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नेपाल की उठापठक और हिंदुत्व-हिंदी लेख


नेपाल कभी हिन्दू राष्ट्र था जिसे अब धर्मनिरपेक्ष घोषित किया गया है। वहां की निवासिनी और भारतीय हिन्दी फिल्मों की अभिनेत्री मनीक्षा कोइराला ने अब जाकर इसकी आलोचना की है। उनका मानना है कि नेपाल को एक हिन्दू राष्ट्र ही होना चाहिए था। दरअसल नेपाल की यह स्थिति इसलिये बनी क्योंकि वह राजशाही का पतन हो गया। वहां के राजा को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता था या हम कहें कि उनको ऐसी प्रतिष्ठा दी जाती थी। दूसरी बात यह है कि नेपाल के हिन्दू राष्ट्र के पतन को एक व्यापक रूप में देखा जाना चाहिए न कि इसके केवल सैद्धान्तिक स्वरूप पर नारे लगाकर भ्रम फैलाना चाहिये। इसलिये यह जरूरी है कि हम हिन्दुत्व की मूल अवधारणाओं को समझें।
वैसे हिन्दुत्व कोई विचाराधारा नहीं है और न ही यह कोई नारा है। अगर हम थोड़ा विस्तार से देखें तो हिन्दुत्व दूसरे रूप में प्राकृतिक रूप से मनुष्य को जीने की शिक्षा देने वाला एक समग्र दर्शन है। अंग्रेजों और मुगलों ने इसी हिन्दुत्व को कुचलते हुए भारतवर्ष में राज्य किया किया। अनेक डकैत और खलासी यहां आकर राजा या बादशाह बन गये। अंग्रेजों ने तो अपनी ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जिससे कि यहां का आदमी उनके जाने के बाद भी उनकी गुलामी कर रहा है। देश के शिक्षित युवक युवतियां इस बात के लिये बेताब रहते हैं कि कब उनको अवसर मिले और अमेरिका या ब्रिटेन में जाकर वहां के निवासियों की गुलामी का अवसर मिले।
मुगलों और अंग्रेजों ने यहां के उच्च वर्ग में शासक बनने की ऐसी प्रवृत्ति जगा दी है कि वह गुलामी को ही शासन समझने लगे हैं। अक्सर समाचार पत्र पत्रिकाओं में ऐसी खबरे आती हैं कि अमुक भारतवंशी को नोबल मिला या अमुक को अमेरिका का यह पुरस्कार मिला। अमुक व्यक्ति अमेरिका की वैज्ञानिक संस्था में यह काम कर रहा है-ऐसी उपलब्धियों को यहां प्रचार कर यह साबित किया जाता है कि यहां एक तरह से नकारा और अज्ञानी लोग रहते हैं। सीधी भाषा में बात कहें तो कि अगर आप बाहर अपनी सिद्धि दिखायें तभी यहां आपको सिद्ध माना जायेगा। उससे भी बड़ी बात यह है कि आप अंग्रेजी में लिख या बोलकर विदेशियों को प्रभावित करें तभी आपकी योग्यता की प्रमाणिकता यहां स्वीकार की जायेगी। नतीजा यह है कि यहां का हर प्रतिभाशाली आदमी यह सोचकर विदेश का मुंह ताकता है कि वहां के प्रमाणपत्र के बिना अपने देश में नाम और नामा तो मिल ही नहीं सकता।
मुगलों ने यहां के लोगों की सोच को कुंद किया तो अंग्रेज अक्ल ही उठाकर ले गये। परिणाम यह हुआ कि समाज का मार्ग दर्शन करने का जिम्मा ढोने वाला बौद्धिक वर्ग विदेशी विचाराधाराओं के आधार पर यहां पहले अपना आधार बनाकर फिर समाज को समझाना चाहता है। कहने को विदेशी विचारधाराओं की भी ढेर सारी किताबें हैं पर मनुष्य को एकदम बेवकूफ मानकर लिखी गयी हैं। उनके रचयिताओं की नज़र में मनुष्य को सभ्य जीवन बिताने के लिये ऐसे ही सिखाने की जरूरत है जैसे पालतु कुत्ते या बिल्ली को मालिक सिखाता है। मनुष्य में मनुष्य होने के कारण कुछ गुण स्वाभाविक रूप से होते हैं और उसे अनेक बातें सिखाने की जरूरत नहीं है। जैसे कि अहिंसा, परोपकार, प्रेम तथा चिंतन करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियां हैं। कोई भी मनुष्य मुट्ठी भींचकर अधिक देर तक नहीं बैठ सकता। उसे वह खोलनी ही पड़ती हैं।
चार साल का बच्चा घर के बाहर खड़ा है। कोई पथिक उससे पीने के लिये पानी मांगता है। वह बिना किसी सोच के उसे अपने घर के अंदर से पानी लाकर देता है। उस बच्चे ने न तो को पवित्र पुस्तक पढ़ी है और न ही उसे किसी ने सिखाया है कि ‘प्यासे को पानी पिलाना चाहिये’ फिर भी वह करता है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य अपनी सहज प्रवृत्तियों की वजह से सज्जन तो रहता ही है पर समाज का एक वर्ग उसकी जेब से पैसा निकालने या उससे सस्ता श्रम कराने के लिये उसे असहज बनाने का हर समय प्रयास करता है। विदेशी विचारधाराओं तथा बाजार से मनुष्य को काल्पनिक स्वप्न तथा सुख दिखकार उसे असहज बनाने का हमारे देश के लोगों ने ही किया है। इन्ही विचाराधाराओं में एक है साम्यवाद।
