भी होती है। वहां की धर्म आधार व्यवस्था के अनुसार चोरी की सजा हाथ काटकर दी जाती है। इससे कुछ लोग सहमत नहीं होते। खासतौर से जब कोई बच्चा रोटी चुराते पकड़ा जाये और उसको ऐसी सजा देने की बात सामने आये तब यह कहना पड़ता है कि यह सजा बर्बर है। अपना पेट भरना हर किसी का धर्म है इसलिये धन चुराने और रोटी चुराने के अपराध में फर्क किया जाना चाहिए। मानवीय आधार पर कहें तो मजबूरीवश रोटी चुराना अपराध नहीं माना जा सकता।
अपनी प्रेमिका की आंखें फोड़ने वाले आशिक की आंखें फोड़ने की सजा को शायद कुछ लोग बर्बर मानेंगे पर सच बात यह है कि इसके अलावा अब कोई रास्ता दुनियां में नज़र नहीं आता। बात चाहे ईरान की हो या भारत की हम स्त्रियों के प्रति बढ़ते क्रूर अपराधों की अनदेखी नहीं कर सकते। अब यहां पर कुछ मानवाधिकारी विद्वान दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं। वह कहते हैं कि क्रूर सजा अपराध नहीं रोक सकती। अलबत्ता ऐसा दावा करने वाले फंासी जैसी सरल सजा पर ही सोचते हैं। फांसी से आदमी मर जाता है उसके बाद उसका कोई दर्द शेष नहीं रह जाता। हाथ काटना या आंख फोड़ना मनुष्य के लिये मौत से बदतर सजा है इस बात को पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित विद्वान नहीं जानते। कम से कम स्त्रियों के प्रति क्रूर अपराध रोकने के लिये ऐसी सजायें तो अपनानी होंगी।
                 हम एशियाई देशों में स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराधों को देखें तो ऐसी क्रूर सजाओं को अलावा कोई रास्ता नज़र नहीं आता। एशियाई देशों के अ्रग्रेजी संस्कृति समर्थक विद्वान अक्सर पश्चिमी और पूर्वीै समाज में अंतर नहीं करते। वह सोचते है कि जिस तरह वह पश्चिमी संस्कृति में ढले है वैसे ही पूरा एशियाई समाज भी हो गया है। हम शहरी भारतीय समाज को देखें तो यहां स्पष्टतः दो भागों में बंटा समाज है। एक तो वह जो पाश्चात्य ढंग का पहनावा अपनाने के साथ ही विचारधारा भी वैसी रखते हैं। दूसरा वह जो दिखता तो पश्चिमी सभ्यता से रंगा है पर उसकी मानसिकता ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली है। ऐसे नवपश्चात्यवादी उसी तरह ही खतरनाक हो रहे हैं जैसे कि नवधनाढ्य! हम ग्रामीण परिवेश में रहने वाले समाजों के लोगों की बात करें तो उनमें भी कुछ लोग नारियों के प्रति क्रूरता का व्यवहार करते हैं पर वह मारपीट तक ही सीमित होते हैं या हथियार से मारकर एक बार ही दर्द देने वाले होते हैं। जबकि नवपाश्चात्यवादी तेजाब फैंककर या बलात्कार ऐसी सजा स्त्री को देते हैं जो उसकी जिंदगी को मौत से बदतर बना देती हैं। पश्चिमी विचारधारा के विद्वान इस बात को नहीं देखते।
                    दूसरी यह भी बात है कि पाश्चात्य देशों की समशीतोष्ण जलवायु की बनिस्बत एशियाई देशों की ग्रीष्मोष्ण जलवायु के कारण हमारे यहां के लोगों के दिमाग भी अधिक गर्म रहते हैं। ऐसा नहंी है कि पाश्चात्य देशों में स्त्रियों के प्रति अपराध नहीं होते पर वहां तेजाब डालकर असुंदर या अंधा बनाने जैसी घटनाओं की जानकारी नहीं मिलती जबकि हमारे भारत में निरंतर ऐसी घटनायें हो रही हैं। हम स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराधों के कारणों पर नज़र डालें तो ऐसा लगता है कि अब कठोर सजाओं की नहीं बल्कि क्रूर सजाओं की आवश्यकता है।
             हमारे देश में कुछ ऐसे कारण हैं जो देश में महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ा रहे हैं।
           1.कन्या भ्रुण हत्याओं की वजह से लिंग संतुलन बिगड़ा है, जिससे विवाहों के लिये सही वर वधु का चुनाव कठिन होता जा रहा है। जिससे युवाओं को बड़ी उम्र तक अविवाहित रहना पड़ता है। लड़कियों की शादी में दहेज भी एक समस्या है।
           2.ग्रीष्मोष्ण जलवायु के कारण पश्चिम के समशीतोष्ण जलवायु में रहने वालो लोगों की बनिस्बत कामोतेजना यहां के लोगों में ज्यादा है।
           3.कानून का भय किसी को नहीं है। आजीवन कारावास से अपराधियों को कोई परेशानी नहंी है और फांसी मिल जाये तो एक बार में सारा दर्द खत्म हो जाता है। फांसी मिल भी जाये तो पहले तो बरसो लग जाते हैं और मिलने वाली हो तो मानवाधिकार कार्यकर्ता नायक बना देते हैं।