इसी साम्यवादी की प्रतिलिपि है समाजवाद। इनकी छत्रछाया में ही बुद्धिजीवियों के भी दो वर्ग बने हैं-जनवादी तथा प्रगतिशील। नेपाल को साम्यवादियों ने अपने लपेटे में लिया और उसका हिन्दुत्व का स्वरूप नष्ट कर दिया। सारी दुनियां को सुखी बनाने का ख्वाब दिखाने वाली साम्यवादी और समाजवादी विचारधाराओं में मूल में क्या है, इस पर अधिक लिखना बेकार है पर इनकी राह पर चले समाज सेवकों और बुद्धिजीवियों ने अपने अलावा किसी को खुश रखने का प्रयास नहीं किया। सारी दुनियां में एक जैसे लोग हो कैसे सकते हैं जब प्रकृत्ति ने उनको एक जैसा नहीं बनाया जबकि कथित विकासवादी बुद्धिजीवी ऐसे ही सपने बेचते हैं।
अब बात करें हम हिन्दुत्व की। हिन्दुत्व वादी समाज सेवक और बुद्धिजीवी भी बातें खूब करते हैं पर उनकी कार्य और विचार शैली जनवादियों और प्रगतिशीलों से उधार ली गयी लगती है। हिन्दुत्व को विचाराधारा बताते हुए वह भी उनकी तरह नारे गढ़ने लगते हैं। नेपाल में हिन्दुत्व के पतन के लिये साम्यवाद या जनवाद पर दोषारोपण करने के पहले इस बात भी विचार करना चाहिये कि वहां के हिन्दू समाज की बहुलता होते हुए भी ऐसा क्यों हुआ?
हिन्दुत्व एक प्राकृतिक विचाराधारा है। हिन्दू दर्शन समाज के हर वर्ग को अपनी जिम्मेदारी बताता है। सबसे अधिक जिम्मेदारी श्रेष्ठ वर्ग पर आती है। यह जिम्मेदारी उसे उठाना भी चाहिए क्योंकि समाज की सुरक्षा से ही उसकी सुरक्षा अधिक होती है। इसके लिये यह जरूरी है कि वह योग्य बुद्धिजीवियों को संरक्षण देने के साथ ही गरीब और मजदूर वर्ग का पालन करे। यही कारण है कि हमारे यहां दान को महत्व दिया गया है। श्रीमद्भागवत गीता में अकुशल श्रम को हेय समझना तामस बुद्धि का प्रमाण माना गया है।
मगर हुआ क्या? हिन्दू समाज के शिखर पुरुषों ने विदेशियों की संगत करते हुए मान लिया कि समाज कल्याण तो केवल राज्य का विषय है। यहीं से शुरु होती है हिन्दुत्व के पतन की कहानी जिसका नेपाल एक प्रतीक बना। आर्थिक शिखर पुरुषों ने अपना पूरा ध्यान धन संचय पर केंद्रित किया फिर अपनी सुरक्षा के लिये अपराधियों का भी महिमा मंडन किया। भारत के अनेक अपराधी नेपाल के रास्ते अपना काम चलाते रहे। वहां गैर हिन्दुओं ने मध्य एशिया के देशों के सहारे अपना शक्ति बढ़ा ली। फिर चीन उनका संरक्षक बना। यहां एक बात याद रखने लायक है कि अनेक अमेरिकी मानते हैं कि चीन के विकास में अपराध से कमाये पैसे का बड़ा योगदान है।
भारत के शिखर पुरुष अगर नेपाल पर ध्यान देते तो शायद ऐसा नहीं होता पर जिस तरह अपने देश में भी अपराधियों का महिमामंडन देखा जाता है उससे देखते हुए यह आशा करना ही बेकार है। सबसे बड़ी बात यह है कि नेपाल की आम जनता ने ही आखिर ऐसी बेरुखी क्यों दिखाई? तय बात है कि हिन्दुत्व की विचारधारा मानने वालों से उसको कोई आसरा नही मिला होगा। नेपाल और भारत के हिन्दुत्ववादी आर्थिक शिखर पुरुष दोनों ही देशों के समाजों को विचारधारा के अनुसार चलाते तो शायद ऐसा नहीं होता। हिन्दुत्व एक विचाराधारा नहीं है बल्कि एक दर्शन है। उसके अनुसार धनी, बुद्धिमान और शक्तिशाली वर्ग के लोगों को प्रत्यक्ष रूप से निम्न वर्ग का संरक्षण करना चाहिये। कुशल और अकुशल श्रम को समान दृष्टि से देखना चाहिये पर पाश्चात्य सभ्यता को ओढ़ चुका समाज यह नहीं समझता। यहां तो सभी अंग्रेजों जैसे साहब बनना चाहते हैं। जो गरीब या मजदूर तबका है उसे तो कीड़े मकौड़ों की तरह समझा जाता है। इस बात को भुला दिया गया है कि धर्म की रक्षा यही गरीब और मजदूर वर्ग अपने खून और पसीने से लड़कर समाज रक्षा करता है।
हमारे देश में कई ऐसे संगठन हैं जो हिन्दुत्व की विचारधारा अपनाते हुए अब गरीबों और मजदूरों के संरक्षण कर रहे हैं। उनको चाहिये कि वह अपने कार्य का विस्तार करें और भारत से बाहर भी अपनी भूमिका निभायें पर वह केवल नारे लगाने तक नहीं रहना चाहिये। इन हिन्दू संगठनों को परिणामों में शीघ्रता की आशा न करते हुए दूरदृष्टि से अपने कार्यक्रम बनाना चाहिये।
नेपाल का हिन्दू राष्ट्र न रहना इतनी बड़ी समस्या नहीं है जितनी परेशानी इस बात पर होने वाली है कि वह एक अप्राकृतिक विचाराधारा की तरफ बढ़ गया है जो वहां की संस्कृति और धर्म के वैसे ही नष्ट कर डालेगी जैसे कि चीन में किया है। भारत और नेपाल के आपस में जैसे घनिष्ट संबंध हैं उसे देखते हुए यहां के आर्थिक, सामाजिक तथा बौद्धिक शिखर पुरुषों को उस पर ध्यान देना चाहिये।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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बड़ा कौन, कलम कि जूता-हास्य व्यंग्य