           4.हमारे मनोरंजन के साधन कामोतेजना के साथ ही पुरुष के अंदर पुरुषत्व का अहंकार बढ़ाने तथा नारी को उपभोग्या की मान्यता स्थापित करने वाले प्रकाशन और प्रसारण कर रहे हैं।
                कहने का अभिप्राय यह है कि जिस तरह कुछ नवपाश्चात्यवादी अपने आधुनिक होने के अहंकार तथा घर के बाहर की नारी को उपभोग की वस्तु मानकर चल रहे हैं उनके अंदर भय पैदा करने के लिये ऐसी क्रूर सजाऐं जरूरी हैं। यहां स्पष्ट कर दें कि पश्चिमी विद्वान यह दावा करते हैं कि कठोर सजाओं से अपराध नियंत्रित नहीं होते पर क्रूर सजाओं के बारे में उनकी राय साफ नहीं है हालांकि तब वह मानवाधिकारों की बात कर उसे विषय से भटका देते हैं।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

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ओसामा बिन लादेन कब मरा-हिन्दी लेख (death of osama bin laden,what truth and lie-hindi lekh)


               इस्लामिक उग्रवाद के आधार स्तंभ ओसामा  बिन लादेन के मारे जाने की खबर इतनी बासी लगी कि उस पर लिखना अपने शब्द बेकार करना लगता है।  अगर अमेरिका और लादेन के बीच चल रहे पिछले दस वर्षों से चल रहे संघर्ष के बारे में प्रचार माध्यमों में प्रकाशित तथा प्रसारित समाचारों पर दृष्टिपात करते हैं तो हमारा अनुमान है कि वह दस साल पहले ही मर चुका है क्योंकि उसके जिंदा रहने के कोई प्रमाण अमेरिका और उसकी खुफिया एजेंसी सीआईऐ नहीं दे सकी थी। उसके मरने के प्रमाण नहीं मिले या छिपाये गये यह अलग से चर्चा का विषय हो सकता है। थोड़ी देर के लिये मान लें कि वह दस साल पहले नहीं मारा गया तो भी बाद के वर्षों में भी उसके ठिकानों पर ऐसे अमेरिकी हमले हुए जिसमें वह मर गया होगा। यह संदेह उसी अमेरिका की वजह से हो रहा है जिसकी सेना के हमले बहुत अचूक माने जाते हैं।
                 अगर हम यह मान लें कि ओसामा बिन लादेन अभी तक नहीं मरा  था  तो यह शक होता है कि अमेरिका का एक बहुत बड़ा वर्ग उसे जिंदा रखना चाहता था ताकि उसके आतंक से भयभीत देश उसके पूंजीपतियों के हथियार खरीदने के लिये मजबूर हो सकें। यह रहस्य तो सैन्य विशेषज्ञ ही उजागर कर सकते हैं कि इन दस वर्षों में अमेरिका के हथियार निर्माताओं को इस दस वर्ष की अवधि में ओसामा बिन लादेन की वजह से कितना लाभ मिला? इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि उसे दस वर्ष तक प्रचार में जिंदा रखा गया। अमेरिका के रणीनीतिकार अपनी शक्तिशाली सेना की नाकामी का बोझ केवल अपने आर्थिक हितो की वजह से ढोते रहे।
                  आज से दस वर्ष पूर्व अमेरिका के अफगानिस्तान पर हम हमले के समय ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की खबर आयी थी। वह प्रमाणित नहीं हुई पर सच बात तो यह है कि उसके बाद फिर न तो ओसामा बिन लादेन का कोई वीडियो आया न ही आडियो। जिस तरह का ओसामा बिन लादेन प्रचार का भूखा आदमी था उससे नहीं लगता कि वह बिना प्रचार के चुप बैठेगा। कभी कभी उसकी बीमारी की खबर आती थी। इन खबरों से तो ऐसा लगा कि ओसामा चलती फिरती लाश है जो स्वयं लाचार हो गया है। उन  समाचारों पर शक भी होता था क्योंकि कभी उसके अफगानिस्तान में छिपे होने की बात कही जाती तो कभी पाकिस्तान में इलाज करने की खबर आती।
                          अब अचानक ओसामा बिन लादेन की खबर आयी तो वह बासी लगी। उसके बाद अमेरिका के राष्टपति बराक हुसैन ओबामा के राष्ट्र के नाम संबोधन सुनने का मौका मिला। उसमें ओसामा बिन लादेन के धर्मबंधुओं को समझाया जा रहा था कि अमेरिका उनके धर्म के खिलाफ नहीं है। अगर हम प्रचार माध्यमों की बात करें तो यह लगता है कि इस समय अमेरिका में बराक ओबामा की छवि खराब हो रही है तो उधर मध्य एशिया में उसके हमलों से ओसामा बिन लादेन  के धर्मबंधु पूरी दुनियां में नाराज चल रहे हैं। लीबिया में पश्चिमी देशों के हमल जमकर चल रहे हैं। सीरिया  और मिस्त्र में भी अमेरिका अपना सीधा हस्तक्षेप करने की तैयारी मे है। देखा जाये तो मध्य एशिया में अमेरिका की जबरदस्त सक्रियता है जो पूरे विश्व में ओसामा बिन लादेन के धर्म बंधुओं के लिये विरोध का विषय है। बराक ओबामा ने जिस तरह अपनी बात रखी उससे तो लगता है कि वह ने केवल न केवल एक धर्म विशेष लोगों से मित्रता का प्रचार कर रहे थे बल्कि मध्य एशिया में अपनी निरंतर सक्रियता  से उनका ध्यान भी हटा रहे थे। उनको यह अवसर मिला या बनाया गया यह भी चर्चा का विषय है।
                  अमेरिका में रविवार छुट्टी का दिन था। लोगों के पास मौज मस्ती का समय होता है और वहां के लोगों को यह एक रोचक और दिलखुश करने वाला विषय मिल गया और प्रचार माध्यमों में उनका जश्न दिखाया भी गया। अमेरिका की हर गतिविधि पर नज़र रखने वाले किसी भी घटना के वार और समय में बहुत दिलचस्पी रखते हैं। सदाम हुसैन को फांसी रविवार को दी गयी थी तब कुछ विशेषज्ञों ने अनेक घटनाओं को हवाला देकर शक जाहिर किया था कि कहीं यह प्रचार के लिये फिक्सिंग तो नहीं है क्योकि ऐसे मौकों पर अमेरिका में छुट्टी का दिन होता है और समय वह जब लोग नींद से उठे होते हैं या शाम को उनकी मौजमस्ती का समय होता है।
                    जब से क्रिकेट  में फिक्सिंग की बात सामने आयी है तब से हर विषय में फिक्सिंग के तत्व देखने वालों की कमी नहीं है। स्थिति तो यह है कि फुटबाल और टेनिस में भी अब लोग फिक्सिंग के जीव ढूंढने लगे हैं। अमेरिका की ऐसी घटनाओं पर विश्लेषण करने वाले वार और समय का उल्लेख करना नहीं भूलते।
                        पहले की अपेक्षा अब प्रचार माध्यम शक्तिशाली हो गये है इसलिये हर घटना का हर पहलु सामने आ ही जाता है। अमेरिका इस समय अनेक देशों में युद्धरत है और वह अफगानिस्तान से अपनी सेना  वापस बुलाना चाहता है। संभव है कि ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद उसे यह सहुलियत मिल जायेगी कि वहां के रणनीतिकार अपनी जनता को सेना की वापसी का औचित्य बता सकेंगे। अभी तक  वह अफगानिस्तान में अपनी सेना बनाये रखने का औचित्य इसी आधार पर सही बताता रहा था कि ओसाबा अभी जिंदा है। अलबत्ता सेना बुलाने का यह मतलब कतई नहीं समझना चाहिए कि अफगानितस्तान से वह हट रहा है। दरअसल उसने वहां उसी तरह अपना बौद्धिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक वर्चस्व स्थापित कर दिया होगा जिससे बिना सेना ही वह वहां का आर्थिक दोहन करे जैसे कि ब्रिटेन अपने उपनिवेश देशों को आज़ाद करने के बाद करता रहा है। सीधी बात कहें तो अफगानिस्तान के ही लोग अमेरिका का डोली उठाने वाले कहार बन जायेंगे।        
                     ओसामा बिन लादेन एकदम सुविधा भोगी जीव था। यह संभव नहीं था कि जहां शराब और शबाब की उसकी मांग जहां पूरी न होती हो वह वहां जाकर रहता। उसके कुछ धर्मबंधु भले ही प्रचार माध्यमों के आधार पर उसे नायक मानते रहे हों पर सच यह है कि वह अय्याश और डरपोक जीव था। वह युद्ध के बाद शायद ही कभी अफगानिस्तान में रहा हो। उसका पूरा समय पाकिस्तान में ही बीता होगा। अमेरिकी प्रशासन के पाकिस्तानी सेना में बहुत सारे तत्व हैं और यकीनन उन्होंने ओसामा बिन लादेन को पनाह दी होगी। वह बिना किसी पाकिस्तानी सहयोग  के इस्लामाबाद के निकट तक आ गया और वहां आराम की जिंदगी बिताने लगा यह बात समझना कठिन है। सीधा मतलब यही है कि उसे वहां की लोग ही लाये और इसमें सरकार का सहयोग न हो यह सोचना भी कठिन है। वह दक्षिण एशिया की कोई भाषा नहीं जानता इसलिये यह संभव नही है कि स्थानीय सतर पर बिना सहयोग के रह जाये। अब सवाल यह भी है कि पाकिस्तानी सेना बिना अमेरिका की अनुमति के उसे वहां कैसे पनाह दे सकती थी। यकीनन कहीं न कहीं फिक्सिंग की बू आ रही है। अमेरिका उसके जिंदा रहते हुए अनेक प्रकार के लाभ उठाता रहा है। ऐसे में संभव है कि उसने अपने पाकिस्तानी अनुचरों से कहा होगा कि हमें  तो हवा में बमबारी करने दो और तुम लादेन को कहीं रख लो। किसी को पता न चले, जब फुरतस मिलेगी उसे मार डालेंगे। अब जब उसका काम खत्म हो गया तो उसे इस्लामाबाद में मार दिया गया।