देश के बुद्धिजीवियों का एक गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया था। गोलमेज सम्मेलन का विषय था कि ‘जूता बड़ा कि कलम’। यह सम्मेलन विदेश में एक बुद्धिजीवी द्वारा सरेराह जूते उछालने की घटना की पृष्ठभूमि में इस आशय से आयोजत किया गया था कि यहां के लोग इस बारे में क्या सोचते हैं? जाने माने सारे बुद्धिजीवी दौड़े दौड़े चले जा रहे थे । एक बुद्धिजीवी तो घर से एक ही पांव में जूता पहनकर निकल गये उनको दूसरा पहनने का होश ही नहीं रहा। रास्ते चलते हुए एक आदमी ने टोका तो वह कहने लगे-‘तुम देश के आम लोग भी निहायत जाहिल हो। तुम मेरे पांव के जूते देखने की सोच भी पा रहे हो यह देखकर ताज्जुब होता है। अरे, अखबार या टीवी नहीं देखते क्या? विदेश में जूता फैंकने की इतनी बड़ी घटना हो गयी और हमें उसी पर ही सोचना है। मैंने एक ही पांव में जूता पहना है पर यह कोई एतिहासिक घटना नहीं है और इस पर चर्चा मत करो।’

कहने का तात्पर्य यह है कि बुद्धिजीवियों के लिये यह एक ऐसा विषय था जिसमें उनकी जमात का ही आदमी जूता फैंकने की घटना में शामिल पाया गया था वैसे तो अपने देश में जूतमपैजार रोज होती है पर बुद्धिजीवियों का काम लिखने पढ़ने और भाषण तक ही सीमित होता है। केाई भला काम हो बुरा उनकी दैहिक सक्रियता स्वीकार नहीं की जातीं। पश्चिम से आयातित विचारों पर चलने वाले बुद्धिजीवियों ने स्वयं ही यह बंदिश स्वीकार की है और किसी बुद्धिजीवी द्वारा सरेराह जूता उछालने की घटना देखकर अब यह प्रश्न उठा था कि क्या वह अपनी इस राह में बदलाव करें। क्या मान लें कि बुद्धिजीवी को कलम के अलावा जूता भी उठाना चाहिये। अगर कहीं ऐसी घटना देश में हेाती तो शायद बुद्धिजीवी विचार नहीं करते मगर यह धटना पश्चिम दिशा से आयी थी इसलिये विचार करना जरूरी था। अपने देश का कोई बुद्धिजीवी होता तो सभी एक स्वर में उसकी निंदा करते या नहीं भी करते। निंदा करते तो उस बुद्धिजीवी को प्रचार होता इसलिये शायद अनदेशा करना ही ठीक समझते या फिर कह देते कि यह तो बुद्धिजीवी नहीं बल्कि एक साधारण आदमी है। विदेश में वह भी पश्चिम में कुछ हो तो यहां का बुद्धिजीवी उछलने लगता है।

सम्मेलन शुरू हुआ। कुछ बुद्धिजीवियों ने इस कृत्य की घोर निंदा की तो कुछ ने प्रशंसा। प्रशंसकों का मानना था कि यह बुद्धिजीवी के देश के आक्रोश का परिणाम है। विरोधियों ने पूछा कि ‘जब अपने पास कलम हैं तो फिर जूते से विरोध प्रदर्शन करना ठीक कैसे माना जा सकता है?’
जूता फैंकने के प्रशंसकों ने कहा-‘लिखे हुऐ का असर नहीं होता तो क्या करेें?’

विरोधियों ने कहा-‘तो ऐसा लिखो कि कोई दूसरा जूता उछाले।’
प्रशंसकों ने कहा-‘अगर कोई दूसरा जूता न उछाले तो आखिर क्या किया जाये?‘
विरोधियों ने कहा-‘अगर आपके लिखे से समाज में कोई दूसरा व्यक्ति सरेराह जूते उछालने को तैयार नहीं है तो फिर उसके लिये लिखने से क्या फायदा?’
प्रशंसकों ने कहा-‘अरे वाह! तुम तो हमारा लिखना ही बंद करवाओगे। तुम पिछडे हुए हो और तुम जानते नहीं कि अब समय आ गया है कि बुद्धिजीवी को एक हाथ में कलम और दूसरे हाथ में जूता उठाना चाहिये।’
यह सुनकर एक पांव में जूता पहनकर आये बुद्धिजीवी को जोश आ गया और उसने अपने पांव से जूता उतार कर हाथ में लिया और चिल्लाया-‘ऐसा करना चाहिये।’
प्रशंसक और विरोधी दोनों खेमों में डर फैल गया। पता नहीं वह कहीं उछाल न बैठे-यह सोचकर लोग जड़वत् खड़े हो गये। सभी को पता था कि अगर उसने जूता उछाला तो वह हीरो बन जायेगा और जिसको पड़ा वह खलनायक कहलायेगा।’
कमबख्त वह आम आदमी भी उस बुद्धिजीवी के पीछे यह जिज्ञासा लेकिर आया कि ‘आखिर यह आदमी कहां जा रहा है और क्या करेगा’ यह चलकर देखा जाये। तय बात है कि आम आदमी ही ऐसा सोचता और करता है कोई बुद्धिजीवी नहीं।

उसने जब यह देखा तो चिल्लाया-‘अरे, यह तो इस कार्यक्रम के न्यौते से ही इतना खुश हो गये कि एक जूता पहनकर चले आये दूसरा पहनना भूल गये-यह बात रास्ते में इन्होंने स्वयं बतायी। अब वह जूता इसलिये पांव से उतार लिया कि कोई पूछे भी नहीं हीरो भी बन जायें। इस एक जूते को लेकर कब तक पहनकर चलते और हाथ में लेते तो लोग अनेक तरह के सवाल करते। अब कौन पूछेगा कि यह एक जूता लेकर कहां घूम रहे हो? यह बोल देंगे कि ‘बुद्धिजीवियों के हाथ में कलम और दूसरे हाथ में जूता लेने का नया रिवाज शुरू हो गया है।’

उस बुद्धिजीवी को ताव आ गया और उसने वह जूता उस आम आदमी की तरफ ऐसे उछाला जैसे कि उसे लगे नहीं-यानि एक प्रतीक के रूप में! वह भी उस्ताद निकला उसने जूता ऐसे ही लपका जैसे क्रिकेट में स्लिप में बायें तरफ झुककर कैच लिया जाता है और भाग गया।

गोलमेज सम्मेलन में कोहराम मच गया। विरोधियों ने उस जूता फैंकने वालूे बुद्धिजीवी की निंदा की तो प्रशंसकों ने भी उसे फटकारा-‘शर्म आनी चाहिये एक आम आदमी पर जूता फैंकते हुए। वह चालाक था इसलिये लेकर भाग गया। बचने की कोशिश करता नजर भी नहीं आया जैसे कि विदेश में हुई घटना में नजर आया है। किसी खास आदमी पर फैंकते तो कुछ एतिहासिक बन जाता। हमने जो विदेश का दृश्य देखा है उससे यह दृश्य मेल नहीं खाता।’

बहरहाल बहस जारी थी। कोई निष्कर्ष नहीं निकला। कई दिन तक बहस चली। अनेक लोग उस पर अपने विचार लिखते रहे। कोई समर्थन करता तो कोई विरोध। आखिर उसी आम आदमी को बुद्धिजीवियों पर दया आ गयी और वह वहां इस सम्मेलन में आया। उसके हाथ में वही जूता था। उसे देखकर सब बुद्धिजीवी भागने लगे। सभी को लगा कि वह मारने आ रहा है। हर कोई यही सोचकर बच रहा था कि ‘दूसरे में पड़े जाये पर मैं बच जांऊ ताकि अगर घटना ऐतिहासिक हो तो उस लिखूं। आखिर एक आम आदमी द्वारा बुद्धिजीवी पर जूता बरसना भी एक एतिहासिक घटना हो सकती थी।

वह आम आदमी ढूंढता हुआ उस बुद्धिजीवी के पास पहूंचा जिसका जूता लेकर वह भागा था और बोला-‘मैं आपका जूता ले गया पर बाद में पछतावा हुआ। मैंने अपनी पत्नी को बताया कि यह जूता एक बुद्धिजीवी ने मेरी तरफ उछाला तो वह बोली कि इससे तुम खास आदमी तो नहीं हो गये! जाओ उसे वापस करे आओ। कहीं उसकी पत्नी उसे डांटती न हो।’