                        खबरें यह है कि कुछ मिसाइलें दागी गयीं तो डान विमान से हमले किये गये। अमेरिका के चालीस कमांडो आराम से लादेन के मकान पर उतरे और उसके आत्मसमर्पण न करने पर उसे मार डाला। तमाम तरह की कहानिया बतायी जा रही हैं पर उनमें पैंच यह है कि अगर पाकिस्तान को पता था कि लादेन उनके पास आ गया तो उन्होंने उसे पकड़ क्यों नहीं लिया? यह ठीक है कि पाकिस्तान एक अव्यवस्थित देश है पर उसकी सेना इतनी कमजोर नहीं है कि वह अपने इलाके में घुसे लादेन को जीवित न पकड़ सके। बताया जाता है कि अंतिम समय में पाकिस्तान के एबटबाद में सैन्य अकादमी के बाहर ही एक किलोमीटर दूर एक बड़े बंगले में रह रहा था। पाकिस्तान का खुफिया तंत्र इतना हल्का नहीं लगता है कि उसे इसकी जानकारी न हो। अगर पाकिस्तान की सेना या पुलिस अपनी पर आमादा हो जाती तो उसे कहीं भी मार सकती थी। ऐसे में एक शक्तिशाली सेना दूसरे देश को अपने देश में घुस आये अपराधी की सूचना भर देने वाली एक  अनुचर संस्था  बन जाती है और फिर उसकी सेना  को हमले करने के लिए  आमंत्रित  करती है। इस तरह पाकिस्तान ने सारी गोटिया बिछायीं और अमेरिकी सेना को ही ओसामा बिन लादेन को मारे का श्रेय दिलवाया जिसको न मार पाने के आरोप को वह दस बर्षों से ढो रही थी। लादेन अब ज्यादा ताकतवर नहीं रहा होगा। उसे सेना क्या पाकिस्तानी पुलिस वाले ही धर लेते अगर उनको अनुमति दी जाती । ऐसा लगता है कि अमेरिका ने चूहे को मारने के लिये तोपों का उपयोग  किया है।
                   यह केवल अनुमान ही है। हो सकता है कि दस वर्ष या पांच वर्ष पूर्व मर चुके लादेन को अधिकारिक मौत प्रदान करने का तय किया गया हो। अभी यह सवाल है कि यह तय कौन करेगा कि करने वाला कौन है? बिना लादेन ही न1 इसका निर्णय तो आखिर अमेरिका ही करेगा। हालांकि नज़र रखने वाले इस बात की पूरी तहकीकात करेंगे। सब कुछ एक कहानी की तरह लग रहा है क्योंकि लादेन की लाश की फोटो या वीडियो दिखाया नहीं गया। कम उसका पोस्टमार्टम हुआ कब उसका डीएनए टेस्ट किया गया इसका भी पता नहीं चला। आनन फानन में उसका अंतिम संस्कार समंदर में इस्लामिक रीति से किया गया। कहां, यहा भी पता नहीं। भारतीय प्रचार माध्यम इस कहानी की सच्चाई पर यकीन करते दिख रहे हैं। उनको विज्ञापन दिखाने के लिये यह कहानी अच्छी मिल गयी। हमारे पास भीअविश्वास का कोई कारण नहीं पर इतना तय है कि इस विषय पर कुछ ऐसे तथ्य सामने आयेंगे कि इस कहानी पेंच दिखने लगेंगे।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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क्रिकेट मैच का बराबर रहना-हिन्दी व्यंग्य


अरे यह क्या? बीसीसीआई और इंग्लैंड की टीम के बीच विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता में खेले गये एक मैच की समाप्ति से पहले ही आस्ट्रेलिया के पूर्व स्पिनर शेन वार्न ने अपने ट्विटर पर भविष्यवाणी कर दी थी की मैच टाई होगा-यह जानकारी इंटरनेट की एक पत्रिका ने दी है। मैच के हारने जीतने की भविष्यवाणी तो कोई भी कर सकता है पर टाई, बराबर या अनिर्णीत होने की बात करने का दावा! वह भी सच निकले। वह भी ऐसे अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी की भविष्यवाणी जिसके बारे में कहा जाता है कि वह आनॅलाईन सट्टा चलाता है। यह मामला चौंकाने वाला है।
क्रिकेट के पीछे फिक्सिंग का भूत हमेशा ही पड़ा रहता है। इस भूत को खड़ा भी वही लोग करते हैं जो स्वयं इससे पैसा कमाते हैं। शेन वॉर्न अगर क्रिकेट नहीं खेलता तो शायद उसे दुनियां में कोई नहीं जानता। विश्व क्रिकेट प्रतियोगता 2011 में बीसीसीआई और इंग्लैंड की टीम के मैच के टाई होने की भविष्यवाणी की और ऐसा हुआ भी। एक पत्रिका में ही हमने पढ़ा था कि वह बाकायदा क्रिकेट पर ऑन लाईन सट्टा चलाता है। ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या वह अपने ट्विटर पर सट्टा लगाने वालों को कोई संदेश दे रहा था या अपनी वेबसाईट पर ऐसा कोई खेल कर रहा था जिसे कोई भारत में समझ नहीं पा रहा।