बुद्धिजीवियों में से एक ने पूछा-‘तुम्हें यहां आते डर नहीं लगा यह सोचकर कि ं कोई तुम पर जूता न फैंके।’
आम आदमी ने कहा-‘यह सोचा ही नहीं, क्योंकि आप लोग बिना प्रस्ताव पास हुए कुछ नहीं करते और ऐसी कोई खबर मैंने अखबार में भी नहीं पढ़ी पर आप लोगों को परेशान देखकर सेाचता हूं कि मैं सामने खड़ा हो जाता हूं आम एक एक कर मेरे ऊपर जूता उछालो पर एक बात याद रखना कि वह मुझे लगे नहीं।’
बुद्धिजीवियों को गुस्सा आ गया और वह चिल्लाने लगे कि-‘तू मक्कान है। ठहर अभी तेरे को जूते लगाते हैें।’

वह आदमी हंसता वहीं खड़ा रहा। सभी बुद्धिजीवी एक दूसरे से कहते रहे कि -‘इस आदमी को जूता मारो कोई चिंता वाली बात नहीं है।’

कुछ लोग कहने लगे कि-‘इससे क्या? कोई इतिहास थोड़े ही बनेगा। यह तो एक आदमी है। इसको जूता मारने की कोई खबर नहीं छापेगा। फिर हम में से कौन इसे जूते मार यह तय होना है क्योंकि जिसे इस विषय पर लिखना है वह तो जूता फैंककर उसके समर्थन में तो लिख नहीं सकता। यानि जो वही फैंके जो इस विषय पर लिखना नहीं चाहता।’
इस सभी बुद्धिजीवी एक दूसरे से कहने लगे-तू फैंक जूता मैं तो उस पर लिखूंगा।’
कुछ कहने लगे कि-‘अभी यह तय नहीं हुआ कि बुद्धिजीवी को जूता उठाना चाहिये कि नहीं।’

आम आदमी वहीं खड़ा सब देखता रहा। वह इंतजार करता रहा कि कब उस पर कौनसा सर्वसम्मत प्रस्ताव पास होता है। वह कई चक्कर लगा चुका है पर अभी भी वह यह जानना चाहता है कि‘बुद्धिजीवी को कलम के साथ जूता भी चलाना चाहिये कि नहीं।’
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हास्य व्यंग्य-अपना अपना राग-hasya vyangya


देश के बुद्धिजीवियों के लिये इस समय कुछ न कुछ लिखने के लिये ऐसा आ ही जाता है जिसमें उनको संकुचित ज्ञान को व्यापक रूप से प्रस्तुत करने का अवसर मिल जाता है। देश में निरंतर हो रही आतंकी घटनाओं ने विचाराधारा पर अनेक भागों में बंटे बुद्धिजीवियों को अपने दृष्टिकोण से हर हादसे पर विचार व्यक्त करने का अवसर दिया है। घटना से पीडि़त लोगो के परिवारों के हाल पर कोई नहीं लिख रहा पर हादसों के आधार पर बहसों के दौर शुरू हो गये हैं।

पिछले कई दिनों से लग रहा था कि विचाराधारा के आधार पर लिखने पढ़ने वालों के दिल लद गये और अब कुछ नवीनतम और सत्य लिखकर नाम कमाया जा सकता है पर हमारे जैसे लोगों के दिन न पहले आये और न आयेंगे। हम तो सामाजिक और वैचारिक धरातल पर जो समाज में कहानियां या विषय वास्तव में रहते हैं उस पर लिखने के आदी हैं। विचाराधारा के लोग न केवल पूर्वाग्रह से सोचते हैं बल्कि किसी भी घटना पर संबंधित पक्ष की मानसिकता की बजाय अपने अंदर पहले से ही तय छबि के आधार पर आंकलन कर अपना निष्कर्ष प्रस्तुत कर देते हैं। चूंकि समाज पर बड़े लोगों का प्रभाव है इसलिये उनके पास अपनी विचारधारा के आधार पर इन बुद्धिजीवियों का समूह भी रहता है। इन्हीं बड़े लोगों का सभी जगह नियंत्रण है और अखबार और टीवी चैनल पर उनके समर्थक बुद्धिजीवियेां को ही प्रचार मिलता है। ऐसे मेें शुद्ध सामाजिक एवं वैचारिक आधार वाले समदर्शी भाव वाले लेखक के लिये कहीं अपनी बात कहने का मंच ही नहीं मिल पाता।