वैसे सामने गोरी टीम थी तो लोग शायद इस पर यकीन न करें कि उन्होंने ट्ाई फिक्स की होगी। यहां के लोगों का गोरों पर अंधा विश्वास है, पर हमारा मानना है कि वह दिन गये जब गोरों की छवि ईमानदार की थी। अब तो हमें यह भी शक होता है कि पाकिस्तान के जिन तीन खिलाड़ियों को स्पॉट फिक्सिंग में लंदन में धरा गया वह भी एक फिक्स मामला था। इसका उपयोग भारतीय उपमहाद्वीप में 2011 में हो रहे विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट में यह संदेश देने के लिये किया गया कि अब सारे मैच साफ सुथरे होंगे। इसके अलावा पकड़े गये एक खिलाड़ी की पोल उसकी पूर्व प्रेमिका से खुलवाई गयी। वह पाकिस्तान की एक अभिनेत्री है जिसे बाद में भारत के एक टीवी चैनल के बिग बॉस कार्यक्रम के लिये चुना गया। क्रिकेट वालों से पंगा लेकर भी वह भारतीय टीवी चैनल के कार्यक्रम में आयी, उसी समय शक हो गया था कि कहीं कुछ गड़बड़ है। देखा जाये तो क्रिकेट और मनोरंजन के खैरख्वाह एक ही हैं ऐसे में यह कैसे संभव है कि एक क्षेत्र को बदनाम करने वाला दूसरे में पांव जमा ले। अब वही अभिनेत्री फिर बिग टॉस कार्यक्रम करने यहां आयी है। उसकी छवि बनी इसलिये थी कि उसने एक अपराध क्रिकेट खिलाड़ी की पोल खोली थी।
मामला फिक्स न लगे इसलिये गोरी पुलिस को बीच में लाया गया। उसने तीन पाकिस्तानी खिलाड़ी पकड़े या उससे पकड़वाये गये यह कहना कठिन है पर इतना तय हो गया कि क्रिकेट में अभी फिक्सिंग यथावत है। अब यह शेन वार्न की भविष्यवाणी सामने आयी है। कुछ लोग उसकी तुलना उस समुद्री जीव ऑक्टोपस बाबा से कर रहे हैं जिसके बारे में कहा गया कि उसने विश्व कप फुटबाल प्रतियोगिता में सही भविष्यवाणी की। एक बात याद रखने लायक है कि उस कथित बाबा की चर्चा भी अनेक मैचों के बाद प्रारंभ हुई थी। अब शेनवार्न भी बाबा के भेस में आ गये हैं। गोरे हैं तो विश्वसीय तो माने ही जायेंगे पर यहां अंग्रेज गोरे क्रिकेट खिलाड़ी शक शुबहे में आ गये हैं। अंपायर भी गोरे थे। हैरानी इस बात की है कि उन्होंने ऐसा क्या गुणा भाग बिठाया कि मैच टाई हो गया और उसके फिक्स होने का आभास तक नहीं हुआ। इन गोरे अंपायरों ने ब्रिटेन के एक खिलाड़ी को पगबाधा नहीं दिया तो एक खिलाड़ी के आउट होने की अपील भारतीय खिलाड़ियों ने नहंी की। हो सकता है कि भारतीय खिलाड़ियों को मतिभ्रम हुआ हो पर जब एक खिलाड़ी को पगबाधा आउट होने की अपील तीसरे अंपायर की तरफ बढ़ायी गयी तो उसने टीवी देखकर भी गलत निर्णय दिया जबकि यह दृश्य पूरी दुनियां को दिखाई दिया कि वह गोरा खिलाड़ी आउट था।
इसके बावजूद भी यह यकीन नहीं होता कि कभी मैच टाई फिक्स हो सकता है। अगर शेन वार्न की भविष्यवाणी को मैच के पहले ही फिक्स होने की बात सोचें तो मानना पड़ेगा कि क्रिकेट खेल में गजब के अभिनेता और निर्देशक आ गये हैं। इतना कि जो मानते हैं कि सारे मैच फिक्स होते हैं वह भी इस मैच को फिक्स नहीं मानेंगे। अब ऑक्टोपस के नये अवतार शेन वार्न पर सारी दुनियां की नज़रे रहेंगी। हर मैच के खत्म होने के एक घंटै पहले उनको ट्विटर पर ढूंढा जायेगा। खासतौर से वह लोग जो क्रिकेट मैचों पर दाव लगाते हैं। ऐसे लोग इस देश में कम नहीं है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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हमारे देश में ऐसी बहुत बड़ी आबादी है जिसकी दिलचस्पी अमेरिका में इतनी नहीं है जितनी प्रचार माध्यम या विशिष्ट वर्ग के लोग लेते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि जनसामान्य जागरुक नहीं है या समाचार पढ़ने या सुनने के उसके पास समय नहीं है। दरअसल देश के प्रचार माध्यम से जुड़े लोग यह मानकर चलते हैं कि गरीब, ठेले वाले, खोमचे वाले या तंागे वाले उनके प्रयोक्ता नहीं है और इसलिये वह पढ़े लिखे नौकरी या व्यवसाय करने वालों को ही लक्ष्य कर अपनी सामग्री प्रस्तुत करते हैं। यह उनका अज्ञान तथा अव्यवसायिक प्रवृत्ति का परिणाम है। शायद कुछ बुद्धिमान लोग बुरा मान जायें पर सच यह है कि समाचार पढ़ना तथा राजनीतिक ज्ञान रखना गरीबीया अमीरी से नहीं जुड़ा-यह तो ऐसा शौक है जिसको लग जाये तो वह छूटता नहीं है। चिंतन क्षमता केवल शिक्षित या शहरी लोगों के पास होने का उनका विचार खोखला है। कई बार तो ऐसा लगता है कि ग्रामीण और शिक्षित वर्ग का ज्ञान कहीं  अधिक है। सीधी बात कहें तो अमेरिका ने 1971 में भारत पाक युद्ध के समय अपना सातवां बेड़ा भारत के खिलाफ उतारने की घोषणा की थी और यह बात आज भी आम भारतीय के जेहन में है और वह उस पर यकीन नहीं करता। विकिलीक्स से बड़े शहरों के बुद्धिजीवी चौंक गये हैं पर उनमें कुछ ऐसा नहीं है कि आम भारतीय जनमानस प्रभावित या चिंतित हो।
विकिलीक्स ने अमेरिकी सरकार के गोपनीय दस्तावेजों का खुलासा किया है। यह एक बहुदेशीय वेबसाईट है। अनेक पत्रकार इसमें अपने पाठ या पोस्ट रखते हैं और उनकी जांच के बाद उनको प्रकाशित किया जाता है। अपनी भद्द पिटते देखकर अमेरिकी सरकार इसके विरुद्ध कार्यवाही करने में लगी है। वह अन्य देशों से इसे अनदेखा करने का आग्रह कर रही है। दुनिया भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रचार की जिम्मेदारी लेने वाले अमेरिकी रणनीतिकार अब ठीक उलट बर्ताव कर रहे हैं।
अमेरिका की विदेश मंत्री हेनरी क्लिंटन ने सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के भारत के दावे का मखौल उड़ाने के साथ ही हमारे देश के विशिष्ट वर्ग की जासूसी करने को कहा है। बात तो यह है कि अमेरिका अपनी आर्थिक विवशताओं के चलते ही भारत को पुचकार रहा है वरना उसकी आत्मा तो खाड़ी देश और उनके मानस पुत्र पाकिस्तान में ही बसती है। इसलिए अपनी साम्राज्यवादी भूख मिटाने तथा हथियार बिकवाने के लिये पाकिस्तान को भी साथ रख रहा है। अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान में फैले आतंकवाद से निपटने में भारतीय हितों की उसे परवाह नहीं है। उसका दोगलापन कोई ऐसी चीज नहीं है जिस पर चौंका जाये। सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता भी अब कितनी प्रासंगिक है यह भी हमारे लिये विचार का विषय है। ब्राजील, जापान, जर्मनी के साथ भारत को इसमें स्थाई सदस्यता दी भी गयी तो उसमें वीटो पॉवर का अधिकार मिलेगा इसमें संदेह है-कुछ प्रचार माध्यमों में इस आशय का समाचार बहुत पहले पढ़ने को मिला था कि अब नये स्थाई सदस्यों को इस तरह का अधिकार नहीं मिलेगा। बिना वीटो पॉवर की स्थाई सदस्यता को कोई मतलब नहीं है। यह अलग बात है कि अमेरिकी मोह में अंधे हो रहे प्रचार कर्मी उसकी हर बात को ब्रह्म वाक्य की तरह उछालते हैं। तब ऐसा भी लगता है कि वह अपने देश के जनमानस की बजाय पश्चिमी अप्रवासी भारतीयों को लिये अपने प्रसारण कर रहे हैं। अभी हाल ही में भारत के सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्यता पर भी जिस तरह खुश होकर यह प्रचार माध्यम चीख रहे थे वह हास्यप्रद था क्योंकि यह क्रमवार आधार पर नियम से मिलनी ही थी। समाचारों पर बहुत समय से रुचि लेने वाले आम पाठक यह जानते हैं कि अनेक अवसरों पर भारत को यह सदस्यता मिली पर उसकी बात सुनी नहीं गयी।
इस चर्चा में विकीलीक्स के खुलासे चिंतन से अधिक मनोरंजन के लिये है। जिस तरह विदेशी राष्ट्रों के लिये संबोधन चुने गये हैं उससे भारतीय टीवी चैनलों के हास्य कलाकारों की याद आती है। यह अलग बात है कि यह कलाकार पेशेवर होने के कारण अमेरिकी रणनीतिकारों से अधिक शालीन और प्रभावी शब्द इस्तेमाल करते हैं। विकिलीक्स ने अमेरिकी रणनीतिकारों के दोहरेपन को प्रमाण के साथ प्रस्तुत किया है जो कि एक असामान्य घटना है। अमेरिकी जो कहते हैं और सोचते हैं इस पर अधिक माथा पच्ची करने की आवश्यकता नहीं है। सच तो यह है कि विकिलीक्स के खुलासे देखकर कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अमेरिका एक स्वतंत्र राष्ट्र नहीं बल्कि पूंजीवाद का उपनिवेश है जो व्यापार या बाज़ार के वैश्वीकरण के साथ ही अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है। चाहे किसी भी देश के पूंजीपति या विशिष्ट वर्ग के लोग हैं अपने क्षेत्र में उसे कितनी भी गालियां देते हों पर अपनी संतान या संपत्ति वहां स्थापित करने में उनको अपनी तथा भविष्य की पीढ़ी की सुरक्षा नज़र आती है। तय बात है कि वह कभी वहां के रणनीतिकारों के निर्देश पर चलते हैं तो कभी उनको चलाते हैं। अमेरिकी रणनीतिकारों की भी क्या कहने? एक ग्राहक कुछ मांगता है दूसरे से उसकी आपूर्ति