इधर अंतर्जाल पर लिखना शुरू किया तो पहले तो अच्छी सफलता मिली पर अब तो जैसे विचारधारा पर आधारित सक्रिय बुद्धिजीवियों को देश मेंं हो रहे हादसों ने फिर अपनी जमीन बनाने का अवसर दे दिया। अब हम लिखें तो लोग कहते हैं कि तुम उस ज्वलंत विषय पर क्यों नहीं लिखते! हमने गंभीर चिंतन,आलेख और कविताओं को लिखा। मगर फिर भी फ्लाप! क्योंकि हम किसी का नाम लेकर उसे मुफ्त में प्रचार नहीं दे सकते। वैसे तो समाज को बांटने के प्रयासों के प्रतिकूल जब हमने पहले लिखा तो खूब सराहना हुई। वाह क्या बात लिखी! अब लगता है कि हमारे दिल लद रहे हैंं।
तब ऐसा लग रहा था कि समाज अब भ्रम से निकलकर सच की तरफ बढ़ रहा है पर हादसों ने फिर वैचारिक आधार पर बंटे बुद्धिजीवियों को अपनी बात कहने का अवसर दे दिया। यह बुद्धिजीवी बात तो एकता की करते हैं मगर उससे पहले समाज को बांट कर दिखाना उनकी बाध्यता है। उनके तयशुदा पैमाने हैं कि अगर दो धर्म, जातियों या भाषाओं के बीच विवाद हो तो एक को सांत्वना दो दूसरे को फटकारो। ऐसा करते हुए यह जरूर देखते हैं कि उनके आका किसको सांत्वना देने से और किसको फटकारने से खुश होंगे।

एकता, शांति और प्रेम का संदेश देते समय छोड़ मचायेंगे। इतिहास की हिंसा को आज के संदर्भ में प्रस्तुत कर अहिंसा की बात करेंगे।

जिस धर्म के समर्थक होंगे उसे मासूम और जिसके विरोधी होंगे उसके दोष गिनायेंगे। मजाल है कि अपने समर्थक धर्म के विरुद्ध एक भी शब्द लिख जायें। जिस जाति के समर्थक होंगे उसे पीडि़त और जिसके विरोधी हों उसे शोषक बना देंगे। यही हाल भाषा का है। जिसके समर्थक होंगे उसको संपूर्ण वैज्ञानिक, भावपूर्ण और सहज बतायेंगे और जिसके विरोधी हों तो उसकी तो वह हालत करेंगे जो वह पहचानी नहीं जाये।
मतलब उनका केंद्र बिंदु समर्थन और विरोध है और इसलिये उनके लेखक में आक्रामकता आ जाती है। ऐसे में समदर्शिता का भाव रखने वाले मेरे जैसे लोग सहज और सरल भाषा में लिखकर अधिक देरी तक सफल नहीं रह सकते। इनकी आक्रामकता का यह हाल है कि यह किसी को राष्ट्रतोड़क तो किसी को जोड़क तक का प्रमाणपत्र देते हैं। बाप रे! हमारी तो इतनी ताकत नहीं है कि हम किसी के लिये ऐसा लिख सकें।

इन बुद्धिजीवियों ने ऐसे इतिहास संजोकर रखा है जिस पर यकीन करना ही मूर्खता है क्योंकि इनके बौद्धिक पूर्वजों ने अपना नाम इतिहास में दर्ज कराने के लिये ऐसी किताबें लिख गये जिसको पढ़कर लोग उनकी भ्रामक विचाराधारा पर उनका नाम रटते हुए आगे बढ़ते जायेंं। ऐसा तो है नहीं कि सौ पचास वर्ष पूर्व हुए बुद्धिजीवी कोई भ्रमित नहीं रहे होंगे बल्कि हमारी तो राय है कि उस समय ऐसे साधन तो थे नहीं इसलिये अधिक भ्रमित रहे होंगे। फिर वह कोई देवता तो थे नहीं कि हर बात सच मान जी जाये पर उनके समर्थक इतने यहां है कि उनसे विरोधी बुद्धिजीवी वर्ग के ही लोग लड़ सकते हैं। समदर्शी भाव वाले विद्वान के लिये तो उनसे दो हाथ दूर रहना ही बेहतर है। अगर नाम कमाने के चक्कर में हाथ पांव मारे तो पता पड़ा कि सभी विचारधारा के बुद्धिजीवी कलम लट्ठ की तरह लेकर पीछे पड़ गये।
इतिहास के अनाचार, व्याभिचार और अशिष्टाचार की गाथायें सुनाकर यह बुद्धिजीवी समाज में समरसता का भाव लाना चाहते हैं। ऐसे में अगर किसी प्राचीन महान संत या ऋषि का नाम उनके सामने लो तो चिल्ला पड़ते हैं-अरे, तुझे तो पुराने विषय ही सूझते हैं।‘

अब यह बुद्धिजीवी क्या करते हैं उसे भी समझ लें
किसी जाति का नाम लेंगे और उसको शोषित बताकर दूसरी जाति को कोसेंगे। मतलब शोषक और और शोषित जाति का वर्ग बनायेंगे। फिर जायेंगे शोषित जाति वाले के पास‘उठ तू। हम तेरा उद्धार करेंगे। चल संघर्ष कर।’

फिर शोषक जाति वाले के पास जायेंगे और कहेंगे-‘हम बुद्धिजीवी हैं हमारा अस्तित्व स्वीकारा करो। हमसे बातचीत करो।’

तय बात है। फिर चंदे और शराब पार्टी के दौर चलते हैं। इधर आश्वासन देंगे और उधर सिंहासन लेंगे। अब अगर यह समाज को बांट कर समाज को नहीं चलायेंगे तो फिर इनका काम कैसे चलेगा।

ऐसे ही धर्म के लिये भी करेंगे। एक धर्म को शोषक बताकर उसे मानने वाले से कहेंगे-‘उठ तो अकेला नहीं है हम तेरे साथ हैं। उठ अपने धर्म के सम्मान के लिये लड़। तू चाहे जो गलती कर हम तुझे और तेरे धर्म को भले होने का प्रमाणपत्र देंगे।’

दूसरे धर्म वाले के पास तो वह जाते ही नहीं क्योंकि उसके लिये प्रतिकूल प्रमाणपत्र तो वह पहले ही तैयार कर चुके होते हैं। फिर शुरू करेंेगे इधर आश्वासन देने और उधर सिंहासन-यानि सम्मान और को पुरस्कार आदि-लेने का काम।’

मतलब यही है कि अब फिर वह दौर शुरू हो गया है कि हम जैसे समदर्शी भाव के लेखक गुमनामी के अंधेरे में खो जायें, पर यह अंतर्जाल है यहां सब वैसा नहीं है जैसा लोग सोचते हैं। यही वजह है कि लिखे जा रहे हैं। समदर्शिता के भाव में जो आनंद है वह पूर्वाग्रहों में नहीं है-अपने लेखन के अनुभव से यह हमने सीखा है। इसमें इनाम नहीं मिलते पर लोगों की वाह वाह दिल से मिलती है। अगर प्रकाशन जगत ने हमें समर्थन दिया होता तो शायद हम भी कहीं विचाराधाराओं की सेवा करते होते। ऐसी कोशिश यहां भी हो रही है पर यहां हर चीज वैसी नहीं है जैसे लोग सोचते हैं। सो लिखे जा रहे हैं। वैसे इन बुद्धिजीवियों का ज्ञान तो ठीक ठाक है पर अपना चिंतन और मनन करने का सामथर्य उनमें नहीं है। वैसे उनके आका यह पसंद भी नहीं करते कि कोई अपनी सोचे। हां, अब तो अंतर्जाल पर भी चरित्र प्रमाण पत्र बांटने का काम शुरू हो गया है। देखते हैं आगे आगे होता है क्या। यह आश्वासन और सिंहासन का खेल है हालांकि समाज का आदमी इसे देखता है पर उसका निजी जीवन अब इतना कठिन है कि वह इसमें दिलचस्पी नहीं लेता।

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यह कविता इस ब्लॉग

‘दीपक भारतदीप की शब्द प्रकाश-पत्रिका’

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बुद्धिजीवी समझाते है,पर समाज समझता नहीं-व्यंग्य आलेख


बहुत दिन से हमारे दिमाग में यह बात नहीं आ रही कि आखिर कौन किसको क्या और क्यों समझा रहा है? कब समझा रहा है यह तो समझ में आ रहा है क्योंकि चाहे जब कोई किसी को समझाने लगता है? मगर माजरा हमारी समझ में नहीं आ रहा है। कहीं छपा हुआ पढ़ते हैं या कोई दिखा रहा है तो उसे पढ़ते हैं, मगर समझ में कुछ नहीं आ रहा है।

देश में अनेक जगह पर बम फटे उसमें अनेक लोग हताहत हुए और कई परिवारों पर संकट टूट पड़ा। सब जगह तफशीश चल रही है पर इधर बुद्धिजीवियों ने देश में बहस शुरू कर दी है। अमुक धर्म देश तोड़ता है और अमुक तो प्रेम का संदेश देता है। जाति, भाषा और धर्म के लोग बहस किये जा रहे हैं। किसी से पूछो कि भई क्या बात है? आखिर यह बहस चल किस रही है।’

जवाब मिलता है कि ‘क्या करें विषयों की कमी है।’

जवाब सुनकर हैरानी होती है। फिर सोचते हैं कि ‘जिनको वाद और नारों पर चलने की आदत हो गयी है कि उनके लिये यह कठिनाई तो है कि जो विषय अखबार और टीवी पर दिखता हो उसके अलावा वह लिखें किस बात पर? फिर आजकल लो आलेख और व्यंग्य तात्कालिक मुद्दों पर लिखने के सभी अभ्यस्त हैं। वाद और नारों जमीन पर खड़े लेखक लोग समाज की थोड़ी हलचल पर ही अपनी प्रतिक्रिया देना प्रारंभ कर देते हैं। आदमी का नाम पूछा और शुरू हो गये धर्म, जाति और भाषा के नाम पर एकता का नारा लेकर। अगर अपराधी है तो उसकी जाति,भाषा और धर्म की सफाई की बात करते हुए एकता की बात करते हैं। हमारे एक सवाल का जवाब कोई नहीं देता कि क्या ‘आतंकी हिंसा अपराध शास्त्र से बाहर का विषय है?’