करवाते हैं। दूसरा कहे तो तीसरे से करवाते हैं। खुलासों से पता लगता है कि खाड़ी देश दूसरे के परमाणु संयत्र पर अमेरिका को हमले के लिये उकसा रहा है। मतलब यह कि अमेरिका अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहा है या पूंजीतंत्र के शिखर पुरुष अपने क्षेत्र में उसे घसीट रहे हैं, यह अब चर्चा का विषय हो सकता है। ऐसे में अमेरिकी रणनीतिकारों के औपचारिक या अनौपचारिक बयानों, कमरे में या बाहर की गयी टिप्पणियों तथा कहने या करने में अंतर की चर्चा करना भी समय खराब करना लगती है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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मैत्रीपूर्ण संघर्ष-हिन्दी हास्य व्यंग्य (friendly fighting-hindi comic satire article)


दृश्यव्य एवं श्रव्य प्रचार माध्यमों के सीधे प्रसारणों पर कोई हास्य व्यंगात्मक चित्रांकन किया गया-अक्सर टीवी चैनल हादसों रोमांचों का सीधा प्रसारण करते हैं जिन पर बनी इस फिल्म का नाम शायद………… लाईव है। यह फिल्म न देखी है न इरादा है। इसकी कहानी कहीं पढ़ी। इस पर हम भी अनेक हास्य कवितायें और व्यंगय लिख चुके हैं। हमने तो ‘टूट रही खबर’ पर भी बहुत लिखा है संभव है कोई उन पाठों को लेकर कोई काल्पनिक कहानी लिख कर फिल्म बना ले।
उस दिन हमारे एक मित्र कह रहे थे कि ‘यार, देश में इतना भ्रष्टाचार है उस पर कुछ जोरदार लिखो।’
हमने कहा-‘हम लिखते हैं तुम पढ़ोगे कहां? इंटरनेट पर तुम जाते नहीं और जिन प्रकाशनों के काग़जों पर सुबह तुम आंखें गढ़ा कर पूरा दिन खराब करने की तैयारी करते हो वह हमें घास भी नहीं डालते।’
उसने कहा-‘हां, यह तो है! तुम कुछ जोरदार लिखो तो वह घास जरूर डालेेंगे।’
हमने कहा-‘अब जोरदार कैसे लिखें! यह भी बता दो। जो छप जाये वही जोरदार हो जाता है जो न छपे वह वैसे ही कूंड़ा है।’
तब उसने कहा-‘नहीं, यह तो नहीं कह सकता कि तुम कूड़ा लिखते हो, अलबत्ता तुम्हें अपनी रचनाओं को मैनेज नहीं करना आता होगा। वरना यह सभी तो तुम्हारी रचनाओं के पीछे पड़ जायें और तुम्हारे हर बयान पर अपनी कृपादृष्टि डालें।’
यह मैनेज करना एक बहुत बड़ी समस्या है। फिर क्या मैनेज करें! यह भी समझ में नहीं आता! अगर कोई संत या फिल्मी नायक होते या समाज सेवक के रूप में ख्याति मिली होती तो यकीनन हमारा लिखा भी लोग पढ़ते। यह अलग बात है कि वह सब लिखवाने के लिये या तो चेले रखने पड़ते या फिर किराये पर लोग बुलाने पड़ते। कुछ लोग फिल्मी गीतकारों के लिये यह बात भी कहते हैं कि उनमें से अधिकतर केवल नाम के लिये हैं वरना गाने तो वह अपने किराये के लोगों से ही लिखवाते रहे हैं। पता नहंी इसमें कितना सच है या झूठ, इतना तय है कि लिखना और सामाजिक सक्रियता एक साथ रखना कठिन काम है। सामाजिक सक्रियता से ही संबंध बनते हैं जिससे पद और प्रचार मिलता है और ऐसे में रचनाऐं और बयान स्वयं ही अमरत्व पाते जाते है।
अगर आजकल हम दृष्टिपात करें तो यह पता लगता है कि प्रचार माध्यमों ने धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक शिखरों पर विराजमान प्रतिमाओं का चयन कर रखा है जिनको समय समय पर वह सीधे प्रसारण या टूट रही खबर में दिखा देते हैं।
एक संत है जो लोक संत माने जाते हैं। वैसे तो उनको संत भी प्रचार माध्यमों ने ही बनाया है पर आजकल उनकी वक्रदृष्टि का शिकार हो गये हैं। कभी अपने प्रवचनों में ही विदेशी महिला से ‘आई लव यू कहला देते हैं’, तो कभी प्रसाद बांटते हुए भी आगंतुकों से लड़ पड़ते हैं। उन पर ही अपने आश्रम में बच्चों की बलि देने का आरोप भी इन प्रचार माध्यमों ने लगाये। जिस ढंग से संत ने प्रतिकार किया है उससे लगता है कि कम से कम इस आरोप में सच्चाई नहंी है। अलबत्ता कभी किन्नरों की तरह नाचकर तो कभी अनर्गल बयान देकर प्रचार माध्यमों को उस समय सामग्री देतेे हैं जब वह किसी सनसनीखेज रोमांच के लिये तरसते हैं। तब संदेह होता है कि कहीं यह प्रसारण प्रचार माध्यमों और उन संत की दोस्ताना जंग का प्रमाण तो नहीं है।
एक तो बड़ी धार्मिक संस्था है। वह आये दिन अपनी विचारधारा से जुड़े लोगों के लिये अनर्गल फतवे जारी करती है। सच तो यह है कि इस देश में कोई एक व्यक्ति, समूह या संस्था ऐसी नहंी है जिसका यह दावा स्वीकार किया जाये कि वह अपने धर्म की अकेले मालिक है मगर उस संस्था का प्रचार यही संचार माध्यम इस तरह करते हैं कि उस धर्म के आम लोग कोई भेड़ या बकरी हैं और उस संस्था के फतवे पर चलना उसकी मज़बूरी है। वह संस्था अपने धर्म से जुड़े आम इंसान के लिये कोई रोटी, कपड़े या मकान का इंतजाम नहंी करती और उत्तर प्रदेश के एक क्षेत्र तक ही उसका काम सीमित है पर दावा यह है कि सारे देश में उसकी चलती है। उसके उस दावे को प्रचार माध्यम हवा देते हैं। उसके फतवों पर बहस होती है! वहां से दो तीन तयशुदा विद्वान आते हैं और अपनी धार्मिक पुस्तक का हवाला देकर चले जाते हैं। जब हम फतवों और चर्चाओं का अध्ययन करते हैं तो संदेह होता है कि कहीं यह दोस्ताना जंग तो नहीं है।
एक स्वर्गीय शिखर पुरुष का बेटा प्रतिदिन कोई न कोई हरकत करता है और प्रचार माध्यम उसे उठाये फिरते हैं। वह है क्या? कोई अभिनेता, लेखक, चित्रकार या व्यवसायी! नहीं, वह तो कुछ भी नहीं है सिवाय अपने पिता की दौलत और घर के मालिक होने के सिवाय।’ शायद वह देश का पहला ऐसा हीरो है जिसने किसी फिल्म में काम नहीं किया पर रुतवा वैसा ही पा रहा है।
लब्बोलुआब यह है कि प्रचार माध्यमों के इस तरह के प्रसारणों में हास्य व्यंग्य की बात है तो केवल इसलिये नहीं कि वह रोमांच का सीधा प्रसारण करते हैं बल्कि वह पूर्वनिर्धारित लगते हैं-ऐसा लगता है कि जैसे उसकी पटकथा पहले लिखी गयी हों हादसों के तयशुदा होने की बात कहना कठिन है क्योंकि अपने देश के प्रचार कर्मी आस्ट्रेलिया के उस टीवी पत्रकार की तरह नहीं कर सकते जिसने अपनी खबरों के लिये पांच कत्ल किये-इस बात का पक्का विश्वास है पर रोमांच में उन पर संदेह होता है।
ऐसे में अपने को लेकर कोई भ्रम नहीं रहता इसलिये लिखते हुए अपने विषय ही अधिक चुनने पर विश्वास करते हैं। रहा भ्रष्टाचार पर लिखने का सवाल! इस पर क्या लिखें! इतने सारे किस्से सामने आते हैं पर उनका असर नहीं दिखता! लोगों की मति ऐसी मर गयी है कि उसके जिंदा होने के आसार अगले कई बरस तक नहीं है। लोग दूसरे के भ्रष्टाचार पर एकदम उछल जाते हैं पर खुद करते हैं वह दिखाई नहीं देता। यकीन मानिए जो भ्रष्टाचारी पकड़े गये हैं उनमें से कुछ इतने उच्च पदों पर रहे हैं कि एक दो बार नहीं बल्कि पचास बार स्वाधीनता दिवस, गणतंत्र, गांधी जयंती या नव वर्ष पर उन्होंने कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि की भूमिका का निर्वाह करते हुए ‘भ्रष्टाचार’ को देश की समस्या बताकर उससे मुक्ति की बात कही होगी। उस समय तालियां भी बजी होंगी। मगर जब पकड़े गये होंगे तब उनको याद आया होगा कि उनके कारनामे भी भ्रष्टाचार की परिधि में आते है।
कहने का अभिप्राय यह है कि लोगों को अपनी कथनी और करनी का अंतर सहजता पूर्वक कर लेते हैं। जब कहा जाये तो जवाब मिलता है कि ‘आजकल इस संसार में बेईमानी के बिना काम नहीं चलता।’

जब धर लिये जाते हैं तो सारी हेकड़ी निकल जाती है पर उससे दूसरे सबक लेते हों यह नहीं लगता। क्योंकि ऊपरी कमाई करने वाले सभी शख्स अधिकार के साथ यह करते हैं और उनको लगता है कि वह तो ‘ईमानदार है’ क्योंकि पकड़े आदमी से कम ही पैसा ले रहे हैं।’ अलबत्ता प्रचार माध्यमों में ऐसे प्रसारणों के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि वह दोस्ताना जंग है। यह अलग बात है कि कोई बड़ा मगरमच्छ अपने से छोटे मगरमच्छ को फंसाकर प्रचार माध्यमों के लिये सामग्री तैयार करवाता  हो या जिसको हिस्सा न मिलता हो वह जाल बिछाता हो । वैसे अपने देश में जितने भी आन्दोलन हैं भ्रष्टाचार के विरुद्ध नहीं बल्कि उसके बंटवारे के लिए होते हैं । इस पर अंत में प्रस्तुत है एक क्षणिका।
एक दिन उन्होंने भ्रष्टाचार पर भाषण दिया
दूसरे दिन रिश्वत लेते पकड़े गये,
तब बोले
‘मैं तो पैसा नहीं ले रहा था,
वह जबरदस्ती दे रहा था,
नोट असली है या नकली
मैं तो पकड़ कर देख रहा था।’

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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