अगर आजकल के बुद्धिजीवियों की बातें पढ़ें और सुने तो लगता है कि यह अपराध शास्त्र से बाहर है क्योंकि इसमें हर कोई ऐसा व्यक्ति अपना दखल देकर विचार व्यक्त करता है जैसे कि वह स्वयं ही विशेषज्ञ हो। व्यवसायिक अपराध विशेषज्ञों की तो कोई बात ही नहीं सुनता। अपराध के तीन कारण होते हैं-जड़ (धन),जोरु (स्त्री) और जमीन। मगर भाई लोग इसके साथ जबरन धर्म, जाति और भाषा का विवाद जोड़ने में लगे हैं। यानि उनके लिये यह अपराध शास्त्र से बाहर का विषय है।

हम तो ठहरे लकीर के फकीर! जो पढ़ा है उस पर ही सोचते हैं। कभी सोचते हैं कि अपराध शास्त्र के लोग अपने पाठ्यक्रम का विस्तार करें तो ही ठीक रहेगा। अब इन तीनों चीजों के अलावा तीन और चीजें भी अपराध के लिये उत्तरदायी माने-धर्म,जाति और भाषा।’

यहां यह स्पष्ट कर दें कि हमने अपराध शास्त्र नहीं पढ़ा उनका एक नियम हमने रट रखा है कि अपराध केवल जड़,जोरु और जमीन के कारण ही होता है। अगर अपराध शास्त्री उसमें तीन से छह कारण जोड़ लें तो हम भी अपनी स्मृतियों में बदलाव करेंगे। अपने दिमागी कंप्यूटर में तीन से छह कारण अपराध के फीड कर देंगे। बाकी जो अन्य विद्वान है उनसे तो हम इसलिये सहमत नहीं हो सकते क्योंकि हम भी अपने को कम विद्वान नहीं समझते। एक विद्वान दूसरे विद्वान से सहमत नहीं होता यह भी हमने कहीं पढ़ा तब से चाहते हुए भी असहमति व्यक्त कर देते हैं ताकि मर्यादा बनी रहे। हां, कोई अपराध शास्त्री कहेगा तो उसे मान जायेंगे। इतना तो हम भी जानते हैं कि अपने से अधिक सयानों की बात मान लेनी चाहिये।

सभी आतंकी हिंसा की घटनाओं की चर्चा करते हैंं। हताहतों के परिवारों पर जो संकट आया उसका जिक्र करने की बजाय लोग उन मामलों में संदिग्ध लोगों पर चर्चा कर रहे हैं। उनके धर्म और जाति पर बहस छेड़े हुए हैं। अब समझाने वालों के जरा हाल देखिये।

एक तरफ कहते हैं कि दहशत की वारदात को किसी धर्म,जाति या भाषा से मत जोडि़ये। दूसरी तरफ जब वह उस पर चर्चा करते हैं तो फिर अपराधियों की जाति, भाषा और धर्म को लेकर बहस करते हैं। वह धर्म ऐसा नहीं है, वह जाति तो बहुत सौम्य है और भाषा तो सबकी महान होती है। अब समझ में नहीं आता कि वह कि हिंसक घटना से धर्म, जाति और भाषा से अलग कर रहे हैं या जोड़ रहे हैं। यह हास्याप्रद स्थिति देखकर कोई भी हैरान हो सकता है।

फिर कहते हैं कि संविधान और कानून का सम्मान होना चाहिये। मगर बहसों में संदिग्ध लोगों की तरफ से सफाई देने लगते हैं। एक तरफ कहते हैं कि अदालतों में यकीन है पर दूसरी तरफ बहस करते हुए किसी के दोषी या निर्दोष होने का प्रमाण पत्र चिपकाने लगते हैं। इतना ही नहीं समुदायों का नाम लेकर उनके युवकों से सही राह पर चलने का आग्रह करने लगते हैं। हम जैसे लोग जो इन वारदातों को वैसा अपराध मानते हैं जैसे अन्य और किसी समुदाय से जोड़ने की सोच भी नहींं सकते उनका ध्यान भी ऐसे लोगों की वजह से चला जाता है।

इस उहापोह में यही सोचते हैं कि आखिर लिखें तो किस विषय पर लिखें। अपराध पर या अपराधी के समुदाय पर। अपराध की सजा तो अदालत ही दे सकती है पर अपराधी की वजह से जाति,धर्म, और भाषा के नाम पर बने भ्रामक समूहों की चर्चा करना हमें पसंद नहीं है। ऐसे में सोचते हैं कि नहीं लिखें तो बहुत अच्छा। जिन लोगों ने इन वारदातों में अपनी जान गंवाई है उनके तो बस जमीन पर बिखरे खून का फोटो दिखाकर उनकी भूमिका की इतिश्री हो जाती है और उनके त्रस्त परिवार की एक दो दिन चर्चा रहती है पर फिर शुरू हो जाता है अपराधियों के नाम का प्रचार। हादसे से पीडि़त परिवारों की पीड़ा को इस तरह अनदेखा कर देने वाले बुद्धिजीवियों को देखकर उनके संवेदनशील होने पर संदेह होता है।

फिर शुरू होता है समझने और समझाने का अभियान। इस समय सभी जगह यह समझने और समझाने का अभियान चल रहा है। हम बार बार इधर उधर दृष्टिपात करते हैं पर आज तक यह समझ में नहीं आया कि कौन किसको क्या और क्यों समझा रहा है? समझाने वाला तो कहीं लिखता तो कहीं बोलता दिखता है पर वह समझा किसको रहा है यह दिखाई नहीं देता।
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